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Wednesday, 16 November 2016

सती अनसूया जी : पति भक्ति अर्थात महाशक्ति

समापन भाग 
तुलसीदास जी ने लिखा है - अनसूया जी कह रही हैं - 
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।।
तन, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए बस एक ही धर्म, एक ही व्रत, एक ही नियम है। अनसूया जी ने पतिव्रता नारियों के चार स्वरूपों का वर्णन भी किया। 
पतिव्रता का सबसे श्रेष्ठ स्वरूप इस प्रकार है - श्रेष्ठतम पतिव्रता के मन में एक दृढ़ विश्वास होता है, दृढ़ निश्चय होता है कि मेरा पति संसार में अकेला पुरुष है और बाकी सब नारियां हैं। मेरे लिए पूर्ण रूप से समर्पित रहने वाला वही है, जिसे माता-पिता ने दिया है, बाकी पुरुष सब नारियां। श्रेष्ठ पतिव्रता के लिए पति के अलावा कोई दूसरा जीव पुरुष होता ही नहीं है। 
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहूँ आन पुरुष जग नाहीं।।
पति ही जगत का अकेला पुरुष है, दूसरा कोई पुरुष नहीं है। रामानंद संप्रदाय में लोग इस तरह की उपासना करते हैं, भगवान को पति और अपने को पत्नी मानकर। भगवान ही पति हैं और बाकी संसार के सभी जीव पत्नियां हैं। यह कांता भाव रामानंद संप्रदाय में प्रचलित है। दूसरा जब कोई पुरुष ही नहीं है मान्यता में, तो कहां से विकार आएगा?ï इससे उनका पतिव्रत सुदृढृ बनता है। यह सबसे अच्छा तरीका है कि स्त्री अपने पति को ही पुरुष माने। भटकाव को आधार देने की आवश्यकता ही नहीं है। 
दूसरे प्रकार की पतिव्रता जो होती हैं - जिन्हें मध्यम पतिव्रता कहा अनसूया जी ने। ऐसी पतिव्रता स्त्रियां दूसरे पुरुषों को देखती तो हैं, लेकिन पुत्र, भाई और पिता के रूप में देखती हैं। छोटा है, तो पुत्र के रूप में, समान है, तो भाई के रूप में और बड़ा है, तो पिता के रूप में देखती हैं। ये भी पति के लिए संपूर्ण समर्पित रहती हैं। ऐसा भी अगर सोचा जाए, तो तमाम तरह की मर्यादाओं के उल्लंघन से बचा जा सकता है। 
तीसरी पतिव्रता वो हैं - उन्हें अत्यंत नीच कहा गया है - जो स्त्रियां धर्म का विचार करके, कुल का विचार करके, दूसरे पुरुष पर मन नहीं लगाती हैं। इस तरह से जो स्त्रियां पतिव्रत धर्म का पालन करती हैं, वे निकृष्ट हैं। 
चौथी पतिव्रता के लिए कहा - अवसर नहीं मिलने के कारण जो पतिव्रता बनी रहती हैं, भय के कारण पति के साथ जुड़ी रहती हैं, उनके विचारों में क्षमता नहीं है, उनके विचारों में ऊंचाई नहीं है। ऐसी स्त्रियां अधम पतिव्रता हैं। 
इन चारों पतिव्रताओं का वर्णन अनसूया जी ने जानकी जी के लिए किया और आशीर्वाद दिया कि जो पति को ठगती हैं, दूसरे पति के साथ विहार करती हैं, उन्हें घोर नरक यात्रा होती है। क्षणभंगुर सुख के लिए जो अपने पति की उपेक्षा कर देती हैं, उन्हें बाद में सौ करोड़ जन्म तक नर्क की प्राप्ति होती है। कोई अन्य श्रम करने की कोई जरूरत नहीं है, नारी को पतिव्रत धर्म से परमपद की प्राप्ति हो सकती है। 
उन्होंने कहा कि नारी का जीवन बहुत ही अपावन है, अपावन मतलब - पावन कहते हैं पवित्र को, नारियां तभी पावन अवस्था को प्राप्त करती हैं, जब पति की सेवा करती हैं। दुनिया का कोई भी संसाधन, विज्ञान स्त्री जीवन को उत्कर्ष देने वाला नहीं है, जितना पतिव्रत धर्म है। 
नारी की सुंदरता के लिए, नारी के सुख के लिए, पति के सेवन के लिए पति के प्रति समर्पण अति महत्वपूर्ण है। यदि समर्पण होता है, तो परिवार ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र को मजबूती मिलती है। इस भाव में मानव को पहुंचना ही चाहिए। 
जानकी जी को अंतिम आशीर्वाद देते हुए अनसूया जी ने कहा कि जो स्त्रियां तुम्हारे नाम का स्मरण करेंगी और पतिव्रत का पालन करेंगी, वो अपने पतिव्रत के पालन में सफल होंगी। स्त्रियों को यह बात बतलाई जानी चाहिए कि जानकी जी के नाम का स्मरण करें, क्योंकि आशीर्वाद है, उनके नाम से पतिव्रत धर्म के पालन में बल मिलेगा। 
अनेक महिलाएं हैं, जिनका जीवन कोसते-कोसते बीत जाता है, उन्हें कुछ भी नहीं मिलता, लेकिन जो संपूर्ण जीवन अपने पति के लिए जीती हैं, ऐसी महिलाएं अगर सीता जी के नाम का स्मरण करती हैं, तो बहुत लाभ होता है। अनसूया जी ने हृदय की गहराई से आशीर्वाद दिया। पतिव्रत की सफलता ही परिवार की सफलता है, राज्य-राष्ट्र की सफलता है। पत्नी में यदि कोई खोटापन है, वह भी धीरे-धीरे दूर हो जाएगा। खोटेपन से जो हानि हो रही है, वो दूर हो जाएगी। यह वैदिक सनातन धर्म की अद्भुत स्थापना है। जीवन को सर्वविधि सुन्दर बनाने के लिए स्त्रियों के समर्पण से बढक़र कोई उपाय नहीं है।  
मेरा आग्रह है कि अनसूया जी का नाम भी महिलाएं जपा करें। धन्य हैं अनसूया और धन्य हैं सीता, जिन्होंने हर परिस्थिति में समर्पित होकर अपने पति के साथ जीवन बिताया। वे अपने जीवन के लिए ही नहीं, पूरे संसार के लिए मानक हैं। तमाम तरह के जो उपकरण बने हैं दुनिया में, लोग जिन्हें शक्तिशाली मान रहे हैं, वो कभी समाज के दूषण को मिटाने वाले नहीं हैं, कितना भी ग्रहों पर लोग चले जाएं, संसाधन बढ़ जाएं, जीवन के संसाधन बढ़ जाएं, लेकिन जब तक पतिव्रता स्त्रियां पैदा नहीं होंगी, तब तक समाज का वह स्वरूप कभी नहीं आएगा, जिसकी कल्पना ऋषियों ने की थी। पतिव्रता की शक्ति बहुत बड़ी शक्ति है, इसको कोई माप नहीं सकता, यह शुभ ही शुभ को देने वाली है। जो हर तरह के श्रेष्ठ भावों को देने वाली है। 
जगदंबा की जय हो, अनसूया माता की जय हो, सीता माता की जय हो... इससे केवल महिलाओं का सुधार नहीं होगा। संपूर्ण मानवता का उद्धार हो जाएगा। 
जय श्री राम

सती अनसूया जी : पति भक्ति अर्थात महाशक्ति


भाग - ४
यहां भगवान ने सीता जी को अनसूया जी से सत्संग करने के लिए प्रेरित किया। भगवान को पता था कि अनसूया जी आदर्श महिला हैं। राम जी ने कहा कि जाओ आप, अनसूया जी को प्रणाम करो, आशीर्वाद लो। 
अनसूया जी के पास जाकर सीता जी ने अत्यंत विनम्रता से समर्पित भावना से सीता जी को बार-बार प्रणाम किया, बार-बार चरणों में स्वयं को नवाया और उनसे आशीर्वाद की आकांक्षा की। सीता जी के विनीत भाव को देखकर अनसूया जी बहुत प्रसन्न हुईं और अपने समीप में बैठाया। एक महिला के पास दूसरी आए, तो बड़ी महिला आशीर्वाद देती है। अनसूया जी ने भी सीता जी को आशीर्वाद दिया। साथ ही, दिव्य आभूषण और दिव्य वस्त्र सीता जी को प्रदान किए। विशेषता यह थी कि ये वस्त्र और आभूषण कभी पुराने नहीं होंगे, उनमें कभी गंदगी नहीं आएगी। अनसूया जी को पता था कि राम जी वनवास के लिए निकले हैं, तपस्वी वेष है। सीता जी कहां, कैसे वस्त्र बदलेंगी, कहां आभूषण बदलेंगी, कैसे बदलेंगी। इसलिए अनसूया जी ने सीता जो को आशीर्वाद स्वरूप दिव्य वस्त्र-आभूषण दिए। 
लिखा है तुलसीदास जी ने -
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।।
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।।
अनसूया जी अपने हाथों से सीता को दिव्य वस्त्र, आभूषण पहनाए। एक और भी काम किया अनसूया जी ने, संक्षेप में जानकी जी को नारी धर्म का व्याख्यान किया कि नारी को कैसे रहना चाहिए। सबसे पहली बात नारी धर्म का व्याख्यान करते हुए कहा कि माता, पिता, भाई, जितने भी सम्बंधी हैं स्त्री के, वे सब सीमित हैं, माता-पिता, भाई इत्यादि लडक़ी को कोई भी वह नहीं दे सकता, जो पति दे सकता है। 
तुलसीदास जी ने लिखा है -
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।।
अनसूया जी ने ही यह उपेदश किया था - 
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।।
एक लडक़ी को माता-पिता क्या दे सकते हैं, पढ़ा सकते हैं, वस्त्र दे सकते हैं, दान-दहेज दे सकते हैं, यह सीमित है, इसकी एक सीमा है, अमिट देने की क्षमता पति में ही होती थी। हे जानकी, कोई सीमा नहीं है, जिसका कोई माप नहीं हो सकता, जिसको तौला नहीं जा सकता है, जिसे दायरे में नहीं लाया जा सकता, वह सुख पति ही दे सकता है। दूसरे लोग पत्नी को उतना सुख नहीं दे सकते। 
जिस तरह की देखभाल पति करता है, उस तरह की देखभाल माता-पिता भाई नहीं कर सकते। पति के साथ लगकर पत्नी अपने परलोक को भी सुधार सकती है। पति जो धर्म करेगा, उसमें आधे की भागीदार पत्नी होगी। जो परम फल अमिट फल कहलाता है, उस फल को देने की क्षमता पति के साथ लगकर ही प्राप्त हो सकती है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण उपदेश है। पिता कभी अपनी बेटी के सभी रहस्यों के जानकार नहीं हो सकते, लेकिन पति अपनी पत्नी के सभी रहस्यों का जानकार होता है। 
पति सब कुछ दे सकता है, अमित दानि भर्ता बयदेही। जो पालन-पोषण करता है, उसे भर्ता कहा जाता है। पति की सेवा करके नारी सब कुछ प्राप्त कर सकती है। लोक की सभी विभूतियों को लोक के सभी फलों को प्राप्त कर सकती है, इसलिए अनसूया जी ने कहा कि किसी भी अवस्था में पति का परित्याग नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह असीमित दान देने वाला है। भले ही पति गरीब हो, बीमार हो, नेत्र ज्योति न हो, अपंग हो, सभी प्रकार की दीनता से युक्त होने के बावजूद पति की सेवा में ही पत्नी को सब कुछ मिलेगा। दूसरों से कुछ नहीं मिलेगा, जो है, वह भी चला जाएगा। 
आजकल असंख्य नारियों का मन भटकता है अपने पति से, अपने पति की दरिद्रता, दीनहीनता, रोग आदि को देखकर भटकता है, भटकने से कुछ नहीं मिलता, बल्कि जो मिला हुआ है, वह भी छिन जाता है। इसलिए पति को किसी भी तरह से उपेक्षित नहीं करना चाहिए। यदि थोड़ा भी मन भटकता है, तो उससे अनेक तरह की यातनाएं प्राप्त होती हैं। सब कुछ मानकर पति का ही साथ तन-मन से देना चाहिए। 
इसके बाद चार प्रकार की पतिव्रता स्त्रियों का उल्लेख किया अनसूया जी ने। स्त्रियों को इन बातों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। आज के लोग समझ रहे हैं कि हम बहुत होशियार हैं, एक जगह बंधन में रहने की क्या जरूरत है, जबकि यह बंधन नहीं है, यह तो बड़े लाभ देने वाला है। जब संयम-बंधन में रहेंगे, तभी हम जीवन का सही मूल्यांकन कर सकेंगे। हम सम्बंध जरूर बढ़ाएं, लेकिन मर्यादा से सम्बंध को बढ़ाना चाहिए, जिससे हमारे जीवन का विकास हो, यह नहीं कि जो मिले उसे पत्नी मान लें, जो मिले उसे पति मान लें। सम्बंधों की गरिमा बनाए रखने के लिए बंधन जरूरी हैं। 
क्रमश: 

सती अनसूया जी : पति भक्ति अर्थात महाशक्ति


भाग - ३
पतिव्रता कुछ भी कर सकती है। जो भी करने योग्य है या नहीं करने योग्य है, वह जैसा चाहे, वैसा बना दे। यदि स्त्री पतिव्रत का पालन करती है, जो सर्वश्रेष्ठ भावों को समर्पित है, उसकी भावना कहीं नहीं भटकती। पतिव्रता नारी में बहुत शक्ति होती है। जीवन की दूसरी समस्याओं के समाधान में वे संभव हैं। जैसे ईश्वर कुछ भी कर लेते हैं, जैसे वह संप्रभुता संपन्न हैं, ठीक उसी तरह से पतिव्रता महिलाएं भी कुछ भी कर सकती हैं। 
स्त्रियों का पहले सीमित क्षेत्र था, लेकिन अब विस्तृत क्षेत्र हो गया है, अब वे कार्यालय भी जाती हैं। घर से बाहर निकलकर कई तरह के काम करने लगी हैं। बाहर निकलने से उनकी व्यस्तता बढ़ी, उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ी, उनकी पहचान बढ़ी है, उनका धन बढ़ा है। उनका मनोरंजन बढ़ा है, लेकिन इसमें बहुत बड़ी विडंबना उत्पन्न हो गई है, बाहर निकलने से पतिव्रता धर्म बहुत असक्त हुआ है। पहले एक दायरे में रहना होता था, उसमें माता-पिता, बच्चों-पति की सेवा अतिथि सेवा का काम एक दायरे में ही होते थे। सीमित दायरे में रहने से पतिव्रता धर्म का पालन करने में स्त्रियों को काफी सुविधा होती थी, काफी बल मिलता था, लेकिन उन्मुक्त जीवन जब से स्त्रियों का शुरू हुआ है, अनेक तरह के काराबारों में वे सक्रिय हुई हैं, तब से पतिव्रता यज्ञ का अनुष्ठान कमजोर पड़ा है, जिससे संपूर्ण परिवार, समाज, जाति खतरे में पड़ रही है। वैसे ज्यादातर लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसा क्यों हो रहा है। बच्चों को कौन संभाले, संस्कार कौन दे, पति कार्यालय गए, पत्नी कार्यालय गई, कौन संस्कार दे? समाज का चिंतन कई बड़े चिंतकों ने किया है, भारत ने अपने प्रभुत्व को गंवा दिया। भारत का प्रभुत्व छोटा रह गया। देश की शक्ति के मूल में एक बड़ी भूमिका है पति और पत्नी के परस्पर विश्वास की, सम्बंधों की। अनसूया जी के बारे में चिंतन करते हुए इन बातों पर ध्यान जा रहा है। 
यदि पत्नी पूर्ण रूप से पति के लिए समर्पित होती है, तो समाज, परिवार, जाति, मानवता को अनेक प्रकार की कमजोरियों से बचाया जा सकता है। अब किसी का किसी के लिए संपूर्ण समर्पण नहीं है। 
अनसूया जी अत्रि जी के साथ परलोक सुधार के लिए ही आई थीं। संतति को जन्म देने, संग्रहण करना, उनका संकल्प नहीं था। संकल्प यह था कि आज से दोनों एक हो गए, जैसे एक हाथ में पीड़ा होती है, तो संपूर्ण शरीर की पीड़ा मानी जाती है, ठीक उसी तरह से पति-पत्नी, दोनों एक हो जाते हैं। एक ही के दो भाग, एक पुरुष भाग और दूसरा नारी भाग। परिवार, समाज में पत्नी बनकर जब कोई कन्या आती थी, तो पति का बल बढ़ जाता है। एक नई शक्ति के रूप में पति प्रकट होता है। सनातन धर्म में पतिव्रता का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण रूप से स्वीकार किया गया है। एक ही पति से अपने मन, तन को जोडक़र रखना आजकल कम हो रहा है। जब जो अच्छा लगे, वैसा करना चाहिए, क्या यह सोच जीवन के सभी क्षेत्रों में संभव है? जब मन करे, वैज्ञानिक बन जाएं, डॉक्टर बन जाएं, राजनेता बन जाएं, ऐसा तो संभव नहीं है। जहां जो समर्पित हो गया, वहां वह क्षेत्र उसका अपना हो गया। जहां जो लगा हुआ है, पूर्ण समर्पण से लगे, तो उसकी शक्ति बढ़ जाती है।
पतिव्रता धर्म का पालन विश्वव्यापी धर्म है। ऋषियों-महर्षियों ने पतिव्रता का जो प्रतिपादन किया, उसके प्रयोग के लिए लोगों को समझाया, लोगों को इसका अनुरक्त बनाया, यह केवल ब्राह्मणों के लिए नहीं था, यह केवल भारत भूमि के लिए नहीं था, दुनिया के हर व्यक्ति के लिए था। 
पति तभी कामयाब होता है, जब उसके पीछे पत्नी की शक्ति पूरी तरह से लगती है। जब दोनों एक दूसरे के लिए, एक दूसरे के हित के लिए प्रयासरत रहते हैं। पतन के लिए नहीं, उद्धार के लिए प्रयासरत रहते हैं। कहीं भी अपूर्ण समर्पण से उपलब्यिां प्राप्त नहीं होतीं। संपूर्ण समर्पण से ही बड़ी उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। 
अनसूया जी पति के प्रति अपने समर्पण के कारण बहुत बड़ी शक्ति में बदल गईं। जैसे सूर्य संपूर्ण संसार को दिन में प्रकाशित करता है, चंद्रमा रात्रि में प्रकाशित करता है, ठीक उसी तरह से अनसूया जी का जो जीवन है, पूरे संसार को पतिव्रता धर्म के लिए प्रेरित करने के लिए आदर्श है। जब वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश को बालक बना सकती हैं, तो कितनी अतुलनीय शक्ति उनके पास है। 
आज समर्पण के अभाव में ही समाज भ्रष्ट हो रहा है, समाज का सही मूल्यांकन घट रहा है। सभी महिलाओं को अनसूया जी से प्रेरणा लेकर, बल लेकर अपने जीवन को सुधारना चाहिए। आज महिलाएं जीवन की कमजोरी को दूर करने के लिए यहां-वहां भटकती हैं, कई तरह के लोगों से जुड़ती हैं, किन्तु उन्हें खास कुछ प्राप्त नहीं होता। उन्हें उत्तम चरित्र प्राप्त नहीं होता। 
भगवान जब चित्रकूट में रह रहे थे। वहां काफी लोगों का आना-जाना हो गया था। भगवान ने सोचा कि इस स्थल को भी छोड़ देना चाहिए, कहीं और दूरी पर रहना चाहिए। भगवान ने महर्षि अत्रि के आश्रम में जाकर उन्हें प्रमाण किया, उनका सम्मान किया, आशीर्वाद लिया और उनसे प्रेरणा भी ली। आप आज्ञा दीजिए कि आगे बढूं, ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त करूं। अत्रि जी ने भी राम जी का बहुत आदर किया। उन्होंने भगवान की एक लंबी वंदना की और कहा कि आपकी शुचिता बनी रहे, आपकी कृपा बनी रहे। 
क्रमश: 

सती अनसूया जी : पति भक्ति अर्थात महाशक्ति

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी


भाग - २
हमारे वैदिक सनातन धर्म ने इस धारणा को बहुत पुष्ट किया। संसार का हर पति चाहता है कि उसकी पत्नी केवल उसकी पत्नी रहे। मेरे ही विकास के लिए और मुझे ही सुख देने के लिए मेरा ही सहयोग करे। जाति, संप्रदाय, नस्ल, देश कोई भी हो, पूरी दुनिया के पुरुष यही सोचते हैं। 
वैदिक सनातन धर्म ने पतिव्रता स्त्रियों को बहुत महत्व दिया, उसका लाभ भी बताया और पतिव्रता न होने की हानि का भी वर्णन किया। यह भी बताया कि कैसे पतिव्रता रहा जा सकता है। इस देश में यह प्रथा बहुत पुरानी, अनादि है। काफी कोशिश करके समाज के अच्छे लोग पत्नियों को पतिव्रता, पति परायणा बनाने का उपक्रम करते रहते हैं। पतिव्रता स्त्रियों में अनसूया जी का स्थान सबसे ऊंचा है। उनका पूरा जीवन ही अपने पति महर्षि अत्रि जी के लिए अर्पित था। उनके मन में किसी दूसरे के लिए कोई भाव आया ही नहीं। कभी उन्होंने अपनी दृष्टि या दूसरी इन्द्रीयों को दूसरी ओर नहीं लगाया। कभी लोभ नहीं आया, किसी पुरुष को उन्होंने काम की भावना से नहीं देखा, उन्होंने अपने पति देव को ही अपना सबकुछ माना। उन्हें ही परिवार माना, राज्य व देश माना, संपूर्ण संसार उन्हीं को माना। पतिव्रता होने के लिए पत्नी का जीवन सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए। महर्षि अत्रि को भी अपनी पत्नी पर बड़ा अभिमान था। 
अनेक तरह की कथाएं अनसूया जी को लेकर कही जाती हैं। एक बड़ी प्रसिद्ध कथा है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भी अनसूया जी ने बालक बना दिया था। हुआ ऐसा कि सत्संग की परंपरा है ही, सत्संग में विभिन्न विषयों की चर्चा होती है। एक बार ब्रह्मा की पत्नी ब्रह्माणी, विष्णु की पत्नी लक्ष्मी और महेश की पत्नी गौरी परस्पर चर्चा कर रही थीं कि संसार में सबसे बड़ी पतिव्रता कौन है। सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता किसको माना जाए? बहुत देर तक वे चर्चा करती रहीं, पतिव्रत धर्म की चर्चा करती रहीं, दोष निकालती रहीं। अंत में उन्होंने निर्णय किया आज के काल में अत्रि जी की पत्नी अनसूया जी सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता हैं। उनसे बड़ी पतिव्रता कोई नहीं है, ऐसा ब्रह्माणी, लक्ष्मी गौरी ने तय किया। यह बात ब्रह्मा, विष्णु, महेश तक पहुंची। चर्चा के बारे में बताया, उसके परिणाम के बारे में बताया। तीनों देवताओं ने कहा कि आप लोगों ने तय कर लिया है, तो परीक्षण भी होना चाहिए। हम तीनों जाते हैं ब्राह्मण वेष बनाकर उनकी परीक्षा लेते हैं। 
तीनों देवता महर्षि अत्रि जी के आश्रम पहुंच गए। तब अत्रि जी किसी विशेष परिस्थिति के कारण आश्रम के बाहर थे। आश्रम में ब्राह्मणों को देखकर अनसूया जी ने आदर, सत्कार किया। तीनों ब्राह्मणों ने कहा कि हम लोग आपके यहां आए हैं, अतिथि सत्कार होना चाहिए, भीक्षा भी हम लोग लेंगे, लेकिन हमारी शर्त है कि आप भिक्षा देने के पहले जितने वस्त्रों को आपने धारण कर रखा है, उन सभी को अपने से अलग रखकर हम लोगों को भीक्षा दें, तभी हम आपसे भिक्षा लेंगे। ऐसा ब्राह्मण वेषधारी ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने कहा, धर्म संकट उत्पन्न हो गया। अनसूया जी के सामने विकट परिस्थिति आ गई, उन्होंने भगवान का ध्यान किया, मन में ही कह रही हैं कि यदि पति के समान किसी दूसरे को नहीं देखा हो, यदि किसी भी देवता को पति के समान न माना हो, यदि मैं पति की अराधना में ही लगी रही हूं, तो मेरे सतीत्व के प्रभाव से ये तीनों ब्राह्मण नवजात बच्चे हो जाएं। तत्काल तीनों ही नन्हें बच्चे होकर अनसूया जी की गोद में खेलने लगे। अद्भुत घटना हो गई। दुनिया का सृजन करने वाले, पालन करने वाले और संहार करने की क्षमता रखने वाले देवता, तीनों ही अनसूया जी की गोद में खेलने लगे। तीनों ही बच्चे हो गए। यह इतिहास की अकेली घटना है। जिसकी शक्ति से ब्रह्मा विष्णु, महेश बालक रूप धारण कर लें, तो अनुमान लगाइए कि अनसूया जी कितनी महान पतिव्रता रही होंगी। 
क्रमश: 

सती अनसूया जी : पति भक्ति अर्थात महाशक्ति

(जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के प्रवचन से)

भारत में चरित्र निर्माण पर विशेष जोर रहा है। तमाम लोग जानते हैं कि अहिंसा का क्या महत्व है, फिर भी हिंसक हैं और सत्य का क्या महत्व है, फिर भी असत्य बोलते हैं। लोग अपने ज्ञान को परिपक्व नहीं बनाते हैं। ज्ञान को अपने चरित्र में नहीं उतारते हैं। कहा जाता है, धन नष्ट हुआ, तो कुछ नष्ट हुआ, शास्त्र नष्ट हुआ, तो कुछ ज्यादा नष्ट हुआ और यदि चरित्र नष्ट हुआ, तो सब कुछ नष्ट हो गया। भारत एक चरित्र प्रधान देश रहा है। यहां के संतों, गुरुओं, आचार्यों ने संपूर्ण संसार को ज्ञान का पाठ ही नहीं पढ़ाया, ज्ञान का परिपक्व स्वरूप भी संसार को दिया। इसके साथ ही अपने चरित्र में भी ज्ञान को उतारा। पूरी दुनिया को चरित्र की शिक्षा देने वाला देश भारत ही है। मनु ने भी यही कहा है। इसलिए भारत को विश्व गुरुत्व की प्राप्ति हुई।
भारत में पतिव्रता, पति परायणा महिलाओं का अस्तित्व का एक बहुत बड़ा पक्ष है, उन्नत अवस्था है। यदि कोई स्त्री है और पतिव्रता है, अपने पति को ही सब कुछ समझती है, उन्हीं के लिए आदर रखती है, स्नेह करती है और सेवा में समर्पित रहती है, उसके अतिरिक्त उसके जीवन का कोई और उद्देश्य नहीं होता, जो संपूर्ण बाहर और भीतर पति के लिए ही है, उसे पतिव्रता बोलते हैं। पति के लिए जिसके सभी व्रत हों, वो पतिव्रता। पति की प्रसन्नता, पति का विकास, पति से अनुकूलता, इसके लिए उन्हें पतिव्रता कहा जाता था। स्त्री जाति के संरक्षण, विकास, सुख के लिए, स्त्री जाति के जीवन की सार्थकता उत्तम चरित्र में है। 
शादी की जो प्रथा है, वह भी बहुत उपयोगी होती। यदि विवाह नहीं होता, तो सम्बंधों में बड़ा घृणित रूप हो जाता। जिसने विवाह की प्रथा को चलाया होगा, वह दुनिया का सबसे बड़ा आदमी होगा। वेद जो ईश्वर से प्राप्त होते हैं, जो संपूर्ण सृष्टि के नियामक हैं, उनके आधार पर भी जीवन परम ऊंचाई को प्राप्त कर सकता है। उसी क्रम में स्त्री जब शादी करके आती है, जब वह पत्नी बनती है, तो उसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है सबसे बड़ा अर्जन है, सबसे बड़ी औषधि व प्रेरणा है कि वह पतिव्रता धर्म का पालन करे। पति के लिए पूर्ण समर्पित हो जाए। अपने ज्ञान और अपनी इन्द्रीयों को किसी भी दूसरे उपक्रम में नहीं लगाए। समाज में जो आज कलह हो रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं, कई तरह की कुरीतियां आती हैं, दूषण होते हैं, वो सब समाप्त हो जाएं। पत्नी पतिव्रता होती है, तो उसका बल बढ़ता है। पतिव्रता महिलाओं के प्रति लोगों का भी सम्मान बहुत ज्यादा होता है। संदेह में आजकल कई तरह की बीमारियां पैदा हो जाती हैं, पत्नी यदि पति के लिए समर्पित न हो, तो परिवार टूट जाते हैं, परिवार टूटता है, तो समाज टूटता है। धीरे-धीरे ये टूटन पूरे राष्ट्र और मानवता को प्रभावित करता है। वस्तुत: दोनों एक दूसरे के पूरक बनकर जितना उत्पादन कर सकते हैं अपने लिए, परिवार, समाज, राज्य के लिए, उतना अलग-अलग होकर नहीं कर सकते। यह बहुत बड़ा दूषण समाज में है, पत्नी अगर पति के लिए पूर्ण समर्पित नहीं है, यदि मन उसका डोल रहा है, तो वह न अपने को सुख दे पाएगी, न पति को न परिवार को। भटकती रहेगी, भटकने की कोई सीमा नहीं है। आदमी रोज खाता है, लेकिन उसका कोई अंत नहीं है। कितने कपड़े हम पहन सकते हैं, सभी मकानों में हम ही रह लेंगे, तो कैसे होगा। अनावश्यक संपत्ति को अपने लिए आरक्षित करके हम कहीं के नहीं रहेंगे, सब संपत्ति मकान में ही खर्च हो जाएगी, फिर भी जीवन कठिन हो जाएगा, इसलिए संयम तो जरूरी है। 
क्रमश: