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Wednesday, 9 November 2016

भक्तिनी शबरी : सेवा का सच्चा पर्याय

समापन भाग
किसी को सीखना हो, तो शबरी से सीखे कि कैसे श्रद्धा भक्ति के माध्यम से ऊंचाई को प्राप्त किया जा सकता है। शबरी ने सबकुछ पा लिया था, जब तक मानवता रहेगी, तब तक शबरी की चर्चा होती रहेगी। संपूर्ण संसार के मनुष्यों से अत्यंत आग्रह है कि सभी लोग ईश्वर सेवक बनें, संत सेवक बनें, गुरु सेवक बनें। मार्गदर्शन हम शबरी से प्राप्त करें। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, सभी मार्गदर्शन प्राप्त करें। किसी भी जाति, संप्रदाय के लिए शबरी प्रेरणा का स्रोत हैं। इस तरह के व्यक्तित्व संसार के इतिहास में दुर्लभ हैं। जो जहां है, वहीं से सेवा प्रस्तुत करे। जीवन की परम धन्यता को प्राप्त करेगा। 
ऐसे वैज्ञानिकों की जरूरत है, बहुत से सेवकों की जरूरत है, बहुत से नेताओं की जरूरत है। शबरी से सीखकर समाज उन्नत समाज होगा, एक दूसरे के काम आने वाला समाज होगा, राम राज्य वाला समाज होगा। 
शबरी को भगवान ने नवधा भक्ति का उपदेश दिया, जो आज भी संसार में भक्ति का श्रेष्ठतम उपदेश माना जाता है। यह भक्ति भागवत में भी बताई गई है। जगह-जगह इसका वर्णन है। भगवान ने शबरी के माध्यम से संसार को नवधा भक्ति उपदेश दिया, जैसे कृष्ण अवतार में भगवान ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। भगवान ने शबरी से कहा कि नवधा भक्ति में से किसी एक प्रकार की भक्ति भी किसी को हो जाए, तो उसका कल्याण हो जाएगा, लेकिन आपने तो नौ प्रकार से भक्ति की है। आपके कल्याण में कोई संदेह की बात ही नहीं है। तुम संपूर्ण भक्तिमय हो। राम जी ने बहुत उपदेश दिए होंगे, ३३ हजार साल का उनका काल है, लेकिन उन्होंने जो उपदेश शबरी को दिया, वह अतुलनीय है, यह परम सौभाग्य है कि साधन विहीन शबरी को भक्ति क ा उपदेश मिला। राम जी सबसे साधन संपन्न हैं, वह सबसे साधन विहीन शबरी को उपदेश दे रहे हैं। 
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा। 
अर्थात पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंग से प्रेम। तीसरी भक्ति है, अभिमान रहित होकर गुरु की सेवा। चौथी है - कपट छोडकर मेरे गुणों का गान करना। पांचवीं है - दृढ़ विश्वास के साथ मेरे मंत्र अर्थात राम नाम का जाप। छठी है - इन्द्रियों का निग्रह, अच्छा चरित्र, संत आचरण करना। सातवीं है - संसार को मुझमें ओतप्रोत देखना, संतों को मुझसे भी अधिक मानना। आठवीं है - जो मिल जाए, उसी में संतोष करना, दूसरे के दोष न देखना। नौवीं भक्ति है - सरलता और सबके साथ कपटरहित व्यवहार करना, मुझमें भरोसा रखना और मन में विषाद न लाना। 
नवधा भक्ति में शबरी ऊंचाई को प्राप्त हुईं। जब शबरी ने राम जी से कहा था कि मैं तो अधम हूं, मन्दबुद्धि हूं, तब राम जी ने कहा, 
कह रघुपति सुनु भामिनी बाता। मानउं एक भगति कर नाता।।
हे भामिनी, मेरी बात सुन, मैं तो केवल एक ही भक्ति का ही सम्बंध रखता हूं। 
भगवान तो भक्त के वश में हो जाते हैं, भगवान केवल भक्ति भाव देखते हैं, ऐसे भगवान के लिए शबरी ने स्वयं को अर्पित कर दिया और संसार के लिए आदर्श बन गईं।
जय श्री राम

भक्तिनी शबरी : सेवा का सच्चा पर्याय

भाग - ४
एक और चर्चा होती है कि शबरी ने चख-चखकर राम जी को बेर खिलाए। राम जी का यह स्वभाव है, जो भी माताएं, गुरु माताएं उन्हें खिलाती थीं, वे बहुत रुचि के साथ खाते थे, किन्तु शबरी के हाथ से खाने के बाद ईश्वर ने जब भी किसी माता के हाथों कुछ खाया, तो प्रशंसा तो जरूर की, किन्तु धीरे से यह भी कह दिया कि जो स्वाद शबरी के बेर में मिला था, वह फिर कभी नहीं मिला। ईश्वर की जो यह पक्षपाती भावना है, वह भक्त को परम ऊंचाई देने वाली है।
शबरी द्वारा किए गए स्वागत-सत्कार के बाद राम जी ने कहा था, मैं आपके गुरु मतंग ऋषि जी का आश्रम देखना चाहता हूं, जहां वे बच्चों को पढ़ाते, पूजन, अर्चन करते थे। शबरी उन्हें आश्रम में जगह-जगह ले गईं, आश्रम का हर कक्ष दिखाया। वहां सब कुछ व्यवस्थित था, अध्ययन की जगह, ग्रंथ, सबकुछ वैसे ही था, जैसे ऋषि छोड़ गए थे। भगवान बड़े प्रसन्न हुए, शबरी ने सबकुछ ठीक से सजा रखा था। भगवान को चार वेदों को जानने वाला उतना प्रिय नहीं होता, जितना भक्त भाव वाला चांडाल प्रिय होता है। जो भगवान के लिए समर्पित है, वह भगवान को प्रिय है। 
भगवान बैठे हैं, भक्त में वह धन, रूप नहीं देख रहे, केवल श्रद्धा देख रहे हैं। शबरी ने अनुमति मांगी, आपका दर्शन हो गया, आज मेरा जीवन परिपूर्ण हुआ। भगवान अब कृपा करें, मैं अब जाऊं। गुरु चरणों की सेवा करूं। राम ने कहा, ऐसा ही हो। शबरी भगवान के देखते-देखते ही दिव्यधाम चली गईं। ऐसा वाल्मीकि रामायण में लिखा है।
शबरी से जुड़ी प्रसिद्ध कथा है। एक तालाब में कीड़े पड़ गए थे, लोगों ने राम जी से कहा कि आप इसे निर्मल बना दीजिए, 
भगवान ने कहा कि यह पाप का फल है। किससे यह पाप हुआ कि पानी दूषित हो गया? 
लोग नहीं बतला पाए। तब राम जी ने कहा, चिंतन करने से मेरे मन में ऐसा आ रहा है कि कभी रास्ता साफ कर रही थीं शबरी। एक संत ने शबरी को नहीं देखा, शबरी ने उन्हें देखा और किनारे खड़ी हो गईं, स्नान करके जब वह लौटने लगे, तो शबरी का कपड़ा उनके चरणों में गिर गया, वे बड़े नाराज हुए, कौन है दुष्टा, रास्ते में आ गई, दूषित कर दिया, अब फिर स्नान करना पड़ेगा। 
दुबारा स्नान के लिए वह संत नदी नहीं गए, उन्होंने इसी तालाब में स्नान किया। उसी समय से इसका जल कीड़ों से भर गया। 
लोगों ने पूछा, इसका समाधान क्या हो सकता है बताइए?
तो राम जी ने कहा, यदि शबरी के चरणों से धोकर इसमें जल डाला जाए, तो कीड़े समाप्त हो जाएंगे। 
लोगों ने ऐसा ही किया और तालाब के कीड़े समाप्त हो गए। बहुत बड़ी घटना हो गई। सभी प्रकार से निर्बल साधन विहिन व्यक्ति के माध्यम से संत सेवा की महिमा से ईश्वर सेवा की महिमा से शबरी शक्तिशाली हो गईं। तालाब को निर्मलता प्राप्त हो गई। इस घटना से दण्डकारण्य के संपूर्ण ऋषि समाज में बहुत अच्छा संदेश गया। कई लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि हम तो जान ही नहीं रहे थे कि ये महिला इतनी प्रभावशाली हैं। ईश्वर तो वस्तुत: दीनदयाल हैं, उन्होंने शबरी के रूप में भक्त को पहचान लिया। 
चिंतन की बात है कि लाखों वर्ष हो गए, त्रेता की बात है राम जी जब हुए थे, लेकिन शबरी की चर्चा आज भी ताजा है। कितना परिवर्तन आया संसार में, कितने तरह के लोग आए, गायक, कलाकार, सुनने वाले, लिखने वाले, बोलने वाले, सब लोग सिमट गए, बड़ी जातियों में जन्मे लोग सिमट गए लेकिन शबरी आज भी संसार को प्रकाशित कर रही हैं। शबरी का एक ही रहस्य है कि उन्होंने श्रेष्ठ भावों के साथ संतों की सेवा की। कहीं से कोई छल नहीं, अभिमान नहीं, दिखावा नहीं। 
क्रमश:

भक्तिनी शबरी : सेवा का सच्चा पर्याय

भाग - ३
जब बाकी ऋषियों को पता चला कि राम जी आए हैं, तो वे आए और कहने लगे कि आप हमारे यहां नहीं आए, यहां आ गए। राम जी ने उत्तर दिया कि दण्डकारण्य में मैंने कई लोगों से पूछा कि सबसे अच्छा भक्त कौन है, तो सबने शबरी का नाम लिया। मुझे भक्त बहुत प्रिय हैं। जो मुझे प्रेम करता है तन-मन से, उसे मैं सबसे ज्यादा चाहता है, शबरी ऐसी ही हैं। 
एक विशेषता है, शबरी ने सदा छिपकर सेवा की। अपने यहां वैदिक सनातन धर्म में कहा जाता है कि दान का हाथ दिखना नहीं चाहिए कि किसने दान दिया। वैसे ही सेवा भी छिपकर की जानी चाहिए, सेवा का विज्ञापन बड़ा नहीं होना चाहिए, दिखावटीपना नहीं हो। हमने किसी की सेवा की है या सम्मान किया है, तो दिखना नहीं चाहिए। उसका प्रचार नहीं होना चाहिए, यही काम शबरी करती थीं। दो दिन नहीं, चार दिन नहीं, पूरे जीवन ऐसा ही किया। 
शबरी के पिताजी राजा थे, शबरी जब विवाह लायक हुईं, तो विवाह के आयोजन के क्रम में वर वगैरह देखने के बाद, शादी की तैयारी होने लगी, दरवाजे पर तैयारी होने लगी, शबरी ने पूछा कि यह क्या हो रहा है, लोगों ने बताया कि तुम्हारी शादी होने वाली है, तो शबरी का हृदय तो आध्यात्मिक था, पूर्व जन्म के संस्कार भी रहे होंगे, शबरी में ईश्वर के लिए चाह, ललक थी, इच्छा थी कि ईश्वर व संतों के लिए जीवन को अर्पित करें, इसके अलावा कोई उद्देश्य नहीं था। उन्होंने धीरे से संकल्प किया कि मैं घर पर नहीं रहूंगी। वह जंगल में चली गईं, फिर लौटकर नहीं आईं। बहुत से लोगों ने मनाया, किन्तु सांसारिक जीवन में शबरी का मन नहीं माना। शबर जाति की थीं, भील जाति, इसलिए नाम शबरी हो गया। जैसे फल ग्रहण करने वाले को फलाहारी बोलते हैं, ठीक उसी तरह से वे शबर जाति की थीं, इसलिए शबरी कहा गया। मतंग ऋषि के आश्रम में रहीं, वे आश्रम में कुछ भी लेकर नहीं गई थीं। आज लोक प्रतिष्ठा के जो कारण होते हैं, वो शबरी के पास नहीं थे। धन का स्पर्श ही नहीं किया पूरे जीवन में। आज का साधु आते ही धन संग्रह में लग जाता है। 
गृहस्थ जीवन ही नहीं, आश्रम के लिए भी धन चाहिए, लेकिन आश्रम का उद्देश्य धन नहीं है। वह तो अध्ययन, अध्यापन, जप, तप की जगह है। उतना ही धन प्राप्त करें, जो भक्त सहर्ष देकर जाएं। 
शबरी के पास न धन, न रूप, न कला, न विद्या, लेकिन सेवा है। हमें सोचना चाहिए कि हम जो कर रहे हैं, वह यदि किसी की समस्या का समाधान है, निवारक है, किसी के लिए वरदान स्वरूप है, तो हमारा जीवन सफल हो जाएगा, हमारी पहचान सुस्पष्ट हो जाएगी, फिर हमें जो चाहिए, वह मिलेगा। सेवा के इस पहलू को समझना चाहिए। अपने जीवन में सेवा भाव को उतारना चाहिए, समाज, परिवार, लोक का उत्कर्ष तभी होगा। 
ईश्वर के प्राप्ति में जो परम लाभ है, उसमें शुरू से सहिष्णुता होनी चाहिए। संत सेवा से, साधना से, शबरी को कोई शिकायत नहीं, कोई उलाहना नहीं, केवल श्रद्धा और प्रतीक्षा है। भक्ति में देने-देने की बात होती है, लेने की नहीं, रिटर्निंग गिफ्ट नहीं होता। सेवा में ही वह स्वयं का जीवन सार्थक मानता है। वाल्मीकि रामायण में लिखा है, भगवान ने शबरी से पूछा कि तुमने इतने व्रत-नियम किए, तुम्हें क्या प्राप्त हुआ, तो शबरी ने कहा कि आप प्राप्त हुए। 
दूसरा कोई होता, तो कई तरह की बातें करता, कहता कि गुरुजी ने मुझे बहुत मान दिया। तमाम लौकिक बातें करता, लेकिन शबरी ने स्पष्ट कहा, आप प्राप्त हुए। अंतिम उद्देश्य तो ईश्वर प्राप्ति ही है। सच्चा फल तो यही है। संपूर्ण कल्याणकारी है आपका दर्शन। 
क्रमश:

भक्तिनी शबरी : सेवा का सच्चा पर्याय

भाग - २
पुरानी प्रथा है कि भगवान के साथ भगवान के भक्तों की भी सेवा करनी चाहिए। भागवत यानी जो भगवान के लिए अर्पित हैं, भागवतों की सेवा भी गुरु और ऋषियों के समान ही होनी चाहिए। शबरी का जो जीवन क्रम है, वह बड़ा ही प्रेरणादायक है, वह सैंकड़ों वर्षों तक प्रतिदिन दण्डकारण्य में जमा ऋषियों, संतों की सेवा करती रही थीं। विलक्षण प्रतिभा संपन्न थीं। जो रास्ता ऋषियों का होता था, उस रास्ते को बुहारने, साफ रखने, कंकड़ इत्यादि दूर करने, उस पर रेत बिछाने में उन्होंने अपना समय लगाया। और ऐसा करते हुए कभी अपने को प्रकट नहीं करना। प्रचारित नहीं करना। सुबह से पहले रात्रि में ही उठकर ये सारे काम करना, जिससे किसी को पता ही नहीं चलता था कि किसने यह किया है। सैंकड़ों वर्ष तक शबरी ऐसा करती रहीं। वह मतंग ऋषि के आश्रम में रहती थीं, मतंग ऋषि शबरी का महत्व समझते थे। उन्होंने शबरी को अद्भुत आध्यात्मिक आभा प्रदान की। ऐसा नहीं है कि वह धन लेकर आई थी, आज के साधु तो आते ही धन संग्रह में लग जाता है। बड़ा प्रश्न हो जाता है कि किसे संत समझा जाए। गुमराह अवस्था समाज के सामने खड़ी हो जाती है। किसे असली समझें, किसे नकली समझें। सनातन धर्म धन के बिना नहीं चल सकता। जीवन केवल खाने-पीने, वस्त्र, गृहस्थ जीवन के लिए ही नहीं है, आश्रम के लिए भी धन की जरूरत है। अनायास रूप से जो लोग धन दें, उसका उपयोग करें, मर्यादा से जीवन जीएं। ईश्वर की सेवा करें, जितना जरूरी हो, उतने ही धन का सेवन करें। शबरी के पास न रूप है, न जाति है, फिर भी उन्होंने पूर्णत: समर्पित होकर सेवा को अपना मार्ग बनाया। अब तो लोगों को विश्वास ही नहीं होगा कि सेवा करके अपने को सफल मानव बना सकते हैं, लेकिन शबरी ने ऐसा एक-दो दिन नहीं, सैंकड़ों वर्षों तक किया। उन्हें विश्वास था कि भगवान आएंगे। मतंग ऋषि पर विश्वास था। मतंग ऋषि ने स्वर्ग जाते हुए कहा था कि राम जी जरूर आएंगे, शबरी प्रतीक्षा करती रहीं। गुरु पर परम विश्वास था, इसी को श्रद्धा कहते हैं। शबरी को परम श्रद्धा थी कि राम जी जरूर आएंगे। गुरु की वाणी कभी मिथ्या नहीं होती। 
गुरु ने जाते हुए कहा था, तुम्हें आशीर्वाद देता हूं, राम जी अवतार लेने वाले हैं, तुम्हें यहां आकर मिलेंगे। 
गुरु ने यह नहीं कहा कि तुम बहुत सुन्दर बन जाओगी, नर्तकी बन जाओगी, धनवान बन जाओगी, रानी बन जाओगी। संत की मनोकामना पवित्र होती है। उनके आशीर्वाद में भी भलाई छिपी होती है। उन्होंने कहा, राम जी तुम्हें यहीं आकर मिलेंगे, राम जी के दर्शन के बाद तुम आ जाना, मेरे दिव्य धाम। शबरी लग गई तैयारी में कि राम जी आएंगे। 
उसने नियम बना लिया, दूर-दूर तक मार्ग को बुहारना, अच्छे फलों को एकत्र करना, अच्छे फूलों का चयन करके माला बनाना और अपने दरवाजे पर बैठकर प्रतीक्षा करना। उपवास करना, भोजन नहीं, फलाहार नहीं, ईश्वर की प्रतीक्षा करना। जब भी कोई आहट हो, तो लगता था कि राम जी आ गए, सुबह से शाम हो जाती थी, दिन बीत जाता था। आज नहीं आए, तो कल आएंगे, आज किसी दूसरे ऋषि के आश्रम चले गए होंगे, कल आएंगे। शबरी ने १२ वर्ष प्रतीक्षा की। श्रद्धा थी, गुरु ने कहा है। रोम-रोम से संयम, नियम से जीवन जीया, और रोम-रोम से भक्ति प्रवाहित होती थी। शबरी के बारे में लोग कहते हैं कि न रंग-रूप और गंदा कपड़ा, इत्यादि-इत्यादि, लेकिन जो लोग अध्यात्म की उपलब्धि को नहीं समझते हैं, वही ऐसी बातें करते हैं। जिसने अपना जीवन संतों की सेवा में लगाया हो, वह ऐसा ही रह जाएगा क्या, जैसे अपने घर से आने के समय शबरी थी। उसके शरीर से तो आभा निकल रही थी। श्री राम जी ने देखकर ही समझ लिया कि यह तो महान तपस्विनी है। शबरी ने भी भगवान को देखा। चरणों में गिर पड़ी, भक्ति-श्रद्धा से उपजे आंसुओं से पैरों को धोया। हृदयाकाश से सेवा की। भगवान ने उन्हें पूरा सम्मान दिया, हाथों से पकडक़र उठाया, शबरी ने भगवान की सेवा की। कितनी खुशी है कि सामने राम बैठे हैं। अनेक तरह से वंदना की, अनेक तरह के फूलों, मालाओं से सजाया। संसार में आनंद की कमी नहीं है, लेकिन ऐसा आनंद दुर्लभ है, जब ईश्वर सामने बैठे हों। यह भी कहा जाता है कि भगवान तो मिल जाते हैं, लेकिन ऐसे भक्त रोज नहीं मिलते। भगवान का तो काम है, ऐसे भक्तों का मान बढ़ाना। सारी वर्ण व्यवस्था, सारी आश्रम व्यवस्था ऊंचाई और निचाई का भाव, जो विभाजित करने वाली बातें हैं, सब टूट गईं। कहीं कोई विभाजक रेखा नहीं रही, सेवा ने सारे बंधनों, सीमाओं को पार कर लिया। शबरी सतर्क है। आज कोई अपराध नहीं हो जाए, भगवान मेरे आश्रम में आए हैं। 
क्रमश:

भक्तिनी शबरी : सेवा का सच्चा पर्याय

(जगदगुरु रामानंदाचार्य के प्रवचन के अंश)
संसार में नारियों का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन अलग-अलग देशों में अलग-अलग संप्रदायों, जातियों में अलग-अलग उनके स्वरूप हैं। भारतीय परंपराओं में नारी का महत्वपूर्ण स्थान है, फिर भी जो सम्मान पुरुष को प्राप्त हैं, जो अधिकार, अवसर प्राप्त हैं, वो नारी को नहीं हैं। यह जरूरी है कि नारी को बराबरी का दर्जा हर दृष्टि से मिले। आधुनिक समय में कई अधिकार मिलने के बावजूद आज नारियों को वह स्थान नहीं मिला है या वह सम्मान नहीं मिल सका है, जो पुरुषों को मिला हुआ है। सनातन धर्म में नारी को अध्यात्म में भी वह स्थान नहीं मिल पाता है, जो मिलना चाहिए, किन्तु शबरी अपवाद स्वरूप हैं, वो तमाम प्रचलित धाराओं को पीछे छोड़ देती हैं। वे पौराणिक इतिहास में अमिट छवि वाली भक्त हैं।
जगद्गुरु शंकराचार्य जी के मार्ग में नारी को संन्यास लेने का अधिकार नहीं दिया गया था। वहां केवल ब्राह्मण ही संन्यास का अधिकारी है, क्षत्रिय नहीं, वैश्य नहीं, शुद्र नहीं और नारी भी नहीं। वेदों के अध्ययन, अध्यापन में भी नारियां वर्जित रही थीं। उन्हें वेद पढऩे का अधिकार प्राप्त नहीं था। 
जो भक्ति मार्ग के संप्रदाय हैं, उनके अनुयायियों में ऐसी वर्जना नहीं रही है। साक्षात नारियों को लाभान्वित करने वाले भक्ति मार्ग में भी नारियां कम हैं। हालांकि भक्ति मार्ग में नारियों को बढ़ावा मिला। जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी के १२ शिष्यों में, जो परम तत्व तक पहुंचे, जिनका जीवन संतत्व की पराकाष्ठा पर पहुंचा, उनमें दो नारियां भी हैं। पद्मावती और सुरसरी। दोनों ही संतत्व के चरम में अवस्थित हैं। रामानंदाचार्य जी की उदारता इससे प्रमाणित होती है। यहां यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सनातन धर्म शुरू से ही उदार रहा है। जिन संतों और आचार्यों ने नारियों को आगे बढ़ाया, वो सभी धाराएं वैदिक सनातन धर्म में रही हैं। यह कोई अपनी ओर से किया गया कृत्य नहीं है। शबरी का जो उदाहरण है, वह सबसे बड़ा उदाहरण है। उनके जीवन क्रम को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे भगवान की सेवा करके पूजा करके, ध्यान करके, भगवान का नाम जप करके, भगवान की शक्तियों का ध्यान करके, समर्पण के अभाव, शरणागति के अभाव से ऊपर उठकर लोग जीवन को धन्य बनाते हैं, वैसे ही साधुओं और गुरुओं की सेवा से भी फल प्राप्त किया जा सकता है। मतंग ऋषि की वे शिष्या हैं, उसी सद्भाव और उत्साह के साथ समर्पण के साथ तत्कालीन दूसरे ऋषियों की भी उन्होंने सेवा की थी। भगवान के साथ भक्तों की सेवा भी होनी चाहिए। अध्यात्मिक जगत में सामाजिक जगत में अपने गुरु का सम्मान अनिवार्य है। हम दूसरे संतों और आचार्यों का भी सम्मान करें, इससे धर्म मजबूत होगा, उसका महत्व ऊंचाई को प्राप्त होगा। उसकी उपयोगिता को पंख लगेंगे, उसकी आयु भी बढ़ेगी। उसकी उदारता का बहुत विस्तार होगा। जैसे आजकल परिवार टूट रहे हैं, संयुक्त परिवार की परंपरा अब टूट रही है। पत्नी को पति का तो सम्मान करना ही है, लेकिन परिवार के दूसरे सदस्यों का भी वह ध्यान रखती है, पति के माता-पिता, पति की बुआ, पति के भाई-बहन, सबका वह ध्यान रखती है, इससे ही परिवार का आनंद, अस्मिता, परिवार की पहचान, परिवार का स्नेह, परिवार का धन, सब कुछ वृद्धि को प्राप्त होंगे। ऐसा नहीं होने से परिवार टूट रहे हैं। वैसे ही ऋषियों की सेवा जरूरी है। धर्म और अध्यात्म का स्वरूप विस्तृत होगा, तो बहुत दिनों तक उसका जीवन होगा। लंबी उसकी उपादेयता होगी, सार्थकता होगी। आज का जो साधु समाज है, गुरु समाज है, आचार्य समाज है, उसकी बहुत बड़ी भूमिका है। अपने शिष्यों को लोग दूसरे के काम नहीं आने देते हैं। हमारा शिष्य केवल हमारा ही प्रबंध करे, हमारा ही केवल आदर करे, हमें ही सब कुछ समझे, ऐसा वातावरण आज के गुरु लोग बनाने लगे हैं। अपने सम्मान को दूसरों को नहीं देते। आज साधु जगत में यह बड़ी कमी आ गई है। शबरी के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए, जैसे शबरी ने मतंग ऋषि की सेवा की, उनको मान दिया, उनके प्रति आस्था व्यक्त की, वैसे ही दूसरे ऋषियों और संतों के लिए भी किया और कभी भी मतंग ऋषि ने उन्हें मना नहीं किया। 
क्रमश: