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Sunday, 16 August 2026

गुरु पूर्णिमा पर गुरु पूजन उत्सव, श्रीमठ

 

श्रीमठ, पंचगंगा घाट, वाराणसी में आयोजित गुरु पूर्णिमा महोत्सव की कुछ झांकियां। श्रीमठ में इसी दिन चामुर्मास महायज्ञ का भी शुभारंभ हुआ है। 






जय जय गुरुदेव महाराज

जय जय गुरुदेव महाराज

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के श्रीचरणों में विराजमान उत्तराधिकारी आचार्य श्रीराघवदास जी महाराज

गुरुपूजन - जय जय गुरुदेव महाराज
 

Saturday, 11 July 2026

अयोध्या, राजस्थान एवं पंजाब विहार



 

संन्यास दीक्षा - पूज्य राघवदासजी महाराज, उत्तराधिकारी

श्रीमठ पंचगंगा घाट, वाराणसी में संन्यास दीक्षा ग्रहण, जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज अपने शिष्य राघवदासजी महाराज को आशीर्वाद देते हुए।


देश भर से पधारे साधु, संतों और विद्वतजनों के संगत में संन्यास दीक्षा संस्कार संपन्न








 

Saturday, 15 July 2023

सबसे बड़ा दानी कौन?

बहुत सारे लोग हैं, जो समझते हैं कि वही सबसे ज्यादा दान करते हैं। मठ बना दिया, घर बना दिया, घर दे दिया, किसी को धन दे दिया, कुछ संसाधन दे दिया, इसी को सबसे बड़ा दान समझते हैं। 

भागवद्कार ने सबसे बड़ा दानी व्यावसायियों या किसानों को नहीं कहा। भागवद्कार ने कहा कि भगवान की कथा अमृत के समान है। कथा को अमृत मानकर, उसकी विशेषता बतलाते हुए कहा कि हे भगवान आपकी कथा, हे श्याम सुंदर आपकी कथा तो अमृत के समान है। जो तीनों तापों से जल रहे हैं, संतप्त हैं, तड़प रहे हैं, बिलख रहे हैं, उनको जीवन दे देती है। 

कहा कि भगवान आपकी कथा में एक और विशेषता है, बड़े विद्वान और ऋषि भी इसकी विशेषता गाते हैं। सदाचारी गाते हैं, जो धन्य जीवन के हैं, वे भी इनकी प्रशंसा करते हैं। नारद जी भी इनकी प्रशंसा करते हैं। जो अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि का हो, उसको कवि कहा जाता है, वे भी भगवान की महिमा गाते हैं। जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि, कहावत है। सूक्ष्मदर्शी भी आपकी चर्चा करते हैं और इससे पाप का नाश भी होता है। केवल सुनने से काम नहीं होगा, उसे गुनना भी पड़ेगा। ईश्वर को सुनना है, तो उनका मनन भी करना होगा। ऐसा करने के बाद ही ईश्वर का दर्शन होगा। हम उसे देख सकेंगे। 

व्यास जी ने कहा कि भगवान की कथा में ऐसी शक्ति है कि उनको गुनने की कोई जरूरत नहीं है, केवल सुनने से ही कल्याण प्राप्त हो जाता है। जैसे आप ईश्वर की चर्चा सुन रहे थे। मनन के लिए अध्ययन की जरूरत है। मैंने जो न्याय दर्शन पढ़ा है, वह संपूर्ण दर्शन मनन का ही दर्शन है। हेतु का मनन, बारह साल लग गए पढ़ाई में। जो न्याय दर्शन नहीं पढ़ता, उसे काशी में विद्वान नहीं मानते हैं।  

व्यास जी ने कहा कि बहुत सारे लोग देते हैं, मकान देते हैं, भूमि देते हैं, ये बड़ा दान नहीं है। बटुए से देने वाला बहुत मुश्किल से गिनकर कुछ देता है, पर जो भगवद् कथा की वर्षा करता है, वह देने पर आ जाए, तो कथा अमृत की सुनामी लहर ला सकता है। भगवद् कथा की अमृत वर्षा करने वाला ही सबसे बड़ा दानी है, वह सर्वस्व दे देना चाहता है, इस अमृत वर्षा में कुछ भी घटने वाला नहीं है। 


Sunday, 20 October 2019

पंचगंगा घाट और उससे जुड़ी परंपरा

वाराणसी : गंगा के साथ ही इसके वैभव और घाटों पर मौजूद सभ्यता और संस्कृतियों का फलना फूलना यह साबित करता है कि गंगा अपने आप में भी किसी संस्कृति से कम नहीं। खासकर जब काशी में गंगा के चौरासी घाटों की चर्चा होती है तो काशी के ठाठ से जुडे़ यह घाट किसी शीर्ष प्रतीक से कम नहीं। दैनिक जागरण के वेब सीरीज में आज जानिए पंचगंगा घाट और उससे जुड़ी परंपरा और मान्यता के बारे में - 

पंचगंगा घाट में पांच नदियों के संगम की जहां मान्यता है वहीं आलमगीर मस्जिद जो स्थानीय स्तर पर बेनी माधव का डेरा के नाम से जानी जाती है, यहां ¨हदू-मुस्लिम संस्कृतियों को समाहित किए हुए है। हालांकि समय के साथ काफी क्षति तो हुई है मगर यह मस्जिद अपने समय के सबसे बड़े मंदिर माने जाने वाले बिंदु माधव के ध्वंस अवशेषों पर बनी है। कालांतर में यह भगवान विष्णु का एक विशाल मंदिर हुआ करता था जो पंचगंगा से राम घाट तक फैला हुआ था। इतिहासकारों के मुताबिक मंदिर को औरंगजेब ने नष्ट कर इस मस्जिद का निर्माण कराया। हालांकि पंचगंगा हिंदू और मुस्लिमों के परस्पर संबंधों की एक और कड़ी अपने में समेटे हुए है। यह कड़ी है मध्ययुगीन दौर में संत कबीर की। माना जाता है कि एक मुस्लिम जुलाहे के बेटे कबीर ने अपनी कृतियों से हिंदू और मुस्लिम दोनों ही वर्गो में समान रूप से लोकप्रियता बटोरी थी। यहां नदी के मुहाने पर तीन ओर से घिरी कोठरिया हैं, जो बरसात बाढ़ के दौरान पानी में डूबी रहती हैं। यहीं पर है पाच नदियों के संगम का प्रतीक मंदिर निर्मित है तो धूतपाप और किरण जैसी अदृश्य मानी जाने वाली नदियों सहित यमुना, सरस्वती और गंगा नदी का यह संगम स्थल भी है। यह जीवंत शहर बनारस के सर्वाधिक चर्चित और महत्व वाले घाटों में अपना स्थान रखता है।

दैनिक जागरण

Sunday, 15 May 2016

साधु, तुझको क्या हुआ?


(महाराज के विशेष प्रवचन का संपादित अंश)

संसार में आकार, प्रकार, स्वभाव की अथाह विविधता है, जहां चौरासी लाख योनियों की चर्चा की जाती है। चौरासी लाख योनियों के संपूर्ण निर्माण का जो श्रेय है, सनातन धर्म के अनुसार, सृष्टि जहां भी हो, जैसी भी हो, इस संपूर्ण सृष्टि का निर्माता ईश्वर ही है। ईश्वर द्वारा ही संसार में सारे निर्माण हो रहे हैं। जिन्हें आज के आधुनिक निर्माण कहा जाता है, वो निर्माण भी उसी ईश्वर के बनाए हुए पदार्थों को ही जोड़-तोडक़र हो रहे हैं। अनुसंधान हो रहे हैं, वस्तुएं बन रही हैं, उपयोगी पदार्थ बन रहे हैं, लेकिन उसका जो मूल है, उसका जो प्रारंभ है, वह तो ईश्वर ही है। इतनी बड़ी सृष्टि का संपादन कोई मनुष्य नहीं कर सकता - न समुद्र का, न हिमालय का, न आकाश का, न पृथ्वी का, न वायु का, न ग्रह-नक्षत्र का। इसलिए यह माना गया है और इसको बार-बार वेदों ने, पुराणों ने, स्मृतियों में दोहराया गया है कि संसार को ईश्वर ही बनाता है और वही उसका पालन करता है, वही उसका पोषण करता है। उसको सुन्दर बनाता है, उपयोगी बनाता है, उसे सुदृढ़ बनाता है और जब कभी उसे लगता है कि अनिवार्य है, तो उस चीज को अपने में समाहित कर लेना है, इसी को संहार कहते हैं। ईश्वर अपनी तरह से सुधार करता है। जैसे राज प्रथा की जो विकृतियां थीं, उनमें से बहुत-सी विकृतियों से समाज को छुटकारा मिला। उसकी तुलना में लोकतंत्र में बहुत-सी अच्छाइयां हैं, जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है। वैसे ही संसार को बनाकर ईश्वर ने वेदों, शास्त्रों के रूप में नियम-कानून भी बनाए कि जीवन में कैसे चलना है, कैसे रहना है, किस तरह से विकास होगा, किस तरह से व्यक्ति सही रहेगा। संपूर्ण नियम-कानून उसने बनाए और उसी आधार पर संसार को अच्छाई की ओर ले जाने का सही मार्गदर्शन किया।
कहीं कोई आदमी भटक रहा है, तो उसके दोषों को दूर करके सही रास्ते पर लाने का, कोई और अधिक उन्नति करना चाहता है, तो उसका भी मार्गदर्शन करने का। सहायक साधनों को देकर आगे बढ़ाने का, इस तरह हर सही उपाय किए गए। प्रेरित किया कि अपने दायरे में सभी परम शक्ति या सुप्रीम पावर से जुड़ें। आज यह होना कठिन लगता है, लेकिन राजतंत्र हो या लोकतंत्र या कोई अन्य तंत्र हो, परम शक्ति से सभी लोग सीधे जुडक़र अपना संरक्षण प्राप्त करें, अपना विकास प्राप्त करें। अपने जीवन की अच्छाइयों को प्राप्त करें, अपना जो भी कुछ जीवन के लिए अनुकूल है, उसे प्राप्त करें, यह कठिन काम है, इसलिए आज की दुनिया में लोकतंत्र की महत्ता अत्यंत सात्विक दृष्टि से सभी लोग स्वीकार करते हैं कि यह अच्छा तंत्र है। वैसे ही ईश्वर ने अपनी बातों को लोगों को समझाने के लिए, सही रास्ते पर लाने के लिए कि कैसे लोगों का विकास हो, चिंतन, शरीर, धन, ज्ञान का कैसे विकास हो, कैसे लोगों की गतिविधियों का विकास हो, उसके लिए एक प्रतिनिधि परंपरा का प्रारंभ किया, यही संत परंपरा है। जो ईश्वर की भावनाएं होती हैं, जो ईश्वर की स्थापनाएं होती हैं, जो ईश्वर के सारे उद्देश्य होते हैं, ईश्वर जिन भावनाओं से जुड़ा होता है, जिन गुणों से जुड़ा होता है, जिन अच्छाइयों से जुड़ा होता है, वो सब संतों में होती हैं। संत के जीवन में समाज भी यही खोजता है कि संत में लोभ नहीं हो, कामना-हीनता हो। समाज संत में यह देखता है कि उसमें श्रेष्ठता है या नहीं, संयम है या नहीं। संत में दूसरों की भलाई करने की भावना है या नहीं। लोग संत में सभी गुण खोजते हैं। संतों को परखा जाता है। लोग यह नहीं देखते कि संत को गाड़ी चलाना आता है या नहीं, कंप्यूटर चलाना आता है या नहीं, संत को प्रबंधन चलाना आता है या नहीं। संत हैं, तो संतत्व होना चाहिए। जो गुण, जो भाव, जो उत्कर्ष, जो ग्रहणशीलता, जो विशिष्टता ईश्वर में पाई जाती है, उन सभी भावों को लोग लोकतंत्र में खोजते हैं और संतों में भी खोजते हैं। लोग जब किसी में इन गुणों को नहीं पाते हैं, तब उसे ढोंगी कहते हैं।
क्रमश:

Sunday, 10 June 2012

श्रीमठ दर्शन



श्रीमठ के सामने गंगा और उस पार श्रीमठ का ही एक आश्रम है, जहाँ गोशाला भी है, श्रीमठ में बच्चों और छात्रों के लिए वहीं से रोज दूध आता है  

बोट (बड़ा वाला ) जो एक भक्त ने श्रीमठ को भेंट किया है.

यह हजारा है, हजार दीपों का स्टैंड. इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने १८वी सदी में काशी विश्वनाथ मंदिर और श्रीमठ का जीर्णोधार करवाया था, तभी यह हजारा बना. इसके बगल में एक छोटा हजारा भी है. देव दीपावली को इसे रौशन किया जाता है, तब देखने के लिए बनारस भर के लोग जुटते हैं और गंगा की रौनक देखने लायक हो जाती है. हजारा के लिए आइना बन जाती है गंगा मैया.

श्रीमठ की चौथी मंजिल की बालकनी या गलियारा, जो हमेशा के लिए याद रह जाता है.  
श्री विधान जी, अर्थात श्रीमठ के हनुमंत, सीधे सज्जन मृदुभाषी संत, जब जगदगुरु श्रीमठ में नहीं होते हैं तो विधान जी ही पूरी देख रेख करते हैं, संतों की सेवा में कोई कमी नहीं, श्रीमठ में रहकर पढ़ रहे छोटे छोटे बच्चों से घिरे रहने वाले, विधान जी सबके बाबा हैं, कोई बालक नेपाल से आया है तो कोई बिहार से तो कोई पूर्वोत्तर भारत से, तो कोई राजस्थान से, विधान जी कहते हैं, हमारा क्या त्याग है, त्याग तो इन बच्चों का है, घर बार से दूर, माता पिता से दूर, बस दो बार खाना मिलता है, सन्यासी का जीवन है, त्याग तो इन बच्चों का है. हम तो इनकी उम्र में चार पांच बार खाते थे, जेब में भूजा रखते थे, जब भूख लगी खा लिया, बच्चे हैं, पढ़ लिख लेंगे तो कोई घर सांसारिक जीवन में लौट जाएगा तो कोई सन्यासी बन जाएगा, कोई कहीं पढ़ाने लगेगा.
एक बालक बहुत विद्वान भी है, उसे संस्कृत में काफी कुछ याद है, मैं उससे पूछता हूँ, क्या घर लौटना चाहते हो? वह बालक जवाब देता है, नहीं घर नहीं लौटूंगा, यहीं रहूँगा पढूंगा.
विधान जी की छत्र छाया में बच्चे खुश हैं,  और विधान जी तो तब खुश होते हैं जब जगदगुरु श्रीमठ में विराजते हैं, विधान जी बहुत भाव बिभोर होकर कहते हैं, हमारे लिए तो वही राम हैं.

Wednesday, 6 June 2012

श्रीमठ दर्शन

श्रीमठ की तीसरी मंजिल पर विराजमान पावन चरण पादुका और जगदगुरु रामानंदाचार्य जी महाराज
श्रीमठ की बाईं ओर के घाट और गंगा जी 

श्रीमठ की दायीं ओर के घाट और गंगा जी   

श्रीमठ के ठीक सामने का घाट और श्रीमठ की बोट (सबसे बड़ी वाली), बनारस की गलियों में जब भीड़ रहती है, तब महाराज जगदगुरु इसी बोट के सहारे दूसरी घाट पर जाकर वहां किसी सड़क वाहन में विराजते हैं. श्रीमठ तक किसी सड़क वाहन के जाने की सुविधा नहीं है. श्रीमठ से करीब एक सवा किलोमीटर दूर वाहन छोड़ देना पड़ता है, और फिर गलियों से होते हुए करीब दस- बारह जगह मुड़ने के बाद गंगा और श्रीमठ के दर्शन होते हैं. जब गलियों में ज्यादा भीड़ नहीं होती और जगदगुरु के पास पूरा समय होता है तो वे भी गलियों से होते हुए लोगों को दर्शन देते हुए निकलते हैं.


बस इतना ही बचा है श्रीमठ, ऊपरी मंजिल अर्थात पांचवी मंजिल पर महाराज के विश्राम का कमरा है, यह कमरा भी छोटा ही है, सुविधा के बहुत जरूरी सामान ही यहाँ हैं. जब यह कमरा नहीं बना था तब महाराज वर्षों तक चतुर्थ मंजिल में रामजी के बगल वाले छोटे से कमरे में रहते थे

चतुर्थ मंजिल पर रामजी के मंदिर के बाहर हॉल में महाराज के बैठने का स्थान झूला. यहाँ महाराज आगंतुकों से मिलते हैं.



Monday, 28 May 2012

श्रीमठ : कल और आज

श्रीमठ की ऊपरी तीन मंजिलें 
गंगा मैया की गोद में कुछ आगे बढक़र गहरे तक रचा-बसा श्रीमठ, मानो मां की गोद में अधिकार भाव से विराजमान कोई दुलारी संतान। श्रीमठ की पांचवीं मंजिल पर बालकनी में खड़े होकर जब आगे-पीछे देखता हूं, तो लगता है, बनारस ने श्रीमठ को आगे खड़ा कर दिया है कि तुम आगे रहो, ताकि हम पीछे सुरक्षित रहें। श्रीमठ को देखकर अनायास यह अनुभूति होती है और समझ में आता है कि आखिर क्या होता है, बची हुई थोड़ी-सी जगह में खुद को बचाए रखना। श्रीमठ की यह बची हुई जगह आकार में अत्यंत छोटी है, लेकिन अपने अंतस में अनंतता और अपनी भाव गुरुता को संजोए हुए, प्रेम से सराबोर, भक्ति के अनहद नाद से गुंजायमान। संसार के अत्यंत कठिन व छलिया समय में क्या होता है सन्तत्व, यह केवल श्रीमठ को देखकर ही अनुभूत किया जा सकता है। यहाँ आकर जो अनुभूतियाँ होती हैं, वो दुर्लभ हैं और निस्संदेह, इन अनुभवों का सम्पूर्ण अनुवाद असंभव है।
बताते हैं जब गंगा जी का संसार में अवतरण नहीं हुआ था तब भी यह भूमि पावन थी. इस जगह को कभी श्री विष्णु ने अपना स्थाई निवास बनाया था. ग्रंथों में इस स्थान का उल्लेख धर्मनद नाम से भी हुआ है. इस तीर्थ को सतयुग में धर्मनद, त्रेता में धूतपापक, द्वापर में विन्दुतीर्थ एवं कलियुग में पंचनद नाम से जाना गया। धर्मनद तीर्थ तब भी था, जब गंगा जी नहीं थीं। धर्मनद तीर्थ पर दो पवित्र जल धाराएं मिलती थीं - धूतपापा और किरणा। यह संगम स्थल तब भी बहुत पुण्यकारी था। बाद में जब गंगा जी आईं, तो उनके साथ यमुना और सरस्वती भी थीं। बनारस की दो पावन धाराओं का मिलन तीन नई पावन धाराओं से हुआ और इस तरह से धर्मनद तीर्थ पंचनद तीर्थ कहलाने लगा।
पंचनद को ही लोगों ने बाद में पंचगंगा कर दिया, भगवान विष्णु द्वारा पवित्र किये गए इसी पंचगंगा घाट पर अनेक वैष्णव संतों ने निवास किया, जगदगुरु रामानन्द जी, श्री वल्लभाचार्य जी, संत एकनाथ, समर्थगुरु रामदास, महात्मा तैलंगस्वामी इत्यादि ने यहीं डेरा डाला. गंगा जी के आने के बाद बनारस में घाट तो खूब बन गए, ज्यादातर घाटों का विकास राजाओं ने करवाया, किन्तु संतों की कृपा व प्रेरणा से जो घाट बना, वह तो केवल पंचगंगा है. ग्रंथों में यह भी आया है कि इस घाट पर स्नान सर्वाधिक पुण्यकारी है. जो लोग इस तथ्य को जानते हैं, वे यहां स्नान व सीताराम दर्शन के लिए अवश्य आते हैं।
उर्जा से भरपूर कबीर को यहीं आसरा मिला, यहीं आकर गुरु की खोज पूरी हुई. पंचगंगा घाट की सीढिय़ों पर ही किसी रात लेट गए थे कबीर, और जगदगुरु रामानन्द जी सुबह-सुबह घाट की सीढियां उतर रहे थे, उनके पाँव कबीर पर पड़ गए थे, कबीर भी यही चाहते थे, जगदगुरु रामानन्द जी ने उन्हें हाथों से पकडक़र उठा लिया था, कष्ट मिटाते हुए कहा था, बच्चा राम राम कहो, तुम्हारा कल्याण होगा. उसके बाद पूरे बनारस को पता चल गया कि एक निम्न जाति के कबीर को जगदगुरु रामानन्द जी ने अपना शिष्य बना लिया है. कबीर से जुडी इसके बाद की भी रोचक कथा है, जिसे आप सब जानते हैं.
पंचगंगा घाट श्रीमठ आकर रोम हर्षित हो उठते हैं, बिल्कुल यहीं रहते होंगे आचार्य जगदगुरु श्री रामानन्द जी। यहां कभी विराजती होंगी - कबीर, रैदास, पीपा, धन्ना, सेन और गोस्वामी तुलसीदास जैसी अतुलनीय विभूतियां। यहां पत्थरों के स्पर्श में भी जादू-सा है। जहां आप पांव भी रखते हैं, तो लगता है, ओह, जरा प्रेम से रखा जाए। पंचगंगा घाट के पत्थर इतिहास नहीं बताते, लेकिन यह अनुभूति अवश्य करा देते हैं कि देखो, आए हो, तो जरा ध्यान से, जरा प्यार से, भाव विभोर हो, जरा याद तो करो कि यहां क्या-क्या हुआ होगा। यहां लाखों वैष्णवों, रामानन्दियों ने खरबों बार जपा होगा - सीताराम-सीताराम। यह भूमि पवित्र हो गई, तभी तो बची हुई है।
पंचगंगा घाट बनारस के प्राचीनतम पक्के घाटों में शामिल है। 16 वीं सदी में यहां जयपुर-आमेर के राजा मानसिंह ने भी घाट का निर्माण करवाया था। 18वीं सदी में जीर्णोद्धार का कुछ काम महारानी अहिल्याबाई ने भी करवाया। पहले श्रीमठ काफी विस्तृत था, लेकिन ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि यवनों ने इसे लगभग पूरी तरह से तोड़ दिया। यहां विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दुख और रोष होता है, श्रीमठ की जगह यवनों ने अपना विशाल धर्मस्थल बना लिया, जो आज भी श्रीमठ के पीछे स्थित है। यह आक्रमण इस बात का प्रमाण है कि श्रीमठ का भारतीय संस्कृति में कैसा उच्चतम स्थान रहा होगा कि जिसे ध्वस्त करके ही शत्रु आगे बढ़ सकते थे। बनारस में गंगा घाट क्षेत्र में ऐसा विनाशकारी अधार्मिक अतिक्रमण और कहीं नहीं दिखता। उस पावन स्थली को ध्वस्त किया गया, उस महान तीर्थ को ध्वस्त किया गया, जहां से कभी भारतीय संस्कृति को सशक्त करने वाला महान नारा गूंजा था कि जाति-पांति पूछे नहि कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।
रामजी की कृपा से पूजनीय है यह धर्मस्थल, जहां ब्राह्मणवाद सम्पूर्ण समाज को समर्पित हो जाता है, जहां चर्मकार रैदास के लिए भी जगह है, तो जाट किसान धन्ना के लिए भी, जहां कबीर जुलाहे को सिर आंखों पर बिठाया जाता है, जहां जात से नाई सेन भी पूजे जाते हैं और जहां राजपूत राजा पीपा को भी सन्त बना दिया जाता है। जहां वर्णभेद नहीं, लिंगभेद नहीं, वर्गभेद नहीं। जहां भगवान के द्वार सबके लिए खुले हैं, जहां पहुंचकर पद्मावती और सुरसरी सन्त हो गईं। ऐसा श्रीमठ हमले का शिकार हुआ, तो उसके पीछे का षडयंत्र प्रत्येक भारतीय को पता होना चाहिए। 

श्रीमठ के मंदिर, रसोईघर और विद्यार्थियों के रहने की जगह के पीछे विशाल धार्मिक अतिक्रमण

आक्रमण व विध्वंस के उपरांत कभी बस आचार्य रामानन्द जी की पादुकाओं का स्थान ही शेष रह गया था, फिर कभी दो मंजिल की एक छोटी-सी इमारत बनी, लेकिन अब थोड़ी-सी जगह में पांच मंजिली इमारत खड़ी है, भीतर-बाहर से पवित्र, प्रेरक, उज्ज्वल। विनाश व विध्वंस के अनगिनत प्रयासों के बावजूद श्रीमठ आज हमारे समय का एक बचा हुआ अकाट्य और महान सत्य है। ऐतिहासिक भारतीय संकोच का जीता-जागता उदाहरण है। हम आक्रमणकारी नहीं हैं, हम हो नहीं सकते। हम अतिक्रमणकारी नहीं हैं, हम हो नहीं सकते। हम छीनते नहीं, क्योंकि छीन नहीं सकते। हम खुद को बदलते-बनाते चलते हैं। हम दूसरों की लकीर छोटी नहीं करते, अपनी छोटी ही सही, लेकिन जितनी भी लकीर है, उसे बचाते-बढ़ाते चलते हैं और चल रहे हैं। ठीक ऐसे ही चल रहा है श्रीमठ।
लोग कहते हैं कि मठों में बड़ा विलास और वैभव होता है, लेकिन सीधा-सादा श्रीमठ इस आधुनिक-प्रचारित तथ्य को सिरे से नकार देता है। श्रीमठ अपने भले होने की मौन गवाही देता है। अर्थात अपने होने में श्रीमठ ने उसी सज्जनता, सादगी और सीधेपन को बचाया है, जिसे आचार्य श्री रामानन्द जी ने बचाया था, जिसे कबीर ने पुष्ट किया और गोस्वामी तुलसीदास जी ने घर-घर पहुंचा दिया।
यह परम सौभाग्य है कि आज श्रीमठ के पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी भी सादगी के अतुलनीय प्रतिमान हैं। अपनी सम्पूर्ण सशक्त उपस्थिति के साथ वे इस कठिन काल में भी न्यायसिद्ध विद्वतापूर्ण सच्ची राम भक्ति के महान प्रमाण हैं। जैसे वे हैं, वैसा ही आज का श्रीमठ है, सीधा-सच्चा-सज्जन-बेलाग। आचार्य श्री में थोड़ी-सी भी असक्तता होती, तो श्री राम विरोधी विशालकाय भौतिक अभियान श्रीमठ को धकियाता-मिटाता समाप्त कर देता और बाकी बचे हुए को गंगा मैया की लहरें बहा ले जातीं। आज श्रीमठ खड़ा है, गंगा मैया को बताते हुए कि मां, मैं अब यहां से नहीं डिगने वाला। बनारस के गंगा तट पर वरुण घाट से अस्सी घाट तक इतना बेजोड़ राष्ट्र को सशक्त करने वाला दूसरा कोई मठ नहीं है।
यह बात सही है कि आक्रमण के कारण बीच में काफी लंबे समय तक श्रीमठ की गद्दी एक तरह से खाली हो गई थी। कोई रखवाला नहीं था, किन्तु रामभक्त वैष्णव सन्तों के आशीर्वाद और प्रेरणा से रामानन्दाचार्य श्री भगवदाचार्य जी ने श्रीमठ के नवोद्धार की नींव रखी। उनके उपरान्त रामानन्दाचार्य शिवरामाचार्य जी महाराज ने समृद्ध परंपरा की बागडोर रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी को थमा दी। आज श्रीमठ अपनी सुप्तावस्था से काफी आगे निकल आया है, जाति से परे जाकर सन्त सेवा जारी है, यहां से एक से एक विद्वान निकल रहे हैं, समाज, संस्कृति और संस्कृत की सेवा हो रही है। श्रीमठ आज हर पल जागृत है, आज उसकी पताका चहुंओर दृश्यमान होने लगी है। अब चिंता की कोई बात नहीं। आज वह जितना सशक्त है, उतना ही शालीन है। कोई शोर-शराबा नहीं, कोई ढोल-धमाका नहीं, केवल सेवाभाव, भक्तिभाव, रामभाव और सीताराम-सीताराम-सीताराम . . . .