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Saturday, 15 July 2023

सबसे बड़ा दानी कौन?

बहुत सारे लोग हैं, जो समझते हैं कि वही सबसे ज्यादा दान करते हैं। मठ बना दिया, घर बना दिया, घर दे दिया, किसी को धन दे दिया, कुछ संसाधन दे दिया, इसी को सबसे बड़ा दान समझते हैं। 

भागवद्कार ने सबसे बड़ा दानी व्यावसायियों या किसानों को नहीं कहा। भागवद्कार ने कहा कि भगवान की कथा अमृत के समान है। कथा को अमृत मानकर, उसकी विशेषता बतलाते हुए कहा कि हे भगवान आपकी कथा, हे श्याम सुंदर आपकी कथा तो अमृत के समान है। जो तीनों तापों से जल रहे हैं, संतप्त हैं, तड़प रहे हैं, बिलख रहे हैं, उनको जीवन दे देती है। 

कहा कि भगवान आपकी कथा में एक और विशेषता है, बड़े विद्वान और ऋषि भी इसकी विशेषता गाते हैं। सदाचारी गाते हैं, जो धन्य जीवन के हैं, वे भी इनकी प्रशंसा करते हैं। नारद जी भी इनकी प्रशंसा करते हैं। जो अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि का हो, उसको कवि कहा जाता है, वे भी भगवान की महिमा गाते हैं। जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि, कहावत है। सूक्ष्मदर्शी भी आपकी चर्चा करते हैं और इससे पाप का नाश भी होता है। केवल सुनने से काम नहीं होगा, उसे गुनना भी पड़ेगा। ईश्वर को सुनना है, तो उनका मनन भी करना होगा। ऐसा करने के बाद ही ईश्वर का दर्शन होगा। हम उसे देख सकेंगे। 

व्यास जी ने कहा कि भगवान की कथा में ऐसी शक्ति है कि उनको गुनने की कोई जरूरत नहीं है, केवल सुनने से ही कल्याण प्राप्त हो जाता है। जैसे आप ईश्वर की चर्चा सुन रहे थे। मनन के लिए अध्ययन की जरूरत है। मैंने जो न्याय दर्शन पढ़ा है, वह संपूर्ण दर्शन मनन का ही दर्शन है। हेतु का मनन, बारह साल लग गए पढ़ाई में। जो न्याय दर्शन नहीं पढ़ता, उसे काशी में विद्वान नहीं मानते हैं।  

व्यास जी ने कहा कि बहुत सारे लोग देते हैं, मकान देते हैं, भूमि देते हैं, ये बड़ा दान नहीं है। बटुए से देने वाला बहुत मुश्किल से गिनकर कुछ देता है, पर जो भगवद् कथा की वर्षा करता है, वह देने पर आ जाए, तो कथा अमृत की सुनामी लहर ला सकता है। भगवद् कथा की अमृत वर्षा करने वाला ही सबसे बड़ा दानी है, वह सर्वस्व दे देना चाहता है, इस अमृत वर्षा में कुछ भी घटने वाला नहीं है। 


Friday, 8 December 2017

हरिद्वार में निर्माणाधीन भव्य श्री राम मंदिर



हरिद्वार में निर्माणाधीन भव्य श्री राम मंदिर
रामानंद संप्रदाय के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी के महाराज के नेतृत्व में हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर शांतिकुंज के करीब सप्त ऋषि घाट मार्ग पर निर्मित हो रहा भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण फिर से गति पकडऩे जा रहा है। यहां भूमि पर अतिक्रमण की वजह से मंदिर निर्माण में बाधा आ रही थी, लेकिन गत १८ नवंबर को हरिद्वार में इस कार्य को फिर गति मिली है। यह दुनिया का एक अद्वितीय श्रीराममंदिर होगा। भगवान श्री राम जी की कृपा से यह मंदिर इतना अद्भुत बनेगा कि हरिद्वार के आकर्षण में चार चांद लगा देगा। जय सियाराम

Thursday, 3 October 2013

जगद्‌गुरू का एक पावन संकल्प

 हरिद्वार में निर्माणाधीन राम मंदिर

 सप्तऋषि मार्ग, हरिद्वार स्थित यह निर्माणाधीन मंदिर ऋषीकेश जाने वाले मार्ग पर शान्तिकुंज के बाद पड़ता है.  

Saturday, 14 September 2013

भाई-भाव बचाइए

चित्र श्री हिमांशु व्यास जी ने लिए हैं
मनुष्य इस संसार का एक भाग है और वह सदा अपने को विकसित करना चाहता है। अपने को बड़े दायरे में पहुंचाना चाहता है। इसके लिए अनेक तरह के कारणों को खोजता है, अनेक तरह के सम्बंधों को बनाता है और मित्र बनाता है, सहयोगी बनाता है, कुछ लोगों को पिता का दर्जा देता है, कुछ लोगों को बराबरी का दर्जा देता है। कुछ लोगों को सखा बनाता है। उसे आगे बढऩे के लिए बहुत सारे सम्बंधों की आवश्यकता पड़ती है, बहुत सारे संसाधनों की जरूरत पड़ती है। सम्बंध को विकसित किए बिना कोई बड़ा नहीं हो सकता। सम्बंध जरूर विकसित होने चाहिए। किन्तु सम्बंध जितने भी हों, कम हैं, बाकी सम्बंधों से भातृत्व की बराबरी का कोई प्रश्न नहीं है। अन्य सम्बंध तो बनाए जा सकते हैं, जन्म लेने के बाद, आवश्यकता के अनुसार, अपनी समझ के अनुसार, मनुष्य सम्बंधों का निर्माण करता है, सम्बंधों को चित्त में रखता है, किन्तु भातृत्व तो स्वयं बनता है, बनाया नहीं जाता। एक माता-पिता से जब हम जन्म को प्राप्त करते हैं, एक ही मां के गर्भ में रहकर जब हम अस्तित्व में आते हैं। कोई हमारे पहले आता है, तो बड़ा भाई हो जाता है, हम बाद में आते हैं, छोटे भाई हो जाते हैं, हमारे बाद जो आता है, वह हमारा छोटा भाई हो जाता है। यह सम्बंध अकृत्रिम है। बाकी सम्बंधों को कृत्रिम कहा जा सकता है, जो बाद में बनते हैं। इस सम्बंध का मूल समान माता-पिता से पैदा होना है, माता-पिता की समानता है। जिनके माता-पिता एक हैं, उन बच्चों में भातृत्व होता है। इस सम्बंध को इतना महत्व इसलिए पूरे संसार में मिला, क्योंकि यह कृत्रिम नहीं है। कहा जाता है और सभी लोग स्वीकार करते होंगे, भारत भर में यह बात तो बहुत जोर-शोर से कही जाती है कि पुत्र भले ही कुपुत्र हो सकता है, दूसरे सम्बंध भी बिगड़ सकते हैं। बाकी सम्बंध सहयोगी दृष्टि खो सकते हैं, किन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती। दूसरे सम्बंध, स्वजन, परिजन तमाम तरह की वाहियात बातों से जुड़ जाते हैं, दुर्गुणों और दोषों से ग्रस्त हो जाते हैं, किन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती, उसका स्तर नहीं गिरता। वह हमेशा ही अपने बच्चों के लिए बहुत उदार और बहुत समर्पित और एक मालिक जैसी महान, समुद्र के जैसी गहरे आत्मीय भाव से युक्त होती है। यही आधार है भातृत्व सम्बंध का। भाई किसी को इसलिए मानते हैं, क्योंकि जिस मां से मैंने जीवन प्राप्त किया, जिस मां के गर्भ में रहकर मैंने बाल रूप को प्राप्त किया, जिस मां के साथ रहकर मैंने अपनी अबोध अवस्था को बड़े रूप में परिवर्तित किया, उसी तरह से किसी और ने कभी किया, जिससे हमारा भातृत्व सम्बंध बना। भातृत्व का भी कारण मातृत्व ही है। मां आधार है, जो कभी भी कुमाता नहीं हो सकती। जब कारण मजबूत है, तो कार्य मजबूत होगा ही। यह नियम है कि कारण में जो गुण होते हैं, वही कार्य में आते हैं। यह दर्शन शास्त्र की पुरानी युक्ति है। तो माता में जैसे श्रेष्ठ भाव हैं, समर्पित भाव हैं, कभी भी उसमें संकुचित भाव अपने संतति के लिए नहीं आता, वह भाव स्वाभाविक रूप से भाइयों में प्रेषित होता है। भाव हैं, वासनाएं हैं, उसके लिए संस्कार हैं, जो तौर-तरीके हैं, मेरे भाई में भी आए हैं और निश्चित रूप से भाई में भी मां के जैसा ही विचार होगा, मां के जैसा ही समर्पित भाव होगा। भाई भी मां के जैसा ही दुर्गुणों से दूर होगा।
इसलिए भातृत्व को महत्व देने की पुरानी परंपरा है। यह सर्वश्रेष्ठ आधार है, अन्य सम्बंधों का आधार उतना मजबूत नहीं है, इतना बड़ा नहीं है, इतना व्यवस्थित और समर्पित नहीं है। भातृत्व का आधार संसार में सबसे सशक्त होता है। भगवान की दया से, माता के सारे संस्कार पुत्रों में आते हैं, संतति में आते हैं, तो आदमी सोचता है कि जैसी मेरी मां है, वैसे ही मेरे भाई हैं। मां जैसे जीवन भर सम्बंध का निर्वाह करती है निश्छल भाव से समर्पित होकर, वैसे ही मेरा भाई भी करेगा। मेरे लोक और परलोक दोनों का ही साधक होगा, विशेष सम्बंध वाला होगा।  
क्रमश:

Wednesday, 26 June 2013

हरिद्वार में चातुर्मास

महाराज जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज इस बार पावन नगरी हरिद्वार में विराजेंगे. निर्माणाधीन राम मंदिर परिसर वा उसके निकट ही चातुर्मास का आयोजन होगा. 22 जुलाई को इसका शुभारंभ होगा. इस काल में अनेक प्रकार के धार्मिक, सामाजिक कार्यक्रम होंगे. जल्द ही आप सभी को विस्तृत कार्यक्रम की सूचना प्रदान की जायेगी. गत वर्ष तीर्थ राज प्रयाग में चातुर्मास आयोजित हुआ था, वर्ष 2011 में इंदौर में और वर्ष 2010 में सूरत और 2009 में जयपुर में. महाराज के चातुर्मास अतुलनीय होते हैं. धार्मिक चर्चा के साथ साथ आज के आधुनिक प्रासंगिक विषयों पर भी खूब चर्चा होती है और राम भक्ति की रसधारा निरंतर प्रवाहित होती रह्ती है. महाराज के द्वार सबके लिए खुले रहते हैं, रामानंद संप्रदाय का एक तरह से यही ध्येय वाक्य है - जात पाँत पूछे नहीं कोई हरि को भजे सो हरि का होई.