Showing posts with label जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी. Show all posts
Showing posts with label जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी. Show all posts

Tuesday, 21 July 2026

कभी हिंसा न करो - रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी

(एक प्रवचन के अंश)

हम कभी नहीं चाहते कि हमारे साथ कोई हिंसा करे, मेरी वाणी की, मेरी सुन्दरता की, मेरे बल की, मेरे धन की हिंसा कर दे। वेदों ने कहा, मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि। किसी भी जीव की हिंसा वर्जित है। कथा है कि एक ऋषि ने एक उडऩे वाले पतंगे के पंख पर कुछ गड़ा दिया था, तो उनको सूली पर चढऩा पड़ा था। एक मेरे भक्‍त हैं, मुझे सुना रहे थे, 'एक बार मैंने बंदूक का निशाना किया, विनोद कर रहा था, ऊपर एक चिडिय़ा थी, दुर्भाग्य से उसकी आंख में गोली लगी, वह गिर गई, वह बची नहीं। वह भक्‍त मेरे बड़े शुभचिंतकों में हैं, मैं जब उन्हें कर्म का सिद्धांत बता रहा था, तो उन्होंने मुझसे कहा, 'मैं आइंस्टीन हूं कर्म का, प्रयोगकर्ता। मुझे बेटा हुआ, उसकी दाहिनी आंख ठीक नहीं थी, जन्म से ही अंधा था, डॉक्टरों को दिखाया, उसका कोई इलाज नहीं था, तो देखिए तुरंत न्याय हो गया, इधर से लीजिए, उधर से दीजिए, कहीं और जाने का कोई अर्थ ही नहीं है।

वेद जिसको कहता है कि करो, वह धर्म है या उस कर्म से उत्पन्न ऊर्जा धर्म है। धर्म की दो परिभाषाएं हैं, कुमारिल भट्ट और प्रभाकर जी की। वेदनिहित कर्म को धर्म कहते हैं, वेदनिहित कर्म से उत्पन्न कर्म से जो शक्‍त‍ि उत्पन्न होती है, जो दिखाई नहीं पड़ती, उसे धर्म कहते हैं। वेदों में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो दुनिया के लोगों के लिए मान्य न हो। उसके लिए मुझे दो बातें कहनी हैं। पहली बात, वह जो बनाई हुई पद्धति है, हमारा सनातन धर्म कहता है, अनादि सृष्‍टि का अनादि चिंतन हो और सबके लिए चिंतन हो। हरिजन के लिए भी चिंतन हो। जो दुकानदार लोग दिन भर झूठ बोलते हैं, वे भी घर में अपनी पत्‍नी से यही उम्मीद करते हैं कि पत्‍नी सत्य बोले। 

जिसने दिन भर झूठ बोला है कि यह सामान इतने का है, इसमें मार्जिन बिल्कुल नहीं है, किन्तु वह भी उम्मीद करता है कि उससे सच बोला जाए। 

सारे लोग ऐसा नहीं करते, किन्तु ज्यादातर लोग व्यवसाय में झूठ बोलते हैं, फिर भी वे चाहते हैं कि उनसे सच बोला जाए। हुआ न. . . सत्यम् वद्। 

मेरे लिए तो अवसर ही नहीं आता है कि झूठ बोलूं। सत्य की सबको जरूरत है।  

Friday, 4 July 2025

दिव्य चातुर्मास महायज्ञ कार्यक्रम

सादर सूचना एवं आमंत्रण
वाराणसी। परम आराध्य तथा परमाचार्य भगवान सीताराम जी महाराज की पावन कृपा एवं जगदगुरु रामानंदाचार्य जी महाराज की अनुकंपा से गुरुदेव महाराज रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी इस वर्ष वाराणसी में चातुर्मास करेंगे।  चातुर्मास महायज्ञ का शुभारंभ 10 जुलाई 2025 को हो रहा है और समापन 7 सितंबर 2025 को होगा।
 जय जय सियाराम




 

Tuesday, 31 December 2024

भगवत्स्मरण करें

कई जन्मों के संस्कार हमारी आत्मा में पड़े हुए हैं। यह तो हमारा सौभाग्य है कि वे याद नहीं आते, जन्म-जन्मांतरों में हमने जो अनुभव किया, उसमें जो प्रगाढ़ संस्कार थे, जो मजबूत संस्कार थे, बस वही साथ रह जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं, ये संस्कार मन में पड़े हुए हैं, तो कुछ कहते हैं, आत्मा में पड़े हुए हैं। उनका कोई उद्बोधक नहीं मिलता, उनको कोई जगाने वाला नहीं मिलता। संसार में तमाम तरह के कर्म हैं, जो पूर्वजन्म में किए गए होंगे, जिनका स्मरण नहीं होता। न जाने किस-किस योनी में जन्मे होंगे, गिद्ध रहे होंगे, कभी कुत्ता रहे होंगे, कभी बिल्ली रहे होंगे, कितने चूहों को दबा दिया होगा। लोग कहते हैं कि हमने कोई पाप नहीं किया, फिर हमारे जीवन में कष्‍ट क्यों आ गया। व्यवसाय में मंदी आ गई, तो कई लोग सोच रहे होंगे, हमने तो कुछ नहीं किया, फिर यह मंदी कैसे आ गई। जरा अपने पिछले जन्म का तो ध्यान करो, भले आदमी। बिल्ली रहे होगे, न जाने कितने चूहों का गला दबा दिया होगा। कितने पाप हुए, कितनी अनुभूतियां हुईं गलत, जो मजबूत संस्कार थे, वही रह गए। संस्कार यदि मजबूत हों, तभी रहते हैं, वरना मिट जाते हैं।

तभी तो कृष्ण ने कहा, 'अंत में मेरा स्मरण करो?

अर्जुन ने कहा, 'अंत में कैसे होगा?

तो कृष्ण ने कहा, 'तब तो निरंतर स्मरण करना होगा।

जो निरंतरता, प्रगाढ़ता, अनन्यता के साथ अत्यंत श्रद्धा के साथ स्मरण होता है, वही अंतिम काल में होता है। ऐसा नहीं है कि बुढ़ापे में ही रामजी याद आएंगे, रामजी को तो प्रारंभ से ही याद रखना होगा। जो प्रारंभ में याद रखेगा, उसे ही रामजी बाद में भी याद रहेंगे। 


 


 


 


 


 


 


 

अधर्म से जो पैसा आएगा

महर्षि कणाद ने कहा कि धर्म वह है, जो अभ्युदय मतलब लौकिकता को देता है, सकारात्मक नैतिक उन्नति को देता है। सुन्दरता तो सुन्दरता है, लेकिन वह सुन्दरता नहीं है, जो सिनेमा में काम आए। सुन्दर होकर यदि वेश्यावृति ही कोई औरत करती है, तो यह ठीक नहीं है। जो अपने पति का साथ दे, जहां दिया माता-पिता ने, उसको मर्यादा में रहकर निभाए। मर्यादा में ही सुख है। सुन्दरता चाहिए, तो शालीनता भी चाहिए कि जहां वह जाए, सबको गदगद कर दे। कितने लोगों को कोई सुन्दरी पति बना सकती है, दुनिया की किसी सुन्दरी ने दुनिया के सभी लोगों को कभी भी वासनात्मक सुख नहीं दिया है और न दे सकती है। सुन्दरता होनी चाहिए, किन्तु वह सकारात्मक होनी चाहिए। बल भी होना चाहिए। सैनिक बलवान होना चाहिए, बल का अपना क्षेत्र है, मजदूरों को भी भगवान बल दें। बल नहीं होता, तो मैं गरज-गरज कर बोलता क्या? बल है, तभी तो बोल रहा हूं, बल नहीं होगा, तो जो बोलूंगा, वह किसी को सुनाई ही नहीं पड़ेगा। लेखनी में भी बल होना चाहिए, तभी तो संपादन, लेखन गरजेगा। बल हो, सुन्दरता हो, लेकिन उसका सकारात्मक उपयोग हो, यही धर्म है।

पैसा धर्म से भी आता है और अधर्म से भी आता है। धर्म से जो पैसा आएगा, वह सकारात्मक विकास करेगा और भोग का सही संसाधन मुहैया करवाएगा और अधर्म से जो पैसा आएगा, वह आदमी को गलत बनाएगा, दूसरी पत्‍नी, मांस मदिरा, अमुक-गाड़ी, हों हों, शोर-शराबा। नई-नई गाड़ी खरीद रहे हैं, नया-नया बंगला बना रहे हैं। वश चले, तो रोज बंगला बने, शरीर तो बना ही नहीं रहे हो रोज। पैसा हो जाता है, तो आदमी को लगने लगता है कि यह मकान बहुत छोटा है। अरे मरो इसी में भले आदमी, बच्चों को कहो कि आप पंद्रह एकड़ में बनाना। अधर्म हुआ, तो बहुतों को देखो, जो भगवान ने मकान दिया था, वही टूट रहा है।

इसलिए धर्म जीवन के विकास का सही साधन है।

दिखावा क्या करना

आजकल तो बड़े लोग हर साल अपना सोफा, कुर्सी-टेबल, सजावट बदल देते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए, सादगी का जीवन होना चाहिए। रामराज्य का जीवन होना चाहिए। जरा सोचिए कि राम जी ने जंगल में कैसे बिताया होगा समय। ईश्‍वर  की बात छोडि़ए, अयोध्या के महल में तो सब कुछ था, किन्तु जंगल में रहकर एक दिन उफ् तक नहीं किया।

वृंदावन में एक महात्मा से मैं मिला था। उन्हें देखकर बहुत अच्छा लगा, तो मैंने उनसे पूछा, 'आप इतने अच्छे साधु हो गए, इसका रहस्य क्या है?

उन्होंने कहा, 'मैं तो आपको अपना रोना कहने आया हूं, आप मेरा ही इंटरव्यू मत लीजिए। हां, मुझे एक बात का सदा ध्यान रहा कि मैं साधु बनने आया हूं, और इसी का आज यह फल है।

मैं भी बनारस साधु बनने नहीं आया था, मैं तो विद्वान बनने आया था, अविवाहित रहने आया था। मुझे साधु तो नहीं बनना था, लेकिन जब रामानंदाचार्य हो गया, तो फिर कोशिश की कि थोड़े-बहुत साधु हम भी हो जाएं, साधुओं जैसे दिखने लगें। इस कोशिश से मुझे भी लाभ हुआ।

ध्यान दीजिएगा, केवल यह याद रहे कि मैं साधु हूं, तो आदमी साधु हो जाएगा। दिखावा क्या करना, गद्दी का क्या करना? जब शरीर का मांस ही सूख जाएगा, तो बुढ़ापे में तो ये गद्दा ही गडऩे लगेगा। चेहरा सिकुड़ जाएगा, दांत टूट जाएंगे, तो ये गद्दा-पंखा काम करेगा क्या? कदापि नहीं करेगा।

मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि

हम कभी नहीं चाहते कि हमारे साथ कोई हिंसा करे, मेरी वाणी की, मेरी सुन्दरता की, मेरे बल की, मेरे धन की हिंसा कर दे। वेदों ने कहा, मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि। किसी भी जीव की हिंसा वर्जित है। कथा है कि एक ऋषि ने एक उडऩे वाले पतंगे के पंख पर कुछ गड़ा दिया था, तो उनको सूली पर चढऩा पड़ा था। एक मेरे भक्‍त हैं, मुझे सुना रहे थे, 'एक बार मैंने बंदूक का निशाना किया, विनोद कर रहा था, ऊपर एक चिडिय़ा थी, दुर्भाग्य से उसकी आंख में गोली लगी, वह गिर गई, वह बची नहीं। वह भक्‍त मेरे बड़े शुभचिंतकों में हैं, मैं जब उन्हें कर्म का सिद्धांत बता रहा था, तो उन्होंने मुझसे कहा, 'मैं आइंस्टीन हूं कर्म का, प्रयोगकर्ता। मुझे बेटा हुआ, उसकी दाहिनी आंख ठीक नहीं थी, जन्म से ही अंधा था, डॉक्टरों को दिखाया, उसका कोई इलाज नहीं था, तो देखिए तुरंत न्याय हो गया, इधर से लीजिए, उधर से दीजिए, कहीं और जाने का कोई अर्थ ही नहीं है।

वेद जिसको कहता है कि करो, वह धर्म है या उस कर्म से उत्पन्न ऊर्जा धर्म है। धर्म की दो परिभाषाएं हैं, कुमारिल भट्ट और प्रभाकर जी की। वेदनिहित कर्म को धर्म कहते हैं, वेदनिहित कर्म से उत्पन्न कर्म से जो शक्‍त‍ि उत्पन्न होती है, जो दिखाई नहीं पड़ती, उसे धर्म कहते हैं। वेदों में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो दुनिया के लोगों के लिए मान्य न हो। उसके लिए मुझे दो बातें कहनी हैं। पहली बात, वह जो बनाई हुई पद्धति है, हमारा सनातन धर्म कहता है, अनादि सृष्‍टि का अनादि चिंतन हो और सबके लिए चिंतन हो। हरिजन के लिए भी चिंतन हो।

जो दुकानदार लोग दिन भर झूठ बोलते हैं, वे भी घर में अपनी पत्‍नी से यही उम्मीद करते हैं कि पत्‍नी सत्य बोले। जिसने दिन भर झूठ बोला है कि यह सामान इतने का है, इसमें मार्जिन बिल्कुल नहीं है, किन्तु वह भी उम्मीद करता है कि उससे सच बोला जाए। सारे लोग ऐसा नहीं करते, किन्तु ज्यादातर लोग व्यवसाय में झूठ बोलते हैं, फिर भी वे चाहते हैं कि उनसे सच बोला जाए। हुआ न. . . सत्यम् वद्। मेरे लिए तो अवसर ही नहीं आता है कि झूठ बोलूं। मेरा यह कहना है कि सत्य की किसको जरूरत नहीं है?

सत्य के बाद फिर परिष्कार हुआ। अहिंसा की सबको जरूरत है। दान की किसको जरूरत नहीं है? आप अपनी लेखनी की रोटी खा रहे हैं, हम दान की रोटी खा रहे हैं, लेकिन आपमें और हममें कोई अंतर नहीं है। दोनों को दान की जरूरत है। पत्‍नी कहीं से दान में आई है या कोई बहन है आपकी? यदि बहन से शादी कर लिए होते, तो आज यहां कोई बैठने देता क्या? दरवाजा बंद कर दिया जाता। माता-पिता ही बाहर कर देते, समाज में सब थू-थू करते। दान है, कन्यादान प्राप्‍त  हुआ है, किसी ने अपनी बेटी आपको दान की। जो आपके घर में बैठकर आपके बच्चों को संभाल रही है, आपके घर को संभाल रही है, हर व्‍यक्‍त‍ि दान से चलता है। यह संसार दान से चलता है।

Monday, 3 June 2019

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - ८
सभी लोगों को भगवान उज्ज्वल अनुपम प्रेरणा दे रहे हैं। कहीं कोई पिता है, यदि वह गलत बोलता है, तो वो नहीं है पिता। अगर गलत बोलता है, तो वह नहीं है पुत्र। पिता डकैती करने के लिए कहेगा, तो करेंगे क्या? गलत भावना का समर्थन भी नहीं करना चाहिए। भयभीत नहीं होना चाहिए। ईश्वर रक्षक हैं। 
मेरे जीवन में भी व्यवधान आए। मेरे पिता गुरुजी बड़े विद्वान थे। बड़े गुरु के शिष्य थे, लेकिन आश्रम की सेवा को चंदा लाना, कमरा बनाना, यही सबको बहुत महत्व देते थे। मांग-मांग कर लाना। व्यसनी नहीं थे, चरित्रवान थे, वंश बड़ा था, पढ़े भी थे, किन्तु वे हमें भी बोलते थे, आपको ऐसे ही करना है। उसका हमने थोड़ा भी पालन नहीं किया। मैं कहता हूं- भक्त हमें जो धन देते हैं, उसका हम पूर्ण सदुपयोग करते हैं राम भाव के प्रचार-प्रसार में। 
सभी लोगों को अपनी शक्ति का उपयोग प्रह्लाद जी की रीति से करना चाहिए। वो चंद्रमा हैं, जिसका सबको लाभ उठाना चाहिए। वे कभी मरने वाले नहीं हैं, उनका महापथ कभी मरने वाला नहीं है। यह पथ प्रह्लाद जी का ही नहीं है, यह पथ वेदों का है, स्मृतियों, पुराणों का है। परमार्थ का जीवन केवल कीर्तन करने के लिए नहीं है। केवल मंच पर कहे और फिर लग गए मांगने कि आप कितनी दक्षिणा देंगे। आज के संत जब किसी मंच पर कथा करने आते हैं, तो पहले ही अनुबंध कर लेते हैं। 
सुदामा जी जब गए भगवान के यहां, कई कथाकार कहते हैं कि सुदामा जी से बड़ा कोई दरिद्र ही नहीं हुआ। ऐसे कथाकारों से बड़ा दरिद्र कोई नहीं है। बोलते हैं कि लाइए चावल जैसे सुदामा जी लाए थे और मेरा बोरा भर दीजिए। दक्षिणा के लिए रूठ जाते हैं। 
एक बार एक जगह भागवत सप्ताह का उद्घाटन करने मैं गया था। वहां एक कथाकार ने कहा कि साढ़े तीन सौ कथाएं मैंने की, किन्तु इतना फिसड्डी पंडाल कहीं नहीं लगा, सूर्य की रोशनी तक नहीं रुक रही है। मंच विमान जैसा बनवाया था। मैंने कहा, वाह, जिस भगवान ने नंगे पांव गायों के पीछे चलकर अपने मित्रों के साथ सेवा का परम आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया, उसी भगवान की कथा कहने वाला कथाकार पंडाल में आती धूप पर ही प्रवचन करने लग गया। यह भी बतला दिया कि अब तक कितनी कथाएं कर चुका हूं। 
मैंने मैल छुड़ा दिया उद्घाटन भाषण में। यह कोई बात नहीं, मुझे २९ साल हो गए रामानंदाचार्य हुए, कभी भी किसी को नहीं कहा कि आपका मंच कैसा है, पंडाल कैसा है, दक्षिणा कैसी है, आपका भोजन कैसा है। 
प्रह्लाद जी का अनुकरण करना है। सारी यातनाओं को झेलकर प्रह्लाद जी वैसे ही हो गए जैसे चंद्रमा और सूर्य हैं, जैसे वायु हैं। जिनका कोई जोड़ नहीं है। एक से एक लोग हुए सनातन धर्म में जिन्होंने परम पुरुषार्थ की प्राप्ति के व्यवहार को बतलाया। केवल रोटी और भोग के लिए हमें व्यवहार नहीं करना है, हमें केवल धर्म के लिए व्यवहार नहीं करना है। 
सबसे उत्तम मोक्षीय व्यवहार ही होता है, इसी के लिए मानव जीवन है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए जो व्यवहार है, उसका सभी को लाभ लेना चाहिए। हमें सुधार करना होगा। एक ही बार में कोई चाहे कि मैं चौथे पायदान पर पहुंच जाऊं, तो उसके पैर ही टूटेंगे। ऊंचाई पर पहुंचने के लिए आवश्यक है कि पहला पायदान, दूसरा पायदान, तीसरा पायदान आवश्यक है। धीरे-धीरे बढ़ें। 
पहला पायदान - हम अर्थ को शुद्ध करें, अर्थीय व्यवहार सुधारें, अर्थ पाने के व्यवहार को शास्त्रीय बनाएं। उसके आधार पर धन अर्जित करें। 
दूसरा पायदान - हम भोग की प्राप्ति के अनुरूप व्यवहार को शुद्ध करें। 
तीसरा पायदान - हम अपने धर्म के संपादन की जो क्रियाएं हैं, जिन्हें हम व्यवहार कहेंगे, उनको भी शुद्ध करें। दान भी व्यवहार का बड़ा स्वरूप है। आज दान ही देने नहीं आ रहा है लोगों को। आयकर चुराकर दान दे रहे हैं। लूटपाट करके दान दे रहे हैं। दान के पात्र, स्थान, काल का ध्यान नहीं है। आज लोग दान दे रहे हैं कि इससे हमारा उपकार होगा, इससे हमारा धन लौटेगा। जैसे उद्योगपति लोग नेताओं को देते हैं कि नेता जी सत्ता में आएंगे, तो लाभ देंगे। यहां केवल लोगों में लेने की भावना है कि क्या लौटेगा, हमारा कैसे उपकार होगा। दान में बिल्कुल दिखावा नहीं, वर्णन नहीं करते हुए दान करना है। अभी जो राष्ट्राध्यक्ष लोग हैं, जो राजनीति से, समाजसेवा से जुड़े हैं लोग, जो नकली संत, सब यह बताने में जुटे हैं कि मैंने यह किया, मैंने वह किया। भक्त ऐसा नहीं करते। भक्त कहता है ठाकुर जी ने किया, हमने क्या किया। हममें कहां क्षमता है कि हम समुद्र पार कर जाएं, लंका जला दें। हनुमान जी ने कहा कि ये सब तो हमारे राम जी ने किया। सैनिक कभी नहीं बोलता कि मैं विजयी हो गया, वह देश प्रेम और लोगों को श्रेय देता है। 
क्रमश:

Sunday, 5 May 2019

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - 6
अंत में इस व्यवहार का संसार में लाखों लोगों ने अनुकरण करके जीवन को धन्य बनाया। प्रह्लाद जी अकेले नहीं हुए, प्रह्लाद जी के जैसे वैदिक सनातन धर्म में असंख्य महान लोग हुए, जिन्होंने पूरा जीवन ईश्वर को समर्पित कर दिया, जिन्होंने जीवन के परम लाभ को प्राप्त किया और ईश्वर जैसा ही हो गए। संसार में न जाने कितने लोग मिट गए, कितने लोग लुट गए, कितने लोग असंख्य भोग के साधनों से जुड़ गए, कितने लोगों ने खूब दान किया, भामाशाह जैसे असंख्य लोग हुए, किन्तु मोक्ष की प्राप्ति के लिए जिन्होंने व्यवहार किया और जीवन को धन्य बनाया, वे ईश्वर जैसे हो गए। इसी परंपरा में प्रह्लाद हैं। 
जैसे सभी नदियों का गंतव्य समुद्र है, वैसे ही मनुष्य को भी जानना चाहिए कि उसका परम गंतव्य ईश्वर है। गुरुओं के बताए रास्ते पर चलकर ज्ञान प्राप्त करके उच्च स्तर पर पहुंचे। हिरण्यकश्यप ने बहुत कोशिश की कि प्रह्लाद जी अपने विश्वास से हट जाएं, किन्तु प्रह्लाद जी नहीं हटे। जो विपरीत परिस्थितियां हैं, जो विपरीत मन वाले लोग हैं, वे सही काम करने वालों को मुश्किल में डालते हैं। ईष्र्या, द्वेष में रहकर लोग अच्छे लोगों को परेशान करते हैं, किन्तु अच्छा रास्ता छोडऩा नहीं चाहिए, अडिग रहना चाहिए। उसी से विजय मिलती है। जीवन सही है, तो उसे धन्य बनाएगा, सुयश देगा। लोक भी देगा और परलोक भी देगा। गलत नीति से चलने वालों का एक बड़ा उदाहरण हिरण्यकश्यप हैं। भोग के लिए अहंकार के लिए जीवन जी रहे हैं। इन्हें कोई मतलब नहीं है ईश्वर से, धर्म से, सदाचार से, मर्यादा से। बेटा, पत्नी से कोई मतलब नहीं है। 
हिरण्यकश्यप का पथ गर्त में ले जाने का पथ है। सर्वश्रेष्ठ जीवन को परम लांछित करने का महापथ है। प्रह्लाद जी का महापथ है, ईश्वर का पथ है। लिखा है भागवत में कि प्रह्लाद जी को मारने के लिए हिरण्यकश्यप ने बहुत प्रयास किए। कुचलवाने का प्रयास हुआ, पहाड़ से फेंकवाने का प्रयास हुआ, होलिका की गोद में बैठाकर जलाने का षड्यंत्र हुआ, किन्तु प्रह्लाद के विरुद्ध किसी गलत कार्य में हिरण्यकश्यप सफल नहीं हो पाए। 
एक दिन हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को चुनौती देते हुए कहा, तुम्हारा ईश्वर व्यापक है, तो इस जलते-तपते खंभे में प्रकट हो जाए। 
ईश्वर की व्यापकता का अगर अहसास हो जाए, तो जीवन में आमूलचूल परिवर्तन हो जाए, किन्तु ऐसा नहीं होता है। यह तो मन में आता है कि कहां के पार्षद हैं, कहां के विधायक हैं, यह तो अहसास होता है, छोटा जो स्वरूप है, किन्तु यह बात मन में नहीं आती कि ईश्वर व्यापक है। कण-कण में है। बहुत बड़ा सिद्धांत है। घड़े की मिट्टी व्यापक है। कारण व्यापक होता है। वैसे ही संसार में ईश्वर व्यापक है, क्योंकि ईश्वर ही संसार हो गया है। 
हिरण्यकश्यप को ईश्वर की सर्वव्यापकता पर विश्वास नहीं है। यह विश्वास तभी आएगा, जब आदमी गुरु के सान्निध्य में जाकर वेदों, स्मृतियों को पढ़ेगा। प्रह्लाद जी की अग्नि परीक्षा हो रही है, तो भगवान खंभे से ही प्रकट हो गए। नरसिंह स्वरूप प्रकट हो गया। धरती कांप गई। विशाल नर और सिंह का संधि स्वरूप - विकराल रूप प्रकट हुआ। सृष्टि संहारक स्वरूप उत्पन्न हो गया। भगवान ने सबसे पहले हिरण्यकश्यप को उठाया और उसका अंत किया। 
ईश्वर का ऐसा स्वरूप देख लोग घबरा गए, लगा कि सबका विनाश हो जाएगा। सभी ने वंदना की, किन्तु भगवान शांत नहीं हो रहे थे। सभी ने फिर प्रह्लाद जी से कहा कि प्रभु इस रूप में आपके लिए ही प्रकट हुए हैं, आप प्रार्थना करें। यह नियम है कि जो व्यक्ति किसी से नहीं मान रहा है, उसका जो सबसे अधिक प्रिय है, उससे मनवाने की कोशिश की गई। प्रह्लाद जी भगवान के परम लाड़ले हैं। परम प्रेरणास्पद हैं भगवान। सब लोगों ने कहा, तो प्रह्लाद जी ने प्रार्थना की। बड़ी लंबी प्रार्थना की। भक्ति की महिमा को विस्तार से बतलाया, भगवान की परम उदारता को बतलाया। जाति, रंग, नस्ल का कोई बंधन नहीं। चांडाल भी भक्ति कर रहा है, तो वह ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ है। उसमें लिखा है कि ब्राह्मण अपने पुण्य से ब्राह्मण हुआ, यह शास्त्र-सम्मत है, किन्तु यदि उसने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन को ईश्वर की सेवा में नहीं लगाया, प्रेम और वंदना में नहीं लगाया, तो उससे तो चांडाल भी श्रेष्ठ है। प्रह्लाद जी ने नरसिंह प्रभु से प्रार्थना करते हुए बहुत लाड़-प्यार किया। प्रह्लाद जी ने खूब सहलाया प्रभु को, तो वे शांत हुए। खुश हुए, कहा कि कुछ मांगो।
क्रमश:

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - 5
मुझे तो कोई मित्र मिलता ही नहीं था। छोटी आयु में भगवान ने मेरी बनावट ऐसी की थी कि मेरी किसी से मित्रता नहीं होती थी। मेरे जीवन से दूसरों का ऐसा अंतर होता था कि मैं कह नहीं पाता था और न कोई मुझे मित्र कह पाता था। साधु जीवन में आने पर भी लोग मुझे मित्र कहने में हिचकते हैं। एक बार एक आदमी ने कहा कि मैं उनका मित्र हूं, तो उठ के चल पड़ा, कैसा मित्र? कहां उनका जीवन, एक घंटा लगाते थे कपड़ा पहनने में, अपनी दाढ़ी दांत से ही काटते रहते थे, वो बाद में बिगड़ गए, किसी युवती के साथ जुड़ गए। संन्यासी जीवन उनका गड़बड़ा गया। पहनने का ठिकाना नहीं, कभी इधर देखेगा, कभी उधर देखेगा। स्वभाव, उद्देश्य, ज्ञान, विज्ञान की साम्यता नहीं, तो कैसी मित्रता? हमने सोचा कि भगवान को ही मित्र बनाएंगे। 
राम जी को सखा भाव बहुत प्रिय है। अंगद को भी राम जी सखा बोलते हैं। नल, नील को भी बोलते हैं। लगता है कि पूरे संसार के जीवों को भगवान सखा मान रहे हैं। कोल, भील, किरात, किसी को नौकर नहीं मान रहे हैं। 
जब राम जी अयोध्या आए, तो वानरों की ओर संकेत करके गुरु वशिष्ठ से कहा कि ये मेरे मित्र हैं। इन्होंने मेरे युद्ध रूपी जहाज को संभाला। राम जी ने सुग्रीव को मित्र बनाया, किन्तु जब सुग्रीव को समझ आ गई, तो वह स्वयं को राम जी का दास ही मान रहा था। पूर्ण समर्पण भी ईश्वर के साथ। पूर्ण समर्पण पार्टी, जाति, परिवार को नहीं करना है। जिसने हमें पूर्ण जीवन दिया है, जिससे जुडक़र ही पूर्णता हुई है, उसी को समर्पित होना है। अपने समस्त कर्मों को ईश्वरीय चासनी में भिगोना होगा। वैसा ही करना होगा, जैसा ईश्वर करते हैं और जैसा वे सबसे चाहते हैं। 
प्रह्लाद जी ने कहा कि वाणी, आंखें, मन भी, हमारे हाथ भी, हमारे पैर भी, हमारा रोम-रोम, हमारी सांस-सांस, हमारी चेष्टा, इन्द्रियां, ज्ञानेन्द्रियां, परमेन्द्रियां भगवान के लिए समर्पित और श्रेष्ठ जीवन की हैं। यह मोक्षीय व्यवहार है। मैं कहना चाह रहा हूं, जीवन का जो सर्वश्रेष्ठ व्यवहार का स्वरूप है, वह यही है कि हम ईश्वर के लिए अपने संपूर्ण जीवन को समर्पित करें। उसके लिए ज्ञान, शिक्षा की संप्राप्ति करके जीवन जीएं। यह सृष्टि और समाज का वरदान जीवन होगा। जिन संतों ने, जिन ऋषियों ने, जिन समाजसेवियों ने संपूर्ण रीति से अपने को समर्पित कर दिया, सृष्टि के लिए संसार के लिए वही बड़े लोग इतिहास में हैं। इनमें जाति का बंधन नहीं है, कोई भी हो सकता है। 
महात्मा गांधी का जन्म वैश्य परिवार में हुआ था, कभी चर्चा नहीं होती कि बनिया राष्ट्रपिता कैसे हो गया। उस समय किसी का व्यक्तित्व नहीं था वैसा। अपने को ईश्वर के लिए समर्पित कर देना। उन्होंने अपने को राष्ट्र को पूर्ण समर्पित कर दिया, तो उन्हें राष्ट्रपिता बना दिया गया। यहां जाति नहीं चलती। रूप नहीं चला, बहुत लोग विद्वान थे, गांधी जी से भी धनवान थे, तमाम तरह की बातें बड़ी थीं, किन्तु गांधी जी ही महान कहलाए। वैसे ही जीव जब ईश्वर को अपना संपूर्ण अर्पित करता है, तो ही आगे बढ़ता है। 
प्रह्लाद जी के पिता के मन में यह बात समा नहीं रही थी कि मेरे अतिरिक्त कोई ईश्वर शक्तिशाली है। मेरा बेटा ही मुझे ईश्वर नहीं मान रहा है, यह कोई बेटा है क्या? जो आदमी बड़े उद्देश्य का होता है, वह छोटे उद्देश्य वालों को बड़ा ही बेकार लगता है। हिरण्यकश्यप मान रहे हैं कि बेटा मेरा दुश्मन है। विपरीत धारा वाला है। प्रह्लाद जी जीवन के सर्वश्रेष्ठ मोक्षीय व्यवहार के बहुत बड़े उदाहरण हैं। मोक्ष अंतिम व्यवहार और परम पुरुषार्थ की पराकाष्ठा है। ईश्वर के बढ़े अनुग्रह से असंख्य जीवन के पुण्य प्रभाव से जो मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है, जो परम लाभ है, यह जीवन - ऋषि जीवन है। 
यह परमार्थ नहीं है, यह व्यवहार है। जैसे सिर पर सामान रखकर बेचना, कुदाल चलाना, छोटी-मोटी नौकरी करना व्यापार है, वैसे ही लाखों लोगों को जीवन देना, मकान देना, यह भी तो व्यापार है। वैसे ही व्यवहार की पराकाष्ठा सबसे बड़ी ऊंचाई। उसके सामने एवरेस्ट की ऊंचाई तक कम है। और ऊंचाई...ऊंचाई का जो अंतिम स्वरूप है, वह व्यवहार है मोक्षीय व्यवहार। 
क्रमश:

Wednesday, 1 May 2019

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - ४
जब हम सुनेंगे ईश्वर को, तो कहां से सुनेंगे, किससे सुनेंगे। संसार में अनेक धर्मों की परंपराएं खड़ी हो गई हैं, जिनको सीधे-सीधे लोग बोलते हैं कि सब धर्म बराबर हैं। तो आइंस्टीन भी बराबर और पटाखा बनाने वाला भी बराबर। बर्तन बनाने वाला भी बराबर और बर्तन धोने वाली भी बराबर। कई लोग हैं, जो माता-पिता को ही बर्तन धोने में लगा देते हैं, क्योंकि वे नौकर नहीं रख सकते। तो हमें ऐसा नहीं मानना है कि किसी को भी सुनें ईश्वर के लिए। हम वेदों को सुनेंगे। बराबरी कैसे होगी? वो तो लूटने आए थे, कुछ लोग आज भी वही काम कर रहे हैं। गौतम बुद्ध के लोग भी आगे चलकर विक्षिप्त हुए, सनातन धर्म को अपशब्द बोलकर। मांस, मदिरा इत्यादि का सेवन सब करने लगे। सारे दुव्र्यसन करने लगे। तो हम केवल वेदों को ही सुनें।
कहा प्रह्लाद जी ने कि हमें उस ईश्वर को जानना है। केवल सुनने के लिए ही नहीं, उस ईश्वर की वाणी का वाचन भी करें। सुनें, देखें और बोलें। हमें उसका स्मरण भी करना है। तीनों इन्द्रियां साथ हैं। सुनना, गायन करना और मन से स्मरण करना। स्मरण से प्रेम उत्पन्न होता है ज्ञान और परिपक्व होता है। 
प्रह्लाद जी ने कहा कि ईश्वर को ही जानना है। भक्ति और ज्ञान का स्वरूप स्मरण है। तेल की धारा टूटती नहीं है, वैसे ही स्मरण है, जो टूटे ना। ऐसे स्मरण से उत्पन्न प्रेम ही भक्ति है। 
कई बार अपने स्वजनों के बीच भी कई महीनों के बाद बातचीत होती है, किन्तु मन में स्मरण रहता है, अपनत्व निरंतर रहता है, तो लगता ही नहीं है कि कितने दिन बीत गए और बात ही नहीं हुई। हमारा कोई भी अनुयायी हो, समर्थक हो, अपने को बल देने वाला हो, अपने को अपना मानने वाला हो, उससे बातचीत नहीं हुई, किन्तु स्मरण से परस्पर जुड़े रहे। हमने जो कहा है, उसने जो कहा है, उसके आधार पर स्मरण होता है। स्मरण का अर्थ है अनुभव होगा, तो संस्कार उत्पन्न होंगे, उन्हीं संस्कारों से उद्बोधक की प्राप्ति होगी। भगवान का स्मरण करें। अभी चुनाव होना है, तो पूरे देश के लोग लगे हैं। अपशब्द बोले जा रहे हैं। तमाम आरोप लग रहे हैं। लोकतंत्र को घटिया बना रहे हैं लोग। मन उसी में जा रहा है। यदि हम ईश्वर को सुनेंगे-गाएंगे-स्मरण करेंगे, उससे जो हमारा ज्ञान परिपक्व होगा, तो ईश्वर के दर्शन होंगे, तो हमारा उसमें प्रेम बढ़ेगा। प्रेमी का स्तर कैसा है, उसी से तो प्रेम का स्तर तय होता है। हम जिससे प्रेम करते हैं, वह कैसा है। किसी का दुष्ट ही प्रेमास्पद है, किसी का कुत्ता ही प्रेमास्पद है। पीने वाला है नाचने वाला है। प्रह्लाद जी ने कहा कि हम ईश्वर से प्रेम करेंगे, जो दुनिया का सबसे बड़ा है, किसी भी दुर्गुण से युक्त नहीं है। उसी की हम चरण सेवा करेंगे। पादसेवनम् 
उसी की हम पूजा करेंगे। संपूर्ण साधनों से उसकी हम वंदना करेंगे। उसको प्रणाम करेंगे। उसी को हम अपना मित्र बनाएंगे। हमें मित्रों की आवश्यकता होती है, जो हमारी बराबरी का हो, जिसे हम मानें कि ये मेरे जैसा है, मैं इसके जैसा हूं, स्वच्छ भाव से हम जुड़ें। भगवान के सामने सुग्रीव और विभीषण की क्या योग्यता है, किन्तु भगवान ने सखा बना लिया। जैसे पत्नी का अपहरण करने वाले रावण को हमें दंडित करना है, वैसे ही सुग्रीव की भी पत्नी का अपहरण हुआ है, उनके लिए भी लडऩा है। जैसे मैं संसार के लोगों में श्रेष्ठ भावनाओं का प्रसार करता हूं, ठीक वैसे ही ये भी करेंगे। विभीषण लंका को अयोध्या बनाएंगे और सुग्रीव किष्किन्धा को बनाएंगे। बहुत बड़े क्षेत्र को अयोध्या जैसा बनाएंगे। भगवान को मित्र बनाना है। तमाम लोग दुनिया में हैं, जिनका कोई मित्र नहीं है। समान संस्कार और दीक्षा चरित्र, कत्र्तव्य के लोग नहीं हैं। मित्रता का बड़ा अकाल है। ऐसे-ऐसे लोगों को मित्र लोग बना लेते हैं। 
क्रमश:

Saturday, 4 November 2017

महर्षि मनु भाग - 2

: दुनिया के पहले संविधान निर्माता :
मनु जी तो ब्रह्मा जी से ही प्रकट हुए संसार की संरचना के लिए। जप-तप से संतानोत्पत्ति का प्रयास किया। उनको दो पुत्र और तीन कन्याएं हुईं। दो पुत्र उत्तानपाद और प्रियव्रत। तीन पुत्रियां - आकूति, प्रसूति और देवहूति। धीरे-धीरे उनके विवाह का समय हुआ। ये सब संतानें समाज के लिए ईश्वर के लिए जीवन जीने वाली थीं। पुराणों में वर्णित है कि जो मनु जी के पुत्र प्रियव्रत जी बड़े भक्त हुए। प्रियव्रत जी ने पृथ्वी को सात भागों में विभक्त किया था। उत्तानपद भी बड़े भक्त हुए, महान धु्रव जी इन्हीं के पुत्र थे। आकूति का विवाह महर्षि ने रुचि प्रजापति से किया। देवहूति का विवाह महर्षि कर्दम से हुआ, जिससे सांख्यशास्त्र के प्रणेता महर्षि कपिल का अवतार हुआ। कपिल जी की बड़ी महिमा है, वे ज्ञानी के रूप में ही उत्पन्न हुए। अभ्यास से व्यक्ति ज्ञानी होता है, तब आदमी विद्वान बनता है, लेकिन जिसने पिछले जन्म में अभ्यास किया है, वह पिछले जन्मों के संस्कार के आधार पर, जो यहां नहीं भी पढ़ा है, तो उसमें ज्ञान स्वयं प्रकट हो जाते हैं। वे अच्छे रूप में अपने भावों को प्रकट करने लगता है। 
मनु जी की तीसरी पुत्री प्रसूति का प्रजापति दक्ष से विवाह हुआ। सृष्टि का क्रम प्रारंभ हुआ और उसका विस्तार होता गया। सभी उनके दामाद, पुत्र, पौत्र इत्यादि पूरे परिवार के लोग बड़े संस्कारी थे, क्योंकि शुरू से ही उनके जीवन को सही ढंग से सींचा गया था। इन संतानों की ऋषियों, शास्त्रों में बड़ी आस्था थी। शास्त्रों से प्रेरित जीवन में उनकी आस्था थी, उसी के अनुरूप जीवन शैली, समस्त व्यवहार और जीवन को परम फल देने वाले कार्य उन्होंने किए। सृष्टि का क्रम चला। बढ़ता गया। संसार बढ़ा। 
मनु का अपना जीवन भी सर्वश्रेष्ठ था। वे भगवान के साक्षात पुत्र थे और उन्होंने सृष्टि उत्पादन के क्रम को जो शुरू किया, तो उन्होंन अपने लोगों को भी इसी तरह से तैयार किया। जो भी उत्पन्न हो, वह विशुद्ध मानव हो, वह लौकिक जीवन भी शास्त्रों के तहत ही जीए। केवल कमाना और भोग करना ही जीवन नहीं है। ईश्वर की सेवा में समर्पित होना भी जीवन है। लौकिक और परालौकिक जीवन दोनों ही इससे संभव होते हैं। सत्यं शिवं सुन्दरं इससे संभव होता है। क्रमश:

Wednesday, 28 June 2017

पायो परम बिश्रामु

भाग - ४
अभी तमाम तरह की विकृतियों से युक्त जो लोग हो रहे हैं, उन्हें गोस्वामी जी को अवश्य पढऩा चाहिए। सभी लोग उसी रीति से प्रयास करें। रामचरितमानस कालजयी रचना है। गोस्वामी जी की सभी रचनाएं मानक हैं। 
सृष्टि के लिए सबकुछ शुभ-शुभ मंगल देने वाला, हमें उनके बारह ग्रंथों के रूप में प्राप्त हुआ। वह केवल किसी मरे हुए को जिंदा कर देना, किसी बीमार को जिंदा कर देना, ये चमत्कारिक घटनाएं बहुत छोटी हैं।
करपात्री जी महाराज कहते थे कि सनातन धर्म में ऐसे चमत्कार दिखाने वाले लौंडा महात्मा होते हैं। गंगा में पैदल चल गया, इससे मानव जाति या सृष्टि का कोई भला नहीं होगा। इससे तो बेहतर वे लोग हैं जो ठगी कर रहे हैं। जब तक आदमी सही कर्म से नहीं जुड़ेगा, उसका कल्याण नहीं होगा। 
गोस्वामी जी ने इतना सब किया, उनसे लोगों ने पूछा कि आपने क्या किया, आपको क्या मिला? उन्होंने उत्तर दिया - पायो परम विश्राम... मैंने परम विश्राम को प्राप्त कर लिया। अब कभी थकावट नहीं होगी। हमने धन्य जीवन को प्राप्त कर लिया। राम जी की कृपा से ही यह प्राप्त हुआ। 
जैसे मनुष्य राष्ट्र के लिए सबकुछ करे, लेकिन महत्व ईश्वर को दे। उनकी कृपा से ऐसा हो गया। हनुमान जी ने लंका में खूब काम किए, लेकिन कहा कि मैंने कुछ नहीं किया, जो भी किया राम जी की कृपा से किया। 
राम भाव और रावण भाव में यही फर्क है। लंका के लोग कहते हैं कि यह जो भी किया मैंने किया, मैंने ही किया, लेकिन अयोध्या के लोग कहते हैं, जो किया ईश्वर ने किया, उन्हीं की कृपा से सब संभव हुआ। भारत से सारी बुराइयों को निकालने का मार्ग यही है कि कर्म का श्रेय ईश्वर को दिया जाए। गोस्वामी जी के पास कर्म योग भी है, ज्ञान योग भी है। कहा लोगों ने कि यह पहला महाकाव्य है कि जिसमें इतिहास भी है, दर्शन भी है, काव्य भी है, ऐसा कोई भी महाकाव्य नहीं है, जिसे इतिहास भी कहा जाए, काव्य भी कहा जाए और दर्शन भी कहा जाए। 
उनके ग्रंथ सूर्य के समान हैं, जो सबको जीवनी शक्ति देता है। गोस्वामी जी भक्त शिरोमणि हैं। हनुमान जी को भी भक्त शिरोमणि कहा जाता है, वे भक्त भी हैं ज्ञानी भी हैं, कर्मयोगी भी हैं। लोगों को धन्य जीवन देने वाले, करोड़ों लोग इससे प्रेरित होकर जीवन जी रहे हैं। 
संपूर्ण संसार के लोगों को यह कहना चाह रहा हूं कि शास्त्रों के संदर्भ में देखिए कि हम क्या कर रहे हैं, कहीं गलत तो नहीं कर रहे। सब शास्त्र सम्मत कर रहे हैं क्या? धन कमाना, परिवार कमाना, शक्ति कमाना, साथ-साथ ईश्वर प्रेम से ओतप्रोत होना। भगवान की संतुष्टि के लिए हम कर्म करें। लोगों को दिखाने के लिए हम न करें। गोस्वामी जी का जो जीवन काल है, उससे लेकर आज तक वे एक बड़े समुदाय के लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। 
हमें उन पर चर्चा करते हुए और भी खुशी हो रही है कि वे रामानंद संप्रदाय की परंपरा से आते हैं। जिस पीठ में मैं सेवारत हूं, उसकी चौथी पीढ़ी में गोस्वामी जी का अवतरण हुआ। रामानंदाचार्य जी के शिष्य अनंतानंद जी थे, उनके शिष्य नरहरिदास जी और उनके शिष्य हुए तुलसीदास जी। तुलसीदास जी ने लिखा है कि नरहरिदास जी अगर नहीं मिले होते, तो मैं नहीं मानता कि दया नाम की कोई चीज है। मेरा जीवन बिलख रहा था, कोई छाया नहीं थी, लेकिन नरहरिदास जी ने मेरे लौकिक जीवन को भी संभाला, ज्ञान की धारा से भी जोड़ा, सर्वश्रेष्ठ भक्ति की धारा में खड़ा करके मुझे धन्य बना दिया। 
कहा जाता है कि हनुमान जी ने राम जी को वश में कर लिया था, कहा जा सकता है कि गोस्वामी जी ने भी राम जी को वश में कर लिया। आपको जो भी चाहिए कि राम जी के जैसा जीवन करके प्राप्त कीजिए। हम सभी के लिए वे गौरव हैं। 
क्रमश: