धर्म के ज्ञान से ही व्यक्ति को जीने की कला आती है.
Saturday, 15 July 2023
ईश्वर पर विश्वास रखें
वैसे ऐसा भी नहीं करो कि कर्म करना ही छोड़ दो। जीने के लिए कर्म करना जरूरी है। गीता में भगवान ने कहा कि कोई शरीरधारी कर्म के बिना नहीं रह सकता। अभी आपको लग रहा होगा, हम तो कुछ कर्म कर ही नहीं रहे हैं, लेकिन यह सच नहीं है। ज्ञानेन्द्रीय हैं, कान है, जिससे आप ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। आप यहां प्रवचन में बैठे हैं, यह भी कर्म है, इसमें बहुत जोर लगता है। एक मुद्रा में बैठना पड़ता है। वश चले, तो लोग हमारी ओर ही पैर कर लें। सोना भी क्रिया है। अभिप्राय यह कि भगवान ने कहा कि कर्म करो, तो शास्त्रों से पूछ कर करो, मनमानी करोगे, तो रावण बन जाओगे। कोई नौकरी करने जाता है, तो नौकरी देने वाले के उद्देश्य, क्रिया और प्रक्रियाओं की पालना करता है। नौकरी में मनमानी नहीं चल सकती। शास्त्रों के अनुरूप ही कर्म करना चाहिए, अच्छे कर्म करने चाहिए और फल के लिए ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए।
Tuesday, 8 November 2022
श्रीमठ में देव दीपावली
काशी में देव दीपावली के भव्य आयोजन की शुरुआत 1985 में पंचगंगा घाट से ही हुई थी। यह वही घाट है, जहां रामानंदाचार्य संप्रदाय का मूल श्रीमठ विराजमान है।
वैसे तो बनारस के घाटों पर रोज ही सैंकड़ों दीये जलते हैं, लेकिन देव दीपावली मनाने की शुरुआत नई है। आखिर क्यों मनाई जाती है देव दीपावली?
पुराणों के अनुसार, बताया जाता है कि त्रिपुरासुर राक्षस का आतंक तीनों लोकों में बहुत बढ़ गया था। देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की। भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही त्रिपुरासुर का अंत कर दिया। वह त्रिपुरारि कहलाए। इससे प्रसन्न होकर देवताओं ने स्वर्ग लोक में दीप जलाकर दीपोत्सव मनाया था। तभी से कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली का विधान रहा है।
वर्तमान रामानंदाचार्य जगद्गुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के नेतृत्व में पंचगंगा घाट पर संपूर्ण भक्ति भाव से पूजन करते हुए देव दीपावली का आयोजन होता है। श्रीमठ में ऐतिहासिक महत्व का हजारा स्थित है, जिस पर देव दीपावली के अवसर पर एक साथ हजार दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं।
Thursday, 18 August 2022
Tuesday, 19 July 2022
Monday, 18 July 2022
Sunday, 17 July 2022
Thursday, 14 July 2022
Wednesday, 13 July 2022
Monday, 3 June 2019
प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा
अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के लिए जो शास्त्रीय क्रियाएं हैं, इनको मनमानी ढंग से जीने के कारण ही दुनिया में राक्षसी भाव बढ़ रहा है। सुख बहुत कम होता जा रहा है। रिश्ते टूट रहे हैं, सुंदरता कम हो रही है। संसार का जो आकर्षण था, वह कम हो रहा है। घुटन हो रही है। बड़ी विडंबना है, इसलिए प्रह्लाद जी के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए।
ज्ञान किसके लिए - यह कैसा ज्ञान कि बम बना दिया, लाखों लोगों को मार दिया। यह कौन-सा ज्ञान कि हर आदमी से हम ईष्र्या ही कर रहे हैं। यह कौन-सा ज्ञान कि हमारी सारी शक्ति अपने को सजाने में ही लग गई। क्या हम जीवन भर रजिस्टर ही लिखेंगे? हम जीवन भर लोहा पर लोहा ही ठोंकेंगे?
एक बार सूरत में किसी से पूछा कि एक आभूषण बनाने वाले को क्या देते हो। उत्तर मिला कि सौ रुपया, डेढ़ सौ रुपया एक दिन में देते हैं। वहां सौ से ज्यादा कारीगर थे। बतलाइए। ये सारा जीवन लग गया आभूषण बनाने में तो कुछ नहीं हुआ। यदि सही दिशा होती, तो ईश्वर का आभूषण बन जाता। वरदान हो जाता। इसीलिए हम अपने कर्म का इस रूप से उपयोग करें, भूलें नहीं। बंगला बना लेंगे, तो बच नहीं जाएंगे। कुछ भी कीजिएगा, मरने से नहीं बचिएगा। दुख से नहीं बचिएगा। छप्पन भोग भी खाइएगा, तो दुख और मरने से नहीं बचिएगा। बड़ा परिवार, बड़ी गाड़ी से जुडक़र नहीं, सुख सागर से जुडक़र हम आनंद पाएं। उसके लिए कर्म करें। जैसे प्रह्लाद जी ने किया। वे ईश्वर सेवा के मार्ग में कभी किसी से नहीं डरे।
भगवान की दया से मैं भी नहीं डरता था। अपने गुरुजी के सामने भी अवसर देखकर सही बात बोल देता था। मेरे गुरुदेव जमींदार परिवार के थे। जब उन्हें अवसर मिले, तो जमींदारी की कथा सुनाते रहते थे, मैं चरण दबाता रहता था। कुछ महीने जब हो गए। एक बार मैंने गुरुजी से बड़े संतों के नाम लेकर पूछता गया कि वो संत कैसे परिवार के थे। मैं संतों के नाम लेकर पूछता गया, गुरुजी बताते गए कि ये भी गरीब परिवार के थे।
फिर मैंने पूछा, आपके गुरुजी की क्या स्थिति थी?
मेरे गुरुदेव ने कहा, उनके पास भी ज्यादा संसाधन नहीं थे।
तब मैंने कहा, इसका मतलब गरीब का बच्चा भी संत हो सकता है। जरूरी नहीं कि बड़े जमींदार का ही हो। यदि ऐसा हो कि गरीब का नहीं हो सकता है, तो मैं तो जमींदार परिवार में नहीं जन्मा, तो मैं चला जाऊं क्या?
गुरुजी को लग गया कि अरे यह तो मुझे ही कह रहा है, तो उन्होंने कहा कि शिष्य ऐसी बात बोलता है क्या?
मैंने पूछा, यह कहां लिखा है कि गुरु रोज अपनी जमींदारी की बात करें।
मैंने कह दिया, कहिए तो मैं चलता हूं झोला उठाए। किसी और दरवाजे को खटखटाता हूं, जिस दरवाजे पर लिखा हो कि नहीं सामान्य परिवार का बच्चा भी संत हो सकता है, ऋषि हो सकता है, ज्ञानी हो सकता है, धन्य जीवन का हो सकता है। प्रह्लाद जी की तरह ही मैंने बिना भय के अपना विचार प्रस्तावित किया। गुरुजी के गांव में कई हजार एकड़ जमीन थी, जहां वो जन्मे थे। तो मैंने कह दिया। जब नहीं कहेगा आदमी, तो कैसे चलेगा।
प्रह्लाद जी लड़ गए कि आपको जो करना है, करो, किन्तु मैं अपना महापथ नहीं छोड़ूंगा। ध्यान रहे सभी श्रेष्ठ जो अवदान हैं, वो शास्त्रों से, ऋषियों से ही हमें प्राप्त हुए हैं। तभी हमारा जीवन धन्य हो जाएगा। जीवन की सारी कठिनाइयां दूर हो जाएंगी।
जय सियाराम
प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा
क्या कहा प्रह्लाद जी ने सुनिए। कहा कि प्रभु, हमें आपसे कुछ नहीं चाहिए। भगवान ने कहा कि मांगों बहुत खुश हूं। प्रह्लाद जी ने कहा, मैंने वणिक भक्ति नहीं की है। बनिया वाली भक्ति नहीं की, सामान देना और उसके बदले में पैसा लेना। एक हाथ से लो, एक हाथ से दो। हमने आपकी सेवा की, समर्पित हुआ, भजन किया, स्मरण किया, जो भी नवधा भक्ति के स्वरूप हैं, किन्तु ये सब हमारे किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए नहीं हैं। इसके लिए हमें कोई ‘रिटर्निंग गिफ्ट’ नहीं चाहिए। यह सब हमने आपकी सेवा के लिए किया। इसका कोई सकाम उद्देश्य नहीं था। जो किया, निष्काम भाव से किया। हमारे पास जो भी आपका दिया था, वो आपको दिया, कुछ लेने के लिए नहीं दिया।
भक्त अपने स्वामी के लिए सर्वस्व अर्पित करता है, उसकी खुशहाली के लिए उसके बदले में कभी नहीं कहता कि हमें भी आप कुछ दीजिए। यही भक्ति का सबसे बड़ा सिद्धांत है - तत्सुखे सुखम्
उसके सुख में सुखी रहना। अपने सुख की परवाह नहीं करना। ऐसी गोपियां हुईं, तुलसीदास जी हुए, अनेक संत हुए, जिन्होंने कभी नहीं कहा कि हमें कुछ चाहिए। हमने वणिक भक्ति नहीं की।
तो प्रह्लाद जी के बहुत मना करने बावजूद नरसिंह भगवान ने जोर देकर कहा कि मांगो, कुछ मांगो।
तब प्रह्लाद जी ने कहा, ऐसी कृपा करें भगवान कि मेरी इच्छा ही जल जाए। जिस बीज को हम दग्ध भाव कर देते हैं, मतलब सिंकाई हो गई, तो उसमें से अंकुर नहीं निकलते हैं। आशीर्वाद दीजिए कि मेरे मन में कोई इच्छा ही नहीं हो। सारी इच्छाएं जल जाएं। अब क्या इच्छा, जब आप मिल गए। जब मेरा मन आपका हो गया, हमारी इन्द्रियां आपकी हो गईं, अब क्या? इच्छा दुखदायक है, नहीं चाहिए कुछ भी।
यहां तक कह दिया प्रह्लाद जी ने, कोई जब संपूर्ण इच्छाओं को छोड़ता है, तो देवता हो जाता है। प्रयास करना चाहिए कि कम से कम इच्छाएं हों। जैसे गृहिणी कम इच्छा करे, सास-ससुर की सेवा करे, परिवार की सेवा करे, कोई इच्छा न करे कि यहां ले चलो, वहां ले चलो, ये चाहिए, वो चाहिए। इच्छाएं सब खत्म होंगी, तो वह देवी बन जाएगी।
प्रह्लाद जी ने कहा - ईश्वर को समर्पित होकर इच्छाओं से हीन होकर भगवान के सदृश हो जाता है जीव। आज भी प्रह्लाद जी का जोड़ नहीं है। अभावग्रस्त परिवेश वाले कोल, भील का कोई जोड़ नहीं मिल रहा है, गोपियां तो उनसे श्रेष्ठ स्थिति में हैं, आलवार संतों का कोई जोड़ नहीं मिल रहा है। अनेक महात्मा, ऋषि, संत इस देश में हुए, जिन्होंने बिना स्वार्थ संसार की सेवा की। आवश्यकता है प्रह्लाद जी से सीखने की, उनसे प्रेरणा लेने की। प्रह्लाद जी ने बहुत कहने के बाद भी कुछ भी नहीं मांगा। कह दिया, नहीं चाहिए।
मैं पहले भी कह चुका हूं, जो भगवान की सभी दृष्टि से सेवा करेगा, जो ऐसी भक्ति करेगा, उसे लोक और परलोक, दोनों मिलेंगे। उसका कोई अभाव शेष नहीं रहेगा। दुनिया का कोई ऐसा सोपान नहीं, कोई ऐसा गंतव्य नहीं, इसलिए नहीं चाहने पर भी प्रह्लाद जी को भगवान ने राजा बना दिया। किसी को बड़ा फल देना हो, तो पात्र को ही देगा, अपनों को ही देगा, प्रिय को ही देगा। जो मूर्ख है, वह अक्षम बेटे को, पापी बेटे को भी दे देता है। यहां तो ईश्वर को दिया ईश्वर ने।
ऐसे ही संसार के लोगों को धैर्य के साथ सभी कामों में लगे रहना चाहिए। मैंने भी जीवन में अभाव में ही शुरुआत की, किन्तु मुझे भगवान ने सब दिया, रोटी कपड़ा, मान, स्नेह, आत्मीयता, किन्तु मैं हमेशा ध्यान रखता हूं कि मेरा जो ईश्वरीय समर्पण है, वह कभी नीचे नहीं हो जाए। संपूर्ण वरीयता रहनी चाहिए। जो मिला हुआ प्रसाद है भक्ति, ज्ञान, उनका प्रयोग बना रहे।
क्रमश:
Thursday, 27 December 2018
रावण कैसे भटक गया
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
पिछले जन्मों में भी आप ही रहे, कल भी आप ही रहेंगे। ऐसा ही जीवन और ऐसा ही व्यवहार और चिंतन, ऐसे ही संस्कार जब हम प्राप्त करेंगे, चिंतन की जो सर्वश्रेष्ठ अनुपम परंपरा है, तो हमारा जीवन अपने और दूसरों के लिए वरदान हो जाएगा। हमें बल सुकून सुंदरता देगा। भगवान से प्रार्थना है कि सभी लोगों को शास्त्र ज्ञान की परंपरा के अनुसार मंडित करें, व्यवहार का जीवन दें, व्यवहार को शुद्ध करें।
मैं कहा करता हूं कि भारत के प्रधानमंत्री अभी स्वच्छता अभियान चला रहे हैं, किन्तु इस स्वच्छता से लोकतंत्र सशक्त नहीं होगा। इस स्वच्छता से पार्टी का सामंजस्य सुदृढ़ नहीं होगा, परिवार का नहीं होगा, मानवता का नहीं होगा। जब तक हमारा मन शुद्ध नहीं होगा, हमारा चित्त शुद्ध नहीं होगा, हमारी बुद्धि शुद्ध नहीं होगी, हमारा अहंकार शुद्ध नहीं होगा, तब तक केवल झाडू लगाने से कुछ नहीं होगा। आज कितना गंदा है लोगों का मन। कोई दुर्गंध तो थोड़ी दूर तक प्रभावित करती है, किन्तु ये जो मन की दुर्गंध है, वह दूर तक प्रभावित करती है और आज कर रही है।
हमारा व्यवहार शुद्ध हो, शास्त्रों की कसौटी पर कसा हुआ हो, उसके माध्यम से परिपूर्णता व्यापकता हो, यही काम किया भारत के ब्राह्मणों ने, शास्त्रों ने संपूर्ण संसार को चरित्र की शिक्षा दी और चरित्र में सब व्यवहार आ गए। एक भी व्यवहार नहीं छूटा। यहां अब लोग केवल याद करवाते हैं, ऐसे ही क्लास में पढ़ा दिया और कोई चरित्र की शिक्षा नहीं दी।
दिल्ली के एक विद्वान बता रहे थे कि मैंने अपने कुलपति को कहा, लडक़े-लड़कियां परिसर में अश्लील मुद्रा में बैठे रहते हैं, आप उनको रोकिए।
कुलपति ने कहा कि इससे हमारा कोई मतलब नहीं कि किससे कौन चिपक कर बैठा है। हमारा काम केवल पढ़ाना है।
यह विश्वविद्यालय के कुलपति कह रहे हैं, तो परिणाम यह कि बच्चे मार रहे हैं अपने अध्यापकों को, जूतों से मार रहे हैं। यही स्थिति शिक्षण संस्थानों में कम या ज्यादा हो रही है। सुधारने की जरूरत है, केवल मोक्ष के लिए नहीं, अपने लिए भी यह लाभदायक है। यह हमारा पूर्ण विश्वास है। यह कोई रटी रटाई बात नहीं है। यह कोई आकाश का फूल नहीं। श्री राम ने, ऋषियों ने, हमारे पूर्वजों ने, हमारे ब्राह्मणों ने, संत जनों ने इसका प्रयोग करके सृष्टि को वरदान स्वरूप बनाया था। शास्त्रों की आवश्यकता सदा रहेगी, उचित व्यवहार की आवश्यकता संसार को सदा रहेगी, जिससे हमारा जीवन परिपूर्ण होगा और उसको बहुत सुदृढ़ता से स्थापित करने की आवश्यकता है।
जय सियाराम
रावण कैसे भटक गया
अपनी जो संस्कृति है, वह ज्ञान की परिपक्व अवस्था की बात करती है। अभी भी ऐसे संत हैं, जो सही जीवन, सही विधि से जुडक़र लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं। हम सब लोगों को क्या करना चाहिए, समय निकालकर स्वाध्याय करें, जिनके प्रतिपादित मूल्य कभी नहीं बदलेंगे। जैसे सूर्य और चंद्रमा नहीं बदलते। जैसे इस अनादि सृष्टि का लाभ, उसका संपादन नहीं बदलता, वैसे ही हमारे शास्त्रों में अमर मूल्य का परिपालन कभी भी नहीं बदलता। जीवन को पूर्णता देने वाले मूल्यों से जुडक़र अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।
आज लगने लगा है कि गलत काम किए बिना कोई बड़ा नहीं हो सकता, तो ये गलत बात है। सही मार्ग पर चलकर भी बड़ा आदमी हुआ जा सकता है।
मैं गया था संत ज्ञानेश्वर के गुरु जी निवृत्तिनाथ की समाधि पर। निवृत्तिनाथ जी उनके बड़े भाई भी थे। संत ज्ञानेश्वर ने १८ साल की आयु में जीवित समाधि ले ली। उन्होंने अपने जीवन में महत्वपूर्ण ग्रंथ रचे, गीता के ७०० पदों की ९००० से अधिक छंदों में व्याख्या की मराठी में। दुनिया का इतिहास नहीं है कि १८ साल की आयु में इस तरह का परिपूर्ण जीवन। जीवन में केवल लिखने-पढऩे का नहीं, सीखे हुए के आधार पर अपने रोम-रोम को परिपक्व बनाना, सर्वश्रेष्ठ अवस्था को प्राप्ति करना और उसके माध्यम से संसार से पूर्ण विरागी हो जाना। जो काम था, जल्दी किया और इस संसार से चलते बने। ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। निवृत्तिनाथ जी के यहां मैं गया त्रियंबकेश्वर, तो हैरान हो गया कि कैसे लोग खड़े होकर गा रहे हैं, प्रवचन हो रहा है, अद्भुत है। वहां जाकर लग नहीं रहा था कि संसार में ही है यह जगह।
हमारा संपूर्ण जीवन व्यवहार ही है। हमारा कदम-कदम है, हमारा कर्म हमारी चितवन, चलना, बैठना, खाना, पीना, सबकुछ व्यवहार है। व्यवहार के बिना तो जीवन मृत है। व्यवहार नहीं तो जीवन कैसा? यदि हमारा सबकुछ व्यवहार है, तो हम सोचें कि हमारे व्यवहार से कैसे हमें सही जीवन प्राप्त होगा। बोलना भी व्यवहार है, लेकिन केवल बोलना ही हो और कार्य व चरित्र में वह नहीं दिखे, तो क्या मतलब?
इसलिए हमारे संपूर्ण व्यवहार का मूल ज्ञान है और ज्ञान का मूल वेद हैं, पुराण, स्मृतियां हैं। केवल भारतीय संविधान से व्यवहार को पूर्णता प्राप्त नहीं होगी। संविधान नहीं बोलता कि माता को देवी बोलो, पिता को देव बोलो। संविधान यहां तक पहुंचता ही नहीं है। देवत्व क्या है, संविधान नहीं बतलाता। सत्य का क्या मतलब है। सत्य का जो स्वरूप है, पहले पायदान से अंतिम पायदान तक सत्य की आवश्यकता है। हमारा संविधान यह नहीं बोल रहा कि आप शुद्ध आहार लीजिए, नहीं तो आपका मन विकसित नहीं होगा। अशुद्ध आहार से आप कभी भी हरिश्चंद्र या सत्य बोलने वाले नहीं बनेंगे, अंदर-बाहर से सशक्त नहीं बनेंगे। खेत ही अच्छा नहीं है, तो बीज क्या करेगा?
तमाम तरह के जो संगठन हैं, उनके अपने जो विचार हैं, वो अधूरे हैं। जब वे शास्त्रों से गुरुओं के माध्यम से प्राप्त होंगे, तो ही विचार के सही व्यवहार को देंगे। विचार में सही व्यवहार होना चाहिए। बोलने-बैठने में सही व्यवहार। अभी तो लोगों को पता ही नहीं है कि बड़ों के सामने पैर पर पैर रखकर नहीं बैठते। एक बार जर्मनी की दो लड़कियां मोक्षपुरी पर पीएचडी करने आई थीं, तो मेरे यहां आईं, तो कहा गया, महाराज इनको मोक्षपुरी पर बतलाइए।
वो २७ -२८ साल की थीं, घुटनों के ऊपर जो पहनते हैं, वो कपड़ा पहने। दोनों ने मेरी ओर ही पैर कर लिया। मैंने सोचा, ये मोक्षपुरी पर पीएचडी करने आई हैं! फिर मैंने पूछा, जैसा पैर आपने मेरी ओर किया, वैसा कभी अपनी क्लास में किया क्या? उन्होंने कहा, नहीं किया।
अपने से बड़ों के यहां कभी किया क्या? कहीं ऑफिस में किया क्या? हम आपकी पीएचडी के एक निर्देशक होंगे, किन्तु आपने ये क्या किया, ये कौन-सी संस्कृति है? जो अपने से वरिष्ठ हैं, उन्हें सम्मान दें। ऐसे ही जीवन के सभी क्षेत्रों में अपने व्यवहार को शास्त्रों से जोडक़र शुद्ध करेंगे, मर्यादित करेंगे, प्रचार-प्रसार करेंगे, तो हमारा जीवन सही होगा। इसीलिए अपना देश विश्व गुरु कहलाता था। संसार को सिखलाने वाला कहलाता था। संसार के सभी लोगों को मनु ने चरित्र की शिक्षा दी। क्रमश:
रावण कैसे भटक गया
कल ही एक व्यक्ति बतला रहे थे कि एक आदमी को हमने जैसे-तैसे करके बड़ी गद्दी दिलवा दी। गद्दी दिलाने के लिए जाल फरेब किया, तो वह गद्दी कितने दिन चलेगी और वह महंत कितने दिन चलेगा, वस्तुत: साधु होगा या नहीं होगा। कैसे बड़ा उदार होगा, कैसे उसमें तमाम विशिष्टताएं होंगी, कैसे उसका जीवन चमचमाएगा, हो ही नहीं सकता। गलत पद्धति हो गई, उद्देश्य गलत, शिक्षा गलत, उसका निर्माण गलत।
आज कोई कह ही नहीं रहा कि कहां से शुरुआत होगी, कहां से शुरू करें। अभ्यास की आवश्यकता है। शास्त्रों ने इस बात को बार-बार दोहराया है। जैसे अपनी दूकान नहीं बंद कर रहे हो, जैसे अपने दूसरे काम बंद नहीं कर रहे हो, वैसे ही आप अभ्यास बंद मत करो। जो ज्ञान प्राप्त किया है, उसे अभ्यास से बढ़ाइए। देखिए आपकी वैराग्य की स्थिति क्या है, आपके विश्वास की स्थिति क्या है, विश्वास के अभाव में भी लोगों का जीवन बिगड़ रहा है। शास्त्रीय लोगों में विश्वास नहीं है। जाति में परिवार में नहीं और परलोक में विश्वास नहीं है। इसमें श्रद्धावान जरूर होना चाहिए। श्रद्धावान ऐसा नहीं कि अंध भक्त हो जाएं। श्रद्धा का अर्थ है - शास्त्रों में पूर्ण विश्वास हो और उन शास्त्रों के आधार पर जिन्होंने अपने जीवन को परिपूर्ण कर लिया है, उन पर विश्वास हो - यही श्रद्धा है। आस्तिक बुद्धि को श्रद्धा कहते हैं।
यह भी होता है कि लोग पुरानी चीजों, प्राचीन ज्ञान से दूर भागने लगते हैं। मुंह से खाने की परंपरा या तरीका पुराना है, तो क्या नाक से खाने लगोगे? सडक़ पर ही चलना है या सडक़ पर नहीं चलकर कहीं और चलने लगोगे? हवाई जहाज उड़ता है, उसके उडऩे का तंत्र व्यवस्थित है, यह रोज नहीं बदलता है। इसलिए हम केवल कपड़ा बदलते हैं, केवल कार बदलकर, सोफा बदलकर, मित्र बदलकर, कारोबार बदलकर, आभूषण बदलकर जीवन को परमपथ पर ले जाना चाहेंगे, तो यह बिल्कुल ढकोसला हो जाएगा। जो बना है परंपरा से, जो बने हैं संयम-नियम, उनके आधार पर यदि हम अपने जीवन को ले चलेंगे, तो हमारा जीवन धन्य होगा। इसलिए व्यवहार को दुरुस्त करने की आवश्यकता है। तमाम लोग ऐसे हैं, जो बहुत बड़ी-बड़ी बात बोलते हैं, किन्तु उनका व्यवहार शून्य होता है।
हमने छोटी आयु में एक कहानी पढ़ी थी - आज भी वह कहानी पढ़ाई जाती है। किसी तोते को उसके पालक ने सिखाया था कि शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, उसमें मत फंसना। कंठस्थ हो गया। एक बार शिकारी आया, जाल बिछाया और दाना डाला, पास ही बैठ गया कि देखें, कौन फंसता है, तो वही तोता आया। तोते ने तो केवल याद किया था मालिक के शब्दों को, बार-बार सुनकर अभ्यास करके, किन्तु उसे यह नहीं पता था कि शिकारी कौन होगा, दान क्या होगा, कैसे आएगा, कैसे जाल बिछाएगा, फंसने का क्या अर्थ है, कैसे हम फंसने से बचेंगे, यह कुछ नहीं पता था। ठीक इसी तरह से तमाम अच्छी बात करने वाले लोग हैं, किन्तु पहले बतलाया जा चुका है, ज्ञान को परिपक्व बनाना पड़ता है। ज्ञान जब परिपक्व होता है, तभी लाभ देता है।
ऐसे ही तमाम लोग हैं - रामायण या भागवत पर बोल रहे हैं। लोकतंत्र पर बोल रहे हैं, तमाम विधाओं पर बोल रहे हैं, स्वच्छता पर बोल रहे हैं, कुरीतियों को दूर करना है, लेकिन ये तोते के जैसा बोल रहे हैं। तोता भी बोलता था, किन्तु आकर जाल में फंस गया। शिकारी ने फंसा लिया। तो हम अपने ज्ञान को परिपक्व ज्ञान बनाएं, तब हमारा व्यवहार शुद्ध होगा, इसलिए हमारे यहां कहा जाता है कि केवल अधकचरा ज्ञान विष के समान होता है। ज्ञान पचना चाहिए, चरित्र में उतरना चाहिए। दुुनिया में जितने दुराचारी हुए, उन्हें भी पता था कि झूठ नहीं बोलना है, चोरी नहीं करना है, गलत आहार नहीं लेना है, गलत स्त्री को साथ नहीं लेना है, दूसरे की स्त्री को नहीं देखना है, कहीं से भी लांछित नहीं होना है, छल-कपट नहीं करना है, किन्तु वे नहीं कर सके। क्रमश:
रावण कैसे भटक गया
लिखा है शास्त्र में - सब लोग मुक्त हों। कुम्हार जैसे मिट्टी से घड़ा बना लेता है, घड़ा अलग करके रख देता है, किन्तु चक्का चलता रहता है, क्योंकि उसमें गति है, चलने की शक्ति है। घड़ा भले ही हट गया, किन्तु चक्र चलता है। जीवन में भी ऐसा ही होना चाहिए। आप बन गए, तो चक्र को चलने दें, उससे आप मुक्त हो जाएं।
भगवान की दया से जीवित रहते ही लोगों को ज्ञान हो जाता है। दुनिया में जितने वैज्ञानिक नहीं हुए हैं, उससे ज्यादा दुनिया में मुक्त पुरुष हुए हैं। एक से एक ऋषि, महात्मा, संत हुए हैं, जिन्होंने पूरे संसार को आलोकित किया है।
हम मनुष्यों की इतनी बड़ी आबादी हो गई, लगभग ७ अरब लोग संसार में हैं, किन्तु व्यवस्थित जीवन के लोगों का प्रतिशत कम हो गया। आज बहुत कम लोग हैं, जिनका जीवन सही मार्ग पर चल रहा है, जिन्हें स्वयं सुख मिल रहा है, संतोष मिल रहा है। जिनका जीवन दूसरों के लिए भी प्रेरणादायक है, ऐसे बहुत कम प्रतिशत लोग हैं। यहां तो जब हम देखते हैं, तो उन महान लोगों से इतिहास के पृष्ठ भरे पड़े हैं, जिनका जीवन धन्य, प्रेरक था। संस्कारितों का प्रतिशत कम हो रहा है। श्रेष्ठ उद्देश्य वालों की, महापथ पर आरूढ़ लोगों की संख्या बहुत कम हो रही है, यह चिंता की बात है। आज हम नजर दौड़ाते हैं, तो सोचते हैं कि किसके हाथ में नेतृत्व आ गया है, ऐसा कौन है, जो वस्तुत: राष्ट्रभक्त है। जो मातृभूमि के सेवक हैं, बहुत कम हैं ऐसे लोग।
जो लोग आज मोक्ष के लिए जी रहे हैं, उनमें भी कमी आई है। गाड़ी नहीं हो, तो चलेगा, माला नहीं हो, तो चलेगा। हमारी भी वर्दी है, प्रेरक है, बतलाती है कि हम साधु हैं, किन्तु भगवान की दया से हमारा जीवन धार्मिक लिबास और बाह्य स्वरूप से ठीक होकर भी यदि हमारा जीवन केवल धन के लिए है, केवल भोग के लिए है, तो हमारा बाहरी स्वरूप कभी भी हमें श्रेष्ठ जीवन नहीं दे सकता। सभी क्षेत्रों में जो गिरावट आई है और जो गिरावट राष्ट्र को प्रभावित कर रही है, पूरी मानवता, पूरी जाति को प्रभावित कर रही है। सही शिक्षा के अभाव में, वेदों, दर्शनशास्त्रों की शिक्षा के अभाव में, शिक्षा की परिपक्वता के अभाव में, शिक्षा को चरित्र में नहीं उतारने के कारण ही सभी क्षेत्रों में विकृतियां आई हैं। उन लोगों को देखकर, जो बहुत समृद्ध हैं, हमें अपने जीवन को नहीं ढालना चाहिए। हमें उन लोगों को जीवन में ढालना चाहिए, जिन्होंने अपने जीवन की परिपूर्णता को प्राप्त कर संपूर्ण समाज को आलोकित किया और बल दिया। किन्तु अनेक लोग आलोकित व्यक्ति को नहीं देखते। हम तो पड़ोस वाले को देखते हैं कि कहां से पैसा लाकर बंगला बना लिया, कहां से गाड़ी ले आया, हमें भी ऐसे ही करना है। मालूम हो जाता है कि पड़ोसी गलत विधि से लाया है, तो भी फर्क नहीं पड़ता, लोग केवल यह सोचते हैं कि इसका हो गया, तो ऐसी ही किसी गलत विधि से मेरा भी हो जाए। जबकि गलत विधि से जो शक्ति आएगी, परिवार, प्रभाव आएगा, चाहे ज्ञान हो, वो कभी भी कारगर नहीं होगा। वस्तुत: सफल नहीं होगा। तो शिक्षा को हमें बदलने की आवश्यकता है। संयम हो और बढ़े। हमारा कदम-कदम शास्त्र की मर्यादा में होना चाहिए।
हमारे कमाने का तरीका भी सही होना चाहिए। न्याय से अर्जित धन को ही स्वीकार करने के लिए शास्त्रों ने कहा, किसी तरह से कमाया और दे दिया, तो दान नहीं कहलाएगा। न्यायार्जित धन का परित्याग दान है। न्यायपूर्वक जो धन अर्जित किया है, शास्त्रों की रीति से किया है, जो संविधान है, उसके भी नियम-कायदे के अनुरूप किया है, उससे जो धन अर्जित होगा, वही पवित्र होगा। उससे ही आपको सही जीवन मिलेगा, संतति को अच्छा स्वरूप मिलेगा। सबकुछ मिलेगा, अगर आपने ऐसे कमाया।
यदि कहीं से झूठ से पाकिटमारी से धन लाए, फरेब से, जैसे-तैसे, उससे कुछ नहीं होगा। कहीं से भी लाई गई पत्नी वंश का गौरव नहीं बढ़ाएगी, उससे तो वर्णसंकर ही पैदा होना है। उससे हमारा जीवन नहीं सुधरेगा। क्रमश:
रावण कैसे भटक गया
सबसे बड़ा सिद्धांत है कि हम अपने को ईश्वरीय कार्य के लिए नौकर मानें। संसार के समस्त जीवों को यह बात याद कराई जानी चाहिए और बार-बार यह कहना चाहिए। आप केवल यह नहीं मानो कि दो पैसा कमाने के लिए आपका जीवन है, ऐसा नहीं मानो कि परिवार के लिए, पत्नी, बच्चे, मां के लिए जीवन है, ऐसा मत मानो कि हमारा जीवन केवल जयजयकार के लिए है, यश के लिए है, मकान के लिए है। हमारा जीवन ईश्वर के कार्य के लिए है।
तुम्हारे रोम-रोम, तुम्हारी सांस-सांस का उपयोग, तुम्हारी हर चेष्टा का उपयोग ईश्वर के लिए है। राम जी के लिए हनुमान जी ने पूरा जीवन दे दिया। इसीलिए हम सभी लोगों को अपने संपूर्ण जीवन भाग का प्रयोग राम सेवा के लिए करना है। थोड़ा करने से नहीं चलेगा, पूरा करना पड़ेगा। इससे हमारी गृहस्थी नहीं बिगड़ेगी। जैसे ९९ रुपए एक सौ रुपए के नोट में शामिल हैं, वैसे ही ईश्वर के प्रति समर्पण में सब शामिल है। ईश्वर सेवा में सारी सेवाएं समाहित हो जाती हैं। उसी में राष्ट्र सेवा, जाति सेवा, समाज की सेवा समाहित है।
जो लोग यह समझते हैं कि हमारे पास साधन नहीं है, तो हम भगवान की कैसे सेवा करेंगे, तो यह उनकी भूल है, साधन से ईश्वर का कोई मतलब नहीं है। साधन मिला है, मन मिला है, मन से करो सेवा। मन को व्यवस्थित करो। बड़ा आदमी जैसे आता है, तो लोग कालीन बिछाने की सेवा करते हैं, तुम भी ऐसा मानो कि ईश्वर के लिए हमारा मन है, उसी का यह मंदिर है, उसी का मंदिर है हमारा चित्त, हमारी वाणी, सब ईश्वर के लिए है।
जैसे कोई विशिष्ट अतिथि आता है आपके घर, तो आप पूरी शक्ति लगाकर सफाई अभियान चलाते हैं। ईश्वर आपके मन में आने वाले हैं, तो आपके मन को कितना साफ होना चाहिए। मन को साफ रखने, शरीर को साफ करने का प्रयास, यह भी साधन का एक बड़ा स्वरूप है। ऐसा ही हनुमान जी ने किया, ऐसा ही सभी आचार्यों ने किया। समर्पित होकर ही आप अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त करेंगे।
प्लेटो कहते थे कि शासक को दार्शनिक होना चाहिए, देश की बागडोर दार्शनिकों के पास होना चाहिए। हालांकि यह चिंतन सफल नहीं हो पाया। सुकरात के शिष्य थे प्लेटो, जिनको हिंदी में अफलातून भी बोलते हैं। उन्होंने कहा था कि राष्ट्र का संचालन दार्शनिक करें, किन्तु संसार में इसका प्रयोग नहीं हो पाया। मेरा कहना है कि इस बात में सुधार किया जाए। देश की बागडोर जिनको दी जाए, उन्हें दर्शनशास्त्र जरूर पढ़ाया जाए। उन्हें बताया जाए कि राम जी ने कैसे संपूर्ण सृष्टि को राममय बना दिया। सृष्टि को कैसे निर्दोष और सशक्त स्वरूप प्रदान किया।
आज देश की बागडोर ऐसे लोगों के हाथों में कतई नहीं हो, जिन्होंने संपूर्ण शक्ति लगाकर किसी तरह से धन अर्जित करके अपने लिए बंगला बना लिया। बाद में घोटाले में फंस गए। वोट मिला, तो लोगों को अपना माना और वोट नहीं मिला, तो पांच साल के लिए लोगों को अंगूठा दिखा दिया। आज नेता अपनी जाति का अपने प्रांत का शोषण करने में लग जाते हैं। अपने लिए और अपने दो बच्चों, परिवार के लिए नेता गलत काम करता है। बागडोर संभालने वाले आज रामजी से नहीं सीखते।
समष्टि की भावना जब आती है, तब दुष्कर्म खत्म होने लगते हैं। संपूर्ण सृष्टि में जो आज अव्यवस्था मची है, वह समष्टि या समाज के बारे में न सोचने के कारण ही है। हम सोच नहीं पा रहे हैं, इसका एकमात्र कारण है कि हमारी शिक्षा हमारा सान्निध्य श्रेष्ठजनों के साथ नहीं है, शिक्षा हमारी नहीं है। शिक्षा का परिपक्व स्वरूप नहीं है। प्रयोगात्मक स्वरूप नहीं है। यदि स्वरूप परिपक्व हो जाए, तो सब पता लग जाए, तो आदमी गलत दिशा में कभी न जाए।
कुछ ही दिन पहले मैंने एक लेख पढ़ा था कि कैसे अमरीका में पैसा उत्पादन की नीति को तैयार किया गया। विचित्र स्थिति है, केवल पैसा और केवल भोग। भोग में सब आ जाता है, आंखों से, जीभ से, कानों से, जननेन्द्रिय के माध्यम से, तमाम जो सुख के साधन हैं, उन्हें प्राप्त करने के उद्देश्य से ही सबकुछ करें, तो पैसे का बड़ा योगदान है इस मामले में। ऐसे में अपने चरित्र से हम कैसे संसार को आलोकित करेंगे, कैसे विश्व गुरुत्व की प्राप्ति होगी। हम कैसे अपना जीवन चमकीला बना लेंगे, कैसे सबके लिए हमारा जीवन प्रेरक होगा। इसकी शिक्षा नियमित होनी चाहिए। एक दिन पढक़र कोई विद्वान नहीं हो जाता। कच्चा फल सुखदायक नहीं होता। फल का विकास आवश्यक है। ठीक इसी तरह से जीवन है, पढऩे की बहुत आवश्यकता है।
योग दर्शन के भाष्य में लिखा है कि मोक्ष शास्त्रों के अध्ययन को स्वाध्याय कहते हैं। अभी तो पता ही नहीं है कि मोक्ष किसका होगा, पता नहीं है कि मोक्ष है क्या? लोग समझ रहे हैं कि मोक्ष माने मरना, परलोक में जाना, किन्तु ऐसा नहीं है। मोक्ष माने आनंद की उस धारा को पाना जो कभी सूखती नहीं है। ज्ञान के उस स्वरूप को पाना जो कभी विकृत नहीं हो, किसी भी तरह का दूषण जिसमें नहीं हो, कोई कुरूपता नहीं हो, गलत भाव नहीं हो। यह जो अवस्था जीवन की है, यही मोक्ष है। जिसकी प्राप्ति के बाद आदमी कहने लगता है कि मुझे अब कुछ नहीं चाहिए। जीवन के उद्देश्य को छोटे दायरे से बड़े दायरे में ले जाना है। इस काम को शास्त्रों ने, ऋषियों ने सदियों से किया। क्रमश:

.png)

























