Wednesday, 23 November 2011

संस्कार और दुख

कई जन्मों के संस्कार हमारी आत्मा में पड़े हुए हैं। यह तो हमारा सौभाग्य है, वे याद नहीं आते, जन्म-जन्मांतरों में हमने जो अनुभव किया, उसमें जो प्रगाढ़ संस्कार थे, जो मजबूत संस्कार थे, बस वही साथ रह जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं, ये संस्कार मन में पड़े हुए हैं, तो कुछ कहते हैं, आत्मा में पड़े हुए हैं। उनका कोई उदबोधक नहीं मिलता, उनको कोई जगाने वाला नहीं मिलता। संसार में तमाम तरह के कर्म हैं, जो पूर्वजन्म में किए गए होंगे, जिनका स्मरण नहीं होता। जाने किस-किस योनी में जन्मे होंगे, गिद्ध रहे होंगे, कभी कुत्ता रहे होंगे, कभी बिल्ली रहे होंगे, कितने चूहों को दबा दिया होगा। लोग कहते हैं कि हमने कोई पाप नहीं किया, फिर हमारे जीवन में कष्ट क्यों गया। व्यवसाय में मंदी गई, तो कई लोग सोच रहे होंगे, हमने तो कुछ नहीं किया, फिर यह मंदी कैसे गई। जरा अपने पिछले जन्म का तो ध्यान करो, भले आदमी। बिल्ली रहे होगे, जाने कितने चूहों का गला दबा दिया होगा। कितने पाप हुए, कितनी अनुभूतियां हुईं गलत, जो मजबूत संस्कार थे, वही रह गए। संस्कार यदि मजबूत हों, तभी रहते हैं, वरना मिट जाते हैं।
तभी तो कृष्ण ने कहा, ‘अंत में मेरा स्मरण करो?’
अर्जुन ने कहा, ‘अंत में कैसे होगा?’
तो कृष्ण ने कहा, ‘तब तो निरंतर स्मरण करना होगा।
जो निरंतरता, प्रगाढ़ता, अनन्यता के साथ अत्यंत श्रद्धा के साथ स्मरण होता है, वही अंतिम काल में होता है। तो हम सभी लोग भगवद स्मरण करें और अपने जीवन को धन्य बनाएं। अपने संस्कारों को सशक्त करें। भगवद स्मरण के लिए सबसे बड़ी सामग्री है कि हम भगवान की सुनें, सत्संग करें, सत्संग से कई काम होते हैं, पाप नष्ट होते हैं। आप प्रवचन सुनते हैं, ईश्वर के प्रति श्रद्धा बढ़ती है, तो मन पवित्र होता है। लगता है, आज मैंने कुछ काम अच्छा किया।

Sunday, 20 November 2011

भगवद स्मरण करें

भगवद स्मरण करें
लोग कहते हैं, हम मानवता धर्म को मानते हैं। यह कैसा धर्म है? वास्तव में भारत भूमि से जुड़ा मनुष्य जीवन सच्चा जीवन है, वैदिक सनातन धर्म से जुड़ा हुआ मनुष्य जीवन ही प्रशस्त है। सडक़ से दूर धान के खेत में कोई गाड़ी फंसी हो, तो पेट्रोलिंग वाले भी उसे कुछ नहीं बोलते, कोई मूर्ख आदमी होगा, जो गाड़ी को खेत में ले गया, फंसी रहने दो, जो गाड़ी नेशनल हाईवे पर हो, उसकी मदद की जा सकती है, लेकिन जो गाड़ी मार्ग पर ही नहीं है, उसकी मदद कौन करेगा? पश्चिम में जहां न औरत का ठिकाना, न बाप की चिंता, न भोजन की स्वच्छता न धन की पवित्रता, न दया, न संयम, यह कैसा मानवता धर्म है। भारत में तो वैदिक सनातन धर्म है, लोग सुबह उठते हैं, तो हथेली पर ही ईश्वर के दर्शन करते हैं। भगवान के नाम से सुबह की शुरुआत करता है। पृथ्वी पर पांव रखने से पहले उसे प्रणाम करते हैं, ईष्ट देव को प्रमाण करते हैं। पग-पग पर भगवद् स्मरण, यही सनातन जीवन है।
एक व्यक्ति के घर गया था, काठियावाड़ी यादव परिवार है, बहुत संस्कारी है, उनकी बेटी है कोई बड़ी पढ़ाई कर रही है, उसकी दीक्षा हो गई है। उसने पूछा, ‘गुरुजी, आप जितना बोले थे, उतना भजन नहीं हो पाता है, उतनी माला जपती हूं, जितना आपने बताया था, उतना कर लेती हूं, लेकिन रामायण नहीं पढ़ पाती हूं।’ मैंने कहा, ‘तो छुट्टी के दिन पढ़ो। इस दिन रामायण पाठ को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लो।’ रविवार को लोग रुके हुए काम निपटाते हैं, सप्ताह भर के कपड़े इत्यादि धोते हैं, उन्हें इस छुट्टी के दिन रामायण पाठ के लिए भी समय तय कर लेना चाहिए। उसने बताया, ‘दस हजार बार नाम जपती हैं,’ क्या बात है? यही सनातन धर्म है, इतना कितने लोग जपते होंगे? मैंने कहा, ‘मैं आशीर्वाद देता हूं, इसी तरह जपोगी, तो साल दो साल में पचास हजार बार जपने लगोगी।’ तो आज के युवा व बच्चे भी भगवान का नाम जपने लगे हैं। ध्यान से सुनें आप लोग, बड़े आयु वाले लोग ध्यान दें। आप लोग भी जपना शुरू करो। वरना ये बच्चे आपको घर में खांसने नहीं देंगे। बोलेंगे, सारा जीवन पेट भरने में लगा दिया, पैसा कमाया, भगवान का नाम नहीं लिया। नाम कब लेंगे?
विचित्र धर्म है, सनातन धर्म, आज भी बड़े संस्कारी लोग हैं। लोग रात-रात भर प्रवचन सुनते हैं, आप भी संस्कारी हों। उधर गिरजा घरों में आधा घंटा में सब कर्मकांड खत्म हो जाता है और उसके बाद लोग रविवार को समुद्र के किनारे जा लेटते हैं।
मनुष्य जीवन में भगवद स्मरण जरूरी है। मन का सदुपयोग करें। ज्ञानेन्द्रीयों में सबसे बड़ा क्षेत्र श्रवण इन्द्रीय का ही है। जितना हम आंखों से देखते हैं, उससे करोड़ों गुना ज्यादा कानों से सुनते हैं। सम्पूर्ण अध्ययन का काम कानों से जुड़ा है। जब अध्ययन करता है आदमी, गुरु बोलता है, शिष्य सुनता है। पुराने जमाने में गुरु सुना-सुनाकर ही याद करा देते थे। नाक से जो ज्ञान होता है, वह अत्यंत सीमित है, आंखों से जो होता है, वह भी सीमित है। कानों से जो होता है, वह असीमित है। ईश्वर को कान से सुनें, कान से ज्ञान करें। केवल पद ज्ञान ही महत्वपूर्ण नहीं है। सुनाई पडऩा ही बड़ा ज्ञान है। किसी ने कहा, ‘राम गांधी नगर जाता है।’ तो कानों से पहले ‘राम’ सुना, उसके बाद ‘गांधी नगर’ सुना, फिर ‘जाता’ सुना और फिर ‘है’ सुना। सुना, जाना और उसके बाद ही वाक्य का अर्थ समझ में आया। कान से हम सुनें, इसके बाद ज्ञान सुनें, अर्थ अनुभव करें, उसके बाद प्रवचन करें, भगवद महिमा गाएं। यह सनातन धर्म हैं।

Thursday, 13 October 2011

जात पांत पूछै नहीं कोई

भाग-दो
बिहार में मेरे एक बड़े भक्त हैं। बात बड़ी जोरदार करते हैं। होटल के मालिक हैं। खूब धार्मिक हैं, शायद ही कोई आदमी हो, जो अपनी आमदनी का चौथा भाग धर्म पर खर्च करता हो। वे करते हैं। चौथा भाग राजनीति में, चौथा भाग परिवार में और चौथा भाग व्यापार में खर्च करते हैं। राजा आदमी हैं। उन्होंने मुझे बुलाया, मैं गया। यज्ञ मंडप में उन्होंने मुझे किसी कार्य से बुलाया, कहा, 'चलिए,' मैं दंड छोडक़र चल पड़ा, तो उन्होंने कहा, 'ओह, दंड क्यों छोड़ रहे हैं, इसी को तो हम नमस्कार करते हैं, बाकी आप रामनरेशाचार्य जी तो पहले भी थे। ये दंड स्वामी जी हैं, राम जी हैं, इनको नमस्कार है, इन्हें साथ ले चलिए।' कितनी बड़ी ज्ञान की बात उन्होंने की। मैंने दंड थाम लिया। तो ऐसा है हमारा संप्रदाय। न कोई परिवारवाद, न क्षेत्रवाद, न जातिवाद, हमने वेदों की नब्ज पकड़ ली है।
जब राम जी और भरत जी निषादराज को, कोल, भिल्लों को गले लगा सकते हैं, तो रामानंदाचार्य जी रविदास को क्यों नहीं अपना सकते? आज भी लोग शुद्रों, दलितों को मुख्यमंत्री बनाने में हिचकते हैं, किन्तु रामानंद जी ने धन्ना जाट को भी ऊंचाई पर पहुंचाया, जिनको लिखना भी नहीं आता था। जो वेद मंत्र नहीं जानते थे, धर्म नहीं जानते थे, शास्त्र नहीं जानते थे, रामायण नहीं जानते थे, लेकिन राम जी को जानते थे।
हमारी भूमि शांति की भूमि है, अमरीका की भूमि नहीं है, पता नहीं आप लोग क्या देखने जाते हो अमरीका? इस मामले में काठियावाडिय़ों की प्रशंसा करनी चाहिए, वे वहां से हीरा लाने तो जाते हैं, लेकिन वहां की रोटी भी नहीं खाते, वश चले तो जल भी अपना ले जाएं, लेकिन यह संभव नहीं है। कल मैंने एक काठियावाड़ी से पूछा, आप वहां क्या करते हो? उन्होंने उत्तर दिया, 'हम अपना भोजन बनाते हैं, यहीं से बाजारा, आटा, दाल ले जाते हैं। वहां से हीरा लेकर आते हैं, पैसा कमाते हैं।'
आप लोग मुझे इतनी देर से सुन रहे हो, वहां अमरीका के लोग दो घंटा पोप को नहीं सुनते। यहां गरीबों को लालच देकर ईसाई बनाते हैं, यहां हम लोग दक्षिणा लेकर चेला बनाते हैं। दोनों में अंतर है। अभी मैंने दीक्षा दी बहुत से लोगों को, इतना सामान आया कि एक कमरे में अलग से व्यवस्था करनी पड़ रही है। मैं बतलाना नहीं चाह रहा हूं कि कहीं इनकम टैक्स का छापा नहीं पड़ जाए। भले आदमी, जो टॉफी खाकर चेला बनेगा, उसकी टॉफी गल जाएगी, तो उसका शिष्यत्व भी पिघल जाएगा। जगद्गुरु रामानंदाचार्य ने यहां जो प्रयोग किया, इसीलिए यह श्रेष्ठ भूमि है। सनातन धर्म सबको प्रेरित करने वाला धर्म है। यह सर्वश्रेष्ठ धर्म है। क्या रूप है? ईसा मसीह सलीब पर ऐसे लटके हैं, देखकर ही कष्ट होता है।
धन्य हैं, हम लोगों को मनुष्य जीवन मिला और भारत वर्ष का मनुष्य जीवन मिला। दैविक सनातन धर्म का मनुष्य जीवन मिला। वैदिक सनातन धर्म केवल ब्राह्मणों का नहीं है, केवल भारत वालों का नहीं है, किसी भी प्रकार का भेदभाव का नहीं है, सनातन धर्म सम्पूर्ण मानवता का धर्म है। भगवान ने अनादि वेदों को स्मरण किया, उन्हें दुनिया को दिया। केवल ब्राह्मणों, क्षत्रियों को नहीं, सबको दिया। जैसे चंद्रमा को दिया, वायु को दिया। बाद में कई लोगों ने वेदों को तोड़-तोडक़र अपनी पोथी बना ली, ग्रन्थ बना लिए, सब वेदों से लेने को अभिशप्त हैं। किन्तु दुनिया में जितने भी बल्ब बनेंगे, सूर्य से कमजोर ही होंगे। वायु का प्रबंध होगा, तो वह प्रबंध वायु देव के प्रबंध के आकार का नहीं होगा। जो कमरे बनेंगे, उनकी तुलना महा-आकाश से नहीं होगी। बर्तन में रखे पानी की समुद्र से तुलना होगी क्या? समुद्र की तुलना तो समुद्र से ही होगी, आकाश की तुलना तो आकाश से ही होगी। राम जी की तुलना राम जी से होगी और किसी से नहीं। रामानंदाचार्य की तुलना और किसी आचार्य से नहीं होगी, स्वयं रामानंदाचार्य जी से ही होगी। गगन से किसकी उपमा की जाए, गगन के सिवा गगन से और कोई उपमा के लायक नहीं है। सागर से किसकी तुलना की जाए, सागर से। अपनी पानी की टंकी की तुलना सागर से करेंगे क्या?
संतों ने अपने मन को ही कहा, रे मन मूरख। तो हम दूसरे को क्यों कहेंगे, अपने मन को कहेंगे। रामानंदाचार्य ने अदभुत काम किया, मानव जीवन के लिए सनातन धर्म के लिए, किन्तु यह कोई उनका अपना काम नहीं है। पुराने अभिप्रायों से उन्होंने समझा और उसका कृयान्वयन किया। सनातन धर्म में कोई नई बात नहीं कही जाती है, कहा जाता है कि अभिप्राय समझकर इन्होंने व्याख्या की, इसीलिए सभी प्रवर्तक हैं, व्याख्याकार हैं। रामानंदाचार्य जी सभी के हैं। कौन आदमी होगा, जो सत्य को नहीं मानेगा, अहिंसा को नहीं मानेगा, ब्रह्मचर्य को नहीं मानेगा। वेदों ने बड़ी बड़ी बातें कीं। केवल अपने यहां की बात नहीं है। अमरीका के राष्ट्रपति ने वाटरगेट कांड में झूठ बोला, तो अमरीकियों ने ही कहा यह आदमी वाइट हाउस में नहीं रहेगा। अर्थात वहां भी सत्यम वद को महत्व दिया गया। सत्य को ही महत्व देना होगा. हम लोगों को वेदों के आधार पर जीवन मिला है। मनुष्य जीवन जब वेदों के मार्ग पर चले, तभी सच्चा जीवन है।
क्रमशः

Tuesday, 4 October 2011

जात पांत पूछे नहीं कोई


यह ईश्वरावतार की भूमि है, ऐसी भारत भूमि हमें प्राप्त हुई। कहा जाता है, ईसाई धर्म दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है। ईसाई देश दुनिया में सबसे धनवान हैं। दुनिया का नेतृत्व कर रहे हैं, दुनिया की सारी गतिविधियों को प्रभावित करते हैं। तो जिसके पास पैसा है, वह तो बड़ा हो जाता है, सुंदर हो जाता है। ये सभी बातें आपको मालूम हैं। किन्तु काफी लंबे समय तक कोई काले रंग का आदमी संत की उपाधि प्राप्त नहीं कर सका था। अमरीका को स्थापित हुए सवा दो सौ साल से भी अधिक हो गए। ईसा मसीह को २००० वर्ष हो गए, किन्तु कैसा धर्म है कि काले लोग संत नहीं बन पाते हैं, अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, वहां काले रंग वाले को भी संत की उपाधि दी गई। यहां तो जब कहा गया कि विद्याध्ययन ब्राह्मण ही करेगा, ब्राह्मणों को ही संन्यास लेने का अधिकार होगा, ऐसा कहा शंकराचार्य जी ने। धर्म को निश्चित रूप से उनका योगदान अनुपम है, लेकिन इस बात पर उनके अनुयायियों ने ही विरोध कर दिया। इस बात का विरोध विद्वान मंडन मिश्र ने कर दिया, जो बाद में सुरेश्वराचार्य के रूप में जाने गए, सृंगेरी मठ के प्रथम शंकरचार्य हुए. कहा यह गलत है, जिसे जेनऊ का अधिकार है, उसे वेदाध्ययन करने का अधिकार है, संन्यास लेने का भी अधिकार है। तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, तीनों संन्यासी बनने लगे। दशनाम की परंपरा है, संन्यासी में भी दो विभाग हैं एक तो दंड वाले लोग और दूसरे दशनाम हैं। जो दंडी नहीं हैं। बिना दंड के हैं, जैसे महामंडलेश्वर इत्यादि। यह सनातन धर्म है, यहां ऐसे गुरु हैं, जिन्हें शंकराचार्य कहा जाता है।
कुछ वर्ष पहले दिल्ली में विशाल मंदिर अक्षरधाम बना, बड़े-बड़े नेता आए, राष्ट्रपति आये और संभवतः आडवाणी जी ने कहा कि यह देश का एक बड़ा पर्यटन स्थल होगा। यह बात बिल्कुल वैसी ही है जैसे कोई किसी दूल्हे को कहे कि तुम्हारी नाक टेढ़ी है, तू बड़ा कुरूप लगता है, तो दूल्हे के संग बाराती दमदार होंगे, तो बिना मारे नहीं छोड़ेंगे। दूल्हा विष्णु है, उसकी नाक टेढ़ी होती है क्या? यदि मैं दूल्हा होता और ऐसे कोई मुझे बोलता, तो शादी होती न होती, जेल भले चले जाता, लेकिन बिना मारे नहीं छोड़ता। नेताओं ने मंदिर को कहा कि देश का बड़ा भारी पर्यटन स्थल बन गया। किन्तु वो शंकराचार्य कैसे थे, जिन्होंने चार मठों की स्थापना की, जिन्हें दुनिया सबसे बड़ा मठ मानती है। विशाल बगीचा लगा देने से, खूब सजा देने से या आलीशान भवन बना देने से मठ नहीं बनते। जहां सत्य चिंतन हो, जहां संयम, नियम सिखलाया जाए और शास्त्रों का अध्ययन कराया जाए, उसे मठ कहते हैं। मठ में केवल मंदिर से नहीं चलेगा, मठ में केवल गोशाला से नहीं चलेगा। मठ का अपना स्वरूप है, विद्यालय वहां न हो तो कोई बात नहीं, वहां जो बड़े संत होते हैं, उनके पास बैठकर जिज्ञासाएं शांत होती हैं, जिन्हें देखकर ही शांति मिलती है, भक्ति भाव उत्पन्न होता है, ऐसा हो, तभी मठ बनता है। जहां अध्यात्म शास्त्र के जिज्ञासुओं को रखा जाए, धर्म शास्त्र पढ़ाया-सिखाया जाए, भोजन कराया जाए, वह मठ है।
मधुसूदन सरस्वती के माध्यम से मैं बताना चाहूंगा कि यदि कोई भगवान की भक्ति करता है, तो सारे वेदों के वाक्य उस भक्त के जीवन में उतरते हैं, ईश्वर कृपा से अंत:करण की पवित्रता संपादित होती है, दिव्य भाव उनके हृदय में उतरते हैं, उनका साक्षात्कार उतरता है। जीवन धन्य हो जाता है।
मैं ध्यान दिलाना चाह रहा हूं कि अगर भारत में भी यह होता कि काले रंग वाले को ईश्वर प्रेम का अधिकार नहीं होगा, तो तमाम पंडित लोग जो काले हैं, वे छंट जाते हैं, क्षत्रिय छंट जाते। किन्तु ब्राह्मणत्व का सम्बंध रंग से नहीं है, आचार-आकृति से नहीं है। रंग का भेद उस पश्चिम में है, जहां छुआछूत को मिटाओ की पढ़ाई कराई जाती है, जहां भारत को छुआछूत वाला देश माना जाता है, जहां भारत को पिछड़ा हुआ बताया जाता है। उसी भारत में स्वामी रामानंदाचार्य जी ने साफ कहा की जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई। सर्वे प्रपत्ते: अधिकारिणो मता:। अर्थात ज्ञान, कर्मयोग आदि से रहित व्यक्ति भी यदि शरण में आ जाए, तो ईश्वर उसे अंगीकार करते हैं। इस भक्ति में कोई विशिष्ट अर्हता या पात्रता नहीं होती।
तुलसीदास ने लिखा है कि भरत जी निषादराज से वैसे ही मिल रहे हैं, जैसे लक्ष्मण जी से मिलते थे। ऐसा द्वापर या कलयुग में नहीं, उस समय हुआ, ईसाई धर्म का अता-पता नहीं था। निषादराज पवित्र हैं, भक्ति के परम पावन रूप ने उन्हें इतना पावन बना दिया, दिप्तीमय बना दिया कि उनमें कहीं कोई दुराभाव नहीं रहा। निषादराज का रंग कुछ भी हो सकता है। कितना भी आदमी सुंदर हो गोरा हो, धूप में रहेगा तो सांवला हो जाएगा, यज्ञशाला में रहेगा, तो सांवला हो जाएगा। गोरे होने का क्या महत्व है? यह तो केवल शरीर का मामला है। स्वामी जी ने इस मामले को बहुत परिष्कृत किया। रामानुजाचार्य जी भक्ति के बड़े आचार्य माने जाते हैं, लेकिन वहां भी शुद्रों को भक्ति करने से रोका गया। शुद्र को शास्त्र पढऩे का अधिकार नहीं दिया गया। किन्तु रामानंदाचार्य जी ने शुद्रों को भी भक्ति का मार्ग दिखा दिया। दूसरे संप्रदायों को भी देखिए।
वल्लभाचार्य जी की सभी गद्दियों पर उनके परिवार के लोग ही विराजमान हैं। उनके परिवार के लोग ही गद्दी पर जमे हैं। दूसरी जाति वालों से पैसे तो लेते हैं, लेकिन गद्दी पर उनके बच्चे ही बैठते हैं। उनकी गद्दी पर दूसरा कोई ब्राह्मण, उनकी ही बिरादरी के ब्राह्मण भी नहीं बैठ सकते। गद्दी पर वंश चल रहा है। कहीं किसी को सिद्धी नहीं हो, तो गोद ले लेते हैं, किन्तु गद्दी छोड़ते नहीं। निम्बाकाचार्य संप्रदाय की तो एक ही गद्दी है, वृन्दावन में होनी चाहिए थी, किन्तु उनके उत्तराधिकारी गद्दी ले गए राजस्थान, अपनी जन्मभूमि।
हमारे श्रीमठ में पांच किलोमीटर के दायरे में रामानंद जी का क्षेत्र था। औरंगजेब में तुड़वा दिया, कब्जा हो गया, अभी मठ का बहुत छोटा-सा हिस्सा बचा था, अरविंद भाई मफतलाल समूह व रामानंद संप्रदाय के अन्य महंतों, भक्तों, विद्वानों ने श्रीमठ को संभाला। कभी आप वहां जाओगे, तो देखोगे, वह कोई बड़ी जगह नहीं है, किन्तु वह रामानंद जी का मूल स्थान है, वहीं से हम लोग राम भक्ति की गर्जना करते हैं, तो हर जगह सम्मान मिलता है। यदि मैं बोलूं कि मेरा जहां जन्म हुआ था, वहीं श्रीमठ को ले चलता हूं, तो यहां जो रामानंदी महंत हैं, वो तो बहुत नाराज हो जाएंगे। बोलेंगे कि हम आपको दंडवत इसलिए नहीं कर रहे थे कि आप श्रीमठ को अपनी जन्मभूमि ले जाओ, दंडवत इसलिए कर रहे थे कि आप श्रीमठ में झाड़ू लगाते हो।
क्रमशः
--महाराज के एक प्रवचन से --

मीडिया में महाराज

(राजस्थान पत्रिका में रविवार को महाराज जगदगुरु के सम्बन्ध में २ अक्टूबर को प्रकाशित सामग्री)
संस्कृत का संरक्षण मेरा उद्देश्य
बारह साल की उम्र में बिहार के भोजपुर से अपना गांव परसिया छोड़कर साधु बने स्वामी रामनरेशाचार्य संस्कृत में निरंतर लुप्त हो रही हजारों साल पुरानी न्याय दर्शन, वैशेषिक और वैष्णव दर्शन की परंपरा को पुनर्जीवित करने में लगे हुए हैं। काशी की विद्वत परंपरा के विद्वान आचार्य बदरीनाथ शुक्ल से 10 वर्षो तक विद्याध्ययन करने के बाद रामनरेशाचार्य ने ऋषिकेश के कैलाश आश्रम में बिना किसी जाति-पांति व वर्ग का भेद किए हजारों विद्यार्थियों व साधुओं को न्याय दर्शन, वैशेषिक और वैष्णव दर्शन पढ़ाया। संस्कृत के दुर्लभ व लगभग अप्राप्त ग्रंथों का प्रकाशन कर रामनरेशाचार्य ने विलुप्त होते अनेक ग्रंथों को भी बचाया है।
अपने जीवन के छह दशक पूरे कर रहे रामनरेशाचार्य काशी में जगद्गुरू रामानंदाचार्य के मुख्य आचार्य पीठ "श्रीमठ" में 1988 से "जगद्गुरू रामानंदाचार्य" के पद पर अभिषिक्त होने के बाद भी अनेक देशी-विदेशी छात्रों को संस्कृत मे निबद्ध भारतीय दर्शन की जटिल शास्त्र प्रक्रिया को निरंतर सहज रूप से पढ़ा रहे हैं। देश के अनेक क्षेत्रों में संस्कृत विद्यालयों की स्थापना कर रामनरेशाचार्य विद्यार्थियों को सारी सुविधाएं भी निशुल्क ही उपलब्ध करवाते हैं। आदिवासी क्षेत्र में रामनरेशाचार्य ने संस्कृत की एक ऎसी अलख जगाई है कि वहां स्थापित विद्यालयों में हजारों छात्र समान रूप से बिना किसी भेद-भाव के संस्कृत पढ़ रहे हैं।

Saturday, 1 October 2011

गलत लोगों का बहिष्कार हो

भ्रूण हत्या केवल समाज का संतुलन ही नहीं बिगाड़ रही है, केवल शादी की समस्या ही नहीं पैदा कर रही है, आतंकवाद का विस्तार भी कर रही है, जो दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है। विचार के क्रम में मेरे मन में यह भाव भी आया कि लंका में सारे दुराचार होते थे, लूट, अत्याचार, व्यभिचार, अपहरण, लेकिन भ्रूण हत्या नहीं होती थी, आपस में वहां भाईचारा था। विभिषण का भी सम्मान था, कुम्भकर्ण का भी सम्मान था। हां, लंका में भोग की वृत्ति गलत थी।
वैसे अपने राष्ट्र में कन्या द्रोह पुराना है। राजा लोग, क्षत्रिय लोग लड़कियों को विष चटा देते थे कि किसी के सामने सिर नहीं झुकाना पड़ेगा। लडक़ी हो जाए, तो सिर झुकाना पड़ता है। राम राज्य में यह परंपरा नहीं थी। अपने देश में इंदिरा गांधी भी हुई। कहा गया, नेहरू वंश में इतनी बदसूरत, लेकिन बाद में अक्लमंद संतति उत्पन नहीं हुई। इंदिरा जी के साथ रही महिला ने उनकी जीवनी लिखी, जब उन्होंने इंदिरा की सूरत के बारे में लिखा, तो लोगों ने विरोध नहीं किया। कभी सूरत से कम रही, अक्लमंद लडक़ी विश्व की सबसे बड़ी व शक्तिशाली महिला हुई। इतने बड़े लोकतंत्र की प्रधानमंत्री रहीं। आज इंदिरा जी जैसे लोगों की जरूरत है देश को। यहां कविता पाठ करने वाला प्रधानमंत्री और केवल हिसाब-किताब करने वाला ही नहीं चलेगा। जिसकी राजनीति में गहरी पैठ नहीं है, संगठन में गहरी पैठ नहीं है, जो देश की नब्ज नहीं समझता, वह कभी सफल नहीं होगा। देश को ऐसा नेता चाहिए जो जरूरत हो, तो दो हाथ भी जमा सके।
वैसे मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि कन्या भ्रूण हत्या पर राष्ट्र को शर्म है। यह व्यक्ति का शर्म नहीं, जिला या राज्य का शर्म नहीं है, यह राष्ट्र का शर्म है। मैं बोलता हूं, यह मानवता का शर्म है। सम्पूर्ण मानवता इसके माध्यम से आतंकवादी होती जा रही है। इसे छोड़ा नहीं जा सकता कि होती है, तो होने दो। मैं इस दिशा में काम कर रहा हूं। जितने लोग हमारे साथ जुड़े हुए हैं, उनके बीच ही हम प्रचार कर रहे हैं। लोग हमारे पास आते हैं, महाराज, दो बेटियां हैं, एक बेटा हो जाता, तो हम लोग प्रयास करते हैं कि सनातन धर्म की दृष्टि से मांगने वाला का भला हो जाए। शर्त भी रखते हैं कि हमारे प्रयास के बावजूद फिर बेटी आ गई, तो उसकी हत्या नहीं होगी। ईश्वर ने बेटा नहीं दिया, तो क्या हो सकता है, जो दिया है, वह स्वीकार हो। मैंने कह रखा है कि हमसे जुड़ा कोई आदमी भ्रूण हत्या में जुड़ा, तो हमारे सामने न आए। ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। हत्यारे आपके बगल में बैठे हों, तो आप तो हत्या के समर्थक हो गए न। हमारे सम्पर्क में देश के कई बड़े-बड़े बाहुबली हैं, जिन्होंने अरबों रुपयों कमाए हैं, मैं उन्हें भी कहता हूं, मुझे आपका एक रुपया भी नहीं चाहिए और आपसे सम्बंध भी नहीं चाहिए। हिंसा भाव, हत्यारों और अपराधियों से राम जी सबको दूर ही रखें, तो अच्छा है।
-समापन-

घर घर आतंकवाद

भाग २
भ्रूण हत्या से चिंता यह नहीं है कि लड़कियों की संख्या कम होगी, तो लडक़ों की शादी कैसे होगी। शादी जरूरी नहीं है, सौ में से २० लोग ही शादी की योग्यता वाले हैं। जो योग्य नहीं, वे शादी क्यों करते हैं, शादी उसी को करना चाहिए, जिसकी जेब में पैसे हों, जो स्वस्थ हो। पुराने जमाने में सभी लोगों की शादी नहीं होती थी। बहुत पुरुष कुंवारे रह जाते थे, अभी भी हरियाणा वगैरह में प्रथा चल रही है, पांच भाइयों में एक भाई शादी कर रहा है, क्योंकि पाचों शादी करेंगे, तो सबके बच्चे होंगे, विभाजन हो जाएगा, संपत्ति बिखर जाएगी। संपत्ति बिखर जाएगी, तो परिवार का कुटुंब का सम्मान चला जाएगा। इसलिए कई परिवारों में शादियां कम होती हैं।
असली बात पर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है। दुनिया में आतंकवाद सबसे बड़ी समस्या है, लेकिन दुनिया में एक प्रतिशत भी गुंडे और आतंकवादी नहीं हैं, लेकिन भ्रूण हत्या के माध्यम से हर घर में आतंकवादी पनप रहे हैं। अपनी संतान को जिसने मार दिया, वो दूसरों को मारने वालों से भी बड़ा अपराधी है। अपने बेटी का कोई मर्डर करता है, तो मर्डर करने वाला दूसरों को मर्डर करने वाले से ज्यादा बड़ा अपराधी होता है। हिंसा की भावना बहुत प्रबल होती है, तभी अपने से सम्बंध रखने वालों को मारना संभव होता है। एक बार भ्रूण हत्या हो गई, तो पूरा परिवार उसमें सम्मिलित होता है। पति राजी होता है, घर का मुखिया राजी होता है। सब मिलकर कन्या भ्रूण हत्या करते हैं, ऐसे लोगों में कभी भी राम भाव आने वाला नहीं है। जिस मां को मातृ देवो भव: कहा, जिस पिता को पितृ देवो भव: कहा, अगर दोनों की सहमति से मर्डर हुआ है, तो मंदोदरी देवो भव: हो गया, रावण देवो भव: हो गया। मैंने सुझाव दिया कि राष्ट्र जैसे चुनाव का खर्च सरकारी स्तर पर उठाने की सोच रहा है। ठीक उसी तरह कानून बनाया जाए, ऐसा कानून हो कि जितनी लड़कियां होंगी, सरकार शादी करवाएगी। इससे कन्याएं भी बचेंगी और पैसा भी बचेगा। कन्या भू्रण हत्या के आतंकवाद का फैलाव होता जा रहा है। एक बार जो इस तरह की हिंसा करेगा, वह सामान्य जीवन का, सुंदर जीवन का, प्रेमी जीवन का आदमी बन ही नहीं सकता। इस पर ध्यान दिया जाए। समस्या का समाधान यह भी होगा कि हर दो-चार साल बाद एक बार अल्ट्रा साउंड सभी औरतों का हो जाए, जिसने नहीं कराया, उसकी जय जयकार और जिसने कराया है, उसे तुरंत आजीवन कारावास। यदि ऐसा हो जाए, तो तुरंत भ्रूण हत्या रुक जाएगी। रही बात दहेज की, उसका समाधान कन्याएं कर ही रही हैं। दुनिया भर में लड़कियां काम कर रही हैं। अभी ममता बनर्जी ने जो किया, लगता नहीं था कि कम्युनिष्ट हटेंगे, ममता का कितना अपमान हुआ होगा, उसे समाप्त करने की कितनी चेष्टा हुई होगी, लेकिन वह नहीं झुकी। वामपंथियों को हरा दिया। आज की स्थिति में देश की सबसे बोल्ड महिला का नाम ममता बनर्जी है। वामपंथियों का पुराना शासन उखड़ गया, ऐसे वामपंथी, जो ऊपर से त्यागी और अंदर से भोगी थे। दुनिया के गरीबों एक हो जाओ बोलकर लूटते थे, मजदूरों के भले के लिए काम नहीं करते थे। रोजगार बढ़ाने के लिए काम नहीं करते थे।

Thursday, 29 September 2011

मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि

भ्रूण हत्या, पहला - भाग
आज कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ी समस्या है। हम मानते हैं कि हत्या होनी ही नहीं चाहिए, क्योंकि जो जीवन दान है, वह हमारे द्वारा नहीं होता है, चाहे कीट का जीवन हो या पतंग का जीवन हो। यहां तक कि हम गेहूं, चावल भी स्वयं नहीं बना पाते हैं, हम केवल बीज डालते हैं, सींचते हैं, उसमें फूल स्वत: आता है, फल आता है। जो बनाता है, उसी को नष्ट करने का अधिकार है। रोटी हम बनाते हैं, बिल्ली आदि से उसकी रक्षा करते हैं, हम उसको खा जाते हैं या लोगों को खिला देते हैं। तीनों काम हुआ, उत्पादन, पालन और संहारण, इसलिए हम रोटी के स्वामी हैं। स्वामी को अधिकार है। मकान बनाया हमने, तो स्वामी उसका कोई दूसरा होगा क्या? इस संसार में एक भी ऐसा मनुष्य शरीर नहीं है, जो मनुष्य बनाता हो। गर्भाधान संस्कार हुआ, उसके बाद कौन-सी शक्ति है जो ७२ हजार नाडिय़ों को बनाए, ईश्वर ने निमित्त बनाया, माता और पिता के गुणों का संयोजन हुआ, लेकिन शरीर की जो संरचना है, कहां नाक, कहां कान, कहां मुंह, कहां मस्तिष्क , कैसे रक्त जा रहा है, कहां वायु का मार्ग और कहां से पानी जा रहा है। इसमें से एक भी उत्पादन मनुष्य नहीं करता। आत्मा के साथ शरीर का जो संयोग है, वह मुनष्य के लिए संभव नहीं है। इसलिए वेदों ने यह नहीं कहा कि ब्राह्मण को मारो, क्षत्रिय को नहीं मारो, वेदों ने कहा, किसी भी प्राणी को नहीं मारो।
मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि अर्थात किसी भी प्राणी को नहीं मारो। यह वाक्य है हिंसा के विरुद्ध, ऐसा कोई दूसरा वाक्य नहीं है, पूरी दुनिया के साहित्य में नहीं है।
अपने यहां एक कथानक सुनाते हैं लोग, जिसने पूर्वजन्म में तितली को कांटे चुभोए थे, उसे सूल पर बैठना पड़ा। हमारे यहां ऐसा प्राचीन संविधान है। बहुत स्पष्ट उदाहरण है। मारने से तो पाप है ही, उसके अनुमोदन से भी पाप लगता है। दुनिया में एक ही कानून है, आपको मैं गाली दूं, आप कब तक मेरी वंदना करेंगे। जैसा हम आपके साथ करेंगे, वैसा आप हमारे साथ करेंगे। हम आदर करेंगे, आदर मिलेगा। संसार में ध्वनि भी लौटती है। जैसी ध्वनि आप उत्पन्न करेंगे, वैसी ही ध्वनि आप तक लौटेगी। राम को पुकारेंगे, तो राम लौटेंगे, रावण को पुकारेंगे, तो रावण ही लौटेगा। मारने का अधिकार किसी को नहीं है, जो मारेगा उसे दंड मिलेगा। इसलिए यहां तो किसी को वाणी से भी नहीं मारा जाता, मन से भी नहीं मारा जाता, शरीर से मारने की बात भूल जाइए, क्या बात है। आज भी भगवान की दया से अपने यहां सिखाया जाता है कि पता नहीं, कौन ऋषि, महर्षि हो। पहले वृंदावन में किसी भी चीज को नहीं मारते थे। वृक्ष काटने को भी पाप ही कहते हैं, आजतक दुनिया में कोई भी वृक्ष काटने वाला बड़ा आदमी नहीं हुआ। लकड़ी बेचकर लकड़ी वाले थोड़े दिन तक पैसे वाले हो जाते हैं, कुछ ही साल बाद नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि जीवित वृक्ष को जो काटेगा, उसका तख्तापलट हो जाएगा। यहां यह बात सबको पता है। हमारे मठ के प्रबंधक ने एक दिन कहा कि मैं आम के वृक्ष को काटने आऊंगा, आप मुझे रोकना। मैंने कहा, आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं, उन्होंने कहा, आम के पेड़ को डराना है, कई साल हो गए फलता ही नहीं है। वो आए कुल्हाड़ी लेकर लगे बोलने कि काटो इस पेड़ को, बेकार हो गया है, फलता ही नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है, तीन-चार साल हो गए फल ही नहीं रहा। मैंने कहा, मत काटिए, इनको एक बार मौका दीजिए। ऐसा नाटक हुआ कि अगली बार आम इतना फला कि मत पूछिए। वृक्ष में प्राण होते हैं, संवेदना होती है, वह डरता है, वह लोभ भी करता है, उसमें भी आत्मा है, यह आज की बात नहीं है। हमारे यहां कहा जाता है कि कोई अमुक काम करेगा, तो अगले जन्म में ये वृक्ष होगा, अमुक काम करेगा, तो वो वृक्ष होगा।
वह कैसा समाज होगा, जहां किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होगी। जिस समाज में किसी की हत्या की भावना नहीं होगी। व्यभिचार नहीं होगा, किसी प्रकार का अत्याचार नहीं होगा। शोषण नहीं होगा, दुख नहीं होगा।
क्रमश:
जगदगुरु के एक प्रवचन से

हर कोई अपनी संपत्ति बताए

भ्रष्टाचार को खत्म करना है, उसके खिलाफ आंदोलन करना है, तो आंदोलन करने वालों को सबसे पहले अपनी संपत्ति बतानी चाहिए। संपत्ति कितनी है, कैसे बढ़ी, कितनी बढ़ी है, कहां बढ़ी। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है, यह तरीका सही है। शरीर अचानक बढ़ जाता है, तो डॉक्टर पता लगाते हैं कि शरीर क्यों बढ़ा है, शक्ति बढ़ गई है या कोई और कारण है। उसके लिए डॉक्टर जांच करते हैं। जांच मेरी भी होनी चाहिए, पहले साइकिल भी नहीं थी, किन्तु बाद में पैसा कहां से आया, श्रीमठ में मार्बल, ग्रेनाइट लगने लगा। देश में हर आदमी को अपनी आय बतानी चाहिए। छोटा महंत भी बताए, सेठ भी बताए, रामानंदाचार्य भी बताएं, रामदेव जी को भी बतलाने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं, तो शंका के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। वैसे भी संन्यासी का जीवन खुला होता है, कुछ भी छिपा नहीं होता। जैसे संपत्ति आई है, आप डंके की चोट पर बताइए, कहां से आई, गलत आई है, तो आप सुधार कीजिए।
संपत्ति की जांच से किसी को घबराना नहीं चाहिए, किन्तु चोर की दाढ़ी में तिनका होता है। पुलिस वाले पूछते भी नहीं हैं कि चोर के पैर हिलने लगते हैं। मैंने पुलिस वालों से पूछा कि आप चोरों को भीड़ में से कैसे पकड़ लेते हो, जवाब मिला कोई कठिन बात नहीं है, हमें सामने देखते ही उनके हाव-भाव बदल जाते हैं, पैर हिलने लगते हैं। जैसे ओझा को देखते ही भूत चिल्लाने लगता है। जो सही वह कभी नहीं घबराता।
हर किसी का उत्तरदायित्व होना चाहिए। आप देश की सुविधाओं का उपयोग वैसे ही करते हैं, जैसे आम आदमी करता है, आपके लिए अलग से कुछ नहीं है, पूरा भारतीय संविधान आप पर लागू होता है। संपत्ति के मामले में हर किसी को साफ-सुथरा होना चाहिए। जिसको भी आंदोलन में उतरना है, वह पहले अपना दामन साफ रखे।
यह कोई कांग्रेस की बात नहीं है, यह नीति की बात है। भ्रष्टाचार के मामले में रामराज्य के सूत्र को अपनाया जाए। जिसके आचरण में पवित्रता नहीं होगी, उसका अर्थ पवित्र नहीं होगा और जिसका अर्थ पवित्र नहीं होगा, उसका आचरण भी पवित्र नहीं होगा।
(जगदगुरु के एक प्रवचन से)

Wednesday, 28 September 2011

कैसे दूर होगा भ्रष्टाचार?

सीबीआई जांच या कुछ लोगों को जेल भेजने से भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा। यह भावना आनी चाहिए कि भ्रष्टाचार नहीं करके भी हम बड़े हो सकते हैं। जब तक यह विवेक जागृत नहीं होगा कि भ्रष्टाचार करने के बाद क्या कुफल होगा, तब तक भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा। किसी भी अच्छी चीज को देखकर, सुदर्शन पुरुष या सुंदर स्त्री को देखकर मन जाता है, अच्छा मकान देखकर भी मन बहकता है, किसी का सम्मान हो रहा हो, तो अपने मन को भी लगता है कि अपना भी सम्मान होता। यह भावना स्वाभाविक है, लेकिन इस भावना को नियंत्रित अनुशासित करने के लिए विवेक जरूरी है। यदि हम चरित्र सम्बंधी भ्रष्टाचार की बात करें, तो स्त्री और पुरुष का परस्पर आकर्षण स्वाभाविक है, उनकी जो संरचना है, उसे भगवान ने ही बनाया है। पुरुष का आकर्षण महिला के लिए, महिला का आकर्षण पुरुषों के लिए स्वाभाविक है।
जब धर्मराज युधिष्ठिर की अंतिम परीक्षा चल रही थी, ऋषियों ने उनसे पूछा, 'आपकी मां सुन्दर है, कभी मन आपका जाता है या नहीं जाता। धर्मराज ने उत्तर दिया, जाता है, ईश्वर ने मन ही ऐसा बनाया है, किसी का अच्छा मकान हो, सम्मान हो, तो मन होता है कि अपना भी होता। इसमें कोई बुराई नहीं है। फिर मैं बोलता हूं कि धर्मशास्त्र में क्या लिखा है, मां हैं, ईश्वर हैं, इन्होंने ही जन्म दिया है, ये भोग के साधन नहीं हैं, मल-मूत्र धोया है, इनको दर्जा वह प्राप्त है, जो सीता और सावित्री को प्राप्त है। इनके चरण छूऊंगा तो कल्याण होगा। जब समझाते हैं, तब मन बोलता है - गलती हो गई, क्षमा कीजिये।
यहां हम आए हैं, यह भवन बहुत अच्छा है, मन करे कि यह भवन हमारे मठ का ही हो जाता। किन्तु राम जी का यह अर्थ नहीं है कि आप जहां जाएं, वह भवन, भूमि, वस्तु आपकी हो जाए। इसलिए भ्रष्टाचार को रोकने के लिए विवेक आवश्यक है। मन कहां नहीं जाएगा, किसी भी वस्तु पर जाएगा, खाने की वस्तु पर जाएगा, स्त्री पर जाएगा, लेकिन उसको रोकने का जो तरीका लोकतंत्र में है, दंड है, संविधान है, उसकी पालना होनी चाहिए। लोकतांत्रिक भाव में वृद्धि होनी चाहिए। रामभाव का भी प्रचार होना चाहिए। लोगों में विवेक जागृ़त हो। संस्कार सदियों से चले आ रहे हैं, स्त्रियों में बहन को बहन, मां को मां, बेटी को बेटी, पुत्रवधू को पुत्रवधू मानने का संस्कार चला आ रहा है। किसी स्त्री को आप क्या मानेंगे, यह किसी संविधान में नहीं लिखा है, किन्तु मानने का संस्कार तो अनादि काल से चला आ रहा है। मां अपने बड़े बेटे को गले से लगा लेती है, वह भाव भिन्न होता है। मां गले लगाती है, तो लगता है, जैसे ईश्वर ने गले लगा लिया। कितना भी बड़ा बच्चा हो, मां को ध्यान ही नहीं है, वह बच्चे को गले लगा लेती है। स्त्री किसी दूसरे या अनजाने व्यक्ति को गले नहीं लगाती। यह संविधान की बात नहीं है, यह विज्ञान की बात भी नहीं है। जिन मूल्यों की अनादिकाल से स्थापना हुई थी कि मां मां है, बहन बहन है, बेटी बेटी है, उन्हीं मूल्यों व विवेक के कारण भाव में बुराई नहीं पनपती, भाव अच्छाई पर बने रहते हैं। मैं बतलाना चाह रहा हूं कि तमाम जो बुराइयां पनप रही हैं, जाति, धर्म, समाज, परिवार में, सबके समाधान के लिए लोकतांत्रिक प्रयास होने ही चाहिए, यह गलत नहीं है। कानून हो, दंड हो, रोकने के उपाय हों, किन्तु पापों व भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए विवेक का होना परम आवश्यक है।
(जगदगुरु के एक प्रवचन से)

Tuesday, 27 September 2011

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ

हम संसार को अनादि मानते हैं। मनुष्य अनादि काल से विकास के लिए जुटा है। विकास के प्रयास में ज्ञान भी संसाधन है। बल भी संसाधन है। विकास में हमारा व्यवहार, परस्पर सौहार्द्र और प्रेम भी संसाधन है। विकास की जो भावना है, वह हम सब लोगों में है। हम ब्रह्म के अंश हैं, ब्रह्म का स्वभाव ही विकासशील है। जो निरंतर विकासशील हो, वही ब्रह्म है, जो महान है, वही ब्रह्म है। हमारे मन में भी विकास की भावना निरंतर है, हमारा, ज्ञान बढ़े, सुंदरता बढ़े, लोग इसमें लगे रहते हैं, परिवार बढ़े, कीर्ति बढ़े, व्यवहार भी बढ़ाता है, पहचान भी बढ़ती है। विकासशील स्वभाव को सही तरीके से नहीं समझने की वजह से ही भ्रष्टाचार में संसार लिप्त हो गया है।
इसी क्रम में मैं कहना चाह रहा हूं कि विकास के इस भाव के साथ जुडऩे के बाद सतत विकास की भावना ऑटोमेटिक है। विकास के लिए मैं रामराज्य का एक उदाहरण देना चाहूंगा। एक वृतांत सुनाना चाहूंगा। जब भगवान श्रीराम मान गए कि भरत जी जो कहेंगे, वहीं करूंगा। भरत जी ने कहा कि आप जो कहेंगे, मैं वही करूंगा। भरत जी पहले मना रहे थे कि भइया राम, आप राजा बनें, मैं जंगल में रह लेता हूं, या दोनों ही जंगल में रह लेते हैं। आप जैसे खुश हों, वैसा हम करने के लिए तैयार हैं। भरत जी ने कहा कि चरण पादुका दे दीजिए। उसी को राजा मानकर राज्य चलाऊंगा। तो भरत जी ने पहले सारे प्रयास किये कि राम जी लौट चलें। जिस तरह से अनुपम प्रयास भरत जी ने राम जी को मनाने के लिए किये, वैसा इतिहास में पहले भी नहीं था और वह भविष्य में भी तभी होगा, जब राम जी फिर प्रकट होंगे। राम जी जैसे राम जी हैं और भरत जी जैसे भरत जी। गगन के समान दूसरा गगन नहीं है, राम के समान दूसरे राम नहीं हैं।
यहां भ्रष्टाचार के सम्बंध में मैं एक संदेश राम चरित्र के माध्यम से देना चाह रहा हूं। जब चरण पादुका मिल गई, भरत जी आश्वस्त हुए कि १४ वर्ष बाद राम जी आएंगे। तब तक उनकी चरण पादुका को ही राजा मानकर समय व्यतीत करूंगा, प्रतीक्षा करूंगा राम जी के आने की। भरत जी चरण पादुका को सिर पर रखकर खड़े हैं। राम जी ने सोचा कि सब हो गया है, भरत जी जा नहीं रहे हैं। बाद में उनको ध्यान आया कि भरत पूछ रहे हैं कि १४ साल तक चरण पादुका राजा रहेगी, मैं सेवक रहूंगा। राज ऐसे ही नहीं चलता है, राज चलाने का कोई सूत्र भी तो बताइए ताकि राज्य रामराज्य के अनुकूल चले। आप आएं, तो राम राज्य की नींव भरी भराई मिले। कहना चाहिए कि रामराज्य की संस्थापना राम जी ने नहीं की, यह काम भरत जी ने किया। रामराज्य का सारा भवन तैयार करके भरत जी ने रखा था। १४ साल कम नहीं होते। आज के एक लोकसभा कार्यकाल से लगभग तीन गुना ज्यादा समय होता है। आखिर वह क्या सूत्र है, जिसका पालन लोग करें, तो कहीं कोई भ्रष्टाचार नहीं होगा। भ्रष्टाचार कैसे दूर होगा, यह समस्या पूरी दुनिया की है। एक आदमी को जो ज्यादा कमाने वाला है, अपने बच्चों को अपनी पत्नी को अपने चहेतों को, परिवार को ही उपकृत करता है। सम्मान देना, सुविधा देना, घुमाना। भ्रष्टाचार के विरुद्ध क्या सूत्र है? भ्रष्टाचार कहां से शुरू होता है? महंतों में भ्रष्टाचार की बात सुनेंगे, तो आप हैरान हो जाएंगे, महंत जी के लिए बहुत प्रकार के व्यंजन बन रहे हैं और ठाकुर जी को खिचड़ी भोग लगा देते हैं। यह तो . राजा वाले भ्रष्टाचार से भी ज्यादा भ्रष्टाचार है। बहुत से लोग राजा को भी सैल्युट मारते होंगे, करुणानिधि को भी और मैडम को भी। . राजा के साथ बड़े-बड़े लोग थे, किन्तु पूरा का पूरा बड़ा घोटाला हो गया।
तो राम जी ने सूत्र दिया भरत जी को। कैसे चलेगा राम राज्य? राम जी ने कहा,
'मुखिआ मुखु सो चाहिऐ, खान पान कहुं एक।
पालइ-पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक।।
मुखिया को मुख के समान होना चाहिए। यह तो बिलकुल लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं दृष्टांत: हो गया। एक ऐसा उदाहरण, जो हर मूर्ख को भी समझ में आएगा और विद्वान को भी। खाता मुंह है, लेकिन जो ऊर्जा बनती है, वह अपने पास नहीं रखता। बालों को देता है, रोमों को देता है, हाथ को पैर को देता है, नाक, कान को देता है, हर अंग को देता है। यदि सारी ऊर्जा अपने पास रख लेता, तो राक्षस जैसा मुंह हो जाता। बाकी अंगों को पता ही नहीं चलता। तो मुखिया मुख सो चाहिए। हर आदमी को कपड़ा, अनाज चाहिए, संसाधन चाहिए, लेकिन आप दूसरे सहयोगियों का हिस्सा भी अपने में ही लगा लेंगे, तो आपके जीवन में रामराज्य नहीं आएगा, परिवार में नहीं आएगा। भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े उदाहरण रहे हैं, आप लोगों को ध्यान होगा कि किस तरह से भ्रष्टाचार फैला है, भ्रष्ट लोग अपने भाई को ही वह नहीं दे पाते हैं, जो उन्हें मिलना चाहिए, अपने पड़ोसी, अपने रिश्तेदारों को भी नहीं दे पाते हैं। एक ही उदाहरण है, मुखिया मुख सा चाहिए। मुख से बड़ा कौन होगा, मनुष्य जीवन सबसे अच्छा जीवन और उस जीवन को भी चलाने, शक्ति देने, सुन्दर बनाने के लिए शक्ति मुख से ही मिलती है। मुख रहेगा, तो परिवार रहेगा, देश रहेगा, संसार रहेगा। मुख नहीं रहे, तो कोई मतलब नहीं। इस मशीन का ज्ञान हर आदमी को है, यह मुख उपदेश के रूप में हम सबके साथ-साथ घूम रहा है। गुरु छूट जाएगा, शिक्षक छूट जाएंगे, अपने लोग छोट जाएंगे, लेकिन मुख पीछे नहीं छूटेगा, राम जी ने ऐसा उदाहरण दिया।
इसलिए भ्रष्टाचार के लिए बार-बार लोगों को यह बताने की जरूरत है, मुख की याद दिलाने की जरूरत है। आप . राजा हों, आप अंबानी या टाटा या बिल गेट्स जैसे अमीर हों, आपको शिक्षा लेनी है, तो मुख से लीजिए। जो हमने कमाया है, वह धन, बल, यश सब कुछ केवल हमारा ही नहीं है। पार्टी का कार्यकर्ता काम करता है, तो पार्टी जीतती है, लाभ का बंटवारा भी होना चाहिए। मुख्यमंत्री आप बन गए, आप अपने कार्यकर्ताओं को नहीं पूछेंगे, तो क्या आप अगली बार मुख्यमंत्री होंगे क्या? वैसे ही किसी भी क्षेत्र में ऊर्जा का, शक्ति का सम-वितरण होना चाहिए। किन्तु ध्यान रहे, जांघों को जितनी शक्ति चाहिए, उतनी हाथों को नहीं चाहिए। जांघों को पूरे शरीर का वजन उठाना है। जितनी और जैसी शक्ति दिमाग को चाहिए, वैसी और उतनी किसी दूसरे अंग को नहीं चाहिए। हवाई जहाज में जो ईंधन लगता है, वह सामान्य गाड़ी वाला नहीं होता, वह अलग गुणवत्ता का होता है। मैं डॉक्टर तो नहीं हूं, लेकिन यह कह सकता हूं कि सबसे महत्वपूर्ण ब्रेन है, दिमाग है, सबसे अच्छी ऊर्जा यहां लगती है या लगनी चाहिए। पैर बोले कि हमें भी वैसी ही ऊर्जा दीजिए, जैसी दिमाग को मिल रही है, तो यह बात जमेगी नहीं। यह नहीं कहना चाहिए कि अधिकारी को जो मिले, वही द्वारपाल को भी मिले।
भगवान ने जैसी व्यवस्था की है, उसमें जिसकी जैसी योग्यता, उसी के अनुरूप ऊर्जा स्वयं वहां पहुंच जाती है, उतनी ही पचेगी, उससे ज्यादा पचेगी नहीं। भ्रष्टाचारियों को और जो उनके कारण पीडि़त हैं, उन्हें भी मुख से सीखना चाहिए। कमाई का सम-वितरण होना चाहिए, जिसको जितना चाहिए, उसे उतना मिलना चाहिए। ऐसा होगा, तो कोई भ्रष्टाचार नहीं होगा। सभी लोग रोज आईना देखते हैं कि कितना सुन्दर है मुख, किन्तु उन्हें मुख के योगदान पर भी विचार करना चाहिए, मुख के उस स्वरूप को देखना चाहिए, जो राम जी दिखाना चाहते थे।
(जगदगुरु के एक प्रवचन से)

Wednesday, 21 September 2011

ऐसे संत कम हैं

रामबहादुर राय
प्रसिद्ध पत्रकार
ऐसे संत कम हैं, जो विद्वान भी हैं और अपनी बात ढंग से रख सकते हैं। इनकी जो पहली योग्यता दिखती है, वह है अपने पंथ के बारे में और उसके इतिहास के बारे में बचपन से ही आकर्षण। यह भी नहीं है कि मठ के आकर्षण ने उन्हें संत बनाया हो। कई बार ऐसा भी होता है, मठ का वैभव लूटने के लिए लोग संत बन जाते हैं। बनारस में जहां ये रहकर पढ़े-लिखे हैं, एक संस्कृत विद्यालय में। उस संस्कृत विद्यालय के सामने साहित्यकार मनु शर्मा रहते थे, उनके बहुत सारे उपन्यास हैं। तब मनु शर्मा की इन सब चीजों में रुचि नहीं थी, लेकिन मनु शर्मा की माता जी जो हैं, वो रामनरेशाचार्य जी को (तब वे रामनरेशाचार्य नहीं हुए थे) बहुत मानती थीं और अपने परिवार में यह चर्चा करती थीं कि इस लडक़े को यहां से निकालना चाहिए, बहुत प्रतिभा है, बहुत क्षमता है और संस्कृत पढक़र ये भविष्य में क्या करेंगे।.. लेकिन ये उनका अपना स्नेह था, जो बालक रामनरेशाचार्य जी पर बरसता था। इससे यह मालूम होता है कि साधना करके वे यहां तक पहुंचे हैं। यह स्वाध्याय और प्रार्थना का बल है, जो वे यहां तक पहुंचे हैं। यह बात उनमें दिखाई भी पड़ती है, जो व्यक्ति स्वाध्याय और साधना से ऊपर उठता जाता है, उसमें एक स्वाभिमान भी होता है, जो रामनरेशाचार्य जी में भरपूर दिखता है।
धारणा तो यह है कि वे दिग्विजय सिंह के करीब हैं और कुछ हद तक कांग्रेस हाईकमान के भी. मेरी धारणा यह है कि दिग्विजय सिंह चूंकि रामानंद जी के एक प्रिय शिष्य संत पीपा के वंशजों में से एक हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से रामनरेशाचार्य जी का उनसे भावनात्मक लगाव है। परन्तु हम यह नहीं कह सकते कि दिग्विजय सिंह जैसा चाहेंगे, वैसा रामनरेशाचार्य जी को चलाएंगे। संत को या एक मठाधीश को जिस तरह से स्वतंत्र रहना चाहिए, वो सारी चीजें उनमें दिखती हैं। इसीलिए जो इनके कामकाज हैं, सारा कुछ रामानंद संप्रदाय के लिए है। मेरा मानना है, यह अकेला संत संप्रदाय है हिन्दू समाज में, जिसमें बहुजन हैं। यानी समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व है और यही वजह थी कि जब समाज पर संकट था, तो इसमें वैरागी भी थे, इसमें संन्यासी भी थे। उस परंपरा को आज के संदर्भ में जीवित करने और उसमें नई जान डालने की कोशिश रामनरेशाचार्य जी कर रहे हैं और ये करते हुए उनके सामने साधनहीनता का संकट भी रहता है, किन्तु ज्यादा झुककर किसी से मदद लेने वाले वे नहीं हैं। एक सामाजिक सरोकार भी उनके मन में रहता है, जो इस संप्रदाय का स्वाभाविक पक्ष है।
मेरा थोड़ा-बहुत संपर्क है, कई ऐसे लोगों से जो मठों पर काबिज हैं। मैं देखता हूं कि ज्यादातर मठाधीश मठ की सत्ता और मठ की संपत्ति में ही डूबे रहते हैं, फंसे रहते हैं। इसके विपरीत रामनरेशाचार्य जी तटस्थ दिखते हैं और यह उनके व्यक्तित्व में भी प्रकट होता है। जहां वे चातुर्मास करते हैं, वहां हर वर्ग के लोग जुटते हैं, शायद ही किसी अन्य संत के चातुर्मास में इतने और इतनी विधा के लोग जुटते हैं। शायद ही किसी अन्य संत के चातुर्मास काल में आज के जो प्रासंगिक विषय हैं, उन पर चर्चा होती हो, लेकिन रामनरेशाचार्य जी ने एक सिलसिला शुरू किया है। यह सिलसिला बिल्कुल नया है। यह आगे बढ़ता है, तो बहुत उपयोगी होगा।
राजनीतिक रुझान भी उनमें मुझे लगता है, लेकिन सत्ता वगैरह के कारण नहीं, बल्कि जहां इनको ठीक लगता है, वहां राजनीतिक हस्तक्षेप का भी वे प्रयास करते हैं और समाज में उसका संदेश भी जाता है। जैसे २००९ के चुनाव में उन्होंने बनारस में मुरली मनोहर जोशी के पक्ष में कोई भाषण तो नहीं किया, बैठे-बैठे ही उन्होंने अपने लोगों को यह कहा कि यहां जो चुनाव हो रहा है, उसमें ये विद्वान आदमी हैं, ठीक आदमी हैं और माफिया के मुकाबले में इन्हें जिताना ठीक रहेगा। इसका असर भी हुआ।
श्रीमठ का महत्व
पंचगंगा घाट पर रामानंद संप्रदाय की मूल पीठ श्रीमठ स्थित है और पंचगंगा घाट बनारस में एक छोर पर है, जहां वरुणा गंगा में मिलती हैं, उससे थोड़ी ही दूर पर काशी स्टेशन के पास पहले पंचगंगा घाट है, वहीं से बनारस शुरू होता है। या तो गलियों से होकर आप वहां जा सकते हैं या सीधे नाव से जा सकते हैं। मेरा खयाल है कि काशी विश्वनाथ मंदिर को तोडऩे के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब ने दूसरा निशाना साधा पंचगंगा घाट के श्रीमठ पर। हमले के बाद रामानंद जी के केवल दो पदचिन्ह वहां बचे रह गए। श्रीमठ जीर्ण-शीर्ण हो गया था, उसका रामनरेशाचार्य जी ने पुनरोद्धार किया है और जैसी व जितनी जगह है, वहां श्रीमठ को एक जीवित केंद्र के रूप में इन्होंने पुन: स्थापित किया है।

(रामबहादुर राय अपने समय में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे हैं। जेपी आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी, उन्होंने जनसत्ता और नवभारत टाइम्स में महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है, दिल्ली के जाने-माने पत्रकार हैं. प्रधानमंत्रियों तक उनकी पहुँच रही है, उनकी अनेक किताबें प्रकाशित हैं। उनके विचारों को राजनीति, पत्रकारिता व संत समाज में भी पूरी गंभीरता से लिया जाता है।)

Monday, 19 September 2011

सूचना

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी के वीडियो देखने के लिए You Tube पर gyanghar लिख कर देखें. सामवेद के दुर्लभ पाठ से लेकर राम जी की डोली और छप्पन भोग तक।

gyanghar

सत्संग

भगवान की दया से एक बार मैं सूरत से वाराणसी के लिए यात्रा कर रहा था। प्रात: काल का समय था, लोग सो रहे थे। मैं बैठे-बैठे ईश्वर की विराट अवस्था का अवलोकन कर रहा था। कितना बड़ा आकाश, बाग-बगीचे और हमारा अपना छोटा-सा दायरा। ट्रेन में सामने ही एक सज्जन मेरी ही तरह बैठे थे। बाकी सभी लोग सो रहे थे। उन्होंने कहा, 'महाराज, मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूं।'

मैंने पूछा, 'यह प्रश्न आपके मन में कैसे आया?'

उन्होंने कहा, 'बार-बार मेरे मन में आ रहा है कि आपसे कुछ पूछूं, आपसे कोई गपशप हो।'

मैंने कहा, 'मैं संन्यासी हूं, हमारी कोई जाति नहीं, हमारा कोई परिवार नहीं। हम आपसे आदान-प्रदान जरूर करेंगे, किन्तु आप अपने शब्द का सुधार करें, हमसे बातचीत करने के लिए गपशप शब्द का प्रयोग नहीं होना चाहिए। आप स्तर बनाइए। हम कहें, आप सुनें, आप कहें, तो हम सुनें। उद्देश्य केवल टाइमपास करना न हो। गपशप तो कुछ भी बोलना है, अप्रासंगिक, इधर की उधर की। जो अव्यवस्थित बातचीत है, उसे गपशप कहते हैं। तो पहले आप शब्दावली शुद्ध कीजिये।'

वे प्रसन्न थे, उन्होंने पूछा, 'इसके लिए सबसे बढिय़ा शब्दावली क्या होगी?'

हमने कहा, 'हम सत्संग करेंगे। आइए, हम विचार विनमय करते हैं, चिंतन करते हैं। मनुष्य जीवन का बड़ा महत्व है, उसमें मिले समय का सदुपयोग करेंगे, गपशप करके दुरुपयोग नहीं। सवाल कीजिए, विचार कीजिए कि दुख क्यों है, ईश्वर है या नहीं, मानसिक क्षमता का विकास कैसे किया जाए। ऐसे सत्संग से ही हमारी शक्ति बढ़ेगी।'

उन्हें मेरी बात अच्छी लगी। सत्संग का विचार हुआ। लेकिन किससे कब, क्या, कहां कह रहे हैं, इसका बड़ा महत्व है। उन सज्जन ने कुछ विचार के बाद मुझसे पूछा, 'आपकी चप्पल बहुत अच्छी है, ये चप्पल आपने कहां से खरीदी?'

यह सत्संग की कैसी शुरुआत हुई? मैं चुप हो गया। तब उन्होंने पूछा, 'क्या मैंने कुछ गलत पूछ लिया, क्या आपको बुरा लगा?'

मैंने कहा, 'नहीं, बुरा नहीं लगा। याद कर रहा हूं। साधु होने के बाद कभी चप्पल खरीदा नहीं। हमारे दाता बहुत हैं। चप्पल किस कम्पनी का है, कितने रुपए का है, ये बातें तो छोडि़ए, देने वाले का ही ध्यान नहीं है कि किसने दिया, कहां दिया, कब दिया।'

उन्होंने कहा, 'कैसे आदमी हैं, इतनी बढिय़ा चप्पल है, लेकिन यह याद नहीं है कि किसने दिया, कब और कहां दिया?'

मैंने फिर कहा, 'आप विश्वास कीजिए, मुझे नहीं पता, लेकिन मुझे कष्ट है कि आपने मेरे साथ चिंतन की शुरुआत चप्पल से की. मुझे दुख हुआ। आप चप्पल पर चर्चा करेंगे, फिर जूते पर आ जाएंगे। कपड़े पर आ जाएंगे, ब्रांड की चर्चा करेंगे। आप सुधार की बात आखिर कब करेंगे, सत्संग कब करेंगे?'

उन्होंने फिर गलती मानी, कहा, 'मैं सुधार कर रहा हूं, आप बहुत अच्छे लग रहे हैं। मेरी बड़ी इच्छा है। मैं आपसे हाथ मिलाना चाहता हूं।'

मैंने जवाब दिया, 'बात फिर गड़बड़ा गई। हाथ मिलाने से काम नहीं चलेगा, मन मिलाना होगा। मिलन भी बराबर का होता है। आपका हाथ मेरे स्तर का नहीं है, मैं नहीं मिलाऊंगा।'

उन्हें बुरा लगा, 'क्यों? मेरा हाथ खराब है क्या?'

मैंने कहा, 'भले आदमी, उसमें कुछ कमी है। आपने जूता खोला, हाथ नहीं धोया, आपने पान खाया, मुंह में उंगली डाली, लेकिन हाथ नहीं धोया। इतनी देर में आपने देखा होगा, मैंने अपनी उंगली न मुंह में डाली, न जूता ठीक किया। बाकी आप पवित्र हैं। हम केवल यह कह रहे हैं कि आपका हाथ साफ नहीं है।' उन्होंने भी माना कि उनका हाथ गंदा है। विज्ञान भी गंदगी का समर्थन नहीं करता। डॉक्टर भी स्वस्थ रहने के लिए शरीर और हाथों को स्वच्छ रखने की सलाह देते हैं। स्वस्थ रहने में सफाई का बड़ा महत्व है। स्वच्छता होनी ही चाहिए। आज लोग केवल हाथ मिलाते हैं, जबकि ज्यादा आवश्यक है मन मिलाना, विचार मिलाना है। हाथ मिलाना, लेकिन मन से दूर रहना भला किस काम का?

जगदगुरु के प्रवचन का अंश

आनंद की खोज !

बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य ऋषि अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं, 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति। संसार के प्रत्येक व्यक्ति को अपने सुख के लिए ही पत्नी, पुत्र व धन प्रिय होता है।

एक व्यक्ति ने अपने समस्त परिवार से विद्रोह करके एक अत्यंत सुन्दर कन्या से विवाह किया। रात-दिन पत्नी को खुश करने में जुट गया। एक बार वह पत्नी के साथ गंगा में नौका विहार कर रहा था, तभी आकस्मिक तूफान आने से नाव डूबने लगी। भयभीत पत्नी बोल पड़ी, 'मुझे तैरना नहीं आता, मेरी कैसे रक्षा होगी।' पति ने उत्तर दिया, 'नाव भले डूब जाए, मैं तुम्हें पार ले जाऊंगा।' वह पत्नी को कंधे पर बिठाकर तैरने लगा। तैरते-तैरते बहुत देर हो गई, किनारा न आया। पति बुरी तरह थक चुका था, उसे स्वयं के प्राण की चिंता सताने लगी। उसके हृदय में स्वार्थ जाग उठा। उसने पत्नी से कहा, 'जितनी देर संभव था, मैंने तुम्हारी रक्षा का प्रयास किया, परन्तु अब यदि मैं तुम्हें लेकर तैरता रहूंगा, तो तुम्हारे साथ मैं भी डूब जाऊंगा, अत: तुम मुझे क्षमा करो। मैं तुम्हें मझधार में छोडक़र अपने प्राणों की रक्षा करूंगा, क्योंकि प्राण रक्षा होने पर तो मैं पुन: किसी स्त्री से विवाह कर लूंगा।'

यह कथा उदाहरण है कि संसार के प्रत्येक व्यक्ति को स्व-प्राण व स्व-सुख ही सर्वाधिक प्रिय है, इसकी तुलना में न पुत्र प्रिय होता है, न पत्नी, न धन, किन्तु यह उचित नहीं है। वस्तुत: व्यक्ति को यह ध्यान रखना चाहिए कि सच्चा आनंद तो अपनी आत्मा में ही छिपा होता है। हमारे शास्त्रों के अनुसार, इस आनंद को खोजने के साधन हैं कर्म, ज्ञान और भक्ति।

(जगदगुरु के एक प्रवचन से)

Sunday, 18 September 2011

नाथ आज मैं काह न पावा

राम जी जब अपने पिता के वरदान स्वरूप जंगल जा रहे थे। उन्हें वनवासी होने का वरदान दिया गया था। कैकई ने मांगा था, रामजी को १४ वर्षों का वनवास होगा और भरत को राजा बनाया जाएगा। वनवासी राम वनवासी वेष धारण करके वन की ओर निकल गए। उस पूरे वन यात्रा में, पिता की आज्ञा के पालन की यात्रा में राम जी ने सम्पूर्ण मानवता को लाभ पहुंचाया। यात्राओं का एक विशेष स्वरूप होता है। जैसे वनस्पति वैज्ञानिको की यात्रा, जैसे खनिज वालों की यात्रा, राजनेता की यात्रा। राजनेता यात्रा करता है, तो अपने वोट बैंक को मजबूत करता है। खनिज पदार्थों का अन्वेषण करने वाले यह पता लगाते हैं कि कहां खनिज तत्व हैं। राम जी भी वनवास यात्रा पर निकले। रामजी ने वहां केवल अपने वनवासी स्वरूप को ही नहीं बनाए रखा, बल्कि सम्पूर्ण संसार को वनवासी होने की प्रेरणा भी दे सकते। रामभाव में आने की प्रेरणा दे सके। वनवासी होने का भी अभिप्राय है भौतिक जीवन से संन्यासी जीवन की ओर बढऩा। बालों को जटा बना लिया, शैम्पू-साबुन की जरूरत नहीं। पैरों में जूते की जरूरत नहीं। कोई शृंगार नहीं, कोई आडंबर, कोई दिखावा नहीं, वृक्ष के नीचे रहना है, गांव में भी नहीं जाना है। ऋषियों के बीच रहना है, सत्संग में रहना है, अच्छी संगत में रहना है, वनवासी जातियों की परंपराओं से जुडऩा है। उन्होंने १४ वर्षों के वनवास काल में सम्पूर्ण संसार को वनवासी जीवन का आदर्श दिया। इससे सम्बंधित केवट वाला प्रसंग मैं सुनाना चाह रहा हूं।
राम जी केवट के पास गए कि मुझे नदी पार जाना है। केवट ने कहा कि मैं आपके चरण धोऊंगा। केवट को वनवासी से क्या लेना-देना? उसका काम तो नाव चलाना और मजदूरी लेना है। राम जी से अच्छा ग्राहक कौन मिलेगा? अगर अभी नकद पेमेन्ट नहीं होगा, तो उधारी ही लिखवा लेता। उसको क्या कहा जाएगा कि जो रोज कमाता है, रोज खाता है। जिसका जीवन रोज सूर्योदय से सूर्यास्त तक अर्जन और भोग का माध्यम है। वह कौन-सा प्रयास था, कौन-सी बात थी कि केवट ने चरण धोने की बात कही। उसमें ऐसा परिवर्तन हुआ राम जी को देखकर, राम जी को छूकर, उनसे बात करके कि जब राम जी मजदूरी देने लगे, तो उसने कहा, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। एक व्यक्ति पिता की आज्ञा से राजा होते-होते जंगल जा रहा है। जंगल जाते-जाते भी छोटे-छोटे से छोटे कर्म और छोटी से छोटी सोच, छोटी शिक्षा वालों को भी रामभाव में लाने के प्रयास में जुटा है। जब राम जी उसे मजदूरी दे रहे हैं, तो उत्तर सुनिए, नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा। बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी। अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।
केवट पूर्ण रूप से रामभाव में आ गया। जो राम जी का सम्प्रेषण है, वह अद्भुत अतुलनीय है। बाहर से तो वह पहले ही प्रभावित कर रहे हैं, लेकिन आंतरिक धरातल भी उजागर है। कहा जाता है, जब राम जी चले गए, तो केवट ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली कि जब राम जी लौटेंगे, तब उन्हीं को देखूंगा और किसी को नहीं देखूंगा। नौका बांधकर चलाऊंगा, दूसरे किसी व्यक्ति को नहीं देखूंगा, जो अव्रती होगा, क्रोधी होगा, कामी होगा, भ्रष्ट होगा, किसी को नहीं देखूंगा।। आंख पर पट्टी बंध गई, तब तक बंधी रही, जब तक राम जी लौट न आए। राम जी जब लौटे, तब राम जी ने कहा कि अब पट्टी खोल दो, उसने कहा, आप चले जाएंगे, तो फिर पट्टी बांध लूंगा। तब राम जी ने कहा, नहीं उसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि तुम्हें अब हर जगह राम ही दिखाई पड़ेंगे।
कितना बड़ा संदेश है इसमें। तमाम जो बड़े व्यक्तित्व हैं, विभिन्न क्षेत्रों के बड़े लोग हैं, उनके द्वारा अपने क्षेत्र में अपने ही समान लोगों का निर्माण क्यों नहीं हो रहा है? इस पर मेरा कहना है कि जो बड़े लोग हैं, वे अपने जैसे लोगों का निर्माण करना ही नहीं चाहते हैं। जो बड़ा उद्योगपति है, वह चाह रहा है कि दूसरे लोग उनसे दबें और साथ न खड़े हों। बड़ा क्रिकेटर बड़ा क्रिकेटर पैदा नहीं कर रहे हैं। बहुत दिनों से एक ही 'बिग बी चल रहे हैं बुढ़ापे तक, दूसरा 'बिग बी नहीं खड़ा कर रहे हैं, यहां तक कि अपने बेटे को भी स्वयं की तरह नहीं खड़ा कर पा रहे हैं। दूसरों को अपने जैसा विशाल बनाने के लिए जरूरी है कि आप अपने अंतर और बाह्य को एक जैसा बनाएं। राम जी बिना कोई उपदेश दिए, बिना जादू टोना, बिना किसी अनुष्ठान के केवट को, कोल-भील्लों को परिवर्तित किया। उनकी दूसरी कोई नीति नहीं, उनकी एक ही नीति है, सबको ऊंचाई पर लाना। बाहर और भीतर जब एक होता है, तो कोई भी आदमी बड़ा हो जाता है। जैसे पहाड़ों में जो घास-पात हैं, वो भी पत्थर हो जाते हैं, मिट्टी भी पत्थर हो जाती है। आज प्रयास तो खूब हो रहे हैं, ढेर सारे लोग परिवर्तन के लिए प्रयासरत हैं, बड़े-बड़े अभियान चल रहे हैं। समाज में अनेक मठाधीश, भागवत-कथाकार, उपदेशक सक्रिय हैं, किन्तु उनके द्वारा कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है, क्योंकि जो बोल रहा है, वह अंदर बाहर से एक नहीं है। अधिकतर लोग तो यही चाहते हैं कि हमारा बाह्य जीवन कैसे विस्तार पाएगा, हमें लोग बड़ा कैसे समझेंगे, किन्तु राम जी ऐसा नहीं क रते। उन्होंने न केवल स्वयं तपस्वी जीवन जीया, बल्कि दूसरों को भी प्रेरणा दी। जो भी उनके संपर्क में आया, उसमें रामभाव आ गया। इसीलिए मैं कहा रहा हूं कि जो भी समाज सुधारक हैं, वे अंतरमन और बाहर को एक करके दूसरों को भी अपने जैसा बनाने के प्रयास करें।
आदि शंकराचार्य ने कहा, गुरु पारसमणि लोहे को भी सोना बना देता है, लेकिन पारसमणि नहीं बनाता। सच्चा गुरु तो वह है, जो अपने जैसा बना देता है। सबमें गुरुत्व का भाव आए, मैं ऐसी परिकल्पना करता हूं। नकली गुरु कदापि नहीं बनना है। उपदेश कुछ दे रहे हैं और मन कुछ सोच रहा है। ऐसे तो सारा समाज ही दिग्भ्रमित हो जाएगा। राम जी ने केवट को अपने जैसा बना दिया। केवट उसी ऊंचाई तक पहुंच गया। यही सच्चा परिवर्तन है। अगर इसी विचारधारा पर सारे गुणी लोग चलें, तो ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्रों में बड़े-बड़े लोग तैयार हो जाएंगे, राष्ट्र और विश्व का कल्याण हो जाएगा।
जय श्रीराम
(जयपुर में जगदगुरु का एक प्रवचन)

Wednesday, 14 September 2011

India needs own education policy

(What jagadguru thinks about education and pakistan?)

“The English system of education introduced by Lord Macaulay in the country has failed. India should now evolve its own education policy,” remarked Jagadguru Ramanandacharya Swami Ramnareshacharya Ji Maharaj of Shrimath Kashi (Varanasi), while addressing the audience at Law Auditorium, Panjab University, today.

Swami Ramnareshacharya was invited by the Panjab University Students Association to express his views on the present education system in India and the need for proper guidance in the education field in colleges and universities .

Regarding the possibility of a war, the Swami said: “India is not interested in extending her territory but wants protection at the LoC. And for this purpose, India should not be afraid of any world power.”

Commenting on the recent events, including an attack on the World Trade Centre and America’s war against terrorism, he categorically stated, ‘’It was in the knowledge of America that Osama bin Laden is Pakistan’s creation and that is why it directed Pakistan to locate Osama bin Laden.”

He further said, “India should dispell fear and leave the policy of wait and watch. India should repell terrorists activity with vigour and force. The country should not fear even declaring a war against Pakistan and should strike at the very root of evil”.

“There are some other supreme powers which do not want that Pakistan and India should lead peaceful lives. The conflict between the two countries suits them”, he added.

A report published in the tribune

Chandigarh, January 4, 2002

Tuesday, 13 September 2011

हरिद्वार में अद्वितीय श्रीराम मंदिर निर्माण

संसार के जो महामनीषी श्रीराम को भगवान के रूप में नहीं स्वीकार करते वे भी उन्हें विश्व इतिहास का सर्वश्रेष्ठ मानव मानते ही हैं। विश्व के किसी भी देश, जाति, संप्रदाय एवं धर्म के पास श्रीराम जैसे चरित्रनायक नहीं है। वर्तमान संसार की अखिल संस्कृतियां श्रीरामसंस्कृति की ही जीर्ण-शीर्ण-विकृत एवं मिश्रित स्वरूप है। यह संस्कृति अनुसंधान नायको की प्रबलतम भावना है। ऐसे मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का मंदिर कहां नहीं होना चाहिए? संसार के सभी क्षेत्रों कालों एवं दिशाओं में होना चाहिए, तभी तो मानवता का सम्पूर्ण विकास होगा। धर्म की स्थापना होगी एवं तभी रामराज्य की स्थापना होगी। इन्हीं भावों को ध्यान में रखकर श्रीसंप्रदाय तथा सगुण एवं निर्गुण रामभक्ति परंपरा का एकमात्र मूलआचार्यपीठ श्रीमठकाशी ने हरिद्वार में विश्व का अद्वितीय श्रीराम मंदिर निर्माण का संकल्प श्रीरामजी की प्रेरणा एवं अनुकंपा से लिया है। श्री संप्रदाय के परमाचार्य तथा परमाराध्य श्रीराम ही है। मध्यमाचार्य रामावतार रामानन्दाचार्य जी हैं।
विश्व के अद्वितीय श्रीराम मंदिर की विशेषता
यह परमपावन मां गंगा का प्रथम अवतरण स्थल हरिद्वार में निर्मित हो रहा है।
राम भकति जहं सुरसरी धारा, सरसई ब्रम्ह बिचार प्रचारा।
विधि निषेधमय कलिमल हरनी, करम कथा रवि नंदनी बरनी।
यह चारधामों में सुप्रतिष्ठित बद्रीधाम के द्वारभूत हरिद्वार में निर्मित हो रहा है। हरिद्वार में भगवान हरि के अवतारों में पूर्णावतार भगवान श्रीराम का मंदिर अवश्य ही होना चाहिए, वह भी अद्वितीय होना चाहिए। यह सनातनधर्म की मंदिरनिर्माण की समस्त मान्यताओं से पूर्ण होगा। इस मंदिर की अराधना में सम्पूर्ण वैदिक विधि एवं भावों का सर्वांश में पालन होगा। यह विश्व का सर्वाधिक ऊंचा जोधपुर के पत्थरों द्वारा निर्मित मंदिर होगा। यह मंदिर, मंदिर के लिए होगा। मनोरंजन का साधन नहीं होगा। केवल आराधना एवं श्रीरामभाव का प्रसारक केन्द्र होगा। मंदिरनिर्माण के लिए जनताजनार्दन से पवित्र धन का संग्रह किया जा रहा है. रामराज्य की संस्थापना में आचरण एवं धन की पवित्रता की श्रेष्ठतम भूमिका है। वर्तमान विश्व की समस्याओं की जड़ आचार एवं अर्थ की अपवित्रता भी है।
अद्वितीय श्रीराम मंदिर की स्थापत्यकला
श्रीराम मंदिर आज के लौहयुग से परे ऐसे प्राचीन शिल्प स्थापत्य के नियमानुसर जोधपुर पाषाण से निर्माण हो रहा है। इस स्थापत्य की आयु २००० साल से भी अधिक मानी जाती है। परमपूज्य १००८ श्री जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज, श्रीमठपंचगंगा काशी की प्रेरणा से निर्मित हो रहे श्रीराममंदिर की रचना का विवरण इस प्रकार है :
: प्रासाद :
यह प्रासाद ८५ इन्डक (कलश), एवं २४ तिलक से युक्त होगा। इस प्रासाद की सर्वदा बुद्धिमान ब्यक्तियों को रचना करनी चाहिए। ऐसा ऐरावत प्रासाद जो निर्माण करता है, वह देवताओं को प्रिय समग्र त्रैलोक्य में शोभामान एवं वसुंधरा पर यशस्वी होता है।
श्रीराममंदिर की लंबाई १९३ फीट, चौड़ाई ११० फीट एवं ऊंचाई १७५ फीट होगी। इसका गर्भगृह या निज मंदिर का नाभ १३.७ फीट गुणा १३.७ फीट, जिसमें पुष्य नक्षण आता है। कोली मंडप २९.५ फीट गुणा ११५ फीट, जिसमें मृगशीर्ष नक्षत्र आता है। गृढ़ मंडप २९.५ फीट गुणा २९.५ फीट जिसमें मृगशीर्ष नक्षत्र आता है। त्रीचोकी २९.५ फीट गुणा ११.५ फीट होगा, जिसमें मृगशीर्ष नक्षत्र आता है। शृंगार चोकी ११.५ फीट गुणा ११.५ फीट होगी, जिसमें मृगशीर्ष नक्षत्र आता है और इन सभी नक्षण में देवगण लिया गया है।
यह मंदिर बेसमेंट, ग्राउंड फ्लोर, फर्स्ट फ्लोर व सेकंड फ्लोर बनेंगे, जिसमें ग्राउंड में श्रीराम, लक्ष्मण एवं श्री जानकी जी की बैठी हुई प्रतिमाएं होंगी। फर्स्ट फ्लोर में भगवान श्रीरामचंन्द्र जी के चौबीस अवतार रहेंगे और सेकंड फ्लोर में श्रीरामचंद्र जी के जीवन चरित्र का पट्टचित्र बनेगा, जिनमें भगवान श्रीराम के सम्पूर्ण जीवन को प्रदर्शित किया जाएगा।
: संचालन :
विश्व के अद्वितीय राममंदिर निर्माण की योजना को मूर्तरूप प्रदान करने के लिए जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य श्रीमठ पंचगंगा, काशी द्वारा जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्मारक सेवान्याय की स्थापना हुई, जिसके वे आजीवन संस्थापक अध्यक्ष हैं। न्यास का पंजीयन दिनांक १९/०६/२००१ को हरिद्वार में हुआ। पंजीयन संख्या १९२/२००१ है। सप्तऋषिचुंगी, बाईपास मुख्य सडक़ से सप्तऋषि मार्ग पर २७० फीट ल. २५० फीट के भूभाग को जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्मारक सेवान्यास के नाम से रजिस्ट्री कराकर १८ नवम्बर २००५ को जगदगुरु मध्वाचार्च स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज उडुपी कर्नाटक के द्वारा भूमि पूजन सम्पन्न हुआ। समारोह में राष्ट्रीय स्तर के साधु संत एवं विद्वान भक्त उपस्थित थे, तब से श्रीराममंदिर का निर्माण कार्य निरंतर जारी है।

दुनिया में इतना दुख क्यों है?

एक दिन मैं बिहार यात्रा में किसी गांव जा रहा था। विभिन्न स्वभाव और विभिन्न आयु व आकार-प्रकार व अवस्थाओं के लोग साथ थे। उन लोगों ने कई प्रकार की चर्चाएं छेड़ रखी थीं, लेकिन उन चर्चाओं का कोई समाधान नहीं हो रहा था। कोई पूछ रहा था कि माता पिता को लोग क्यों नहीं मान रहे हैं, कोई भ्रष्टाचार की बात कर रहे थे। हर आदमी के मन में कोई न कोई जिज्ञासा थी, लेकिन उसका समाधान उस समूह के द्वारा नहीं हो रहा था। देखने से यही लग रहा था कि लोग जिज्ञासु हैं, जानने की इच्छा है। शास्त्रों में लिखा है, जिज्ञासा तभी होती है, जब संदेह हो और जब अपना मतलब सिद्ध होना हो। तो दुनिया में कोई ऐसा नहीं है, जिसे जिज्ञासा नहीं हो। हर किसी को कोई न कोई मतलब भी है और संदेह भी है।
तो चर्चा चल रही थी, क्यों लोग भ्रष्टाचारी हो रहे हैं, क्यों मर्यादाएं खो रही हैं। मुझसे लोगों ने पूछा कि आप इस पर कुछ बोलिए। मैंने कहा कि आप लोग अच्छी चर्चा कर रहे हैं, लेकिन इस चर्चा का कहीं एक जगह समाधान होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। मैंने कहा कि देखिए, व्यावसायिक उदाहरण से आपको समझाने का प्रयास कर रहा हूं। व्यवसाय में सभी को किसी दूसरे की सहायता लेनी पड़ती है। अपनी पूंजी से बड़ा व्यवसाय सभी लोग नहीं करते। बहुत बड़ा प्रतिशत उन लोगों का है, जो बैंक या दूसरों से ऋण लेकर व्यवसाय शुरू करते हैं। कुछ लोग मित्रों और रिश्तेदारों से ऋण लेकर व्यवसाय शुरू करते हैं। जो आदमी पैसा ले ले और उसे लौटाए नहीं, बाजार में उसकी साख खत्म होने लगती है। उसे लोग ऋण देने में संकोच करने लगते हैं। लोग उसे चोर कहेंगे, गलत आदमी कहेंगे। बाजार से आदमी बाहर हो जाएगा। यह आम दुनिया की बात है, तो मेरा यह मानना है कि सारी जो अव्यवस्थाएं हैं, वे सिर्फ इसलिए है कि जहां से हमने ऋण लिए हैं, उन ऋणों को चुका नहीं रहे हैं। हमारे ऊपर देवताओं का ऋण हैं, जो हमें वायु देते हैं, जल देते हैं, आकाश देते हैं, पृथ्वी देते हैं, किन्तु हम यह भूल जाते हैं।
मनुष्य जब जन्म लेता है, तो तीन ऋणों के साथ जन्म लेता है। पितृ ऋण, ऋषि ऋण और देव ऋण। इन तीनों से ऋणवान होकर ही आदमी जन्म लेता है। जो टाटा-बिड़ला के परिवारों में जन्म लेगा, वह भी इन तीन ऋणों के साथ जन्म लेगा। अमीर हो या गरीब, सबको ऑक्सीजन की, प्रकाश की और जल की आवश्यकता पड़ेगी। जन्म लेते ही जो हमें संस्कार मिले, जो ज्ञान-विज्ञान मिले, वह ऋषियों का ऋण है, वह परंपरागत रूप से हमें प्राप्त है और एक ऋण हमारे पितरों का हमारे शरीर में है। इन तमाम लोगों से हम ऋण लेकर आगे बढ़ते हैं और इन ऋणों को नहीं चुकाना ठीक उसी तरह से है, जैसे बाजार से ऋण लिया हो, किन्तु चुकाया नहीं। जो ऋण नहीं चुकाता, वह कभी पनप नहीं पाएगा, कभी यशस्वी नहीं हो पाएगा, कभी शांत नहीं होगा। हम सभी को इन ऋणों को चुकाने का प्रयास करना चाहिए। इन ऋणों को नहीं चुकाने के कारण ही संसार में सारी अव्यवस्थाएं हैं। सारी समस्याएं हैं।
सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए और कहा कि इस बात को प्रचारित करने की जरूरत है। जो माता-पिता के ऋण को नहीं चुकाएगा, राष्ट्र के ऋण को नहीं चुकाएगा, हम राष्ट्र की सडक़ों पर चलेंगे, लेकिन हम राष्ट्र या सरकार को नहीं मानेंगे, ऐसा कैसे चलेगा। जो ईश्वर को नहीं मानता, उसका कैसे चलेगा, मूल पिता तो वही हैं। संसार के सभी लोगों को इस परंपरा से जुडऩा चाहिए कि आपको अपने विकास के लिए जहां से शक्ति मिली है, वहां के प्रति कृतज्ञता की भावना होनी ही चाहिए। ऋषियों से क्या लिया, देवताओं से क्या लिया, पितरों से क्या लिया, यह अवश्य विचार करना चाहिए।
शास्त्रों में पांच यज्ञ करने के लिए कहा गया है, ऋषि (ब्रम्ह) यज्ञ - स्वध्यात्मक, देव यज्ञ - हवनात्मक, पितृ यज्ञ - तर्पणात्मक, भूत यज्ञ - गाय को चारा डालना, पंछियों को दाना डालना इत्यादि, मनुष्य यज्ञ - अतिथि, दीन हीन अभ्यागत व अतिथियों को भोजन कराना सत्कार करना। जो व्यक्ति अपने जीवन में इन यज्ञों या कर्मों को करता है, वही सुखी होता है और कष्टों से बचा रहता है।
(महाराज के प्रवचन से)