Tuesday, 6 August 2024

गुरुदेव श्रृंखला

श्री रामानन्द सम्प्रदाय का गुरु-परम्परा (गुरु-श्रृंखला)

1. श्री राम:

   - श्री राम ने श्री जानकी जी को षडाक्षर श्री राम मंत्र (रां रामाय नमः) प्रदान किया।

   - जानकी जी ने यह मंत्र श्री हनुमान को दिया।

   - श्लोक: 

     इममेव मनुं पूर्व साकेतपतिर्मामवोचत् अहं हनुमते मम प्रियाय प्रियतराय । 

     स वेद वेदिने ब्रह्मणे स वशिष्ठाय स पराशराय । 

     स व्यासाय । स शुकाय इत्येषोपनिषत् । इत्येषाग्रह्मविद्या ।

     (अथर्ववेद शाखा मैथिली महा-उपनिषद अध्याय 1)

2. श्री जानकी (सीता जी):

   - उन्होंने श्री हनुमान को मंत्र दीक्षा दी।

   - श्लोक:

     इममेव मनुं पूर्व साकेतपतिर्मामवोचत् अहं हनुमते मम प्रियाय प्रियतराय । 

     स वेद वेदिने ब्रह्मणे स वशिष्ठाय स पराशराय । 

     स व्यासाय । स शुकाय इत्येषोपनिषत् । इत्येषाग्रह्मविद्या ।

     (अथर्ववेद शाखा मैथिली महा-उपनिषद अध्याय 1)

3. श्री हनुमान:

   - श्री हनुमान ने श्री ब्रह्मा को मंत्र दीक्षा दी।

   - श्लोकः

     ऐहिकेषु च कार्येषु महापत्सु च सर्वदा ॥

     नैव योज्यो राममन्त्रः केवलं मोक्षसाधकः ऐहिके समनुप्राप्ते मां स्मरेद् रामसेवकम् ॥

     यो रामं संस्मरेन्नित्यं भक्त्या मनुपरायणः ।

     तस्याहमिष्टसंसिद्ध्यै दीक्षितोऽस्मि मुनिश्वराः ॥

     वाञ्छितार्थं प्रदास्यामि भक्तानां राघवस्य तु सर्वथा जागरूकोऽस्मि रामकार्यधुरंधरः ॥

     (अथर्ववेद श्रुति राम रहस्य उपनिषद 4/10-13)

4. श्री ब्रह्मा:

   - श्री ब्रह्मा ने श्री वशिष्ठ को मंत्र दीक्षा दी।

   - श्लोक:

     त्वत्तो वा ब्रह्मणो वापि ये लभन्ते षडक्षरम् ।

     जीवन्तो मन्त्रसिद्धाः स्युर्मुक्ता मां प्राप्नुवन्ति ते ।।

     मुमूर्षोर्दक्षिणे कर्णे यस्य कस्यापि वा स्वयम् ।

     उपदेक्ष्यसि मन्मन्त्रं स मुक्तो भविता शिव ।।

     (अथर्ववेद श्रुति राम उत्तर तापनीय उपनिषद 3.15/16)

5. श्री वशिष्ठ:

   - श्री वशिष्ठ ने श्री पराशर को मंत्र दीक्षा दी।

   - श्लोक:

     तारकं मन्त्रराजं तु श्रावयामास ईश्वरः ।

     जानकी तु जगन्माता हनुमन्तं गुणाकरम् ।।

     श्रावयामास नूनं स ब्रह्माणं सुधियांवरम् ।

     तस्माल्लेभे वशिष्ठर्षिः क्रमादस्मादवातरम् ॥

     भूमौ हि राममन्त्रोऽयं योगिनां सुखदः शिवः ।

     एवं क्रमं समासाद्य मन्त्रराजपरम्परा ॥

     (श्री वाल्मीकि संहिता अध्याय 2 श्लोक 33- 35)

6. श्री पराशर:

   - श्री पराशर ने श्री वेदव्यास को मंत्र दीक्षा दी।

   - श्लोक:

     पराशराय रामस्य मन्त्रं मुक्तिप्रदायकम् ।

     स वेदव्यासमुनये ददावित्थं गुरुक्रमः ॥

     वेदव्यासमुखेनात्र मन्त्रो भूमौ प्रकाशितः ।

     वेदव्यासो महातेजः शिष्येभ्यः समुपादिशत् ।।

     (श्री अगस्त्य संहिता, अध्याय 8, श्लोक 3-4)

7. श्री वेदव्यास:

   - श्री वेदव्यास ने श्री शुकदेव को मंत्र दीक्षा दी।

   - श्लोक:

     इममेव मनुं पूर्व साकेतपतिर्मामवोचत् अहं हनुमते मम प्रियाय प्रियतराय । 

     स वेद वेदिने ब्रह्मणे स वशिष्ठाय स पराशराय । 

     स व्यासाय । स शुकाय इत्येषोपनिषत् । इत्येषाग्रह्मविद्या ।

     (अथर्ववेद शाखा मैथिली महा-उपनिषद अध्याय 1)

8. श्री शुकदेव:

   - श्री शुकदेव ने महर्षि बौधायन (पुरुषोत्तमाचार्य) को मंत्र दीक्षा दी।

   - श्लोक:

     शुकदेवं गुरुं नत्वा श्रीमद्व्यासं च राघवं ।

     रामायणरहस्यं हि सद्बोधाय ब्रवीम्यहम् ॥

     (महर्षि बौधायन, श्री रामायण रहस्य)

9. महर्षि बौधायन:

   - महर्षि बौधायन ने श्री गंगाधराचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

   - श्लोकः

     सीतानाथ समारंभाम् बादरायण मध्यमाम्।

     बोधायनाख्य गुर्वन्तां वन्दे गुरु परम्पराम् ॥

     (महर्षि बौधायन, सधन दीपिका मंगलाचरण)

10. श्री गंगाधराचार्य:

    - श्री गंगाधराचार्य ने श्री सदानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोक:

      गङ्गाधरं गुरुं नत्वा बोधायनं च राघवम्।

      अहं करोमि वेदान्त्सारस्तवं सुखावहम् ॥

      (श्री सदानंदाचार्य, वेदांत सार-स्तव)

11. श्री सदानंदाचार्य:

    - श्री सदानंदाचार्य ने श्री रमेश्वरानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोक:

      सीतानाथं नमस्कृत्य सदानन्दं गुरुं तथा ।

      सत्प्रबोधामृतं कुर्वे प्राणिमृत्योर्विनाशकम्॥

      (श्री रमेश्वरानंदाचार्य, सत्प्रबोधामृत)

12. श्री रमेश्वरानंदाचार्य:

    - श्री रमेश्वरानंदाचार्य ने श्री द्वारानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोक:

      व्यासं बोधायनं रामं नत्वा रामेश्वरं गुरुम् ।

      तत्त्वावबुद्धये कुर्वे प्रश्नोत्तरावलीं शुभाम्॥

      (श्री द्वारानंदाचार्य, प्रश्नोत्तर रत्नावली)

13. श्री द्वारानंदाचार्य:

    - श्री द्वारानंदाचार्य ने श्री देवानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोक:

      कुर्वे बोधायनं नत्वा द्वारानन्दं गुरुं तथा ।

      सदाचारप्रबोधाय सदाचारप्रदीपिकाम् ॥

      (श्री देवानंदाचार्य, सदाचार प्रदीपिका 

14. श्री देवानंदाचार्य:

    - श्री देवानंदाचार्य ने श्री श्यामानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोक:

      सीतानाथं नमस्कृत्य देवानन्दं गुरुं तथा।

      प्रपन्नानां हितायेयं नवरत्नी विधीयते ॥

      (श्री श्यामानंदाचार्य, नवरत्नी मंगलाचरण)

15. श्री श्यामानंदाचार्य:

    - श्री श्यामानंदाचार्य ने श्री श्रुतानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोकः

      रामं बोधायनं व्यासं गुरुदेवं प्रणम्य च।

      श्रुतिवेद्यस्तवं कुर्वे श्रौतरामस्य तृप्तये॥

      (श्री श्रुतानंदाचार्य, श्रुतिवेद्य स्तव)

16. श्री श्रुतानंदाचार्य:

 श्री श्रुतानंदाचार्य ने श्री चिदानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोकः

      धर्मकीत्तर्यादयो बौद्धा येन वादे निराकृताः।

      तं गुरुं श्रीश्रुतानन्दं वन्दे बोधमहोदधिम् ॥

      नत्वा बोधायनं व्यासं तथा रामं परमेश्वरम्।

      कुर्वे प्रमयेबोधाय प्रमेयोद्देश-भास्करम् ॥

      (श्री चिदानंदाचार्य, प्रमेयदेश भास्कर)

17. श्री चिदानंदाचार्य:

    - श्री चिदानंदाचार्य ने श्री पूर्णानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोक:

      गुरुं च राघवं नत्वा व्यासं बोधायनं तथा।

      रामभक्तिविवेकं हि कुर्वे भक्तिप्रदायकम्॥

      (श्री पूर्णानंदाचार्य, राम भक्ति विवेक)

18. श्री पूर्णानंदाचार्य:

    - श्री पूर्णानंदाचार्य ने श्री श्रीयानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोक:

      व्यासं बोधायानं ब्रह्म रामं नत्वा च सद्गुरुं।

      कुर्वे श्रौतार्थबोधाय श्रौतप्रमेयेन्द्रिकाम् ॥

      (श्री श्रीयानंदाचार्य, श्रौतप्रमेय चंद्रिका)

19. श्री श्रीयानंदाचार्य:

    - श्री श्रीयानंदाचार्य ने श्री हरीयानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोक:

      श्रियानन्दं गुरुं नत्वा रामं बोधायनं तथा।

      कुर्वे श्री चरममन्त्ररामायणं हि मुक्तिदम् ॥

      (श्री हरीयानंदाचार्य, चरम मंत्र रामायण)

20. श्री हरीयानंदाचार्य:

    - श्री हरीयानंदाचार्य ने श्री राघवानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोक:

      राघवेन्द्रं नमस्कृत्य हर्यानन्दं गुरुं तथा ।

      कुर्वे मङ्गलमालां श्रीराघवेन्द्रस्य तुष्टये ॥

      (श्री राघवानंदाचार्य, राघवेंद्र मंगल माला)

21. श्री राघवानंदाचार्य:

    - श्री राघवानंदाचार्य ने श्रीमद जगद्गुरु रामानंदाचार्य को मंत्र दीक्षा दी।

    - श्लोक:

      श्रीरामं जनकात्मजामनिलजं वेधो वशिष्ठावृषी योगीशं च पराशरं श्रुतिविदं व्यासं जिताक्षं शुकम्।

      श्रीमन्तं पुरुषोत्तमं गुणनिधिं गङ्गाधराद्यान्यतीन् श्रीमद्राघवदेशिकं च वरदं स्वाचार्यवर्यं श्रये ॥

      (श्री रामानंदाचार्य, गीता आनंद भाष्य)

22. श्री रामानंदाचार्य:

    - श्री रामानंदाचार्य ने विभिन्न वर्गों के लोगों को शिष्य बनाकर भक्ति आंदोलन को बढ़ावा दिया और धर्म का प्रचार किया।

    - श्लोक

      जगमंगल आधार भक्ति दसधा के आगर॥

      (श्रीभक्तमाल पद - ३६)

Sunday, 21 July 2024

गुरुदेव महाराज, प्रयागराज




 

आज प्रयागराज में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर धूमधाम से गुरुदेव महाराज का पूजन। 

आज से रामानंदाचार्य प्राकट्य धाम हरित माधव मंदिर, दारा गंज, प्रयागराज में चातुर्मास महायज्ञ का प्रारंभ। महाराज दो महीने यही पूजन-प्रवचन करेंगे। जय जयसियाराम

Monday, 18 March 2024

जगद्गुरु महाराज की जय


बुरे कर्म से जो डरेगा, दुख से जो डरेगा, वही अच्छे कर्म में अपने मन को लगाएगा और ईश्वर के धाम जाने योग्य बनेगा।

 

Thursday, 22 February 2024

अद्वितीय श्रीराममंदिर निर्माण शुभारंभ

शांतिकुंज मार्ग पर भूपतवाला, हरिद्वार में अद्वितीय श्रीराममंदिर निर्माण का पुन: शुभारंभ हो गया। जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने गुरुवार, 22 फरवरी, माघ शुक्ला त्रियोदशी को विधिवत पूजन करते हुए निर्माण का शुभारंभ किया। सप्तऋषिघाट पर जाने वाले शांतिकुंज मार्ग पर निर्माणस्थल स्थित है। हरिद्वार में बनेगा श्रीराम का भव्य मंदिर। वर्ष 2005 से शुरू हुआ था निर्माण। केवल लाल पत्थरों से हो रहा है निर्माण। नींव के बाद से रुका हुआ था निर्माण। 

हरिद्वार। राम भक्ति परंपरा की जो मूल पीठ है, उसके माध्यम से देश का अद्वितीय श्रीराम मंदिर हरिद्वार में सृजित होने जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इस अनुपम श्रीराम मंदिर का शिलान्यास 18 नवंबर 2005 को हुआ था। कुछ निर्माण पूर्व में हो चुका है और बीच में भूमि अतिक्रमण के कारण निर्माण थम गया था। अब इस अद्वितीय श्रीराम मंदिर का निर्माण पुन: 22 फरवरी को प्रारंभ हो गया है, मंदिर निर्माण के शुभारंभ के अवसर पर देश भर से राम भक्त जुट रहे हैं। 

यह रामानंद संप्रदाय के लिए बड़ी सुखद पावन सूचना है कि रामानंदाचार्य पीठ के वर्तमान पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के सान्निध्य में निर्माण कार्य पूर्ण गरिमा व तीव्रता के साथ प्रारंभ हो गया है। रामानंदचार्य पीठ का मुख्यालय या मुख्य गद्दी श्रीमठ, पंचगंगा घाटी, काशी में स्थित है। यह वही स्थान है, जहां कभी राम भक्त शिरोमणि रामानंदाचार्य निवास करते थे। जहां से पूरे देश में भक्ति प्रेम की नई धारा बही थी और उद्घोष हुआ था, जात पात पूछे नहीं कोई हरि को भजे से हरि का होई।  

ध्यान रहे, रामभक्ति परंपरा का यही वह मूल पीठ है, जहां से भक्त धन्ना निकले थे, भक्त पीपा निकले थे, जहां से रविदास निकले थे, भक्त सैन निकले थे, जहां से कबीरदास और तुलसीदास निकले थे। रामभाव से सराबोर ऐसे संप्रदाय और मूल पीठ के नेतृत्व में हरिद्वार में श्रीराम मंदिर निर्माण का संकल्प करीब दो दशक पुराना है, जो अब पूरा होने जा रहा है।

निर्माण कार्य को गति प्रदान करने के लिए देश भर से रामानंद संप्रदाय से जुड़े साधुओं और श्रद्धालुओं का आगमन हरिद्वार में होने लगा है। यह अपनी तरह का अद्वितीय श्रीराम मंदिर होगा। यह मंदिर पूरी तरह से पत्थरों से ही तैयार किया जा रहा है। 

यहां मंदिर में भगवान राम का पूर्ण वैदिक रीति से पूजन होगा। ईश्वर सेवा से जुड़ी सभी गतिविधियों की आदर्शतम परंपरा का निर्वाह यहां होगा। यह एक ऐसा मंदिर होगा, जो पूरी तरह से रामजी और उनके परिवार को समर्पित रहेगा। देश राम पूजन की जिन रीतियों को भूल सा गया है, उन रीतियों के दर्शन यहां संभव होंगे। विद्वानों और संतों का एक विशाल समूह है, जो वर्षों से इस मंदिर की प्रतीक्षा में है। रामानंद संप्रदाय से जुड़े साधुओं-संतों का संकल्प है कि इस अद्वितीय श्रीराममंदिर का निर्माण अब यथाशीघ्र पूर्ण हो।

अद्वितीय श्रीराम मंदिर निर्माण पूजन, हरिद्वार










 

Sunday, 28 January 2024

देवभूमि हरिद्वार में विश्व का अद्वितीय श्रीराम मंदिर निर्माण



 

अद्वितीय श्रीराम मंदिर निर्माण का पुन: श्रीगणेश



हरिद्वार में 22 फरवरी को भव्य आयोजन। सप्तऋषिघाट पर जाने वाले शांतिकुंज मार्ग पर निर्माणस्थल। हरिद्वार में बनेगा श्रीराम का भव्य मंदिर। वर्ष 2005 से शुरू हुआ था निर्माण। केवल पत्थरों से हो रहा है निर्माण। नींव के बाद से रुका हुआ था निर्माण। 

हरिद्वार। राम भक्ति परंपरा की जो मूल पीठ है, उसके माध्यम से देश का अद्वितीय श्रीराम मंदिर हरिद्वार में सृजित होने जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इस अनुपम श्रीराम मंदिर का शिलान्यास 18 नवंबर 2005 को हुआ था। कुछ निर्माण पूर्व में हो चुका है और बीच में भूमि अतिक्रमण के कारण निर्माण थम गया था। अब इस अद्वितीय श्रीराम मंदिर का निर्माण पुन: 22 फरवरी को प्रारंभ होने जा रहा है, जिसमें देश भर से राम भक्त जुट रहे हैं। 

रामानंदाचार्य पीठ के वर्तमान पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के सान्निध्य में निर्माण कार्य पूर्ण गरिमा व तीव्रता के साथ प्रारंभ हो जाएगा। रामानंदचार्य पीठ का मुख्यालय या मुख्य गद्दी श्रीमठ, पंचगंगा घाटी, काशी में स्थित है। यह वही स्थान है, जहां कभी राम भक्त शिरोमणि रामानंदाचार्य निवास करते थे। जहां से पूरे देश में भक्ति प्रेम की नई धारा बही थी और उद्घोष हुआ था, जात पात पूछे नहीं कोई हरि को भजे से हरि का होई।  

ध्यान रहे, रामभक्ति परंपरा का यही वह मूल पीठ है, जहां से भक्त धन्ना निकले थे, भक्त पीपा निकले थे, जहां से रविदास निकले थे, भक्त सैन निकले थे, जहां से कबीरदास और तुलसीदास निकले थे। रामभाव से सराबोर ऐसे संप्रदाय और मूल पीठ के नेतृत्व में हरिद्वार में श्रीराम मंदिर निर्माण का संकल्प करीब दो दशक पुराना है, जो अब पूरा होने जा रहा है।

निर्माण कार्य को गति प्रदान करने के लिए देश भर से रामानंद संप्रदाय से जुड़े साधुओं और श्रद्धालुओं का आगमन हरिद्वार में होगा। यह अपनी तरह का अद्वितीय श्रीराम मंदिर होगा। यह मंदिर पूरी तरह से पत्थरों से ही तैयार किया जा रहा है। 



राम भाव से राम मंदिर तक

अद्वितीय श्रीराम मंदिर निर्माण में अनावश्यक विलंब अतिक्रमण के कारण भी आया। कानूनन सभी कागजात होने के बाद अतिक्रमियों को बलपूर्वक भी हटाया जा सकता था, किंतु रामानंद संप्रदाय के वर्तमान मूल पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज की इच्छा थी कि रामजी के कार्य में किसी का भी हृदय दुखी नहीं होना चाहिए। जो भी कार्य होना चाहिए संविधान के तहत पूरी गरिमा व मर्यादा की रक्षा करते हुए होना चाहिए। यह स्वर्णिम इतिहास ही है कि रामानंद संप्रदाय ने भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए न्यायालयों में लंबी लड़ाई लड़ी है और हर विधि सम्मत नियम-कायदों का पालन करते हुए मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है। 



दान में भी राम भाव

यह बात बहुत उल्लेखनीय है कि श्रीराम जी का यह मंदिर पूरी तरह से रामभाव के अधीन ही निर्मित होगा। इसमें धन देने वालों के व्यवसाय और प्रवृत्ति का भी अब तक पूरा ध्यान रखा गया है। किसी भी अपराधी या नशा या गलत द्रव्यों का व्यवसाय करने वाले से किसी भी प्रकार का धन या सहयोग न लेने का संकल्प है। अभी तक श्रीराम के मंदिर में रामभाव से अर्जित धन का ही उपयोग होता आया है। रामजी के मंदिर में गलत ढंग से अर्जित धन का उपयोग भला कैसे हो सकता है? जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज बार-बार दोहराते रहे हैं कि पाप से अर्जित धन से पुण्य का प्रतीक मंदिर भला कैसे खड़ा हो सकता है?


समायोजक : रामानंदाचार्य स्मारक सेवा न्याय

खाता संख्या : 10876860158

आईएफएससी कोड - SBIN 0002350

भारतीय स्टेट बैंक, हरिद्वार, उत्तरांचल


निर्माण स्थल

सप्तऋषि मार्ग या शांतिकुंज मार्ग, भूपतवाला, हरिद्वार

श्रीरामलला के विराजमान होने का सुख


जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी

अयोध्या में श्रीरामलला जी की प्रतिष्ठा 22 जनवरी को हो चुकी है, इससे जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी भी बहुत खुश हैं और इसी खुशी को विस्तार देते हुए उन्होंने घोषणा की है कि रामजी की कृपा से बहुत प्रसन्नता की बात है कि मेरे संकल्प का अद्वितीय श्रीराम मंदिर हरिद्वार में बनने जा रहा है और 22 फरवरी से नई ऊर्जा के साथ मंदिर का निर्माण पुन: शुरू हो जाएगा। प्रयास होगा कि जल्द से जल्द अद्वितीय राममंदिर का निर्माण कर देश और समाज के सामने रामभाव व रामभक्ति का एक और आदर्श प्रस्तुत किया जाए।

जगदगुरु रामानंदाचार्य ने एक चैनल से बात करते हुए बताया है कि रामजी अपने पूरे जीवन में जोड़ते ही रहे, जिसके अनेक उदाहरण हैं। मैं लोगों से कहता हूं कि रामजी ने राजा बनने के बाद पहला जो भाषण दिया था, तो उन्होंने कहा था, यदि मैंने कोई भी गलत बात कही हो, तो आप भय छोड़कर मुझे रोक सकते हैं। कहीं भी मेरे कर्म में कोई पक्षपात लगे, कोई रोकने लायक काम लगे, तो आप मुझे रोक दीजिएगा। 

रामानंदाचार्य जी के अनुसार, मैं अपनी मर्यादा से हटकर एक शब्द भी कहने का पक्षधर नहीं हूं। मैं निरंतर जोड़ रहा हूं, सुधार रहा हूं और जोड़ने का ही प्रयास होना चाहिए। अयोध्या धाम में भी 98 प्रतिशत आश्रम रामानंद संप्रदाय के ही हैं। अयोध्या में रामानंद संप्रदाय के साधु खूब हैं, रामजी उनके ईष्ट हैं। अयोध्या भी मोक्षपुरियों में सिरमौर मानी जाती है। वहां अखाड़े भी हैं, पहलवान भी हैं। 

मैं आपको बताना चाहता हूं कि एक बहुत बड़ी घटना अयोध्याजी में हनुमानगढ़ी में होने वाली थी, कुछ लोग वैमनस्य वाले थे, उन्होंने सोचा कि मौका अच्छा है, पर ऐन मौके पर ज्ञान हुआ और लोग मुकर गए कि हम ऐसा नहीं करेंगे। रामकाज में बाधा नहीं बनेंगे।

वह इतिहास को याद करते हुए बताते हैं कि जब अयोध्या में विवाद हुआ, तब राष्ट्रीय स्तर पर तय हुआ था कि एक ट्रस्ट बन जाए, जो विवाद को सुलझाए, ताकि श्रीरामलला का मंदिर बन जाए और सही रीति से ट्रस्ट वर्षों-वर्षों तक मंदिर का संरक्षण करे। मेरे पहले जो रामानंदाचार्य थे, जगदगुरु रामानंदाचार्य श्रीशिवरामाचार्य जी महाराज, उनको लोगों ने अध्यक्ष बनाया। वह वर्ष 1978 में रामानंदाचार्य बने थे और मैं उनके बाद 1988 में रामानंदाचार्य बना। ट्रस्ट का एक नियम था कि मुख्य रामानंदाचार्य पीठ का आचार्य ही अध्यक्ष बनेगा। हालांकि, ट्रस्ट के कार्य को कभी मेरे पास आने नहीं दिया गया। दूसरे महात्माओं के पास ही कार्यभार रहा, किंतु उनके प्रति मेरे मन में कोई द्वेष कभी नहीं आया। उनका मुझसे स्नेह भी निरंतर बना रहा।

एक बार मैं अयोध्या गया, तो अनेक लोगों ने कहा कि मूल पीठ का रामानंदाचार्य होने के नाते ट्रस्ट का नेतृत्व मेरे हाथों में ही होना चाहिए और मुझे न्यायालय का सहारा लेना चाहिए, किंतु मैंने कहा, जो लोग अभी काम संभाल रहे हैं, अपने ही स्नेही हैं। मेरी प्रवृत्ति कभी लड़ने की नहीं रही है। मेरी केवल जोड़ने की ही इच्छा रही है। आज भी मैं द्वेष, ईष्र्या से परे केवल जोड़ने में ही विश्वास करता हूं। जब तक मेरा जीवन रहेगा, मैं रामजी की सेवा करता रहूंगा, जो भी धन मेरे पास होगा, वह रामजी में ही लगाऊंगा। पूरी मर्यादा और सीमा में रहने वाले हम रामानंदी विचारधारा के लोग हैं, लड़ना बहुत छोटा काम है और जोड़ना बड़ा काम। 

वह उल्लसित भाव से बताते हैं कि अयोध्या में श्रीरामलला के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए मुझे आमंत्रण मिला या नहीं मिला, यह बहुत महत्व की बात नहीं है। कोई विद्यार्थी शायद ही ऐसा होता होगा, जो सारे प्रश्नों का सही हल करके आता होगा। कोई भंडारी शायद ही ऐसा होता होगा, जो हर बार रसोई पूरी तरह सही ही बनाता होगा। कभी हल्दी ज्यादा पड़ना, तो कभी नमक ज्यादा हो जाना, कभी मसाला ज्यादा। ऐसी भूलें होती रहती हैं, इतना बड़ा कार्यक्रम है, निमंत्रण देने का क्रम भी बहुत बड़ा होगा, तो उसमें बांटने वाले लोग सीमित होंगे, उनकी एक सोच होगी, तो कहीं से कोई नाम आमंत्रण से रह गया, तो जो अवसर आया है, भगवान की प्रतिष्ठा का, इतने बड़े समायोजन का, तो इसमें किसी प्रकार का क्षोभ, किसी प्रकार की उदासीनता, कहीं कोई चिंता, शिकायत इसलिए भी नहीं है कि अब जब फल आ ही गया है, तब नाचने की जरूरत है, गाने की जरूरत है। आयोजन में जाकर जो बन सके सेवा करने की जरूरत है, उसके लिए शिकायत नहीं कि निमंत्रण नहीं आया। ऐसे में शिकायत करना तो ऐसा ही हुआ कि जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, कि इधर बारात आ गई है और दूल्हा रूठ जाए कि अब मैं शादी नहीं करूंगा। मेरा सही सम्मान नहीं हुआ। ( हंसते हुए -अब हम शादी न करब, हमार सही सम्मान न भइल)। 

हम उस प्रकृत्ति के नहीं हैं। जो लोग मुझे रामानंदाचार्य बनाकर लाए थे, कहते थे कि आपको पालकी पर ढोएंगे। आपको कुछ नहीं करना है, आप केवल चलिए। 

रामजी की कृपा से आज भी कोई भी मेरा क्रम रुकता नहीं है, किसी आदमी के बिना या पैसे के बिना। रामकाज में कहीं से कोई कमी नहीं आती, जो संसाधन आता है, वह दूसरों के भी काम आता है। मैं कहता हूं कि लोग भगवान से न जाने क्या-क्या मांगते हैं, पर भगवान से आज तक मैंने कुछ भी कहा नहीं, जरूरत ही नहीं है, वह सबकुछ समयानुसार स्वयं ही दिए जा रहे हैं। 


रामानंदाचार्य जयंती महोत्सव