Sunday, 31 December 2017

जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज

परमात्मा के दो प्रकार के अवतार शास्त्रों में स्वीकृत हैं । नित्य एवं नैमित्तिक अवतार । किसी निमित्त अर्थात् विशेष प्रयोजन, जैसे रावण कुम्भकरण, शिशूपाल दन्तवक्र, कंस आदि दुष्टों का विनाश करने हेतु जो अवतार होता है। उसे नैमित्तिक अवतार कहते है i ये अवतार राम-कृष्ण आदि के रूप में यदाकदा होते है। जो अवतार किसी निमित्त विशेष के बिना नित्य निरन्तर संसार के जीवों पर अहैतुकि अनुकम्पा करके सभी युगों में सर्वत्र होते है, उन्हें नित्यावतार कहते हैं । ये अवतार सन्तों, आचार्यों तथा भगवत भक्तों के रूप में होते है । जैसे शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य,निम्बार्काचार्य, रामानन्दाचार्य, चैतन्य महाप्रभु आदि । इन्हीं नित्यावतारों में काशी श्रीमठ पीठाधीश्वर जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज एक अन्यतम ज्वलंत उदारहण है । जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का अवतार पुण्यभूमि भारतवर्ष के बिहार प्रान्त के भोजपुर जिले में परसीया ग्राम में, पुण्यात्मा पंडित जगन्नाथ शर्मा के पुत्र के रूप में माघ शुक्ल पंचमी, संवत् 2008 तद्नुसार गुरूवार दिनांक 31 जनवरी सन् १९५५ ई. में हुआ ।इनका बचपन का नाम स्वभावतः श्री कृष्ण होने के कारण श्री कृष्ण शर्मा रखा गया, इनकी प्रारम्भिक शिक्षा – दीक्षा जन्मभूमि में हुई । बाल-सुलभ चापल्य से विमुक्त होकर, निरन्तर अध्ययन करना आपका स्वभाव था। संसार से विरिक्ति होने के कारण अल्पावस्था में ही मात्र (14 वर्ष) की आयु में मोह-माया का त्याग कर आप काशी आ गये । यहां सन्त प्रवर श्रीरघुवर गोपलदास जी महन्त से वैष्णवी विरक्त दीक्षा ग्रहण कर आप श्रीकृष्ण शर्मा से श्री रामनरेश दास हो गये ।

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अपने-अपने संकल्प


सबके मन में प्रतिशोध की भावना होती है, सबके मन में यह भावना होती है कि उसके हिसाब से ही सारे काम हों। सबके अपने-अपने संकल्प होते हैं। लेकिन इसके लिए जो लोग हमारे विपरीत हैं, उनका हम क्या करें? हमें बनाना है राम राज्य और हम प्रयोग कर रहे हैं रावण राज का। सरेआम सडक़ पर गलत काम हो, व्यभिचार हो, यह कदापि उचित नहीं। इस तरह से राम राज्य नहीं आएगा। रावण तो आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रतीक हुआ। उसने तो राम जी की पत्नी का ही धोखे से अपहरण कर लिया। ब्राह्मणों की तो हत्या रोज ही होती थी, वेद ध्वनि बंद हो गई थी, यज्ञ बंद हो गए, माता-पिता का सम्मान बंद हो गया था, देवताओं का कोई सम्मान नहीं रहा। अर्थ यह कि धर्म की, श्रेष्ठता की, पवित्रता की, मर्यादाओं की, अच्छी परंपराओं की विधियां नष्ट हो गई थीं। दंड व प्रतिशोध का कोई विकल्प नहीं बच गया था। परन्तु तब भी राम जी ने हनुमान जी को भेजा, अंगद को भेजा, विभीषण, कुंभकर्ण और यहां तक कि पुलत्श्य को भी परोक्ष रूप से प्रेरित किया कि वे रावण को सुधरने के लिए समझाएं। ताकि रावण रास्ते पर आ जाए। राम जी ने रावण को पूरे मौके दिए, वे प्रतिशोध भावना के कारण अमर्यादित नहीं हुए। प्रतिशोध या किसी को दंड देने की भी एक मर्यादा होती है, एक उचित विधि होती है। हनुमान ने भी तरह-तरह से समझाया, अंगद ने भी रावण को खूब समझाया कि बिना हत्या-मारकाट, बिना युद्ध के ही सुधार हो जाए। रावण के ही कुटुंब के लोगों ने समझाया कि राम जी को उनकी धर्म पत्नी लौटा दो, धर्म का पालन करो, लेकिन जब रावण नहीं माना, तब राम जी ने अंतिम विकल्प के रूप में विधिवत व घोषित युद्ध का सहारा लिया। वे रावण की तरह छिपकर आक्रमण करने नहीं गए, उन्होंने रावण की तरह किसी को धोखा नहीं दिया। राम जी ने अमर्यादित व दुष्ट रावण को भी दंड देने के लिए युद्ध की तमाम मर्यादाओं का पालन किया। आक्रमण का वह तरीका नहीं था, जो आज दंगों के समय देखने को मिलता है या आतंककारी हमलों के समय देखने को मिलता है। राम जी की सेना ने खुलेआम सडक़ों पर मौत का तांडव नहीं मचाया। निर्दोष लोगों को नहीं मारा। लूटमार या हत्या या बलात्कार का सहारा नहीं लिया। युद्ध जीतने के बाद भी राम जी की सेना ने लंका में घुसकर कोई उत्पात नहीं मचाया। यदि सडक़ पर खुलेआम व्यभिचार होगा, अन्याय होगा, तो राम राज्य कैसे आएगा? एक हत्या करने के बाद हत्या की भावना बनी रहती है। लाखों में से कोई एक हत्यारा ही सामान्य हो पाता है। 
प्रतिशोध के लिए और श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना के लिए उन कृत्यों की जरूरत नहीं है, जिन कृत्यों की हम निंदा करते हैं। जोर-ज्यादती ठीक नहीं है। रावण जैसी तानाशाही ठीक नहीं है। जब देश स्वतंत्र हुआ, तब किसी ने गांधी जी से कहा कि देश में तानाशाही की जरूरत है। गांधी जी ने जवाब दिया, ‘यह मैं भी मानता हूं, लेकिन जो लोग दस साल तानाशाही चला लेंगे, वो फिर लोकतंत्र को नहीं आने देंगे।’ प्रतिशोध भाव होना चाहिए, लेकिन सुधार के लिए होना चाहिए। हमें यथोचित मर्यादाओं, संविधान, धर्म के हिसाब से चलना चाहिए। हमें कदापि बर्बर नहीं होना चाहिए।  


Friday, 8 December 2017

हरिद्वार में निर्माणाधीन भव्य श्री राम मंदिर



हरिद्वार में निर्माणाधीन भव्य श्री राम मंदिर
रामानंद संप्रदाय के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी के महाराज के नेतृत्व में हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर शांतिकुंज के करीब सप्त ऋषि घाट मार्ग पर निर्मित हो रहा भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण फिर से गति पकडऩे जा रहा है। यहां भूमि पर अतिक्रमण की वजह से मंदिर निर्माण में बाधा आ रही थी, लेकिन गत १८ नवंबर को हरिद्वार में इस कार्य को फिर गति मिली है। यह दुनिया का एक अद्वितीय श्रीराममंदिर होगा। भगवान श्री राम जी की कृपा से यह मंदिर इतना अद्भुत बनेगा कि हरिद्वार के आकर्षण में चार चांद लगा देगा। जय सियाराम

योग का उद्देश्य समझिए - 8 - समापन भाग

परमसुख के लिए योग 
यदि किसी को जीवन का परमसुख लेना है, पूर्णता लेनी है, तो महर्षि पतंजलि के योग दर्शन का अवलंबन करके। यम से लेकर समाधि पर्यंत योग का संपादन करें। आज देखिए, व्यक्ति चाहता है कि मैं अपने चित्त को अधिक से अधिक फैलाऊं। यह अज्ञान का विस्तार है। यह जितना बढ़ेगा, संसार में उतनी ही अशांति बढ़ेगी। इसलिए संसार के सभी लोगों को योग का अवलंबन करके अन्य संसाधनों को गौण करके, साधनों का उतना ही उपयोग किया जाए, जितना जीवन जीने के लिए आवश्यक है। अभी तो इतनी बीमारियां हैं, तमाम समाज में अमानवीय कृत्य हो रहे हैं। जब संपूर्ण संसार को योग का आनंद मिल जाएगा, तो क्यों आदमी बुराई में लगेगा, क्यों आदमी आतंककारी बनेगा। जिसे उत्तम रूप मिल जाएगा, वह दूसरे छोटे रूपों को क्यों देखेगा? 

गलत प्रचार न हो
यह दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज जो लोग योग प्रचारक के रूप में प्रचलित हैं, वे केवल धन और प्रतिष्ठा कमाने के लिए कर रहे हैं। धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के बारे में लोग मानते थे कि उन्हें योग का बड़ा ज्ञान था, सरकार से नजदीकी के कारण लोग स्वीकारने लगे थे, लेकिन अंत में क्या हुआ। उन्हें इंदिरा गांधी का परिवार ही सम्मान नहीं दे सका। इंदिरा गांधी की पार्टी सम्मान नहीं दे सकी। वे कैसे योगी थे? आज उनका नाम लेने वाला कोई नहीं है। 
आज मैं किसी का नाम लेना नहीं चाहता, लेकिन बहुत से लोग योग का प्रचार कर रहे हैं। आश्रम नहीं, होटल खुल रहे हैं, दुकानें खुल रही हैं। अब कैसे लोग विश्वास करेंगे कि योग से व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है?
अब योग का सरकार में विभाग होना चाहिए और उस विभाग को अत्यंत विशुद्ध रूप से प्रचारित किया जाए। अधिकारी, नेता सभी इसमें भाग लें, तभी भ्रष्टाचार, अनियमितताएं, व्याधियां मिटेंगी। बड़े-बड़े जो घोटाले हो रहे हैं, न्यायपालिका और विधायिका में जो व्याधियां हो रही हैं, उन सबका समाधान योग के जरिये हो सकता है। 
केवल रोग निवारण नहीं
जिसे देखो, वही योगासान कर रहा है। आज का योग केवल रोग निवारण का साधन बनकर रह गया है। यह योग का अत्यंत गौण फल है। केवल रोग निवारण के लिए प्रयासरत होने से सच्चा सुख नहीं मिल सकता। मैं मानता हूं, आसनों से रोग निवारण होता है, लेकिन यह योग का अंतिम फल नहीं है। यह योग का पूरा सत्य नहीं है। लोगों को योग के पूर्ण सत्य से साक्षात्कार करना चाहिए, तभी जीवन को संपूर्णता मिलेगी। सच्चे योगी में तो इतनी शक्ति आ जाती है कि वो जो चाहे, वैसा कर सकता है। वह पिछले जन्मों और आगे के जन्मों को देख सकता है। केवल घुटने का दर्द कम करने के प्रयास बंद हों और योग की सही प्रक्रिया की स्थापना समाज में हो। पतंजलि के ज्ञान का पूरा लाभ लिया जाए। योग ने असंख्य लोगों को परम जीवन दिया है, आज भी देने में समर्थ है, योग की सभी क्रियाओं का संपूर्ण संसार में अवलंबन होना चाहिए। 
जयसियाराम

योग का उद्देश्य समझिए - 7

आठवां अंग समाधि
समाधि क्रिया नहीं है, एक उपलब्धि है। समाधि कोई घटना नहीं है, ध्यान के स्थिर होने पर ही अपने आप समाधि घटित होती है। चित्त का कोई स्वरूप नहीं रह जाता। चित्त एक ही आकार में परिणत हो जाता है। इसके बाद आगे चलते हैं, तो भगवान की दया से अत्यंत बुद्धि का विकास हो जाता है। हमारी बुद्धि आसाधारण को भी समझने में सक्षम हो जाती है। ऋषियों के पास ऐसा ज्ञान था कि जहां आज भी वैज्ञानिक नहीं पहुंच पाए हैं। इस बुद्धि को प्रज्ञा कहा गया है। जब प्रज्ञा का प्रकाश होता है, तक सबकुछ दिखने लगता है। अध्यात्म प्रकाश की प्राप्ति हो जाती है। सभी क्रियाएं छूट जाती हैं। भागदौड़ रुक जाती है, मोक्ष मिल जाता है। 
लिखा महर्षि ने - 
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि:।
यहां केवल ध्येय मात्र का आभास होता है, स्वरूप शून्य-सा हो जाता है और समाधि लग जाती है। केवल एक ही प्रतीती होती है। चित्त का निरंतर प्रवाह एक ही दिशा में चलता रहता है, अधिक समय तक प्रवाह चलता रहेगा, तो उसका स्वरूप शून्य हो जाता है। यही अवस्था समाधि है। प्रज्ञा का उच्च स्वरूप सामने आ जाता है। यहां तक वैज्ञानिक भी नहीं पहुंच पा रहे हैं। प्रज्ञा का जब प्रकाश होता है, तो सब दिखने लगता है।   
अंतिम समाधि में आने के बाद सत्य का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। योगी को ज्ञान हो जाता है, चित्त अलग है और पुरुष अलग है। चित्त का संपूर्ण व्यापार पुरुष के लिए होता है। चित्त जब संसार की रचना करता है, तो भोग प्राप्त करता है। चित्त जब यह समझने लगे, जब उसे परिज्ञान हो जाए, जब चित्त का पूर्णविलय हो जाए, तभी समाधि प्रज्ञा संभव है। चित्त जब समझ लेता है कि मैं पुरुष से अलग हूं। जैसे मुख्यमंत्री के परिवार के लोग भी स्वयं को मुख्यमंत्री समझकर अनर्थ कर लेते हैं, जैसे चपरासी भी स्वयं को अफसर समझने लगता है, ठीक उसी तरह चित्त और चेतन पुरुष के बीच होता है। चित्त समझता है कि मैं चेतन हूं और चेतन पुरुष समझता है कि मैं भोक्ता हूं। इसी के कारण ये सारा संसार भटक रहा है। समाधि में यह भटकना रुकता है।
कहा गया है, अंतिम समाधि में चित्त बीज का भी अभाव हो जाता है। समाधि संयम को प्राप्त हो जाती है। चित्त का ही अभाव पैदा करना पड़ता है। योगी को यह ज्ञान हो जाता है कि चित्त अलग है और पुरुष अलग है। यह योग की अंतिम सीढ़ी है। उसके बाद ही मोक्ष संभव होता है।
मोक्ष क्या है? 
कैसे मोक्ष की प्राप्ति होती है, उसके लिए पतंजलि ने लिखा। कहा कि पुरुषार्थ शून्य हो जाते है गुण। यह केवल्य है। चित्त के जो गुण हैं, सत, रज, तम, तीनों गुण बराबर हो जाते हैं, तीनों गुणों की साम्या अवस्था को प्रकृति माना गया है। जब पुरुषार्थ शून्य हो जाते हैं गुण, तो वो अपने कारण में लीन हो जाते हैं। उनको मालूम हो गया कि हमारा जो पुरुषार्थ था, वो संपन्न हो गया। अब हमें मोक्ष की प्राप्ति हो गई। हमारा जो काम था, वह हमने कर लिया। जो पुरुष है, जो जीवात्मा है, वह अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है, ईश्वर में समर्पित हो जाता है, पूर्ण रूप से वहां अटल भाव को प्राप्त कर लेना, इसी का नाम मोक्ष है। मूल स्वरूप सृष्टि का अव्यक्त है। उपनिषदों का वेद वाक्य है, जब सृष्टि में कुछ भी नहीं था, तब केवल सत्य ही था। भगवान के संकल्प से सृष्टि का रोज फैलाव हो रहा है। एक योगी इस विस्तार को अपने भीतर रोक देता है। अविद्या का नाश हो जाता है। यह जीवन की संपूर्णता का स्वरूप है। 
क्रमश: 

योग का उद्देश्य समझिए - 6

पांचवां अंग प्रत्याहार 
महर्षि पतंजलि ने कहा - 
स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहार:। 
प्रत्याहार समाधि प्राप्ति का अंग है। अपने चित्त को अपने विषयों से रहित करना चाहिए। जहां-जहां हमारा चित्त भागता है, उसे वहां जाने से रोकना है। आहारण करना आवश्यक है। अपने-अपने विषयों से इन्द्रियों को हटाना और चित्त के स्वरूप में उन्हें विलीन कर देना प्रत्याहार है। इन्द्रियां जब तक भागती रहती हैं, तब तक परम सुख नहीं मिलता। चित्त को भटकने नहीं देना, इन्द्रियों को वश में करना प्रत्याहार है। इन्द्रियों को रोकने से ही सुख मिलता है। प्रत्याहार सिद्ध होने के बाद साधक अपनी इन्द्रियों को जहां चाहे वहां लगा सकता है।
कहा गया है - 
तत: परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्। 
प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में हो जाती हैं। 

छठा अंग धारणा 
चित्त को एक देश विशेष में बांधना धारणा है। पतंजलि जी ने कहा -
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा। 
जैसे पशु को बांधना पड़ता है, खुला छोड़ दें, तो वह पता नहीं कहां-कहां चला जाए। अपने चित्त को व्यक्ति बांधे एक जगह। महान जीवन के सर्वश्रेष्ठ संसाधनों को बांधना चाहिए। एक स्थान पर केन्द्रित करना चाहिए। कहां हम उनको बांधें, नाभि में बांधिए, किसी अन्य अंग में बांधिए, रोकिए। नासिका के अग्र भाग में बांधें। हृदय कमल में बांधें। हृदय कमल को देखें, इससे क्या होगा, इससे हमारा चित्त धारणा योग को प्राप्त करेगा। 


सातवां अंग ध्यान
धारणा सिद्ध हो जाए, तो ध्यान सिद्ध हो जाता है। आज कोई भी पद्धति उतनी दूषित नहीं हुई है, जितना कि लोगों ने योग को दूषित किया है। योग दुनिया के सभी लोगों के लिए परमऔषधि है, जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्धारक है, जीवन को संपूर्णता देने वाला है। इस योग को लोग सांप्रदायिक मान रहे हैं। मैं पूछता हूं, किसके जीवन में योग की जरूरत नहीं है। सबके जीवन में ध्यान की जरूरत है। जीवन की समस्या का कारण निर्बलता नहीं है, पानी का कम होना समस्या नहीं है, दवाई का अभाव समस्या नहीं है, समस्या तो यह है कि जो संसाधन हमारे पास हैं, उनका हम उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। हम अपने जीवन को शांतमय और सुखमय बनाएं। ध्यान सबको करना चाहिए। ज्ञान के विषय बदलते रहते हैं, जब एक ही तरह का ज्ञान लगातार हो, जब हम चंद्रमा को देख रहे हों, तो चंद्रमा का ही ध्यान हो। गंगा को देख रहे हों, तो गंगा का ही ध्यान हो। 
ध्यान का अभिप्राय है - महर्षि पतंजलि ने कहा - 
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्। 
चित्त का एक सा बना रहना ही ध्यान है। ध्यान बदलना नहीं चाहिए। विषय के बदलने से ध्यान बदलता है। एक ही समान ध्यान बना रहना चाहिए। भटकना रुका, तो ध्यान होता है। लोग कई तरह से ध्यान करते हैं। जो चित्त बना, एक जगह लगा, वहां बंधन को प्राप्त किया, उसी का लगातार बनाए रखना, चित्त में कोई दूसरी वृत्ति नहीं आनी चाहिए, कोई शब्द नहीं आवे, कोई रूप नहीं आवे, तो यह ध्यान है। 
क्रमश: 

योग का उद्देश्य समझिए - 5

योग का विकल्प भी बताया
यदि कोई यम-नियम नहीं करना चाहता और समाधिस्थ होना चाहता है, मोक्ष की प्राप्ति चाहता है। उसके लिए विकल्प बताया महर्षि पतंजलि ने कि ईश्वर प्रणिधान करो। ईश्वर का चिंतन करो, ईश्वर के लिए अपने जीवन को समर्पित करो, ऐसा करने से बिना किसी संसाधन के आपको मोक्ष या समाधि की प्राप्ति होगी। ईश्वर का हम प्रणिधान करें। विकल्प क्या है? इसे बहुत ध्यान से समझाना चाहिए। जैसे हम हवाई जहाज से नहीं जा सकते, तो रेल से जा सकते हैं, रेल से नहीं जा सकते, तो बस से जा सकते हैं, बस से नहीं जा सकते, तो पैदल जा सकते हैं। समाधि की प्राप्ति के लिए विकल्प बता दिया महर्षि पतंजलि ने कि ईश्वर प्रणिधान करो। यह भी नियम का भाग है। ईश्वर में हम पूरा ध्यान लगाएं, तो इससे भी सीधे समाधि की प्राप्ति संभव है। 
भगवान ने कहा कि मेरी शरण में आ जाओ। इसमें ज्ञान की विशेष जरूरत नहीं है, मेरे ऊपर पूर्ण रूप से विश्वास करके, सभी मोह, माया, प्रपंच, सभी दूसरे अवलंबों को दूसरे आश्रयों को पूर्णत: विदाई देकर तुम आ जाओ मेरी शरण में, तुम्हें मैं मोक्ष दूंगा, तुम्हारे शोक दूर करूंगा, तुम्हें तमाम प्रकार के दुखों से दूर करूंगा। यह भी मोक्ष का मार्ग है। 
यम, नियम योग दर्शन के महत्वपूर्ण सोपान हैं। आज समाज के हर व्यक्ति को जरूरत है कि वह यम, नियम का अवलंबन करे। महा चंचलता से युक्त मन को संभालना है, नियंत्रित करना है, तो यम, नियम का पालन करना होगा। 

योग का तीसरा अंग आसन 
आसन को परिभाषित करते हुए महर्षि पतंजलि ने लिखा -
स्थिरसुखमासनम्। 
चित्त का स्थिर होना आसन है। सुख से स्थिर बैठना आसन है। केवल हाथ पैर हिल रहे हैं, यह आसन नहीं है। हम बैठे हैं और सुख नहीं मिल रहा है, तो आसन नहीं हुआ। हम अंग संचालन बंद करें, तब भी सुख की प्राप्ति हो, यह आसन है। हम आसन का अवलंबन करें। आसन करने से क्या होगा? योग का तीसरा अंग आसन जब सिद्ध हो जाएगा, तो हमारा मन अनंत परमात्मा में लगने लग जाएगा। आसन के दो फल हैं - मन लगने लगेगा परमात्मा में और जो द्वंद्व होते हैं विपरीत भावों को, हम उन्हें झेल सकेंगे। 
ततो द्वंद्वानभिघात:।
हम भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी को झेल सकेंगे। विपरीत परिस्थितियों को झेलने की शक्ति आसन करने से ही मिलती है। हमें बेचैन करने वाले द्वंद्व दूर होंगे। हमारा ईश्वर में जो मन प्रतिष्ठित नहीं हो रहा था, उसमें उसकी प्रतिष्ठा होने लगेगी। मन को भागने से हम रोक पाएंगे। हम आसानी से अपने चित्त को ईश्वर में लगा सकेंगे, इसलिए योग दर्शन में वर्णित विभिन्न आसनों का अभ्यास करना चाहिए। आज लोग जहां जाते हैं, देखने लगते हैं कि मेरे लिए क्या आसन हैं। मेरे लिए बैठने का क्या संसाधन रखा गया है। देखने लगते हैं कि खाने के क्या संसाधन हैं। कुछ न मिले, तो व्यक्ति को विषाद होने लगता है, लेकिन आसन सही आ गया, तो हमारे ये द्वंद्व दूर हो जाएंगे। 

चौथा अंग प्राणायाम
आसन सिद्ध हो जाएं, तो प्राणायाम करना चाहिए। श्वांस-प्रश्वांस की गति को रोकने का नाम प्राणायाम है। महर्षि ने लिखा - 
तस्मिन् सतिश्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:। 
इससे चित्त की एकाग्रता बढ़ती है। इसलिए सनातन धर्म में किसी भी पूजन के प्रारंभ में भी और अंत में भी कहते हैं कि अब आप प्राणायाम कीजिए। हम अपने श्वांस-प्रश्वांस की गति को रोकें। वायु को अंदर लेना श्वांस और वायु को छोडऩे को प्रश्वांस कहते हैं। योग दर्शन की भाषा में जो श्वांस भीतर ले जाते हैं, उसे पूरक बोलते हैं और जो श्वांस छोड़ते हैं, उसे रेचक कहते हैं और श्वांस रोकने को कुंभक कहते हैं। जो वायु है, उसे बाहर निकालना, धीरे-धीरे वायु को भगवान का नाम लेते हुए अंदर ले जाना, फिर श्वांस-प्रश्वांस को रोक देना और उसके बाद धीरे-धीरे प्राण वायु को निकालना, इसी का नाम प्राणायाम है। 
प्राणायाम करने से क्या होगा? प्राणायाम करने से हमारी चित्त वृत्तियां रुकेंगी। हमारा संपूर्ण समाधि का क्रम मजबूत होगा। लोगों को शांति मिलेगी, चित्त का उद्वेग रुकेगा। जीवन जीने का इतना लाभ होगा कि जिसकी परिकल्पना भी लोग नहीं कर सकते। संपूर्ण ज्ञान हममें समाहित है, ज्ञान कहीं बाहर से नहीं आता, उस पर मल जमा हुआ है, अनेक तरह के आवरण हैं उस पर, इससे उसका प्रकाश प्रभावित हो जाता। प्राणायाम करने से प्रकाश या ज्ञान पर से आवरण हटते हैं। हमारा चित्त धुलता जाता है। प्राणायाम से हम बातों को बहुत दिनों तक याद रख सकते हैं। स्मरण व अन्य सकारात्मक शक्तियां प्राणायाम से बढ़ जाती हैं।
क्रमश: 

योग का उद्देश्य समझिए - 4

नियम का महत्व 
योग में यम के बाद नियम का महत्व है। नियम के पांच अंग हैं - शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान। हम नियमों का पवित्रता से पालन करें। आज के योगियों को शौच का कितना ज्ञान है। लोग गलत काम करते हैं, हाथ नहीं धोते, कान को पकड़ा, जूता छुआ, पैर छुआ और उसके बाद आसन भी कर लेते हैं। ऐसे आसन नहीं किया जा सकता। पतंजलि ऋषि ने लिखा है कि आदमी को अपने अंगों से ही घृणा हो जाएगी। जब व्यक्ति बाहर से भी पवित्र होगा, अंदर से भी पवित्र होगा, तो दूसरे के लिए आकर्षण क्या होगा, उसे अपने से भी घृणा होने लगेगी। यह भाव आने लगेगा कि नहीं-नहीं, अब हमें किसी की जरूरत नहीं है, अब हम किसी को छुएंगे नहीं, किसी को भी प्राप्त करने की जरूरत नहीं। दूसरों से संसर्ग की इच्छा नहीं होगी। दूसरों को गले लगाने की इच्छा नहीं होगी, वह यह सदा मानेगा कि हमारे संस्कार अलग हैं, हमारे परमाणु अलग हैं, हम अपने चित्त को निरुद्ध करना चाहते हैं। हम शांति और आनंद के सागर में निमग्न होना चाहते हैं, तो किसी को छूने की भी जरूरत नहीं।
महर्षि पतंजलि ने लिखा है - शौच का सही पालन करने से अपने ही अंगों से वैराग्य उत्पन्न होता है और दूसरों को छूने की भी इच्छा नहीं होती। 
शौच के लिए जैसे सफाई आवश्यक है, उससे भी आवश्यक है कि हम पवित्रता का पालन करें। किटाणु भले आंखों से दिखाई न पड़ते हों, लेकिन वे हैं और हमें दुष्प्रभावित करते हैं। लोग समझते हैं कि अपने बालों को छूने से क्या होगा, अपने अंगों को छूने से क्या होगा, अपनी उंगलियों से आंखों को साफ करने से क्या होगा, लेकिन हर जगह किटाणु हैं, गंदगी है। योग करते हुए सजग होना चाहिए। शौच का पालन करने से ही हम पवित्र हो सकते हैं, तभी मन साफ हो जाएगा। क्या आज के योगियों को शौच का पूरा ध्यान है? क्या वे अपने शिष्यों को शौच का पाठ पढ़ा रहे हैं?
ठीक उसी तरह से हममें संतोष हो। महर्षि पतंजलि ने लिखा है - संतोषादनुत्तमसुखलाभ:। आज तमाम घोटाले संतोष के अभाव में ही हो रहे हैं। संतोष होगा, तभी सुख की प्राप्ति होगी। संतोष का मतलब हम सही काम करें, समर्पित होकर काम करें और उससे जो संसाधन प्राप्त हो, उसी से हम जीवन का निर्वाह करें। यही संतोष है। काम और व्यापार किया, तो भी संतोष होना चाहिए। 
उसके बाद तप भी आवश्यक है। तप के कारण अशुद्धियां समाप्त होती हैं। स्वाध्याय का भी अवलंबन करना चाहिए। ईश्वर के गुणों का जप करें, मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन करें, यह स्वाध्याय है। आज के योग के प्रचारक स्वाध्याय नहीं करते हैं। लोग कहते हैं कि पढऩे से केवल नौकरी मिलती है, लेकिन महर्षि पतंजलि ने लिखा कि मोक्ष शास्त्रों को पढ़ो, वेदों, स्मृतियों, पुराणों, दर्शन शास्त्र को, गीता को पढ़ो, रामायण को पढ़ो, तभी तुम ईश्वर के लिए समर्पित होगे। ईश्वर के सही स्वरूप को तुम जान सकोगे, तुम्हारा उनके प्रति आकर्षण होगा। तुम्हारी समाधि हो जाएगी और मोक्ष का लाभ होगा।  
दार्शनिक प्लेटो ने कहा था कि दुनिया का शासक दार्शनिक होना चाहिए, मैं कहता हूं दुनिया के हर आदमी को दार्शनिक होना चाहिए। जो स्वाध्याय करेगा, उसे पता चलेगा कि उसे बुद्धि को कहां लगाना है, समस्या का समाधान कहां है, यह शास्त्रों के अध्ययन से ही पता चलेगा। शास्त्रों को सही पढऩे वाला कभी नहीं बिगड़ेगा। उसे जीवन के उद्देश्य का पता होगा। यह भी नियम का अंग है।
उसके बाद नियम में प्रणिधान अर्थात ईश्वर प्रणिधान आवश्यक है।
समाधिसिद्धिरीश्वर प्रणिधानात्। 
वास्तव में समाधि की सिद्धि प्रणिधान से होती है। योग के मार्ग में स्वयं को ईश्वर के लिए समर्पित कर देना चाहिए। 
क्रमश: 

योग का उद्देश्य समझिए - 3

मां हिंस्यात सर्वाभूताणि। 
हमें किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी है। इसलिए सनातन धर्म में लिखा है कि मच्छरों, कीट-पतंगों को भी मारने, वृक्ष-लताओं को काटने से भी पाप उत्पन्न होता है। यज्ञ में लकड़ी की जरूरत होती है, पेड़़ काटे जाते हैं, तो जैसे यज्ञ से पुण्य मिलता है, ठीक उसी प्रकार हरा भरा पेड़ काटने से पाप भी मिलता है। यदि हम हिंसा से नहीं बचते हैं, तो हमारा चित्त कभी एकाग्र नहीं होगा। कभी जीवन में पूर्णता की प्राप्त नहीं होगी। 
पूरी दुनिया में अहिंसा की भावना का अस्तित्व है, इसके लिए कोर्ट है, पुलिस है। इतना ही नहीं, लोग मनुष्यों की ही नहीं, किसी भी तरह से हिंसा नहीं करें। कौन-सा संप्रदाय होगा, कौन-सी ऐसी जाति होगी, जिसे हिंसा पसंद है, जो हिंसा का अभिशाप नहीं मानती। योग के पहले अंग यम का पहला स्वरूप अहिंसा है। जिसे वेदों ने सबसे पहली बार समाज में प्रकट किया था। किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो। 
ऐसे आख्यान भी आए हैं, तितली के पंख में कांटे को छुआ दिया, तो दंड स्वरूप सूली पर बैठना पड़ा। शास्त्रों में वर्णित हैं ऐसे प्रसंग। कितना बड़ा चिंतन है महर्षि पतंजली का। अहिंसा की प्राप्ति होगी, तो ही आदमी चित्त को एकाग्र कर पाएगा। क्या खूब लिखा है महर्षि पतंजलि ने - 
अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्याग:।
अर्थात जब योगी का अहिंसा भाव स्थिर हो जाता है, तब उसके निकटवर्ती हिंसक जीव भी वैर त्याग देते हैं।

सत्य -  यम का दूसरा अंग है सत्य। वेदों ने कहा - सत्यम वद। यह किसी एक जाति या काल के लोगों के लिए नहीं कहा था, सबके लिए कहा था। सत्य सभी को बोलना चाहिए। इसका उदाहरण है, जहां लोग गोमांस खाते हैं, जहां लोग अत्यंत अमर्यादित जीवन जीते हैं, जिनका जीवन बड़े रूप में पशुता के समीप है। कहीं भी उनको देवत्व देने वाला नहीं है, वहां के लोग भी सत्य के पक्षधर हैं। इसलिए वाटरगेट कांड में निक्सन को झूठ बोलने के कारण पद छोडऩा पड़ा। कहा महर्षि पतंजलि ने कि सत्य में भी प्रतिष्ठित होना पड़ेगा। जो जैसा है, उसका वैसा ही ज्ञान करना और उसी तरह प्रकट करना, यह सत्य की प्रतिष्ठा है। 
महर्षि पतंजलि ने कहा - 
सत्य प्रतिष्ठायां क्रिया फलाश्रयत्वम।
पतंजलि ने लिखा है कि सत्य में यदि कोई प्रतिष्ठित है, तो उसकी वाणी में संपूर्ण क्रियाओं के फल आ जाएंगे। सत्य बोलने वाला यदि कह देगा, तो पापी भी स्वर्ग चला जाएगा। सत्य की आवश्यकता पूरे संसार को है। सत्य बोलने से सच्ची शक्ति उत्पन्न होती है।

अस्तेय - यम का तीसरा अंग है अस्तेय। महर्षि ने लिखा है - 
अस्तेय प्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्। 
चोरी के अभाव के स्थिर होने पर योगी के सामने हर प्रकार के रत्न उपस्थित हो जाते हैं। हमें चोरी नहीं करना चाहिए। बेईमानी से दूसरे का हक हम ले लें, यह चोरी है। हेराफेरी भी चोरी है। पूरी दुनिया की समस्या है, लोग छल कपट अनेक तरह के गलत हथकंडों से दूसरे की वस्तु, जमीन, संसाधनों को अपना बना लेते हैं, संपूर्ण मानव जाति चोरी से त्रस्त है। योग और यम के लिए अस्तेय आवश्यक है।

ब्रह्मचर्य - योग के लिए ब्रह्मचर्य बहुत आवश्यक है। महर्षि पतंजलि ने कहा कि आपको मन को काबू में करना है, तो ब्रह्मचारी बनना पड़ेगा। ब्रह्मचर्य धर्म का मूल है। आज इतनी बीमारियां हो रही हैं, लोग दुर्बल होते जा रहे हैं, इसका कारण है कि मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर रहा है। आपको तन से मन से वचन से मैथुन का परित्याग करना होगा। मनुष्यों की क्षमता कम होती जा रही है, जो दुर्बलता हो रही है, उसका कारण है कि मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर रहा है। 

अपरिग्रह - महर्षि पतंजलि ने लिखा - 
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोध:। 
आज योग के प्रचार का एक बड़ा विकृत स्वरूप आ गया है, धन कमाना। लोग शुल्क ले रहे हैं। उपनिषदों में लिखा है संग्रह उतना ही करना चाहिए, जितने में जीवन का निर्वाह हो जाए। नहीं तो आदमी इसी चिंता में मरता रहता है कि धन की रक्षा कैसे होगी। अपरिग्रह होना चाहिए। आज जो लोग योग के प्रचार में लगे हैं, उनमें से ज्यादातर बड़े परिग्रही लोग हैं। उनमें धन जुटाने की प्रबल भावनाएं हैं। कथित योगियों को पता ही नहीं कि यम क्या होगा, नियम क्या होगा, समाधि कैसे लगेगी। जो योग के अच्छे विद्यार्थी भी नहीं हैं, आज ऐसे लोग योग के प्रचारक बन बैठे हैं। योगी को अपने साथ आवश्यकता भर का सामान ही रखना चाहिए। जिन ऋषियों ने योग का प्रचार किया वे सर्वथा अपरिग्रही थी, आज भी ऐसे लोग हैं, लेकिन कम हैं। यदि संग्रह में आप पड़े रहेंगे, तो योग नहीं कर सकते, यम नहीं कर सकते। स्पष्ट लिखा है पतंजलि ने - अपरिग्रही को सभी तरह के फल की प्राप्ति होगी, उसे बैठे-बैठे ही सभी रत्नों की प्राप्ति होगी।
क्रमश: 

योग का उद्देश्य समझिए -2

यह आवश्यक है कि हम अपने चित्त को अनुशासित करें, इन्द्रियों को अनुशासित करें, लेकिन प्रश्न है कि हम कैसे अपने चित्त को अनुशासित करेंगेे। 
उदाहरण के लिए, जब हम अपने घर से बाहर होते हैं, तो हमें वह शांति नहीं मिलती, जो घर आकर मिलती है। बाहर हमारी चंचलता बढ़ती है, अशांति बढ़ती है, अपने कमरे में भी हम जब अपने बिस्तर पर आ गए और जब हमने अपने चित्त को समाहित करके कुछ समय बिताया, तो हमें बहुत आनंद होता है। योग दर्शन के अनुसार, यह बहुत बड़ा समाधान है कि हम अपने मन के फैलाव को रोकें। भगवान की दया से यह कैसे किया जाए, यह चिंता संसार को अनादि काल से रही है कि हम अपने चित्त को कैसे समाहित या एकाग्र करें, जो मन विभिन्न विषयों-चीजों से जुड़ रहा है, जो कभी शांति को प्राप्त नहीं कर रहा है, उसे हम कैसे जोड़ें, उसे हम कैसे रोकें। इसके लिए महर्षि पतंजलि ने सबसे अच्छा समाधान बताया। उन्होंने लिखा - 
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान समाधयोष्टावंगानी।
अर्थात हम यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के माध्यम से अपनी चित्त वृत्तियों को रोकने का प्रयास करें। वास्तव में ये आठ अंग हैं योग के, इसे अष्टांग योग भी कहा जाता है। यहां योग का अर्थ समाधि है। अभी अधिकतर लोग योग की शुरुआत आसन से करते हैं, लेकिन केवल आसन करने से ही चित्त वृत्तियां निरुद्ध नहीं होंगी। हमें योग के सबसे पहले अंग यम को अपनाना पड़ेगा। आज योग प्रचारकों का जो समुदाय है, वह पहली भूल यही कर रहा है कि वह लोगों से यम का परिचय नहीं करा रहा है। आज के योग प्रचारक योग के दो शुरुआती अंगों - यम, नियम को छोडक़र सीधे आसन पर आ जाते हैं। यह बहुत बड़ा धोखा है। आज यह एक बड़ी विडंबना है, यह समाज के साथ घातक प्रयोग है। 
पहले यम, फिर नियम, फिर आसन, फिर प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और अंत में समाधि को प्राप्त करना होता है, यह योग के ही चरण हैं। हम धीरे-धीरे परीक्षाओं को पास करते हैं, विभिन्न चरणों से होकर विकास करते हैं, ठीक उसी प्रकार योग भी विभिन्न चरणों से बारी-बारी गुजरता है। यम, नियम को नहीं छोडऩा चाहिए। जो लोग यम, नियम को छोडक़र आगे बढऩे का प्रयास कर रहे हैं, वे गलत कर रहे हैं, समाज को भटका रहे हैं।
यम के भी पांच भाग हैं। महर्षि पतंजलि ने लिखा 
- अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्र्रहायमा:  
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ये पांचों यम हैं। अहिंसा कहते हैं हिंसा के अभाव को। योग के पहले अंग का पहला स्वरूप अहिंसा है। अहिंसा की प्राप्ति होगी, तो ही आदमी चित्त को एकाग्र कर पाएगा। अहिंसा का बड़ा व्यापक अर्थ है, किसी को किसी भी तरह से दुख नहीं पहुंचाना। न वाणी से न शरीर से, जब हम प्राण वायु को नष्ट करने का प्रयास करते हैं, तो इसी को हिंसा कहते हैं। लेकिन जब हम कटु वाणी का प्रयोग करते हैं, उससे भी हिंसा होती है। इसका भी प्रयोग नहीं होना चाहिए। जब हम किसी की समाप्ति का या नुकसान पहुंचाने का संकल्प करते हैं, तो यह भी हिंसा है, यह नहीं होना चाहिए।
क्रमश: 

चंचल चित्त की चिंता - योग का उद्देश्य समझिए

(स्वामी रामनरेशाचार्य जी के प्रवचन से, जो उनकी नई प्रवचन पुस्तिका में शामिल है)
शास्त्रीय चिंतन परंपरा के जो अत्यंत उत्कृष्ट स्वरूप हैं, उनमें वेद, उपनिषद, स्मृतियां, पुराण, दर्शन इत्यादि समाहित हैं। मूलभूत वेदों के जो मानवोपयोगी अत्यंत श्रेष्ठ विचार हैं, जो मनुष्य जीवन को पूर्णता प्रदान करने वाले हैं, वेदों में ही उनका मूल है। उनको ऋषियों ने समझा, उनका साक्षात्कार किया और उनको लोगों को देने के लिए विभिन्न दर्शनों के रूप में निर्मित करके, उस परंपरा को, उस ज्ञान निधि को समाज को प्रदान किया, उसमें योग दर्शन भी एक है। वेदों को लोगों तक पहुंचाने के लिए यह ऋषियों का प्रयास था। जैसे योग अनादि हैं, सृष्टि अनादि है, उसी तरह से दर्शन शास्त्रों के चिंतन भी अनादि हैं। ऋषियों ने उन्हें जैसा देखा, समझा और वैसा ही लोगों को दिया। यह कोई आम लोक का चिंतन-विचार नहीं है, जो तत्वदर्शी नहीं होते। भारतीय परंपरा में योग दर्शन एक अत्यंत महत्वपूर्ण दर्शन है। यह कोई ऐसा ज्ञान नहीं था, जिसे यहां-वहां से लिया, यहां-वहां से देखकर लिखा, जो भी उल्टा-सीधा समझ में आया, उसे अनेक उद्देश्यों से लोगों तक पहुंचाया। इसी तरह आजकल अपरिपक्व ज्ञान के लोग ही ग्रंथ लिखते हैं, जो संपूर्ण स्वरूप को नहीं समझते। आज ऐसे अनेक लोग होने लगे हैं, जो ज्ञान की उच्चा अवस्था को प्राप्त नहीं करते, वे भी अध्यापन करते हैं, दूसरों को सिखाने की चेष्टा करते हैं। लेकिन ऋषियों ने ऐसा नहीं किया था। उन्होंने योग को पहले स्वयं के जीवन में उतारा और उसके बाद ही व्यापक लोक कल्याण के लिए पूरे संसार को प्रदान किया।
जीवन को पूर्णता देने के लिए जीवन को प्रकाशित करने के लिए जीवन को बाहर-भीतर से उज्ज्वल बनाने के लिए योग आवश्यक है। योग संसार के सभी लोगों के लिए ऑक्सीजन के समान, प्राण वायु के समान नितांत आवश्यक है। ऐसा नहीं है कि केवल भारत के ही लोगों के लिए योग का ज्ञान आवश्यक है या सनातन धर्म के लोगों के लिए ही आवश्यक है, अपितु यह ऐसा जीवनोपयोगी संसाधन है या ऐसी व्यवस्था है, ऐसी चिंतन प्रक्रिया है, जो ईश्वर के वरदान स्वरूप ऐसा आशीर्वाद है, ऐसा अवदान है कि जिसकी संसार में सभी लोगों को आवश्यकता है। योग से सभी को जुडऩा चाहिए और अपने जीवन को आगे बढ़ाना चाहिए।
योग दर्शन को महर्षि पतंजलि ने संसार के सामने लिखकर उद्घाटित किया था। महर्षि पतंजलि ने योग व्याख्यान की जब प्रतिज्ञा की कि मैं योग का व्याख्यान करूंगा। योग का एक अर्थ होता है जोडऩा। इसमें कोई संदेह नहीं कि अपनी शक्ति, अपने संसाधनों को जोडऩे से ही हमें जीवन में उत्कर्ष की प्राप्ति होती है। हम श्रेष्ठ फल से जुड़ें, श्रेष्ठ लोगों से जुड़ें, श्रेष्ठ समाज से जुड़ें, श्रेष्ठ कर्म और ज्ञान से जुड़ें, श्रेष्ठ साधनों से जुड़ें। यहां योग दर्शन में योग का अर्थ समाधि है। महर्षि पतंजलि ने व्याख्यान किया कि संसार में जितनी भी कठिनाइयां हैं, जितनी भी क्रियाएं हैं, उन सबका मूल चंचलता ही है। जितना संसार दिख रहा है, वहां बड़ी चंचलता है। चित्त जब जड़ पदार्थों से जुड़ता है, तो भटकता है। कष्टों का एक ही कारण है - हमारा चित्त चंचल है। जैसे पशु-पक्षी भटकते रहते हैं कहीं भी उन्हें संतोष नहीं होता, कहीं भी उन्हें सुकून नहीं मिलता। ठीक उसी तरह से हम भी भटकते हैं, तरह-तरह की चीजों से अपने चित्त को जोड़ते हैं, उसी अनुरूप चित्त का आकार बढ़ाते-बनाते हैं। चित्त भटकता ही रहता है। इसलिए महर्षि पतंजलि ने कहा कि चित्त के भटकाव का निरोध होना चाहिए। योग का यही अर्थ है। चित्त वृत्तियों का थमना जरूरी है। चित्त वृत्तियां निरुद्ध हो जाएंगी, तो हमारे जीवन की कठिनाइयां नष्ट हो जाएंगी और हमें पूर्ण जीवन प्राप्त होगा। यह सबके लिए जरूरी है, यह केवल हिन्दू के लिए नहीं है। संपूर्ण काल के लिए संपूर्ण संप्रदाय के लोगों के लिए है, यह सबके लिए परमोपयोगी है। क्रमश:

Saturday, 4 November 2017

ऐसे संत कम हैं

रामबहादुर राय


ऐसे संत कम हैं, जो विद्वान भी हैं और अपनी बात ढंग से रख सकते हैं। इनकी जो पहली योग्यता दिखती है, वह है अपने पंथ के बारे में और उसके इतिहास के बारे में बचपन से ही आकर्षण। यह भी नहीं है कि मठ के आकर्षण ने उन्हें संत बनाया हो। कई बार ऐसा भी होता है, मठ का वैभव लूटने के लिए लोग संत बन जाते हैं। बनारस में जहां ये रहकर पढ़े-लिखे हैं, एक संस्कृत विद्यालय में। उस संस्कृत विद्यालय के सामने साहित्यकार मनु शर्मा रहते थे, उनके बहुत सारे उपन्यास हैं। तब मनु शर्मा की इन सब चीजों में रुचि नहीं थी, लेकिन मनु शर्मा कीधर्मपत्नी रामनरेशाचार्य जी को (तब वे रामनरेशाचार्य नहीं हुए थे) बहुत मानती थीं और अपने परिवार में यह चर्चा करती थीं कि इस लडक़े को यहां से निकालना चाहिए, बहुत प्रतिभा है, बहुत क्षमता है और संस्कृत पढक़र ये भविष्य में क्या करेंगे।.. लेकिन ये उनका अपना स्नेह था, जो बालक रामनरेशाचार्य जी पर बरसता था। इससे यह मालूम होता है कि साधना करके वे यहां तक पहुंचे हैं। यह स्वाध्याय और प्रार्थना का बल है, जो वे यहां तक पहुंचे हैं। यह बात उनमें दिखाई भी पड़ती है, जो व्यक्ति स्वाध्याय और साधना से ऊपर उठता जाता है, उसमें एक स्वाभिमान भी होता है, जो रामनरेशाचार्य जी में भरपूर दिखता है।
धारणा तो यह है कि वे दिग्विजय सिंह के करीब हैं और कुछ हद तक कांग्रेस हाईकमान के भी. मेरी धारणा यह है कि दिग्विजय सिंह चूंकि रामानंद जी के एक प्रिय शिष्य संत पीपा के वंशजों में से एक हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से रामनरेशाचार्य जी का उनसे भावनात्मक लगाव है। परन्तु हम यह नहीं कह सकते कि दिग्विजय सिंह जैसा चाहेंगे, वैसा रामनरेशाचार्य जी को चलाएंगे। संत को या एक मठाधीश को जिस तरह से स्वतंत्र रहना चाहिए, वो सारी चीजें उनमें दिखती हैं। इसीलिए जो इनके कामकाज हैं, सारा कुछ रामानंद संप्रदाय के लिए है। मेरा मानना है, यह अकेला संत संप्रदाय है हिन्दू समाज में, जिसमें बहुजन हैं। यानी समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व है और यही वजह थी कि जब समाज पर संकट था, तो इसमें वैरागी भी थे, इसमें संन्यासी भी थे। उस परंपरा को आज के संदर्भ में जीवित करने और उसमें नई जान डालने की कोशिश रामनरेशाचार्य जी कर रहे हैं और ये करते हुए उनके सामने साधनहीनता का संकट भी रहता है, किन्तु ज्यादा झुककर किसी से मदद लेने वाले वे नहीं हैं। एक सामाजिक सरोकार भी उनके मन में रहता है, जो इस संप्रदाय का स्वाभाविक पक्ष है।
मेरा थोड़ा-बहुत संपर्क है, कई ऐसे लोगों से जो मठों पर काबिज हैं। मैं देखता हूं कि ज्यादातर मठाधीश मठ की सत्ता और मठ की संपत्ति में ही डूबे रहते हैं, फंसे रहते हैं। इसके विपरीत रामनरेशाचार्य जी तटस्थ दिखते हैं और यह उनके व्यक्तित्व में भी प्रकट होता है। जहां वे चातुर्मास करते हैं, वहां हर वर्ग के लोग जुटते हैं, शायद ही किसी अन्य संत के चातुर्मास में इतने और इतनी विधा के लोग जुटते हैं। शायद ही किसी अन्य संत के चातुर्मास काल में आज के जो प्रासंगिक विषय हैं, उन पर चर्चा होती हो, लेकिन रामनरेशाचार्य जी ने एक सिलसिला शुरू किया है। यह सिलसिला बिल्कुल नया है। यह आगे बढ़ता है, तो बहुत उपयोगी होगा।
राजनीतिक रुझान भी उनमें मुझे लगता है, लेकिन सत्ता वगैरह के कारण नहीं, बल्कि जहां इनको ठीक लगता है, वहां राजनीतिक हस्तक्षेप का भी वे प्रयास करते हैं और समाज में उसका संदेश भी जाता है। जैसे २००९ के चुनाव में उन्होंने बनारस में मुरली मनोहर जोशी के पक्ष में कोई भाषण तो नहीं किया, बैठे-बैठे ही उन्होंने अपने लोगों को यह कहा कि यहां जो चुनाव हो रहा है, उसमें ये विद्वान आदमी हैं, ठीक आदमी हैं और माफिया के मुकाबले में इन्हें जिताना ठीक रहेगा। इसका असर भी हुआ।
श्रीमठ का महत्व
पंचगंगा घाट पर रामानंद संप्रदाय की मूल पीठ श्रीमठ स्थित है और पंचगंगा घाट बनारस में एक छोर पर है, जहां वरुणा गंगा में मिलती हैं, उससे थोड़ी ही दूर पर काशी स्टेशन के पास पहले पंचगंगा घाट है, वहीं से बनारस शुरू होता है। या तो गलियों से होकर आप वहां जा सकते हैं या सीधे नाव से जा सकते हैं। मेरा खयाल है कि काशी विश्वनाथ मंदिर को तोडऩे के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब ने दूसरा निशाना साधा पंचगंगा घाट के श्रीमठ पर। हमले के बाद रामानंद जी के केवल दो पदचिन्ह वहां बचे रह गए। श्रीमठ जीर्ण-शीर्ण हो गया था, उसका रामनरेशाचार्य जी ने पुनरोद्धार किया है और जैसी व जितनी जगह है, वहां श्रीमठ को एक जीवित केंद्र के रूप में इन्होंने पुन: स्थापित किया है।
(रामबहादुर राय अपने समय में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे हैं। जेपी आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी, उन्होंने जनसत्ता और नवभारत टाइम्स में महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है, दिल्ली के जाने-माने पत्रकार हैं. प्रधानमंत्रियों तक उनकी पहुँच रही है, उनकी अनेक किताबें प्रकाशित हैं। उनके विचारों को राजनीति, पत्रकारिता व संत समाज में भी पूरी गंभीरता से लिया जाता है।)

महर्षि मनु भाग - 7

: दुनिया के पहले संविधान निर्माता :
दान कैसे होता है, तीर्थ यात्रा कैसे होती है, माता-पिता की सेवा कैसे होती है। ये कौन सिखलाएगा सबको? मुसलमानों को पता है क्या कि माता देवी स्वरूप क्यों है, कैसे हमें उसका ऋण उतारना होगा। बच्चों को कैसे अध्ययन करना है, यह कौन बताएगा, मोबाइल से वेदाध्ययन होगा क्या? कोई चरित्रवान कैसे बनेगा? चारों ही वर्णों को, कौन कत्र्तव्य बताएगा, ब्राह्मण का, क्षत्रिय, वैश्य का शूद्र का। जो लोग घृणित हो गए हैं, उन्हें क्या मिल रहा है। अमेरिका आज भी रंगभेद की दलदल में है। काले-गोरे की भावना नहीं जा रही है। यह जातिभेद से भी घृणित है। यहां जो सम्मान मिला जातियों का बंटवारा होने के बाद ही, यह कहीं नहीं मिला है। जब मनु द्वारा संवद्र्धित संसार को देखा जाएगा, तब मनुवाद अभिशाप के रूप में पक्षपात के रूप स्वीकार नहीं किया जाएगा। 
मनु ने कहा कि वेद धर्म के मूल हैं। जो हमारे जीवन को बढ़ाने वाला है, वह धर्म है। जैसे सूर्य और चंद्रमा को हम कभी नहीं छोड़ पाएंगे, उसी तरह संसार के सभी मनुष्यों को कल्पित पद्धतियों से जीवन जीने वाले जैसे-तैसे जीवन जीने वाले मनु स्मृति का जरूर अध्ययन करें। परिपक्व रूप में मनु स्मृति को अपने जीवन में उतारें, अपने चरित्र में उतारें, तो उनके विकास को कोई रोक नहीं पाएगा। 
मनु को श्रेय देना चाहिए। मनु स्मृति को श्रेय देना चाहिए। उन नेताओं को सीखना चाहिए, जो समाज को वोट के लिए बांट रहे हैं। राष्ट्रपति भवन में आम आदमी जाने लगे, तो वह तो चौराहा हो जाएगा। बड़े लोगों से मिलने की मर्यादा है। बड़ा काम करने की मर्यादा है।
मनु सृष्टि के आदर्श हैं, अतुलनीय और प्रेरक हैं। सभी तरह के श्रेष्ठ जीवन से सज्जित हैं। मनु की संतानों को ही मानव कहते हैं। मनु को गाली देने वाले, स्वयं दूषित हो गए, जो लोग मनुवाद को नुकसान पहुंचाकर आगे बढऩा चाहते हैं, वे स्वयं भी लांछित हो गए। उनकी पार्टी के लोग ही कहने लग गए कि ये केवल धन के लिए, स्वार्थ के लिए जी रहे हैं, उन्हें गरीबों से कोई लेना-देना नहीं है, दलितों से कोई लेना देना नहीं है, ये तो जमींदारों से भी आगे निकल गए हैं। मनुवाद की जिन विकृतियों को वे निशाना बना रहे थे, वही विकृतियां स्वयं उनमें आ गईं। 
मनु की प्रेरणा से ही भारत को विश्व गुरुत्व प्राप्त हुआ, लेकिन हम यह बात भूल गए। भारतीय संविधान जो धर्मनिरपेक्ष संविधान बन गया। भारत का संविधान बनाते हुए हमने अनेक देशों के संविधान का नकल किया, लेकिन मनु के संविधान को नहीं देखा। यह देश मनु का देश है, हमारे रक्त में उनका अंश है। तपस्वी का देश है, लेकिन हमने सृष्टि के पहले लिखित संविधान को उपेक्षित कर दिया। स्वतंत्र आधुनिक भारत के संविधान में मनु रचित संविधान को भी लेना चाहिए। यह सोचना था कि धर्म को कैसे जोड़ा जाए, केवल संविधान में यह लिखने से नहीं चलेगा कि सत्यमेव जयते। 
सोचना चाहिए था कि सत्य को कैसे जोड़ा जाए। केवल लिख देने से लोग सत्य नहीं बोलने लगेंगे। सत्य की व्याख्या मनु से पूछिए, सत्य का प्रयोग मनु से पूछिए, वर्णों, आश्रमों का वर्गीकरण मनु से पूछिए। हमारा दुर्भाग्य है कि समाज कल्याण के मनु मार्ग को छोड़ दिया गया। 
भगवान ने सोचा कि लोग कैसे रहेंगे, तो उन्होंने वेदों को बनाया। फिर स्मृतियों का जन्म हुआ। पहला ज्ञान अनुभव है और जब उसका स्मरण होता है, तो उसे स्मृति बोलते हैं। 
संपूर्ण संसार की मार्गदर्शक और सर्वोत्कृष्ट ऊंचाई, आनंद, सफलता देने वाली उसकी नियंत्रक प्रकाशक मनु स्मृति है। मनुवादी... मनुवादी कहकर अपने व्यक्तित्व को ही व्यक्ति लांछित न करे। संविधान में मनु की विशेषताओं को जोड़ा जाता। धर्मनिरपेक्षता ने हमें कुछ नहीं दिया। अनेक लोग हैं, जो इस देश के स्वरूप को नष्ट करने में लगे हुए हैं। यदि हम मनु स्मृति के अनुरूप देश को चलाते, तो भारत अभी भी पूरी तरह से विश्व शुरू होता। मनु के अनुरूप चलते तो हम लौकिक और परालौकिक विकास करते। निस्संदेह, हमें विकसित भारत के निर्माण के लिए मनु की शरण में जाना चाहिए। उनसे सीखना चाहिए।

जयसियाराम

महर्षि मनु भाग - 6

: दुनिया के पहले संविधान निर्माता :
ईश्वर सबके लिए हैं, उनमें कोई पक्षपात नहीं है। वेदांत में पढ़ाया जाता है कि भगवान में कोई पक्षपात नहीं है। वैसे ही मनु के लिए भी कहा जाएगा कि वे कहीं भी पक्षपात नहीं करते। मनु का ज्ञान परिपक्व ज्ञान है। दुर्भाग्य है कि लोग मनु स्मृति का उपहास करते हैं, लोगों को कहा जाता है कि मनुवादी हैं। 
मनु ने जैसे जीवन को खड़ा किया, कैसे परिवार, समाज को खड़ा किया, कैसे उत्तम जीवन जीया। और दूसरी ओर, उनकी आलोचना करने वालों का जीवन कैसा है? क्या उनमें मनु जैसे तपस्वी राजा-महर्षि पर कुछ बोलने का अधिकार है? आज घृणित जीवन जीने वाले भी मनु को कोसते हैं। 
वर्गीकरण के बिना आज भी संसार नहीं चलता। हर जगह श्रेणियां हैं, उसी के अनुरूप मकान मिलते हैं, वेतन मिलता है, भत्ते मिलते हैं, सुविधाएं मिलती हैं। आप सोचिए, चपरासी को भी अगर आईएएस के समान सुविधाएं मिलने लगेंगी, तो कौन आईएएस बनने के लिए जीवन लगाएगा, मेहनत करेगा। 
वर्गीकरण तो होगा ही। सुंदर-असुंदर, त्यागी भोगी का वर्गीकरण होगा ही। गरीब-अमीर का वर्गीकरण होगा ही। मनु ने जो व्यवस्था प्रदान की, वह कोई ऐसे ही नहीं दे दिया, पहले उन्होंने अपने बच्चों में और प्रजा में इसका प्रयोग किया और उसके बाद संसार को दिया। 
चरित्र की शिक्षा वही दे सकता है, जो स्वयं चरित्रवान है। ज्ञानी ही ज्ञान दे सकता है। सभी को मनु स्मृति का पाठ करना चाहिए। कैसे हम अपने जीवन को धर्म से जोड़ें, हमें क्या जपना है, क्या करना है, कोई भी ऐसी चीज नहीं है, जिसे मनु ने अंतिम स्वरूप में नहीं कहा। 
मनु से किसी ने पूछा कि हम धर्म को कहां खोजने जाएं।
मनु ने उत्तर दिया कि वेद ही धर्म का उत्स है और कहीं जाने का अर्थ नहीं है, आप वेदों की शरण में जाइए। क्रमश:

महर्षि मनु भाग - 5

: दुनिया के पहले संविधान निर्माता :
स्मृतियों को भी हमारी परंपरा में पूर्ण सम्मान-मान्यता पात्र है, स्मृतियां तभी प्रामाणिक होती हैं, जब वे वेद सम्मत होती हैं। वेद के अभिप्रायों का ही स्मृतियां स्मरण दिलाती हैं। आम आदमी तक वेद को पहुंचाने का यह प्रयास है। पहले यह वर्णन था कि वेद को सभी लोग नहीं पढ़ेंगे। तो कहा गया कि जो वेद नहीं पढ़ सकता, वह स्मृतियों को पढ़े, उपनिषद को पढ़े, पुराणों को पढ़े, इतिहास पढ़े। परिष्कार होता गया। बाद में समस्त समाज को यह अधिकार मिला कि वेद कोई भी पढ़ सकता है। लेकिन यह बताइए कि देश की गोपनीय फाइलों को सभी लोग पढ़ते हैं क्या? युद्ध के लिए जो बड़े हथियार बने हुए हैं, क्या वो आम आदमी को दिए जाते हैं, बनाने वालों को ही यह हथियार रखने का अधिकार नहीं है। हथियार निर्माता के परिवार वालों को ही ये हथियार नहीं मिल सकते। कहा गया था कि जिनका संस्कार, उद्देश्य, सक्षमता, जीवन पवित्र नहीं है, वे वेद कैसे पढ़ेंगेे, लेकिन जो वेद नहीं पढ़ सकते हैं, उनके लिए स्मृतियों, उपनिषदों का अवतरण हुआ।
मनु स्मृति सबसे पुरानी स्मृति है। कहा जाता है कि वेदों के बाद मनु हुए। वेदों की व्याख्या हुई, स्मृति आई। मनु जी ने उन्हें समाज, विश्व के लिए सरलीकृत किया। राजा होकर भी तपस्वी होना, परम फल प्राप्ति के लिए प्रयास करना और उसे प्राप्त करना पूरे विश्व के सामने आदर्श है। 
रामराज्य के संस्थापक को पुत्र के रूप में प्राप्त कर लेना। ईश्वर के द्वारा नियंत्रित और सभी प्रकार के उत्कर्ष को प्राप्त कर लिया। राम जी जिनके पुत्र हुए। ऐसे मनु जी के द्वारा जो ग्रंथ बना मनु स्मृति - यह दुनिया का पहला संविधान है। 
एक जगह मैंने पढ़ा था। मुस्लिम राष्ट्र के सुप्रीम कोर्ट में एक आदमकद की प्रतिमा लगी है महर्षि मनु की और लिखा है कि दुनिया के सर्वप्रथम संविधान के निर्माता महर्षि मनु। मनु ने हर तरह के जीवन को जीया, गृहस्थ आश्रम से वामप्रस्थ तक और अंत में भगवान को भी प्राप्त किया। राजा, पिता, पति, दादा के रूप में जीए, राम के पिता होने के रूप में जीवन। मनु स्मृति संपूर्ण संसार का शास्त्र है। मनु ने जो संविधान बनाया, जब किसी देश का पता नहीं था, तब वेदों के अभिप्राय को समझा और मनु स्मृति को प्रस्तुत किया। 
क्रमश:

महर्षि मनु, भाग - 4

: दुनिया के पहले संविधान निर्माता :
ठीक उसी तरह मनु ने कहा कि मुझे आपके जैसे पुत्र की प्राप्ति हो। शास्त्रों में लिखा है, ईश्वर दूसरा कोई नहीं होता, ईश्वर के समान ईश्वर ही होता है, उससे अधिक की तो कल्पना ही नहीं। भगवान की समकक्षता किसी में नहीं है। कोई भगवान से अधिक कैसे होगा? मनु ने मांग लिया। उसके लिए ही उन्होंने तप किया था, जिसके लिए खाना, पीना त्यागा, जीवन का कोई अन्य उद्देश्य नहीं, मनु के जीवन का, अस्थियों का ढांचा मनु हो गए थे, भगवान ने यह देखा। 
भगवान की आज्ञा का जो लोग पालन करते हैं, वे भगवान पर उनका उपकार है। भगवान को और कुछ नहीं चाहिए। जैसे उन्होंने कहा कि सत्य बोलो, तो सच ही बोलना चाहिए। भगवान ने कहा कि देखो धन संग्रह ज्यादा नहीं करो। अपरिग्र्रह करो। मनु जी के संपूर्ण जीवन को देखकर भगवान ने कहा, आपने तो अच्छा मांग लिया, कोई संसार या और कुछ नहीं मांगा, मेरे जैसा पुत्र मांग लिया। 
भगवान ने वरदान दिया। जाइए, मैं अयोध्या में आपके पुत्र के रूप में जन्म लूंगा। मनु ही राजा दशरथ हुए और शतरूपा ही कौसल्या हुईं। भगवान ने पुत्र के रूप में उनके यहां जन्म लिया। ध्यान रहे कि भगवान कोई ऐसे ही नहीं मिल जाएंगे, भगवान कोई ऐसे ही आपके यहां जन्म नहीं ले लेंगे, इसके लिए पूरे प्रयास करने पड़ेंगे। संयम-नियम, शास्त्र अनुकूल चलना होगा। 
मनु की शुरुआत शास्त्रीय मर्यादाओं, जीवन को दिव्य स्वरूप देने वाले संसाधनों से हुई। जीवन भर जो लोग एक ही काम करते रहते हैं, वे अदूरदर्शी हैं। सभी को यह तय करना चाहिए कि इतने दिनों तक ही हमें कमाना है, इतने दिनों तक ही हमें काम के लिए प्रयास करना है। भोग की भावना कोई ऐसे ही नहीं जाएगी। एक सीमा होने चाहिए, भोग की, धन की। हमें जो सर्वश्रेष्ठ जीवन मिला है, वह केवल भोग के लिए नहीं है। 
कैसी सृष्टि होनी चाहिए, कैसे चलनी चाहिए, इसके लिए मनु ने मनु स्मृति का निर्माण किया। यह उनका एक महान कार्य है। उपकार है विश्व पर। यह सनातन धर्म का धर्मशास्त्र है। हमें कैसे जीवन जीना है, इसे कैसे बिताना है, क्या इसका कोई नियंत्रक होना चाहिए? समाज, राष्ट्र विश्व को संचालित करने के लिए मनु स्मृति की रचना हुई। मानव के संवद्र्धन, परम फल प्राप्ति अभियान का शास्त्र है मनु स्मृति।
क्रमश:

महर्षि मनु, भाग - 3

: दुनिया के पहले संविधान निर्माता :
वर्षों वर्ष बीत गए। उनको अपने जीवन के परम सार्थकता की चिंता हुई, तो उन्होंने राजपाट अपने संतानों को संभलाकर तप करने निकल गए। आदमी हजारों हजारों साल तक भोग कर ले, सभी भोग के साधन उसके पास हों, कहीं किसी तरह का अभाव नहीं, कहीं किसी तरह का अवरोध नहीं, भोग से कभी शांति नहीं मिलती। यह बड़ी विडंबना है कि अनादिकाल से लोग इसी क्रम में जीवन जीते हैं, कैसे भी धन आए और कैसे भी धन से हम जीवन जीएं। हमारे भोग की शक्ति कम नहीं हो, हम दिन भर खाएं, हम दिन भर देखें, लेकिन आंखों में कष्ट न हो, भोग करें, हम दिन भर चलें, लेकिन पैरों में दिक्कत नहीं हो। कभी हममें किसी तरह का अवरोध नहीं आए। इन बातों को ध्यान में रखकर ही ज्यादातर लोग जीवन जी रहे हैं। लगे हैं कि भोग में कहीं से भी कोई न्यूनता नहीं आए। इन बातों को ध्यान में रखकर जो लोग जीवन जी रहे हैं, उनके सामने मनु जी ने अपने जीवन और अभिव्यक्ति के बल पर सर्वोच्च जीवन का उदाहरण प्रस्तुत किया। इसे भी परम विश्राम या मोक्ष कहते हैं। 
संसार में जो आप देख रहे हैं ईश्वर को ही देख रहे हैं। जल देख रहे हैं, वायु के रूप में अनुभव करते हैं, लेकिन ईश्वर के साक्षात रूप में हम नहीं देखते। मनु ने वन में घूम-घूमकर संयम नियम व्रत किया। भगवान की दया से उन्होंने मांगा कि जो परम भगवान हैं, जो सबका पालन करते हैं, जिनके कारण सूर्य और चंद्रमा हैं, जो समय से उगते-डूबते हैं। जिनके प्रभाव से वायु नियंत्रित है, जिनके कारण समुद्र मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, जिनसे वह नियंत्रित होता है। शास्त्रों ने जिन्हें कहा कि वह सर्वत्र व्यापक है, वही बनाते, पालन करते, संहार करते हैं, कर्म फल वही देते हैं। सबकी आत्मा हैं जो, आत्मा की भी आत्मा हैं जो। 
मनु को पूरा ज्ञान था, उनके मन में यह बात आई कि भगवान का दर्शन हो जाता। आंखों से दर्शन। संसार में जहां आप देख रहे हैं, ईश्वर को ही देख रहे हैं। जल, पृथ्वी, वायु, समुद्र के रूप में देखते हैं, किन्तु ईश्वर को साक्षात रूप में हम नहीं देख पाते हैं। ईश्वर के दूसरे रूपों को देखते हैं, साक्षात नहीं देखते। जो माया निर्मित है, उसे देखते हैं। मन में आना चाहिए कि हम भगवान को देखें, जैसे हमारे मन में आता है कि किसी कलाकार को देखें, विभिन्न क्षेत्रों के बड़े लोगों को देखें। 
उन्हें देखने का मन जो है, वह ईश्वर को देखने का ही मन है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है, यह जीवन की परम सार्थकता का साधन नहीं बन पाएगा। जब तक हम उसे ईश्वर के रूप में नहीं देखें। हमारी दृष्टि जब व्यापक होगी, संपूर्ण संयम-नियम से सज्जित होगी, तभी हम उन्हें देखने की योग्यता वाले हो सकेंगे। तुलसीदास जी ने लिखा है - सियाराम मय सब जग जानी 
मनु को इच्छा हुई कि भगवान का साक्षात दर्शन करें। आकाशवाणी हुई, भगवान ने कहा, हम आएंगे। बड़े लोग कहते हैं कि मांगो, भगवान जब प्रसन्न होते हैं, तो कहते हैं कि मांगो। श्रेष्ठतम जीवन वालों को ही यह अवसर मिलता है भगवान से सीधे कुछ मांगने का। 
मनु जी ने कहा कि हमने संसार को खूब नजदीक से देखा है, सब हमको मिला, लेकिन स्थायी शांति, परम शांति, परम उद्देश्य नहीं प्राप्त हुआ। सब भोग प्राप्त हुए, लेकिन आप प्राप्त नहीं हुए। भक्ति मार्ग में संत भगवान से अर्थ, काम, मोक्ष से नहीं मांगता, वो भगवान से कहता है कि हमें और कुछ नहीं चाहिए, केवल आपकी प्रसन्नता व प्रेम चाहिए, भक्ति चाहिए। भक्त लोग भगवान से केवल उनकी भक्ति को चाहते हैं। क्रमश:

महर्षि मनु भाग - 2

: दुनिया के पहले संविधान निर्माता :
मनु जी तो ब्रह्मा जी से ही प्रकट हुए संसार की संरचना के लिए। जप-तप से संतानोत्पत्ति का प्रयास किया। उनको दो पुत्र और तीन कन्याएं हुईं। दो पुत्र उत्तानपाद और प्रियव्रत। तीन पुत्रियां - आकूति, प्रसूति और देवहूति। धीरे-धीरे उनके विवाह का समय हुआ। ये सब संतानें समाज के लिए ईश्वर के लिए जीवन जीने वाली थीं। पुराणों में वर्णित है कि जो मनु जी के पुत्र प्रियव्रत जी बड़े भक्त हुए। प्रियव्रत जी ने पृथ्वी को सात भागों में विभक्त किया था। उत्तानपद भी बड़े भक्त हुए, महान धु्रव जी इन्हीं के पुत्र थे। आकूति का विवाह महर्षि ने रुचि प्रजापति से किया। देवहूति का विवाह महर्षि कर्दम से हुआ, जिससे सांख्यशास्त्र के प्रणेता महर्षि कपिल का अवतार हुआ। कपिल जी की बड़ी महिमा है, वे ज्ञानी के रूप में ही उत्पन्न हुए। अभ्यास से व्यक्ति ज्ञानी होता है, तब आदमी विद्वान बनता है, लेकिन जिसने पिछले जन्म में अभ्यास किया है, वह पिछले जन्मों के संस्कार के आधार पर, जो यहां नहीं भी पढ़ा है, तो उसमें ज्ञान स्वयं प्रकट हो जाते हैं। वे अच्छे रूप में अपने भावों को प्रकट करने लगता है। 
मनु जी की तीसरी पुत्री प्रसूति का प्रजापति दक्ष से विवाह हुआ। सृष्टि का क्रम प्रारंभ हुआ और उसका विस्तार होता गया। सभी उनके दामाद, पुत्र, पौत्र इत्यादि पूरे परिवार के लोग बड़े संस्कारी थे, क्योंकि शुरू से ही उनके जीवन को सही ढंग से सींचा गया था। इन संतानों की ऋषियों, शास्त्रों में बड़ी आस्था थी। शास्त्रों से प्रेरित जीवन में उनकी आस्था थी, उसी के अनुरूप जीवन शैली, समस्त व्यवहार और जीवन को परम फल देने वाले कार्य उन्होंने किए। सृष्टि का क्रम चला। बढ़ता गया। संसार बढ़ा। 
मनु का अपना जीवन भी सर्वश्रेष्ठ था। वे भगवान के साक्षात पुत्र थे और उन्होंने सृष्टि उत्पादन के क्रम को जो शुरू किया, तो उन्होंन अपने लोगों को भी इसी तरह से तैयार किया। जो भी उत्पन्न हो, वह विशुद्ध मानव हो, वह लौकिक जीवन भी शास्त्रों के तहत ही जीए। केवल कमाना और भोग करना ही जीवन नहीं है। ईश्वर की सेवा में समर्पित होना भी जीवन है। लौकिक और परालौकिक जीवन दोनों ही इससे संभव होते हैं। सत्यं शिवं सुन्दरं इससे संभव होता है। क्रमश:

महर्षि मनु : दुनिया के पहले संविधान निर्माता

(रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के प्रवचन का अंश)
हमारी पौराणिक मान्यता है, सृष्टि को ब्रह्मा जी ने प्रकट किया। ब्रह्मा विष्णु महेश एक ही शक्ति के रूप हैं। कर्मों, गुणों के आधार पर उनका अलग अलग नाम पड़ जाता है। एक ही वायु जब हमारे नाकों से होकर जाती है, तो उसी वायु को प्राण वायु, अपान वायु इत्यादि कहते हैं। भगवान की दया से ब्रह्मा, विष्णु, महेश एक ही शक्ति के नाम हैं, सृष्टिकर्ता के रूप में ब्रह्मा पालन शक्ति के रूप में विष्णु और संहारकर्ता के रूप में महेश जी का नाम आता है।  
ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना की, तब ब्रह्मा जी ने अपने शरीर से दंपती को प्रकट किया, पति मनु और पत्नी शतरूपा। उनको अधिकृत किया। तब जल में निमग्न पृथ्वी थी। भगवान की सहायता से उसका उद्धार होना था। ब्रह्मा जी से उन्होंने कहा कि पृथ्वी तो निमग्न है, इस पर लोग कैसे उत्पन्न होंगे। कैसे इस पर रहेंगे उनका पालन कैसे होगा। तो ब्रह्मा जी ने भगवान से प्रार्थना की, आप इस पृथ्वी को जल से निकालें। तब भगवान ने अवतार लेकर पृथ्वी को जल से निकाला। परमपिता ब्रह्मा जी की कृपा से यह हुआ। अपने सनातन धर्म की यह मान्यता से सभी सहमत होंगे कि केवल वासना से उद्वेलित या प्रेरित होकर जो हम पुत्रोप्ति का क्रम अपनाते हैं, वह गलत है। संतति तो संयमी हो, श्रेष्ठ हो। श्रेष्ठ संतति का संकल्प होना चाहिए। केवल संतति होने से काम नहीं चलेगा। संतान ऐसी होनी चाहिए, जो गौरव बने। जो अपने ऋषियों की महिमा को, उनके ज्ञान-विज्ञान को विस्तार करने के लिए सोचे, पितरों की शांति के लिए भी प्रयास करे, समाज के लिए ईश्वर के लिए जीवन जीए। केवल अपने लिए ही कमाना और खाना यह कोई बड़ी बात नहीं है। 
संयम, नियम से मन को विशुद्ध करके संतान उत्पन्न करने की बात होनी चाहिए, तभी सही संतति उत्पन्न होगी। इसके लिए शास्त्रों में काल का भी वर्णन हो। जब संतति उत्पत्ति के लिए मन हो, तो कैसा आचार-विचार होना चाहिए, यह सब वर्णित है। तभी ऐसी संतति उत्पन्न होती है, जो पूरे संसार के लिए उपयोगी होगी। अब तो ऐसी संतानें भी होने लगी हैं, जो अपनों का भी ध्यान नहीं रखतीं। 
क्रमश:

Wednesday, 28 June 2017

पायो परम बिश्रामु

समापन भाग
नारी के साथ भी ऐसा ही है। वह सुख देने वाली है, सेवा देने वाली है, परिवार को सही राह पर रखने वाली है, वह पुत्र को जन्म देती है, लेकिन अगर वह गलत दिशा में जा रही है, तो क्या किया जाए? यहां ताडऩा का मतलब पीटना नहीं है। आंख दिखाना भी ताडऩा है, सुधारने के लिए धमकाना भी ताडऩा ही है। कोई न माने, तो ताडऩा में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन यह मानना कि मारने के लिए ही लिखा गया है, ऐसा किसी परंपरा में नहीं है। कोई प्यार करता है, पीटना हुआ क्या, नारी पर ही घर को छोड़ दिया जाता है, बीमार पडऩे पर नारियों का भी उपचार कराया जाता है, कोई वहां अस्पताल में उन्हें पीटता है क्या?
अमरीका में  २५ प्रतिशत से ज्यादा अश्वेत लोग जेलों में हैं, क्यों? वे अपराध करते हैं, इसलिए उनके साथ ऐसा करना पड़ा है, इसे कोई गलत कहेगा क्या? ऐसा नहीं है कि हर अश्वेत को जेल में डाल दिया जाता है। 
देखना पड़ेगा, नारियों को जिस तरह से भारत में अनादिकाल से मान मिला, वैसा कहीं नहीं मिला। गोस्वामी जी ने जब रामायण शुरू किया, तो सबसे पहले नारी का ही नाम लिया। प्रथा तो सबसे पहले गणेश जी की पूजा की है, लेकिन गोस्वामी जी ने कहा कि मैं नारी का पक्षधर हूं, सीता जी के लिए ही जीवन जीता हूं। उनकी वंदना से शुरुआत हुई। महर्षि वाल्मीकि ने तो रामायण का नाम ही सीताचरित रखा है। यहां लक्ष्मी जी, दुर्गा जी, सरस्वती जी, सारी जो मुख्य शक्तियां वे देवियां हैं। अपने देश में जब लोकतंत्र आया, तो इंदिरा गांधी को लोगों ने सबसे बड़े पद पर पहुंचाकर आदर दिया, वर्षों तक पद पर रखा, यदि यह धारणा होती है कि नारी तो पीटने ही योग्य है, तो उन्हें कौन प्रधानमंत्री बनाता। सोनिया गांधी आज नारी हैं, लेकिन पूरी पार्टी के लोग उन्हें सिर पर लिए हुए हैं। ऐसा किस देश में है, कहां है। अमेरिका में ऐसा है क्या, चीन में इतने बड़े-बड़े नेता हुए, नारी कहां है, उनकी पत्नियां कहां हैं? कहां गईं? दुनिया में नारी को बड़े पद पर चढऩे नहीं दिया गया, लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ। धर्म के सबसे बड़े क्षेत्र उत्तर प्रदेश में भी मायावती जी को भी पूरा सम्मान दिया गया। 
जहां जरूरत पड़े, वहां ब्राह्मण की भी ताडऩा होती है, क्षत्रिय की भी होती है, केवल शूद्र की ही नहीं होती। सुधार के लिए ही ताडऩा होनी चाहिए। यह कोई दूषित परंपरा नहीं है, यह कोई आलोचना नहीं है, यह कोई संकीर्णता से जुड़ी परंपरा नहीं है। यहां देखिए कि मंदोदरी का कितना सम्मान है, रावण को शिक्षा देती है। तारा का कितना सम्मान है। बाली को मारा। पूछा बाली ने कि आपने क्यों मारा?
उत्तर दिया, जब तुम्हें मालूम हो गया कि जब मैं पक्षधर हो गया सुग्रीव का, तब तुम्हें युद्ध नहीं करना चाहिए था। तुमने छोटे भाई की पत्नी को ही रख लिया। जिस पत्नी के साथ एक छत के नीचे तुम रहते हो, मोक्ष के अवलंब के रूप में उसे स्वीकार करते हो, जो घर की संरक्षिका है, जो घर का प्रकाश है, कितने तरह के अवसर तुम्हें उसके साथ सुख के मिलते हैं, तुमने उसकी सही बात को नहीं माना। इससे अधिक नारी का सम्मान क्या होगा?
इसलिए धर्म में स्त्रियों की बराबर की सहभागिता है। पुरुष जलता है हवन में तो वह दाहिने हाथ में हाथ लगाती है और पुण्य में आधी भागीदारी होती है। गोपियों को समाज ने जाने दिया, तभी तो भगवान के यहां गईं भक्ति की आचार्य हो गईं, तो यह सम्मान है कि जाने दिया, माताओं का कितना बड़ा सम्मान है।  
जब राम जी जंगल में जाने लगे, तो उनकी 350 माताएं थीं। राम जी ने कहा कि जैसे मैंने कौसल्या, कैकयी, सुमित्रा को सम्मान दिया, आपके लिए भी वैसा किया है, आपको पिता दशरथ जी का पत्नी माना, इसलिए माना, क्योंकि जो हमारे पिता के लिए सम्मान स्नेह प्रदर्शित करता है, जो यह कहता है कि मेरा जीवन इनको सुख देने के लिए है, उसे मैं सम्मान अवश्य दूंगा। कोई भूल हुई हो, तो क्षमा करना, पुन: मैं १४ वर्ष बाद आपकी सेवा में हाजिर हो जाऊंगा। 
वाल्मीकि रामायण में यह लिखा है।
ताडऩा के बारे गोस्वामी जी ने लिखा, केवल सुधार के लिए। ऐसा उदाहरण होना चाहिए कि जिससे दूसरों को समझ में आए। उनमें संकीर्णता का कोई भाव नहीं है। सभी लोगों को वे समान भाव से जोड़ते हैं। राम जी निषादराज को गले लगा रहे हैं। सारी दुनिया को सीखना चाहिए कि यह कोई संकीर्ण परंपरा नहीं है। हमारी परंपरा हमारी शिक्षाएं उज्ज्वल हैं। सनातन धर्म आकाश के सामान उदार है, सभी के लिए है, सबके लिए उसमें सम्मान की भावना है, विकास के लिए प्रेरणा है। सभी तरह की शक्ति देने का उदार भाव है। गोस्वामी जी को सही भाव से देखते हुए उनकी बातों को समझना चाहिए और तभी हमें सुख मिलेगा। 
जयसियाराम

ढोल गंवार शूद्र पशु नारि

भाग - ५
गोस्वामी जी के साहित्य में जो स्थापनाएं हैं, उनके विचारों के क्रम में ऐसे विचार भी प्रकट हुए, जिन्हें आपदात: देखने से लगता है कि वे संकीर्ण विचाराधारा के हैं, उनका विचार सांप्रदायिक है। वे संकीर्ण दायरे से प्रेरित होकर चल रहे हैं, यह भी उन पर लांछन लगता है।  
ढोल गंवार शूद्र पशु नारि सकल ताडऩा के अधिकारी
ढोल की ताडऩा में किसी को दिक्कत नहीं है। उसे जोर से लगाना ही पड़ता है, तभी आवाज निकलती है। जो आदमी विचारों से विकसित नहीं है, बिल्कुल ही कुछ नहीं समझता है, विवेकहीन है, शास्त्र का अध्ययन नहीं किया, इसके लिए उसे डराकर उसे विकास के लिए प्रेरित करना, इसमें विवाद नहीं है कि गंवार आदमी को रास्ते पर लाना चाहिए। 
छोटी आयु में ताडऩा की जरूरत पड़ती है, राम और कृष्ण को भी उनकी माता डराती थीं, कभी कान गरम करना भी होता होगा। अपने बच्चों को सही मार्ग पर रखने के लिए आज भी अभिभावक करते हैं। पशु को भी सत्संग सुनाकर आप श्रेष्ठ नहीं बना सकते। यह उचित नहीं है कि पशु से सबकुछ कराया जा सके, उसे अनुशासित रखने के लिए हम उसे डराते हैं, बांधते हैं, घेरते हैं। 
अब शूद्र की चर्चा। कितने शूद्रों के साथ राम की मुलाकात हुई, राम जी ने भी सबको गले लगाया, निषादराज, केवट शूद्र हैं। कोल-भील्ल, जो बड़े अपराधी हैं। उनको राम जी ने अपने प्रभाव से, स्नेह से उनमें परिवर्तन लाया। उन्हें किसी की पिटाई नहीं करनी पड़ी। न आंखें दिखानी पड़ीं, किसी तरह की ताडऩा की जरूरत नहीं पड़ी। जहां जो लोग नहीं मानते, जो लोग नहीं समझ पाते, उन्हें मारने के लिए राम जी ने धनुष उठाया। खर दूषण को मारा, राक्षस जाति के बहुत बिगड़े हुए लोगों को मारा। राम जी को कोई नहीं कहता कि वे शूद्र विरोधी हैं, क्योंकि असंख्य शूद्रों को उन्होंने श्रेष्ठ जीवन दिया। जहां औषधि काम नहीं करती, वहां डॉक्टर ऑपरेशन करते हैं। 
हम दवाई तभी तक लेते हैं, जब तक उसका असर दिखता है, लेकिन जब दवाई काम नहीं करे, तो ऑपरेशन करना ही पड़ेगा। जब यह लगता है कि किसी व्यक्ति को सुधारने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन प्रयास बार-बार नाकाम हो रहा है, तो उसका एनकाउंटर हो जाता है। बड़े अपराधी को भी अच्छे विचारों, कानूनों से सुधारने की भी कोशिश होती है। 
जो नहीं मानते, उनको सुधारने की वैदिक क्रिया मानी जाति है कि ताडऩा दी जाए। ढोलक को तभी पीटा जाता है, जब आवाज की जरूरत हो। ढोलक को भी कोई यों दिन-रात नहीं पीटा जाता। गलत लोगों को रास्ते पर लाने के लिए ताडऩा कई बार जरूरी हो जाती है। गलत लोगों के जीवन को सही जगह पहुंचाने के लिए ताडऩा अनुचित नहीं है। ऐसा नहीं है कि शूद्रों की पिटाई के लिए ही कहा गया है। पशु भी प्रिय होते हैं, लोग उनसे खूब प्यार करते हैं। उसे कोई यों ही नहीं ताडऩा देता। 
क्रमश:

पायो परम बिश्रामु

भाग - ४
अभी तमाम तरह की विकृतियों से युक्त जो लोग हो रहे हैं, उन्हें गोस्वामी जी को अवश्य पढऩा चाहिए। सभी लोग उसी रीति से प्रयास करें। रामचरितमानस कालजयी रचना है। गोस्वामी जी की सभी रचनाएं मानक हैं। 
सृष्टि के लिए सबकुछ शुभ-शुभ मंगल देने वाला, हमें उनके बारह ग्रंथों के रूप में प्राप्त हुआ। वह केवल किसी मरे हुए को जिंदा कर देना, किसी बीमार को जिंदा कर देना, ये चमत्कारिक घटनाएं बहुत छोटी हैं।
करपात्री जी महाराज कहते थे कि सनातन धर्म में ऐसे चमत्कार दिखाने वाले लौंडा महात्मा होते हैं। गंगा में पैदल चल गया, इससे मानव जाति या सृष्टि का कोई भला नहीं होगा। इससे तो बेहतर वे लोग हैं जो ठगी कर रहे हैं। जब तक आदमी सही कर्म से नहीं जुड़ेगा, उसका कल्याण नहीं होगा। 
गोस्वामी जी ने इतना सब किया, उनसे लोगों ने पूछा कि आपने क्या किया, आपको क्या मिला? उन्होंने उत्तर दिया - पायो परम विश्राम... मैंने परम विश्राम को प्राप्त कर लिया। अब कभी थकावट नहीं होगी। हमने धन्य जीवन को प्राप्त कर लिया। राम जी की कृपा से ही यह प्राप्त हुआ। 
जैसे मनुष्य राष्ट्र के लिए सबकुछ करे, लेकिन महत्व ईश्वर को दे। उनकी कृपा से ऐसा हो गया। हनुमान जी ने लंका में खूब काम किए, लेकिन कहा कि मैंने कुछ नहीं किया, जो भी किया राम जी की कृपा से किया। 
राम भाव और रावण भाव में यही फर्क है। लंका के लोग कहते हैं कि यह जो भी किया मैंने किया, मैंने ही किया, लेकिन अयोध्या के लोग कहते हैं, जो किया ईश्वर ने किया, उन्हीं की कृपा से सब संभव हुआ। भारत से सारी बुराइयों को निकालने का मार्ग यही है कि कर्म का श्रेय ईश्वर को दिया जाए। गोस्वामी जी के पास कर्म योग भी है, ज्ञान योग भी है। कहा लोगों ने कि यह पहला महाकाव्य है कि जिसमें इतिहास भी है, दर्शन भी है, काव्य भी है, ऐसा कोई भी महाकाव्य नहीं है, जिसे इतिहास भी कहा जाए, काव्य भी कहा जाए और दर्शन भी कहा जाए। 
उनके ग्रंथ सूर्य के समान हैं, जो सबको जीवनी शक्ति देता है। गोस्वामी जी भक्त शिरोमणि हैं। हनुमान जी को भी भक्त शिरोमणि कहा जाता है, वे भक्त भी हैं ज्ञानी भी हैं, कर्मयोगी भी हैं। लोगों को धन्य जीवन देने वाले, करोड़ों लोग इससे प्रेरित होकर जीवन जी रहे हैं। 
संपूर्ण संसार के लोगों को यह कहना चाह रहा हूं कि शास्त्रों के संदर्भ में देखिए कि हम क्या कर रहे हैं, कहीं गलत तो नहीं कर रहे। सब शास्त्र सम्मत कर रहे हैं क्या? धन कमाना, परिवार कमाना, शक्ति कमाना, साथ-साथ ईश्वर प्रेम से ओतप्रोत होना। भगवान की संतुष्टि के लिए हम कर्म करें। लोगों को दिखाने के लिए हम न करें। गोस्वामी जी का जो जीवन काल है, उससे लेकर आज तक वे एक बड़े समुदाय के लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। 
हमें उन पर चर्चा करते हुए और भी खुशी हो रही है कि वे रामानंद संप्रदाय की परंपरा से आते हैं। जिस पीठ में मैं सेवारत हूं, उसकी चौथी पीढ़ी में गोस्वामी जी का अवतरण हुआ। रामानंदाचार्य जी के शिष्य अनंतानंद जी थे, उनके शिष्य नरहरिदास जी और उनके शिष्य हुए तुलसीदास जी। तुलसीदास जी ने लिखा है कि नरहरिदास जी अगर नहीं मिले होते, तो मैं नहीं मानता कि दया नाम की कोई चीज है। मेरा जीवन बिलख रहा था, कोई छाया नहीं थी, लेकिन नरहरिदास जी ने मेरे लौकिक जीवन को भी संभाला, ज्ञान की धारा से भी जोड़ा, सर्वश्रेष्ठ भक्ति की धारा में खड़ा करके मुझे धन्य बना दिया। 
कहा जाता है कि हनुमान जी ने राम जी को वश में कर लिया था, कहा जा सकता है कि गोस्वामी जी ने भी राम जी को वश में कर लिया। आपको जो भी चाहिए कि राम जी के जैसा जीवन करके प्राप्त कीजिए। हम सभी के लिए वे गौरव हैं। 
क्रमश:

Sunday, 16 April 2017

सब नर करहीं परस्पर प्रीती

पायो परम बिश्रामु
भाग - ३
संसार में तलवार के बल पर भी कई लोगों ने अपनी बात को स्थापित करने का प्रयास किया। जब वे अपने को सिद्ध मानने लगे, तो मक्का वालों को कहा कि आप लोग मेरी बात मानिए, मुझे ईश्वर दूत, प्रतिनिधि मानिए। वहां के लोगों ने कहा कि हम नहीं मानते कि आप ईश्वर का संदेश लेकर आए हैं, तो वे मदीना चले गए, वहां उन्होंने लोगों को अपने विचारों से सहमत किया। वह उनके मामा का गांव था, वहां से आकर उनके लोगों ने मक्का वालों को कहा कि जो बात मानेगा, वही मक्का में रहेगा। हमारी बात मानो।  
इधर तो राम जी सभा को संबोधित करते हुए कहते हैं कि मैंने जो कहा, उसमें जो भी गलत हो, वेद, शास्त्र और नीति विरुद्ध हो, तो आप मेरी बात को नहीं मानिए, कहीं से भी मैं हिंसक होकर, मनमानी करके मैं अपनी बात को आपसे मनवाना नहीं चाहता। 
लंका में भी उन्होंने तभी युद्ध किया, जब सारे अन्य प्रयास विफल हो गए। उनके संपूर्ण प्रयास सकारात्मक थे। आज दुनिया में तमाम तरह के ग्रंथ बनते हैं, लेकिन किसी की समकक्षता गोस्वामी जी के ग्रंथों से नहीं होती। वे केवल ईश्वर प्रेम को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। गोस्वामी जी ने वही किया, जो राम जी ने किया। 
कहा जाता है कि दुनिया में रामचरितमानस फिर बनने वाला नहीं है। कई लोग रामायण लिखकर गोस्वामी तुलसीदास बनना चाहते हैं, लेकिन यह संभव नहीं है। लेकिन लोगों के पास राम जी हों, तब तो ऐसे ग्रंथ की रचना हो। यदि राम जी मिल भी गए, तो तुलसीदास जी का मन कहां से लाएंगे। पूरी दुनिया में इस स्तर के महाकाव्य की रचना नहीं हो पाई। तुलसीदास जी की कोई तुलना नहीं है। उन जैसी प्रतिभा कहां से आएगी? 
इस दुनिया में जितने मांगलिक भाव हैं, उन सबका समुद्र ईश्वर माना जाता है। हमारा ईश्वर समुद्र है, उसके अवतार भी समुद्र हैं। यह केवल परोक्ष ज्ञान में नहीं है, अपरोक्ष ज्ञान में भी है। रावण को भी अपरोक्ष ज्ञान होता, तो वह महापाप नहीं करता। ज्ञान उसके हृदय में कभी नहीं उतरा। उसे केवल ऊपरी ज्ञान था। 
राम जी मनुष्यावतार हैं, वे सबकुछ जानते हैं, लेकिन उन्होंने ज्ञान का संग्रह किया। अपने चरित्र में ज्ञान को उतारा और अपने संपूर्ण अवतारकाल में लोगों को वह ज्ञान दिया, गुणों को प्रसारित किया, तभी रामराज्य की स्थापना हो पाई। सभी लोग उसी तरह से जीवन जीने लगे। रामराज्य में लोग केवल राम जी से ही प्रेम नहीं कर रहे हैं, उनमें परस्पर भी प्रीति है। 
सब नर करहीं परस्पर प्रीती
ईश्वर के लिए समर्पित होकर हम कर्म करें। इससे ऐसे समाज की रचना होती है, जो समाजवाद कभी नहीं कर सकता, लोकतांत्रिक पार्टियां ऐसा नहीं कर सकतीं। ईश्वर को नहीं मानने वाला भी कर्मयोगी कहलाता है, महर्षि अरविंद ने ऐसा उल्लिखित किया। वेदों, पुराणों को नहीं मानने वाला भी बोलता है कि मैं कर्म योगी हूं। वेदों से जो धारा आई थी वाल्मीकि रामायण में, उसमें एक अद्भुत स्थापना हुई, गोस्वामी जी केवल कर्म की शिक्षा नहीं देते, केवल ज्ञान या भक्ति की शिक्षा नहीं देते, ईश्वर को समर्पित होकर, जो विधान शास्त्रों में वर्णित है, उनके अनुरूप स्वयं चलते भी हैं। कहा जाता है कि यहां के ऋषियों ने पूरी दुनिया को ज्ञान दिया। भारत में अभी भी विश्व गुरुत्व है। छोटे उद्देश्यों के लिए जीकर कोई विश्व गुरु नहीं होता। लिखा है मनु ने कहा कि श्रेष्ठ ऋषियों ने ब्राह्मणों ने संपूर्ण संसार को चरित्र की शिक्षा दी। हम पहले स्वयं को चरित्रवान बनाते हैं और उसके बाद ही दूसरों को चरित्रवान बनने के लिए प्रेरित करते हैं। रामराज्य में भी ऐसा ही होता है। रामजी पहले स्वयं चरित्र शिरोमणि हैं, उसके बाद ही उनका व्यापक प्रभाव समाज पर दिखने लगता है। संसार को चरित्र की शिक्षा भारत ने ही दी है। 
गोस्वामी जी ने अपने संपूर्ण जीवन में ज्ञान को प्रकट किया। उसे अपने चरित्र में उतारा, जैसे राम जी ने अपने संपूर्ण काल में चरित्र के माध्यम से संसार को राम राज्य का स्वरूप दिया कि कैसे आदमी को होना चाहिए, उसी दिशा में गोस्वामी जी के प्रयास हैं। वे केवल भक्त नहीं हैं, केवल कवि नहीं हैं। 
आज कई कविता बनाने वाले हैं, जिनका जीवन कहीं भी ज्ञान से नहीं जुड़ा है, जिनका जीवन दुराचारों से जुड़ा है। 
जब तक हमारा ज्ञान चरित्र में नहीं उतरे, तब तक कुछ भी सिद्ध नहीं होगा। आज भी जो लोग राम जी के रास्ते पर चलकर अपना जीवन संवारने में जुटे हैं। जनता की सेवा में जो लगे हैं, उन्हें भी प्रेरित होने की जरूरत है। नौकरी करने वालों को भी गोस्वामी जी के अभियान से जुडऩा चाहिए। हम केवल कर्म के संपादक नहीं बन जाएं, केवल हम तोते जैसे रटंत नहीं बन जाएं। जैसे तोता बोलता है कि शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, उसमें फंसना नहीं, लेकिन वह स्वयं फंस जाता है, क्योंकि उसे जाल का पूरा ज्ञान नहीं है। क्रमश:

पायो परम बिश्रामु

भाग - २
यह गोस्वामी जी ने कैसे कह दिया कि मैं स्व सुख के लिए ग्रंथ रच रहा हूं। स्व का जो अर्थ है, आत्मा केवल हमारी आत्मा नहीं, भगवान की आत्मा। 
संपूर्ण पृथ्वी भगवान का शरीर है। जैसे जल शरीर है। वैसे ही हमारी आत्मा भी है। आत्मा की भी आत्मा भगवान हैं। अपने भगवान राम की खुशी के लिए गोस्वामी जी ने रामायण की रचना की, इसी में उनका जीवन धन्य हुआ और यह काम दूसरों के लिए लाभप्रद हुआ। 
गोस्वामी जी अपने संपूर्णजीवन में जिन कर्मों, जिन मान्यताओं को, जिन विधाओं, परिपाटियों, जीवन जीने के क्रमों को वेदानुकूल स्मृतियों, पुराणों, इतिहासों ने बताया था, उन सभी क्रमों, नीतियों, सिद्धांतों को लोगों को बतलाने का प्रयास किया और यह काम उन्होंने अपने ग्रं्रंथों के माध्यम से किया। इस संसार में 126 साल तक वे रहे। इतनी ही उनकी आयु मानी जाती है। विक्रम संवत 1680 में अस्सी घाट पर उन्होंने देह का त्याग किया। 
कई लोग यह भ्रम पाल लेते हैं, यह गलत है। तुलसीदास जी ने पारिवारिक जीवन के लिए अपने जीवन के लिए राष्ट्र के जीवन के लिए मौलिक अवदान दिया। यह अवदान औरों से उन्हें अलग करता है, उस पर मैं दृष्टि डाल रहा हूं। गीता ने यह नहीं कहा कि देश के लिए लडऩा चाहिए, गीता कर्म का विधान करती है, युद्ध के लिए प्रेरित करती है, अर्जुन को प्रेरित कर रही है कि संन्यासी नहीं बनना है, युद्ध करना है। सत्य और राष्ट्र के लिए युद्ध करना है, इसी से कल्याण होगा। केवल युद्ध से कोई कर्मयोगी नहीं बनता। केवल कर्म से व्यक्ति उसके बंधन में आ जाता है। उसमें दोष आ जाता है। 
गोस्वामी जी ने शास्त्रों में प्रतिपादित सिद्धांतों को ईश्वर भक्ति की चासनी में डुबोकर रचना की। गोस्वामी जी को अपूर्वता प्राप्त है, जो वाल्मीकि रामायण से प्रवाहित हो रही है, पुराणों से प्रवाहित हो रही है, उसके लिए गोस्वामी जी ने कहा कि यदि माता-पिता की आप सेवा करें, तो उस सेवा का स्वरूप वैसा ही होना चाहिए। भक्ति से हमें कुछ लेना नहीं है। माता-पिता की सेवा उनकी खुशहाली के लिए है। अपने कत्र्तव्य के अनुपालन के लिए है। हम परिवार की सेवा करें, जो हमारे माध्यम से संसार में आए हैं, उनकी सेवा करें। हम गायों की सेवा करें, अतिथियों की सेवा करें, किसी भी तरह से हम अपनी शक्ति को कहीं लगाएं। कर्मयोग का परिमापक यंत्र है। मनमानी कर्म से जीवन नष्ट हो जाता है। जैसे लंका वाले नष्ट हो गए। तुलसीदास जी ने कहा कि हम धर्म द्वारा नियंत्रित कर्म करें, लेकिन यह ध्यान रहे कि हम सभी कर्म ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए करें। वही उत्स है, वही आत्मा है, ईश्वर समर्पण के भाव से अपने स्वार्थों को नियंत्रित करके जब हम कर्म करेंगे, तो हमारा पारिवारिक जीवन भी अच्छा हो जाएगा। समाज, राष्ट्र, संसार का जीवन सुधर जाएगा। 
कुछ लोग इसे केवल भक्ति का ग्र्रंथ मानकर चलते हैं, यह भी पूरा सही नहीं है। यह सामाजिक ग्रंंथ भी है, पारिवारिक ग्रं्रथ भी है। राम जी के प्रभाव में कोल-भील्लों में भी सुधार आ गया। रामजी को देखकर उनके जीवन, संस्कार, कर्म देखकर संपूर्ण समाज राम जी की प्रसन्नता के लिए जीने लगे। कोल-भील्लों ने भी राम जी से कुछ नहीं मांगा, कोई लौकिक लाभ सिद्ध नहीं किया। इस तरह के भाव को तैयार करते हैं गोस्वामी जी। 
डॉक्टर, किसान, वकील इत्यादि सभी को गोस्वामी जी प्रेरित करते हैं, उनका एक ही लक्ष्य है कि हर परिवार में रामराज्य आए। जैसे राम जी ने अपने पिता के वचन की पालन के लिए घर छोड़ दिया, उन्होंने स्थापित किया कि मां देव है, पिता देव हैं, इनकी सेवा करेंगे, इन्हें प्रसन्न करेंगे, तभी रामराज्य आएगा। अयोध्या में अर्थ काम के लिए युद्ध नहीं होते। वहां से राम जी संसार को प्रभावित करते हैं। राम जी के पास सद्भाव है, वाणी है, मन है, ज्ञान है, वे सभी को खुश करते चलते हैं। वह आश्रमों में स्वयं जाकर ऋषियों को सुख देते हैं। जैसे राम जी ने बिना फल की आकांक्षा के जीवन जीया, संपूर्ण संसार के प्राणियों को धन्य जीवन दिया, परिपूर्ण जीवन दिया। उन्होंने अपने सभी कत्र्तव्यों की पालना की।  
गोस्वामी जी ने अपने सभी ग्रंंथों में इन्हीं स्थापनाओं को बल दिया। उन्होंने यह नहीं सिखाया कि कैसे भी पैसा कमा लो। उन्होंने उच्च जीवन के साथ धन कमाना सिखाया है। 
गीता संत सैनिक बनाती है। उसमें संतत्व भी होता है और सैन्य भाव भी होते हैं। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस व अपने अन्य ग्रंथों के माध्यम से प्रकाश पूंज तैयार किया। यह महत्वपूर्ण है कि हमें जीवन के इन सभी सकारात्मक क्षेत्रों में प्रेरित होने की जरूरत है। हमें यह ध्यान रहे कि हम केवल अपना स्वार्थ नहीं चाहें। ईश्वर की प्रसन्नता के लिए अपने जीवन को समर्पित करें। तुलसीदास जी के हर वाक्य की प्रेरणा चिंतन की अनादि परंपरा से जुड़ी हुई है। क्रमश:

पायो परम बिश्रामु


(गोस्वामी तुलसीदास जी पर महाराज स्वामी रामनरेशाचार्य जी का प्रवचन)
गोस्वामी तुलसीदास जी कवि जगत के शिरोमणि हैं। दुनिया में कवियों की जो शृंखला है, दुनिया में प्रशस्त जो कवि हुए सभी भाषाओं में, सभी धर्मों में, तो उनके कवित्व का एक महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी में जो कवि हुए, जिसे राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त हो गया, उसमें गोस्वामी तुलसीदास की समकक्षता आज तक किसी को नहीं मिली है। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस का निर्माण किया, चार सौ वर्षों से भी ज्यादा हो गए। मैं छोटा था, चतुर्थ सदी मनाई गई थी मानस की। संवत 1631 में रामनवमी के दिन मंगलवार को उन्होंने रामचरितमानस की रचना की शुरुआत की थी। दो वर्ष से ज्यादा समय लिखने में लगा। उनका रचनात्मक जीवन श्रेष्ठ है, उनमें सहज भाव है, प्रेरक स्वरूप है। महाकाव्य कितने बने, उसमें रामचरितमानस को कोई अतिक्रमित नहीं कर पाया। इतने दिनों में दुनिया में कितने परिवर्तन हुए। अपने देश में सत्ता बदली, कोई ऊपर हो जाता है, कोई नीचे हो जाता है, गुलामी गई, अंग्रेज गए। इतने वर्षों में हृदय को कंपित कर देने वाली कौन सी विद्या है कि तुलसीदास जी का जो अमर काव्य है, उनके जो दूसरे ग्रंथ हैं, उन्हें पार करना तो दूर किसी को उनकी समकक्षता ही प्राप्त नहीं हुई है। मैं हिन्दी की बात कर रहा हूं। गोस्वामी जी दुनिया के सबसे बड़े कवि हैं। सभी तरह की संपन्नता इस महाकाव्य में है, यह समकक्षता किसी को प्राप्त नहीं हो पाई। जैसे भगवान की कोई बराबरी नहीं कर सकता, वैसे ही रामचरितमानस की बराबरी कोई नहीं कर सका है। यह कृति उनके ही व्यक्तित्व को ऊंचाई नहीं देती, पूरी हिन्दी भाषा को ऊंचाई देती है। हिन्दू संस्कृति, हिन्दू विचारधारा, चिंतन, राम भक्ति धारा को उन्होंने ऊंचाई पर पहुंचा दिया। 
रविन्द्रनाथ टैगोर को लोग विश्व कवि बोलते हैं, विचारकों में कवियों में उन्हें बड़ा स्थान प्राप्त होता है, लेकिन रामचरितमानस की समकक्षता टैगोर की रचना गीतांजलि को नहीं मिल पाई। टैगोर को दुनिया में साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान नोबेल मिला था, लेकिन उनकी लोकप्रियता-उपयोगिता वैसी नहीं हुई। आज मंगल भवन अमंगल हारी को एक रिक्शाचालक भी जपता है। रामचरितमानस की पहुंच घर-घर तक है। गोस्वामी जी ने समाज को अत्यंत परिष्कृत, परिपूर्ण ज्ञान प्रदान किया है।  
भगवान की दया से द्वादस ग्रं्रंथों को तुलसीदास जी ने समाज के लिए रचा। उन्होंने पैसा कमाने के लिए ऐसा नहीं किया। किसी को प्रभावित करने के लिए उन्होंने ऐसा नहीं किया। कौन-सा लौकिक प्रयोजन था, गोस्वामी जी ने महर्षि वाल्मीकि की परंपरा में रहते हुए कहा कि मैं सब कुछ कहूंगा जो शास्त्र अनुकूल होगा, प्रेरक होगा, भारतीय संस्कृति का संरक्षक होगा। मैं यह जो कर रहा हूं वह मेरी साधना है। इससे श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होगी, सबको इससे लाभ होगा। परिवार, समाज राष्ट्र और संपूर्ण संसार की उन्नति होगी। कहा गोस्वामी जी ने रामचरितमानस के प्रारंभ में, मैं राम जी के चरित का वर्णन कर रहा हूं। मैं अपने सुख के लिए राम जी के गुणों का गायन कर रहा हूं। 
स्वान्त: सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा
भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति।
इससे लोग समझते हैं कि गोस्वामी जी ने अपने सुख के लिए ही ग्रं्रंथ लिखा। लोग यहां भूल कर देते हैं, संत तो दूसरों के लिए ही जीवन जीता है। जो संपूर्ण प्राणियों की भलाई के लिए समर्पित हो, सतत कर्मशील हो, श्वांस श्वांस, हर चेष्टा सभी प्राणियों की पीड़ा को मिटाने के लिए संत जीते हैं। संत का स्वरूप विशाल होता है। भक्ति मार्ग में यह बात कही जाती है कि भक्त वह है, जो अपने सुख की परवाह नहीं करता, वह अपने भगवान के सुख के लिए प्रयास करता है। उसके सुख में ही वह सुखी होता है। जैसे गोपियों का अपना सुख गौण है, वे केवल भगवान कृष्ण के सुख के लिए जीवन जीती हैं। उनमें कोई लौकिक इच्छा नहीं है, कभी नहीं कहा कि आपको हमारे सुख के लिए ऐसा करना चाहिए। राम भक्ति परंपरा में राम भी दूसरों को सुख देते हैं और लोगों को जोड़ते हैं। क्रमश:

Tuesday, 11 April 2017

अबलौं नसानी, अब न नसैहौं

समापन भाग 
भगवान कितने खुश हो रहे होंगे कि हम लोग इस घनघोर कलयुग में भी सत्संंग में बैठे हैं। अभी दुनिया में करोड़ों-करोड़ों लोग क्या-क्या कर रहे होंगे, आप भी घर में होते, तो कुछ करते ही, मैं भी कमरे में होता, तो कुछ करता, लेकिन अभी जो मैं कर रहा हूं, उससे अच्छा नहीं करता और जो आप कर रहे है उससे अच्छा नहीं कर रहे होते। 
अभी हम लोग मोक्ष यज्ञ के संपादन में लगे हैं। यह सबसे बड़ा काम है। हम कानों का उपयोग कर रहे हैं, हम मन का उपयोग कर रहे हैं, हम चित्त का उपयोग कर रहे हैं, अहंकार का उपयोग कर रहे हैं, हम अपने पैरों का उपयोग कर रहे हैं। हम अपने शरीर के सभी अंगों का उपयोग कर रहे हैं। भगवान की आराधना में धीरे-धीरे हमारा मन पिघल रहा है। विश्वास की ओर बढ़ रहा है। समर्पण की ओर बढ़ रहा है। निष्ठा की ओर बढ़ रहा है। आज नहीं तो कल भगवान को पिघलना ही होगा और पिघलकर हमें अपनाना ही होगा, गले लगाना ही होगा। इसके लिए भगवान अब रुक नहीं पाएंगे। जैसे उन्होंने कोल-भील्लों को गले लगाया। लेकिन संकल्प बड़ा होना चाहिए और पूर्ण रीति से होने की जरूरत है। मैं पंजाब में अपने भक्तों से पूछता हूं, तुम भी कुछ भजन कीर्तन करते हो या नहीं? पंजाब वाले भक्त क्या बोलते हैं, आप सुनो। पंजाब वाले भक्त कहते हैं, माढ़ा-मोटा पूजन करता हूं। मतलब थोड़ा-बहुत पूजन करता हूं। 
मैं उनको पूछता हूं, जब दुकान पर जाकर इतने घंटे बैठते हो, तो दो रुपए मिलते हैं, तो दो अगरबत्ती दो मिनट घुमाने से तुम्हें भगवान क्या देंगे, बतलाना तो। घंटा दो घंटा पढऩे से कोई आईएएस की परीक्षा पास करेगा क्या? थोड़ी-पढ़ाई से कोई बड़ी परीक्षा में टॉप करेगा क्या? दो चार दंड बैठक करने से हिंद केसरी होगा क्या? देश का सबसे बड़ा पहलवान होगा क्या? नहीं होगा। जो हम धन कमाने के लिए करते हैं, जो हम भोग कमाने के लिए करते हैं, जो हम धर्म कमाने के लिए करते हैं, उससे बहुत ज्यादा जब हम मोक्ष कमाने के लिए करेंगे, तो हमारा जीवन धन्य होगा। जगद्गुरु वल्लभाचार्य जी ने लिखा है, (नाथद्वारा बहुत बड़ा संस्थान है उनके भक्ति मार्ग का) अर्थ कहते हैं धन को, धन कमाने के लिए हम कितना प्रयास करते हैं, तो भगवान तो परमार्थ हैं, परम अर्थ हैं, सबसे बड़ा धन हैं, उन्हें कमाने के लिए बहुत-बहुत लाखों-लाखों करोड़ों-करोड़ों गुणा ज्यादा प्रयास की जरूरत है, अधिक प्रयास की जरूरत है। अभी वाला कम प्रयास नहीं चलेगा। दो मिनट केवल ध्यान, पूजन करने से, इलायची दाना भोग लगाने से। भगवान को इलायची दाना नहीं चलेगा, भगवान का नाम पांच मिनट लेना नहीं चलेगा। आदमी अपने बच्चों को कितनी देर तक खेलाता, खिलाता है, लेकिन भगवान के पास बैठने पर दम घुटने लगता है। अभी आपको पता नहीं है, बाल स्वरूप भगवान की सेवा में घंटों-घंटों भगवान को वैसा करना पड़ता है, जैसा माता-पिता परिवार के लोग अपने बच्चों को मनोरंजन का संसाधन देते हैं। मैं देखकर हैरान हो जाता हूं, इन माताओं में भगवान को अद्भुत रूप से अनुकूल बनाने की क्षमता है। क्योंकि ये बच्चों को बहुत देर तक रिझाती हैं। रोते हैं, तो चुप कराना, हंसाना, उसके मन को परिवर्तित करना, उसका सारा रोम-रोम खिला देना, अपने अनुकूल व्यवहार से, मुंह बनाकर, बोलकर, आंखों से, हाथों, पैरों को उपयोग करके, सभी प्रकार के संसाधन से माताएं ऐसा करती हैं, तो वे भगवान के लिए भी ऐसा कर सकती हैं। 
भगवान ने हमें मनुष्य जीवन दिया है। हम अपने ही कर्मों से प्राप्त इस जीवन को, जो भगवान के परम अनुग्रह से हमें प्राप्त हुआ, उसका हम मोक्ष के लिए उपयोग करें। हमें स्वर्ग नहीं जाना है, हमें ब्रह्म लोक नहीं जाना है। हमें गणेश लोक नहीं जाना है। हमें देवी लोक नहीं जाना। हमें अब किसी दूसरे के लोक में नहीं जाना, हमें तो राम कृष्ण के लोक में जाना है। जहां जाने से लौटा नहीं जाता, वहीं मेरा धाम है।
आपको भी दिव्य जीवन की प्राप्ति हो, जय सियाराम। 

अबलौं नसानी, अब न नसैहौं

भाग - १४
हमारा जूता सीना भी कल्याण के लिए है। क्यों? जूता सीऊंगा, दो पैसे आएंगे, तो राम जी की माला लाऊंगा, भोग लगाऊंगा, जो संत आएंगे, उनकी सेवा करूंगा। और मैं भी उसका बचा हुआ खाऊंगा। यह धर्म का बहुत बड़ा स्वरूप है। स्वयं अर्जित करना और उसके आधार पर जीवन जीकर भक्ति करना। हम लोगों का कमजोर वाला जीवन है, मांग करके दूसरों के संसाधन के ऊपर अवलंबित होकर भक्ति करना। 
स्वजीवी, परोपजीवी, यह दो विभाग हैं। जूता सीना भी भक्ति है। एक बार रविदास जी की महिमा फैली, तो वहां के राजा आए और कहा कि मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं। रविदास जी ने कहा कि हमें जरूरत होगी तो बताऊंगा। बहुत-बहुत आपको आशीर्वाद, आप खूब भक्ति करें, गरीबों की सेवा करें, आप आए हमारे यहां, मैं धन्य हुआ, आप पर भी राम जी की कृपा बरसे। 
राजा ने कहा कि आप मांगिए, आप मुझसे सेवा लीजिए। 
धनवान लोग ऐसे ही कहते हैं। हमें भी एक धनी ब्राह्मण कह रहे थे कि चातुर्मास में हमारा भी भंडारा हो जाए, मैंने कहा, जब जरूरत होगी, तो हम आपके यहां कटोरा लेकर आएंगे। कोई फलोदी का था मनचला ब्राह्मण, नहीं माना, तो मैंने कहा, आप जाओ, जब आपका भंडार नहीं हुआ था, तब भी मैं प्रसाद पा रहा था और आगे भी पाऊंगा।   
रविदास जी ने भी कहा था कि चलो महाराजा, आपकी जरूरत होगी, तो कटोरा लेकर आपके द्वार आऊंगा। 
मैंने भी वैसा ही कहा। उनको अनुमान था कि वो ही पैसा देंगेे, तो ही चातुर्मास होगा। 
बताते हैं, वह राजा जाते-जाते संत रविदास को पारसमणि दे गया और कहा, इससे जो भी आप चाहें, बना लीजिए। किसी से कुछ मांगने की कोई जरूरत नहीं, जूता बनाने की जरूरत नहीं। 
रविदास जी ने कहा, रहने दीजिए, हम संतुष्ट हैं अपने जूता सीने से।
भक्त विनम्र होता है, इससे कौन लड़ेगा? राजा नहीं माना, तो अंत में रविदास जी ने कहा, आप इसे झोंपड़ी में कहीं रखवा दीजिए। राजा को बुरा लग रहा था, ये तो ले भी नहीं रहे हैं। उसने अपने मंत्री से कहा कि जहां कह रहा है, वहां रख दो। उसके बाद राजा एक साल तक पता करता रहा कि रविदास जी ने पारसमणि से सोना बनाया या नहीं बनाया। रिपोर्ट आती रही कि वैसे ही जूता सी रहे हैं, संत व भगवत सेवा वैसे ही हो रही है। 
अंत में राजा एक साल के बाद आ गए, राजा ने कहा, मैंने जो पारसमणि दिया था आपने उसका उपयोग नहीं किया। 
संत शिरोमणि ने कहा कि कोई जरूरत नहीं पड़ी, नहीं तो मैं जरूर करता। आपके राज्य में रहता हूं, आपका ही दिया हुआ खाता हूं, मैं क्यों नहीं करता? लेकिन मुझे लगा कि इसकी जरूरत नहीं है। 
राजा ने पूछा, कहीं आपने किसी को दे तो नहीं दी, बेच तो नहीं दी?
रविदास जी ने कहा, मैं क्षमा चाहता हूं कि मैंने तो देखा ही नहीं कि कहां रखा है, जहां आपने रखवाया होगा, वहीं होगी पारसमणि। 
मंत्री ने निकाला, उसी जगह पारसमणि टिकी हुई थी। एक साल बाद राजा अपनी पारसमणि ले गए।
न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। 
जब हमें भगवान उम्मेद भवन पैलेस देंगे, जब भगवान हमें सबसे महंगी गाड़ी देंगे, सबसे सुंदर पत्नी देंगे, सबसे सुंदर बेटा-बेटी देंगे। पोता, पोती देंगे, खूब पैसा देंगे, संपत्ति देंगे, सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा देंगे, क्या तभी हम भगवान को कहेंगे कि ओम जय जगदीश हरे...
तब तो कभी कल्याण होने वाला नहीं है। अभी जो संसाधन मिला हुआ है, जो जीवन मिला है, टेढ़ा-मेढ़ा, जैसा भी मिला है, जाति, माता-पिता, जो भाषा मिली, जो स्वभाव मिला, जो भी भोजन मिला, संस्कृति, सभ्यता, मर्यादा मिली, उसी में हमें भगवान की शरण में जाकर उनकी सेवा में लग जाना है। आप आए हो यहां, कितनी अच्छी बात है। आप मेरे लिए आए हो, केवल ऐसा ही नहीं है, हम भी अपने कल्याण के लिए आपके यहां आए हैं। हमारा भी कल्याण हो, आपका भी कल्याण हो, ऐसी भगवान से प्रार्थना है। आप भी अपने लिए आए हैं, मैं भी अपने लिया आया हूं। हम दोनों - श्रोता, वक्ता मिलकर एक ही सिद्धी के लिए तत्पर और समर्पित हैं। हमारा मन भगवान में लगे, समर्पित हो। 
क्रमश: