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Wednesday, 21 September 2011

ऐसे संत कम हैं

रामबहादुर राय
प्रसिद्ध पत्रकार
ऐसे संत कम हैं, जो विद्वान भी हैं और अपनी बात ढंग से रख सकते हैं। इनकी जो पहली योग्यता दिखती है, वह है अपने पंथ के बारे में और उसके इतिहास के बारे में बचपन से ही आकर्षण। यह भी नहीं है कि मठ के आकर्षण ने उन्हें संत बनाया हो। कई बार ऐसा भी होता है, मठ का वैभव लूटने के लिए लोग संत बन जाते हैं। बनारस में जहां ये रहकर पढ़े-लिखे हैं, एक संस्कृत विद्यालय में। उस संस्कृत विद्यालय के सामने साहित्यकार मनु शर्मा रहते थे, उनके बहुत सारे उपन्यास हैं। तब मनु शर्मा की इन सब चीजों में रुचि नहीं थी, लेकिन मनु शर्मा की माता जी जो हैं, वो रामनरेशाचार्य जी को (तब वे रामनरेशाचार्य नहीं हुए थे) बहुत मानती थीं और अपने परिवार में यह चर्चा करती थीं कि इस लडक़े को यहां से निकालना चाहिए, बहुत प्रतिभा है, बहुत क्षमता है और संस्कृत पढक़र ये भविष्य में क्या करेंगे।.. लेकिन ये उनका अपना स्नेह था, जो बालक रामनरेशाचार्य जी पर बरसता था। इससे यह मालूम होता है कि साधना करके वे यहां तक पहुंचे हैं। यह स्वाध्याय और प्रार्थना का बल है, जो वे यहां तक पहुंचे हैं। यह बात उनमें दिखाई भी पड़ती है, जो व्यक्ति स्वाध्याय और साधना से ऊपर उठता जाता है, उसमें एक स्वाभिमान भी होता है, जो रामनरेशाचार्य जी में भरपूर दिखता है।
धारणा तो यह है कि वे दिग्विजय सिंह के करीब हैं और कुछ हद तक कांग्रेस हाईकमान के भी. मेरी धारणा यह है कि दिग्विजय सिंह चूंकि रामानंद जी के एक प्रिय शिष्य संत पीपा के वंशजों में से एक हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से रामनरेशाचार्य जी का उनसे भावनात्मक लगाव है।

Sunday, 11 September 2011

स्वामी रामनरेशाचार्य जी


रामबहादुर राय
स्वामी रामानन्द ने जहां से भक्ति आंदोलन चलाया, वह काशी का पंचगंगा घाट है। उस पर श्रीमठ है। इस मठ का नामकरण अपने आप में भक्ति की गंगोत्री का प्रतीक है। श्री का अर्थ सीता से है। साफ है कि स्वामी रामानंद का भक्ति आंदोलन भगवान श्रीराम का गुणगान है। जब स्वामी रामानंद का सप्तशताब्दी महोत्सव मनाया गया, उसके अध्यक्ष तत्कालीन मुख्यमंत्री दिज्विजय सिंह थे, उस समय यह जाना जा सका कि वे संत पीपा के वंशज हैं। याद करिए कि स्वामी रामानंद के शिष्यों में एक पीपा भी थे। जो श्रीमठ था, वह स्वामी रामनरेशाचार्य से पहले श्रीहीन हो गया था। उसे जगाने में स्वामी रामनरेशाचार्य लगे हैं, विद्वानों का मानना है कि श्रीमठ बहुत विशाल था। आश्चर्य की बात है कि स्वामी रामानंद का विशाल आनंदमठ और श्रीमठ ऐतिहासिक रूप से प्राय: लुप्त हो गए। स्वामी रामानंद का वह विशाल वन, जिसमें हजारों संन्यासी रहते थे, सैंकड़ों सूफी, पचासों संत, फकीर, जंगम, जोड़े, नाथपंथी रहता करते थे, वहां लोगों के घर हैं।
दु:ख क्यों होता है?