Tuesday, 31 December 2024

मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि

हम कभी नहीं चाहते कि हमारे साथ कोई हिंसा करे, मेरी वाणी की, मेरी सुन्दरता की, मेरे बल की, मेरे धन की हिंसा कर दे। वेदों ने कहा, मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि। किसी भी जीव की हिंसा वर्जित है। कथा है कि एक ऋषि ने एक उडऩे वाले पतंगे के पंख पर कुछ गड़ा दिया था, तो उनको सूली पर चढऩा पड़ा था। एक मेरे भक्‍त हैं, मुझे सुना रहे थे, 'एक बार मैंने बंदूक का निशाना किया, विनोद कर रहा था, ऊपर एक चिडिय़ा थी, दुर्भाग्य से उसकी आंख में गोली लगी, वह गिर गई, वह बची नहीं। वह भक्‍त मेरे बड़े शुभचिंतकों में हैं, मैं जब उन्हें कर्म का सिद्धांत बता रहा था, तो उन्होंने मुझसे कहा, 'मैं आइंस्टीन हूं कर्म का, प्रयोगकर्ता। मुझे बेटा हुआ, उसकी दाहिनी आंख ठीक नहीं थी, जन्म से ही अंधा था, डॉक्टरों को दिखाया, उसका कोई इलाज नहीं था, तो देखिए तुरंत न्याय हो गया, इधर से लीजिए, उधर से दीजिए, कहीं और जाने का कोई अर्थ ही नहीं है।

वेद जिसको कहता है कि करो, वह धर्म है या उस कर्म से उत्पन्न ऊर्जा धर्म है। धर्म की दो परिभाषाएं हैं, कुमारिल भट्ट और प्रभाकर जी की। वेदनिहित कर्म को धर्म कहते हैं, वेदनिहित कर्म से उत्पन्न कर्म से जो शक्‍त‍ि उत्पन्न होती है, जो दिखाई नहीं पड़ती, उसे धर्म कहते हैं। वेदों में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो दुनिया के लोगों के लिए मान्य न हो। उसके लिए मुझे दो बातें कहनी हैं। पहली बात, वह जो बनाई हुई पद्धति है, हमारा सनातन धर्म कहता है, अनादि सृष्‍टि का अनादि चिंतन हो और सबके लिए चिंतन हो। हरिजन के लिए भी चिंतन हो।

जो दुकानदार लोग दिन भर झूठ बोलते हैं, वे भी घर में अपनी पत्‍नी से यही उम्मीद करते हैं कि पत्‍नी सत्य बोले। जिसने दिन भर झूठ बोला है कि यह सामान इतने का है, इसमें मार्जिन बिल्कुल नहीं है, किन्तु वह भी उम्मीद करता है कि उससे सच बोला जाए। सारे लोग ऐसा नहीं करते, किन्तु ज्यादातर लोग व्यवसाय में झूठ बोलते हैं, फिर भी वे चाहते हैं कि उनसे सच बोला जाए। हुआ न. . . सत्यम् वद्। मेरे लिए तो अवसर ही नहीं आता है कि झूठ बोलूं। मेरा यह कहना है कि सत्य की किसको जरूरत नहीं है?

सत्य के बाद फिर परिष्कार हुआ। अहिंसा की सबको जरूरत है। दान की किसको जरूरत नहीं है? आप अपनी लेखनी की रोटी खा रहे हैं, हम दान की रोटी खा रहे हैं, लेकिन आपमें और हममें कोई अंतर नहीं है। दोनों को दान की जरूरत है। पत्‍नी कहीं से दान में आई है या कोई बहन है आपकी? यदि बहन से शादी कर लिए होते, तो आज यहां कोई बैठने देता क्या? दरवाजा बंद कर दिया जाता। माता-पिता ही बाहर कर देते, समाज में सब थू-थू करते। दान है, कन्यादान प्राप्‍त  हुआ है, किसी ने अपनी बेटी आपको दान की। जो आपके घर में बैठकर आपके बच्चों को संभाल रही है, आपके घर को संभाल रही है, हर व्‍यक्‍त‍ि दान से चलता है। यह संसार दान से चलता है।

दुख क्यों होता है?

एक दिन मैं बिहार यात्रा में किसी गांव जा रहा था। विभिन्न स्वभाव और विभिन्न आयु व आकार-प्रकार व अवस्था के लोग साथ यात्रा कर रहे थे। उन लोगों ने कई प्रकार की चर्चा छेड़ रखी थीं, लेकिन उन चर्चा का कोई समाधान नहीं हो रहा था। कोई पूछ रहा था कि आजकल माता-पिता को लोग क्यों नहीं मान रहे हैं, कुछ लोग चारों तरफ बढ़ते भ्रष्टाचार की बात कर रहे थे। कुल मिलाकर सवाल यह था कि कष्‍ट  क्यों होता है? दुख क्यों होता है। हर आदमी के मन में कोई न कोई जिज्ञासा थी, लेकिन उसका समाधान उस समूह द्वारा नहीं हो रहा था। देखने से यही लग रहा था कि लोग जिज्ञासु हैं, उनमें जानने की इच्छा है। शास्त्रों में लिखा है, जिज्ञासा तभी होती है, जब संदेह हो और जब अपना मतलब सिद्ध होना हो। दुनिया में कोई ऐसा नहीं है, जिसे जिज्ञासा न हो। हर किसी को कोई न कोई मतलब भी है और संदेह भी है।

तो चर्चा चल रही थी, क्यों लोग भ्रष्टाचार कर रहे हैं, क्यों मर्यादा खो रही हैं, क्यों दुख बढ़ रहा है? मुझसे लोगों ने पूछा कि आप इस पर कुछ बोलिए। मैंने कहा कि आप लोग अच्छी चर्चा कर रहे हैं, लेकिन इस चर्चा का कहीं एक जगह समाधान होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। मैंने कहा कि देखिए, व्यावसायिक उदाहरण से आपको समझाने का प्रयास कर रहा हूं। व्यवसाय में सभी को किसी दूसरे की सहायता लेनी पड़ती है। अपनी स्वयं की पूंजी से कोई बड़ा व्यवसाय सभी लोग नहीं कर पाते हैं। बहुत बड़ा प्रतिशत उन लोगों का है, जो बैंक या दूसरों से ऋण लेकर व्यवसाय शुरू करते हैं। कुछ लोग मित्रों और रिश्तेदारों से ऋण लेकर व्यवसाय शुरू करते हैं। जो आदमी पैसा ले ले और उसे लौटाए नहीं, बाजार में उसकी साख खत्म होने लगती है। उसे लोग ऋण देने में संकोच करने लगते हैं। लोग उसे चोर कहेंगे, गलत आदमी कहेंगे। ऋण न लौटाने वाला आदमी बाजार से बाहर हो जाएगा। यह आम दुनिया की बात है, तो मेरा यह मानना है कि सारी जो अव्यवस्था है, वह सिर्फ इसलिए है, क्योंकि जहां से हमने ऋण लिए हैं, उन ऋणों को चुका नहीं रहे हैं। हम देवताओं के ऋणी हैं, जो हमें वायु देते हैं, जल देते हैं, आकाश देते हैं, पृथ्वी देते हैं, किन्तु हम यह भूल जाते हैं।

प्रत्येक मनुष्य जब जन्म लेता है, तो तीन ऋणों के साथ जन्म लेता है। पितृ ऋण, ऋषि ऋण और देव ऋण। इन तीनों से ऋणवान होकर ही आदमी जन्म लेता है। जो टाटा-बिड़ला के परिवारों में जन्म लेगा, वह भी इन तीन ऋणों के साथ जन्म लेगा। अमीर हो या गरीब, सबको ऑक्सीजन की, प्रकाश की और जल की आवश्यकता पड़ेगी। जन्म लेते ही जो हमें संस्कार मिले, जो ज्ञान-विज्ञान मिले, वह ऋषियों का ऋण है, वह परंपरागत रूप से हमें प्राप्‍त  है और एक ऋण हमारे पितरों का हमारे शरीर में है। इन तमाम लोगों से हम ऋण लेकर आगे बढ़ते हैं और इन ऋणों को नहीं चुकाना ठीक उसी तरह से है, जैसे बाजार से ऋण लिया हो, किन्तु चुकाया नहीं। जो ऋण नहीं चुकाता, वह कभी पनप नहीं पाएगा, कभी यशस्वी नहीं हो पाएगा, कभी शांत नहीं हो पाएगा। हम सभी को इन ऋणों को चुकाने का प्रयास करना चाहिए। इन ऋणों को नहीं चुकाने के कारण ही संसार में सारी अव्यवस्था है। सारी समस्याएं हैं, सारे दुख हैं।


Ramandacharya Ji Maharaj


 

Ramandacharya Ji Mahraja


 

Ramandacharya Ji Maharaj


 


 


 


 


 


 


 


 


 


 

Friday, 4 October 2024

साधु को सदा याद रहे कि वह साधु है

गुरुदेव महाराज जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी के प्रवचन से ---



कैसे-कैसे लोग आज संत की गद्दी पर बैठ गए हैं। एक ऐसे ही संत ने खास पंखा लगवाया, मैंने दूर से देखा, पूछा, 'कितने का पंखा लगवाया है? उन्होंने उत्तर दिया, 'यह ज्यादा का नहीं है, बस 25 हजार का है। आप भी लगवा लीजिए। हमने देखा ही नहीं कि कैसा पंखा है, क्या पंखा है। उनका नाम नहीं बतलाऊंगा।

हम जहां पढ़े थे, वहां एक व्‍यक्‍त‍ि थे, बाद में उन्होंने विवाह कर लिया और अब फुलपैंट पहनकर वेदांत पढ़ाते हैं। जब उन्होंने मुझे पहली बार श्रीमठ में रामानंदाचार्य की वेशभूषा में देखा, तो रोने लगे, उन्होंने कहा, 'आप तो छात्रावस्था में इससे अच्छे थे। श्रीमठ में जब मैं रामानंदाचार्य जी की गद्दी पर आया, तब विरासत में मिली जिस चौकी पर मुझे बैठाया गया, उसकी तीन पटरियां ऊंची-नीची थीं। जिस पर चढ़कर मजदूर लोग दीवारों पर प्लास्टर इत्यादि करते हैं, वैसे लकड़ी के फंटे ही जोड़कर मेरी चौकी बना दी गई थी, उसमें तिलचट्टे भी बहुत थे। उन्होंने मुझसे कहा, 'इससे बेहतर स्थिति में तो आप पहले थे। वह मेरे विद्यार्थी भी रहे थे, एक साथ हम लोग पढ़े भी थे। उन्होंने कहा, 'इसी को रामानंदाचार्य कहते हैं क्या? क्या यह चौकी नहीं बदल सकती है? मैंने विनम्रता से कहा, 'जिस दिन मैं श्रीमठ गया, मैं पहले दिन ही चौकी बदलवा सकता था, इतना मेरे पास था, जेब में नहीं था, लेकिन प्रभाव था, लेकिन मैंने कभी नहीं कहा कि चौकी बदली जाए। बदलने को जरूरी काफी कुछ था, लेकिन बदलने के लिए यदि मुझे चौकी ही सबसे पहले दिखेगी, तो राम राज्य कैसे आएगा?

आजकल तो बड़े लोग हर साल अपना सोफा, कुर्सी-टेबल, सजावट बदल देते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए, सादगी का जीवन होना चाहिए। रामराज्य का जीवन होना चाहिए। जरा सोचिए कि राम जी ने जंगल में कैसे बिताया होगा समय। ईश्‍वर  की बात छोडि़ए, अयोध्या के महल में तो सब कुछ था, किन्तु जंगल में रहकर एक दिन उफ् तक नहीं किया।

वृंदावन में एक महात्मा से मैं मिला था। उन्हें देखकर बहुत अच्छा लगा, तो मैंने उनसे पूछा, 'आप इतने अच्छे साधु हो गए, इसका रहस्य क्या है?

उन्होंने कहा, 'मैं तो आपको अपना रोना कहने आया हूं, आप मेरा ही इंटरव्यू मत लीजिए। हां, मुझे एक बात का सदा ध्यान रहा कि मैं साधु बनने आया हूं, और इसी का आज यह फल है।

मैं भी बनारस साधु बनने नहीं आया था, मैं तो विद्वान बनने आया था, अविवाहित रहने आया था। मुझे साधु तो नहीं बनना था, लेकिन जब रामानंदाचार्य हो गया, तो फिर कोशिश की कि थोड़े-बहुत साधु हम भी हो जाएं, साधुओं जैसे दिखने लगें। इस कोशिश से मुझे भी लाभ हुआ।

ध्यान दीजिएगा, केवल यह याद रहे कि मैं साधु हूं, तो आदमी साधु हो जाएगा। दिखावा क्या करना, गद्दी का क्या करना? जब शरीर का मांस ही सूख जाएगा, तो बुढ़ापे में तो ये गद्दा ही गडऩे लगेगा। चेहरा सिकुड़ जाएगा, दांत टूट जाएंगे, तो ये गद्दा-पंखा काम करेगा क्या? कदापि नहीं करेगा।

उन मूल्यों को हम धर्म कहते हैं, जो शाश्वत जीवन देते हैं, जो बहुत सुख देते हैं।

ज्ञान की चार अवस्थाएं

गुरुदेव महाराज के प्रवचन से--- 

जो व्‍यक्‍त‍ि सम्पूर्ण मानवता के लिए सिद्धांत पढ़ता है, समझता है, उसको अनुभव करता है और अपने जीवन में उतारता है दूसरों को देने के लिए, इसी का नाम ज्ञान है, मैं बार बार दोहराता रहता हूं आचार्य पतंजलि ने लिखा है, ज्ञान की चार अवस्थाएं होती हैं। पहली अवस्था ज्ञान पढऩा, इसे परोक्ष ज्ञान बोलते हैं - यह ज्ञान की कच्ची अवस्था है। दूसरी अवस्था, परिपक्व ज्ञान, यानी अपरोक्ष ज्ञान - इसमें ज्ञान पक जाता है। तीसरी अवस्था, उस ज्ञान को जीवन में उतारना। फिर चौथी अवस्था, ज्ञान दूसरों को पेश करना। यदि मैं संन्यासी ज्ञान की सम्पूर्ण अवस्था में जीवन जी रहा हूं, तो मेरा सम्मान होना चाहिए। अध्यापक का सम्मान तो अमरीका में भी किया जाता है, क्या आप नहीं करेंगे? अध्यापक या गुरु का सम्मान होना ही चाहिए, यह भी धर्म ही है।

जय सियाराम

जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज







 

जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज





 

जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज