Wednesday, 16 November 2016

श्रीमठ में कार्तिक पूर्णिमा पर हजारा प्रज्ज्वलित करते जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी




सती अनसूया जी : पति भक्ति अर्थात महाशक्ति

समापन भाग 
तुलसीदास जी ने लिखा है - अनसूया जी कह रही हैं - 
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।।
तन, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए बस एक ही धर्म, एक ही व्रत, एक ही नियम है। अनसूया जी ने पतिव्रता नारियों के चार स्वरूपों का वर्णन भी किया। 
पतिव्रता का सबसे श्रेष्ठ स्वरूप इस प्रकार है - श्रेष्ठतम पतिव्रता के मन में एक दृढ़ विश्वास होता है, दृढ़ निश्चय होता है कि मेरा पति संसार में अकेला पुरुष है और बाकी सब नारियां हैं। मेरे लिए पूर्ण रूप से समर्पित रहने वाला वही है, जिसे माता-पिता ने दिया है, बाकी पुरुष सब नारियां। श्रेष्ठ पतिव्रता के लिए पति के अलावा कोई दूसरा जीव पुरुष होता ही नहीं है। 
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहूँ आन पुरुष जग नाहीं।।
पति ही जगत का अकेला पुरुष है, दूसरा कोई पुरुष नहीं है। रामानंद संप्रदाय में लोग इस तरह की उपासना करते हैं, भगवान को पति और अपने को पत्नी मानकर। भगवान ही पति हैं और बाकी संसार के सभी जीव पत्नियां हैं। यह कांता भाव रामानंद संप्रदाय में प्रचलित है। दूसरा जब कोई पुरुष ही नहीं है मान्यता में, तो कहां से विकार आएगा?ï इससे उनका पतिव्रत सुदृढृ बनता है। यह सबसे अच्छा तरीका है कि स्त्री अपने पति को ही पुरुष माने। भटकाव को आधार देने की आवश्यकता ही नहीं है। 
दूसरे प्रकार की पतिव्रता जो होती हैं - जिन्हें मध्यम पतिव्रता कहा अनसूया जी ने। ऐसी पतिव्रता स्त्रियां दूसरे पुरुषों को देखती तो हैं, लेकिन पुत्र, भाई और पिता के रूप में देखती हैं। छोटा है, तो पुत्र के रूप में, समान है, तो भाई के रूप में और बड़ा है, तो पिता के रूप में देखती हैं। ये भी पति के लिए संपूर्ण समर्पित रहती हैं। ऐसा भी अगर सोचा जाए, तो तमाम तरह की मर्यादाओं के उल्लंघन से बचा जा सकता है। 
तीसरी पतिव्रता वो हैं - उन्हें अत्यंत नीच कहा गया है - जो स्त्रियां धर्म का विचार करके, कुल का विचार करके, दूसरे पुरुष पर मन नहीं लगाती हैं। इस तरह से जो स्त्रियां पतिव्रत धर्म का पालन करती हैं, वे निकृष्ट हैं। 
चौथी पतिव्रता के लिए कहा - अवसर नहीं मिलने के कारण जो पतिव्रता बनी रहती हैं, भय के कारण पति के साथ जुड़ी रहती हैं, उनके विचारों में क्षमता नहीं है, उनके विचारों में ऊंचाई नहीं है। ऐसी स्त्रियां अधम पतिव्रता हैं। 
इन चारों पतिव्रताओं का वर्णन अनसूया जी ने जानकी जी के लिए किया और आशीर्वाद दिया कि जो पति को ठगती हैं, दूसरे पति के साथ विहार करती हैं, उन्हें घोर नरक यात्रा होती है। क्षणभंगुर सुख के लिए जो अपने पति की उपेक्षा कर देती हैं, उन्हें बाद में सौ करोड़ जन्म तक नर्क की प्राप्ति होती है। कोई अन्य श्रम करने की कोई जरूरत नहीं है, नारी को पतिव्रत धर्म से परमपद की प्राप्ति हो सकती है। 
उन्होंने कहा कि नारी का जीवन बहुत ही अपावन है, अपावन मतलब - पावन कहते हैं पवित्र को, नारियां तभी पावन अवस्था को प्राप्त करती हैं, जब पति की सेवा करती हैं। दुनिया का कोई भी संसाधन, विज्ञान स्त्री जीवन को उत्कर्ष देने वाला नहीं है, जितना पतिव्रत धर्म है। 
नारी की सुंदरता के लिए, नारी के सुख के लिए, पति के सेवन के लिए पति के प्रति समर्पण अति महत्वपूर्ण है। यदि समर्पण होता है, तो परिवार ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र को मजबूती मिलती है। इस भाव में मानव को पहुंचना ही चाहिए। 
जानकी जी को अंतिम आशीर्वाद देते हुए अनसूया जी ने कहा कि जो स्त्रियां तुम्हारे नाम का स्मरण करेंगी और पतिव्रत का पालन करेंगी, वो अपने पतिव्रत के पालन में सफल होंगी। स्त्रियों को यह बात बतलाई जानी चाहिए कि जानकी जी के नाम का स्मरण करें, क्योंकि आशीर्वाद है, उनके नाम से पतिव्रत धर्म के पालन में बल मिलेगा। 
अनेक महिलाएं हैं, जिनका जीवन कोसते-कोसते बीत जाता है, उन्हें कुछ भी नहीं मिलता, लेकिन जो संपूर्ण जीवन अपने पति के लिए जीती हैं, ऐसी महिलाएं अगर सीता जी के नाम का स्मरण करती हैं, तो बहुत लाभ होता है। अनसूया जी ने हृदय की गहराई से आशीर्वाद दिया। पतिव्रत की सफलता ही परिवार की सफलता है, राज्य-राष्ट्र की सफलता है। पत्नी में यदि कोई खोटापन है, वह भी धीरे-धीरे दूर हो जाएगा। खोटेपन से जो हानि हो रही है, वो दूर हो जाएगी। यह वैदिक सनातन धर्म की अद्भुत स्थापना है। जीवन को सर्वविधि सुन्दर बनाने के लिए स्त्रियों के समर्पण से बढक़र कोई उपाय नहीं है।  
मेरा आग्रह है कि अनसूया जी का नाम भी महिलाएं जपा करें। धन्य हैं अनसूया और धन्य हैं सीता, जिन्होंने हर परिस्थिति में समर्पित होकर अपने पति के साथ जीवन बिताया। वे अपने जीवन के लिए ही नहीं, पूरे संसार के लिए मानक हैं। तमाम तरह के जो उपकरण बने हैं दुनिया में, लोग जिन्हें शक्तिशाली मान रहे हैं, वो कभी समाज के दूषण को मिटाने वाले नहीं हैं, कितना भी ग्रहों पर लोग चले जाएं, संसाधन बढ़ जाएं, जीवन के संसाधन बढ़ जाएं, लेकिन जब तक पतिव्रता स्त्रियां पैदा नहीं होंगी, तब तक समाज का वह स्वरूप कभी नहीं आएगा, जिसकी कल्पना ऋषियों ने की थी। पतिव्रता की शक्ति बहुत बड़ी शक्ति है, इसको कोई माप नहीं सकता, यह शुभ ही शुभ को देने वाली है। जो हर तरह के श्रेष्ठ भावों को देने वाली है। 
जगदंबा की जय हो, अनसूया माता की जय हो, सीता माता की जय हो... इससे केवल महिलाओं का सुधार नहीं होगा। संपूर्ण मानवता का उद्धार हो जाएगा। 
जय श्री राम

सती अनसूया जी : पति भक्ति अर्थात महाशक्ति


भाग - ४
यहां भगवान ने सीता जी को अनसूया जी से सत्संग करने के लिए प्रेरित किया। भगवान को पता था कि अनसूया जी आदर्श महिला हैं। राम जी ने कहा कि जाओ आप, अनसूया जी को प्रणाम करो, आशीर्वाद लो। 
अनसूया जी के पास जाकर सीता जी ने अत्यंत विनम्रता से समर्पित भावना से सीता जी को बार-बार प्रणाम किया, बार-बार चरणों में स्वयं को नवाया और उनसे आशीर्वाद की आकांक्षा की। सीता जी के विनीत भाव को देखकर अनसूया जी बहुत प्रसन्न हुईं और अपने समीप में बैठाया। एक महिला के पास दूसरी आए, तो बड़ी महिला आशीर्वाद देती है। अनसूया जी ने भी सीता जी को आशीर्वाद दिया। साथ ही, दिव्य आभूषण और दिव्य वस्त्र सीता जी को प्रदान किए। विशेषता यह थी कि ये वस्त्र और आभूषण कभी पुराने नहीं होंगे, उनमें कभी गंदगी नहीं आएगी। अनसूया जी को पता था कि राम जी वनवास के लिए निकले हैं, तपस्वी वेष है। सीता जी कहां, कैसे वस्त्र बदलेंगी, कहां आभूषण बदलेंगी, कैसे बदलेंगी। इसलिए अनसूया जी ने सीता जो को आशीर्वाद स्वरूप दिव्य वस्त्र-आभूषण दिए। 
लिखा है तुलसीदास जी ने -
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।।
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।।
अनसूया जी अपने हाथों से सीता को दिव्य वस्त्र, आभूषण पहनाए। एक और भी काम किया अनसूया जी ने, संक्षेप में जानकी जी को नारी धर्म का व्याख्यान किया कि नारी को कैसे रहना चाहिए। सबसे पहली बात नारी धर्म का व्याख्यान करते हुए कहा कि माता, पिता, भाई, जितने भी सम्बंधी हैं स्त्री के, वे सब सीमित हैं, माता-पिता, भाई इत्यादि लडक़ी को कोई भी वह नहीं दे सकता, जो पति दे सकता है। 
तुलसीदास जी ने लिखा है -
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।।
अनसूया जी ने ही यह उपेदश किया था - 
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।।
एक लडक़ी को माता-पिता क्या दे सकते हैं, पढ़ा सकते हैं, वस्त्र दे सकते हैं, दान-दहेज दे सकते हैं, यह सीमित है, इसकी एक सीमा है, अमिट देने की क्षमता पति में ही होती थी। हे जानकी, कोई सीमा नहीं है, जिसका कोई माप नहीं हो सकता, जिसको तौला नहीं जा सकता है, जिसे दायरे में नहीं लाया जा सकता, वह सुख पति ही दे सकता है। दूसरे लोग पत्नी को उतना सुख नहीं दे सकते। 
जिस तरह की देखभाल पति करता है, उस तरह की देखभाल माता-पिता भाई नहीं कर सकते। पति के साथ लगकर पत्नी अपने परलोक को भी सुधार सकती है। पति जो धर्म करेगा, उसमें आधे की भागीदार पत्नी होगी। जो परम फल अमिट फल कहलाता है, उस फल को देने की क्षमता पति के साथ लगकर ही प्राप्त हो सकती है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण उपदेश है। पिता कभी अपनी बेटी के सभी रहस्यों के जानकार नहीं हो सकते, लेकिन पति अपनी पत्नी के सभी रहस्यों का जानकार होता है। 
पति सब कुछ दे सकता है, अमित दानि भर्ता बयदेही। जो पालन-पोषण करता है, उसे भर्ता कहा जाता है। पति की सेवा करके नारी सब कुछ प्राप्त कर सकती है। लोक की सभी विभूतियों को लोक के सभी फलों को प्राप्त कर सकती है, इसलिए अनसूया जी ने कहा कि किसी भी अवस्था में पति का परित्याग नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह असीमित दान देने वाला है। भले ही पति गरीब हो, बीमार हो, नेत्र ज्योति न हो, अपंग हो, सभी प्रकार की दीनता से युक्त होने के बावजूद पति की सेवा में ही पत्नी को सब कुछ मिलेगा। दूसरों से कुछ नहीं मिलेगा, जो है, वह भी चला जाएगा। 
आजकल असंख्य नारियों का मन भटकता है अपने पति से, अपने पति की दरिद्रता, दीनहीनता, रोग आदि को देखकर भटकता है, भटकने से कुछ नहीं मिलता, बल्कि जो मिला हुआ है, वह भी छिन जाता है। इसलिए पति को किसी भी तरह से उपेक्षित नहीं करना चाहिए। यदि थोड़ा भी मन भटकता है, तो उससे अनेक तरह की यातनाएं प्राप्त होती हैं। सब कुछ मानकर पति का ही साथ तन-मन से देना चाहिए। 
इसके बाद चार प्रकार की पतिव्रता स्त्रियों का उल्लेख किया अनसूया जी ने। स्त्रियों को इन बातों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। आज के लोग समझ रहे हैं कि हम बहुत होशियार हैं, एक जगह बंधन में रहने की क्या जरूरत है, जबकि यह बंधन नहीं है, यह तो बड़े लाभ देने वाला है। जब संयम-बंधन में रहेंगे, तभी हम जीवन का सही मूल्यांकन कर सकेंगे। हम सम्बंध जरूर बढ़ाएं, लेकिन मर्यादा से सम्बंध को बढ़ाना चाहिए, जिससे हमारे जीवन का विकास हो, यह नहीं कि जो मिले उसे पत्नी मान लें, जो मिले उसे पति मान लें। सम्बंधों की गरिमा बनाए रखने के लिए बंधन जरूरी हैं। 
क्रमश: 

सती अनसूया जी : पति भक्ति अर्थात महाशक्ति


भाग - ३
पतिव्रता कुछ भी कर सकती है। जो भी करने योग्य है या नहीं करने योग्य है, वह जैसा चाहे, वैसा बना दे। यदि स्त्री पतिव्रत का पालन करती है, जो सर्वश्रेष्ठ भावों को समर्पित है, उसकी भावना कहीं नहीं भटकती। पतिव्रता नारी में बहुत शक्ति होती है। जीवन की दूसरी समस्याओं के समाधान में वे संभव हैं। जैसे ईश्वर कुछ भी कर लेते हैं, जैसे वह संप्रभुता संपन्न हैं, ठीक उसी तरह से पतिव्रता महिलाएं भी कुछ भी कर सकती हैं। 
स्त्रियों का पहले सीमित क्षेत्र था, लेकिन अब विस्तृत क्षेत्र हो गया है, अब वे कार्यालय भी जाती हैं। घर से बाहर निकलकर कई तरह के काम करने लगी हैं। बाहर निकलने से उनकी व्यस्तता बढ़ी, उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ी, उनकी पहचान बढ़ी है, उनका धन बढ़ा है। उनका मनोरंजन बढ़ा है, लेकिन इसमें बहुत बड़ी विडंबना उत्पन्न हो गई है, बाहर निकलने से पतिव्रता धर्म बहुत असक्त हुआ है। पहले एक दायरे में रहना होता था, उसमें माता-पिता, बच्चों-पति की सेवा अतिथि सेवा का काम एक दायरे में ही होते थे। सीमित दायरे में रहने से पतिव्रता धर्म का पालन करने में स्त्रियों को काफी सुविधा होती थी, काफी बल मिलता था, लेकिन उन्मुक्त जीवन जब से स्त्रियों का शुरू हुआ है, अनेक तरह के काराबारों में वे सक्रिय हुई हैं, तब से पतिव्रता यज्ञ का अनुष्ठान कमजोर पड़ा है, जिससे संपूर्ण परिवार, समाज, जाति खतरे में पड़ रही है। वैसे ज्यादातर लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसा क्यों हो रहा है। बच्चों को कौन संभाले, संस्कार कौन दे, पति कार्यालय गए, पत्नी कार्यालय गई, कौन संस्कार दे? समाज का चिंतन कई बड़े चिंतकों ने किया है, भारत ने अपने प्रभुत्व को गंवा दिया। भारत का प्रभुत्व छोटा रह गया। देश की शक्ति के मूल में एक बड़ी भूमिका है पति और पत्नी के परस्पर विश्वास की, सम्बंधों की। अनसूया जी के बारे में चिंतन करते हुए इन बातों पर ध्यान जा रहा है। 
यदि पत्नी पूर्ण रूप से पति के लिए समर्पित होती है, तो समाज, परिवार, जाति, मानवता को अनेक प्रकार की कमजोरियों से बचाया जा सकता है। अब किसी का किसी के लिए संपूर्ण समर्पण नहीं है। 
अनसूया जी अत्रि जी के साथ परलोक सुधार के लिए ही आई थीं। संतति को जन्म देने, संग्रहण करना, उनका संकल्प नहीं था। संकल्प यह था कि आज से दोनों एक हो गए, जैसे एक हाथ में पीड़ा होती है, तो संपूर्ण शरीर की पीड़ा मानी जाती है, ठीक उसी तरह से पति-पत्नी, दोनों एक हो जाते हैं। एक ही के दो भाग, एक पुरुष भाग और दूसरा नारी भाग। परिवार, समाज में पत्नी बनकर जब कोई कन्या आती थी, तो पति का बल बढ़ जाता है। एक नई शक्ति के रूप में पति प्रकट होता है। सनातन धर्म में पतिव्रता का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण रूप से स्वीकार किया गया है। एक ही पति से अपने मन, तन को जोडक़र रखना आजकल कम हो रहा है। जब जो अच्छा लगे, वैसा करना चाहिए, क्या यह सोच जीवन के सभी क्षेत्रों में संभव है? जब मन करे, वैज्ञानिक बन जाएं, डॉक्टर बन जाएं, राजनेता बन जाएं, ऐसा तो संभव नहीं है। जहां जो समर्पित हो गया, वहां वह क्षेत्र उसका अपना हो गया। जहां जो लगा हुआ है, पूर्ण समर्पण से लगे, तो उसकी शक्ति बढ़ जाती है।
पतिव्रता धर्म का पालन विश्वव्यापी धर्म है। ऋषियों-महर्षियों ने पतिव्रता का जो प्रतिपादन किया, उसके प्रयोग के लिए लोगों को समझाया, लोगों को इसका अनुरक्त बनाया, यह केवल ब्राह्मणों के लिए नहीं था, यह केवल भारत भूमि के लिए नहीं था, दुनिया के हर व्यक्ति के लिए था। 
पति तभी कामयाब होता है, जब उसके पीछे पत्नी की शक्ति पूरी तरह से लगती है। जब दोनों एक दूसरे के लिए, एक दूसरे के हित के लिए प्रयासरत रहते हैं। पतन के लिए नहीं, उद्धार के लिए प्रयासरत रहते हैं। कहीं भी अपूर्ण समर्पण से उपलब्यिां प्राप्त नहीं होतीं। संपूर्ण समर्पण से ही बड़ी उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। 
अनसूया जी पति के प्रति अपने समर्पण के कारण बहुत बड़ी शक्ति में बदल गईं। जैसे सूर्य संपूर्ण संसार को दिन में प्रकाशित करता है, चंद्रमा रात्रि में प्रकाशित करता है, ठीक उसी तरह से अनसूया जी का जो जीवन है, पूरे संसार को पतिव्रता धर्म के लिए प्रेरित करने के लिए आदर्श है। जब वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश को बालक बना सकती हैं, तो कितनी अतुलनीय शक्ति उनके पास है। 
आज समर्पण के अभाव में ही समाज भ्रष्ट हो रहा है, समाज का सही मूल्यांकन घट रहा है। सभी महिलाओं को अनसूया जी से प्रेरणा लेकर, बल लेकर अपने जीवन को सुधारना चाहिए। आज महिलाएं जीवन की कमजोरी को दूर करने के लिए यहां-वहां भटकती हैं, कई तरह के लोगों से जुड़ती हैं, किन्तु उन्हें खास कुछ प्राप्त नहीं होता। उन्हें उत्तम चरित्र प्राप्त नहीं होता। 
भगवान जब चित्रकूट में रह रहे थे। वहां काफी लोगों का आना-जाना हो गया था। भगवान ने सोचा कि इस स्थल को भी छोड़ देना चाहिए, कहीं और दूरी पर रहना चाहिए। भगवान ने महर्षि अत्रि के आश्रम में जाकर उन्हें प्रमाण किया, उनका सम्मान किया, आशीर्वाद लिया और उनसे प्रेरणा भी ली। आप आज्ञा दीजिए कि आगे बढूं, ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त करूं। अत्रि जी ने भी राम जी का बहुत आदर किया। उन्होंने भगवान की एक लंबी वंदना की और कहा कि आपकी शुचिता बनी रहे, आपकी कृपा बनी रहे। 
क्रमश: 

सती अनसूया जी : पति भक्ति अर्थात महाशक्ति

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी


भाग - २
हमारे वैदिक सनातन धर्म ने इस धारणा को बहुत पुष्ट किया। संसार का हर पति चाहता है कि उसकी पत्नी केवल उसकी पत्नी रहे। मेरे ही विकास के लिए और मुझे ही सुख देने के लिए मेरा ही सहयोग करे। जाति, संप्रदाय, नस्ल, देश कोई भी हो, पूरी दुनिया के पुरुष यही सोचते हैं। 
वैदिक सनातन धर्म ने पतिव्रता स्त्रियों को बहुत महत्व दिया, उसका लाभ भी बताया और पतिव्रता न होने की हानि का भी वर्णन किया। यह भी बताया कि कैसे पतिव्रता रहा जा सकता है। इस देश में यह प्रथा बहुत पुरानी, अनादि है। काफी कोशिश करके समाज के अच्छे लोग पत्नियों को पतिव्रता, पति परायणा बनाने का उपक्रम करते रहते हैं। पतिव्रता स्त्रियों में अनसूया जी का स्थान सबसे ऊंचा है। उनका पूरा जीवन ही अपने पति महर्षि अत्रि जी के लिए अर्पित था। उनके मन में किसी दूसरे के लिए कोई भाव आया ही नहीं। कभी उन्होंने अपनी दृष्टि या दूसरी इन्द्रीयों को दूसरी ओर नहीं लगाया। कभी लोभ नहीं आया, किसी पुरुष को उन्होंने काम की भावना से नहीं देखा, उन्होंने अपने पति देव को ही अपना सबकुछ माना। उन्हें ही परिवार माना, राज्य व देश माना, संपूर्ण संसार उन्हीं को माना। पतिव्रता होने के लिए पत्नी का जीवन सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए। महर्षि अत्रि को भी अपनी पत्नी पर बड़ा अभिमान था। 
अनेक तरह की कथाएं अनसूया जी को लेकर कही जाती हैं। एक बड़ी प्रसिद्ध कथा है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भी अनसूया जी ने बालक बना दिया था। हुआ ऐसा कि सत्संग की परंपरा है ही, सत्संग में विभिन्न विषयों की चर्चा होती है। एक बार ब्रह्मा की पत्नी ब्रह्माणी, विष्णु की पत्नी लक्ष्मी और महेश की पत्नी गौरी परस्पर चर्चा कर रही थीं कि संसार में सबसे बड़ी पतिव्रता कौन है। सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता किसको माना जाए? बहुत देर तक वे चर्चा करती रहीं, पतिव्रत धर्म की चर्चा करती रहीं, दोष निकालती रहीं। अंत में उन्होंने निर्णय किया आज के काल में अत्रि जी की पत्नी अनसूया जी सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता हैं। उनसे बड़ी पतिव्रता कोई नहीं है, ऐसा ब्रह्माणी, लक्ष्मी गौरी ने तय किया। यह बात ब्रह्मा, विष्णु, महेश तक पहुंची। चर्चा के बारे में बताया, उसके परिणाम के बारे में बताया। तीनों देवताओं ने कहा कि आप लोगों ने तय कर लिया है, तो परीक्षण भी होना चाहिए। हम तीनों जाते हैं ब्राह्मण वेष बनाकर उनकी परीक्षा लेते हैं। 
तीनों देवता महर्षि अत्रि जी के आश्रम पहुंच गए। तब अत्रि जी किसी विशेष परिस्थिति के कारण आश्रम के बाहर थे। आश्रम में ब्राह्मणों को देखकर अनसूया जी ने आदर, सत्कार किया। तीनों ब्राह्मणों ने कहा कि हम लोग आपके यहां आए हैं, अतिथि सत्कार होना चाहिए, भीक्षा भी हम लोग लेंगे, लेकिन हमारी शर्त है कि आप भिक्षा देने के पहले जितने वस्त्रों को आपने धारण कर रखा है, उन सभी को अपने से अलग रखकर हम लोगों को भीक्षा दें, तभी हम आपसे भिक्षा लेंगे। ऐसा ब्राह्मण वेषधारी ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने कहा, धर्म संकट उत्पन्न हो गया। अनसूया जी के सामने विकट परिस्थिति आ गई, उन्होंने भगवान का ध्यान किया, मन में ही कह रही हैं कि यदि पति के समान किसी दूसरे को नहीं देखा हो, यदि किसी भी देवता को पति के समान न माना हो, यदि मैं पति की अराधना में ही लगी रही हूं, तो मेरे सतीत्व के प्रभाव से ये तीनों ब्राह्मण नवजात बच्चे हो जाएं। तत्काल तीनों ही नन्हें बच्चे होकर अनसूया जी की गोद में खेलने लगे। अद्भुत घटना हो गई। दुनिया का सृजन करने वाले, पालन करने वाले और संहार करने की क्षमता रखने वाले देवता, तीनों ही अनसूया जी की गोद में खेलने लगे। तीनों ही बच्चे हो गए। यह इतिहास की अकेली घटना है। जिसकी शक्ति से ब्रह्मा विष्णु, महेश बालक रूप धारण कर लें, तो अनुमान लगाइए कि अनसूया जी कितनी महान पतिव्रता रही होंगी। 
क्रमश: 

सती अनसूया जी : पति भक्ति अर्थात महाशक्ति

(जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के प्रवचन से)

भारत में चरित्र निर्माण पर विशेष जोर रहा है। तमाम लोग जानते हैं कि अहिंसा का क्या महत्व है, फिर भी हिंसक हैं और सत्य का क्या महत्व है, फिर भी असत्य बोलते हैं। लोग अपने ज्ञान को परिपक्व नहीं बनाते हैं। ज्ञान को अपने चरित्र में नहीं उतारते हैं। कहा जाता है, धन नष्ट हुआ, तो कुछ नष्ट हुआ, शास्त्र नष्ट हुआ, तो कुछ ज्यादा नष्ट हुआ और यदि चरित्र नष्ट हुआ, तो सब कुछ नष्ट हो गया। भारत एक चरित्र प्रधान देश रहा है। यहां के संतों, गुरुओं, आचार्यों ने संपूर्ण संसार को ज्ञान का पाठ ही नहीं पढ़ाया, ज्ञान का परिपक्व स्वरूप भी संसार को दिया। इसके साथ ही अपने चरित्र में भी ज्ञान को उतारा। पूरी दुनिया को चरित्र की शिक्षा देने वाला देश भारत ही है। मनु ने भी यही कहा है। इसलिए भारत को विश्व गुरुत्व की प्राप्ति हुई।
भारत में पतिव्रता, पति परायणा महिलाओं का अस्तित्व का एक बहुत बड़ा पक्ष है, उन्नत अवस्था है। यदि कोई स्त्री है और पतिव्रता है, अपने पति को ही सब कुछ समझती है, उन्हीं के लिए आदर रखती है, स्नेह करती है और सेवा में समर्पित रहती है, उसके अतिरिक्त उसके जीवन का कोई और उद्देश्य नहीं होता, जो संपूर्ण बाहर और भीतर पति के लिए ही है, उसे पतिव्रता बोलते हैं। पति के लिए जिसके सभी व्रत हों, वो पतिव्रता। पति की प्रसन्नता, पति का विकास, पति से अनुकूलता, इसके लिए उन्हें पतिव्रता कहा जाता था। स्त्री जाति के संरक्षण, विकास, सुख के लिए, स्त्री जाति के जीवन की सार्थकता उत्तम चरित्र में है। 
शादी की जो प्रथा है, वह भी बहुत उपयोगी होती। यदि विवाह नहीं होता, तो सम्बंधों में बड़ा घृणित रूप हो जाता। जिसने विवाह की प्रथा को चलाया होगा, वह दुनिया का सबसे बड़ा आदमी होगा। वेद जो ईश्वर से प्राप्त होते हैं, जो संपूर्ण सृष्टि के नियामक हैं, उनके आधार पर भी जीवन परम ऊंचाई को प्राप्त कर सकता है। उसी क्रम में स्त्री जब शादी करके आती है, जब वह पत्नी बनती है, तो उसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है सबसे बड़ा अर्जन है, सबसे बड़ी औषधि व प्रेरणा है कि वह पतिव्रता धर्म का पालन करे। पति के लिए पूर्ण समर्पित हो जाए। अपने ज्ञान और अपनी इन्द्रीयों को किसी भी दूसरे उपक्रम में नहीं लगाए। समाज में जो आज कलह हो रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं, कई तरह की कुरीतियां आती हैं, दूषण होते हैं, वो सब समाप्त हो जाएं। पत्नी पतिव्रता होती है, तो उसका बल बढ़ता है। पतिव्रता महिलाओं के प्रति लोगों का भी सम्मान बहुत ज्यादा होता है। संदेह में आजकल कई तरह की बीमारियां पैदा हो जाती हैं, पत्नी यदि पति के लिए समर्पित न हो, तो परिवार टूट जाते हैं, परिवार टूटता है, तो समाज टूटता है। धीरे-धीरे ये टूटन पूरे राष्ट्र और मानवता को प्रभावित करता है। वस्तुत: दोनों एक दूसरे के पूरक बनकर जितना उत्पादन कर सकते हैं अपने लिए, परिवार, समाज, राज्य के लिए, उतना अलग-अलग होकर नहीं कर सकते। यह बहुत बड़ा दूषण समाज में है, पत्नी अगर पति के लिए पूर्ण समर्पित नहीं है, यदि मन उसका डोल रहा है, तो वह न अपने को सुख दे पाएगी, न पति को न परिवार को। भटकती रहेगी, भटकने की कोई सीमा नहीं है। आदमी रोज खाता है, लेकिन उसका कोई अंत नहीं है। कितने कपड़े हम पहन सकते हैं, सभी मकानों में हम ही रह लेंगे, तो कैसे होगा। अनावश्यक संपत्ति को अपने लिए आरक्षित करके हम कहीं के नहीं रहेंगे, सब संपत्ति मकान में ही खर्च हो जाएगी, फिर भी जीवन कठिन हो जाएगा, इसलिए संयम तो जरूरी है। 
क्रमश: 

Wednesday, 9 November 2016

भक्तिनी शबरी : सेवा का सच्चा पर्याय

समापन भाग
किसी को सीखना हो, तो शबरी से सीखे कि कैसे श्रद्धा भक्ति के माध्यम से ऊंचाई को प्राप्त किया जा सकता है। शबरी ने सबकुछ पा लिया था, जब तक मानवता रहेगी, तब तक शबरी की चर्चा होती रहेगी। संपूर्ण संसार के मनुष्यों से अत्यंत आग्रह है कि सभी लोग ईश्वर सेवक बनें, संत सेवक बनें, गुरु सेवक बनें। मार्गदर्शन हम शबरी से प्राप्त करें। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, सभी मार्गदर्शन प्राप्त करें। किसी भी जाति, संप्रदाय के लिए शबरी प्रेरणा का स्रोत हैं। इस तरह के व्यक्तित्व संसार के इतिहास में दुर्लभ हैं। जो जहां है, वहीं से सेवा प्रस्तुत करे। जीवन की परम धन्यता को प्राप्त करेगा। 
ऐसे वैज्ञानिकों की जरूरत है, बहुत से सेवकों की जरूरत है, बहुत से नेताओं की जरूरत है। शबरी से सीखकर समाज उन्नत समाज होगा, एक दूसरे के काम आने वाला समाज होगा, राम राज्य वाला समाज होगा। 
शबरी को भगवान ने नवधा भक्ति का उपदेश दिया, जो आज भी संसार में भक्ति का श्रेष्ठतम उपदेश माना जाता है। यह भक्ति भागवत में भी बताई गई है। जगह-जगह इसका वर्णन है। भगवान ने शबरी के माध्यम से संसार को नवधा भक्ति उपदेश दिया, जैसे कृष्ण अवतार में भगवान ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। भगवान ने शबरी से कहा कि नवधा भक्ति में से किसी एक प्रकार की भक्ति भी किसी को हो जाए, तो उसका कल्याण हो जाएगा, लेकिन आपने तो नौ प्रकार से भक्ति की है। आपके कल्याण में कोई संदेह की बात ही नहीं है। तुम संपूर्ण भक्तिमय हो। राम जी ने बहुत उपदेश दिए होंगे, ३३ हजार साल का उनका काल है, लेकिन उन्होंने जो उपदेश शबरी को दिया, वह अतुलनीय है, यह परम सौभाग्य है कि साधन विहीन शबरी को भक्ति क ा उपदेश मिला। राम जी सबसे साधन संपन्न हैं, वह सबसे साधन विहीन शबरी को उपदेश दे रहे हैं। 
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा। 
अर्थात पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंग से प्रेम। तीसरी भक्ति है, अभिमान रहित होकर गुरु की सेवा। चौथी है - कपट छोडकर मेरे गुणों का गान करना। पांचवीं है - दृढ़ विश्वास के साथ मेरे मंत्र अर्थात राम नाम का जाप। छठी है - इन्द्रियों का निग्रह, अच्छा चरित्र, संत आचरण करना। सातवीं है - संसार को मुझमें ओतप्रोत देखना, संतों को मुझसे भी अधिक मानना। आठवीं है - जो मिल जाए, उसी में संतोष करना, दूसरे के दोष न देखना। नौवीं भक्ति है - सरलता और सबके साथ कपटरहित व्यवहार करना, मुझमें भरोसा रखना और मन में विषाद न लाना। 
नवधा भक्ति में शबरी ऊंचाई को प्राप्त हुईं। जब शबरी ने राम जी से कहा था कि मैं तो अधम हूं, मन्दबुद्धि हूं, तब राम जी ने कहा, 
कह रघुपति सुनु भामिनी बाता। मानउं एक भगति कर नाता।।
हे भामिनी, मेरी बात सुन, मैं तो केवल एक ही भक्ति का ही सम्बंध रखता हूं। 
भगवान तो भक्त के वश में हो जाते हैं, भगवान केवल भक्ति भाव देखते हैं, ऐसे भगवान के लिए शबरी ने स्वयं को अर्पित कर दिया और संसार के लिए आदर्श बन गईं।
जय श्री राम

भक्तिनी शबरी : सेवा का सच्चा पर्याय

भाग - ४
एक और चर्चा होती है कि शबरी ने चख-चखकर राम जी को बेर खिलाए। राम जी का यह स्वभाव है, जो भी माताएं, गुरु माताएं उन्हें खिलाती थीं, वे बहुत रुचि के साथ खाते थे, किन्तु शबरी के हाथ से खाने के बाद ईश्वर ने जब भी किसी माता के हाथों कुछ खाया, तो प्रशंसा तो जरूर की, किन्तु धीरे से यह भी कह दिया कि जो स्वाद शबरी के बेर में मिला था, वह फिर कभी नहीं मिला। ईश्वर की जो यह पक्षपाती भावना है, वह भक्त को परम ऊंचाई देने वाली है।
शबरी द्वारा किए गए स्वागत-सत्कार के बाद राम जी ने कहा था, मैं आपके गुरु मतंग ऋषि जी का आश्रम देखना चाहता हूं, जहां वे बच्चों को पढ़ाते, पूजन, अर्चन करते थे। शबरी उन्हें आश्रम में जगह-जगह ले गईं, आश्रम का हर कक्ष दिखाया। वहां सब कुछ व्यवस्थित था, अध्ययन की जगह, ग्रंथ, सबकुछ वैसे ही था, जैसे ऋषि छोड़ गए थे। भगवान बड़े प्रसन्न हुए, शबरी ने सबकुछ ठीक से सजा रखा था। भगवान को चार वेदों को जानने वाला उतना प्रिय नहीं होता, जितना भक्त भाव वाला चांडाल प्रिय होता है। जो भगवान के लिए समर्पित है, वह भगवान को प्रिय है। 
भगवान बैठे हैं, भक्त में वह धन, रूप नहीं देख रहे, केवल श्रद्धा देख रहे हैं। शबरी ने अनुमति मांगी, आपका दर्शन हो गया, आज मेरा जीवन परिपूर्ण हुआ। भगवान अब कृपा करें, मैं अब जाऊं। गुरु चरणों की सेवा करूं। राम ने कहा, ऐसा ही हो। शबरी भगवान के देखते-देखते ही दिव्यधाम चली गईं। ऐसा वाल्मीकि रामायण में लिखा है।
शबरी से जुड़ी प्रसिद्ध कथा है। एक तालाब में कीड़े पड़ गए थे, लोगों ने राम जी से कहा कि आप इसे निर्मल बना दीजिए, 
भगवान ने कहा कि यह पाप का फल है। किससे यह पाप हुआ कि पानी दूषित हो गया? 
लोग नहीं बतला पाए। तब राम जी ने कहा, चिंतन करने से मेरे मन में ऐसा आ रहा है कि कभी रास्ता साफ कर रही थीं शबरी। एक संत ने शबरी को नहीं देखा, शबरी ने उन्हें देखा और किनारे खड़ी हो गईं, स्नान करके जब वह लौटने लगे, तो शबरी का कपड़ा उनके चरणों में गिर गया, वे बड़े नाराज हुए, कौन है दुष्टा, रास्ते में आ गई, दूषित कर दिया, अब फिर स्नान करना पड़ेगा। 
दुबारा स्नान के लिए वह संत नदी नहीं गए, उन्होंने इसी तालाब में स्नान किया। उसी समय से इसका जल कीड़ों से भर गया। 
लोगों ने पूछा, इसका समाधान क्या हो सकता है बताइए?
तो राम जी ने कहा, यदि शबरी के चरणों से धोकर इसमें जल डाला जाए, तो कीड़े समाप्त हो जाएंगे। 
लोगों ने ऐसा ही किया और तालाब के कीड़े समाप्त हो गए। बहुत बड़ी घटना हो गई। सभी प्रकार से निर्बल साधन विहिन व्यक्ति के माध्यम से संत सेवा की महिमा से ईश्वर सेवा की महिमा से शबरी शक्तिशाली हो गईं। तालाब को निर्मलता प्राप्त हो गई। इस घटना से दण्डकारण्य के संपूर्ण ऋषि समाज में बहुत अच्छा संदेश गया। कई लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि हम तो जान ही नहीं रहे थे कि ये महिला इतनी प्रभावशाली हैं। ईश्वर तो वस्तुत: दीनदयाल हैं, उन्होंने शबरी के रूप में भक्त को पहचान लिया। 
चिंतन की बात है कि लाखों वर्ष हो गए, त्रेता की बात है राम जी जब हुए थे, लेकिन शबरी की चर्चा आज भी ताजा है। कितना परिवर्तन आया संसार में, कितने तरह के लोग आए, गायक, कलाकार, सुनने वाले, लिखने वाले, बोलने वाले, सब लोग सिमट गए, बड़ी जातियों में जन्मे लोग सिमट गए लेकिन शबरी आज भी संसार को प्रकाशित कर रही हैं। शबरी का एक ही रहस्य है कि उन्होंने श्रेष्ठ भावों के साथ संतों की सेवा की। कहीं से कोई छल नहीं, अभिमान नहीं, दिखावा नहीं। 
क्रमश:

भक्तिनी शबरी : सेवा का सच्चा पर्याय

भाग - ३
जब बाकी ऋषियों को पता चला कि राम जी आए हैं, तो वे आए और कहने लगे कि आप हमारे यहां नहीं आए, यहां आ गए। राम जी ने उत्तर दिया कि दण्डकारण्य में मैंने कई लोगों से पूछा कि सबसे अच्छा भक्त कौन है, तो सबने शबरी का नाम लिया। मुझे भक्त बहुत प्रिय हैं। जो मुझे प्रेम करता है तन-मन से, उसे मैं सबसे ज्यादा चाहता है, शबरी ऐसी ही हैं। 
एक विशेषता है, शबरी ने सदा छिपकर सेवा की। अपने यहां वैदिक सनातन धर्म में कहा जाता है कि दान का हाथ दिखना नहीं चाहिए कि किसने दान दिया। वैसे ही सेवा भी छिपकर की जानी चाहिए, सेवा का विज्ञापन बड़ा नहीं होना चाहिए, दिखावटीपना नहीं हो। हमने किसी की सेवा की है या सम्मान किया है, तो दिखना नहीं चाहिए। उसका प्रचार नहीं होना चाहिए, यही काम शबरी करती थीं। दो दिन नहीं, चार दिन नहीं, पूरे जीवन ऐसा ही किया। 
शबरी के पिताजी राजा थे, शबरी जब विवाह लायक हुईं, तो विवाह के आयोजन के क्रम में वर वगैरह देखने के बाद, शादी की तैयारी होने लगी, दरवाजे पर तैयारी होने लगी, शबरी ने पूछा कि यह क्या हो रहा है, लोगों ने बताया कि तुम्हारी शादी होने वाली है, तो शबरी का हृदय तो आध्यात्मिक था, पूर्व जन्म के संस्कार भी रहे होंगे, शबरी में ईश्वर के लिए चाह, ललक थी, इच्छा थी कि ईश्वर व संतों के लिए जीवन को अर्पित करें, इसके अलावा कोई उद्देश्य नहीं था। उन्होंने धीरे से संकल्प किया कि मैं घर पर नहीं रहूंगी। वह जंगल में चली गईं, फिर लौटकर नहीं आईं। बहुत से लोगों ने मनाया, किन्तु सांसारिक जीवन में शबरी का मन नहीं माना। शबर जाति की थीं, भील जाति, इसलिए नाम शबरी हो गया। जैसे फल ग्रहण करने वाले को फलाहारी बोलते हैं, ठीक उसी तरह से वे शबर जाति की थीं, इसलिए शबरी कहा गया। मतंग ऋषि के आश्रम में रहीं, वे आश्रम में कुछ भी लेकर नहीं गई थीं। आज लोक प्रतिष्ठा के जो कारण होते हैं, वो शबरी के पास नहीं थे। धन का स्पर्श ही नहीं किया पूरे जीवन में। आज का साधु आते ही धन संग्रह में लग जाता है। 
गृहस्थ जीवन ही नहीं, आश्रम के लिए भी धन चाहिए, लेकिन आश्रम का उद्देश्य धन नहीं है। वह तो अध्ययन, अध्यापन, जप, तप की जगह है। उतना ही धन प्राप्त करें, जो भक्त सहर्ष देकर जाएं। 
शबरी के पास न धन, न रूप, न कला, न विद्या, लेकिन सेवा है। हमें सोचना चाहिए कि हम जो कर रहे हैं, वह यदि किसी की समस्या का समाधान है, निवारक है, किसी के लिए वरदान स्वरूप है, तो हमारा जीवन सफल हो जाएगा, हमारी पहचान सुस्पष्ट हो जाएगी, फिर हमें जो चाहिए, वह मिलेगा। सेवा के इस पहलू को समझना चाहिए। अपने जीवन में सेवा भाव को उतारना चाहिए, समाज, परिवार, लोक का उत्कर्ष तभी होगा। 
ईश्वर के प्राप्ति में जो परम लाभ है, उसमें शुरू से सहिष्णुता होनी चाहिए। संत सेवा से, साधना से, शबरी को कोई शिकायत नहीं, कोई उलाहना नहीं, केवल श्रद्धा और प्रतीक्षा है। भक्ति में देने-देने की बात होती है, लेने की नहीं, रिटर्निंग गिफ्ट नहीं होता। सेवा में ही वह स्वयं का जीवन सार्थक मानता है। वाल्मीकि रामायण में लिखा है, भगवान ने शबरी से पूछा कि तुमने इतने व्रत-नियम किए, तुम्हें क्या प्राप्त हुआ, तो शबरी ने कहा कि आप प्राप्त हुए। 
दूसरा कोई होता, तो कई तरह की बातें करता, कहता कि गुरुजी ने मुझे बहुत मान दिया। तमाम लौकिक बातें करता, लेकिन शबरी ने स्पष्ट कहा, आप प्राप्त हुए। अंतिम उद्देश्य तो ईश्वर प्राप्ति ही है। सच्चा फल तो यही है। संपूर्ण कल्याणकारी है आपका दर्शन। 
क्रमश:

भक्तिनी शबरी : सेवा का सच्चा पर्याय

भाग - २
पुरानी प्रथा है कि भगवान के साथ भगवान के भक्तों की भी सेवा करनी चाहिए। भागवत यानी जो भगवान के लिए अर्पित हैं, भागवतों की सेवा भी गुरु और ऋषियों के समान ही होनी चाहिए। शबरी का जो जीवन क्रम है, वह बड़ा ही प्रेरणादायक है, वह सैंकड़ों वर्षों तक प्रतिदिन दण्डकारण्य में जमा ऋषियों, संतों की सेवा करती रही थीं। विलक्षण प्रतिभा संपन्न थीं। जो रास्ता ऋषियों का होता था, उस रास्ते को बुहारने, साफ रखने, कंकड़ इत्यादि दूर करने, उस पर रेत बिछाने में उन्होंने अपना समय लगाया। और ऐसा करते हुए कभी अपने को प्रकट नहीं करना। प्रचारित नहीं करना। सुबह से पहले रात्रि में ही उठकर ये सारे काम करना, जिससे किसी को पता ही नहीं चलता था कि किसने यह किया है। सैंकड़ों वर्ष तक शबरी ऐसा करती रहीं। वह मतंग ऋषि के आश्रम में रहती थीं, मतंग ऋषि शबरी का महत्व समझते थे। उन्होंने शबरी को अद्भुत आध्यात्मिक आभा प्रदान की। ऐसा नहीं है कि वह धन लेकर आई थी, आज के साधु तो आते ही धन संग्रह में लग जाता है। बड़ा प्रश्न हो जाता है कि किसे संत समझा जाए। गुमराह अवस्था समाज के सामने खड़ी हो जाती है। किसे असली समझें, किसे नकली समझें। सनातन धर्म धन के बिना नहीं चल सकता। जीवन केवल खाने-पीने, वस्त्र, गृहस्थ जीवन के लिए ही नहीं है, आश्रम के लिए भी धन की जरूरत है। अनायास रूप से जो लोग धन दें, उसका उपयोग करें, मर्यादा से जीवन जीएं। ईश्वर की सेवा करें, जितना जरूरी हो, उतने ही धन का सेवन करें। शबरी के पास न रूप है, न जाति है, फिर भी उन्होंने पूर्णत: समर्पित होकर सेवा को अपना मार्ग बनाया। अब तो लोगों को विश्वास ही नहीं होगा कि सेवा करके अपने को सफल मानव बना सकते हैं, लेकिन शबरी ने ऐसा एक-दो दिन नहीं, सैंकड़ों वर्षों तक किया। उन्हें विश्वास था कि भगवान आएंगे। मतंग ऋषि पर विश्वास था। मतंग ऋषि ने स्वर्ग जाते हुए कहा था कि राम जी जरूर आएंगे, शबरी प्रतीक्षा करती रहीं। गुरु पर परम विश्वास था, इसी को श्रद्धा कहते हैं। शबरी को परम श्रद्धा थी कि राम जी जरूर आएंगे। गुरु की वाणी कभी मिथ्या नहीं होती। 
गुरु ने जाते हुए कहा था, तुम्हें आशीर्वाद देता हूं, राम जी अवतार लेने वाले हैं, तुम्हें यहां आकर मिलेंगे। 
गुरु ने यह नहीं कहा कि तुम बहुत सुन्दर बन जाओगी, नर्तकी बन जाओगी, धनवान बन जाओगी, रानी बन जाओगी। संत की मनोकामना पवित्र होती है। उनके आशीर्वाद में भी भलाई छिपी होती है। उन्होंने कहा, राम जी तुम्हें यहीं आकर मिलेंगे, राम जी के दर्शन के बाद तुम आ जाना, मेरे दिव्य धाम। शबरी लग गई तैयारी में कि राम जी आएंगे। 
उसने नियम बना लिया, दूर-दूर तक मार्ग को बुहारना, अच्छे फलों को एकत्र करना, अच्छे फूलों का चयन करके माला बनाना और अपने दरवाजे पर बैठकर प्रतीक्षा करना। उपवास करना, भोजन नहीं, फलाहार नहीं, ईश्वर की प्रतीक्षा करना। जब भी कोई आहट हो, तो लगता था कि राम जी आ गए, सुबह से शाम हो जाती थी, दिन बीत जाता था। आज नहीं आए, तो कल आएंगे, आज किसी दूसरे ऋषि के आश्रम चले गए होंगे, कल आएंगे। शबरी ने १२ वर्ष प्रतीक्षा की। श्रद्धा थी, गुरु ने कहा है। रोम-रोम से संयम, नियम से जीवन जीया, और रोम-रोम से भक्ति प्रवाहित होती थी। शबरी के बारे में लोग कहते हैं कि न रंग-रूप और गंदा कपड़ा, इत्यादि-इत्यादि, लेकिन जो लोग अध्यात्म की उपलब्धि को नहीं समझते हैं, वही ऐसी बातें करते हैं। जिसने अपना जीवन संतों की सेवा में लगाया हो, वह ऐसा ही रह जाएगा क्या, जैसे अपने घर से आने के समय शबरी थी। उसके शरीर से तो आभा निकल रही थी। श्री राम जी ने देखकर ही समझ लिया कि यह तो महान तपस्विनी है। शबरी ने भी भगवान को देखा। चरणों में गिर पड़ी, भक्ति-श्रद्धा से उपजे आंसुओं से पैरों को धोया। हृदयाकाश से सेवा की। भगवान ने उन्हें पूरा सम्मान दिया, हाथों से पकडक़र उठाया, शबरी ने भगवान की सेवा की। कितनी खुशी है कि सामने राम बैठे हैं। अनेक तरह से वंदना की, अनेक तरह के फूलों, मालाओं से सजाया। संसार में आनंद की कमी नहीं है, लेकिन ऐसा आनंद दुर्लभ है, जब ईश्वर सामने बैठे हों। यह भी कहा जाता है कि भगवान तो मिल जाते हैं, लेकिन ऐसे भक्त रोज नहीं मिलते। भगवान का तो काम है, ऐसे भक्तों का मान बढ़ाना। सारी वर्ण व्यवस्था, सारी आश्रम व्यवस्था ऊंचाई और निचाई का भाव, जो विभाजित करने वाली बातें हैं, सब टूट गईं। कहीं कोई विभाजक रेखा नहीं रही, सेवा ने सारे बंधनों, सीमाओं को पार कर लिया। शबरी सतर्क है। आज कोई अपराध नहीं हो जाए, भगवान मेरे आश्रम में आए हैं। 
क्रमश:

भक्तिनी शबरी : सेवा का सच्चा पर्याय

(जगदगुरु रामानंदाचार्य के प्रवचन के अंश)
संसार में नारियों का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन अलग-अलग देशों में अलग-अलग संप्रदायों, जातियों में अलग-अलग उनके स्वरूप हैं। भारतीय परंपराओं में नारी का महत्वपूर्ण स्थान है, फिर भी जो सम्मान पुरुष को प्राप्त हैं, जो अधिकार, अवसर प्राप्त हैं, वो नारी को नहीं हैं। यह जरूरी है कि नारी को बराबरी का दर्जा हर दृष्टि से मिले। आधुनिक समय में कई अधिकार मिलने के बावजूद आज नारियों को वह स्थान नहीं मिला है या वह सम्मान नहीं मिल सका है, जो पुरुषों को मिला हुआ है। सनातन धर्म में नारी को अध्यात्म में भी वह स्थान नहीं मिल पाता है, जो मिलना चाहिए, किन्तु शबरी अपवाद स्वरूप हैं, वो तमाम प्रचलित धाराओं को पीछे छोड़ देती हैं। वे पौराणिक इतिहास में अमिट छवि वाली भक्त हैं।
जगद्गुरु शंकराचार्य जी के मार्ग में नारी को संन्यास लेने का अधिकार नहीं दिया गया था। वहां केवल ब्राह्मण ही संन्यास का अधिकारी है, क्षत्रिय नहीं, वैश्य नहीं, शुद्र नहीं और नारी भी नहीं। वेदों के अध्ययन, अध्यापन में भी नारियां वर्जित रही थीं। उन्हें वेद पढऩे का अधिकार प्राप्त नहीं था। 
जो भक्ति मार्ग के संप्रदाय हैं, उनके अनुयायियों में ऐसी वर्जना नहीं रही है। साक्षात नारियों को लाभान्वित करने वाले भक्ति मार्ग में भी नारियां कम हैं। हालांकि भक्ति मार्ग में नारियों को बढ़ावा मिला। जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी के १२ शिष्यों में, जो परम तत्व तक पहुंचे, जिनका जीवन संतत्व की पराकाष्ठा पर पहुंचा, उनमें दो नारियां भी हैं। पद्मावती और सुरसरी। दोनों ही संतत्व के चरम में अवस्थित हैं। रामानंदाचार्य जी की उदारता इससे प्रमाणित होती है। यहां यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सनातन धर्म शुरू से ही उदार रहा है। जिन संतों और आचार्यों ने नारियों को आगे बढ़ाया, वो सभी धाराएं वैदिक सनातन धर्म में रही हैं। यह कोई अपनी ओर से किया गया कृत्य नहीं है। शबरी का जो उदाहरण है, वह सबसे बड़ा उदाहरण है। उनके जीवन क्रम को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे भगवान की सेवा करके पूजा करके, ध्यान करके, भगवान का नाम जप करके, भगवान की शक्तियों का ध्यान करके, समर्पण के अभाव, शरणागति के अभाव से ऊपर उठकर लोग जीवन को धन्य बनाते हैं, वैसे ही साधुओं और गुरुओं की सेवा से भी फल प्राप्त किया जा सकता है। मतंग ऋषि की वे शिष्या हैं, उसी सद्भाव और उत्साह के साथ समर्पण के साथ तत्कालीन दूसरे ऋषियों की भी उन्होंने सेवा की थी। भगवान के साथ भक्तों की सेवा भी होनी चाहिए। अध्यात्मिक जगत में सामाजिक जगत में अपने गुरु का सम्मान अनिवार्य है। हम दूसरे संतों और आचार्यों का भी सम्मान करें, इससे धर्म मजबूत होगा, उसका महत्व ऊंचाई को प्राप्त होगा। उसकी उपयोगिता को पंख लगेंगे, उसकी आयु भी बढ़ेगी। उसकी उदारता का बहुत विस्तार होगा। जैसे आजकल परिवार टूट रहे हैं, संयुक्त परिवार की परंपरा अब टूट रही है। पत्नी को पति का तो सम्मान करना ही है, लेकिन परिवार के दूसरे सदस्यों का भी वह ध्यान रखती है, पति के माता-पिता, पति की बुआ, पति के भाई-बहन, सबका वह ध्यान रखती है, इससे ही परिवार का आनंद, अस्मिता, परिवार की पहचान, परिवार का स्नेह, परिवार का धन, सब कुछ वृद्धि को प्राप्त होंगे। ऐसा नहीं होने से परिवार टूट रहे हैं। वैसे ही ऋषियों की सेवा जरूरी है। धर्म और अध्यात्म का स्वरूप विस्तृत होगा, तो बहुत दिनों तक उसका जीवन होगा। लंबी उसकी उपादेयता होगी, सार्थकता होगी। आज का जो साधु समाज है, गुरु समाज है, आचार्य समाज है, उसकी बहुत बड़ी भूमिका है। अपने शिष्यों को लोग दूसरे के काम नहीं आने देते हैं। हमारा शिष्य केवल हमारा ही प्रबंध करे, हमारा ही केवल आदर करे, हमें ही सब कुछ समझे, ऐसा वातावरण आज के गुरु लोग बनाने लगे हैं। अपने सम्मान को दूसरों को नहीं देते। आज साधु जगत में यह बड़ी कमी आ गई है। शबरी के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए, जैसे शबरी ने मतंग ऋषि की सेवा की, उनको मान दिया, उनके प्रति आस्था व्यक्त की, वैसे ही दूसरे ऋषियों और संतों के लिए भी किया और कभी भी मतंग ऋषि ने उन्हें मना नहीं किया। 
क्रमश:

Sunday, 2 October 2016

पटना चातुर्मास २०१६


पटना चातुर्मास २०१६


महर्षि भारद्वाज : राम कथा के अनुपम प्रेमी

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी
समापन भाग 
भारद्वाज जी ने भी आभार जताया। भारद्वाज जी ने कहा कि मैंने जीवन में जो भी तप किया था, उसके फलस्वरूप हमें राम जी वनवासी रूप में प्राप्त हुए। वे भले ही लीला कर रहे हैं, किन्तु वे पूर्ण ब्रह्म हैं। वही सृष्टि के पालक, संचालक, संहारक हैं। ऐसे भगवान का दर्शन हुआ, लेकिन उस दर्शन का जो फल है, उसके परिणाम स्वरूप ही आपके दर्शन हुए। हमारा जीवन धन्य हुआ। 
महर्षि भारद्वाज ने कहा कि 
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।।
सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा।।
भारद्वाज जी ने स्वयं को धन्य माना।
भगवान अपने भक्तों को अपने से भी बड़ा मानते हैं। मेरा तो जीवन धन्य हो गया। उनके दर्शन से भी आपका दर्शन श्रेष्ठ है, उस दर्शन का फल है आपका दर्शन। 
राम वियोग से पीडि़त भरत जी को सांत्वना देते हुए भारद्वाज जी ने अनेक तरह की बातें सुनाईं और चाह रहे थे कि भरत के मन में कोई विद्वेष उत्पन्न नहीं हो। अयोध्या का जो ऐतिहासिक और विश्व के लिए गौरव वाला संप्रभुता संपन्न अयोध्या का रघुवंश और वहां का जो साम्राज्य है, वह कोई छोटा-मोटा साम्राज्य नहीं है, पूरी दुनिया के लोग उससे प्रेरणा लेते हैं। वे उसे सर्वस्व सम्मान अर्पित करने की जगह मानते हैं। भरत के मन में यह बात चल रही थी कि अब राम जी हमारे लिए क्या सोचते हैं। राम जी देखेंगे, तो क्या बोलेंगे, कैसा व्यवहार करेंगे और भारद्वाज जी इसका संपूर्ण निराकरण करना चाहते हैं। दूसरे रामायणों में एक संकेत है, भारद्वाज जी ने कहा, जो काम नहीं करना चाहिए ऋषि परंपरा में रहने वालों को, वह भी मैंने किया। 
ऋषि को जहां पति-पत्नी शयन, विश्राम कर रहे हों, वहां से गुजरना भी नहीं चाहिए। उन्हें सुनना, देखना नहीं चाहिए। यह बात मालूम होनी चाहिए कि राम जी १४ वर्ष के लिए जा रहे हैं। पिता को दिए वचन के पालन के लिए जा रहे हैं, मैं जानना चाहता था कि राम जी क्या सोच रहे हैं। 
महर्षि भारद्वाज ने कहा कि मैंने रात्रि में कान लगाकर सुना कि राम जी, जानकी जी और लक्ष्मण जी क्या बात कर रहे हैं। उनके पूरे वार्तालाप में भरत के लिए कोई कलुषित भावना या प्रतिशोध की भावना नहीं थी। राम जी ने ऐसी कोई चर्चा नहीं की। 
कैकयी ने वरदान मांगा था कि राजा हो जाए मेरा बेटा और राम जी वनवासी हो जाएं। भारद्वाज ऋषि के आश्रम में रात्रि भर राम जी सोए नहीं, केवल भरत की चर्चा करते रहे। 
सुनहू भरत रघुवर मन माहीं। प्रेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं।। 
लखन राम सीतहि अति प्रीति। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती।। 
लखन जी, राम जी, जानकी जी के मन में तुम्हारे लिए बहुत प्रेम है। जितना अपने लिए प्रेम है, दूसरों के लिए प्रेम है, उससे भी ज्यादा तुम्हारे लिए प्रेम है। जिसके लिए प्रेम होता है, उसी के लिए चर्चा होती है। 
आजकल गुरु जीवन जीने वाले लोग राष्ट्र के लिए चिंतित नहीं रहते, वे सोचते हैं कि हमें राष्ट्र से क्या लेना-देना। राष्ट्र के लिए कितने चिंतित हैं भारद्वाज जी? राम कथा वस्तुत: उनके रोम-रोम में प्रवाहित हो रही है। सही रूपों में प्रवाहित हो रही है, तभी तो उनको राम राज्य के लिए कितनी चिंता है। जब राष्ट्र ही नहीं रहेगा, तब संत कहां रहेंगे, कहां गुरु रहेंगे? ऋषियों को राज्य की बड़ी चिंता रहती है। राज्य अच्छे होंगे, तभी तो अच्छी तरह से धर्म-कर्म होंगे। ऋषि समस्याओं के लिए चिंतित होता था, निदान खोजता था, निदान के लिए समर्पित होता था, तभी समाधान होता था। किसानों का भी राष्ट्र है, कर्मचारियों का भी राष्ट्र है, सबमें राष्ट्रहित की जागरुकता होनी ही चाहिए। भरत जी को बहुत आनंद हुआ। अत्यंत विश्वास की प्राप्ति हुई। ऋषियों को हमारे लिए कितनी चिंता है। कभी भरत जी सोच भी नहीं सकते थे कि राम जी को जंगल में जाना पड़ेगा। भरत जी ने भारद्वाज ऋषि से कहा, आपने मुझे जीवन दान दिया, मैं तो डूबता जा रहा था। राम जी मुझसे कितना प्रेम करते थे, अब वे क्या सोचते होंगे। कितनी दुर्भावना उनके मन में आती होगी। मैं ऋणी हूं। रघुवंश आपका ऋणी रहेगा। 
महर्षि भारद्वाज अत्यंंत जागरूक ऋषि है। ऋषि समाज, देश के लिए भी जागरूक होता था। उसे केवल अपनी भलाई की चिंता नहीं रहती थी। उसकी चिंता है कि हमें भी कोई पीड़ा नहीं हो और दूसरों को भी नहीं हो। हमारा जीवन जैसे प्रकाशित हुआ, वैसे ही दूसरों का जीवन भी प्रकाशित हो। 
भारद्वाज जी की प्रेरणा से भरत जी को बड़ा संबल मिला। भरत जी भी भारद्वाज जी के आशीर्वाद से राम मिलन की यात्रा में आगे बढ़े। 
राम जी को भगवान के रूप में प्रचारित करने का काम, रघुवंशियों के चरित्र को प्रचारित करने का कार्य भारद्वाज जी ने किया। राम जीवन के सबसे बड़े प्रचारक भारद्वाज जी ही है। 
आजकल आश्रमों का निर्माण बहुत हो रहा है। संसाधनों के संग्रह से हो रहा है, सत्संग नहीं हो रहा है। संत खोजते हैं कि आश्रम मिल जाएं, संसाधन मिल जाएं, मठ बन जाएं। आश्रम जैसे-तैसे मिल जाता है, लेकिन उनका संतत्व, गुरुत्व अधूरा रह जाता है। वे संपूर्ण संतत्व से बहुत दूर रह जाते हैं। संतत्व को परिपक्व बनाने में आज के लोग पिछड़े जा रहे हैं। महर्षि वाल्मीकि ने कहा था कि वह क्या राष्ट्र है, जहां राम के लिए गौरव न हो। वह आश्रम क्या है, जहां राम चर्चा न हो। आज समाज को कौन-सा ऐसा आदर्श दिया जा सकता है, जिससे परिवर्तन आए, क्रांति आए। राम का संपूर्ण जीवन, उन सभी तत्वों से भरपूर है, अप्लावित है। राम जी मनुष्य जीवन को पूर्ण जीवन बना सकते हैं। कितना बड़ा स्वरूप है भगवान श्रीराम का। महर्षि भारद्वाज के आश्रम में निरंतर राम चर्चा का आयोजन होता रहता था। हमारे आश्रमों में भी जो बड़े संत आज भी हैं, सभी को राम चर्चा से जुडक़र अपने जीवन को दिव्य बनाने का प्रयास करना चाहिए। रामकथा का अर्जन कहीं-कहीं, कभी-कभी देखने को मिलता है। राम कथा रूपी गंगा निरंतर बहती रहनी चाहिए। सबको राम भक्ति की शक्ति मिलनी चाहिए, रामकथा-गंगा कभी बाधित नहीं होनी चाहिए।
जय श्री राम।

महर्षि भारद्वाज : राम कथा के अनुपम प्रेमी

भाग - ३
घर में हम परिवार की चर्चा करते हैं, बाहर निकलते हैं, तो संसार की चर्चा करते हैं, लेकिन हरि चर्चा नहीं होती। राम जी से जुडऩा चाहिए। हमारा विकास होना चाहिए, राम जी से हमें प्रीत होनी चाहिए। वह आजकल नहीं हो रहा है, हमारा जीवन केवल भौतिक बनकर रह जाता है, जीवन का परम उद्देश्य प्राप्त नहीं हो पाता है, हम साधना से दूर रह जाते हैं। सभी मनुष्यों को चाहे वे किसी भी भाषा, चिंतन के हों, संसार के सभी लोगों को ईश्वर के प्रति जुडऩा चाहिए। ईश्वर से जुड़ेंगे, तो हम बोलेंगे, तो दूसरा सुनेगा और दूसरा बोलेगा, तो हम सुनेंगे। जो मर्मज्ञ लोग हैं, जिन्होंने अपना जीवन धन्य कर लिया है या वे जो सामान्य रूप से अभी जान रहे हैं, हमें ईश्वर चर्चा से निरंतरता के साथ जुडऩा चाहिए। सत्संग से ही हमारा जीवन सफल होगा। जो परम ऊंचाई को प्राप्त लोग हैं, जैसे महर्षि याज्ञवल्क्य, उनकी बातों को सुनना ही चाहिए, परम कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
मानव जीवन की सफलता के लिए राम चर्चा होनी ही चाहिए। भगवान की दया से भारद्वाज जी की प्रेरणा से याज्ञवल्क्य जी ने रामकथा को पूरी गहराई के साथ सुनाना शुरू किया। उनमें व्याख्यान की अद्भुत क्षमता थी, श्रोता अच्छे होते हैं, तो वक्ता का मन अति उत्साहित हो जाता है। तो भारद्वाज जी के माध्यम से प्रेरणा प्राप्त करके भगवान की महिमा को उन्होंने सुनाया। उन्हें परमानंद की अनुभूति हुई, जीवन का हर क्षण हर काल हर प्रबंध सभी सार्थक हो गए। अनभिज्ञता की बात कहीं नहीं रह गई। 
आज के आश्रमों के सभी लोगों को इससे प्रेरणा लेने की जरूरत है। भौतिक चर्चा के साथ-साथ ईश्वर चर्चा भी होनी चाहिए। इससे ही हमारा जीवन सुधरेगा, हमारे जीवन में क्रांति आएगी, इससे हमारा जीवन प्रभावित होगा। अयोध्या से निकलने के बाद वनवास के लिए भगवान राम जब प्रयाग पहुंचते हैं, तब भारद्वाज जी के आश्रम में रुकते हैं। विशाल आत्मीय भाव और दिव्य तप और जप से भगवान श्रीराम अत्यंत प्रभावित हुए। महर्षि जी को मालूम हुआ कि राम जी को वनवास हुआ है, वे १४ वर्ष के लिए वन में रहेंगे और उनके छोटे भाई भरत राज्य संभालेंगे। 
राम जी ने भारद्वाज जी को दंडवत किया, राम जी तपस्वी वेश में हैं। लीला का क्रम चल रहा है, महर्षि को सम्मान देना चाहिए। भारद्वाज जी ने भी उनका बड़ा सम्मान किया। ज्ञान, विज्ञान की चर्चाएं हुईं। राम जी के मन को टटोल करके उन्होंने पूछा, ‘आपके वनवास से रामराज्य की स्थापना में बहुत बल मिलेगा, जहां का राजा ही त्यागी हो, वहां प्रजा का तो विश्वास बनेगा, संबल मिलेगा ही।’ 
आपकी आज्ञा का पालन होना ही चाहिए। यहां रहूंगा, तो लोगों का आना-जाना लगा रहेगा, यहां एकांत में साधना का अवसर नहीं बनेगा। मैं लोगों की सेवा के लिए आया हूं, मैं यहां रहकर अयोध्या में ही रहने लगूंगा, इसलिए आप मुझे बताइए कि मैं कहां जाऊं।’ 
भगवान की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए महर्षि भारद्वाज जी ने राम जी को आगे का मार्ग बताया। राम जी वहां चले गए, वहां निवास किया। जीवन में हर तरह के मार्गदर्शकों की जरूरत होती है, शुभचिंतकों की जरूरत होती है। जिन लोगों को ज्ञान, विज्ञान प्राप्त हो, ऐसे लोगों का जीवन की सार्थकता के लिए निर्देशन लेना जरूरी है, इसलिए भगवान श्रीराम ने भारद्वाज जी से निर्देशन लिया। राम जी जब चित्रकूट चले गए, तब भरत जी प्रयाग पहुंचे। भरत जी पूरे दल-बल के साल राम जी को अयोध्या लौटाने के लिए चले थे। वे भारद्वाज जी के आश्रम पहुंचे। जैसे भारद्वाज जी ने राम जी का सम्मान किया था, वैसा ही सम्मान उन्होंने भरत जी का भी किया। भरत जी के साथ गए सभी परिजनों प्रजाजनों का भारद्वाज जी ने सम्मान किया। सत्कार का पूरा प्रबंध किया। जो किसी लौकिक व्यक्ति द्वारा संभव नहीं था, ऐसा सत्कार किया। भरत जी ने भव्यता का अनुभव किया।
क्रमश: 

महर्षि भारद्वाज : राम कथा के अनुपम प्रेमी

भाग - २
दर्शन शास्त्र में बहुत महत्वपूर्ण बात बताई जाती है, विद्वता कैसे पैदा होती है, जिज्ञासा होती है, तभी विद्वता की शुरुआत होती है। जिज्ञासा वहां होती है, जहां संदेह रहता है, यह नियम है। जिसके सम्बंध में हमारा आकर्षण है, जिससे लाभ या हानि होने वाली है, ज्यों ही हम यह जानने की इच्छा करते हैं, जिज्ञासा होती है, फिर उसके बाद ही समाधान निकलता है, विद्वता उत्पन्न होती है।
भारद्वाज जी ने संदेह जताया। एक राम ने रावण के सभी करीबियों को मारा, जो अपनी पत्नी के अपहरण के बाद विलाप कर रहे थे, एक राम वह भी हैं, जिनकी महिमा गाई जा रही है, क्या वही व्यक्ति सामान्य लोगों के समान रो रहा है, बिलख रहा है, क्या यह वही राम हैं, जिनके नाम का भगवान शंकर जैसे देवता जप करते हैं। भगवान शंकर जी से पार्वती जी ने भी यही पूछा था, रामायण में लिखा है। भगवान शंकर से कहती हैं, आप दिन रात, राम, राम जपते रहते हैं, अत्यंत आदर के साथ जपते हैं। आपकी संपूर्ण शक्ति राम नाम जप रही है। आप जो चाहते हैं, वही होता है। 
तो भारद्वाज जी वस्तुत: संशयग्रस्त नहीं हैं। जिज्ञासा के प्रयोजक तत्व हैं, संदेह, संशय, प्रयोजन। जिसे प्रयोजन नहीं होगा, वह संदेह नहीं करेगा, जिसे संदेह नहीं होगा, वह जिज्ञासा नहीं करेगा।  
भारद्वाज जी ने जिज्ञासा की, ‘राम तत्व का अवलोकन करके बताइए, हृदय में हलचल है कि ये दो राम हैं या एक ही राम हैं?’ 
भारद्वाज जी संदेहग्रस्त नहीं हैं, लेकिन लिखा है शास्त्रों में कि ब्रह्म तत्व का ज्ञान होने पर ब्रह्म तत्व की चर्चा बंद नहीं होनी चाहिए, ठीक इसी तरह से राम तत्व का ज्ञान होने के बाद भी राम नाम श्रवण, चिंतन बंद नहीं होना चाहिए। ऐसे ही राम से संयुक्त कोई भी अनुष्ठान बंद नहीं होते। ईश्वर तत्व के ज्ञान के बाद छोटा व्यापार नहीं चलेगा, बड़ा व्यापार भी नहीं चलेगा, वह राम तत्व में ही लगा रहेगा। लोकनीति को ध्यान में रखकर पुरुषार्थ की परंपरा नहीं होती। ब्रह्म चर्चा हो, मर्यादित चर्चा हो। यह अनुपालन नहीं है, यह स्वभाव है। भारद्वाज जी ने महर्षि याज्ञवल्क्य जी जो मेले में आए थे, प्रयाग में आए थे, उनसे प्रश्न किया। प्रश्न के पीछे राम चर्चा के बिना एक क्षण न रहने वाली जो बात है, उसे उजागर किया। महर्षि याज्ञवल्क्य जैसा महात्मा हर किसी को प्राप्त नहीं हो सकता, तो मैं भी जिज्ञासु बनता हूं और ईश्वर को स्मरण करता हूं। 
याज्ञवल्क्य जी ने कहा, ‘आप परम ज्ञानी हैं, आप सभी तत्वों से परिचित हैं, आपसे ज्यादा राम जी के सम्बंध में कौन जानता है? मैं समझ रहा हूं आपकी बात को, आप इसी बहाने राम चर्चा करवाना चाहते हैं, नहीं तो आपको कोई संदेह नहीं है, कोई अज्ञान नहीं है। चर्चा होगी, तो असंख्य लोग लाभ उठाएंगे, एक परंपरा शुरू होगी।’ 
समय ऐसे ही बिताना चाहिए, समय का संपूर्ण सदुपयोग होना चाहिए। भारद्वाज जी का जो प्रश्न है, राम जी के संदर्भ में वह उत्पादक संदेह है। वेदों में लिखा है, स्वाध्याय और प्रवचन से कभी विराम नहीं लेना चाहिए। मोक्ष की चर्चा होती रहनी चाहिए, मोक्ष को सुनना, समझना आवश्यक है। 
शास्त्रों में जो तत्व मानव जीवन को उत्कर्ष देने वाले हैं, मानव जीवन की सफलता के जो सफल कारण हैं, उनकी चर्चा हमेशा होती रहनी चाहिए। हम सभी लोगों को इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। महर्षि भारद्वाज को सबकुछ मालूम है राम तत्व के बारे में, लेकिन तब भी वे महर्षि याज्ञवल्क्य के माध्यम से सुनना चाहते हैं, ताकि लोग अधिक से अधिक लाभ उठाएं। 
क्रमश: 

महर्षि भारद्वाज : राम कथा के अनुपम प्रेमी

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी
(जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के प्रवचन के संपादित अंश)
ऋषियों का राम जी के साथ बड़ा प्रेम था और राम जी को ऋषियों से बड़ा पे्रेम था। ऋषियों की जो श्रेष्ठ परंपरा है, उसके अनुरूप भारद्वाज ऋषि ने मानवीय जीवन को ऋषित्व तक पहुंचाया और अनेक तरह की साधना करके, ईश्वर का साक्षात्कार संपादित करके, संपूर्ण जीवन को ईश्वर और मानवता के लिए समर्पित कर दिया। श्रेष्ठ ऋषि के रूप में भारद्वाज जी का नाम है। उनका निवास तीर्थराज प्रयाग में रहा, तीर्थों का जो राजा है। सनातन धर्म में चीजों का श्रेणीकरण है, सभी ने प्रयाग को तीर्थराज माना है। वहां मुख्य ऋषि के रूप में भारद्वाज जी का स्थान है। प्रयाग में तीन नदियों का संगम है, गंगा, यमुना, सरस्वती। इन तीन नदियों के पावन मंगलमय संगम पर भारद्वाज जी का आश्रम था, जहां वे निवास करते थे। जो भी उन्होंने ज्ञान, विज्ञान, जप, तप, संयम, नियम से अर्जित किया था, उससे वे अनेक लोगों को आलोकित करते थे। सब कुछ ईश्वर के लिए होता है, समष्टि के लिए होता है, संसार के लिए होता है। ऋषि जीवन केवल अपने को लाभान्वित करने के लिए नहीं होता। जैसे परिवार को चलाने के लिए उसका एक मुखिया बनाकर संचालन किया जाता है, ठीक उसी तरह से संत जन जप, तप, संयम, नियम से चलकर संपूर्ण ईश्वर को अर्पित रहते हैं और संपूर्ण संसार को ईश्वर का परिवार मानकर चलते हैं। ईश्वर सबके लिए समान रूप से है। संतों में भी ऋषियों में भी यही दशा या स्थिति होती है। भारद्वाज जी का प्रभाव विलक्षण था। महान चिंतकों में उनकी गणना होती थी, राम कथा को जन जन तक पहुंचाने में, राम कथा को प्रामाणिकता देने और उसे परम उपयोगी बनाने में भारद्वाज जी की बहुत बड़ी भूमिका है, ऐसा सभी लोग मानते हैं। वे निरंतर राम कथा का प्रवाह बनाए रखते थे। अपने आश्रम में राम कथा निरंतर उनकी प्रेरणा से चलती रहती थी। भारद्वाज जी रामभक्ति की परंपरा में अग्रणी ऋषि रहे हैं। 
एक स्पष्ट उदाहरण है, अनादि परंपरा है, माघ मास में प्रयाग में मेला लगता है, जगह-जगह से लोग आते हैं, पूरे देश से और आकर नियम-कायदे से निवास करना, स्नान करना जप, तप करना, हवन करना, ईश्वर दर्शन करना और मेले में जहां भी सत्संग हो रहा है, वहां दर्शन-पूजन के लिए जाना, प्रवचन सुनने जाना। इतना बड़ा मेला दुनिया की किसी परंपरा नहीं है। लाखों लोग आते हैं, सत्संग का लाभ उठाते हैं, तो प्राचीन काल में जितने भी ऋषि, महर्षि आते थे, वे सभी भारद्वाज ऋषि के आश्रम में रुकते थे और सबको मान सम्मान मिलता था। वरिष्ठतम ऋषि तो वे थे ही उनसे सभी को लाभ होता था। 
एक विचित्र घटना हुई। माघ मेले से महर्षि याज्ञवल्क्य जाने लगे, तो भारद्वाज ने कहा, ‘अभी आप मत जाइए, प्रेरणा हो रही है कि राम कथा सुनूं। राम अलग-अलग हैं या एक हैं? जो राजा दशरथ के यहां जन्म लिए, दशरथ कुमार हुए और सभी लोगों को ज्ञात है कौशल्या जी से उनका जन्म हुआ, वनवास भी हुआ और सीता जी का हरण हुआ, अनेक तरह से राम जी ने विलाप किया, अत्यंत रुष्ट हुए और रावण को मार दिया। एक तो यह राम हैं और दूसरे वो जिनके शंकर जी भी पुजारी हैं, जो श्रेष्ठ देवता हैं, संसार के नियामकों में से हैं। लोग राम जी का नाम लेते हैं, राम, राम, राम, निरंतर करते रहते हैं, ये दोनों राम एक ही हैं या अलग-अलग हैं?’ 
क्रमश: 

Saturday, 24 September 2016

रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी


रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी

रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी

रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी
A Photo By Shri Himanshu Vyas

महाराज की ४ प्रवचन पुस्तिकाओं का लोकार्पण

प्रयाग में लोकार्पण : दुख क्यों होता है? 
2012


हरिद्वार में लोकार्पण : अच्छा कैसे सोचा जाए?
2013


जोधपुर में लोकार्पण : साधु कौन?
2015

पटना में लोकार्पण : अबलौ नसानी, अब न नसैहौं
2016

मरा मरा से राम राम तक

समापन भाग 
भारत कोई विश्व गुरु ऐसे ही नहीं हो गया था। विश्व गुरुत्व का परम पद हम केवल डॉक्टर, इंजीनियर पैदा करके नहीं पा सकेंगे, जब तक ऋषियों से सम्बंधित भावनाएं जीवन में नहीं अवतरित होंगी, तब तक जीवन कमाऊ और खाऊ ही बना रहेगा।  
राम जी और जानकी जी ने अपने बच्चों को जैसे पाला, वह आदर्श है। महर्षि वाल्मीकि मेरुदंड के समान उपयोगी और प्रामाणिक स्तंभ हैं। सारा जीवन उन्होंने राम जी के साथ मिलकर उनके भावों को उनके विचारों को मूर्त रूप देने में उनकी स्थापनाओं को मजबूती और संबल देने में लगाया। ऐसे ऋषियों की जरूरत है। 
वैसे आजकल कई गुरुकुल खुल रहे हैं, लेकिन उनमें प्रतिष्ठा की इच्छा ज्यादा है। धन अर्जन की इच्छा ज्यादा है। अभी ऐसे ही एक गुरुकुल में मुझे जाने का अवसर मिला, मैंने देखा, गुरुकुल गौण हो गया है और ऐश्वर्य महत्वपूर्ण हो गया है। मैं कुरुक्षेत्र में गया था एक आश्रम में, सर्दी काल में बच्चों के शरीर पर पूरे वस्त्र नहीं थे, दरिद्रों के बच्चों की तरह, जब वस्त्र ही नहीं मिल रहा था, तो खाने को क्या मिल रहा होगा, जब भोजन ही नहीं मिलेगा, तो संस्कार क्या मिलेगा और विद्या क्या मिलेगी? गुरुकुल का लक्षण ऊपर से दिखता है, लेकिन गहराई में जाइए, तो पता चलता है कि गुरुकुल आज सही नहीं हैं। आज ज्यादातर गुरुकुल पैसा कमाने के लिए ही बनते हैं। सैंकड़ों गुरुकुल चल रहे हैं, लेकिन एक भी बड़ा विद्वान और संत पैदा नहीं कर रहे हैं, यह तो डकैती वाला काम हो रहा है। आज के गुरुकुल अच्छे संस्कार कहां दे रहे हैं। वाल्मीकि के गुरुकुल से अगर तुलना करें, तो पता चलेगा कि हम कितना पीछे हैं। पूरी मानव जाति के लिए वे समर्पित हैं, उनका रोम-रोम पुकार रहा है कि तुम ज्ञान पाओ और जीवन को धन्य बनाओ। ऐसे गुरुकुलों का प्रचलन करना चाहिए, उनसे लाभ उठाने की प्रेरणा भी बढऩी चाहिए। घर से बाहर रहकर बच्चा ऋषि भी बनेगा और साथ-साथ में एमबीएस डॉक्टर, इंजीनियर इत्यादि भी बनेगा। उसकी मनुष्यता पूर्णता को प्राप्त करेगी। ऐसे प्रयत्न सरकार के माध्यम से भी होने चाहिए। सरकार बहुत पैसे खर्च करती है विश्वविद्यालयों, स्कूलों में, लेकिन ऐसे बच्चे तैयार हो रहे हैं, जो केवल कमाएंगे और खाएंगे। जो आंतरिक विकास है अध्याम का, वह नहीं हो रहा है, इसके बिना भारत कभी विश्व गुरु नहीं बनेगा, कभी पूर्ण मानव जीवन नहीं बनेगा। 
वाल्मीकि जी बड़े ज्ञाता ऋषि थे, वे राम जी को जानते थे। रामचरितमानस में लिखा है कि राम जी को चित्रकूट में रहने की सलाह वाल्मीकि जी ने ही दी थी। राम जी ने उनसे बहुत श्रद्धा पूर्वक पूछा था, तुलसीदास जी ने लिखा है - 
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।।
ऐसा हृदय में समझकर, वह स्थान बतलाइए, जहां मैं सीता और लक्ष्मण सहित जाऊं।
वाल्मीकि जी भी भगवान राम को जान रहे थे, उन्होंने आगे उत्तर दिया - 
पँूछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाऊँ।
जहँ न होहु तहँ कहि तुम्हहि देखावौं ठाऊँ।।
अर्थात आप मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं कहा रहूं। यहां मैं आपसे यह पूछते हुए सकुचा रहा हूं कि जहां आप न हों, वह जगह मुझे बता दीजिए, ताकि मैं आपके रहने के लिए जगह दिखा दूं। 
उसके बाद राम जी के विराजने के लिए जो-जो स्थान भक्ति भाव से वाल्मीकि जी ने गिनाए, वो उनकी राम भक्ति का अनुपम प्रमाण हैं और अंत में व्यावहारिक रूप से उन्होंने राम जी को चित्रकूट में विराजने की सलाह दी।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि हम लोग भी राम भाव में योगदान करें, इस वातावरण में हमारी भी आहूति हो। 
जय श्री राम। 

मरा मरा से राम राम तक

भाग - ६
महर्षि वाल्मीकि ने संपूर्ण आत्मीय भाव से जानकी जी और उनके पुत्रों को अपने आश्रम में रखा। राम जी के बच्चों को सशक्त रूप से विकसित किया। उन्होंने राम जी के बच्चों को वीर ही नहीं, विद्वान भी बनाया। 
उनके आश्रम का वातावरण अत्यंत सुंदर था। ऐसे दिव्य वातावरण जहां सबकुछ पवित्र है, शुद्ध है, अच्छे जीवन को देने वाला है। ऐसे वातावरण में निर्वासन के प्रताप से जानकी जी पहुंच गईं। उनके बच्चे भी वहीं पल रहे हैं, बहुत ही शुभ हो। विधि विधान से उनका पालन-पोषण संस्कार हुआ। संसार के लिए यह बहुत ही अच्छी घटना हुई। जो लोग सत्य नहीं जानते, वही कहेंगे कि राम जी ने गलत किया। कहते हैं कि जानकी जी को जंगल में छोड़ दिया गया धोबी के कहने पर, लेकिन वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण में धोबी की चर्चा कहीं नहीं है। तुलसीदास जी ने उस प्रकरण को ही छोड़ दिया, क्योंकि उनसे वियोग सहन नहीं हुआ। 
राम जी को भी गुरुकुल में रहने का ज्यादा अवसर नहीं मिल पाया था, शिक्षा तो उन्हें मिली थी, वन में रहकर शिक्षा लेने का काम अधूरा रह गया था, जिसे जानकी जी ने अपने बच्चों के माध्यम से पूरा किया। महर्षि वाल्मीकि ने अपने आदि काव्य को सबसे पहले राम जी के बच्चों लव-कुश को पढ़ाया। इस संसार की अद्भुत घटना है कि दुनिया का सबसे पहला आदि काव्य ग्रंथ जो लौकिक भाषा का पहला महाकाव्य है, जो बच्चों की मां के लिए लिखा गया है, पिता के लिए लिखा गया है, उसे बच्चों को ही सबसे पहले पढ़ाया। 
लव, कुश रामायण गाते हैं। जहां वे रामायण गाते हैं, वहां लोग एकत्र हो जाते हैं। लोग राम जी के सद्गुण सुनना चाहते हैं, लोग जानकी जी के बारे में जानना चाहते हैं। राम जी के मन में है कि जिस उद्देश्य से सीता आश्रम गई थीं, वह पूरा हुआ, मेरे बेटों को अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई। 
महर्षि वाल्मीकि ने केवल कुछ लोगों को ही सुरक्षित नहीं किया, वाल्मीकि रामायण की रचना की, लव, कुश को शिक्षित करके रघुवंश को सिंचित किया और रघुवंश को सिंचित करके विश्व व सृष्टि को सिंचित किया। रघुवंश आदर्श है पूरे संसार के लिए, उसका जयघोष पूरे संसार में हो। यह सभी लोगों के लिए प्रेरणादायक है कि बच्चों को जो शिक्षा देनी है, जरूर दी जाए, बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाया जाए, आधुनिक शिक्षा दी जाए, इसके बिना जीवन का निर्वाह नहीं होगा, लेकिन बच्चों में ऋषि जीवन का भी प्रभाव होना चाहिए, बच्चों को पता होना चाहिए कि ऋषित्व क्या है, तप-त्याग-संयम नियम का क्या सुख है। घर में रहकर बच्चे यह नहीं प्राप्त कर सकते। संसार के लोगों को, विशेषकर भारत के लोगों को ऐसी योजना बनानी चाहिए कि गर्भावस्था में महिलाओं को ऐसे वातावरण में भेजा जाए, जहां सबकुछ अध्यात्ममय है, जहां एक-एक शब्द विशिष्ट है, खाना-पीना, दिनचर्या शुद्ध है, अनुशासित है, दिव्य है, तो इससे होने वाली संतति में महान संस्कार का प्राकट्य होगा, जो उसके संपूर्ण जीवन को प्रेरित करता रहेगा, गुरुत्व देता रहेगा, संबल देता रहेगा, और उसके साथ-साथ में दूसरी जरूरी आधुनिक शिक्षा भी दी जाए। प्रारंभिक काल किसी के लिए भी अच्छा होना चाहिए। बचपन अगर श्रेष्ठ वातावरण में बीत जाए, तो संपूर्ण जीवन आलोकित हो जाता है।
क्रमश:

मरा मरा से राम राम तक

भाग - ५
राम पूर्णत: आश्वस्त हैं कि सीता कहीं से लांछित नहीं हैं। लंका में पूर्ण विजय की प्राप्ति के बाद जो अग्निपरीक्षा हुई, तो संपूर्ण संसार के लोगों ने सुना-देखा कि सीता पूर्णत: पवित्र हैं। लेकिन जिनके पास अच्छी या शुद्ध दृष्टि नहीं थी, उन लोगों के मन में यह भावना रही होगी कि सीता जी रावण के यहां रही थीं। राम जी के मन में था कि मेरे सम्बंध में कोई अपवाद नहीं होना चाहिए। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में सीता को छोडऩे के पीछे ठोस कारण हैं।
जब कोई गर्भवती होती है, तो इस अवस्था में अभिभावक पूछते हैं कि आपके मन में कोई इच्छा हो, तो बताना। गर्भावस्था में जो इच्छाएं होती हैं, उनका संतति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। 
राम जी ने भी सीता जी से पूछा, ‘आप मां बनने वाली हैं कोई भी मन में भावना हो, तो बतलाएं, मैं कोशिश करूंगा पूरी करने की।’ 
सीता जी ने कहा, ‘मुझे वन की याद बहुत आती है, कितना शांत वातावरण था, प्रकृति की सुंदरता आंखों से निकलती ही नहीं है, कहीं से वेद ध्वनि आ रही है, ऋषियों का आवागमन हो रहा है। लोग जप-तप में लगे हैं। उससे मन को बहुत प्रेरणा मिलती है। ऋषि जीवन स्वीकार करने के लिए प्रेरणा मिलती है। मैं चाहती हूं कि इस जीवन का लाभ लूं। जब बच्चों को आपके जैसा बनाना है, तो आप बहुत मदद नहीं कर पाएंगे। आप व्यस्त रहने वाले राजा हैं, तो बच्चों की जो देखभाल होनी चाहिए, वह नहीं हो पाएगी। आपने तो १४ वर्षों का संन्यासी जीवन बिताया, अयोध्या जी में बच्चे रहेंगे, तो उस जीवन से वंचित रह जाएंगे। उनमें राजसी भाव आ जाएगा, रघुवंशी भाव आ जाएगा, लेकिन ऋषित्व कैसे आएगा? मैं चाहती हूं कि ऋषियों के साथ उनकी छाया में अपने बच्चे बड़े हों। तपस्वी की तरह वे जिएं। ऐसे जीवन का प्रबंध आप कर सकें, तो करें।’
राम जी ने चर्चा की अपने मित्रों, भाइयों से, सभी लोग हिचक रहे थे। कितनी सुन्दर इच्छा है, बच्चे पहले ऋषि बनें, फिर राजा बनें। राम जी ने तपस्वी रहते हुए ही अनेक असुरों व रावण को मारा। कितना सम्मान दिया ऋषियों-महर्षियों को, अभी भी आपकी संपूर्ण जय-जयकार हो रही है। 
राम जी ने लक्ष्मण जी से कहा, ‘भाभी को जंगल में छोडक़र आओ।’ इसके लिए जानकी जी ने ही प्रेरित किया था। संदेह को बहाना बनाकर। राम जी भी चाहते थे कि उनके बच्चे केवल महाराजा ही नहीं बनें, ऋषित्व को भी प्राप्त करें। उनमें दोनों साथ-साथ रहे, इसके फलस्वरूप जानकी जी सहर्ष वाल्मीकि जी के आश्रम आ गईं। 
कहा गया है, जितना चिंतन बच्चों के लिए मां करती है, उतना कोई नहीं करता। माता की जिम्मेदारियां बड़ी होती हैं। लक्ष्मण जी ने वाल्मीकि जी के आश्रम के आसपास जानकी जी को छोड़ा था। वाल्मीकि जी रघुवंशियों से बहुत प्रभावित थे, उनका आत्मीय भाव था जानकी जी के लिए। उल्लेख मिलता है, सीता जी वनवास काल में राम जी के साथ पहले भी एक बार वाल्मीकि आश्रम जा चुकी थीं। उन्हें वहां बहुत अच्छा लगा था। 
जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं, वे आक्रोश प्रकट करते हैं कि राम जी ने जानकी जी को जंगल में छोड़ दिया। यह जानना चाहिए, वन जाने का जो क्रम हुआ, उसमें मूल प्रेरक, मूल भावना जानकी जी की रही और उन्होंने अपनी संतति के भले के लिए ऐसा किया था। 
क्रमश:

मरा मरा से राम राम तक

भाग - ४
कहा जाता है, सौ करोड़ रामायणों की रचना हुई है। हर बार त्रेता में राम को प्रगट होना है। निरंतर उनके लिए लेखन होता रहता है। जितना राम जी पर लेखन हुआ है, उतना किसी भी अवतार के सम्बंध में लेखन नहीं हुआ। चाहे कोई भी अवतार हो, राम का अवतार सर्वाधिक चर्चित है। भगवान राम के सम्बंध में लेखन अद्भुत है। 
हां, वाल्मीकि जी ने यह अवश्य कहा, ‘मैं राम जी के चरित्र का गायन नहीं कर रहा हूं, मैं सीता के चरित्र का गायन कर रहा हूं।’ 
ग्रंथ की चेतना को महानायक से न जोडक़र उनकी जो प्राण वंदना हैं, उनकी जो अद्र्धांग्नि हैं, उनके नाम से जोड़ा। यह अनोखी बात है, ऐसा दुनिया में कहीं नहीं हुआ कि महानायक को छोडक़र उनकी सहभागिनी के नाम पर ग्रंथ रचा जाए। जहां राम जी की तूती बोल रही हो, जिन्होंने हजारों-हजारों वर्षों तक कण-कण को प्रभावित किया हो, अपना बनाया हो, वहां किसी दूसरे के चरित्र का गायन हो और सभी लोग उसको स्वीकार करें, विरोध न हो, यहां तक कि राम जी भी उसे स्वीकार करते हैं, यह तो अद्भुत बात हो जाएगी। राम जी के साथ महर्षि वाल्मीकि का जीवन पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ जीवन है।
बहुत से लोगों का मानना है कि राम जी का जब अवतार हुआ, तो उसके पहले ही रामायण की रचना हो गई थी, अपनी दिव्य दृष्टि से वाल्मीकि ने देख लिया था। जो कुछ राम जी ने अपने अवतार काल में किया, उससे पहले ही उसका लेखन हो गया, ऐसा सनातन धर्म का पूर्ण विश्वास है। यह ऋषित्व के द्वारा ही संभव है, वह दिव्य प्रज्ञा से भूत, भविष्य को जान लेता है। वह वर्तमान को तो जानता ही जानता है। वाल्मीकि ने समाज के लिए, संसार के लिए बहुत बड़ा काम किया, क्रांति हुई। निश्चित रूप से सीता जी के साथ जो हुआ, उससे लोग आहत रहे होंगे, किन्तु वाल्मीकि रामायण का अध्ययन करने से उन्हें बड़ी शीतलता की प्राप्ति होगी।
लोकरंजन के लिए, लोगों को संतुष्ट करने के लिए, लोगों की भावनाओं को सम्मान देने के लिए गर्भावस्था में ही सीता जी को वनवास पर जाना पड़ा। सीता जी को वाल्मीकि जी की रचना से बहुत बल मिला होगा कि सीता चरित्र के लिए रामायण की रचना हुई। वाल्मीकि के रामायण में सीता चरित्र है, राम चरित्र नहीं है। राम जी महत्वपूर्ण चरित्र हैं, तो उसमें उनकी लीला आनी ही है, किन्तु वाल्मीकि जी स्पष्ट कहते हैं कि मैं सीता चरित्र लिख रहा हूं। 
मैं यह नहीं कहने जा रहा कि राम जी ने जो किया, उससे सीता के साथ अन्याय हुआ। मेरे पास ऐसे विचार हैं, जिनसे यह सिद्ध हो सकता है कि भगवान श्रीराम ने सीता जी को अपनी दुर्भावना या संदेह के कारण या सम्मान लेने के लिए गर्भावस्था में वाल्मीकि जी के आश्रम नहीं पहुंचाया था। 
क्रमश:

मरा मरा से राम राम तक

भाग - ३
जीवन के किसी क्षेत्र में कोई नया बड़ा आदमी आता है, तो वह बहुत दमखम के साथ लगता है अपने जीवन को सुधारने में। अपने जीवन को परिवर्तित करने में अपने जीवन को सुंदर बनाने में पूरे दमखम के साथ प्रयास करता है। रत्नाकर ने जपना शुरू किया और हजारों वर्षों तक जपा, उन पर दीमक लग गए, जप करते-करते एक जगह, दीमकों ने उन पर घर बना लिया। दीमक के घरों को ही वल्मीक बोलते हैं, इसलिए इनका नाम वाल्मीकि हो गया। संपूर्ण जीवन विशुद्ध हो गया, भगवान का नाम जपते हुए। रोम-रोम से जहां पाप प्रवाहित हो रहा था, वहां रोम-रोम से राम-राम प्रवाहित होने लगा। अध्यात्म और अहिंसा प्रवाहित होने लगी, रोम-रोम में संयम-नियम स्थापित हो गए। पाप की गुंजाइश ही खत्म हो गई, संपूर्ण जीवन विशुद्ध हो गया। इसी क्रम से रत्नाकर डाकू ने पूर्ण महर्षित्व को प्राप्त कर लिया। वाल्मीकि के नाम से तीनों लोक में ख्याति हुई। एक बहुत बड़ी क्रांति आई कि समाज के लिए जो अभिशाप बना हुआ था, जो मानवता के लिए कलंक था, ब्राह्मण जाति के लिए जो कलंक था, आज राम-राम की महिमा से वह मानवता के लिए वरदान बन गया। देवर्षि नारद के गुरुत्व की महिमा से कल्याण हो गया। उन्होंने ऋषित्व को उत्पन्न कर दिया। पूरे समाज के लिए एक आदर्श बना। मानवता का चरम प्राप्त हुआ। शास्त्र विरुद्ध आचरण के सबसे बड़े कर्ता का जीवन पूर्ण शास्त्रीय जीवन हो गया। शास्त्रों के संकेतों को दूर-दूर तक प्रसारित करने वाली जीह्वा से संपन्न जीवन प्राप्त हो गया। 
चारों ओर यही चर्चा थी, जो जहां सुनता था, उसे लगता था कि कितना भी तुच्छ जीवन हो, नीच जीवन हो, मर्यादा के विरुद्ध जीवन हो, लेकिन संतत्व की प्राप्ति संभव है। यदि ईश्वर में जीवन को लगाया जाए, तो परिवर्तन होगा। शास्त्रों की आज्ञा की जरूरत है। देवर्षि नारद के बताए मंत्र का सम्मान किया और पूर्ण विश्वास अर्जित किया। उन्होंने तपस्या से वह सब प्राप्त किया, जो वह लूटपाट से कभी प्राप्त नहीं कर सकते थे। राम नाम से सामान्य मनुष्य ही नहीं, मनुष्यता की पराकाष्ठा वाला जीवन भी संभव है। देवर्षि नारद की विद्या काम कर गई। हमारा जीवन कितना भी लांछित हो, निंदनीय हो, अभिशापित हो, कितना भी हमारा जीवन हेय हो, समाज के लिए अत्यंत नाकारा हो, किन्तु सही मार्गों से चलकर भी हम अपने जीवन को सुधार सकते हैं। सुधार ही नहीं सकते, उसे परम सौन्दर्य दे सकते हैं, उसको संसार के लिए मानवता के लिए परम उपयोगी बना सकते हैं, प्रेरणादायक बना सकते हैं। सभी लोगों को एक मार्ग की प्राप्ति हुई। 
आम धारणा है, जीवन में, समाज में धन कमाने के लिए भोग के लिए, सम्मान कमाने के लिए व्यक्ति न जाने कितना परिश्रम करता है, लेकिन उतना परिश्रम वह ईश्वर के लिए नहीं करता। लौकिक विद्या को कमाना भी साधारण काम नहीं है, कला के क्षेत्र में बड़े स्वरूप को कमाना भी कोई साधारण काम नहीं है, लेकिन जब आध्यात्मिक कमाई की बात होती है, तो लोग पीछे हट जाते हैं। आध्यात्मिक जीवन को भी उतना ही महत्व देना चाहिए। 
वे पूरे संसार के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। महर्षि वाल्मीकि आदिकाव्य के रचयिता हैं, जैसे वेदों के स्तर का दुनिया में कोई ग्रंथ नहीं है। वेद अनादि माने जाते हैं। ब्रह्मा जी भी केवल ग्रहण करते हैं, ऐसा कहा जाता है, वेदों में भी यह वाक्य आया है। 
वेदों की तुलना में कोई ग्रंथ किसी जाति, किसी राज्य, किसी संप्रदाय के पास नहीं है। कोई भी वेदों को नहीं काट सकता, उनकी ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता। वेदों को छोड़ दें, तो लौकिक भाषा में, लौकिक संस्कृति में सबसे पहला ग्रंथ महर्षि वाल्मीकि के ग्रंथ को माना गया। यह ध्यान देने योग्य बात है। संपूर्ण संसार में जितनी भाषाएं हैं, उन भाषाओं में किसी भी भाषा के पास महर्षि वाल्मीकि का महाकाव्य वाल्मीकि रामायण जैसा कोई ग्रंथ नहीं है। कितनी बड़ी बात है कि जब वेदों के बाद लौकिक संस्कृति के अनुरूप लौकिक रचना बनी, तो पहली रचना वाल्मीकि जी ने ही रची - वाल्मीकीय रामायण। 
वेदों को प्रमाण माना जाता है, महाभारत को, वाल्मीकि रामायण को इतिहास की कोटि में रखा जाता है। इतिहास का प्रतिपादन हुआ। तमाम तरह के विषय वाल्मीकि रामायण में ज्ञान, शरणागति, वेदों का वर्णन, यह अद्भुत महाकाव्य है। सबसे पहले भगवान के चरित्र का वर्णन लौकिक भाषा में हुआ। यह पूर्ण ग्रंथ माना जाता है। वाल्मीकि रामायण में प्रमुखता से राम का वर्णन हुआ। कहा जाता है, वेदों में राम जी का वर्णन नहीं हुआ, किन्तु वाल्मीकि रामायण जैसा बड़ा ग्रंथ बिना आधार के ही लिखा गया था क्या? यदि बिना आधार के लिखा गया होता, तो उसे कोई महत्व नहीं देता, कोई सम्मान नहीं देता। भगवान राम का चरित्र वेदों में भी था, लेकिन वो शाखाएं लुप्त हो गईं। वाल्मीकि रामायण की विशिष्टता और सत्यता पूर्ण प्रमाणित है। राम जी पूर्णावतार हैं, अद्भुत व्यक्तित्व हैं। 
११ हजार वर्षों का काल राम जी का रहा। कुछ विद्वानों ने व्याख्या करके यह भी अर्थ निकाला है कि राम जी का शासनकाल ३३ हजार वर्ष का था। राम जी पूर्ण ब्रह्म हैं, अवतारी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, गुणों की खान हैं, कोई भी हेय गुण उनमें नहीं है। संपूर्ण जीवन उनका उदार है। परम प्रेरणास्पद है, संतों को सुख पहुंचाने वाला है। 
क्रमश: 

मरा मरा से राम राम तक

भाग - २
कथा है, देवर्षि नारद को देखकर रत्नाकर टूट पड़े। देवर्षि नारद का जीवन दिव्य जीवन है, रोम-रोम से अद्भुत आभा प्रस्फुटित हो रही है। पूर्णत: निर्लिप्त जीवन है। डाकू रत्नाकर ने सोचा कि आज काफी कमाई होगी, ‘रुको जो भी है, दे दो, नहीं तो मार दूंगा।’
नारद जी ने कहा, ‘मेरे पास कुछ नहीं है, वीणा है और तन पर वस्त्र है, मेरे पास और क्या संपत्ति है?’ 
वाल्मीकि ने पूछा, ‘वीणा का क्या करते हो?’ 
देवर्षि ने उत्तर दिया, ‘वीणा बजाता हूं, ब्रह्मा जी ने प्रदान किया है, इस पर हरि कीर्तन करता हूं।’
‘हमें भी बजाकर सुनाओ।’
देवर्षि नारद से अच्छा वीणा कौन बजाएगा? वे तो ईश्वर को सुनाते हैं, सच्चे हृदय से बजाते हैं। संगीत भक्ति की ऊंचाइयों को प्राप्त होता है। वीणा की ध्वनि अनेक हृदयों को प्रभावित करती है। रत्नाकर को भी वीणा की ध्वनि ने प्रभावित किया, नरमी आई, रौद्र रूप में धीमापन आया। अच्छा लगा। उन्हें लगा कि विचित्र परिवर्तन आ रहा है। यही तो सत्संग है। फिर भी लंबे समय का पापी जीवन था, सहज परिवर्तन संभव नहीं था। 
उन्होंने कहा, ‘आपकी वीणा अच्छी है, मुझे भी अच्छी लगी। अब आपके साथ क्या व्यवहार किया जाए?’ 
देवर्षि ने कहा, ‘जो मेरे पास है, मैं दे दूंगा, लेकिन मेरा कुछ प्रश्न है, जिसका आप समाधान करें, तो बहुत ही अच्छा होगा।’ 
संत मिलते हैं, तो सत्संग होता है। संत मिलता है, तो ईश्वर की चर्चा करता है, परमार्थ की चर्चा, गुणों की चर्चा। जिनका जीवन ऊंचाई को प्राप्त होता है, उनकी चर्चा करता है। जीवन को सुंदर बनाने वाले तत्वों की चर्चा करता है। 
देवर्षि ने कहा, ‘आप जो काम करते हैं, यह तो बहुत बुरा है, यह तो महान पाप का जनक है। गलत कर्म जीवन, शरीर, मन को लांछित कर देता है, क्रूर बना देता है। आप जो दूसरों के लिए या दूसरों के साथ कर रहे हैं, उससे उत्पन्न होने वाले पापों के कारण आपकी उतने ही वर्षों तक दुर्गति होगी।’ 
रत्नाकर ने कहा, ‘मेरा बड़ा परिवार है, उसके पास दूसरा कोई साधन नहीं है जीवन जीने का, खेती नहीं है, नौकरी नहीं है, दूसरा कोई स्रोत नहीं है। जहां से दो रुपए आएं, पोषण हो। परिवार का विकास हो। स्वास्थ बने। ऐसा कोई भी संसाधन नहीं है। मेरी चेष्टा से ही हुई कमाई से ही मेरा परिवार चलता है।’ 
देवर्षि ने कहा, ‘ अपने परिजनों से पूछो कि तुम्हारे साथ में वे पाप के भागी बनेंगे या नहीं? तुम्हारी पाप की कमाई खाते हैं, तुम्हारा पाप अपने माथे लेंगे या नहीं।’
वाल्मीकि जी को लगा कि ये साधु भागना चाहता है, मुझे घर भेजकर, चालाकी कर रहा है। 
यह जानकर देवर्षि ने कहा, ‘यदि मुझ पर विश्वास नहीं है, तो मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि जब तक आप आओगेे नहीं, मैं जाऊंगा नहीं, विश्वास नहीं है, तो मेरे हाथ-पैर बांध दो।’ 
जैसे पाप से वे भोग कर रहे हैं, उससे होने वाले अधर्म में वे भागीदार बनेंगे या नहीं? यह बात रत्नाकर डाकू को भी ठीक प्रतीत हुई। उसने कहा, ‘ठीक है, मैं आपको बांध देता हूं।’
हाथ-पैर को बांध दिया और तब घर गया। घर जाकर पूछा, ‘मैं जो कमा करके लाता हूं, गलत काम करके, उसके कारण जो पाप उत्पन्न होते हैं, उस पाप में आपकी भागीदारी होगी या नहीं? पाप की कमाई से जो भोजन आता है, उसमें आप सब भागीदारी बनेंगे या नहीं?’
परिजनों ने कहा, ‘पाप में हमारी भागीदारी नहीं है। आप परिवार के मुखिया हैं, आप कहीं से भी संपत्ति लाएं और हमारा पालन-पोषण करें, आपके पाप में हमारी कोई भागीदारी नहीं है, यह बात आप समझ लीजिए।’ 
यह बात सुनकर रत्नाकर को बड़ा आघात लगा कि अरे, हत्या, लूटपाट से अर्जित धन में ये लोग भोगी हैं, लेकिन जो पाप उत्पन्न हो रहा है, उसमें भागीदार नहीं हैं, तो ये तो बहुत स्वार्थी लोग हो गए। ऐसे लोगों के साथ जीवन नहीं जीना चाहिए। कितना बड़ा पाप हो रहा है और ये लोग बंटवारा करना नहीं चाहते हैं, केवल लाभ लेना चाहते हैं। ये परिवार के लोग नहीं हैं, मेरे सगे नहीं हैं, ये तो दूसरे लोग हैं, मेरे अपने नहीं हैं। 
जो दुर्भावना थी, वह उनकी समझ में आ गई। यहां ऐसे ही लोग रहते हैं। हर आदमी को अपनी चिंता है, स्वार्थ की चिंता है। यह बात सर्वत्र व्याप्त है। 
वह आकर देवर्षि नारद के चरणों में गिर पड़े। बार-बार आग्रह किया, ‘हमें पाप कर्मों से बाहर निकालें। कैसे हम किए गए पापों की सजा पाएंगे? कैसे हम नवजीवन को प्राप्त करेंगे? कैसे हम सत्कर्म के जीवन का प्राप्त करेंगे, ऐसे जीवन को प्राप्त करेंगे, जो ईश्वर भक्ति से जुड़ा होगा। कैसे हमारा जीवन सुधरेगा। आप ही मार्ग बताइए।’ 
देवर्षि नारद ने कहा, ‘अपने सनातन धर्म में एक से एक संत महंत हैं, जिनके द्वारा कैसा भी जीव संत जीवन को प्राप्त कर लेता है, आप केवल मन बनाओ कि आपको अच्छा बनना है, आपको बुरे कर्मों से जुड़े नहीं रहना है। यह सबकुछ छोडऩा होगा, न लूट होगी, न हत्या होगी, न झूठ होगा, न फरेब होगा, न ऐसे लोगों की जिम्मेदारी होगी, जिनको केवल फल चाहिए। पूर्ण समर्पित होकर भगवान राम का जो नाम है उसे जपिए, उससे आपका उद्धार होगा। नाम में अद्भुत शक्ति है, यह नाम सबकुछ कर सकता है। आप नाम जपिए। राम, राम, राम, राम, राम करिए आप। यही मंत्र आपको मैं दे रहा हूं, इससे आपके जीवन में पूर्ण परिवर्तन आएगा, पूर्ण सुंदरता आएगी। संपूर्ण जीवन आपका जो अभी लांछित हो गया है, अनेक तरह से अवगुणों से दूषित हो गया है, सब ठीक हो जाएगा। 
रत्नाकर ने प्रयास किया, फिर कहा, ‘मेरे मुंह में यह शब्द आ ही नहीं रहा है। राम, राम कह ही नहीं सकता। मेरा शरीर दूषित है, दिव्य शब्द राम मेरे मुंह से उच्चरित नहीं हो सकता। श्रवण और कथन के लिए जो वातावरण चाहिए, जैसी शक्ति चाहिए, वह मेरे पास नहीं है, मैं राम, राम नहीं जप सकता।’ 
देवर्षि ने कोशिश की, लेकिन रत्नाकर के मुंह से राम शब्द नहीं निकल पाया।  
देवर्षि ने कहा, ‘ठीक है, आप राम राम नहीं जप सकते हैं, तो आप मरा, मरा ही जपिए।’ 
यह रत्नाकर को ठीक लगा, वे जिस गलत व्यवसाय में थे, उसमें मारो, मारो बोलते ही रहते थे, मारो, पीटो, लूटो, काटो। राम, राम तो नहीं जप पाए, पाप की अधिकता के कारण, लेकिन मरा मरा उन्होंने जपना शुरू किया। 
क्रमश: