धर्म के ज्ञान से ही व्यक्ति को जीने की कला आती है.
Saturday, 15 July 2023
Wednesday, 5 July 2023
ब्रह्म या ईश्वर क्या है?
जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज
प्रवचन अंश - 5 जुलाई
वेदों में कहा गया कि जो इस संसार को बनाए, उसका पालन भी करे, और उसको अपने में छिपा भी ले। जैसे घड़ा टूटने के बाद मिट्टी में छिप जाता है। तिरोहित हो जाता है, उसे लोग घड़ा नहीं बोलते, मिट्टी बोलते हैं। कार्य अपने कारण में छिप जाता है, उपादान कारण में। सोने का आभूषण टूटने के बाद सोने में छिप जाता है और उसे कोई आभूषण नहीं कहता। कौन मकान बनाने वाला है, कौन उद्यान बनाने वाला है, ऐसे ही, जो भी कार्य दिखाई पड़ते हैं, उनके लिए आपके मन में जिज्ञासा होती है, तो आपके मन में यह जानने की इच्छा भी होनी चाहिए कि इस संसार को किसने बनाया। वेदों ने कहा, संसार को जो बनाता है, जो इसका पालन करता है, जो इसको अपने में छिपा लेता है, उसी को ब्रह्म कहते हैं। जिसमें तीनों ही तरह के चमत्कार की क्षमताएं हैं, बनाने की, पालन करने की और अपने में छिपा लेने की।
भूत का क्या अर्थ है? पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, इनको भूत कहते हैं। तभी तो हम लोगों के शरीर को पांच भूतों से बना हुआ कहा जाता है। छितिजल पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अधम शरीरा। यह तुलसीदास जी का वाक्य है। हमारे शरीर में पृथ्वी भी है, जल भी, तेज भी, वायु भी और आकाश भी।
हमारे शरीर में जो खुलापन है, वह आकाश का भाग है। देखिए, कान में भी छिद्र है। कान जो बाहर से दिखता है, उसे कान नहीं बोलते। इसके भीतर जो छिद्र है या जो खालीपन है, वह कान है। दर्शनशास्त्र में पढ़ाया जाता है कि भीतर जो आकाश है, खालीपन है, उसी का नाम कान है। यदि ये भीतर वाला भाग बंद हो जाए, तो हमें सुनाई नहीं पड़ेगा। शब्द का ग्रहण नहीं होगा, ज्ञान नहीं होगा। नाक में भी आकाश है। पेट में भी जो खालीपन है, वह भी आकाश ही है। जहां से रक्त आदि प्रवाहित होते हैं, जल प्रभावित होता है। पृथ्वी का भाग तो आप देखते ही हैं, पैर, हाथ व अन्य अंग। जल भी है शरीर में। वायु का भी हम अनुभव करते रहते हैं, कभी डकार, कभी अपान वायु, लोग कहते भी हैं कि पेट में वायु अभी बढ़ गया है। वायु की भी जरूरत है शरीर को, ऑक्सीजन भी उसी रूप में है। इस तरह हमारे पूरे शरीर को पंचभूतों से उत्पन्न या रचित माना जाता है। जब मृत्यु हो जाती है, तो ये पांचों भूत अपने-अपने बड़े शरीर में मिल जाते हैं।
देखिए, जिस जगह हम बैठे हैं, यह कमरा, यहां आकाश है। हम इसे बोलते हैं, मकान है। छत को हटा दीजिए, दीवारों को हटा दीजिए, तो यह जो छोटा आकाश है, बड़े आकाश में मिल जाएगा। महाआकाश में मिल जाएगा, जो पूरे संसार में है। यहां रहें या रूस या अमेरिका जाएं, आपको यही आकाश मिलेगा। तेज, पृथ्वी, वायु, सूर्य का यही स्वरूप मिलेगा। इन सबको जो बनाता है और जो पालन करता है, इनका संरक्षण करता है, रखरखाव करता है, और जब लगता है कि यह रहने लायक नहीं है,तो वह इसे धीरे से अपने में मिला लेता है, छिपा लेता है, इसी का नाम ईश्वर है, बह्म है। ईश्वर चिंतन होते रहना चाहिए।
वेदों ने कहा कि ब्रह्म को जानने की इच्छा करो। आप यहां छोटे-छोटे पदार्थों को देखकर जानने की इच्छा करते हो कि यह क्या है और इतने बड़े संसार को देखकर इच्छा ही नहीं हो रही है। यह बहुत बड़ी विडंबना है जीवन की। आप अवसर खो रहे हैं। सारा जीवन ऐसे ही निकलता जा रहा है और आपने जाना ही नहीं कि संसार को किसने बनाया? कौन इसका पालन करता है? ऐसे प्रश्न हमारे मन में उमड़ने-घुमड़ने चाहिए। आप ध्यान रखिए कि इस संसार को किसी उद्यमी, नेता या संस्था या सरकार ने नहीं बनाया, जिसने इसे बनाया, उसी को ब्रह्म कहते हैं।
ब्रह्म का एक अर्थ और भी है। कहा गया है कि यह महान बहुत है। हम लोग महान नहीं हैं। जहां हम बैठे हैं, उतना ही हमारा। जहां हम बैठ जाते हैं, उसी को संसार समझ लेते हैं, हम छोटे लोग हैं। जहां जो बैठा है, उसका संसार बस उतना ही बड़ा है। जो महान हो, ऐसा कोई स्थान नहीं हो, जहां वह नहीं हो, वह ब्रह्म है। निरंतर जो विकासशील है, जो महान है, सबसे बड़ा जिसका आकार है, वह ब्रह्म है।
हमें ऐसा लगता है कि हम ही पालन करते हैं। जैसे माता-पिता अपने बच्चों को समझते हैं कि हमने इनका पालन किया। पूछिए, उनके माता-पिता से कि ऑक्सीजन आप ही हैं क्या? आप ही आकाश हैं क्या? पृथ्वी या जल हैं क्या? हमारा यह स्वरूप नहीं है कि हम किसी का पालन कर सकें। हमें भ्रम होता है कि हम ने ही सब किया है। सोचिए, आप कौन हैं? आप झूठ ही यह मान रहे हैं कि मैंने वह कर दिया, यह कर दिया। ऐसा अभिमान हमें सभी क्षेत्रों में होता और दिखता है।
ठीक ऐसे ही अभी जो चिंतन मैं आपको सुना रहा हूं, वह मेरा है या उसमें मेरे और पूर्वजों का भी योगदान है। मूल चिंतक कौन है, जिसने हमें यह विचार दिया? वह कौन है, जिसने हमें समझने की शक्ति दी? जिसने हमें आपके पास यह चिंतन पहुंचाने के लिए बल दिया, बुद्धि दिया, वह कौन है? इसीलिए पूरे संसार को बनाना, उसका पालन करना, और उसे अपने में छिपा लेना, जैसे समुद्र सभी जलधाराओं को छिपा लेता है। इसीलिए समुद्र जल का सबसे बड़ा स्वरूप है। जल की बूंद अंश मात्र हैं। इस कमरे का जो आकाश है, जो दीवार या छत टूटने के बाद जिस आकाश में मिल जाएगा, वह महा आकाश है, वह अपने में छिपा लेता है। बड़ा बनने के लिए आवश्यक है कि अंश अपने अंश में ही मिल जाए। जलधाराएं खतरे में रहती हैं, लेकिन उस समुद्र में मिल जाती हैं, जो कभी सूखता नहीं, जो तमाम धाराओं को अपने में समाहित कर लेता है।
मिट्टी के टुकड़े को आपने ऊपर फेंका, वह आ गया पृथ्वी पर, मिल गया पृथ्वी में, तो बड़ा हो गया। हम लोग भी यही प्रयास कर रहे हैं बड़ा होने के लिए। हम ईश्वर जैसा बनना चाहते हैं, जो सबसे बड़ा है। हम उसके अंश हैं, अंश जब अंश में मिल जाता है, तो सबसे बड़े स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
Monday, 3 July 2023
Friday, 30 June 2023
चातुर्मास स्थल हरिद्वार
गूगल मैप के सहारे आसानी से पहुंचें, जय जय सियाराम
चातुर्मास स्थल, हरिद्वार
Sri Rammandir Sthan, Ramanandacharya, Haridwar, Motichur, Haridwar, Uttarakhand 249411
Sunday, 18 June 2023
Thursday, 16 March 2023
Thursday, 2 March 2023
Saturday, 31 December 2022
जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज
।। श्री श्री सीताराम चन्द्राभ्यां नमः।।
।। श्री रामानन्दाभ्यां नमः।।
काशी में पंचगंगा घाट पर जो हमारी अव्दैत आस्था का प्रतीक हैं अपने में कृष्ण भक्ति से स्नातयमना तथा चेतना की सरस्वती को समेटे हुए पश्चातापकी धूतपापा और पराअभ्युदय की किरणा की धाराओं से मिलकर एक महासंगम का निर्माण करती हैं।
इस पावन तट पर स्थित ॰ श्रीमठ ॰ रामानन्द सम्प्रदाय की मूल आर्चाय पीठ है तथा मध्ययुगी भक्ति आन्दोल न की सगुण और निर्गुण दोनों ही धाराओं की गंगोत्री है।रामभक्ति की लोक चेतना के प्रवर्तक जगतगुरू परमाचार्य स्वामी रामानन्द जी ने ईश्वर साक्षात कार की दिशा में ज्ञानरूपी राजपथ के सामानान्तर भेद रहित व जन सुलभ भक्ति व प्रपत्ति का जन पथ प्रशस्त कर भारत में आध्यात्मिक गणतंत्र की भावभूमि को आधार प्रदान किया।
जाति पांति पूछै नहिं कोई,हरि को भजै सो हरि का होई,
जैसे चमत्कारिक उदघोष के साथ स्वामी रामानन्द जी ने ब्राम्हण अनन्तानन्द व नरहर्यानन्द ही नहीं वरन जुलाहा कबीर, र्चमकार रैदास, क्षत्रिय पीपा,जाट धन्ना, नाई सेन और यहां तक कि उपेक्षित नारी समाज की पदमावती व सुरसरी तक को न केवल दीक्षा दी बल्कि उन्हें अपने अपने स्वतंत्र मतो का आचार्य भीबना दियाफलतः कठिन सक्रमण काल में संस्कृति की रक्षा हुई और समाज एवं राष्ट्र में विघटन का निषेध हुआ।
वर्तमान पीठाधीश्वर, परमाचार्यके उत्तर साधक
'' जगदॄगुरू रामानन्दाचार्या स्वामी रामनरेशाचार्या जी '' परम्परा तथा सनातन धर्म में भक्ति के उन्हीं उदात्त आदर्शों के प्रतिबध्द एवंप्रबल संवाहक हैं तथा अनवरत सम्पूर्ण देश भर में प्रशस्त धार्मिक प्रवृत्तियों के साथ नियोजित हो रहे उत्सवों एवं अनुष्ठानों के साथ साथ अनेक क्षेत्रों में कीजा रही आध्यातमिक एवं लोक कल्याणकारी प्रवृत्तियों को उत्कर्ष प्रदान कर रहे हैं।
जय सिया राम
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