Wednesday, 28 June 2017

पायो परम बिश्रामु

समापन भाग
नारी के साथ भी ऐसा ही है। वह सुख देने वाली है, सेवा देने वाली है, परिवार को सही राह पर रखने वाली है, वह पुत्र को जन्म देती है, लेकिन अगर वह गलत दिशा में जा रही है, तो क्या किया जाए? यहां ताडऩा का मतलब पीटना नहीं है। आंख दिखाना भी ताडऩा है, सुधारने के लिए धमकाना भी ताडऩा ही है। कोई न माने, तो ताडऩा में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन यह मानना कि मारने के लिए ही लिखा गया है, ऐसा किसी परंपरा में नहीं है। कोई प्यार करता है, पीटना हुआ क्या, नारी पर ही घर को छोड़ दिया जाता है, बीमार पडऩे पर नारियों का भी उपचार कराया जाता है, कोई वहां अस्पताल में उन्हें पीटता है क्या?
अमरीका में  २५ प्रतिशत से ज्यादा अश्वेत लोग जेलों में हैं, क्यों? वे अपराध करते हैं, इसलिए उनके साथ ऐसा करना पड़ा है, इसे कोई गलत कहेगा क्या? ऐसा नहीं है कि हर अश्वेत को जेल में डाल दिया जाता है। 
देखना पड़ेगा, नारियों को जिस तरह से भारत में अनादिकाल से मान मिला, वैसा कहीं नहीं मिला। गोस्वामी जी ने जब रामायण शुरू किया, तो सबसे पहले नारी का ही नाम लिया। प्रथा तो सबसे पहले गणेश जी की पूजा की है, लेकिन गोस्वामी जी ने कहा कि मैं नारी का पक्षधर हूं, सीता जी के लिए ही जीवन जीता हूं। उनकी वंदना से शुरुआत हुई। महर्षि वाल्मीकि ने तो रामायण का नाम ही सीताचरित रखा है। यहां लक्ष्मी जी, दुर्गा जी, सरस्वती जी, सारी जो मुख्य शक्तियां वे देवियां हैं। अपने देश में जब लोकतंत्र आया, तो इंदिरा गांधी को लोगों ने सबसे बड़े पद पर पहुंचाकर आदर दिया, वर्षों तक पद पर रखा, यदि यह धारणा होती है कि नारी तो पीटने ही योग्य है, तो उन्हें कौन प्रधानमंत्री बनाता। सोनिया गांधी आज नारी हैं, लेकिन पूरी पार्टी के लोग उन्हें सिर पर लिए हुए हैं। ऐसा किस देश में है, कहां है। अमेरिका में ऐसा है क्या, चीन में इतने बड़े-बड़े नेता हुए, नारी कहां है, उनकी पत्नियां कहां हैं? कहां गईं? दुनिया में नारी को बड़े पद पर चढऩे नहीं दिया गया, लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ। धर्म के सबसे बड़े क्षेत्र उत्तर प्रदेश में भी मायावती जी को भी पूरा सम्मान दिया गया। 
जहां जरूरत पड़े, वहां ब्राह्मण की भी ताडऩा होती है, क्षत्रिय की भी होती है, केवल शूद्र की ही नहीं होती। सुधार के लिए ही ताडऩा होनी चाहिए। यह कोई दूषित परंपरा नहीं है, यह कोई आलोचना नहीं है, यह कोई संकीर्णता से जुड़ी परंपरा नहीं है। यहां देखिए कि मंदोदरी का कितना सम्मान है, रावण को शिक्षा देती है। तारा का कितना सम्मान है। बाली को मारा। पूछा बाली ने कि आपने क्यों मारा?
उत्तर दिया, जब तुम्हें मालूम हो गया कि जब मैं पक्षधर हो गया सुग्रीव का, तब तुम्हें युद्ध नहीं करना चाहिए था। तुमने छोटे भाई की पत्नी को ही रख लिया। जिस पत्नी के साथ एक छत के नीचे तुम रहते हो, मोक्ष के अवलंब के रूप में उसे स्वीकार करते हो, जो घर की संरक्षिका है, जो घर का प्रकाश है, कितने तरह के अवसर तुम्हें उसके साथ सुख के मिलते हैं, तुमने उसकी सही बात को नहीं माना। इससे अधिक नारी का सम्मान क्या होगा?
इसलिए धर्म में स्त्रियों की बराबर की सहभागिता है। पुरुष जलता है हवन में तो वह दाहिने हाथ में हाथ लगाती है और पुण्य में आधी भागीदारी होती है। गोपियों को समाज ने जाने दिया, तभी तो भगवान के यहां गईं भक्ति की आचार्य हो गईं, तो यह सम्मान है कि जाने दिया, माताओं का कितना बड़ा सम्मान है।  
जब राम जी जंगल में जाने लगे, तो उनकी 350 माताएं थीं। राम जी ने कहा कि जैसे मैंने कौसल्या, कैकयी, सुमित्रा को सम्मान दिया, आपके लिए भी वैसा किया है, आपको पिता दशरथ जी का पत्नी माना, इसलिए माना, क्योंकि जो हमारे पिता के लिए सम्मान स्नेह प्रदर्शित करता है, जो यह कहता है कि मेरा जीवन इनको सुख देने के लिए है, उसे मैं सम्मान अवश्य दूंगा। कोई भूल हुई हो, तो क्षमा करना, पुन: मैं १४ वर्ष बाद आपकी सेवा में हाजिर हो जाऊंगा। 
वाल्मीकि रामायण में यह लिखा है।
ताडऩा के बारे गोस्वामी जी ने लिखा, केवल सुधार के लिए। ऐसा उदाहरण होना चाहिए कि जिससे दूसरों को समझ में आए। उनमें संकीर्णता का कोई भाव नहीं है। सभी लोगों को वे समान भाव से जोड़ते हैं। राम जी निषादराज को गले लगा रहे हैं। सारी दुनिया को सीखना चाहिए कि यह कोई संकीर्ण परंपरा नहीं है। हमारी परंपरा हमारी शिक्षाएं उज्ज्वल हैं। सनातन धर्म आकाश के सामान उदार है, सभी के लिए है, सबके लिए उसमें सम्मान की भावना है, विकास के लिए प्रेरणा है। सभी तरह की शक्ति देने का उदार भाव है। गोस्वामी जी को सही भाव से देखते हुए उनकी बातों को समझना चाहिए और तभी हमें सुख मिलेगा। 
जयसियाराम

ढोल गंवार शूद्र पशु नारि

भाग - ५
गोस्वामी जी के साहित्य में जो स्थापनाएं हैं, उनके विचारों के क्रम में ऐसे विचार भी प्रकट हुए, जिन्हें आपदात: देखने से लगता है कि वे संकीर्ण विचाराधारा के हैं, उनका विचार सांप्रदायिक है। वे संकीर्ण दायरे से प्रेरित होकर चल रहे हैं, यह भी उन पर लांछन लगता है।  
ढोल गंवार शूद्र पशु नारि सकल ताडऩा के अधिकारी
ढोल की ताडऩा में किसी को दिक्कत नहीं है। उसे जोर से लगाना ही पड़ता है, तभी आवाज निकलती है। जो आदमी विचारों से विकसित नहीं है, बिल्कुल ही कुछ नहीं समझता है, विवेकहीन है, शास्त्र का अध्ययन नहीं किया, इसके लिए उसे डराकर उसे विकास के लिए प्रेरित करना, इसमें विवाद नहीं है कि गंवार आदमी को रास्ते पर लाना चाहिए। 
छोटी आयु में ताडऩा की जरूरत पड़ती है, राम और कृष्ण को भी उनकी माता डराती थीं, कभी कान गरम करना भी होता होगा। अपने बच्चों को सही मार्ग पर रखने के लिए आज भी अभिभावक करते हैं। पशु को भी सत्संग सुनाकर आप श्रेष्ठ नहीं बना सकते। यह उचित नहीं है कि पशु से सबकुछ कराया जा सके, उसे अनुशासित रखने के लिए हम उसे डराते हैं, बांधते हैं, घेरते हैं। 
अब शूद्र की चर्चा। कितने शूद्रों के साथ राम की मुलाकात हुई, राम जी ने भी सबको गले लगाया, निषादराज, केवट शूद्र हैं। कोल-भील्ल, जो बड़े अपराधी हैं। उनको राम जी ने अपने प्रभाव से, स्नेह से उनमें परिवर्तन लाया। उन्हें किसी की पिटाई नहीं करनी पड़ी। न आंखें दिखानी पड़ीं, किसी तरह की ताडऩा की जरूरत नहीं पड़ी। जहां जो लोग नहीं मानते, जो लोग नहीं समझ पाते, उन्हें मारने के लिए राम जी ने धनुष उठाया। खर दूषण को मारा, राक्षस जाति के बहुत बिगड़े हुए लोगों को मारा। राम जी को कोई नहीं कहता कि वे शूद्र विरोधी हैं, क्योंकि असंख्य शूद्रों को उन्होंने श्रेष्ठ जीवन दिया। जहां औषधि काम नहीं करती, वहां डॉक्टर ऑपरेशन करते हैं। 
हम दवाई तभी तक लेते हैं, जब तक उसका असर दिखता है, लेकिन जब दवाई काम नहीं करे, तो ऑपरेशन करना ही पड़ेगा। जब यह लगता है कि किसी व्यक्ति को सुधारने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन प्रयास बार-बार नाकाम हो रहा है, तो उसका एनकाउंटर हो जाता है। बड़े अपराधी को भी अच्छे विचारों, कानूनों से सुधारने की भी कोशिश होती है। 
जो नहीं मानते, उनको सुधारने की वैदिक क्रिया मानी जाति है कि ताडऩा दी जाए। ढोलक को तभी पीटा जाता है, जब आवाज की जरूरत हो। ढोलक को भी कोई यों दिन-रात नहीं पीटा जाता। गलत लोगों को रास्ते पर लाने के लिए ताडऩा कई बार जरूरी हो जाती है। गलत लोगों के जीवन को सही जगह पहुंचाने के लिए ताडऩा अनुचित नहीं है। ऐसा नहीं है कि शूद्रों की पिटाई के लिए ही कहा गया है। पशु भी प्रिय होते हैं, लोग उनसे खूब प्यार करते हैं। उसे कोई यों ही नहीं ताडऩा देता। 
क्रमश:

पायो परम बिश्रामु

भाग - ४
अभी तमाम तरह की विकृतियों से युक्त जो लोग हो रहे हैं, उन्हें गोस्वामी जी को अवश्य पढऩा चाहिए। सभी लोग उसी रीति से प्रयास करें। रामचरितमानस कालजयी रचना है। गोस्वामी जी की सभी रचनाएं मानक हैं। 
सृष्टि के लिए सबकुछ शुभ-शुभ मंगल देने वाला, हमें उनके बारह ग्रंथों के रूप में प्राप्त हुआ। वह केवल किसी मरे हुए को जिंदा कर देना, किसी बीमार को जिंदा कर देना, ये चमत्कारिक घटनाएं बहुत छोटी हैं।
करपात्री जी महाराज कहते थे कि सनातन धर्म में ऐसे चमत्कार दिखाने वाले लौंडा महात्मा होते हैं। गंगा में पैदल चल गया, इससे मानव जाति या सृष्टि का कोई भला नहीं होगा। इससे तो बेहतर वे लोग हैं जो ठगी कर रहे हैं। जब तक आदमी सही कर्म से नहीं जुड़ेगा, उसका कल्याण नहीं होगा। 
गोस्वामी जी ने इतना सब किया, उनसे लोगों ने पूछा कि आपने क्या किया, आपको क्या मिला? उन्होंने उत्तर दिया - पायो परम विश्राम... मैंने परम विश्राम को प्राप्त कर लिया। अब कभी थकावट नहीं होगी। हमने धन्य जीवन को प्राप्त कर लिया। राम जी की कृपा से ही यह प्राप्त हुआ। 
जैसे मनुष्य राष्ट्र के लिए सबकुछ करे, लेकिन महत्व ईश्वर को दे। उनकी कृपा से ऐसा हो गया। हनुमान जी ने लंका में खूब काम किए, लेकिन कहा कि मैंने कुछ नहीं किया, जो भी किया राम जी की कृपा से किया। 
राम भाव और रावण भाव में यही फर्क है। लंका के लोग कहते हैं कि यह जो भी किया मैंने किया, मैंने ही किया, लेकिन अयोध्या के लोग कहते हैं, जो किया ईश्वर ने किया, उन्हीं की कृपा से सब संभव हुआ। भारत से सारी बुराइयों को निकालने का मार्ग यही है कि कर्म का श्रेय ईश्वर को दिया जाए। गोस्वामी जी के पास कर्म योग भी है, ज्ञान योग भी है। कहा लोगों ने कि यह पहला महाकाव्य है कि जिसमें इतिहास भी है, दर्शन भी है, काव्य भी है, ऐसा कोई भी महाकाव्य नहीं है, जिसे इतिहास भी कहा जाए, काव्य भी कहा जाए और दर्शन भी कहा जाए। 
उनके ग्रंथ सूर्य के समान हैं, जो सबको जीवनी शक्ति देता है। गोस्वामी जी भक्त शिरोमणि हैं। हनुमान जी को भी भक्त शिरोमणि कहा जाता है, वे भक्त भी हैं ज्ञानी भी हैं, कर्मयोगी भी हैं। लोगों को धन्य जीवन देने वाले, करोड़ों लोग इससे प्रेरित होकर जीवन जी रहे हैं। 
संपूर्ण संसार के लोगों को यह कहना चाह रहा हूं कि शास्त्रों के संदर्भ में देखिए कि हम क्या कर रहे हैं, कहीं गलत तो नहीं कर रहे। सब शास्त्र सम्मत कर रहे हैं क्या? धन कमाना, परिवार कमाना, शक्ति कमाना, साथ-साथ ईश्वर प्रेम से ओतप्रोत होना। भगवान की संतुष्टि के लिए हम कर्म करें। लोगों को दिखाने के लिए हम न करें। गोस्वामी जी का जो जीवन काल है, उससे लेकर आज तक वे एक बड़े समुदाय के लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। 
हमें उन पर चर्चा करते हुए और भी खुशी हो रही है कि वे रामानंद संप्रदाय की परंपरा से आते हैं। जिस पीठ में मैं सेवारत हूं, उसकी चौथी पीढ़ी में गोस्वामी जी का अवतरण हुआ। रामानंदाचार्य जी के शिष्य अनंतानंद जी थे, उनके शिष्य नरहरिदास जी और उनके शिष्य हुए तुलसीदास जी। तुलसीदास जी ने लिखा है कि नरहरिदास जी अगर नहीं मिले होते, तो मैं नहीं मानता कि दया नाम की कोई चीज है। मेरा जीवन बिलख रहा था, कोई छाया नहीं थी, लेकिन नरहरिदास जी ने मेरे लौकिक जीवन को भी संभाला, ज्ञान की धारा से भी जोड़ा, सर्वश्रेष्ठ भक्ति की धारा में खड़ा करके मुझे धन्य बना दिया। 
कहा जाता है कि हनुमान जी ने राम जी को वश में कर लिया था, कहा जा सकता है कि गोस्वामी जी ने भी राम जी को वश में कर लिया। आपको जो भी चाहिए कि राम जी के जैसा जीवन करके प्राप्त कीजिए। हम सभी के लिए वे गौरव हैं। 
क्रमश:

Sunday, 16 April 2017

सब नर करहीं परस्पर प्रीती

पायो परम बिश्रामु
भाग - ३
संसार में तलवार के बल पर भी कई लोगों ने अपनी बात को स्थापित करने का प्रयास किया। जब वे अपने को सिद्ध मानने लगे, तो मक्का वालों को कहा कि आप लोग मेरी बात मानिए, मुझे ईश्वर दूत, प्रतिनिधि मानिए। वहां के लोगों ने कहा कि हम नहीं मानते कि आप ईश्वर का संदेश लेकर आए हैं, तो वे मदीना चले गए, वहां उन्होंने लोगों को अपने विचारों से सहमत किया। वह उनके मामा का गांव था, वहां से आकर उनके लोगों ने मक्का वालों को कहा कि जो बात मानेगा, वही मक्का में रहेगा। हमारी बात मानो।  
इधर तो राम जी सभा को संबोधित करते हुए कहते हैं कि मैंने जो कहा, उसमें जो भी गलत हो, वेद, शास्त्र और नीति विरुद्ध हो, तो आप मेरी बात को नहीं मानिए, कहीं से भी मैं हिंसक होकर, मनमानी करके मैं अपनी बात को आपसे मनवाना नहीं चाहता। 
लंका में भी उन्होंने तभी युद्ध किया, जब सारे अन्य प्रयास विफल हो गए। उनके संपूर्ण प्रयास सकारात्मक थे। आज दुनिया में तमाम तरह के ग्रंथ बनते हैं, लेकिन किसी की समकक्षता गोस्वामी जी के ग्रंथों से नहीं होती। वे केवल ईश्वर प्रेम को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। गोस्वामी जी ने वही किया, जो राम जी ने किया। 
कहा जाता है कि दुनिया में रामचरितमानस फिर बनने वाला नहीं है। कई लोग रामायण लिखकर गोस्वामी तुलसीदास बनना चाहते हैं, लेकिन यह संभव नहीं है। लेकिन लोगों के पास राम जी हों, तब तो ऐसे ग्रंथ की रचना हो। यदि राम जी मिल भी गए, तो तुलसीदास जी का मन कहां से लाएंगे। पूरी दुनिया में इस स्तर के महाकाव्य की रचना नहीं हो पाई। तुलसीदास जी की कोई तुलना नहीं है। उन जैसी प्रतिभा कहां से आएगी? 
इस दुनिया में जितने मांगलिक भाव हैं, उन सबका समुद्र ईश्वर माना जाता है। हमारा ईश्वर समुद्र है, उसके अवतार भी समुद्र हैं। यह केवल परोक्ष ज्ञान में नहीं है, अपरोक्ष ज्ञान में भी है। रावण को भी अपरोक्ष ज्ञान होता, तो वह महापाप नहीं करता। ज्ञान उसके हृदय में कभी नहीं उतरा। उसे केवल ऊपरी ज्ञान था। 
राम जी मनुष्यावतार हैं, वे सबकुछ जानते हैं, लेकिन उन्होंने ज्ञान का संग्रह किया। अपने चरित्र में ज्ञान को उतारा और अपने संपूर्ण अवतारकाल में लोगों को वह ज्ञान दिया, गुणों को प्रसारित किया, तभी रामराज्य की स्थापना हो पाई। सभी लोग उसी तरह से जीवन जीने लगे। रामराज्य में लोग केवल राम जी से ही प्रेम नहीं कर रहे हैं, उनमें परस्पर भी प्रीति है। 
सब नर करहीं परस्पर प्रीती
ईश्वर के लिए समर्पित होकर हम कर्म करें। इससे ऐसे समाज की रचना होती है, जो समाजवाद कभी नहीं कर सकता, लोकतांत्रिक पार्टियां ऐसा नहीं कर सकतीं। ईश्वर को नहीं मानने वाला भी कर्मयोगी कहलाता है, महर्षि अरविंद ने ऐसा उल्लिखित किया। वेदों, पुराणों को नहीं मानने वाला भी बोलता है कि मैं कर्म योगी हूं। वेदों से जो धारा आई थी वाल्मीकि रामायण में, उसमें एक अद्भुत स्थापना हुई, गोस्वामी जी केवल कर्म की शिक्षा नहीं देते, केवल ज्ञान या भक्ति की शिक्षा नहीं देते, ईश्वर को समर्पित होकर, जो विधान शास्त्रों में वर्णित है, उनके अनुरूप स्वयं चलते भी हैं। कहा जाता है कि यहां के ऋषियों ने पूरी दुनिया को ज्ञान दिया। भारत में अभी भी विश्व गुरुत्व है। छोटे उद्देश्यों के लिए जीकर कोई विश्व गुरु नहीं होता। लिखा है मनु ने कहा कि श्रेष्ठ ऋषियों ने ब्राह्मणों ने संपूर्ण संसार को चरित्र की शिक्षा दी। हम पहले स्वयं को चरित्रवान बनाते हैं और उसके बाद ही दूसरों को चरित्रवान बनने के लिए प्रेरित करते हैं। रामराज्य में भी ऐसा ही होता है। रामजी पहले स्वयं चरित्र शिरोमणि हैं, उसके बाद ही उनका व्यापक प्रभाव समाज पर दिखने लगता है। संसार को चरित्र की शिक्षा भारत ने ही दी है। 
गोस्वामी जी ने अपने संपूर्ण जीवन में ज्ञान को प्रकट किया। उसे अपने चरित्र में उतारा, जैसे राम जी ने अपने संपूर्ण काल में चरित्र के माध्यम से संसार को राम राज्य का स्वरूप दिया कि कैसे आदमी को होना चाहिए, उसी दिशा में गोस्वामी जी के प्रयास हैं। वे केवल भक्त नहीं हैं, केवल कवि नहीं हैं। 
आज कई कविता बनाने वाले हैं, जिनका जीवन कहीं भी ज्ञान से नहीं जुड़ा है, जिनका जीवन दुराचारों से जुड़ा है। 
जब तक हमारा ज्ञान चरित्र में नहीं उतरे, तब तक कुछ भी सिद्ध नहीं होगा। आज भी जो लोग राम जी के रास्ते पर चलकर अपना जीवन संवारने में जुटे हैं। जनता की सेवा में जो लगे हैं, उन्हें भी प्रेरित होने की जरूरत है। नौकरी करने वालों को भी गोस्वामी जी के अभियान से जुडऩा चाहिए। हम केवल कर्म के संपादक नहीं बन जाएं, केवल हम तोते जैसे रटंत नहीं बन जाएं। जैसे तोता बोलता है कि शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, उसमें फंसना नहीं, लेकिन वह स्वयं फंस जाता है, क्योंकि उसे जाल का पूरा ज्ञान नहीं है। क्रमश:

पायो परम बिश्रामु

भाग - २
यह गोस्वामी जी ने कैसे कह दिया कि मैं स्व सुख के लिए ग्रंथ रच रहा हूं। स्व का जो अर्थ है, आत्मा केवल हमारी आत्मा नहीं, भगवान की आत्मा। 
संपूर्ण पृथ्वी भगवान का शरीर है। जैसे जल शरीर है। वैसे ही हमारी आत्मा भी है। आत्मा की भी आत्मा भगवान हैं। अपने भगवान राम की खुशी के लिए गोस्वामी जी ने रामायण की रचना की, इसी में उनका जीवन धन्य हुआ और यह काम दूसरों के लिए लाभप्रद हुआ। 
गोस्वामी जी अपने संपूर्णजीवन में जिन कर्मों, जिन मान्यताओं को, जिन विधाओं, परिपाटियों, जीवन जीने के क्रमों को वेदानुकूल स्मृतियों, पुराणों, इतिहासों ने बताया था, उन सभी क्रमों, नीतियों, सिद्धांतों को लोगों को बतलाने का प्रयास किया और यह काम उन्होंने अपने ग्रं्रंथों के माध्यम से किया। इस संसार में 126 साल तक वे रहे। इतनी ही उनकी आयु मानी जाती है। विक्रम संवत 1680 में अस्सी घाट पर उन्होंने देह का त्याग किया। 
कई लोग यह भ्रम पाल लेते हैं, यह गलत है। तुलसीदास जी ने पारिवारिक जीवन के लिए अपने जीवन के लिए राष्ट्र के जीवन के लिए मौलिक अवदान दिया। यह अवदान औरों से उन्हें अलग करता है, उस पर मैं दृष्टि डाल रहा हूं। गीता ने यह नहीं कहा कि देश के लिए लडऩा चाहिए, गीता कर्म का विधान करती है, युद्ध के लिए प्रेरित करती है, अर्जुन को प्रेरित कर रही है कि संन्यासी नहीं बनना है, युद्ध करना है। सत्य और राष्ट्र के लिए युद्ध करना है, इसी से कल्याण होगा। केवल युद्ध से कोई कर्मयोगी नहीं बनता। केवल कर्म से व्यक्ति उसके बंधन में आ जाता है। उसमें दोष आ जाता है। 
गोस्वामी जी ने शास्त्रों में प्रतिपादित सिद्धांतों को ईश्वर भक्ति की चासनी में डुबोकर रचना की। गोस्वामी जी को अपूर्वता प्राप्त है, जो वाल्मीकि रामायण से प्रवाहित हो रही है, पुराणों से प्रवाहित हो रही है, उसके लिए गोस्वामी जी ने कहा कि यदि माता-पिता की आप सेवा करें, तो उस सेवा का स्वरूप वैसा ही होना चाहिए। भक्ति से हमें कुछ लेना नहीं है। माता-पिता की सेवा उनकी खुशहाली के लिए है। अपने कत्र्तव्य के अनुपालन के लिए है। हम परिवार की सेवा करें, जो हमारे माध्यम से संसार में आए हैं, उनकी सेवा करें। हम गायों की सेवा करें, अतिथियों की सेवा करें, किसी भी तरह से हम अपनी शक्ति को कहीं लगाएं। कर्मयोग का परिमापक यंत्र है। मनमानी कर्म से जीवन नष्ट हो जाता है। जैसे लंका वाले नष्ट हो गए। तुलसीदास जी ने कहा कि हम धर्म द्वारा नियंत्रित कर्म करें, लेकिन यह ध्यान रहे कि हम सभी कर्म ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए करें। वही उत्स है, वही आत्मा है, ईश्वर समर्पण के भाव से अपने स्वार्थों को नियंत्रित करके जब हम कर्म करेंगे, तो हमारा पारिवारिक जीवन भी अच्छा हो जाएगा। समाज, राष्ट्र, संसार का जीवन सुधर जाएगा। 
कुछ लोग इसे केवल भक्ति का ग्र्रंथ मानकर चलते हैं, यह भी पूरा सही नहीं है। यह सामाजिक ग्रंंथ भी है, पारिवारिक ग्रं्रथ भी है। राम जी के प्रभाव में कोल-भील्लों में भी सुधार आ गया। रामजी को देखकर उनके जीवन, संस्कार, कर्म देखकर संपूर्ण समाज राम जी की प्रसन्नता के लिए जीने लगे। कोल-भील्लों ने भी राम जी से कुछ नहीं मांगा, कोई लौकिक लाभ सिद्ध नहीं किया। इस तरह के भाव को तैयार करते हैं गोस्वामी जी। 
डॉक्टर, किसान, वकील इत्यादि सभी को गोस्वामी जी प्रेरित करते हैं, उनका एक ही लक्ष्य है कि हर परिवार में रामराज्य आए। जैसे राम जी ने अपने पिता के वचन की पालन के लिए घर छोड़ दिया, उन्होंने स्थापित किया कि मां देव है, पिता देव हैं, इनकी सेवा करेंगे, इन्हें प्रसन्न करेंगे, तभी रामराज्य आएगा। अयोध्या में अर्थ काम के लिए युद्ध नहीं होते। वहां से राम जी संसार को प्रभावित करते हैं। राम जी के पास सद्भाव है, वाणी है, मन है, ज्ञान है, वे सभी को खुश करते चलते हैं। वह आश्रमों में स्वयं जाकर ऋषियों को सुख देते हैं। जैसे राम जी ने बिना फल की आकांक्षा के जीवन जीया, संपूर्ण संसार के प्राणियों को धन्य जीवन दिया, परिपूर्ण जीवन दिया। उन्होंने अपने सभी कत्र्तव्यों की पालना की।  
गोस्वामी जी ने अपने सभी ग्रंंथों में इन्हीं स्थापनाओं को बल दिया। उन्होंने यह नहीं सिखाया कि कैसे भी पैसा कमा लो। उन्होंने उच्च जीवन के साथ धन कमाना सिखाया है। 
गीता संत सैनिक बनाती है। उसमें संतत्व भी होता है और सैन्य भाव भी होते हैं। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस व अपने अन्य ग्रंथों के माध्यम से प्रकाश पूंज तैयार किया। यह महत्वपूर्ण है कि हमें जीवन के इन सभी सकारात्मक क्षेत्रों में प्रेरित होने की जरूरत है। हमें यह ध्यान रहे कि हम केवल अपना स्वार्थ नहीं चाहें। ईश्वर की प्रसन्नता के लिए अपने जीवन को समर्पित करें। तुलसीदास जी के हर वाक्य की प्रेरणा चिंतन की अनादि परंपरा से जुड़ी हुई है। क्रमश:

पायो परम बिश्रामु


(गोस्वामी तुलसीदास जी पर महाराज स्वामी रामनरेशाचार्य जी का प्रवचन)
गोस्वामी तुलसीदास जी कवि जगत के शिरोमणि हैं। दुनिया में कवियों की जो शृंखला है, दुनिया में प्रशस्त जो कवि हुए सभी भाषाओं में, सभी धर्मों में, तो उनके कवित्व का एक महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी में जो कवि हुए, जिसे राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त हो गया, उसमें गोस्वामी तुलसीदास की समकक्षता आज तक किसी को नहीं मिली है। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस का निर्माण किया, चार सौ वर्षों से भी ज्यादा हो गए। मैं छोटा था, चतुर्थ सदी मनाई गई थी मानस की। संवत 1631 में रामनवमी के दिन मंगलवार को उन्होंने रामचरितमानस की रचना की शुरुआत की थी। दो वर्ष से ज्यादा समय लिखने में लगा। उनका रचनात्मक जीवन श्रेष्ठ है, उनमें सहज भाव है, प्रेरक स्वरूप है। महाकाव्य कितने बने, उसमें रामचरितमानस को कोई अतिक्रमित नहीं कर पाया। इतने दिनों में दुनिया में कितने परिवर्तन हुए। अपने देश में सत्ता बदली, कोई ऊपर हो जाता है, कोई नीचे हो जाता है, गुलामी गई, अंग्रेज गए। इतने वर्षों में हृदय को कंपित कर देने वाली कौन सी विद्या है कि तुलसीदास जी का जो अमर काव्य है, उनके जो दूसरे ग्रंथ हैं, उन्हें पार करना तो दूर किसी को उनकी समकक्षता ही प्राप्त नहीं हुई है। मैं हिन्दी की बात कर रहा हूं। गोस्वामी जी दुनिया के सबसे बड़े कवि हैं। सभी तरह की संपन्नता इस महाकाव्य में है, यह समकक्षता किसी को प्राप्त नहीं हो पाई। जैसे भगवान की कोई बराबरी नहीं कर सकता, वैसे ही रामचरितमानस की बराबरी कोई नहीं कर सका है। यह कृति उनके ही व्यक्तित्व को ऊंचाई नहीं देती, पूरी हिन्दी भाषा को ऊंचाई देती है। हिन्दू संस्कृति, हिन्दू विचारधारा, चिंतन, राम भक्ति धारा को उन्होंने ऊंचाई पर पहुंचा दिया। 
रविन्द्रनाथ टैगोर को लोग विश्व कवि बोलते हैं, विचारकों में कवियों में उन्हें बड़ा स्थान प्राप्त होता है, लेकिन रामचरितमानस की समकक्षता टैगोर की रचना गीतांजलि को नहीं मिल पाई। टैगोर को दुनिया में साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान नोबेल मिला था, लेकिन उनकी लोकप्रियता-उपयोगिता वैसी नहीं हुई। आज मंगल भवन अमंगल हारी को एक रिक्शाचालक भी जपता है। रामचरितमानस की पहुंच घर-घर तक है। गोस्वामी जी ने समाज को अत्यंत परिष्कृत, परिपूर्ण ज्ञान प्रदान किया है।  
भगवान की दया से द्वादस ग्रं्रंथों को तुलसीदास जी ने समाज के लिए रचा। उन्होंने पैसा कमाने के लिए ऐसा नहीं किया। किसी को प्रभावित करने के लिए उन्होंने ऐसा नहीं किया। कौन-सा लौकिक प्रयोजन था, गोस्वामी जी ने महर्षि वाल्मीकि की परंपरा में रहते हुए कहा कि मैं सब कुछ कहूंगा जो शास्त्र अनुकूल होगा, प्रेरक होगा, भारतीय संस्कृति का संरक्षक होगा। मैं यह जो कर रहा हूं वह मेरी साधना है। इससे श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होगी, सबको इससे लाभ होगा। परिवार, समाज राष्ट्र और संपूर्ण संसार की उन्नति होगी। कहा गोस्वामी जी ने रामचरितमानस के प्रारंभ में, मैं राम जी के चरित का वर्णन कर रहा हूं। मैं अपने सुख के लिए राम जी के गुणों का गायन कर रहा हूं। 
स्वान्त: सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा
भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति।
इससे लोग समझते हैं कि गोस्वामी जी ने अपने सुख के लिए ही ग्रं्रंथ लिखा। लोग यहां भूल कर देते हैं, संत तो दूसरों के लिए ही जीवन जीता है। जो संपूर्ण प्राणियों की भलाई के लिए समर्पित हो, सतत कर्मशील हो, श्वांस श्वांस, हर चेष्टा सभी प्राणियों की पीड़ा को मिटाने के लिए संत जीते हैं। संत का स्वरूप विशाल होता है। भक्ति मार्ग में यह बात कही जाती है कि भक्त वह है, जो अपने सुख की परवाह नहीं करता, वह अपने भगवान के सुख के लिए प्रयास करता है। उसके सुख में ही वह सुखी होता है। जैसे गोपियों का अपना सुख गौण है, वे केवल भगवान कृष्ण के सुख के लिए जीवन जीती हैं। उनमें कोई लौकिक इच्छा नहीं है, कभी नहीं कहा कि आपको हमारे सुख के लिए ऐसा करना चाहिए। राम भक्ति परंपरा में राम भी दूसरों को सुख देते हैं और लोगों को जोड़ते हैं। क्रमश:

Tuesday, 11 April 2017

अबलौं नसानी, अब न नसैहौं

समापन भाग 
भगवान कितने खुश हो रहे होंगे कि हम लोग इस घनघोर कलयुग में भी सत्संंग में बैठे हैं। अभी दुनिया में करोड़ों-करोड़ों लोग क्या-क्या कर रहे होंगे, आप भी घर में होते, तो कुछ करते ही, मैं भी कमरे में होता, तो कुछ करता, लेकिन अभी जो मैं कर रहा हूं, उससे अच्छा नहीं करता और जो आप कर रहे है उससे अच्छा नहीं कर रहे होते। 
अभी हम लोग मोक्ष यज्ञ के संपादन में लगे हैं। यह सबसे बड़ा काम है। हम कानों का उपयोग कर रहे हैं, हम मन का उपयोग कर रहे हैं, हम चित्त का उपयोग कर रहे हैं, अहंकार का उपयोग कर रहे हैं, हम अपने पैरों का उपयोग कर रहे हैं। हम अपने शरीर के सभी अंगों का उपयोग कर रहे हैं। भगवान की आराधना में धीरे-धीरे हमारा मन पिघल रहा है। विश्वास की ओर बढ़ रहा है। समर्पण की ओर बढ़ रहा है। निष्ठा की ओर बढ़ रहा है। आज नहीं तो कल भगवान को पिघलना ही होगा और पिघलकर हमें अपनाना ही होगा, गले लगाना ही होगा। इसके लिए भगवान अब रुक नहीं पाएंगे। जैसे उन्होंने कोल-भील्लों को गले लगाया। लेकिन संकल्प बड़ा होना चाहिए और पूर्ण रीति से होने की जरूरत है। मैं पंजाब में अपने भक्तों से पूछता हूं, तुम भी कुछ भजन कीर्तन करते हो या नहीं? पंजाब वाले भक्त क्या बोलते हैं, आप सुनो। पंजाब वाले भक्त कहते हैं, माढ़ा-मोटा पूजन करता हूं। मतलब थोड़ा-बहुत पूजन करता हूं। 
मैं उनको पूछता हूं, जब दुकान पर जाकर इतने घंटे बैठते हो, तो दो रुपए मिलते हैं, तो दो अगरबत्ती दो मिनट घुमाने से तुम्हें भगवान क्या देंगे, बतलाना तो। घंटा दो घंटा पढऩे से कोई आईएएस की परीक्षा पास करेगा क्या? थोड़ी-पढ़ाई से कोई बड़ी परीक्षा में टॉप करेगा क्या? दो चार दंड बैठक करने से हिंद केसरी होगा क्या? देश का सबसे बड़ा पहलवान होगा क्या? नहीं होगा। जो हम धन कमाने के लिए करते हैं, जो हम भोग कमाने के लिए करते हैं, जो हम धर्म कमाने के लिए करते हैं, उससे बहुत ज्यादा जब हम मोक्ष कमाने के लिए करेंगे, तो हमारा जीवन धन्य होगा। जगद्गुरु वल्लभाचार्य जी ने लिखा है, (नाथद्वारा बहुत बड़ा संस्थान है उनके भक्ति मार्ग का) अर्थ कहते हैं धन को, धन कमाने के लिए हम कितना प्रयास करते हैं, तो भगवान तो परमार्थ हैं, परम अर्थ हैं, सबसे बड़ा धन हैं, उन्हें कमाने के लिए बहुत-बहुत लाखों-लाखों करोड़ों-करोड़ों गुणा ज्यादा प्रयास की जरूरत है, अधिक प्रयास की जरूरत है। अभी वाला कम प्रयास नहीं चलेगा। दो मिनट केवल ध्यान, पूजन करने से, इलायची दाना भोग लगाने से। भगवान को इलायची दाना नहीं चलेगा, भगवान का नाम पांच मिनट लेना नहीं चलेगा। आदमी अपने बच्चों को कितनी देर तक खेलाता, खिलाता है, लेकिन भगवान के पास बैठने पर दम घुटने लगता है। अभी आपको पता नहीं है, बाल स्वरूप भगवान की सेवा में घंटों-घंटों भगवान को वैसा करना पड़ता है, जैसा माता-पिता परिवार के लोग अपने बच्चों को मनोरंजन का संसाधन देते हैं। मैं देखकर हैरान हो जाता हूं, इन माताओं में भगवान को अद्भुत रूप से अनुकूल बनाने की क्षमता है। क्योंकि ये बच्चों को बहुत देर तक रिझाती हैं। रोते हैं, तो चुप कराना, हंसाना, उसके मन को परिवर्तित करना, उसका सारा रोम-रोम खिला देना, अपने अनुकूल व्यवहार से, मुंह बनाकर, बोलकर, आंखों से, हाथों, पैरों को उपयोग करके, सभी प्रकार के संसाधन से माताएं ऐसा करती हैं, तो वे भगवान के लिए भी ऐसा कर सकती हैं। 
भगवान ने हमें मनुष्य जीवन दिया है। हम अपने ही कर्मों से प्राप्त इस जीवन को, जो भगवान के परम अनुग्रह से हमें प्राप्त हुआ, उसका हम मोक्ष के लिए उपयोग करें। हमें स्वर्ग नहीं जाना है, हमें ब्रह्म लोक नहीं जाना है। हमें गणेश लोक नहीं जाना है। हमें देवी लोक नहीं जाना। हमें अब किसी दूसरे के लोक में नहीं जाना, हमें तो राम कृष्ण के लोक में जाना है। जहां जाने से लौटा नहीं जाता, वहीं मेरा धाम है।
आपको भी दिव्य जीवन की प्राप्ति हो, जय सियाराम। 

अबलौं नसानी, अब न नसैहौं

भाग - १४
हमारा जूता सीना भी कल्याण के लिए है। क्यों? जूता सीऊंगा, दो पैसे आएंगे, तो राम जी की माला लाऊंगा, भोग लगाऊंगा, जो संत आएंगे, उनकी सेवा करूंगा। और मैं भी उसका बचा हुआ खाऊंगा। यह धर्म का बहुत बड़ा स्वरूप है। स्वयं अर्जित करना और उसके आधार पर जीवन जीकर भक्ति करना। हम लोगों का कमजोर वाला जीवन है, मांग करके दूसरों के संसाधन के ऊपर अवलंबित होकर भक्ति करना। 
स्वजीवी, परोपजीवी, यह दो विभाग हैं। जूता सीना भी भक्ति है। एक बार रविदास जी की महिमा फैली, तो वहां के राजा आए और कहा कि मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं। रविदास जी ने कहा कि हमें जरूरत होगी तो बताऊंगा। बहुत-बहुत आपको आशीर्वाद, आप खूब भक्ति करें, गरीबों की सेवा करें, आप आए हमारे यहां, मैं धन्य हुआ, आप पर भी राम जी की कृपा बरसे। 
राजा ने कहा कि आप मांगिए, आप मुझसे सेवा लीजिए। 
धनवान लोग ऐसे ही कहते हैं। हमें भी एक धनी ब्राह्मण कह रहे थे कि चातुर्मास में हमारा भी भंडारा हो जाए, मैंने कहा, जब जरूरत होगी, तो हम आपके यहां कटोरा लेकर आएंगे। कोई फलोदी का था मनचला ब्राह्मण, नहीं माना, तो मैंने कहा, आप जाओ, जब आपका भंडार नहीं हुआ था, तब भी मैं प्रसाद पा रहा था और आगे भी पाऊंगा।   
रविदास जी ने भी कहा था कि चलो महाराजा, आपकी जरूरत होगी, तो कटोरा लेकर आपके द्वार आऊंगा। 
मैंने भी वैसा ही कहा। उनको अनुमान था कि वो ही पैसा देंगेे, तो ही चातुर्मास होगा। 
बताते हैं, वह राजा जाते-जाते संत रविदास को पारसमणि दे गया और कहा, इससे जो भी आप चाहें, बना लीजिए। किसी से कुछ मांगने की कोई जरूरत नहीं, जूता बनाने की जरूरत नहीं। 
रविदास जी ने कहा, रहने दीजिए, हम संतुष्ट हैं अपने जूता सीने से।
भक्त विनम्र होता है, इससे कौन लड़ेगा? राजा नहीं माना, तो अंत में रविदास जी ने कहा, आप इसे झोंपड़ी में कहीं रखवा दीजिए। राजा को बुरा लग रहा था, ये तो ले भी नहीं रहे हैं। उसने अपने मंत्री से कहा कि जहां कह रहा है, वहां रख दो। उसके बाद राजा एक साल तक पता करता रहा कि रविदास जी ने पारसमणि से सोना बनाया या नहीं बनाया। रिपोर्ट आती रही कि वैसे ही जूता सी रहे हैं, संत व भगवत सेवा वैसे ही हो रही है। 
अंत में राजा एक साल के बाद आ गए, राजा ने कहा, मैंने जो पारसमणि दिया था आपने उसका उपयोग नहीं किया। 
संत शिरोमणि ने कहा कि कोई जरूरत नहीं पड़ी, नहीं तो मैं जरूर करता। आपके राज्य में रहता हूं, आपका ही दिया हुआ खाता हूं, मैं क्यों नहीं करता? लेकिन मुझे लगा कि इसकी जरूरत नहीं है। 
राजा ने पूछा, कहीं आपने किसी को दे तो नहीं दी, बेच तो नहीं दी?
रविदास जी ने कहा, मैं क्षमा चाहता हूं कि मैंने तो देखा ही नहीं कि कहां रखा है, जहां आपने रखवाया होगा, वहीं होगी पारसमणि। 
मंत्री ने निकाला, उसी जगह पारसमणि टिकी हुई थी। एक साल बाद राजा अपनी पारसमणि ले गए।
न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। 
जब हमें भगवान उम्मेद भवन पैलेस देंगे, जब भगवान हमें सबसे महंगी गाड़ी देंगे, सबसे सुंदर पत्नी देंगे, सबसे सुंदर बेटा-बेटी देंगे। पोता, पोती देंगे, खूब पैसा देंगे, संपत्ति देंगे, सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा देंगे, क्या तभी हम भगवान को कहेंगे कि ओम जय जगदीश हरे...
तब तो कभी कल्याण होने वाला नहीं है। अभी जो संसाधन मिला हुआ है, जो जीवन मिला है, टेढ़ा-मेढ़ा, जैसा भी मिला है, जाति, माता-पिता, जो भाषा मिली, जो स्वभाव मिला, जो भी भोजन मिला, संस्कृति, सभ्यता, मर्यादा मिली, उसी में हमें भगवान की शरण में जाकर उनकी सेवा में लग जाना है। आप आए हो यहां, कितनी अच्छी बात है। आप मेरे लिए आए हो, केवल ऐसा ही नहीं है, हम भी अपने कल्याण के लिए आपके यहां आए हैं। हमारा भी कल्याण हो, आपका भी कल्याण हो, ऐसी भगवान से प्रार्थना है। आप भी अपने लिए आए हैं, मैं भी अपने लिया आया हूं। हम दोनों - श्रोता, वक्ता मिलकर एक ही सिद्धी के लिए तत्पर और समर्पित हैं। हमारा मन भगवान में लगे, समर्पित हो। 
क्रमश:

अबलौं नसानी, अब न नसैहौं

भाग - १३
सिद्धों की बातों को सिद्ध लोग ही समझते हैं। मैं असिद्धों की भाषा बोलता हूं। एक मेरे गुरु थे, जिनसे मैं मीमांसा दर्शन पढ़ता था, जिनको मूल ग्रंथ और व्याख्या शब्दश: याद थी। अद्भुत विद्वान थे सुब्रह्मण्यम शास्त्री, दक्षिण भारत के थे। मदन मोहन मालवीय उनको अपना बेटा मानते थे। मैं जब उनका स्मरण करता हूं, तो मेरा शरीर पिघलने लगता है। अभी भी पिघल गया, क्योंकि उनका बहुत स्नेह था मेरे साथ। उन्होंने दो अक्षर जो मुझे दिया, वो बहुत दिया। वह कहते थे, क्या ऐसा योग न हो जाए कि कहीं हम फिर इक_े हो जाएं। आपको देखकर बहुत खुशी होती है, काशी नहीं छोडऩा। 
लेकिन मैं काशी छोडक़र हरिद्वार आ गया। 
वे कहते थे, वह वक्ता ही जड़ है, जिसकी बात को श्रोता समझ नहीं सके। 
अरे खिचड़ी में घी पडऩा चाहिए, लेकिन इतना न पड़ जाए कि बाढ़ आ जाए थाली में, तो गड़बड़ा जाए। बहुत ज्यादा भी घी न हो कि पेट खराब हो जाए। धीरे-धीरे बात होनी चाहिए। यह आचार्यों की शैली है। धीरे-धीरे अपनी बात को कहना। अपनी बात का भी व्याख्यान करना। जब तक लगे कि श्रोता पूरा समझ नहीं गया, तब तक कहते रहना। तो बात आगे बढ़ेगी। तो भगवान की दया से आप सभी को अब शंकराचार्य जी के वचन की ओर ले चलता हूं। जहां शंकराचार्य जी ने कहा कि हे भगवान, मैं ऐसा नहीं कि कभी आपकी पूजा करता हूं और कभी रोटी-दाल के लिए करता हूं, यह तो छोटा वाला काम हुआ, बारह घंटा रोटी के लिए और पांच मिनट अगरबत्ती के लिए, फूल के लिए, इसमें कल्याण होगा क्या? यहां बैठे हुए लोगों से मैं पूछता हूं कि आज तक आपने जो जीवन जीया है, उसमें से कितना धन के लिए जिया, कितना आपने भोग के लिए जिया, कितना आपने धर्म के लिए जिया और कितना आपने मोक्ष के लिए जिया। जीवन तो इतना ही है कि बहुत मुश्किल से मिला है। आपको बतलाना चाहिए, सोचना चाहिए, मन में आप निर्धारण करें, अरे कमाने में ही सारा जीवन निकल गया, फिर भी गरीबी नहीं गई। नहाने में और सजने में ही सारा जीवन निकल गया, फिर भी सुंदरता नहीं आई। जमाने में ही सारी शक्ति लग गई, फिर भी मोहल्ले में भी प्रतिष्ठा नहीं हुई। घर के ही दो लोग नहीं मान रहे हैं कि आप भले आदमी हैं। सारा जीवन निकल गया, लेकिन दो कमरे अभी अधूरे ही हैं, पूरे नहीं हुए हैं। दरवाजा लग गया, तो खिडक़ी नहीं है, खिडक़ी लग गई, तो मच्छर वाली जाली नहीं है। मार्बल लग गया, तो घिसाई नहीं और घिसाई हो गई, तो भंडार में ग्रेनाइट नहीं, सब अधूरा ही अधूरा है। आपको बतलाया था कि दुनिया का २२ प्रतिशत लोहा पैदा करने वाले लक्ष्मीनिवास मित्तल का मकान बिक गया २५० करोड़ रुपए का। आपके राजस्थान में नहीं, पूरे देश में ऐसा आदमी नहीं, जो दुनिया का २२ प्रतिशत लोहा उत्पन्न करता है, उसने बहुत शौक से लिया होगा मकान, वह बिक गया। इसको बोलते हैं अर्थ, भोग। धर्म के लिए कितना किया? धर्म के लिए कितना जीवन? कितनी चेष्टाएं, कितने श्वांस, कितने कदम, कितनी रक्त की बूंदें, बतलाएं कि आपने धर्म के लिए कितना किया? मोक्ष के लिए तो खाता ही खाली है। जगद्गुरु शंकराचार्य जी कह रहे हैं कि आप यह नहीं मानना कि मैं थोड़ी के लिए आराधना करता हूं और थोड़ी देर के लिए कमाता हूं, थोड़ी देर के लिए खाता हूं, थोड़ी देर के लिए सोता हूं। वह जमाना गया, जब चार पुरुषार्थों में जीवन की शक्ति को उड़लते हैं, अब मैं उस अवस्था में पहुंच गया हूं, जो मैं करता हूं, वह आपकी आराधना में ही करता हूं और कुछ नहीं करता। 
जो-जो कर्म करता हूं, वह सब संपूर्ण हे शम्भू आपकी आराधना ही है, मैं और कोई काम नहीं करता। यह जीवन हमें चाहिए। जूता सीने वाले रविदास से भी कोई पूछता था, तो बोलते थे कि राम जी की आराधना कर रहा हूं। आप कल्पना करेंगे?ï धन्य है सनातन धर्म, जिसने रविदास को अपने सिर पर रखा, ब्राह्मणों ने चरणामृत लिया और उच्च आदर दिया, जो आदर दुनिया में हीन अवस्था के जीवन को नहीं मिला। 
मैं पहले भी कह चुका हूं, ईसाई धर्म के काले रंग के व्यक्ति को संतत्व की उपाधि द्वितीय बुश के कार्यकाल में मिली। नहीं तो ईसाई धर्म में काला महात्मा नहीं होता। हमारा तो जूता सीने वाला भी संत शिरोमणि हो जाता है। आप सभी लोगों की बात कह रहा हूं। आप यह नहीं समझना कि महाराज अपने श्रीमठ या रामानंद संप्रदाय की बात कर रहे हैं। 
क्रमश:

अबलौं नसानी, अब न नसैहौं

भाग - १२
मैं कह रहा हूं कि कभी भी कुछ भगवान को अर्पित करो, तो प्यार से अर्पित करो। दुर्भावनाओं को निकालो, संयत बनाओ मन को, कभी इधर भाग रहा है, तो कभी उधर भाग रहा है। तमाम दुर्भावों से युक्त मन नहीं चलेगा। मन में प्यार का प्राकट्य करो, प्यार प्रवाहित करो और उसके बाद समर्पण करो, तो भगवान स्वीकार करेंगे। यह हुआ कल्याण का मार्ग, मोक्ष का मार्ग। यह दान नहीं हुआ। दान तो बहुत छोटी चीज है। सनातन धर्म में जहां-जहां पूजा की बात आती है, वहां-वहां जरूर पुराणों में, स्मृतियों में इतिहासों में कहीं भी यदि कहा कि उन्होंने पूजन किया, तो यह जरूर कहते हैं कि प्रेम के साथ पूजन किया। भरत जी पूजन करते हैं राम की चरण पादुका का, नंदी ग्राम में सिंहासन पर प्रतिष्ठित करके राजा के रूप में उनका सम्मान करते हैं, उनकी आज्ञा लेते हुए, उनके निर्देश से पूरे राष्ट्र का संचालन भरत जी कर रहे हैं। यहां से रामराज्य शुरू हो गया। राम जी की चरण पादुका राज्य का संचालन कर रही है। तुलसीदास जी ने अयोध्या कांड के अंत में लिखा है, 
नित पूजत प्रभु पाँवरी 
भरत जी पादुका की रोज पूजा करते हैं। भरत जी जानते हैं, मेरे साथ चरण पादुका जी आई हैं, मैंने उनको तैयार करवाया। भरत जी चरण पादुका का पूजन कैसे करते थे, काग भुसंडी रामायण में उनका वर्णन मिलता है। मंत्र-तंत्र की भाषा में लिखा था, उसे कोई समझ नहीं पाता था। पंडित राजेश्वर प्रसाद द्राविड़ ने समझाया था। आप ध्यान दीजिए कि भरत जी पूजन कैसे करते हैं, 
तुलसीदास जी ने लिखा - प्रीति न हृदयँ समाति।
जैसे नदी अपने तटों को लांघ जाती है, उछाल लेकर तटों से बाहर आ जाती है, अब तट नहीं रह पाए, तट सामथ्र्यहीन हो गए, वैसे ही प्रेम इतना उमडऩा चाहिए कि लगे कि आपके संभाल में नहीं आ रहा है। भरत जी ऐसा पूजन करते हैं। तुलसीदास जी को बड़ा ज्ञान है शास्त्रों का, उन्हें मालूम है कि कैसे भक्ति होती है। यहां तो अनेक लोग पूजन करते हैं, तो चेहरा पहले से भी खराब हो जाता है। आज कई लोग बदमाश हो गए हैं, पूजन के समय हलो-हलो भी करते हैं, अपने पास मोबाइल रखना चाहिए क्या पूजन के समय? हाईकोर्ट में कोई मोबाइल लेकर जाए, तो रजिस्ट्रेशन भी रद्द हो जाएगा, लेकिन जब मेरे पास वकील आते हैं, तो मोबाइल रखते हैं! अब लोग गलत करने लगे हैं। कथा में बैठे हुए हैं पंडित जी पूजा करवा रहे हैं और साथ ही साथ मोबाइल भी देख रहे हैं, यह पूजन नहीं है। आपको पूजन के लिए अवसर मिला है, यह बहुत संक्षिप्त संसाधन में मोक्ष की यात्रा हो रही है। इसमें किसी मोबाइल की जरूरत है क्या, सत्संग में मोबाइल, मंदिर की पूजा में मोबाइल, गुरु के दर्शन और सामिप्य में मोबाइल, माता-पिता के पास दो मिनट के लिए बैठे हैं, उसमें भी मोबाइल? फोन आता है, तो मोबाइल लेकर लोग ऐसे दौड़ते हैं कि कोई बहुत बड़ी समस्या आ गई हो। मैं भी यहां मोबाइल लेकर आता, तो कैसा लगता आपको बताइए। 
भगवान की दया से जब भी अवसर मिले, तो पूरे भाव से पूजन करें। हमें अपना संपूर्ण जीवन मोक्ष के लिए ही जीना चाहिए। तो गृहस्थी कैसे चलेगी? हमारा देखना, बैठना, बोलना सब मोक्ष के लिए है। 
हम लोग रामानंदाचार्य की पंरपरा के हैं। जो राम भक्ति के प्रवर्तक महान संत थे। जब-जब त्रेता का अवतरण होगा, तब-तब राम जी प्रकट होंगे - 
संभवामि युगे युगे।
और उनकी भक्ति निरंतर चलती रहती है, उसी भक्ति को जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी ने आगे बढ़ाया। राम भक्ति धारा को अत्यंत व्यापकता प्रदान की। रामभक्ति धारा को रविदास की झोंपड़ी तक पहुंचा दिया, जहां जूते सिए जाते थे और चमड़ा पीटा जाता था। यह काम भारत सरकार नहीं कर सकती, जब करेंगे, तो रामानंदाचार्य करेंगे और उनके आप जैसे भक्त करेंगे। ये प्रधानमंत्री के वश में नहीं। प्रधानमंत्री रोड बनवा देगा, बिजली लगवा देगा, यही सब काम करें, यही बहुत है। धन्य है संतों का जीवन। 
क्रमश:

अबलौं नसानी, अब न नसैहौं

भाग - ११
ईश्वर को हम क्या देंगे, वह सर्वसाधन संपन्न है। वह ऐश्वर्यशाली है। समग्र एैश्वर्य का नाम भग है, संपूर्ण यश का नाम भग, संपूर्ण सुंदरता का नाम भग है, संपूर्ण ज्ञान का नाम भग है, वैराग्य का नाम भग है, सब तो इसी में आ गए और भग जिसके पास हो, उसे भगवान कहते हैं। 
सबकुछ जब भगवान के पास है, तो हम भगवान को क्या देंगे। ध्यान दीजिए, पत्ता कोई भी चलेगा, तुलसी का ही नहीं, बेल पत्र ही नहीं, कोई भी पत्ता दीजिए। भगवान का बनाया हुआ है। दीजिए पत्ता। खाली हाथ भगवान के यहां नहीं आएं। 
राजा, देवता और गुरु के यहां खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। कुछ लेकर ही जाएं। आज आपको बताना है देने का तरीका। पत्ता भी कल्याण का साधन कैसे बनेगा, मोक्ष का साधन कैसे बनेगा, यह दान नहीं है, धन नहीं है, भोग नहीं है, भगवान ने कहा कि जो भी पत्ता, पुष्प, फल दें, जल दें, उसे आप भक्ति से दें, यानी प्रेम से दीजिए। चेहरे पर प्रसन्नता आनी चाहिए। हृदय लबालब हो भाव से। जैसे मां स्तनपान कराती है बच्चे को, अपना सर्वस्व उड़ेल रही है, उसके संरक्षण और संवद्र्धन के लिए कि मेरा बच्चा सुंदर हो जाए, शक्तिशाली हो जाए, देश का प्रधानमंत्री हो, बड़ा वैज्ञानिक हो जाए, बड़ा उद्योगपति हो जाए। अपना सबकुछ उसे पिला रही है, जीवन पिला रही है, अमृत पिला रही है। पत्ता देने में भी यही भाव आना चाहिए। भक्ति माने प्रेम। यदि आपको प्रेम का ज्ञान नहीं होता, तो मैं और भी समझाता। आपको प्रेम आता है। कभी-कभी तो आप देते ही हो प्रेम से अपने लोगों को, तो भगवान को भी प्रेम से दीजिए। यह भगवान की आज्ञा है। वस्तु कैसी भी चलेगी। पत्ता, फूल, फल, जल कैसा भी चलेगा। गंगा जल भी यमुना जल भी चलेगा, स्वच्छ होना चाहिए, पवित्र होना चाहिए। 
एक शर्त भगवान ने और लगा दिया कि अपने मन को समाहित करके, संयत करके दीजिए, निश्चल, एकाग्र, तमाम दुर्भावनाओं से रहित मन करके दीजिए। भगवान सबका नहीं लेते। भगवान को कोई कमी नहीं है। 
कबीर की कथा सुनाता हूं। एक छपरा जिला है, छपरा में एक संत थे हलकोरी बाबा, कबीरपंथी महात्मा थे। उन्हें सैंकड़ों जन्म दिखते थे। जो बीत गए और जो आने वाले हैं सब। वे नाम लिखना भी नहीं जानते थे। पढ़े नहीं थे। वहां प्रथा थी कि जन्म होने पर ही कंठी पहना देते थे, गले में बांध देते थे। उनको भी बांध दिया था, सयाने हुए, तो पूछा कि यह धागा क्या है।
लोगों ने कहा कि वहां तुम्हारे गुरु की समाधि है, उनसे पूछो।
वहां जाने पर उन्हें विशिष्ट दृष्टि की प्राप्ति हुई गुुरु के अनुग्रह से। उन्होंने लौटकर घर वालों को कहा, मैं अब कुछ नहीं करूंगा। केवल राम राम जपूंगा। मेरे हिस्से की जमीन के आधार पर आप मुझे रोटी दे देना। वे केवल राम राम करते थे। कबीर लोग सीताराम सीताराम नहीं कहते हैं। केवल राम राम कहते हैं, जैसे राम स्नेही लोग करते हैं। खूब जपा, सारी रिद्धियां-सिद्धियां हो गईं उनको, आप पूछो कि दस जन्म पहले कहां थे, बीस जन्म बाद हम कहां जाएंगे, उन्हें सब दिखता था। वे एक बार लोगों के आग्रह पर तीर्थ यात्रा पर आए, लेकिन काशी में वे भगवान विश्वनाथ के मंदिर में नहीं गए। कबीर लोग निंदा करेंगे, कबीर मूर्ति पूजक नहीं हैं। जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी के शिष्य थे कबीर, जहां मैं रहता हूं, वहीं कबीर जी की दीक्षा हुई थी, काशी में उनका भी आश्रम है। पूरे देश में उनके आश्रम हैं। पूरे देश में कबीर मठ हैं। एक से एक महात्मा हुए कबीर मठों में। साईं बाबा भी कबीर परंपरा से दीक्षित थे। साईं मतलब स्वामी। जो लोग अभी कहने लगे हैं कि वे मुसलमान थे, वे राम नाम नहीं जपते थे। वे मूर्ख हैं, पक्षपाती हैं। साईं बाबा स्वयं कहते थे, वे अपने गुरु आश्रम बताते थे, अपने गुुरुजी का नाम बताते थे, जो गुजरात में है। 
वो पुस्तक मेरे पास बारह खंडों में पड़ी हुई है। उसमें मैंने साईं बाबा का इंटरव्यू पढ़ा है। एक लेखक कई वर्षों तक साईं बाबा के पास रहा। लिखते रहता था साईं बाबा की सारी बातें। पहले बांगला में लिखा, बाद में हिन्दी में अनुवाद हुआ। अपने समय के अनेक बड़े सिद्धों का वर्णन किया उस लेखक ने।
तो हलकोरी बाबा तब विश्वनाथ जी के यहां नहीं गए। जब वे लौटने लगे, गाड़ी पकडऩे के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे, तब भगवान विश्वनाथ दिव्य स्वरूप में अनेक तरह की मालाओं से सुसज्जित वहां पहुंचे, त्रिशूल, डमरू, चंद्रमा विभूषित ललाट इत्यादि से सज्जित। हलकोरी बाबा समझ गए कि भगवान हैं, दंडवत किया, क्षमा याचना की। कहा, मैं आपके मंदिर में नहीं आया। 
भगवान विश्वनाथ बोले कि यही कहने आया हूं कि आप क्यों नहीं आए, आपको आना चाहिए था। 
हलकोरी बाबा ने कहा कि मैं मंदिर जाता, तो कबीर लोग विवाद करते, मुझे सुनाते, निंदा करते, ये कहां चला गया कबीर पंथ की मर्यादा को छोडक़र, इसलिए नहीं आया। क्षमा चाहता हूं। 
धीरे से हलकोरी बाबा ने कहा, मैं दरिद्र आदमी हूं, मेरे जल की क्या महत्ता है, आपके यहां जल चढ़ाने वालों की कमी है क्या, करोड़ों-लाखों लोग आते हैं। 
विश्वनाथ जी ने कहा, मैं लोगों का जल नहीं पीता हूं, मैंने ही कूप, नदियां, समुद्र बनाए हैं। मैं तो उन लोगों का जल स्वीकार करता हूं, जिनका हृदय आप जैसा होता है, जो मुझे भक्ति से प्यार से देते हैं। 
क्रमश: