Monday, 27 July 2015

जोधपुर में चातुर्मास

जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास ३० तारीख को जोधपुर में प्रारम्भ हो जाएगा। जोधपुर स्थिति प्रसिद्ध जूनाखेड़ापति मंदिर परिसर में महाराज दो माह तक निरंतर विराजमान रहेंगे। चातुर्मास काल में राम भाव अनुकूल अनेक कार्यक्रम होंगे। देश भर से अनेक संत और विद्वान भी चातुर्मास के दौरान जोधपुर पधारेंगे।
उल्लेखनीय है कि महाराज ने वर्ष १९९४ में भी जोधपुर में चातुर्मास किया था। पूरे २० साल बाद वे जोधपुर में चातुर्मास कर रहे हैं। एक खास बात यह है कि पिछले चातुर्मास में भी आयोजन समिति के अध्यक्ष सेनाचार्य जी अचलानन्द जी गिरि थे और इस बार भी वे ही अध्यक्ष हैं।

जूनाखेड़ापति मंदिर परिसर में नियमित पूजन, हवन, प्रवचन होंगे। चातुर्मास के प्रति स्थानीय समाजों में बहुत उत्साह है और जोधपुर में जगह-जगह बैनर-पोस्टर लगे हुए हैं। नियमित प्रवचन होंगे। चातुर्मास स्थल शहर के एक मुख्य मार्ग पर स्थित है, इसलिए यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

Wednesday, 25 February 2015

सर्वथा अनिन्दिता सीता

समापन भाग
लोकसंत सेनाचार्य जी स्वामी अचलानन्द जी एवं अपने पट शिष्य स्वामी पदमनाभ जी के साथ जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज 

सीता जी जरा भी निन्दित होने योग्य नहीं हैं। वाल्मीकि जी ने लिखा है। सर्वथा अनिन्दिता सीता। उनके जीवन में ऐसा कोई पक्ष नहीं है, जिसकी निन्दा हो सके। धरती से जन्म लेने से लेकर धरती में समाने तक उन्होंने सदा ही उच्चता का परिचय दिया। वह सर्वथा अनिन्दिता हैं।
तो जितने भी संदेह हो सकते हैं, संभावना हो सकती है, इन सबको जानकी जी ने उपस्थित किया और सबका समाधान हनुमान जी ने किया। समुद्र पार करके आएं हैं, तो जाएंगे भी, बड़ा स्वरूप दिखा दिया, तो यह भी सिद्ध हो गया कि उनमें क्षमता है। सभी दृष्टि से संतुष्ट होने के बाद जानकी जी ने कहा कि मैं पर-पुरुष का स्पर्श नहीं कर सकती। 
भारतीय पतिव्रता नारी पर-पुरुष का स्पर्श नहीं करती है, यह बहुत बड़ा सबक है। रावण के यहां निवास किया, तमाम तरह के शास्त्रों के जानकार लोग हैं। जिन्होंने वाल्मीकि रामायण को नहीं पढ़ा है, वे संदेह में डूबते उतराते हैं, मन को गंदा करते हैं कि जानकी जी सामान्य जीवों में हैं, जिनके सम्बंध में उंगली उठाई जा सकती है। जो नारी चरित्र की चरम हैं, जो नारी शक्ति की चरम हैं, इस बात को इस प्रसंग ने सिद्ध कर दिया।
जब राम जी के दासों के दास भक्त शिरोमणि हनुमान जी जिनमें कोई त्रुटि नहीं है, अंगूठी देकर जिन्हें भेजा था, शंकाओं का निर्मूल करके, पतिव्रता नारी के स्वरूप को स्थापित किया और बताया कि नारी छवि को कैसे संसार में स्थापित करना चाहिए, उनका जीवन का कोई भी कोण, अयोध्या में रही हों, लंका में रही हों, जनकपुर में रही हों, पृथ्वी में विलीन होने तक, उनका सम्पूर्ण चरित्र अनिन्दित है, उस चरित्र से नारियों को प्रेरणा लेनी चाहिए। आज तमाम तरह की विकृतियां महिलाओं में आ गई हैं, बलात्कार हो रहे हैं, शोषण हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि नारी समाज के साथ अत्याचार हो रहा है, सम्पूर्ण दोष पुरुष को दिए जाते हैं, किन्तु नारी को स्वयं भी विवेकवान रहना चाहिए। नारी यदि सजग है, यदि वह छोटे-मोटे प्रलोभन के लिए बिगडऩे को तैयार नहीं है, ऐसी नारी को कोई बिगाड़ नहीं सकता, कहीं से वह अत्याचार का भाजन नहीं बनेगी। जो अत्याचारी हैं, दुराचारी हैं, जो कामलोलुप हैं, उनका शिकार नहीं होंगी। सम्पूर्ण समाज को नारी शक्ति का बल मिलेगा। जानकी जी का चरित्र आदर्श है। 
जय सियाराम...

सर्वथा अनिन्दिता सीता

भाग - 5
दो बातें हनुमान जी ने उत्तर के रूप में कही, 'आपने जो कहा, वह स्त्री स्वभाव के ही अनुकूल है, स्त्रियों में भिरुता होती है, वह आपमें भी है, कई ऐेसे स्वभाव जो शास्त्रों में वर्णित हैं, स्त्रियों के लिए, उसमें भीरुता भी है। सतियों का जो विनय है, मर्यादा है, जो पर पुरुष का स्पर्श नहीं करतीं, जो पतिव्रता हैं, पतिव्रता अपने पति के अतिरिक्त किसी को देखती नहीं, किसी के साथ कोई भी सम्बंध नहीं रखतीं, उसके अनुरूप भी आपने कहा, मैं संतुष्ट हूं। स्त्री स्वभाव के कारण आप समर्थ नहीं हैं सागर को पार करने में, मेरी पीठ पर बैठकर सप्तयोजन, ४०० कोस के विस्तारित समुद्र को आप पार नहीं कर सकतीं। दूसरा जो कारण है, आपने जो बतलाया कि रामजी के अतिरिक्त किसी का स्पर्श मैं नहीं कर सकती, तो यह बिल्कुल सही है। आप भगवान राम की पत्नी हैं, जो परामात्मा हैं, आपने निर्णय लिया, ठीक लिया। जो मैं ले जाना चाहता था, आपने मना किया, राम जी के अनुरूप ही आपने यह विचार व्यक्त किया, आपके अतिरिक्त कौन है, जो इस तरह के विचार व्यक्त कर सकता है? आप जैसी केवल आप ही हैं, जैसे गगन के समान केवल गगन ही है, उसकी दूसरे से तुलना नहीं की जा सकती, आपके अतिरिक्त आपके जैसा कोई नहीं है।'
हनुमान जी के मन में आया, हनुमान जी सफाई दे रहे हैं। राम जी का ध्यान करके उन्होंने जानकी जी को कहा, 'जो आपने कहा, जो आपने चेष्टा की रोदन की, निराशाएं आपने व्यक्ति की, उसको भगवान देख भी रहे हैं, सुन भी रहे हैं, वे सामान्य लोगों की तरह नहीं हैं कि वे हमारी बातों को सुन नहीं रहे हों। राम जी सब देख रहे हैं। मैंने बहुत से कारणों को ध्यान में रखकर निवेदन किया था, पहला कारण था, रामजी मेरे अत्यंत प्रिय हैं और उनके लिए मैं सुख देने वाला उनको उत्साह देने वाला उनको जीवन देने वाला उनको निराशा सागर से बाहर करने वाला, उनके लिए ही काम करूं, यही काम था कि मैं आपको लेकर जाऊं, राम जी की चिंता के संपादन के लिए मैंने यह कहा था। राम जी के स्नेह से भरा मेरा निवेदन था, मेरा मन पिघला हुआ था, इसलिए मैंने कहा, आप मेरे साथ चलिए और कोई कारण नहीं था। मैंने लंका में प्रवेश किया, समुद्र को भी आसानी से पार किया, इसलिए आप मेरे साथ चलें, मैं चाहता था कि आज ही आप मेरे साथ चलतीं, किन्तु आपने मुझे मना किया। भगवान की शपथ खाकर कहता हूं, मेरे मन में कोई अन्यथा प्रयोजन नहीं था कि मैंने आपको चलने के लिए कहा। यदि आप नहीं जाती हैं, तो आप कोई चिन्ह मुझे दें, जिसे लेकर मैं राम जी के पास जाऊं, ताकि उन्हें विश्वास दिलाऊं कि मेरी मुलाकात जगदंबा जानकी जी के साथ हुई, उन्हें पीडि़त करते रावण और राक्षसियों को मैंने देखा, आप कोई चिन्ह दें, तो मेरे लिए आसान हो जाएगा प्रमाणित करना कि मैं आपसे मिला।'
हनुमान जी अभिज्ञान की मांग करते हैं, जानकी जी ने चूड़ामणि निकाल कर हनुमान जी प्रदान की। राम जी से जुड़ा एक गुप्त प्रसंग भी बताया कि एक दिन जानकी जी राम जी के पास बैठी हुई थीं, इंद्र पुत्र जयंत कौवा का वेश बनाकर आया और उनके स्तनों के बीच प्रहार किया, बहुत भगाने की कोशिश की जानकी जी ने, वह बार-बार आता था, उसने प्रहार करके रक्तरंजित कर दिया, राम जी के ऊपर रक्त की बूंदें गिरी गरम-गरम तो राम जी उठे, उन्होंने एक तिनका लेकर उसे ब्रह्मास्त्र से शक्तिशाली बनाकर कौवा रूपी जयंत के पीछे लगा दिया, जयंत भागने लगा, जगह-जगह, तमाम देवताओं के पास गया, पिता इन्द्र के पास गया, ब्रह्मा जी के पास गया, अनेक ऋषियों के पास, कहीं भी किसी ने उसे शरण नहीं दी कि तू रामद्रोही है, तेरी सहायता कौन करे। अंत में जयंत राम जी के चरणों में ही आ गिरा, राम जी ने कहा, तू बड़ा पापी है, मैं अपनी पत्नी के साथ था, यह विधवा नहीं, अनाथ नहीं है, तूने इतना बड़ा दुस्साहस किया, तू कितना बड़ा दुष्ट है, किन्तु तू मेरी शरण में आ गया है, मैं शरण में आए हुए को मार नहीं सकता, तुझे जीवन दान देता हूं, किन्तु तेरी दाहिनी आंख यह ब्रह्मास्त्र जरूर लेगा।
यह प्रसंग जानकी जी ने सुनाया और कहा, 'यह प्रसंग केवल रामजी और मैं जानती हूं। जब मिलना, तो राम जी से कहना, मुझ दुखयारी को लेने के लिए जल्दी आवें।' 

क्रमशः

सर्वथा अनिन्दिता सीता

भाग - 4
सेनाचार्य जी स्वामी अचलानन्द जी के साथ जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज

सभी जिज्ञासाओं का हनुमान जी ने उत्तर दिया, 'मुझसे कोई भी लंका का वीर, कितने भी आयुध हों, कभी मुझसे नहीं जीत सकता, कभी मैं आपको न गिरने दूंगा, न मैं गिरूंगा, न आपको कोई ले जा पाएगा, न छिपा पाएगा, मुझे भगवान राम जी की शक्ति प्राप्त है, देवताओं की शक्ति प्राप्त है, मुझे कहीं से भी पराजय का मुंह नहीं देखना है आप निश्चिंत रहिए।' 
अनेक प्रकार से हनुमान ने जी आशंकाओं का निवारण किया, 'आप निराशा में ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाएंगी, इसलिए आप चलें, अगर आपको कुछ हो गया, तो मेरे स्वामी का क्या होगा?'
इसके उपरांत जानकी जी ने एक और बड़ा संकट खड़ा कर दिया, उन्होंने कहा, 'पति भक्ति को ध्यान में रखकर मेरा जो पति के प्रति जो समर्पण है, पति के लिए जो सम्पूर्ण त्याग है, जो मुझ पतिव्रता का धर्म है, उसको ध्यान में रखकर मैं राम जी के अतिरिक्त किसी पुरुष का स्पर्श नहीं कर सकती। मैं अपनी इच्छा से कभी किसी पर पुरुष का स्पर्श नहीं किया है, न अभी तक किया है, न आगे करना है। मैंने जबसे विवाह हुआ है, राम जी के अतिरिक्त किसी का स्पर्श नहीं किया, इसलिए मैं आपकी पीठ पर स्थित होकर नहीं जा सकती, यह हमारी पति भक्ति है। अपने स्वामी के लिए जो मेरा प्रेम है, जो समर्पण है, जो स्वामी के लिए महान संकल्प है, उसके अंतर्गत यह मर्यादा है कि मैं उसके अतिरिक्त किसी का स्पर्श न करूं, रही बात मैंने रावण का स्पर्श प्राप्त किया था, किन्तु मैं बलात परिस्थिति के कारण उससे जुड़ी, मेरे पास कोई चारा नहीं था, मैं क्या करती, मैं स्वामी के बिना थी, विवश थी, इसलिए बल पूर्वक रावण ने मुझे स्पर्श किया। लंका पहुंचाया, उस समय की बात भिन्न थी, किन्तु मैंने स्वयं किसी पुरुष का स्पर्श नहीं किया। अब राम जी ही यहां आएं, राक्षस राज रावण की हत्या करें, जो उसके लोग हैं, उनको मारें और हमें लेकर जाएं, जैसे रावण लाया था, वैसे ही राम जी मुझे यहां से ले जाएं। राम जी ही मुझे मान-मर्यादा के साथ लेकर जाएं, तब जाकर उसकी बराबरी होगी, आप ले जाएंगे, तो नहीं होगी। राम जी को यहां आने दीजिए। भगवान के ऐश्वर्य से मैं परिचित हूं, भगवान ने खरदूषण और त्रिजटा और उनकी १४,००० सेना को मारकर धूल में मिला दिया, तब उनका कोई सहायक भी नहीं था, उस समय कोई नहीं था जो राम जी का पक्ष लेता, राम जी ने सभी को अपनी तेजस्विता से उत्तर दिया। और संसार में कौन ऐसा है, जो रामजी के साथ लड़ सकता है? कोई राक्षस नहीं है, जो रामजी का युद्ध में सामना कर सके. इसलिए आप जाइए और रामजी को मेरा दुख-दर्द बतलाइए और प्रेरित करके रामजी को यहां लाइए और रामजी राक्षसों का विनाश करें, तभी मैं जाऊंगी।'
जब जानकी जी ने साफ मना कर दिया, तो हनुमान जी के लिए संकट खड़ा हो गया। वह कांपने लगे, अपने को संभालकर प्रस्तुत किया, 'मैं संतुष्ट हूं, आपने जो कहा, आप तो जो कहती हैं, वह अत्यंत ही न्याय और मर्यादा और सिद्धांत की बात होती है, आपने बिलकुल सही कहा।' क्रमशः

सर्वथा अनिन्दिता सीता

भाग - 3
समाधान किया हनुमान जी ने, वे समझ गए कि जानकी जी को मेरे शरीर को देखकर विश्वास नहीं हो रहा है, मेरे प्रभाव को नहीं जानती हैं, मेरे सत्व को नहीं पहचानती हैं। उन्होंने जानकी जी से कहा, 'इच्छा के साथ मेरा शरीर बढ़ता है। यह जो आप देख रही हैं, यह तो छोटे रूप वाला मेरा शरीर है, जो मैंने अपनी इच्छा से धारण कर रखा है।'
वे जानकी जी के पास आ गए, पहले वानरों की तरह पेड़ पर बैठकर ही संवाद कर रहे थे, कूद कर नीचे आ गए और अपने विशाल स्वरूप को, दुष्टों का मर्दन करने वाला जो स्वरूप है, अरि का मर्दन करने वाला जो शरीर है, उसे बढ़ाना हनुमान जी ने शुरू किया, ताकि जानकी जी को विश्वास हो जाए कि मैं उनका भार वहन कर सकता हूं, जो लडऩे आएंगे, उनका मुकाबला कर सकता हूं, राम जी के पास पहुंचा सकता हूं। हनुमान जी ने सुन्दर और अत्यंत बलशाली स्वरूप को प्राप्त किया, जानकी जी के सामने खड़े हो गए, पर्वत के समान ताम्र वस्त्र और महाबली स्वरूप। 
हनुमान जी ने जानकी जी को कहा, 'देखिए मेरा कैसा स्वरूप है, सम्पूर्ण लंका को, जो लोगों से भरपूर है, उसे भी लेकर चलने की  मुझमें क्षमता है। आप मुझ पर संदेह न करें।
जब इस तरह का स्वरूप हनुमान जी ने धारण किया, तो जानकी जी का विश्वास प्रकट हुआ और उन्होंने प्रशंसा की। कहा, 'नहीं, मैं संतुष्ट हूं, यदि आपमें इतना बल नहीं होता, तो आप कैसे यहां आ सकते थे, कोई साधारण बंदर यहां नहीं आ सकता, आपमें अद्भुत बल है, तभी आप समुद्र को पार करके, हर दृष्टि से जो सुरक्षित लंका है, उसमें प्रविष्ट हो गए, मेरे पास आ गए, आपकी गमन शक्ति और आपकी ले जाने की क्षमता को भी मैं जानती हूं, आप मुझे निश्चित रूप से लेकर जा सकते हैं, किन्तु मेरा मन बार-बार इस बात को कहता है कि वायु के वेग से आप मुझे लेकर जाएंगे, तो मैं तो गिर ही जाऊंगी, वेग को सहन नहीं कर पाऊंगी, इसलिए आपके  साथ मेरा जाना उचित नहीं है। और जब गिर जाऊंगी, जो जानवर समुद्र में हैं, वो मुझे खा जाएंगे। आपकी शक्ति की कमी का आरोप नहीं है, किन्तु आपकी इस यात्रा में मैं संभलकर कैसे रह पाऊंगी, इसका मुझे संदेह है, अत: मैं आपके साथ जाने में असमर्थ हूं।
एक और संदेह व्यक्त किया जानकी जी ने, 'आप मुझे लेकर जाओगे, तो लोग समझेंगे कि यह पत्नी वाला है, पहले आप अकेले ही आए थे, ब्रह्मचारी के रूप में, अब मैं जाऊंगी, तो देखने वाले सोचेंगे कि यह निश्चित रूप से पत्नी वाला कोई है, इसलिए मैं आपके साथ जाने में संकोच कर रही हूं। मैं नहीं जा सकती आपके साथ। जब आप चलोगे, तो रावण की आज्ञा से, जो दुष्टराज है, हजारों-हजारों, लाखों-लाखों सैनिक आपका पीछा करेंगे, उनके हाथ में तरह-तरह के आयुध होंगे, आप घिर जाओगे, जो स्त्री वाला है, यह वीर नहीं है, संदेह भी होगा, वे आयुध के साथ होंगे आकाश में और आप बिना आयुध के होंगे, आपके पास अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं, आप मुझे पीठ पर लेकर कैसे उनसे लड़ेंगे और मेरी रक्षा कैसे करेंगे.  आपका जब उनसे युद्ध होगा, जो अत्यंत निर्दयी हैं, मैं आपकी पीठ पर से गिर जाऊंगी, तो गिरने के उपरांत मेरी रक्षा कैसे होगी, जो राक्षस हैं, बल वाले हैं, कहीं उन्होंने आपको हरा दिया, तो...  लडऩे में आप हार गए, तो मेरे जीवन को खतरा हो जाएगा। यदि लड़ते हुए मैं गिर गई, तो भी खतरा, गिरने के उपरांत कल्पना कीजिए कि समुद्री जंतुओं ने नहीं खाया, तो राक्षस ले जाएंगे, वे बड़े पापी हैं। वे मुझे लेकर पुन: चले जाएंगे, कैद हो जाऊंगी। लडऩे पर जरूरी नहीं कि आप ही विजयी हों, वो भी विजयी हो सकते हैं। यदि राक्षसों ने मुझे किसी ऐसी जगह पर छिपा दिया, जहां किसी को पता नहीं चल सके कि मैं कहां हूं, तो कठिनाई हो जाएगी, अभी तो मैं अशोक वाटिका में थी, आपको लोगों ने बताया और आप यहां पहुंच गए। यदि मुझे कहीं अत्यंत गुप्त जगह पर छिपा दिया, तो किसी को पता नहीं चल पाएगा, अत: आप मुझे ले जाने के संकल्प को छोड़ दीजिए।'
क्रमशः

सर्वथा अनिन्दिता सीता


भाग - 2
महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है, हनुमान जी ने कहा, 'आज ही मैं आपको राक्षसों से मुक्त कर देता हूं। राक्षसों से मुक्ति पा जाएंगी, दुख सागर को पार कर लेंगी, आप मेरी पीठ पर विराजमान हों, मैं आपको आज ही मुक्त करवा देता हूं। भगवान श्रीराम के पास आपको ले चलता हूं।
जानकी जी को विश्वास दिलाने के लिए उन्होंने कहा, 'मैं सक्षम हूं, आपको पीठ पर बैठाकर सागर को पार कर लूंगा। रावण सहित लंका को भी ढोने की क्षमता है, इतनी मुझमें शक्ति है, इसमें आप संदेह नहीं करें, निराश न हों, यह न सोचें कि मैं कैसे आपको लेकर जाऊंगा। आज ही भगवान तक आपको ले चलूंगा। आप आज ही राघव का दर्शन कर लेंगी, इसमें कोई बाधा नहीं आएगी। आपका  दर्शन प्राप्त करके राम जी का भी उत्साह बढ़ेगा, लक्ष्मण जी का भी उत्साह बढ़ेगा, ये सब अब बड़े निरुत्साही दिखते हैं, यह दुखद अवस्था भी उनकी समाप्त होगी। आपको देखकर वे पुन: उत्साह से भर जाएंगे।
ऐसा जानकी जी को हनुमान जी ने कहा, किन्तु जानकी जी उत्साह नहीं दिखा रही थीं, तो हनुमान जी ने कहा, 'आप मेरी उपेक्षा न करें, मैं जो कह रहा हूं, उससे पूर्ण रूप से सहमत होकर मेरी पीठ पर विराजमान हो जाएं। मेरे निवेदन की उपेक्षा न करें. 
भगवान की दया से जानकी जी सुन रही थीं। उनके मन में था, जब असुर पीछा करेंगे, तो क्या होगा?
हनुमान जी ने उत्तर दिया कि मैं आपको लेकर जब चलूंगा, तो सभी लंका निवासी भी मेरा पीछा नहीं कर सकते, उनमें सामर्थ्य नहीं है कि मुझे पीछे से पकड़ लें, जैसे मैं आया हूं उधर से, कहीं अवरोध नहीं हुआ और जो अवरोध हुआ, तो उसका समाधान मैंने किया। जैसे मैं आया था, वैसे ही चला जाऊंगा, आप इसके लिए कोई संदेह न करें। मैं आपको लेकर वापस चला जाऊंगा।
हनुमान जी की इन बातों को सुनकर जगदंबा जानकी विस्मित होती हैं, अंग-अंग हर्षित भी हैं और विस्मित भी हैं कि ये जोरदार बात कह रहे हैं। जानकी जी ने कहा, 'बहुत दूरी है, लंबा मार्ग है, आप कैसे मुझे लेकर जाने की इच्छा कर रहे हो, मुझे लगता है कि  आप वानर वाला स्वभाव प्रकट कर रहे हो, वानर इसी तरह से अभिव्यक्ति करता है, यह वानर स्वभाव लग रहा है, आपका छोटा शरीर है, बहुत छोटा, आप मुझे कैसे लेकर जाओगे भगवान श्रीराम के पास?'
हनुमान जी के शरीर को देखकर जानकी जी को विश्वास नहीं हो रहा है कि हनुमान उन्हें लेकर जा सकते हैं। विशाल कार्य के लिए अनुरूप शरीर भी तो होना चाहिए। क्रमशः

सर्वथा अनिन्दिता सीता

( जगदगुरु महाराज के प्रवचन से )

वाल्मीकि  रामायण में जानकी  जी के साथ जो संवाद है हनुमान जी का, उसमें लिखा है कि  जानकी जी की खोज के लिए हनुमान जी लंका गए, अशोक  वाटिका में पहुंचे, वहां पहुंचकर जानकी जी का दर्शन किया। रावण भी उस समय जानकी जी के पास आया था, उसने भी अनेक प्रकार का प्रलोभन दिया था, जानकी  जी को पीडि़त करने वाले व्यवहार को संपादित किया, उसको भी हनुमान जी ने देखा, उसके बाद जानकी जी के समक्ष प्रकट हुए, राम कथा को सुनाया, निशानी के रूप में जो अंगूठी लाए थे, वह दिया। तो एक लंबा संवाद जानकी जी के साथ हनुमान जी का है। जानकी जी ने खुशी भी प्रकट की और कष्ट भी जताया, आशंका भी जताई, ऐसा लग रहा था कि जीवन से निराश हो गई थीं, इतना विलंब कैसे हो गया राम जी को मेरे पास आने में, मेरी समस्या का समाधान करने में। कहीं भूल तो नहीं गए, कहीं और कोई अवरोध तो नहीं आ गया। मुझे दो महीने ही रहना है, रावण ने एक साल का समय दिया था, यदि एक साल में स्वीकार नहीं किया, तो राक्षस खा जाएंगे, दस महीने बीत चुके थे, केवल दो महीने बाकी थे। तो अनेक दृष्टि से जानकी जी सशंकित हैं, भयभीत हैं, एक तरह के ऊहापोह से जुड़ी हुई हैं, उनको लग रहा है कि किसी भी तरह से रावण मान नहीं रहा है, विभीषण ने समझाया, विभीषण की कन्या कला ने समझाया रावण को, किन्तु वह मान नहीं रहा है। बहुत निवेदन हुए, जानकी जी को छोड़ दीजिए, राम जी जैसे शक्ति संपन्न की पत्नी को आप ले आए हैं, छोड़ दीजिए, दूसरे लोगों ने भी जो रावण के  हितचिंतक थे, उन्होंने भी जानकी जी को लौटाने के लिए कहा, किन्तु रावण किसी की बात को सुनने के लिए तैयार नहीं था, तो जानकी  जी की बातों से ऐसा लग रहा था कि जानकी जी उत्साहहीन हो गई हैं, कहीं से जीने का इनको सहारा नहीं दिख रहा है।
ऐसी स्थिति में बहुत मार्मिक विचार हनुमान जी ने भी प्रस्तुत किये। कहा, 'यदि आपको लगता है कि राम जी को आने में विलंब हो रहा है, आपको यदि लग रहा हो कि वह समुद्र पार कर पाएंगे या नहीं, कहीं समय व्यतीत नहीं हो जाए, तो मैं आज ही आपको लेकर रामजी के पास चलता हूं।  क्रमशः

Friday, 19 December 2014



साधु, तुझको क्या हुआ?

समापन भाग
स्वामी विवेकानंद के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस जी, जो गृहस्थ के रूप में रहते थे, किन्तु तब भी उन्होंने ऊंचे संतत्व को प्राप्त किया। आज संसार में संतत्व को महत्वपूर्ण रूप में देखना चाहिए। जैसे सूर्य, ग्रह नक्षत्र तारे हैं, ठीक उसी तरह से ईश्वर जो सबसे बड़े सूर्य हैं, लेकिन उनकी भावनाओं को लोगों के बीच पहुंचाने का काम संतों ने हमेशा ही किया है। मैं किसी संत विशेष की बात नहीं कर रहा हूं, किन्तु इतना अवश्य कहूंगा कि संतत्व संसार से कभी खत्म नहीं होगा। 
मैं तो मोहम्मद साहब और ईसा मसीह को भी मान देता हूं। अजमेर वाले ख्वाजा गरीबनवाज भी सूफी संत थे। सूफी संतों में अनेक ऐसे हुए हैं, जो अहं ब्रह्मास्मि कहते थे, एक ऐसे सूफी संत की हत्या कर दी गई। जब उन्हें जलाकर राख समुद्र में फेंकी गई, तो उसमें से भी अहं ब्रह्मास्मि की आवाज आई, जिसने उस जल को पिया उसके पेट से भी अहं ब्रह्मास्मि की आवाज आने लगी। उस सूफी संत ने कितना तप किया होगा, सोचकर देखिए। जिसने उन्हें मरवाया था, उसने भी जब जल पिया, तो उसके पेट से भी आवाज आने लगी अहं ब्रह्मास्मि। कितना संयम किया होगा, कितना तप किया होगा, तभी तो ऐसी शक्ति अर्जित हुई।
हम लोगों की यह भावना है कि संसार के सभी क्षेत्रों में परिवर्तन हुए हैं। खान-पान, चिंतन बदला है, किन्तु ऐसे परिवेश में भी संतत्व कहीं भी निखर सकता है, संतत्व लाखों-लाखों को प्रेरित करता है। लोगों को संयम के लिए प्रेरित करना, अच्छाई की ओर प्रेरित करना, दुराचार को रोकने का प्रयास करना, समाज को ईश्वर की ऊंचाई की ओर ले जाना। यहां तो तोते को भी राम राम रटवाने की परंपरा रही है। पशु-पक्षी सारा वातावरण ईश्वरीय हो। रामायण, योगदर्शन, पुराणों में लिखा है कि व्यक्ति पूर्णत: अहिंसक हो जाए, तो साक्षात विरोधी जो जीव हैं, उनमें भी अहिंसा की भावना आ जाती है। यदि आप सच्चे अहिंसक हो जाएं, तो आपके पास सांप और नेवले भी साथ-साथ आ जाएंगे, वे भी अपना परस्पर विरोध छोड़ देंगे। परस्पर शाश्वत विरोध वाले बाघ और हिरण एक साथ ऋषियों के आश्रम में रहते थे, कोई किसी को परेशान नहीं करता था। प्रेम का वातावरण संत बनाते हैं। दुनिया की दूसरी व्यवस्थाओं, प्रशासनिक, वैज्ञानिक  व्यवस्थाओं में उतना दम नहीं है, जितना संतों की व्यवस्था में दम है। अत: ईश्वरीय समाज का, ईश्वरीय भावना के अनुरूप समाज का निर्माण होना चाहिए।
आज नेताओं को देखिए। उनमें आवश्यक गुण नहीं हैं। संसदीय प्रणाली जैसी होनी चाहिए, लोकतंत्र के लिए, वैसी नहीं है। यदि नेताओं में लोकतांत्रिक भाव ही ठीक से नहीं है, तो ईश्वरीय भाव कहां से आएगा? ईश्वरीय संसार को ईश्वरीय शक्ति के माध्यम से ही ईश्वरीय वातावरण देने का एकमात्र जो कारण है, उसी का नाम संतत्व है। संतत्व कभी नष्ट नहीं होता। अभी अनेक संत संसार की श्रेष्ठ सेवा कर रहे हैं। देश और दुनिया में ऐसे असंख्य लोग हैं, जो ईश्वरीय जीवन को जी रहे हैं।
जय श्रीराम

साधु, तुझको क्या हुआ?

भाग - ६
आज हमें प्रयास करना है कि इस संसार में अच्छाई को बल मिले, सभी में ईशवरीय जीवन वितरित हो, धैर्य का जीवन वितरित हो। संतों, ऋषियों को अपनी ऊर्जा का ध्यान रखना चाहिए, उन्हें पता होना चाहिए कि ऊर्जा कहां लगानी है। ताड़का, सुबाहू को तो विश्वामित्र जी भी मार सकते थे, लेकिन वे अपनी तप-जप शक्ति को नष्ट करना नहीं चाहते थे, इसलिए राम-लक्ष्मण जी को मांगकर ले गए और राक्षसों के आतंक को कम करवाया, जिससे यज्ञ संभव हुए।
तो संतों के श्रेष्ठ जीवन की बड़ी लंबी परंपरा है, इसमें अब शिथिलता आई है। युगों का परिवर्तन होता रहता है, जब कलयुग समाप्त हो जाएगा, तब पुन: सतयुग आएगा, सभी भावों में परिष्कार आ जाएगा, सही भावों में मजबूती आ जाएगी।
संतों के सम्बंध में अपने मनोबल और मनोभावों को यह सोचकर दूषित नहीं करना चाहिए कि अब संत नहीं रहे। ईश्वर की फैक्ट्री बंद होने वाली नहीं है। एक फैक्ट्री बंद होती है, तो तमाम फेक्ट्रियां खुल जाती हैं। जो ईश्वर की प्रक्रिया है, उसमें कभी भी संतत्व लुप्त नहीं होता है, क्योंकि संत तो ईश्वर के प्रतिनिधि हैं। संत में गुणवत्ता की कमी आ जाना संभव है, लेकिन संतत्व पूरी तरह से कभी लुप्त नहीं होता।
लोगों को आज आशंका होती है, संतों पर प्रश्न उठते हैं। फिर भी यदि विवेचना की जाए, तो अनेक ऐसे संत मिलेंगे, जिनका जीवन पवित्र है, जो पूरा जीवन समाज के लिए लगा रहे हैं, कहीं से भी जिनमें कोई बुराई नहीं है। अनेक संत उत्तम निर्माण में लगे हैं। लोगों को परखने में अवश्य परेशानी होती है, वे गलत लोगों को भी संत मान लेते हैं। रजनीश को भी लोगों ने संत मान लिया था, जबकि उनका शास्त्रों, वेदों से लेना-देना नहीं था, जिनका संयम-नियम से लेना-देना नहीं था, जहां सच्चा साधु जीवन नहीं था, जो आदमी यह कह रहा है कि संभोग से समाधि होती है, वह वैदिक सनातन धर्म का कैसे हो सकता है? हमारे चिंतन में यह बात कहीं नहीं दिखाई देती। परिणाम सामने है, आज उन्हें संत के रूप में कम ही लोग याद करते हैं।
ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि संपूर्ण संतत्व लांछित हो गया है। जैसे कभी मंदी आ जाती है, मजबूती गायब हो जाती है, तो कभी मंदी दूर हो जाती है, मजबूती आ जाती है। परिवर्तन चलता रहता है, ठीक इसी तरह से संतत्व समाज का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है। संत के रूप में हमें ईश्वर प्रतिनिधि रूप में प्राप्त हैं।
संत और ईश्वर में अभेद भावना का भी उल्लेख किया गया है। देवर्षि नारद जी स्वयं भी एक संत हैं, हर युग में उनकी उपस्थिति मानी जाती है, वे हमेशा ही रहते हैं। उन्होंने अपने ग्रन्थ में लिखा है कि संत में और भगवान में कोई भेद नहीं होता। भगवान की  जो भावना होती है, जो उसके गुण होते हैं, जो उसकी प्रक्रिया होती है, जिस तरह से परिवर्तन होते हैं, वे सभी संतों में भी होते हैं। रामानंद संप्रदाय में एक संत हुए नाभादास जी, उन्होंने संत चरित्र की रचना की, वे राजस्थान के सीकर में रैवासा पीठ में रहे। उन्होंने भी यही कहा कि भक्त और भगवान में भेद नहीं होता।
सारे वेदों में संत तत्व एक ही है। सारा संसार ईश्वर स्वरूप ही है। जेट चलाने वाले से लेकर रिक्शा चलाने वाले तक ईश्वर की व्याप्ति है, किन्तु सभी लोग एक ऊंचाई के नहीं होते हैं। सबकी अपनी-अपनी ऊंचाई होती है, ठीक उसी तरह से संत एक जैसे नहीं होते, लेकिन संतत्व का जो सही परिमार्जित स्वरूप है, वह ईश्वर की भावना का स्वरूप है। इन्हीं भावों को ईश्वरों ने शास्त्रों के रूप में प्रस्तुत किया। संतों ने ईश्वर के लिए समर्पित होकर शास्त्र ज्ञान को संसार के लिए समर्पित किया।
जो वेद तत्व हैं, वो अनादि है और उसका जो परिष्कार हुआ, वेदों, इतिहासों पुराणों के रूप में। कबीरदास हुए, संत ज्ञानेश्वर जी हुए, तुकाराम जी हुए, भारत के हर प्रांत में एक से बढ़कर एक संत हुए। ईश्वर में कितनी शक्ति है कि उसकी ऊर्जा ने अनेक संतों को उत्पन्न कर दिया।

क्रमशः 

साधु, तुझको क्या हुआ?

भाग - ५

कौन कितना बड़ा संत है, यह कैसे तय होगा? संत ने ईश्वरीयता को कहां तक प्राप्त किया है और कहां तक प्राप्त नहीं किया है, इससे ही संत के बड़े या छोटे होने का निर्धारण होगा। जिसको ज्ञान नहीं है, वैराग्य, निष्ठा, प्रेम नहीं है, वो संत कैसे बनेगा? कभी भी किसी भी काल में सभी लोग पूर्णत: संतत्व को प्राप्प्त नहीं होते हैं। जो ईश्वरीय कण है, वह सभी में नहीं आता। जैसे सभी लोग वैज्ञानिक नहीं होते, सभी लोग अच्छे खिलाड़ी नहीं होते, सभी लोग बड़े विद्वान नहीं होते, जैसे सभी लोग बलशाली नहीं होते, जैसे सारे लोग योग्य नहीं होते, वैसे ही सभी संतत्व की प्राप्ति में लगे हुए लोग पूर्ण संत नहीं होते। संतत्व आंशिक रूप से आता है, कुछ मात्रा में आता है, आंशिक रूप से आ जाता है, तो भी संत सम्मानित हो जाते हैं।
आजकल संतत्व लांछित हो रहा है, संतों को जो काम करना चाहिए, नित्य अनुष्ठान, संयम, नियम, तप का जो उपक्रम होना चाहिए, वह अब नहीं हो रहा है। संतों को जो काम करने चाहिए, उसमें काफी गिरावट आई है। त्रेता में भी गिरावट आई, कुछ द्वापर में आई और कलयुग में भी गिरावट हुई। इसलिए समाज भी लांछित हो रहे हैं, क्योंकि संतत्व कम हुआ है। संतत्व की प्राप्ति में लगे हर व्यक्ति को देखकर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। अनेक प्रयासरत संतों को देखकर लोगों को लगता है कि अब संत नहीं होते, अब संतों का जीवन सात्विक नहीं रहता। आज ऐसे संत बहुत कम हैं, जिन्हें खाने-पीने, धन की चिंता नहीं है, जिन्हें परिवार और अपनी जाति की चिंता नहीं है। ऐसे संत कम हैं, जिन्होंने स्वयं को संसार को समर्पित कर रखा है।
फिर भी आज समाज में संत की बड़ी उपयोगिता है। आम आदमी में विकार होता है, अपनी कमाई का थोड़ा धर्म पर खर्च करता है, लेकिन सच्चा संत जो भी कमाता है, उसे पूरा का पूरा समाज पर खर्च कर देता है। संत और आम आदमी में यही फर्क है, संत जो भी कमाता है, उसे पूरा खर्च कर सकता है, लेकिन आम आदमी बचत के बारे में सोचता है। कई संत तो कर्ज लेकर भी समाज का भला करते हैं, क्योंकि  समाज के कार्य जरूरी हैं। अच्छे संत अपने ऊपर पैसे खर्च नहीं करते। आम आदमी जो भी बल हो, ज्ञान हो, प्रभाव हो, उसका उपयोग अपने लिए, अपने लोगों, अपने परिवार के लिए, अपने सम्बंधियों के लिए करता है और संत का जो स्वभाव है, संत की जो आंतरिक कमाई है, उसे वह संपूर्ण समाज के लिए खर्च करता है। कहीं से उसमें यह भावना नहीं होती कि ये हमारी जाति के हैं, हमारे संपर्क वाले हैं, हमारे सम्बंधी हैं, हमारी भाषा के हैं। जितने जुड़ाव हैं, उन सबसे अलग हटकर संत अपने जीवन को समाज-संसार के लिए अर्पित कर देता है। निश्चित रूप से संसार की जो स्थिति आज है, यदि संतों को घटा दिया जाए, तो लोगों को अच्छा जीवन जीने की कला ही नहीं आएगी। 
संत प्रयोगशाला भी होते थे और कारखाना भी। संत लेबोरेटरी भी होते थे और फैक्ट्री भी। संत श्रेष्ठ भावों की प्रयोगशाला होते थे, वे स्वयं में अच्छे मूल्यों का प्रयोग करते थे और दूसरों को भी इसके लिए तैयार करते थे। दूसरों में भी सफल प्रयुक्त-उपयोगी भावों को डालना संतों का ही काम होता है।
महर्षि विश्वामित्र जी के जीवन में ऐसा प्रसंग आता है कि वे जब राजा थे, तब वशिष्ठ जी से पवित्र गऊ कामधेनु पुत्री नन्दिनी मांग रहे थे। जब वे सेना के माध्यम से गाय ले जाने लगे, तब नन्दिनी ने वशिष्ठ से पूछा कि क्या मैं बचने-छूटने का प्रयास करूं। वशिष्ठ जी ने कहा कि करो। नन्दिनी ने तत्काल विशाल सेना को जन्म दिया और विश्वामित्र की सेना पराजित होकर लौटने को मजबूर हो गई। विश्वामित्र ने अनेक प्रकार से वशिष्ठ को कष्ट दिए, उनके पुत्रों को भी मार दिया, लेकिन वशिष्ठ जी कुछ नहीं बोले, कहीं कोई आक्रोष नहीं, विद्वेष नहीं। साधु ऐसे ही होते हैं। इसका प्रभाव विश्वामित्र जी पर पड़ा, वे समझ गए कि राजाओं से भी अधिक  शक्ति व महानता साधुओं-ऋषियों के पास है और उन्होंने भी तप-जप-नियम से स्वयं को ब्रह्मर्षि बना लिया। क्रमशः

साधु, तुझको क्या हुआ?

भाग - ४
कबीरदास जी की एक कथा है। वे एक दिन बैठकर राम-राम भजन कर रहे थे, तभी एक आदमी भागता हुआ आया और बोला, 'मुझे बचाओ, कोई मुझे हथियार लेकर मारने के लिए दौड़ा रहा है। बोल रहा है कि मार दूंगा, आप मुझे बचाओ।
पास ही रुई का ढेर था, कबीरदास जी ने कहा, 'जाओ, उसमें छिप जाओ।
वह व्यक्ति बहुत डरा हुआ था, बिना विचार किये वह तत्काल जाकर रुई के ढेर में छिप गया। इसके कुछ ही पल बाद तलवार लिए एक आदमी आया, उसने पूछा, 'यहां एक आदमी दौड़ता हुआ आया था क्या?
कबीरदास जी ने कहा, 'हां, इसी ढेर में छिपा हुआ है।
हमला करने आए व्यक्ति ने कहा, 'मुझे मूर्ख बना रहे हो, जिसे मौत का भय होगा, वह रुई के ढेर में छिपेगा क्या? उसमें तो मारना बहुत आसान है, रुई में तो कोई आग लगा देगा, तो छिपा बैठा आदमी मर जाएगा। तलवार से बचना है, तो व्यक्ति कहीं और छिपेगा। वह सोचेगा कि किसी भी तरह से सुरक्षा हो जाए, यह संभव नहीं है कि कोई रुई में छिपे।
कबीरदास जी ने कहा, 'मैं कह रहा हूं कि वह यहीं छिपा है।
हमलावर व्यक्ति को विश्वास नहीं हुआ, वह बुरा-भला कहते आगे बढ़ गया। उसके जाने के कुछ देर बाद रुई में छिपा व्यक्ति बाहर निकला। उसने कबीरदास जी से कहा, 'आप बाबा बड़े ढोंगी हो, आपने मुझे छिपाया और वह आया, तो आपने उसे भी बता दिया कि इसी में छिपा है, आप तो ढोंगी हैं, आप तो जान के साथ खिलवाड़ कर रहे थे, मैं तो भाग्य से बच गया।
कबीरदास जी ने कहा, 'मैंने तुम्हें रुई से नहीं ढका था, मैंने तुम्हें सत्य से ढका था, सत्य पर कोई तलवार काम नहीं करती। तुम छिपे थे, मैं संत हूं, मैंने ही छिपाया था, मैंने ही कहा कि आप मार दीजिए, लेकिन सत्य इतना मजबूत है कि उस हमलावर को विश्वास ही नहीं हुआ। वह तो उसे रुई समझ रहा था और मैं सत्य समझ रहा था।
तो संत लोग अपने प्रत्येक व्यवहार को सत्यतापूर्वक चलाते हैं। संयम, वैराग्य की इच्छा से अपना पूरा जीवन चलाते हैं और समाज में ऐसे श्रेष्ठ मूल्यों का प्रचार करते हैं, जिन मूल्यों के कारण मनुष्य मनुष्यता वाला बन जाता है, जिसके कारण मनुष्य देवता तक बन जाता है, चंद्रमा बन जाता है, ग्रह-नक्षत्र बन जाता है। 
दुनिया के दूसरे देशों में भी संत हुए, लेकिन जितनी समृद्ध परंपरा संतों की भारत में रही है, वैसी कहीं नहीं रही। कल भी नहीं थी और आज भी नहीं है और कल भी नहीं रहेगी। यहां संतत्व की प्राप्ति का बड़ा राजमार्ग था, इस राजमार्ग पर चलकर असंख्य लोग संतत्व को प्राप्त करते थे। इस मार्ग पर चलना है, यह ईश्वरीय मार्ग है, यह खाने-कमाने का मार्ग नहीं है। कहीं भी रहकर संतत्व को प्राप्त किया जा सकता है, किसी भी कमरे में किसी भी क्षेत्र में, भाषा, जाति, समाज, आयु में रहकर संत बना जा सकता है।
रोम-रोम से जैसे ईश्वर का जीवन होता है, वैसे ही संत का जीवन होना चाहिए, कहीं कोई बुराई नहीं, वासना नहीं, कहीं कोई राग, विद्वेष नहीं। कोई दुर्गण उनमें नहीं है, ये लोग घूम-घूमकर संस्कारों का प्रचार करते हैं, असंख्य लोगों को मंगलमय जीवन देते हैं, पूर्ण विश्राम का जीवन देते हैं। अद्भुत जीवन है उनका। ऐसी ही देश में एक लंबी परंपरा चली है, संतत्व जो है, वह सतयुग में भी वैसा ही था, त्रेता में भी और द्वापर में भी ऐसा ही और कलयुग में भी ऐसा ही है। क्रमशः 

साधु, तुझको क्या हुआ?

 भाग - ३
ईसा मसीह को भी संत का दर्जा प्राप्त है, उन्होंने भी संसार को अपने जीवन से धन्य बनाया। यह परंपरा संसार में अनादि है, जैसे संसार अनादि है, जैसे ईश्वरीय व्यवस्था, उसके संस्कार अनादि हैं। इस संसार का तो यह पता ही नहीं है कि यह कब बना। कर्मों के आधार पर लोगों ने उसे विकसित किया है। केवल बच्चा जन्म देने से बच्चा पवित्र जीवन का नहीं हो जाता, उसके पालन-पोषण में उच्चता होनी चाहिए, उसे पढ़ाना, शब्दों का ज्ञान कराना, ज्ञान देना, यह प्रक्रिया लंबी चलती है और जीवन भर चलती रहती है।
ईश्वर ने संसार को बनाकर छोड़ दिया होता, यदि ऋषियों, संतों, विद्वानों का सृजन नहीं हुआ होता, तो संसार वहीं का वहीं पड़ा रहता। जैसे वेदों ने कहा कि सत्य बोलना चाहिए, सत्यम वद्। वेदों के माध्यम से ईश्वर ने यह बोल दिया, लेकिन वह हर व्यक्ति के पास आकर यह नहीं बोल सकता कि आप सत्य बोलिए, भगवान कितना समय कितने लोगों के साथ बिता सकते हैं, इसीलिए शास्त्रों की रचना हुई, शास्त्रों का अनुसरण करके संतों ने अपने जीवन को अच्छा व धन्य बनाया। संसार में अनेक संतों का प्रादिर्भाव हुआ, न जाने कितने संतों ने संतत्व के विकास के लिए अपना संपूर्ण जीवन लगा दिया। संयम, नियम से सज्जित जीवन के माध्यम से ऊंचाई को प्राप्त किया। उन्होंने बार-बार बताया कि मेरा जीवन अपने लिए ही नहीं है, संपूर्ण संसार के लिए है। जैसे सूर्य अपने लिए नहीं उगता, जैसे चांद अपने लिए नहीं उगता, जैसे नदियां अपने लिए नहीं बहतीं, आकाश अपने लिए ही आवागमन की सुविधा नहीं देता, ठीक उसी तरह से संत का जीवन भी दूसरों के लिए है। संत, मुनि जीवन के लोग अपने जीवन को समाज के लिए पूर्णत: समर्पित कर देते हैं, उनमें अपना स्व कुछ नहीं होता, उनमें अपने भोग की भावना नहीं होती। कहीं भी वे शक्ति नष्ट नहीं करते, मन में कटुता नहीं आती। एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, संपूर्ण जीवन वे ऐसा ही करते चलते हैं। केवल ईश्वरीय भावों को, सर्वश्रेष्ठ भावों को सबको बांटना है। सर्वश्रेष्ठ भावों को अपने जीवन में उतारकर उसका प्रयोग सबको बताना है। कोई भेदभाव नहीं करना है, न जाति का भेदभाव, न क्षेत्र का, न भाषा का, हमें तो बस अच्छी बातें बतलाना है, लोगों को सुशिक्षित बनाना है, सत्य बोलना है और लोगों से बोलवाना है।
सत्य में जो प्रतिष्ठित होता है, वह यदि किसी पापी को भी बोल दे कि तुम स्वर्ग जाओगे, तो पापी को स्वर्ग मिल जाता है, ऐसा योग दर्शन में कहा गया है।
इसमें पैसा नहीं लगता, इसके लिए किसी बड़े विश्वविद्यालय में डिग्री लेने की जरूरत नहीं है, अखाड़े में जाने की जरूरत नहीं, मैदान में जाने की जरूरत नहीं है, जो जहां पर है, वहीं पर जो ज्ञान हुआ है, जो वस्तु जैसी है, उसका ध्यान करे और उसी के अनुरूप बोले। संसार की बहुत बड़ी समस्या का समाधान केवल सत्य बोलने से हो जाएगा और यही काम संत लोग सदा से करते रहे हैं। क्रमशः 

साधु, तुझको क्या हुआ?

भाग - २
ईश्वर ने अपने प्रतिनिधि के रूप में संतों को भेजा है। जैसे लोकतंत्र प्रतिनिधि तंत्र है, ठीक उसी तरह से संतों का समाज भी ईश्वर का प्रतिनिधि तंत्र है। उसके सभी उद्देश्यों, सभी इच्छाओं, सभी लीलाओं, क्रियाओं, सभी व्यवस्थाओं को संत जन समाज कल्याण के लिए प्रयुक्त करते हैं। संत स्वयं को केवल समाज के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए, केवल मानवता के लिए ही नहीं, अपितु संपूर्ण प्राणियों के लिए समर्पित कर सबके विकास को गति देते हैं।
संसार में साधुओं, संतों का बड़ा काम है। संतों ने मानव समाजों को ईश्वरीय ज्ञान से जोड़ा, संस्कारों से जोड़ा, जीवन जीने की कला से जोड़ा है। विकास की तमाम क्रियाओं से जोड़ा है और सबकुछ इतना अच्छा किया कि पूरा संसार उनकी ओर देखता है। ऐसे बड़े कामों के लिए, लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए संत का बड़ा अच्छा और वैसा ही सही स्वरूप होना चाहिए, जैसे ईश्वर के किसी प्रतिनिधि का होना चाहिए।  
आज यह हमें जानना होगा कि संत का सही स्वरूप क्या होता है। जब वह अपने ज्ञान द्वारा ईश्वर को समझ लेता है, अपनी भक्ति द्वारा ईश्वर को प्राप्त कर लेता है, अपनी शरणागति द्वारा ईश्वर को प्राप्त कर लेता है और उसके गुणों से युक्त हो जाता है, जब उसी तरह से अपने संपूर्ण जीवन को संसार का जीवन बना लेता है, जब अपनी संपूर्ण इच्छाओं को संसार की इच्छाओं में डालकर विकास के लिए प्रयास करता है, तमाम उपयोगी विविधिताओं में गुणों को डालकर उनके विकास के लिए प्रयास करता है, तब उसको सही संत का दर्जा प्राप्त होता है। तभी वह संसार में संत के रूप में सार्थक होता है। उसका सम्बंध केवल वस्त्र-आभूषण से नहीं है, किसी एक पंथ या संप्रदाय से नहीं है, बाहरी आडंबरों से नहीं है। वास्तव में आंतरिक उत्कर्ष ही संतत्व का लक्षण है। यह उत्कर्ष उसकी क्रियाओं में प्रकट होता है, यह संत की सबसे बड़ी पहचान है। संत का कर्म कभी स्वार्थ के अनुरूप नहीं होता, हमेशा परमार्थ के अनुरूप होता है।
आज लोगों को भी यह देखना होगा कि संत का केन्द्रीकरण कहाँ है, कहां के लिए वह अपने जीवन को लगा रहा है, किसी काम के लिए स्वयं को थका रहा है, किस उद्देश्य के लिए जीवन व्यतीत कर रहा है, उसके जीवन का परम लक्ष्य कहां है। निस्संदेह, संत का उद्देश्य सम्पूर्ण संसार के लिए होना चाहिए। वह यह चाहता है कि सभी लोगों को महा-आनंद मिल जाए, सभी लोग सुखी हो जाएं, यदि कोई ऐसा चाहता है और इसके लिए प्रयास करता है, तो वैदिक सनातन धर्म में उसे संत कहा गया है।
केवल सनातन धर्म में ही नहीं, दूसरी परंपराओं में भी अच्छे संत हुए हैं। हम कभी यह नहीं मानते की संत केवल भारतीय समाज में हुए। मुसलमानों में भी एक बड़ी धारा सूफियों की रही, जिनका जीवन बहुत अच्छा था, जिनमें सत्ता लोभ नहीं था, भोग नहीं था, जो तपस्या से रहते थे, बहुत त्याग से रहते थे, उनमें दान पाने के लिए उतावलापन नहीं था। ऐसे ज्ञान से प्रेरित होकर मुस्लिम धर्म में भी अनेक संत हुए। अपूर्व शक्ति और स्थान उन्होंने प्राप्त किया। न जाने कितने लोगों के जीवन को सुधारा। जो सही मायने में जीवन का चरम है, वे वहां पहुंच गए। क्रमशः

Sunday, 9 November 2014

साधु, तुझको क्या हुआ?

(जगदगुरु महाराज के प्रवचन से)
संसार में आकार, प्रकार, स्वभाव की अथाह विविधता है, जहां चौरासी लाख योनियों की चर्चा की जाती है। चौरासी लाख योनियों के संपूर्ण निर्माण का जो श्रेय है, सनातन धर्म के अनुसार, सृष्टि जहां भी हो, जैसी भी हो, इस संपूर्ण सृष्टि का निर्माता ईश्वर ही है। ईश्वर द्वारा ही संसार में सारे निर्माण हो रहे हैं। जिन्हें आज के आधुनिक निर्माण कहा जाता है, वो निर्माण भी उसी ईश्वर के बनाए हुए पदार्थों को ही जोड़-तोड़कर हो रहे हैं। अनुसंधान हो रहे हैं, वस्तुएं बन रही हैं, उपयोगी पदार्थ बन रहे हैं, लेकिन उसक जो मूल है, उसक जो प्रारंभ है, वह तो ईश्वर ही है। इतनी बड़ी सृष्टि का संपादन कोई मनुष्य नहीं कर सकता - न समुद्र का, न हिमालय का, न आकाश का, न पृथ्वी का, न वायु का, न ग्रह-नक्षत्र का। इसलिए यह माना गया है और इसको बार-बार वेदों ने, पुराणों ने, स्मृतियों में दोहराया गया है कि संसार को ईश्वर ही बनाता है और वही उसका पालन करता है, वही उसका पोषण करता है। उसको सुन्दर बनाता है, उपयोगी बनाता है, उसे सुदृढ़ बनाता है और जब कभी उसे लगता है कि अनिवार्य है, तो उस चीज को अपने में समाहित कर लेना है, इसी को संहार कहते हैं। ईश्वर अपनी तरह से सुधार करता है। जैसे राज प्रथा की जो विकृतियां थीं, उनमें से बहुत-सी विकृतियों से समाज को छुटकारा मिला। उसकी तुलना में लोकतंत्र में बहुत-सी अच्छाइयां हैं, जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है। वैसे ही संसार को बनाकर ईश्वर ने वेदों, शास्त्रों के रूप में नियम-कानून भी बनाए कि जीवन में कैसे चलना है, कैसे रहना है, किस तरह से विकास होगा, किस तरह से व्यक्ति सही रहेगा। संपूर्ण नियम-कानून उसने बनाए और उसी आधार पर संसार को अच्छाई की ओर ले जाने का सही मार्गदर्शन किया।
कहीं कोई आदमी भटक रहा है, तो उसके दोषों को दूर करके सही रास्ते पर लाने का, कोई और अधिक उन्नति करना चाहता है, तो उसका भी मार्गदर्शन करने का। सहायक साधनों को देकर आगे बढ़ाने का, इस तरह हर सही उपाय किये गए। प्रेरित किया कि अपने दायरे में सभी परम शक्ति या सुप्रीम पावर से जुड़ें। आज यह होना कठिन लगता है, लेकिन राजतंत्र हो या लोकतंत्र या कोई अन्य तंत्र हो, परम शक्ति से सभी लोग सीधे जुड़कर अपना संरक्षण प्राप्त करें, अपना विकास प्राप्त करें। अपने जीवन की अच्छाइयों को प्राप्त करें, अपना जो भी कुछ जीवन के लिए अनुकूल है, उसे प्राप्त करें, यह कठिन काम है, इसलिए आज की दुनिया में लोकतंत्र की महत्ता अत्यंत सात्विक दृष्टि से सभी लोग स्वीकार करते हैं कि यह अच्छा तंत्र है। वैसे ही ईश्वर ने अपनी बातों को लोगों को समझाने के लिए, सही रास्ते पर लाने के लिए कि कैसे लोगों का विकास हो, चिंतन, शरीर, धन, ज्ञान का कैसे विकास हो, कैसे लोगों की गतिविधियों का विकास हो, उसके लिए एक प्रतिनिधि परंपरा का प्रारंभ किया, यही संत परंपरा है। जो ईश्वर की भावनाएं होती हैं, जो ईश्वर की स्थापनाएं होती हैं, जो ईश्वर के सारे उद्देश्य होते हैं, ईश्वर जिन भावनाओं से जुड़ा होता है, जिन गुणों से जुड़ा होता है, जिन अच्छाइयों से जुड़ा होता है, वो सब संतों में होती हैं। संत के जीवन में समाज भी यही खोजता है कि संत में लोभ नहीं हो, कामना-हीनता हो। समाज संत में यह देखता है कि उसमें श्रेष्ठता है या नहीं, संयम है या नहीं। संत में दूसरों की भलाई करने की भावना है या नहीं। लोग संत में सभी गुण खोजते हैं। संतों को परखा जाता है। लोग यह नहीं देखते कि संत को गाड़ी चलाना आता है या नहीं, कप्यूटर चलाना आता है या नहीं, संत को प्रबंधन चलाना आता है या नहीं। संत हैं, तो संतत्व होना चाहिए। जो गुण, जो भाव, जो उत्कर्ष, जो ग्रहणशीलता, जो विशिष्टता ईश्वर में पाई जाती है, उन सभी भावों को लोग लोकतंत्र में खोजते हैं और संतों में भी खोजते हैं। लोग जब किसी में इन गुणों को नहीं पाते हैं, तब उसे ढोंगी कहते हैं। क्रमशः

Saturday, 29 March 2014

नमोsस्तु रामाय

जगदगुरु रामानन्दाचार्य पद प्रतिष्ठा रजत जयंती महोत्सव 
चैत्रीय शुक्ल प्रतिपदा से रामनवमी पर्यन्त - ३१ मार्च से ८ अप्रैल तक विशेष आयोजन। शीर्षस्थ धाम अयोध्या में बधाईगान समारोह। कार्यक्रम स्थल - श्रीरामवल्लभा कुंज, जानकी घाट, अयोध्या। 
इस वृहद व पावन आयोजन में देश के नामी गायक-वादक कलाकार शामिल होंगे। राम जी की सेवा में प्रस्तुत होने वाले कलाकारों के नाम इस प्रकार हैं - रोनू मजुमदार- बांसुरी वादन, कल्पना जोगारकर-गायन, अर्णव चटर्जी - गायन, राजेश्वर आचार्य- गायन, स्वामी जीसीडी भारता- गायन, अखिलेश चतुर्वेदी-कत्थक नृत्य, देवाशीश डे-गायन, श्रीमती मालनी अवस्थी-गायन, श्रीमती कंकना बनर्जी-गायन और प्रसिद्ध संगीतकार गायक रविन्द्र जैन।

जय गंगा, जय नर्मदा - ७

समापन भाग
महाराज के चरण में विद्वान श्री राधेश्याम धूत जी और ज्ञानेश उपाध्याय, चित्र - श्री हिमांशु व्यास जी ने लिए हैं.

नर्मदा में मेरी आस्था का विकास हुआ, धन्यता बोध हुआ और धर्म में धारणा का विकास हुआ। सबलोग अलग-अलग होने पर किसी को कोई शिकायत नहीं थी, आरोप नहीं था, किसी ने कोई भी गलत बात नहीं की और नर्मदा परिक्रमा में लोग पैसा भी कमाते हैं, मैंने कहा था कि श्रीमठ के दो पैसे लग जाएंगे, किन्तु अपने को परिक्रमा कराकर दो रुपए भी नहीं चाहिए। जबकि हम चाहते, तो लाखों-लाखों रुपया मिल जाता। उस समय बड़ा आनंद हुआ। स्वामी रामानन्दाचार्य जी के दोनों तट पर आश्रम थे, इतने आश्रम नर्मदा के तट पर किसी दूसरी परंपरा के नहीं थे। उन सभी समूहों ने मेरी और मेरे लोगों के लिए पलक पांवड़े बिछा दिए। उत्तराधिकारी होने का मुझे लाभ मिला। स्वामी रामानन्दाचार्य का मैं उत्तराधिकारी हूं और उन्हीं की तपस्या का, उनकी परंपरा का जो प्रयास है, उसका फल हम लोगों को मिला, जो सामान हम ले गए थे, वैसे ही लेकर लौट आए। कहीं हमारी पोटली गेहूं, चावल इत्यादि की नहीं खुली। गद्दी संभालते हुए पांच प्रतिशत जो हमने भी प्रयास किया है इतने दिनों तक, इसके लिए भी जो स्वागत लोगों ने किया, मैं धन्य हो गया। यदि मेरा कोई योगदान नहीं होता, तो लोग कहते कि आप रामानन्दाचार्य हो गए, किन्तु आपने कुछ नहीं किया, किन्तु मेरा योगदान मात्र ५ प्रतिशत है। ९५ प्रतिशत से स्वामी जी का ही काम है। उनके आश्रम नर्मदा परिक्रमा के मार्ग में बिछे हुए हैं। जैसा स्वागत उन्होंने किया, वैसा स्वागत आजतक मेरा हुआ ही नहीं। जहां मैं जाता था, लगता था जैसे वनवासियों के यहां राम जी आ गए हैं और वनवासी धन्य हो रहे हैं। नर्मदा जी की कृपा से मैं भी धन्य हो गया।

जय गंगा, जय नर्मदा - ६

भाग - ६

यह जो कहा गया कि नर्मदा जी पुण्यशालिनी हैं, अद्भुत नदी हैं, यह कोई सामान्य लोगों ने नहीं कहां, महात्माओं ने कहा, जिनको दिव्य दृष्टि थी, जैसे अर्जुन को कृष्ण ने दी थी। जिन लोगों को सम्पूर्ण संयम-नियम करके गुरुकृपा, पितरों की कृपा से, ईश्वर की कृपा से दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई थी, उन लोगों ने कहा। तभी तो कबीर कहते हैं - और कहें कागज की लेखी, कबीरा कहे आंखों की देखी। जो दृष्टि दी थी कृष्ण ने अर्जुन को, वही कबीर को भी उनके गुरु ने दी। सत्संग किया, पुण्य मिला। इसलिए नर्मदा और यमुना, सरस्वती, कावेरी और सरयू इत्यादि जो नदियां हैं, जिनको हम लोग पुण्य नदी कहते हैं, ये पुण्य नदियां आराध्यस्वरूपा हैं। उनका जो लौकिक पक्ष है, उसकी भी समालोचना होनी चाहिए और उनकी आध्यात्मिक समालोचना भी होनी चाहिए।
मैं आपको जीवन से जुड़ी एक घटना सुनाता हूं। मैं ऐसे ही ठहरा हुआ था, कोई सत्संग था जबलपुर में, पुलिस का पहरा लगा हुआ था, शौकिया लोगों ने पुलिस लगा रखी थी, पुलिस वाले राइफल लेकर ड्यूटी देते थे। हालांकि मुझे कोई भय नहीं था। एक रात पहरे पर लगे पुलिस वाले ने देखा कि जटा जिसकी जमीन में लग रही है, लंगोटी पहना है, हाथ में कमंडल है, एक हाथ में कुल्हाड़ी है, ऐसा एक संत आ रहा है, प्रकाश था, बड़ी-बड़ी लाइटें लगी थीं आश्रम के घाट तक, बीच में कोई मकान, दुकान नहीं था। पुलिस वाले ने सोचा कि कोई नहाने आया होगा, लेकिन समय तो २ बजे रात का था, पर नर्मदा जी में देर तक लोग नहाते हैं, जैसे-जैसे वह संत पास आते गए, उनका तेजस्वी स्वरूप पुलिस वाले को ध्वस्त करता गया, जब वो संत मेरे कमरे के करीब आ गए, तो पुलिस वाला सहन नहीं कर पाया, तेजस्वी स्वरूप को, जाकर बिस्तर पर लेट गया, बेहोश हो गया, जब ड्यूटी बदली, तो उसे उठाया गया, चार बजे ड्यूटी बदलनी थी, पांच बज गए, उसे हिलाया, जगाया, तो वह बेहोश था। पैर दबाया, पानी दिया मुंह में, अंत में उस पुलिस वाले ने आंख खोला, होश संभाला, तो कहा कि ये-ये घटना हुई, मैं सहन नहीं कर पाया, उस संत के तेज को, महाराज के कमरे के पास तक जब वो संत आ गए, तो मैंने समझा कि खड़ा रहना कठिन है, अब बिस्तर पर लेट जाना चाहिए।
यह घटना मुझे सुनाई गई। उसका चिकित्सकीय परीक्षण हुआ, वह डर गया था। आ गए महाराज जी, आ गए, वह बोलता रहता था।
नर्मदा जी के किनारे कहा जाता है कि इतने सिद्ध हैं, जिनके कमंडल भी आपस में टकराते हैं। इतने सिद्ध चलते हैं परिक्रमा में, जरा सोचिए। मैंने कहा, यह तो अद्भुत हो गया। बाद में मैंने बहुत आभार व्यक्त किया कि मैं छोटा आदमी हूं, आपकी कृपा हुई कि आपने इस तरह के महात्मा को मेरे पास भेजा। यह आभार आपका कभी नहीं भूलूंगा। ऐसी ही कृपा बनी रहे।
आपको ध्यान होगा, जबलपुर में भूकंप आया था। हम एक भंडारा करते है, वैशाख पूर्णिमा पर १२ घंटा चलता है, मैं वहां था। ३६ घंटे तक भंडार बनता रहता है, एक दिन पहले ही बनना शुरू हो जाएगा, रात्रि भर बनेगा, दिन भर बनेगा। उसका आयोजन हो रहा था, तब मैं कमरे में सो रहा था, पहले कमरा बंद नहीं किया था, बाद में लोगों ने बाहर से ताला बंद कर दिया। बीच में मैं उठा, आंख खुली, मैंने भीतर से दरवाजा बंद कर दिया। कमरा बंद करने के बाद मैं साधु वाले छोटे वेश में ही सो गया। भू-कंपन होने लगा, चौकी हिल रही थी, खूब तीव्रता के साथ, मैं समझ गया, भूकंप आ गया, प्रलयंकारी आवाज हो रही थी, मैंने सोचा, बाहर जाऊं, यदि वहीं जमीन फट जाए, तो निश्चित है मर जाऊंगा। जाने की क्या आवश्यकता है, यहीं लेटा रहता हूं, राम-राम कहता हूं, देखूंगा कि भगवान को सेवा की आवश्यकता हो तो मुझे रखें, वरना नहीं तो छत गिरे और यहीं मर जाऊं। भगवान दुखद भी हैं और सुखद भी हैं। विष्णु सहस्रनाम में भगवान के दोनों स्वरूपों का वर्णन है, दुखद भी, सुखद भी। सुख भी देते हैं, दुख भी देते हैं, मारने वाले वही हैं, बचाने वाले भी वही हैं। मैंने सोचा लेटे रहता हूं और स्वयं को राम जी पर छोड़ दिया। मंत्र जपने लगा - श्रीराम: शरणं मम।
मैं प्रसन्न था कि मैं सबसे बड़ी परीक्षा देने जा रहा हूं कि भगवान को रामनरेशाचार्य की आवश्यकता है या नहीं, नहीं हो, तो ले चलें। करवट भी नहीं बदला। खुश था। जब पूरी तैयारी हो, तो क्या डरना, पूरी तैयारी थी, सही काम वही होगा, जो राम जी को मंजूर होगा। जबलपुर के आश्रम में नर्मदा तट की यह घटना है।
बाद में लोगों को मेरी याद आई, लोगों ने बाहर से कमरे का ताला खोला, दरवाजा भीतर से बंद था, तो लोगों ने कहा कि खोला जाए, कहा लोगों ने कि क्षमा चाहते हैं। सुरक्षा के लिए हमने ताला लगवा दिया था।
तब जन हानि तो कम हुई थी, लेकिन माल हानि बहुत हुई थी, भूकंप बहुत बड़ा था। इन सभी चमत्कारों के आधार पर नर्मदा जी में हमारी निष्ठा का विकास हुआ और हमने भरपूर निष्ठा के साथ उनकी परिक्रमा की। नर्मदा जी से जो हमारी उपलब्धि हुई, उस पर हम इतना ही कह सकते हैं कि जीवन धन्य हो गया। जो लोग भी नर्मदा परिक्रमा में मेरे  साथ गए, वे कह सकते हैं कि मेरा जीवन तो अब धन्य होगा, अब कुछ करें या नहीं करें, इस तरह का भाव मुझमें भी आया। लेकिन सबसे बड़ी बात, नर्मदा परिक्रमा का एक जो स्वरूप है, जो निर्मित हुई, जो लोग गए थे, १२५ के करीब लोग थे, सभी लोगों को धन्यता का बोध हुआ। किसी ने नहीं कहा साथ चलने वाले को कि हटिएगा हमें आगे चलना है, कोई महिला औैर पुरुष लंगड़ा रहा है, तो लोग पीछे ही रहते थे, सभी लोगों ने नंगे पांव यात्रा की। मेरे पांव में कांटे भी गड़ गए थे, लोग बोलते थे कि निकाल दिए जाएं, मैं कहता था, इनकी भी परिक्रमा करा देता हूं, न जाने कौन से जीव हैं।
क्रमश:

जय गंगा, जय नर्मदा - ५

भाग - ५

मैं कहता हूं, आंशिक समर्पण से काम नहीं चलेगा। पत्नी यदि पति के लिए सम्पूर्ण रूप से समर्पित हो जाए और पति यदि पत्नी के लिए सम्पूर्ण समर्पित हो जाए, तो राम राज्य आ जाएगा। ईश्वर के लिए सम्पूर्ण रूप से समर्पित होने की भी प्रक्रिया है कि हम उसका पैर भी धोएं, भोग लगाएं, वस्त्र दें, दक्षिणा भी दें, इत्र भी लगाएं और परिक्रमा भी करें। सम्पूर्ण प्रेम-भक्ति भाव व्यक्त करें।
जो ऊर्जावान पदार्थ होता है, वह प्रभावित करता है। दर्शन शास्त्र में पढ़ाया जाता है, वस्तु शक्ति को ज्ञान की जरूरत नहीं है। जैसे यह प्रकाश है, इसका आपको ज्ञान हो या नहीं हो, आपका अंधेरा तो दूर होगा। जो भी परिवर्तन स्वत: होने हैं, वो तो होंगे ही। वैसी ही ऊर्जावान नर्मदा जी ने असंख्य लोगों को धन्य जीवन दिया, जब उनके अगल-बगल में घूमेंगे, पूजन करेंगे, तो हमें भी पुण्य की प्राप्ति होगी, हमारे पाप नष्ट होंगे।
अब थोड़ी वेदांत की बात कर दूं। यहां सब कुछ ब्रह्म है, लेकिन ब्रह्म प्रकट नहीं है। एक बड़ा प्रसिद्ध वाक्य पढ़ाया जाता है शास्त्रों में - सर्वं खल्विदं ब्रह्म, सबकुछ ब्रह्म है,  ब्रह्म द्वारा ही निर्मित है। जो कारण होता है, वह कार्य का व्यापक होता है। जहां-जहां कार्य रहेगा, कारण रहेगा ही। जहां-जहां घड़ा रहेगा, वहां-वहां मिट्टी रहेगी ही रहेगी।
न्याय शास्त्र की पहली पुस्तक - तर्कसंग्रह में लिखा है :- 
कार्यनियतपूर्ववृत्ति कारणम् ।
भगवान से ही यह संसार बना है। सब ब्रह्ममय है, लेकिन ब्रह्म कहीं-कहीं उद्भुत है, प्रकट है। जैसे सब्जी में, चावल में। आम वही था, जो छोटा था, वही था, जब मंजर के रूप में था, आम वही था, जो वृक्ष में रस के रूप में था, लेकिन जब पक गया, बड़ा हो गया, आकर्षक आम हो गया। जैसे कोई आदमी जन्म लेता है बच्चा, तो द्विज नहीं है, ब्राह्मण नहीं है, उसका जो संस्कार हुआ, वह द्विज हो गया। उससे भी काम नहीं चलेगा, वह वेदाध्ययन करे, शास्त्रों को पढ़े, तब जाकर वह विद्वान होगा। ब्राह्मणत्व उद्भुत हो गया। तिल में तेल है, लेकिन उससे काम नहीं चलेगा। पकौड़ी बनेगी, तो सीधे सरसों से नहीं बनेगी। पकौड़ी तब बनेगी, जब सरसों से तेल उद्भुत हो जाएगा। सरसों को पेरा जाएगा, तभी तेल प्रकट होगा। वैसे ही ब्रह्म कहीं-कहीं उद्भुत है, बाकी सब जगह अनुद्भुत है।
नर्मदा इत्यादि नदियां भगवान का शरीर हैं। उपनिषद में लिखा है, जैसे भगवान हम लोगों की आत्मा का शरीर हैं, वैसे ही पूरा संसार भगवान का शरीर है, जल भी भगवान का शरीर है। किन्तु जल तो वह भी है, जो नाला में बह रहा है, जल तो वह भी है, जो भोजन बन रहे बर्तन में है, जल तो वह भी है, जिससे हम स्नान करते हैं और जल वह भी है, जो हमारे स्नान करके बाद बहता है। कुआं, तालाब इत्यादि में भी जल है, लेकिन जो जल कुछ नदियों में है, उन्हें ऋषियों ने देखा। इन नदियों का ब्रह्मत्व पूर्ण है, इनमें पाप नाशकत्व है, विलक्षण शक्ति है, शक्ति उद्भुत है, प्रकट है, इन्हीं नदियों को हम लोग पुण्य नदी कहते हैं। जिनमें पुण्यदायकता प्रकट हो गई है। ऋषियों ने देखा अनुभव किया, पुराणों में नदियों का वर्णन हुआ, यह कोई आम आदमी का चिंतन नहीं है। आम आदमी का चिंतन होता, तो कोई मानता क्या? अभी कोई रिक्शा चलाने वाला बोले कि बराक ओबामा ने सम्पूर्ण अमरीका ही भारत को दे दिया, तो लोग उसकी पिटाई ही कर देंगे। 
एक साधु को झूठ बोलने का अभ्यास था, उन्होंने अपने भक्तों से एक दिन कहा, 'गाड़ी कोलकाता में उलट गई, बहुत लोग मर गए।
शिष्यों-भक्तों ने पूछा, 'अखबार कहां है?
तो वो साधु अखबार दिए कि इसमें लिखा है, किन्तु देते समय अखबार भी उलटा ही थमाए। अंग्रेजी का अखबार था, उस साधु को यही नहीं पता था कि सीधी लाइन कौन-सी है। झूठ बोल रहे थे।
भक्तों ने कहा, 'आप हमारे गुरु हैं, लेकिन ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिए। आपको पता है कि सीधी लाइन कौन-सी है?
उत्तर मिला, 'मुझे नहीं पता, मैं अंग्रेजी पढ़ा हूं क्या, बेवकूफ कहीं का।
क्रमश: