Saturday, 11 July 2026

जोधपुर में श्रीराघवदास जी महाराज


श्रीराघवदासजी महाराज

रामस्नेह संप्रदाय के संत श्रीरामरतनदास जी महाराज के साथ श्रीराघवदासजी महाराज 

देव-देवालय दर्शन

श्रीराघवदासजी की सेवा में श्री जानकीवल्लभदास जी - श्री हेमंत जी




देव-देवालय दर्शन



 

गुरुदेव महाराज दीक्षा गुरु वेदांत मार्तण्ड श्रीरघुवरदासजी महाराज


 


 




 

देवालय दर्शन


 







 





 





 

सेनाचार्य जी महाराज अचलानंदगिरिजी महाराज के साथ परम पूज्य गुरुदेव महाराज एवं उत्तराधिकारी जी महाराज

जयपुर में चातुर्मास के दौरान 2021

जयपुर में चातुर्मास 2021 के दौरान एक भेंट
जोधपुर में सेनाचार्य के दर्शन करने पहुंचे श्रीराघवदासजी महाराज


 



 

गुरुदेव जगदगुरु रामानंदाचार्य जी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज

प्रसन्नचित्त मुद्रा में परम पूजनीय गुरुदेव महाराज

स्नेह से सेवा का अवसर देते गुरुदेव महाराज
 
सम्मान देते गुरुदेव महाराज

 

अयोध्या, राजस्थान एवं पंजाब विहार



 

उपनयन संस्कार



जय सिया राम 

आप सभी भक्तों को बड़े ही हर्ष के साथ सूचित किया जाता हैं रामानंद सम्प्रदाय का एक मात्र मूल पीठ श्रीमठ में विराजमान पूज्य महाराज स्वामी रामानन्दाचार्य ,पद प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज एवं उनके कृपा पात्र उत्तराधिकारी राघव दास जी महाराज जी के सन्निधि में आज श्री मठ आश्रम गुरु कुल में बटुक ब्राह्मणों का उप नयन (जनेऊ संस्कार) (कर्मकाण्ड) आचार्य उपेन्द्र मिश्र, अनुज मिश्र और कृष्णकांत रावत , आदि ब्राह्मणों द्वारा सम्पन्न कराया गया। जिसमें बटुक ब्राह्मणों के लिए रहने , भोजन की व्यवस्था के साथ वेद, वेदांग ,साहित्य, व्याकरण कर्मकाण्ड संबन्धित इत्यादि विषयों की शिक्षा दी जाएगी।

गुर-परंपरा के अनुरूप उत्तराधिकार पत्र : 20 फरवरी 2026



 




 

संन्यास दीक्षा - पूज्य राघवदासजी महाराज, उत्तराधिकारी

श्रीमठ पंचगंगा घाट, वाराणसी में संन्यास दीक्षा ग्रहण, जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज अपने शिष्य राघवदासजी महाराज को आशीर्वाद देते हुए।


देश भर से पधारे साधु, संतों और विद्वतजनों के संगत में संन्यास दीक्षा संस्कार संपन्न








 

Wednesday, 18 February 2026

गुरुदेव भगवान् और श्रीमठ सेवा ही मेरी उपलब्धि

साक्षात्कार

पूज्य गुरुदेव भगवान् और श्रीमठ सेवा ही मेरी उपलब्धि : राघवदास (आचार्य चंद्रशेखर मिश्र)

गुरुदेव भगवान् के साथ : जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी के साथ राघवदास जी-आचार्य चंद्रशेखर मिश्रा 


युवा सन्त आचार्य चंद्रशेखर मिश्र रामानन्द सम्प्रदाय की एक चिर-परिचित प्रिय विभूति हैं। उन्हें गुरुदेव भगवान् रामानन्दाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज की छत्रछाया बाल्यकाल से ही प्राप्त है। श्रीमठ की सेवा और सतत शास्त्र अध्ययन ही उनके जीवन के दो मुख्य लक्ष्य रहे हैं। प्रस्तुत है, गुरुदेव महाराज के ही एक शिष्य जानकीवल्लभ दास से उनकी एक सक्षिप्त वार्ता.. 

 

प्रश्न :  किसी युवा साधु को देखकर प्रथम जिज्ञासा तो यही होती है कि ये कहां से आते हैं और इनका जन्म कहां और कब हुआ है?

 

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : जाति-पंथ के भेद से ऊपर उठकर राष्ट्र को प्रेम और भक्ति का पावन संदेश देने वाले दिव्य श्रीरामानन्द संप्रदाय से आता हूं। इसी संप्रदाय का एक अकिंचन अंश हूं। जहां तक मेरे भौतिक स्वरूप का अर्थ है - भगवद् कृपा से संतों एवं वीरों की भूमि भारत के पूर्व में स्थित बिहार राज्य के आरा जनपद के अंतर्गत बसे परसिया ग्राम में पंडित श्री गणेश मिश्र जी के घर दिनांक 24 सितंबर 1998 को मेरा जन्म हुआ था ।

 

प्रश्न : सामान्य रूप से यह देखा जाता है कि साधुओं का बचपन दुखमय रहता है। आपका बचपन सुखमय रहा या संघर्षमय बीता?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र :  ग्रामीण परिवेश में ही 9 वर्ष की अवस्था तक मेरा जीवन रहा। उन दिनों को याद करता हूं, तो मुझे अनुभव होता है कि ऐसी अवस्था में सुख-दुख का बोध प्रायः न के बराबर होता है।

 

प्रश्न : ग्रामीण परिवेश में बचपन के बाद विद्या अध्ययन के लिए कब घर-गांव छूट गया?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : 9 वर्ष की आयु में ही सन 2008 में श्रीमठ, पंचगंगा घाट, वाराणसी में अध्ययनार्थ आना हुआ और फिर यहीं का होकर रह गया। हां, विद्यार्थी अवस्था में घर-गांव आना-जाना होता था, किन्तु यहाँ के भगवत् सेवानिष्ठ दिव्य वातावरण ने कब संन्यास के तरफ खींच लिया, पता नहीं चला। धीरे-धीरे परिवर्तन स्वाभाविक रूप से ही होता गया।

 

राघवदास जी - आचार्य चंद्रशेखर मिश्र

प्रश्न : साधु या संन्यासी जीवन के लिए आपकी सबसे बड़ी प्रेरणा क्या रही है?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : पूज्य गुरुदेव भगवान जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज का सान्निध्य ही मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है। उन्होंने ही मेरे जीवन को आलोकित किया है। उनके दिव्य और महान् जीवन को देखकर ही साधु जीवन के प्रति मुझमें लगाव बढ़ा है और अब संन्यास जीवन में पूर्ण समर्पण के साथ आगे बढ़ने की इच्छा है। गुरुदेव महाराज के सतत आशीर्वाद से ही आगे मेरा मार्ग प्रशस्त होगा।

 

प्रश्न : अपने जीवन के क्या प्रमुख लक्ष्य आपने तय किए हैं?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : गुरुदेव महाराज की कृपा से हम सभी शिष्य सत् सम्प्रदाय अनुगामी हैं, जिसमें परम्परा से ही सबकुछ प्राप्त होता है। इसीलिए व्यक्तिगत मेरा कोई लक्ष्य न हो कर मेरे गुरुदेव महाराज के संकल्प ही मेरे जीवन का ध्येय हैं।

 

प्रश्न : अपने गुरुदेव महाराज के लिए आपकी भावना पहले कैसी थी और अब कैसी है? क्या इसमें समय के साथ परिवर्तन हुआ है?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : भगवान् श्रीरामजी की कृपा से मैंने गुरुदेव भगवान् से केवल दीक्षा ही नहीं प्राप्त की है, अपितु उनके चरणों में बैठकर व्याकरण, न्याय एवं सम्प्रदाय का प्रतिपद अध्ययन भी किया है। किशोरवय से ही गुरुजी की देव आराधना, संत-अभ्यागत सेवा को निहारा करता था, जिससे उनके अनुकरण की अभिलाषा मन में जागृत हुई और निरन्तर बढ़ती चली गई।

 

प्रश्न : रामानन्द सम्प्रदाय देश का एक प्राचीन व सशक्त संप्रदाय है, इसके लिए आपके मन में क्या इच्छाएं और स्वप्न हैं?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : श्री रामानन्द सम्प्रदाय विश्व का समृद्ध सन्त, महन्त एवं सर्वाधिक शिष्यों वाला संप्रदाय है, जिसमें उपास्य देव आराधना एवं भक्ति पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मेरे गुरुदेव भगवान् की छत्रच्छाया में मेरा उद्देश्य यही रहेगा कि सम्प्रदाय का सत् साहित्य एवं सैद्धान्तिक पक्ष अधिक सशक्त हो और जन-जन तक उसका अनुपम लाभ पहुंचे।

 

प्रश्न : अब संन्यास दीक्षा लेते हुए आपके मन में क्या भावनाएं आ रही हैं?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : संन्यास एक पवित्रतम अवस्था है। मुझे पूर्ण अनुभूति हो रही है, यदि मन में कोई सांसारिक वासना रही, तो संन्यास की कोई आवश्यकता नहीं है। गुरुदेव भगवान् की अनुकंपा से केवल यही आकांक्षा हो रही है कि मध्यमाचार्य जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी के जीवन का अनुकरण करते हुए समाज को विखंडित होने से रोकने के पावन प्रयत्न हों, भगवद्भभक्ति निष्ठ होकर संन्यास जीवन रहे और विश्व के हितार्थ यथा संभव कार्य संपन्न हों।

 

प्रश्न : आज के समय पर पग-पग पर आपसे प्रश्न किए जाएंगे, पूछा जाएगा कि बताइए, धर्म क्या है और उसके प्रति कर्त्तव्य क्या हैं?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : भगवान वेद या वेद भगवान द्वारा बतलाया हुआ मार्ग ही धर्म है, इसीलिए वेदविहित कर्म को ही करने के लिए श्रुति, स्मृति, पुराणादि प्रेरित करते हैं। हमें भगवान वेद के सिद्धांतों को मानना चाहिए और ये सिद्धांत ही हमारा परम कर्तव्य हैं।

 

प्रश्न : अब तक आपके जीवन में क्या प्रमुख उपलब्धियां रही हैं?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : यह अभिमान का विषय नहीं, मेरे लिए केवल संतोष का विषय है कि गुरुदेव भगवान् एवं रामानन्द सम्प्रदाय के मुख्यालय श्रीमठ, पंचगंगा घाट की 18 वर्षीय सेवा ही मेरी एकमात्र उपलब्धि है। अब इस उपलब्धि के विस्तार में ही अपने जीवन को लगा देना है।

राघवदास जी - आचार्य चंद्रशेखर मिश्र

 

प्रश्न : आज के समय में मठों में बहुत संघर्ष हैं। महंतों के बीच लोकाचार ही नहीं, शास्त्रीयता और अध्ययन का भी अभाव दिखता है। इस स्थिति को आप कैसे देखते हैं?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : साधु जीवन में भी लोकाचार, शास्त्रीयता और अध्ययन बहुत आवश्यक है। गुरुदेव भगवान की छत्रछाया में मैंने सतत अध्ययन करना ही सीखा है। वर्ष 2009 से शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा से शिक्षा गंभीरतापूर्वक प्रारंभ हुई थी। न्याय दर्शन, वेदांत दर्शन, प्रथमा से उत्तर-मध्यमा, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शास्त्री, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से एमए करने के बाद यूजीसी नेट उत्तीर्ण कर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से ही पीएचडी कर रहा हूं। हमारे गुरुदेव भगवान स्वयं भी सतत अध्ययनशील रहे हैं और हमें भी उन्होंने यही शिक्षा दी है। साधु और संन्यासी को शास्त्र अध्ययन कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

 

प्रश्न : अर्थात ऐसा लगता है कि आपके अध्ययन का क्रम आगे भी बना रहेगा?

आचार्य चंद्रशेखर मिश्र : हमारे गुरुदेव भगवान् तैत्तरीय श्रुति को उद्धृत करते हुए अनेक बार कहते रहे हैं स्वाध्यायान्मा प्रमद: स्वाध्याय (अध्ययन/आत्म-चिंतन) में आलस्य या प्रमाद न करें , जैसी भक्ति तेल की धारा की तरह होनी चाहिए, कभी टूटनी नहीं चाहिए। ठीक इसी तरह से गुरुदेव भगवान की कृपा से अध्ययन भी कभी थमना नहीं चाहिए और न कभी थमेगा। जय सियाराम।


Sunday, 24 August 2025

धर्म से भोग भी मिलेगा और मोक्ष भी

धर्म से क्या मिलेगा - प्रवचन पुस्तिका का लोकार्पण 

वाराणसी। समाज में सामान्य धारणा है कि धर्म से केवल मोक्ष मिलता है, जबकि धर्म से भौतिक जगत में भी हर प्रकार के भोग प्राप्त होते हैं। धर्म की व्यापक भूमिका पर ऐसे ही प्रकाश डालती रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी की प्रवचन पुस्तिका का लोकार्पण हुआ है। 

जगद्गुरू रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य की अनुकंपा से उनकी छठी प्रवचन पुस्तिका 'धर्म से क्या मिलेगा' का लोकार्पण श्रीविहारम आश्रम, कबीर चौरा के निकट बनारस में संपन्न हुआ है। इस पावन अवसर पर स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य ने कहा कि धर्म से लौकिक उन्नति भी प्राप्त होती है और अलौकिक उन्नति भी। धर्म से भोग भी मिलता है और मोक्ष भी। महर्षि कणाद का रचित एक श्लोक है - यतोsअभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः। 

जीवन के लिए व्यावहारिक इस प्रवचन संग्रह में मानव जीवन में धर्म की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है। इस पावन संग्रह में गुरुदेव महाराज ने अपने प्रमुख गुरुजन को भी बहुत भाव से याद किया है। एक प्रवचन केवल निरोग रहने की कला पर केंद्रित है, तो अन्य प्रवचन विवेक पर केंद्रित है। एक विरल प्रवचन में महाराज ने अपनी अमरनाथ यात्रा को स्मरण करते हुए समझाया है कि तीर्थ कैसे करना चाहिए। प्रवचन पुस्तिका में तीन लेख महाराज के परिचय पर केंद्रित हैं।

स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी आजकल अपने वाराणसी स्थित आश्रम श्रीविहारम में ही चातुर्मास कर रहे हैं। इस पावन अवसर के साक्षी बने गुरुदेव महाराज के अनेक प्रिय सेवकों व शिष्यों ने हार्दिक प्रसन्नता प्रकट की और गुरुदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया। ज्ञात रहे कि स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी की पांच प्रवचन पुस्तिकाओं का लोकार्पण पहले हो चुका है। अपनी व्यावहारिकता के लिए चर्चित इन पुस्तिकाओं के नाम इस प्रकार से हैं। दुःख क्यों होता है, अच्छा कैसे सोचा जाए?, साधु कौन, अबलौ नसानी और आओ जीवन सिखा दूं। 

जय सियाराम