Thursday, 20 September 2012

जगदगु़रु महाराज की प्रवचन पुस्तिका का लोकार्पण

भारत में रामभक्ति की अविरल धारा के जनक आचार्यश्री रामानंद जी के प्राकट्य धाम हरित माधव मंदिर, प्रयाग, इलाहाबाद में २ सितम्बर संध्या के समय अनेक विद्वानों की उपस्थिति में ‘दु:ख क्यों होता है?’ पुस्तिका का लोकार्पण हुआ। रामानंद संप्रदाय की मूल पीठ श्रीमठ, वाराणसी के पीठाधीश्वर रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सानिध्य में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष जटाशंकर जी और देश के प्रसिद्ध संस्कृत समाचारवाचक बलदेवानंद सागर जी ने के इस पुस्तिका का विमोचन किया। इस पावन अवसर पर दिल्ली से आए प्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय भी मंच पर विराजमान थे।
श्रीमठ से अनेक
ग्रंथों का प्रकाशन हुआ है, किन्तु यह पुस्तिका या ग्रंथ इस मामले में एक शुरुआत है कि इसमें रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज के प्रवचन संकलित हैं। प्रवचन समकालीन समस्याओं पर केन्द्रित हैं, इसमें रामभक्ति से लेकर हिग्स बोसोन या ईश्वरीय कण की वैज्ञानिक खोज पर भी विस्तृत चर्चा है। इस प्रवचन ग्रंथ से यह समझने में सहायता मिलती है कि धर्म क्या है? आज की समस्याओं का समाधान क्या है? दु:ख क्यों होता है? सुख कैसे होगा? कन्या भ्रूण हत्या से लेकर आतंकवाद और प्रतिशोध जैसे विषय पर भी इसमें प्रवचन संकलित हैं। 
पुस्तिका विमोचन अवसर पर प्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय, विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास, ज्ञानेश उपाध्याय, रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष जटाशंकर जी और प्रसिद्ध संस्कृत समाचारवाचक बलदेवानंद सागर जी। 

इस अवसर पर अपने उद्बोधन में स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने कहा,‘तुलसीदास जी ने कहा है, निरंतर सुनिए, निरंतर गाइए और निरंतर स्मरण कीजिए, मैं भी निरंतर बोल रहा हूं, निरंतर सुन रहा हूं, निरंतर स्मरण कर रहा हूं, किन्तु लिखने या लिखवाने का अवसर नहीं आया। लिखने का काम अब ज्ञानेश जी ने किया है।’ उन्होंने यह भी कहा, ‘मैं पुस्तिका को पढ़ रहा था, मेरे मन में बार-बार प्रश्न आ रहा था, क्या यह मैंने ही कहा था या ज्ञानेश जी को ही ज्ञान हो गया और उन्होंने लिख दिया। अब विश्वास नहीं होता, ये मेरे ही शब्द हैं। किन्तु ध्यान दीजिए, गीता बस एक बार श्री कृष्ण के मुख से निकली थी। ऐसा नहीं है कि जब कहा जाए, कृष्ण गीता सुनाने लगें, एक विशेष अवसर व प्रयोजन था, जब गीता अवतरित हुई।’
डॉ. जटाशंकर जी ने कहा, ‘धर्म प्रत्येक व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाने का कार्य करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि धार्मिक आचरण, दूसरों की सेवा, दया, करुणा से व्यक्ति के दु:ख कम होते हैं।’ उन्होंने पुस्तिका में प्रवचन में उल्लिखित महर्षि वेदव्यास जी के श्लोक - को विशेष रूप से याद किया। इस श्लोक में महर्षि वेदव्यास कह रहे हैं कि मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूं, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से मोक्ष तो सिद्ध होता ही है, अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते? जटाशंकर जी ने कहा, ‘आज वास्तव में धर्म की पुकार को सुनने की आवश्यकता है। शास्त्र हमें समाधान बता सकते हैं, हमारे दु:ख दूर करने के उपाय बता सकते हैं।’
श्री बलदेवानंद सागर जी ने पुस्तिका के शीर्षक की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘बुरे आचरण के कारण ही दु:ख होता है। यह पुस्तिका एक पावन व प्रशंसनीय प्रयास है, पुस्तिका के माध्यम से रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के विचार मुद्रित अवस्था में लोगों तक पहुंचेंगे, जिससे समाज और देश का भला होगा।’ प्रस्तुत पुस्तिका में स्वामी रामनरेशाचार्य जी का परिचय लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्री रामबहादुर राय जी ने कहा, ‘रामानंद संप्रदाय अकेला ऐसा संप्रदाय है, जिसमें सभी जाति और धर्म के लोगों के लिए जगह है। यह देश के लिए एक अत्यंत उपयोगी संप्रदाय है। यह देश को एक सूत्र में पिरोने का काम कर सकता है।’ उन्होंने स्वामी रामनरेशाचार्य जी की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘यह एक ऐसे सच्चे, सहज और प्रखर संत हैं, जिनसे देश को बहुत आशाएं हैं। देश में ऐसे संत बहुत कम हैं, जो वास्तव में देश और समाज के भले के लिए सोच रहे हैं।’
जयपुर से आए वरिष्ठ पत्रकार व पुस्तिका के संयोजक व संपादन सेवक ज्ञानेश उपाध्याय ने कहा, ‘आज के अत्यंत दुष्कर समय में महाराज स्वामी रामनरेशाचार्य जी के रूप में एक सूर्य उगा हुआ है, हमें अपने-अपने दरवाजे-झरोखे खोल लेने चाहिए और उनके प्रवचन प्रकाश को अपने भीतर उतरने देना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘यह पुस्तिका एक बड़े अभाव की छोटी पूर्ति है। यह एक सिलसिले की शुरुआत है, जो राम जी और जगदगुरु के आशीर्वाद से आगे निरंतर रहेगा।’ उन्होंने स्वामी रामनरेशाचार्य जी को समकालीन समाज और पत्रकारों के लिए अत्यंत उपयोगी बताते हुए और लोकार्पण स्थल के निकट ही बह रही गंगा जी की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘जैसे गंगा मैया की तुलना केवल गंगा मैया से हो सकती है, जैसे सागर की तुलना केवल सागर से हो सकती है, जैसे राम जी की तुलना केवल राम जी से हो सकती है, ठीक उसी प्रकार महाराज जी (स्वामी रामनरेशाचार्य जी) की तुलना केवल महाराज जी से ही हो सकती है।’
दु:ख क्यों होता है? - पुस्तिका के निर्माण में पग-पग पर सहयोगी रहे संस्कृत के जयपुरवासी रामभक्त विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास ने लोकार्पण कार्यक्रम का अत्यंत कुशल व व्यापक बहुमुखी संचालन करके इस अवसर को ऐतिहासिक और पावन बना दिया। उन्होंने पुस्तिका के मुद्रक प्रिंट ओ लैंड के स्वामी श्री सत्यनारायण अग्रवाल की भी प्रशंसा करते हुए कहा, ‘यह प्रयास था कि पुस्तिका ज्यादा मोटी या कीमती न हो, ऐसी हो कि सहजता से जन-जन तक पहुंचे और रामभक्ति का प्रसार हो।’ उन्होंने कहा, ‘रामभक्ति समाधान की संभावनाओं का अनंत आकाश है, जिसके माध्यम से हमारे सारे दु:ख दूर हो सकते हैं। यह अत्यंत प्रसन्नता की बात है कि महाराज जी के आशीर्वाद से इंटरनेट पर आज एक ऐसा ब्लॉग है, जिसके माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी के श्रीमुख से निकले पावन मार्गदर्शक शब्द पूरे संसार में प्रचार-प्रसार पा रहे हैं। रामभक्ति की यह यात्रा सतत रहनी चाहिए।’
वाराणसी सेआए विद्वान एवं श्रीमठ के प्रकाशन का दायित्व संभालने वाले डॉ. उदय प्रताप सिंह ने लोकार्पण के अवसर पर उपस्थित विद्वजनों, संतों और श्रद्धालुओं का आभार जताते हुए कहा, ‘पुस्तिका के रूप में एक अच्छा प्रयास सामने आया है, महाराज के प्रवचन प्रकाशित हुए हैं, यह दायित्व मेरा था, लेकिन मीडिया में होने के कारण ज्ञानेश उपाध्याय मुझसे इस मामले में आगे निकल गए हैं। उनको मेरी तरफ से बधाई है।’
लोकार्पण के अवसर पर हरित माधव मंदिर में बड़ी संख्या में संत, विद्वजन, भक्त और सेवक उपस्थित थे, सभी ने रामभक्ति धारा और पुस्तिका का आनंद लिया। लोकार्पण के उपरांत भव्य भंडारे का भी आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में उपस्थित जनों ने प्रसाद पाया। कार्यक्रम स्थल के निकट ही ‘दु:ख क्यों होता है?’ पुस्तिका के लिए एक स्टॉल लगाई गई थी, जिस पर रखी सभी पुस्तिकाएं देखते-देखते बिक गईं। करीब ७८ पृष्ठ और २५ रुपये कीमत वाली पुस्तिका में श्री रामबहादुर राय द्वारा लिखित महाराज जी के परिचय के उपरांत महाराज जी के १३ प्रवचन अंश हैं और सबसे अंत में रामानंद संप्रदाय की मूल गद्दी वाराणसी में गंगा किनारे पंचगंगा घाट पर स्थित श्रीमठ पर लिखा गया एक फीचर है, जिसमें श्रीमठ के कल और आज के बारे में जाना जा सकता है। पुस्तिका के कवर पृष्ठ पर महाराज जी का चित्र और पिछले कवर पृष्ठ पर महाराज जी की प्रिय प्रार्थना महाकवि जयदेव रचित मंगलगीतम - श्रितकमलाकुचमण्डल. . . भी मुद्रित है।
जय श्री राम

Thursday, 6 September 2012

गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम स्थल प्रयागराज में महाराज

गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम स्थल प्रयागराज में महाराज

विभिन्न मुद्राओं में जगदगुरु

प्रयाग में चातुर्मास स्थल हरित माधव मंदिर आचार्य रामानंदाचार्य प्राकट्य धाम के परिसर में जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज 
  




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Monday, 25 June 2012

प्रयाग में होगा चातुर्मास महोत्सव



जगदगुरु रामानन्दाचार्य पद पर प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के सान्निध्य में प्रयाग अर्थात इलाहाबाद में दिनांक ३ जुलाई २०१२ आषाढ़ पूर्णिमा से दिव्य चातुर्मास महोत्सव का शुभारम्भ होने जा रहा है, जिसका समापन ३० सितम्बर २०१२ को भाद्र पूर्णिमा के दिन होगा।
उल्लेखनीय है कि गंगा, यमुना के संगम की पावन धर्म नगरी प्रयाग आदि जगदगुरु रामानन्दाचार्य की जन्मस्थली है, अत: यहां जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के चातुर्मास का अति विशेष महत्व है। प्रयाग के ठाकुर हरित माधव मंदिर, ४५/४२, मोरी दारागंज की पावन स्थली पर जगदगुरु अपनी साधु-संत मंडली के साथ ९० दिनों तक विराजमान रहेंगे। इन नब्बे दिनों के दौरान अनेक धार्मिक कार्यक्रम नियमित रूप से होंगे, तो कुछ विशेष व दुर्लभ धार्मिक आयोजन भी होंगे। हिन्दू संतों में चातुर्मास की परंपरा का एक तरह से लोप हो गया था, जिसे स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने एक तरह से पुनजीर्वित किया है, जिसे वे पूरे भक्ति, भाव निरंतर मनाते आ रहे हैं। इस दौरान वे संतों के साथ-साथ आम जनों को भी सहज उपलब्ध होते हैं, सुबह से देर रात तक भक्तों की शंकाओं का समाधान करते, उन्हें सच्ची रामभक्ति का मार्ग बताते जगदगुरु एक अदभुत, व्यापक व दुर्लभ छवि प्रस्तुत करते हैं। पिछले वर्ष आपने इन्दौर में चातुर्मास किया था और उसके पहले वर्ष सूरत में, वे भारत में घूम-घूमकर भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में रामभक्ति की अलख जगाते रहे हैं। उनके चातुर्मास में देश भर से विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान भी जुटते रहे हैं। विद्वतजन गोष्ठी और धर्माचार्य सम्मेलन की खास महत्ता रही है।



दैनिक कार्यक्रम 
परमप्रभु श्रीराम जी का पूजन    प्रात: ६ से ८
श्रीराम यज्ञ हवनात्मक            प्रात: ८ से ८-३०
देवर्षि पितृतर्पण यज्ञ                प्रात: ८-३० से ९
आचार्य पूजन                         प्रात: ९ से ९-३०
स्वाध्याय(रामतापनीयोपनिषद्)
एवं शाण्डिय भक्ति सूत्र              प्रात: १० से १२
श्रावण में प्रति सोमवार रुद्राभिषेक    मध्याह्न ११ से २
प्रवचन संतों एवं विद्वानों द्वारा    सायं ६ से ७
मंगलाशीर्वचन-आचार्यश्री द्वारा    रात्रि ७ से ८

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विशेष आयोजन
गुरु पूर्णिमा महोत्सव                   ३ जुलाई, मंगलवार
गोस्वामी तुलसीदास जयन्ती महोत्सव     २५ जुलाई, बुधवार
गणेश महोत्सव                          ५ अगस्त, रविवार
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव        १० अगस्त, शुक्रवार
नन्द महोत्सव                            ११ अगस्त, शनिवार
विद्वज्जन संगोष्ठी
धर्माचार्य सम्मेलन
समापन महोत्सव                        ३० सितम्बर

Monday, 11 June 2012

समस्याओं का समाधान

समापन भाग
कोई निराश न हो, सुधार और रामभाव की संभावना सदा बनी हुई है। ए. राजा भी जेल में गए, करुणानिधि की बेटी भी जेल में गई, एक आदर्श खड़ा हुआ कि बड़े लोग भी जेल जा सकते हैं। आने वाले दिनों में कौन आदमी जेल में पहुंच गया और वहीं सड़ गया, पता नहीं चलेगा। जो गलत हैं, उन्हें दंड मिलेगा।
लोग भूल जाते हैं, अर्जुन सिंह के पिताजी भ्रष्टाचार के मामले में जेल गए थे। बाद में कांग्रेस ने उन्हें विधानसभा चुनाव लडऩे के लिए टिकट दिया। नेहरू जी प्रचार करने के लिए गए थे, भाषण देकर मंच से नीचे उतरे, तो एक स्वतंत्रता सेनानी ने कहा कि पंडित जी आप इस चोर का प्रचार करने के लिए वोट मांग रहे हैं? तो पंडित जी फिर मंच पर चढ़े और वहां से कहा, मैं शर्मिंदगी के साथ अपनी बात को वापस लेता हूं, मैंने कहा था कि इनको वोट दीजिए, अब कहता हूं, आप इनको वोट मत दीजिए, भले कांग्रेस यहां हार जाए, मुझे खुशी होगी कि भ्रष्ट आदमी चुनाव नहीं जीता।
यह बहुत बड़ी बात है, कांग्रेस भी भूल गई है। कांग्रेसियों को कहना चाहिए कि उनकी पार्टी ऐसी पार्टी है, जो अपने नेता को जेल भेज सकती है। समझौता नहीं किया। ए. राजा को उसी सिद्धांत के आधार पर जेल ले जाया गया, लोकपाल के आधार पर वे नहीं गए। पुराने कानून व आधार पर ही न जाने कितने अपराधी जेल में सड़ रहे हैं। आपको मालूम होगा कि चारा घोटाले में दोषी कई लोग मर गए, दस-दस साल का कारावास हो गया। यह वही कानून है, जो संविधान लेखन के समय बना था। सभी समस्याओं की जड़ है आदमी का ईश्वरीय धारा से दूर होना, सभी समस्याओं का समाधान है कि आदमी शास्त्रों के निर्देश से जुड़े, श्रेष्ठ जनों की प्रेरणा से जुड़े और राम भाव के साथ जुडक़र अभियान चलावे। कहीं कोई दिक्कत नहीं होगी। हम लोगों को देखिए, बड़ाई मैं नहीं कर रहा हूं, २३-२४ साल हो गए मुझे रामानन्दाचार्य बने हुए। कहीं एक रुपया भी अपने नाम से नहीं जुड़ा। पैसा आता है, आप ही देते हो, खर्च होता है। किसी ने कहा कि कुछ जमा कर लीजिए, बुढ़ापे में काम आएगा, तो मैंने कहा, मेरे जितने चेले हैं, क्या सब हमसे पहले ही मर जाएंगे, जो मेरे साथ रहेंगे, मैं उनसे कहूंगा कि ऐ दवाई के लिए भेजना, अपनी दवाई में कितना खर्च करते हो, तो मुझे भी भेजना, दवाई की जरूरत है। आज जो हम कमा रहे हैं भावों का धन, हमारे बाद भी हमारे कुछ लोग मरेंगे। अभिप्राय यह कि इतने दिनों में एक रुपया भी जमा नहीं हो पाया, काहे का डिपोजिट, आपको तो बतला दूं, तो हैरान हो जाएंगे। मठ में जो दो ढाई लाख रुपए थे, वो भी १९९७ से ब्लॉक हैं, उसका व्याज भी आना बंद है। फिर भी श्रीमठ चल रहा है।
मैं कई बार लोगों को मजाक में कहता हूं, कुछ दिनों में हम भी पुट्टापर्थी (अमीर) होने वाले हैं, मालामाल होने वाले हैं। पहले ज्यादा साधन नहीं था, साधन अभी जो बढ़ा है, उसमें आप भी हिस्सेदार हैं, आगे जब साधन और बढ़ेगा, तो भोगने के लिए क्या बाहर से लोग आएंगे? हमारे पास जो भी साधन या धन होगा, हमें मिल-बांटकर उपभोग करना है। अभी मैंने नहीं खाया, आप ही प्रसाद लाते हैं, आप ही खाते हैं। हमारे पास जो भाव है, उसे आप प्रचारित करें। हमारे पास जो भी कुछ है, उसमें आप सबकी हिस्सेदारी है। पैसा बहुत आ जाए और सच्ची प्रतिष्ठा न हो, तो कैसे चलेगा? पिछले दिनों जबलपुर के जिस आश्रम में मैंने महायज्ञ करवाया, वह जूना अखाड़े का है। दूसरा कोई आता, तो जूना अखाड़े वाले जगह नहीं देते, धकिया देते। मैं वहां गया, तो उन्होंने सोचा होगा कि रामनरेशाचार्य तो जूना अखाड़े के ही हैं, छोड़ो इन्हें। दूसरा कोई बैठता, तो वे बैठने नहीं देते। मैं कहता हूं, कोई संन्यासी महात्मा वहां आता है, तो इनकी सेवा करो, भेदभाव नहीं करना। श्रीमठ या काशी में भी हमारे यहां कोई संन्यासी आ जाए, तो सेवा होती है। अभी एक छात्र ने निवेदन किया कि हमें सहयोग चाहिए, मैं पढ़ता हूं, मेरे पीछे कोई सहयोग देने वाला नहीं है, मैंने उसके लिए १००० रुपया महीना तय कर दिया, कहा, चिंता मत करो, जरूरत पड़ी तो और दूंगा, अलग साल सहयोग और बढ़ा दूंगा। तुम्हें कहीं जाना होगा, तो टिकट भी बनवा दूंगा, कपड़ा और अन्य आवश्यकता भी पूरी करूंगा, जीवन भर खूब पढ़ो, पूरी मदद करूंगा। मेरा कहना है, कोई आदमी श्रेष्ठ चिंतन में है, तो उसे सहयोग मिलना चाहिए, पैसे का यही उपयोग सबसे बड़ा है।
रामचन्द्र भगवान की जय।

समस्याओं का समाधान

भाग - छह
आज जातिवाद एक बड़ी समस्या बना हुआ है। लगता है, पहले से बढ़ गया है। जातिगत जनगणना भी हुई है। कई लोगों को जाति की राजनीति में बड़ा आनन्द आ रहा है। यह कहा जाता है कि अरहर की दाल को और जाति को जितना पकाया या मथा जाए, उतना ही आनंद बढ़ता है। मैं बतला दूं, बनारस में हमारे लंबे जीवन में एक भी आदमी नहीं मिला, जिसने हमारी जाति के आधार पर हमारा पक्ष लिया हो। बिहार जातिवादियों का देश है, जातिवाद की शुरुआत ही वहां से हुई है। जैसे पहाड़ों पर बर्फ गिरती है, तो तराई के इलाकों तक ठंड स्वत: आ जाती है, ठीक उसी तरह जितनी भावनाएं हैं, भली या बुरी, वे सब बिहार से चलती हैं और देश भर में फैल जाती हैं। महात्मा गांधी ने वहीं से आंदोलन शुरू किया। जब कांग्रेस के विरुद्ध पहला आंदोलन शुरू हुआ, तो बिहार से ही शुरू हुआ, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व किया। कोई भी क्रांति होगी, तो उस क्रांति का सूत्रपात उसका, उत्स और उसे ऊर्जा देना, उसको रास्ता देना और उसको सारी बौद्धिक कौशल देना, बिहार से ही शुरुआत होती है। इतने ऊर्जावान लोग और कहीं होते ही नहीं हैं। अभी आपने सुना होगा कि वहां एक डीजीपी हैं अभयानंद जी। जब नीतीश मुख्यमंत्री हुए, तो उन्होंने अपनी बिरादरी के आदमी को ही डीजीपी बनावा दिया, लेकिन वह सफल नहीं हुआ, फिर उत्तर प्रदेश के एक ब्राह्मण को बनाया, जो किसी की बात नहीं सुनते थे, उसके बाद अभयानन्द जी आए। अभ्यानन्द जी के पास जब लालू यादव के काल में कोई काम नहीं था, तब उन्होंने गरीब बच्चों को आईआईटी कोचिंग कराना शुरू किया, सुपर थर्टी नाम से संस्थान खोला। तीस गरीब बच्चों को वे चुनते थे, उन्हें पढ़ाते थे, हर तरह की सुविधा देते थे और उनमें से अधिकांश बच्चों का आईआईटी में चयन हो जाता था। आईपीएस अभयानन्द जी और उनकी मित्रमंडली ने यह बड़ा काम किया। उन लोगों ने देश भर को बतला दिया कि यह है पढ़ाई का तरीका। पढ़ाई ऐसे भी हो सकती है, पैसा ही सबकुछ नहीं है।
वे डीजीपी हो गए। मैंने किसी पत्रिका में पढ़ा कि लाखों-लाख जो अवैध हथियार बिहार में जप्त हुए हैं, उनमें लगे लोहे को गलाकर उससे कुदाली और हसुआ बनवा रहे हैं अभयानन्द जी। यह आदमी इतना ईमानदार है कि मैं गया में था, लोग बोले कि अभयानन्द जी प्रणाम करेंगे, यह काफी पहले की बात है। लेकिन वे नहीं आ पाए, तो मैंने पूछा कि क्या हुआ। जवाब मिला, जो किराये की गाड़ी लेकर ससुराल आए थे, वह रास्ते में खराब हो गई, जो समय आपके यहां लगना था, वह रोड पर ही लग गया। वे निजी काम के लिए सरकारी वाहन के इस्तेमाल से बचते हैं। उनके पिताजी भी पुलिस अधिकारी थे। बताते हैं कि पिता जी जो भी बोलते थे, अभयानन्द जी सिर झुकाकर मानते थे। व्यवहार कुशल हैं, प्रणाम करेंगे, सिफारिश भी सुनेंगे, लेकिन वही करेंगे, जो उचित होगा, गलत काम नहीं करेंगे। काम सरकारी वही होगा, जो सही होगा। ऐसे ही पुलिस अधिकारी चाहिए, ऐसे लोगों को आगे लाकर काम करना-कराना चाहिए। ऐसा नहीं है कि देश चलाने लायक लोग नहीं हैं।
उत्तर प्रदेश में मायावती ने एक वैश्य को डीजीपी बनवाया था। ये अधिकारी ऐसे थे कि मायावती भी अन्याय की बात करेंगी, तो वे विरोध करेंगे, भले ही इस्तीफा दे दें। जाति ही सबकुछ नहीं है। चरित्रवान कहीं भी पैदा हो सकता है, उसका जाति से कोई सम्बंध नहीं है। महात्मा गांधी भी तो वैश्य थे। जाति के आधार पर गाली देने की परंपरा बहुत गलत है। श्रेष्ठ लोगों का हर स्थिति में सम्मान होना चाहिए, लेकिन आज लोग श्रेष्ठता का सम्मान कम करने लगे हैं। आप कीजिए, अभी से शुरू कीजिए, ऊर्जा फैलेगी और ईमानदार और श्रेष्ठ लोगों का एक समूह तैयार होगा। पुलिस के अच्छे अधिकारियों को अभी कह दिया जाए कि सुधार कीजिए, काम कीजिए, तो ये एक सप्ताह में किसी भी राज्य को रामराज्य जैसा बना देंगे, एक गलत काम नहीं हो सकेगा, लेकिन अच्छे पुलिस अधिकारियों, अच्छे प्रशासनिक अधिकारियों को काम नहीं करने दिया जाता है।  क्रमश:

समस्याओं का समाधान

भाग - पांच
आज के समय में श्री माधवाचार्य जी बहुत अच्छे महात्मा हैं। विहिप के संस्थापकों में रहे हैं, उनको देखने से ही लगता है कि वे ऋषि समान हैं। एक बार वे श्रीमठ आए थे, वहां ऋंगेरी के शंकराचार्य जी भी थे, द्वारिका-जोशी मठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद जी भी थे, मैं भी था। मंच पर हम बैठे थे। सभा के उपरांत मैंने किसी से पूछा, ‘आपको सबसे तेजस्वी कौन लग रहा था?’
उन्होंने पूछा, ‘आपको बुरा तो नहीं लगेगा?’
मैंने कहा, ‘नहीं बुरा लगेगा, बताइए।’
तब उन्होंने कहा, ‘माधवाचार्य जी सबसे अच्छे महात्मा लग रहे थे।’
वास्तव में माधवाचार्य जी का बोलना, उठना, बैठना ऐसा है कि उसमें कहीं से कोई नकलीपना नहीं है। आज तो कई महंत ऐसे बैठते हैं, जैसे कोई अहिरावण बैठा हो। बैठा नहीं जा रहा है कि कमर में दर्द है, ऐसे-ऐसे बैठे रहते हैं कि चित्र खराब हो जाता है। दिखावा वाले महंत यह भी सोचते हैं कि कहीं लोग यह न समझ लें कि छोटा वाला महंत है। क्या अकड़ कर बैठने से कोई बड़ा महात्मा हो जाएगा? अकड़ कर बैठने से तो सिनेमा की शूटिंग तक खराब हो जाती है, तो अध्यात्म की शूटिंग कहां चलने वाली है? यदि कोई आदमी फिल्म की शूटिंग करा रहा हो, तो प्रसंग के अनुसार उसे हंसना, मुस्कराना, रोना पड़ता है। प्रसंग है कि मुस्कराना है और वहां कोई अट्ठाहास करने लगे, तो कैसे चलेगा? धर्म के क्षेत्र में अकडऩा कैसे चलेगा? सबसे बढक़र शालीनता बनी रहनी चाहिए। हमारे राष्ट्र का सौभाग्य है, आज भी अच्छे-अच्छे संत हैं, एक से एक बड़े संत हैं, लेकिन क्या कभी रामदेव जी ने या अन्ना हजारे ने उन्हें पूछा है? कभी नहीं पूछा। वे तो ऐसे लोगों को साथ रखते हैं, जिनकी सनातन धर्म में कोई खास जगह नहीं है। महात्मा माधवाचार्य जी उन लोगों में से हैं, यदि उनको कहना होगा, तो वे सोनिया गांधी और मनमोहन ङ्क्षसह को भले बहुत प्रेम कर रहे हों, लेकिन वे जरूर कह देंगे कि यह गलत हो रहा है।
एक बार हमसे उन्होंने कहा कि विज्ञप्ति जारी की जाए, राष्ट्रहित में जारी की जाए। विज्ञप्ति तैयार हुई, उसे जब शंकराचार्य जी को दिखाया गया कि हम दोनों ये जारी कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि जो पापी हैं, अपने आप ही मर जाएंगे, आप लोग क्यों राजनीति में पडक़र ये कष्ट उठाना चाहते हैं। विज्ञप्ति जारी नहीं हुई। तो माधवाचार्य जी को कहीं से कोई लागलपेट नहीं है। इतना बड़ा विद्वान, धनवान और धर्म के लिए काम करने वाले महात्माओं में दस लोग होंगे, तो एक नाम माधवाचार्य जी का है।
हमने समझना होगा कि रामजी ही रामराज्य के संस्थापक पुरुष हैं। हिन्दू राष्ट्र का अर्थ ही रामराज्य है। लफंगों का राष्ट्र नहीं। मैंने पहले भी कहा था कि मांस खाना, शराब पीना और सारे गलत काम करना, यदि यह चलता रहे और यदि इसे हिन्दू राष्ट्र कहा जाए, तो इससे तो धर्मनिरपेक्ष शासन ही ठीक है। मैं किसी की निंदा कर रहा था, जो मांस भी खाते थे, शराब भी पीते थे और श्रीराम का नारा भी लगा रहे थे, तो इससे अच्छा है कि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र ही बना रहे।
चाहे कांग्रेस के माध्यम से आए या भाजपा या वामपंथियों के माध्यम से आए, रामराज्य की कल्पना तभी साकार होगी, जब शास्त्रीय भावनाओं को या उपनिषद की भावनाओं को, रामजी की भावना पर लोग ध्यान लगाएंगे और रामजी के अभियान से प्रेरणा लेंगे।
संसार में बिन लादेन या दाऊद सबसे बड़े अपराधी नहीं हुए, संसार में रावण जैसा आतंकवादी या व्याभिचारी कोई नहीं हुआ। सबसे बड़ा आतंकवादी कौन - रावण। सबसे बड़ा व्याभिचारी कौन - रावण। नैतिकता ताक पर रखने वाला सबसे बड़ा अपराधी कौन - रावण। सबसे ज्यादा धन का संग्रहकर्ता कौन - रावण। ऐसे रावण को रामजी ने जड़ से उखाड़ दिया और स्वयं कुछ भी नहीं लिया, वहीं का वहीं दे दिया, विभीषण को दे दिया। हां, उससे पहले विभीषण को उत्तराधिकार के लिए तैयार किया, उत्तराधिकारी जोरदार होगा, तभी तो विरासत को बहुत दिन तक बनाए रख पाएगा। अभी कल्पना करिए सब काला धन स्विस बैंक से आ जाए, तो फिर चला जाएगा। जब तक अभी जो लोग हैं, नहीं सुधरेंगे, लोगों में राष्ट्रीय भावना, ईश्वरीय भावना, धार्मिक भावना नहीं होगी, तब तक धन नहीं रुकेगा, फिर काला होकर विदेश चला जाएगा। इसलिए इन भावनाओं को संजोना होगा, ताकि धर्म और धन की शुचिता बनी रहे। रामजी इन भावनाओं को तैयार करते हैं, अपनी सेना को पहले ही तैयार कर दिया कि आपका आचार भी पवित्र है, धर्म भी पवित्र, धन भी पवित्र है। धन का सदुपयोग कैसे होगा, इसके लिए पूरी सेना सौ प्रतिशत तैयार है। अभी तो उत्तराधिकारी बनने के लिए ही झगड़ा चल रहा है। एक से एक लोग लगे हुए हैं, पद के पीछे। कहां से क्या हड़प लिया जाए, यही षडयंत्र जारी हैं।
पहले अच्छी टीम तैयार होनी चाहिए, रामजी से प्रेरणा लेनी चाहिए। रामजी ने जिसको साथ लिया, उसको इतना सक्षम बना दिया कि वह लंका को संभाल सकता था, विभीषण ने संभाला, सुग्रीव ने संभाला, निषादराज ने अपने राज को संभाला, कहीं भरत जी को राजा बनाकर भेजा, कई लोगों को राजा बनाया और अपने बेटों को रामायण गायन में लगा दिया। कुश और लव रामायण गा रहे हैं। आइए, इस अद्भुत, अतुलनीय आदर्श से हम सीखें और समस्याओं का समाधान करें। क्रमश:

Sunday, 10 June 2012

श्रीमठ दर्शन



श्रीमठ के सामने गंगा और उस पार श्रीमठ का ही एक आश्रम है, जहाँ गोशाला भी है, श्रीमठ में बच्चों और छात्रों के लिए वहीं से रोज दूध आता है  

बोट (बड़ा वाला ) जो एक भक्त ने श्रीमठ को भेंट किया है.

यह हजारा है, हजार दीपों का स्टैंड. इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने १८वी सदी में काशी विश्वनाथ मंदिर और श्रीमठ का जीर्णोधार करवाया था, तभी यह हजारा बना. इसके बगल में एक छोटा हजारा भी है. देव दीपावली को इसे रौशन किया जाता है, तब देखने के लिए बनारस भर के लोग जुटते हैं और गंगा की रौनक देखने लायक हो जाती है. हजारा के लिए आइना बन जाती है गंगा मैया.

श्रीमठ की चौथी मंजिल की बालकनी या गलियारा, जो हमेशा के लिए याद रह जाता है.  
श्री विधान जी, अर्थात श्रीमठ के हनुमंत, सीधे सज्जन मृदुभाषी संत, जब जगदगुरु श्रीमठ में नहीं होते हैं तो विधान जी ही पूरी देख रेख करते हैं, संतों की सेवा में कोई कमी नहीं, श्रीमठ में रहकर पढ़ रहे छोटे छोटे बच्चों से घिरे रहने वाले, विधान जी सबके बाबा हैं, कोई बालक नेपाल से आया है तो कोई बिहार से तो कोई पूर्वोत्तर भारत से, तो कोई राजस्थान से, विधान जी कहते हैं, हमारा क्या त्याग है, त्याग तो इन बच्चों का है, घर बार से दूर, माता पिता से दूर, बस दो बार खाना मिलता है, सन्यासी का जीवन है, त्याग तो इन बच्चों का है. हम तो इनकी उम्र में चार पांच बार खाते थे, जेब में भूजा रखते थे, जब भूख लगी खा लिया, बच्चे हैं, पढ़ लिख लेंगे तो कोई घर सांसारिक जीवन में लौट जाएगा तो कोई सन्यासी बन जाएगा, कोई कहीं पढ़ाने लगेगा.
एक बालक बहुत विद्वान भी है, उसे संस्कृत में काफी कुछ याद है, मैं उससे पूछता हूँ, क्या घर लौटना चाहते हो? वह बालक जवाब देता है, नहीं घर नहीं लौटूंगा, यहीं रहूँगा पढूंगा.
विधान जी की छत्र छाया में बच्चे खुश हैं,  और विधान जी तो तब खुश होते हैं जब जगदगुरु श्रीमठ में विराजते हैं, विधान जी बहुत भाव बिभोर होकर कहते हैं, हमारे लिए तो वही राम हैं.

Wednesday, 6 June 2012

श्रीमठ दर्शन

श्रीमठ की तीसरी मंजिल पर विराजमान पावन चरण पादुका और जगदगुरु रामानंदाचार्य जी महाराज
श्रीमठ की बाईं ओर के घाट और गंगा जी 

श्रीमठ की दायीं ओर के घाट और गंगा जी   

श्रीमठ के ठीक सामने का घाट और श्रीमठ की बोट (सबसे बड़ी वाली), बनारस की गलियों में जब भीड़ रहती है, तब महाराज जगदगुरु इसी बोट के सहारे दूसरी घाट पर जाकर वहां किसी सड़क वाहन में विराजते हैं. श्रीमठ तक किसी सड़क वाहन के जाने की सुविधा नहीं है. श्रीमठ से करीब एक सवा किलोमीटर दूर वाहन छोड़ देना पड़ता है, और फिर गलियों से होते हुए करीब दस- बारह जगह मुड़ने के बाद गंगा और श्रीमठ के दर्शन होते हैं. जब गलियों में ज्यादा भीड़ नहीं होती और जगदगुरु के पास पूरा समय होता है तो वे भी गलियों से होते हुए लोगों को दर्शन देते हुए निकलते हैं.


बस इतना ही बचा है श्रीमठ, ऊपरी मंजिल अर्थात पांचवी मंजिल पर महाराज के विश्राम का कमरा है, यह कमरा भी छोटा ही है, सुविधा के बहुत जरूरी सामान ही यहाँ हैं. जब यह कमरा नहीं बना था तब महाराज वर्षों तक चतुर्थ मंजिल में रामजी के बगल वाले छोटे से कमरे में रहते थे

चतुर्थ मंजिल पर रामजी के मंदिर के बाहर हॉल में महाराज के बैठने का स्थान झूला. यहाँ महाराज आगंतुकों से मिलते हैं.



समस्या का समाधान

भाग - चार
श्याम मनोहर कृष्ण तो एक ही थे, उनकी हजारों गोपियों और पत्नियां थीं, किन्तु किसी का ‘हार्ट फेल’ नहीं हुआ। किसी ने कृष्ण के विरुद्ध याचिका दायर नहीं की। गोपियां यदि मिलकर हंगामा करतीं, तो भागवत की कथा ही नहीं होती। आप कल्पना कीजिए, जिन्होंने अपना रोम-रोम श्यामसुन्दर को दे दिया, उनसे अधिक समर्पण, प्रेम, सेवा की भावना, आत्मीय भावना या जितने श्रेष्ठ भाव हैं, वो किसी में नहीं हैं और उसके बाद भी कोई बनावट नहीं है। फिर भी लोग कहते हैं कि कृष्ण जी बहुत प्रेमी हैं और भक्ति के आचार्य के रूप में गोपियों को देखा जाता है, उनसे ज्यादा प्रयोग और ज्ञान किसी को भक्ति का नहीं है। आचार्य क्या है? जिसने सर्वस्व को समझा और जिसने सम्पूर्ण जीवन का सार समझा और जीवन में उतारा, उसी को आचार्य कहते हैं। आज तो आचार्य बनाने वालों को ही आचार्य शब्द के अर्थ का ज्ञान नहीं है। भ्रष्टाचार और आतंकवाद के विरुद्ध आंदोलन करने वाले को भ्रष्टाचार का ज्ञान नहीं है। अन्ना हजारे से कोई पूछे कि भ्रष्टाचार आपको सिर्फ धन का ही दिख रहा है? आज तो ऐसी स्थिति हो गई है कि कोई घर आता है, तो कोई पानी भी नहीं पूछता। आचार्य भी आते हैं, तो कोई बैठने को नहीं कहता। मेरे सामने लोग कुर्सी पर बैठने में संकोच करते हैं, किन्तु जिनके पैरों में कष्ट होता है, उन्हें मैं स्वयं कुर्सी पर बैठने के लिए कहता हूं, यही शिष्टाचार है। यदि आचार्य ही भ्रष्ट होंगे, तो उनका कोई महत्व नहीं रह जाएगा। मैं कह देता हूं कि वरिष्ठता का हनन करके लोकतंत्र में यदि किसी जूनियर को आगे ले आया जा रहा है, तो यह भ्रष्टाचार है या नहीं? ऐसे सामाजिक-मानसिक भ्रष्टाचार के सामने धन का भ्रष्टाचार भी छोटा लगता है। सास आए और बहू बैठने को भी न कहे, तो कैसे चलेगा?
आज लोगों को भ्रष्टाचार का वास्तविक स्वरूप ही समझ में नहीं आ रहा है। ऐसे भ्रष्ट आचरण पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चला रहे लोग भी चुप हैं।
रामजी का जो अभियान है, उसे देखना चाहिए। रामजी ने साधन का संग्रह नहीं किया, किसी पार्टी या किसी जाति या किसी अमुक की कोई भी अपेक्षा नहीं की, जो मिलता गया, उसे जोड़ लिया, सुग्रीव मिले, तो उन्हें जोड़ा, जामवंत मिले, तो उनको जोड़ा। निषादराज मिले, तो उनको और अनेक-अनेक व्यक्तियों को अपने साथ जोड़ा।
रामजी ने कहा कि हमारे पास कुछ नहीं है कि आपको वेतन देंगे, जैसे मैं फलाहार करता हूं, आप भी करिए, नंगे पांव मैं हूं, आप भी चलिए।
आप सोचिए, यदि मैं रोज इत्र लगाकर यहां बन-ठनकर ब्यूटीपार्लर से सजकर आऊं, तो मैं आपको कैसा उपदेश दूंगा या कैसा उपदेश दे सकूंगा। आज यही हो रहा है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन करने वालों को चुनाव प्रचार में नहीं जाना चाहिए था। मेरा कहना है, कांग्रेस ने चालीस साल निरंतर राज किया, तो अवश्य उसका पैसा विदेशी बैंक में होगा, किन्तु जिन्होंने छह साल राज किया, उनका भी तो होगा, भले कुछ कम ही हो। उन लोगों को साथ नहीं जोडऩा चाहिए था, यदि आपने उनको जोड़ा, तो लगा कि आप उनके इशारे पर काम कर रहे हैं। ये लोग रामराज्य की बात क्या करेंगे? इनके साथ कितने सच्चे लोग हैं? रामजी के अभियान में बहुत लोग थे और सभी त्यागी, समर्पित, नि:स्वार्थ। क्या रामराज्य चंद लोगों के दम पर ही आ जाएगा? ध्यान रहे, रामराज्य लानेे के लिए त्रेता युग में भी रामजी को सेना बनानी पड़ी थी। आज अनेक बड़े-बड़े संत हैं, उन्हें साथ नहीं लिया जा रहा है। आंदोलन या अभियान कैसे चलेगा, यह पता ही नहीं है। जिस आदमी को यह ज्ञान नहीं है कि अनशन कैसे तोड़ा जाता है, किसके हाथों से रस पिया जाता है, वह कैसे और कितना सफल होगा?
उधर रामजी को देखिए, अपने समय के महान चिंतकों, मनिषियों, ऋषियों के पास आश्रमों में जा-जाकर रामजी दंडवत करते हैं। रामराज्य की स्थापना के कुछ सूत्र हैं, उन्हें अपनाना पड़ेगा। जो सात्विक जीवन के लोग हैं, जिनके जीवन में दाग मात्र नहीं हैं, उनसे आप सहयोग लें, प्रेरणा प्राप्त करें, उनसे आपका आधार बन जाएगा। यह आपके लिए औषधि बन जाएगी। शल्य क्रिया की भी आपके पास तैयारी होनी चाहिए। जैसे अफगानिस्तान में नाटो सेना वाले संहार करते हैं और बाद में जाकर सडक़ बनाना, विधानसभा बनाना और इसमें भारत से भी सहयोग दिया जाता है। शल्य क्रिया के उपरांत दवा देना, मरहम पट्टी करना यह सब जरूरी है। सकारात्मक परिवर्तन की तैयारी हर तरह से होनी चाहिए। रामराज्य में विचारों से परिवर्तन होगा, उसके लिए प्रयास करना होगा, किन्तु आज दुनिया का कौन-सा संगठन है, जो रामजी के अभियान से प्रेरणा ले रहा है?
सभी ऋषियों, मुनियों के आश्रम में रामजी जाते हैं, वोट मांगने के लिए नहीं जाते हैं, उनके विचारों का संग्रह करने, उन विचारों का प्रयोग करने, उन विचारों को अपने जीवन में उतारने के लिए जाते हैं। जरा देखिए तो कि गुरु वशिष्ठ जी के प्रति रामजी में कितना आदर का भाव है। जब आप श्रेष्ठ जन के प्रति आदर का भाव ही नहीं रखेंगे, तो आप क्या श्रेष्ठ पद का उपयोग कर पाएंगे? रामजी ने विश्वास के साथ शुरुआत किया कि राम भाव के विकास की परंपरा, योजना चलनी चाहिए।
हम दुनिया की बात बाद में करेंगे, अपने देश में जिन लोगों ने शताब्दियों तक समाज को प्रभावित किया, जिनके जीवन में क्षण-क्षण में राष्ट्रीय भावना है, मानवता की भावना है, राम राज्य की भावना है, वे सभी लोग पवित्र जीवन के लोग हैं, इनका आचरण और धर्म भी पवित्र है। शास्त्रों से जो ऊर्जा निकल रही है, ये उसके पक्षधर हैं। आज भ्रष्टाचार कहां नहीं हो रहा है? आदि शंकराचार्य ने चार मठ बनाए थे, उनके किसी मठ पर उनका कोई भाई-भतीजा नहीं है, किन्तु अब मठों में क्या हो रहा है, यह भी तो देखा जाए। राम भाव के प्रकाश में जीवन सुधार की आवश्यकता है। क्रमश:

Tuesday, 5 June 2012

समस्याओं का समाधान

भाग - तीन
जब अभियान करने वाला, ऑपरेशन करने वाला, बुराई को दूर करने वाला, नई ताजा, स्वच्छ और प्रबल धारा को स्थापित करने वाला व्यक्ति सही जीवन का नहीं होगा, तो उसके साथ कौन जुड़ेगा? इसीलिए इन दोनों समस्याओं के समाधान के लिए राम चरित्र से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। देखना होगा कि रामजी ने किन सूत्रों के आधार पर आतंकवाद या भ्रष्ट आचरण का विरोध किया। आप ध्यान दीजिए, राम जी लंका गए, लंका पर विजय प्राप्त किया, लेकिन वहां से एक किलो सोना भी लेकर नहीं आए, यदि आज के दौर के लोग गए होते, तो शायद सेना के लोग ही लूटकर ले आते, वहां इतनी नारियां थीं। रावण जब कहीं आक्रमण-अभियान के लिए चला जाता था, तो उसकी जितनी महिलाएं वहां होती थीं, मंदोदरी उन्हें कारागार में बंद करवा देती थी। रावण का क्या था, जहां गया, नारियों का हरण करके लाया, दो-तीन दिन साथ रखा, फिर कहीं गया तो फिर दूसरी-तीसरी ले आया। रावण को कहां ध्यान है? उस महिला को काम में लगाने का काम, दबाकर रखने का काम मंदोदरी देखती थीं। जब रावण मारा गया होगा और जब राम जी ने कहा होगा कि सबको स्वतंत्र कर दो, कोई भी कारागार में नहीं रहेगा, तो न जाने कितनी शोषित महिलाएं व तमाम दूसरे शोषित लोग छूटे होंगे। दूसरे सैनिक होते, तो पांच-पांच नारियों को साथ लेकर लौटते। नागों की, किन्नरों की, गंधर्वों की महिलाएं, फिर से हर ली जातीं। किन्तु रामजी की सेना थी, उसने कुछ नहीं किया। एक औरत नहीं, एक कोई आभूषण नहीं, एक सोना नहीं, कुछ भी नहीं, रामजी ने वहीं का वहीं सबकुछ उसे सौंप दिया, जो सही था। रावण का ही भाई, जो परिशुद्ध जीवन का है, जिसके विकार राम भाव में धुल चुके हैं। निस्संदेह, राम भाव आए बिना व राम भक्ति आए बिना जितने भी विकार खुराफात के कारण हैं, वे धुलते नहीं हैं। जल से सफाई धोने का श्रेष्ठ तरीका है। झाड़ऩे से भी पूरी गंदगी नहीं जाती है, पूरी गंदगी खत्म करने के लिए धोना पड़ता है। मस्तिष्क में जो मल या विकार हैं, काम, क्रोध, लोभ, भोग की भावना, ईष्र्या, इन सबकी एकमात्र सबसे बड़ी दवा है रामभाव। विभीषण को राम जी ने जब राजा घोषित किया, तो कहा कि आइए लंकेश, तो वह लजा गया कि राम जी को तो उसके मन की बात पहले से पता है। तब विभीषण ने कहा कि आपकी सेवा का मन है।
तुलसीदास जी ने विभीषण की बात को इस तरह लिखा है, उर कछु प्रथम बासना रही। पहले मेरे मन में कुछ वासना थी, भोग की, राजा बनने की, सजने की, पत्नियों की...। वैसे सात्विक व्यक्ति बहुत भोगी नहीं होता है। जो आदमी रजोगुणी है, वह बहुत भोगी होता है। दिन भर इसीमें लगा रहता है कि कुर्ता कौन-सा पहने, क्या खाए, क्या पीए, बाल कैसे झाड़े, कैसे उठे-बैठे कि अच्छा दिखे। हमारे चातुर्मास में एक लडक़ी आती थी, कभी बाल संवारे, तो इधर कर ले, तो कभी उधर कर ले। मैंने पूछा कि यह कौन लडक़ी है, उत्तर मिला, यह कथा करती है। अब बताइए, उसे यही समझ में नहीं आए कि बाल किधर कर लूं कि ठीक लगूं। यह दिशा, चिंतन ठीक नहीं है।
रावण जैसा भोगी था, लंपट था, उसमें आवश्यकता से बहुत ज्यादा संग्रह करने की प्रवृत्ति थी, किन्तु विभीषण में ऐसा नहीं था, क्योंकि वह सतोगुण प्रधान था। वातावरण, परिवेश, पिछले जन्म का कुछ पाप और जब लंका में वही-वही रोज हो रहा था, तो कुछ तो असर पड़ता ही है। फिर भी यदि उसे लगता है कि पापी क्यों राजा होगा, मैं राम-राम करने वाला क्यों राजा नहीं हो सकता, तो इसमें क्या अनुचित है। जब कोई अक्षम व्यक्ति भी बड़े पद पर बैठा रहता है, तो दूसरे व्यक्तियों को लगता है कि हम सक्षम हैं, हम ज्ञानी हैं, तो क्यों न हम उस पद पर बैठें, तो इसमें क्या अनुचित है?
तो तुलसीदास जी विभीषण की बात लिखते हैं, उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही। 
अर्थात पहले मेरे हृदय में कुछ वासना थी, किन्तु आपके चरणों में मेरी प्रीति ने सरिता का रूप धारण कर लिया। पहले आपका चिंतन करते-करते आपकी महिमा का ज्ञान बढ़ा। जब हनुमान जी लंका आए, आपकी महिमा का गान किया, तब मेरी प्रीति और बढ़ी और जब आपको देखा, तो मेरी प्रीति ने नदी का रूप धारण कर लिया और मेरे अंदर जो कुछ वासना थी, वह बह गई।
सही प्यार का क्या स्वरूप है? वैष्णव दर्शन में बताया गया है, जब प्रेम बढ़ता है, समाज में, जाति में, परिवार में, तो उसमें लेने का भाव कम होता है। देने-देने का ही भाव होता है। इसे वैष्णव दर्शन में तत्सुख सुखोत्तम कहते हैं। प्रिया को सुख मिले, यह प्रियतम की भावना होती है। यदि वह सुखी है, तो हम सुखी हैं और प्रिया सोचती है कि हमें अपने सुख की कोई परवाह नहीं, जो होगा देखा जाएगा, बस हमारा प्रेमी या प्रियतम खुश रहे। क्रमश:

Thursday, 31 May 2012

समस्याओं का समाधान

भाग - दो
सम्पूर्ण संसार ईश्वर से व्याप्त है। उसी का कार्य है और कारण से कार्य व्याप्त होता है, जैसे सूत से व्याप्त है वस्त्र। बहुत दिनों से यह बात कही जाती रही थी, लेकिन इस ओर अब आंदोलन चलाने वालों का ध्यान नहीं है। जो अभियान चल रहे हैं, वो रामजी को मानक बनाकर, प्रेरणा का स्रोत बनाकर, उदाहरण बनाकर चलाए जाएं, तो सफल होंगे। जब आपको ज्ञान ही नहीं है कि धन की पवित्रता कैसे होती है, इसके लिए किन किन उपायों को सामने लाना चाहिए और हमको कैसा होना चाहिए, तो कैसे चलेगा? यदि हम चाहते हैं कि यह अभियान चले और सफल हो, तो हमें भगवान राम से सीखना पड़ेगा।
लिखा है कि जब भरत जी जा रहे थे अयोध्या के लिए, तब बहुत चिंतित थे कि राज्य की संपत्ति की सुरक्षा कैसे होगी। यह चिंता बाद में भी बनी रही। किसी ने पूछा उनसे, आप इतने बड़े राजा हैं और आपको बिल्कुल लोभ नहीं है, कोई आपका औचित्य नहीं है कि मैं राजा बन जाऊं, जिसके लिए देवता भी तरसते हैं, कुबेर भी लज्जित होते हैं और आपको यहां धन की सुरक्षा की चिंता हो रही है, यह कैसे? आपको चिंता है कि धन की हानि नहीं हो जाए, आप एक आसक्त व्यक्ति की तरह व्यवहार कर रहे हैं। तब भरत जी ने कहा कि सारी संपत्ति रामजी की है, मैं तो उनका नौकर हूं, मैं उनको स्वामी मानता हूं, थोड़ा भी कुछ नुकसान हो जाएगा, तो हम बड़े अपराधी हो जाएंगे, हमें सेवक कहलाने का मान नहीं रहेगा। सेवक का मतलब होता है कि वह स्वामी के ऐश्वर्य और मान को बढ़ाए और यदि जो बढ़ा हुआ है, उसे ही घटा दे, उसकी रक्षा नहीं करे, तो फिर कैसे चलेगा? तो रामराज्य का यह सूत्र है - सम्पूर्ण संपत्ति ईश्वर की है। उस संपत्ति का हम उतना ही उपभोग करें, जिससे हमारी नितांत आवश्यकताएं तृप्त हों, बाकी जो हम जरूरत से अधिक संचय या उपभोग करते हैं, वह गलत है।
रामजी भी जो अभियान चलाते हैं, वे इसलिए अभियान नहीं चलाते कि लंका से हमें सारा माल-संपत्ति मिल जाए। वे भी मानते हैं कि सम्पूर्ण संपत्ति आध्यात्मिक दृष्टि से ईश्वर की है, इसका सही विनियोग, सही अर्जन, सही संरक्षण, सही भंडारण का भाव होना चाहिए।
जब बाली को रामजी ने मारा, तो बाली ने पूछा कि आपको मारने का क्या अधिकार है, राम जी ने कहा, मैं रघुवंशी हूं, मैंने रघुवंशियों के विधान के तहत आपको मारा है, अभी रघुवंशियों के राजा भरत हैं, मैं उनकी आज्ञा व सिद्धांत के परिपालन क्रम में आपको मार रहा हूं। रघुवंशियों का नियम है, जो भाई की पत्नी को रख ले, वह मारा जाता है, आपने छोटे भाई की पत्नी को रख लिया। मैं यों ही आपको नहीं मार रहा हूं, मैं रघुवंशियों के नियम व शास्त्र के अनुरूप यह कर रहा हूं।
वहीं बाली के मारे जाने के बाद सुग्रीव ने बाली की पत्नी को रख लिया, ऐसा प्रावधान है। अगर भाई मर जाए, तो उसकी पत्नी से विवाह हो सकता है, विवाह न होगा, तो समाज में अपवित्रता व अराजकता बढ़ेगी। आयु है, इच्छाएं हैं, महत्वाकांक्षाएं हैं। सुग्रीव ने जो किया, वह समाज सम्मत था, लेकिन बाली ने तो अपने छोटे भाई के जीते जी उसकी पत्नी को बलात रख लिया था। रामजी वही करते हैं, जो नियम व समाज सम्मत है। हम यदि खोज करें, तो पाएंगे कि शास्त्रों की मान्यता के आधार पर सभी समस्याओं का समाधान है।
आज जो बातें हो रही हैं, वह मनमानी ढंग से हो रही हैं। हर आदमी चाहता है कि हमारे स्वयं का धन, संप्रभुता, मान, बढ़ जाए। यह जो व्यवस्था संविधान के आधार पर बनी है, उसमें तमाम खामियां रह गई हैं। लोगों को आज न उपनिषद से कोई लेना-देना है न पुराणों से लेना-देना है और न इतिहास से कुछ लेना-देना है। यदि किसी भी तरह के अच्छे संघर्ष को सफलता पूर्वक लंबे समय तक चलाना है, तो इस काम को शास्त्र-सम्मत दिशा में ले जाना होगा। दुनिया में जो लोग पवित्र हैं, जिनका आचरण, भोग, धन पवित्र है, व्यवहार पवित्र है, उसमें अधिकांश लोग जाने या अनजाने रूप में शास्त्र के तहत ही चल रहे हैं। महात्मा गांधी को राम पर विश्वास था, रामराज्य पर विश्वास था, इसलिए वे किसी गद्दी या राज-पाट के पीछे नहीं दौड़े। आज जो लोग अभियान चला रहे हैं, उन सभी लोगों को राम जी के अभियान पर ध्यान देना चाहिए। कैसे आतंकवाद की समाप्ति के लिए लोग बिना वेतन रामजी के साथ लग गए थे, जहां भोजन की भी कोई सामूहिक व्यवस्था नहीं थी, वानर इत्यादि अपना भोजन स्वयं जुटाते थे। रामजी के पास भी कंबल, धोती, आसान कुछ भी नहीं था, लेकिन लोगों के सामने अपनी बात को उन्होंने इस तरह से प्रस्तुत किया कि संसार में बहुत गलत हो रहा है, आपका ही धन लंका में है, आपके साथ अन्याय हो रहा है, भयानक शोषण हो रहा है, देखिए हम भी चल रहे हैं, हमारे पैरों में भी जूता नहीं है, झोली में पैसा नहीं है, अंगुलियों में अंगूठी नहीं है, हमारे सिर में भी सुगंधित तेल नहीं है, वस्त्र पर इत्र नहीं है और मैं आपके साथ हूं, यह लड़ाई हम सबके लिए है।... और असर देखिए, सब रामजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आतंकवाद और भ्रष्टाचार मिटाने के लिए चल पड़ते हैं।
अब तो अनशन भी बहुत महंगा होने लगा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ जो अनशन किया गया, उसमें बहुत पैसा खर्च हुआ। आडवाणी जी ने भी यात्रा की। अपने समय में गांधी जी ने जो यात्रा की थी, उसी से प्रेरित होकर ये लोग यात्रा करते हैं, किन्तु गांधी जी ने पैदल यात्रा की थी, उनके लोग जमीन पर बैठकर खाते थे, कहीं उन्हें छप्पन भोग नहीं मिलता था, लेकिन अब नेताओं की यात्राओं का बजट प्रस्तुत किया जाए, तो आश्चर्य होगा। एसी गाड़ी, होटल में ठहरना, खूब खाना-पीना। अगर इनसे पूछ लिया जाए कि कितना खर्च हुआ यात्रा में, तो ये लोग धनी घरानों के बराबर सिद्ध हो जाएंगे। फिर सोचिए, आपके साथ गरीब भला क्यों खड़ा होगा? क्रमश:

Wednesday, 30 May 2012

समस्याओं का समाधान

आज देश दुनिया का अहम मुद्दा है, सबसे बड़ी समस्या व चिंता का विषय है कि चारों ओर आतंकवाद, चारों ओर भ्रष्टाचार है और सारी जो अच्छी व्यवस्थाएं हैं, टूट रही हैं। इसके लिए कौन-सा समाधान होना चाहिए, कौन-सा रास्ता निकालना चाहिए, इसकी चिंता में दुनिया व देश के सभी मनीषी व तत्वज्ञानी और सभी जो नायक हैं राष्ट्र के, संसार के, वे सब लगे हुए हैं। हमारे संसार में आतंकवाद के निदान के लिए और भ्रष्टाचार के निदान के लिए पहले भी अभियान चले हैं, तब भी सामाजिक मान्यताएं विखंडित हो रही थीं, टूट रही थीं, गलत ढंग से उनका निरूपण हो रहा था, तब समाधान केे लिए जो लोग लगे, उसमें सबसे बड़ा प्रयास भगवान श्रीराम का है। भगवान श्रीराम के समय में समस्त दुराचारों का सम्पादक शिरोमणि रावण उपस्थित था, जिसमें मानव या मानवता से विरुद्ध कोई पराकाष्ठा शेष नहीं थी। वह आतंकवादी भी, दुराचारी भी, भ्रष्टाचारी भी, सर्वस्व समाज का सर्वस्व दोहन करके वह लंका में था। आजकल कभी-कभी बलात्कार, अपहरण होता है, लेकिन लंका में तो बलात्कार, अपहरण का अड्डा ही था। नारियों की कोई सीमा नहीं, भोग की कोई सीमा नहीं, मांस-मदिरा की सीमा नहीं है, वैसे ही रावण के पास बल भी था, सेना भी थी, लेकिन कोई नियम-कानून नहीं, मन में आया, तो कहीं भी आक्रमण कर देना। रावण को देख राजा लोग ऐसे भागते थे, जैसे बाघ को देखकर दूसरे जीव जंगल में भागते हैं। ऐसे दुराचारी व मानवता के शोषक व्यक्ति के विरुद्ध रामजी ने जो अभियान चलाया, वह बहुत ही प्रेरणादायक है और ऐसा अभियान, जिसने अपने समूह से एक पैसा नहीं लिया। इतना बड़ा आतंकवाद निरोधक व भ्रष्टाचार निरोधक अभियान के लिए रामजी ने अयोध्या से एक व्यक्ति को भी नहीं बुलाया, एक पैसा नहीं मंगाया, लेकिन उस अभियान में उन्होंने लोगों को जोड़ा, वानरों को, भालुओं को, रिछों को, उपेक्षितों को। आज हम देखते हैं कि समाज के उपेक्षित-शोषित वर्ग को बरगलाकर आतंकवादी बनाया जा रहा है। जहां-जहां नक्सल हिंसा चल रही है, वहां-वहां गरीबी है, आदिवासी हैं, उन्हें बरगलाया जा रहा है कि आपका शोषण हो रहा है। ठीक इसी तरह से मुसलमानों को भडक़ाकर कि आपका शोषण कर रहे हैं हिन्दू लोग, आपको वहां का शासक होना चाहिए, गलत पढ़ाकर अशांति फैलाई जा रही है। लेकिन ऐसे ही उपेक्षितों को रामजी ने अपनी सेना में उस काल में शामिल किया था। जो लोग उस काल में आतंकवादी हो सकते थे, क्योंकि शोषित थे, जब उन्हें ही रामजी ने अपने साथ ले लिया, तो बड़ा अभियान छेडऩे में सफल रहे। आज राम जी के अभियान से लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए।
जहां से आतंकवाद और नक्सलवाद को ‘रॉ मेटेरियल’ मिल रहा है, उन इलाकों को अपने साथ लिया जाए और जो लोग आतंकवाद-नक्सलवाद को धन मुहैया करा रहे हैं, उन पर आक्रमण किया जाए, तो इससे उस समस्या का समाधान होगा, जो आज बहुत बड़ी समस्या बन चुकी है।
अन्ना हजारे या रामदेव जी जैसे जो लोग भी इस सम्बन्ध में वर्तमान काल में चर्चित हैं, जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध अनशन कर रहे हैं, अभियान चला रहे हैं। इनके पास समाज से जुड़े हुए दो-चार-पांच लोग ही ऐसे हैं, जिनकी छवि अच्छी है। आज ऐसे आंदोलनों को सफल होने के लिए एक बहुत बड़े समुदाय की जरूरत है। जो लोग शोषित हों, जो साफ सुथरी छवि के हों, जिनका कहीं से भी कोई बड़ा स्वरूप नहीं रहा हो, आंदोलन में वे लोग आएं, तो यह अभियान आगे बढ़ेगा। ऐसे आगे नहीं बढ़ेगा, जैसे अभी बढ़ रहा है। इसमें रामदेव जी ने जो अभियान चलाया, उसमें बालकृष्ण और रामदेव, बस दोनों ही दिखाए पड़े, वे स्वयं ही धन के ऊपर आधिपत्य वाले हैं, उनका अपना जो धन संग्रह है, वह संदेह की परिधि में है, उसमें त्रुटियां हैं। दूसरी बात, बहुत कम ही दिनों में ये लोग किसी पार्टी विशेष से जुड़े नजर आने लगे, यह गलत हुआ। चुनाव प्रचार करने की जरूरत नहीं थी। उनकी अपनी बात बोलनी चाहिए थी कि धन की पवित्रता को लाना है, अर्जन की पवित्रता को लाना है, धन संग्रह की पवित्रता को लाना है। सम्पूर्ण देश की संपत्ति सम्पूर्ण देश की है, जितनी जरूरत है, उतनी ही हमको मिलनी चाहिए। हमें दूसरे की संपत्ति नहीं चाहिए। उपनिषदों में लिखा है, जो व्यक्ति अपने उपभोग से ज्यादा संपत्ति अर्जित करता है, वह चोर है। जीवनयापन के लिए जितनी संपत्ति चाहिए, मकान कपड़ा, भोजन, यदि इससे ज्यादा आपने संग्रह कर लिया, बहुत ज्यादा संग्रह कर लिया, तो आप चोर हैं, महाचोर हैं। यह धारणा नई नहीं है, यह उपनिषद काल से चली आ रही है, किन्तु उसके अभिप्राय को भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ताओं ने भी नहीं पढ़ा होगा। अच्छे संघर्ष का अपना भारतीय विधान है, अपनी शैली है, लेकिन चिंता की बात है, आज जो लोग संघर्षरत हैं, वे भारतीय विधान को नहीं जानते। क्रमश:
(जगदगुरु का एक प्रवचन)

Monday, 28 May 2012

श्रीमठ : कल और आज

श्रीमठ की ऊपरी तीन मंजिलें 
गंगा मैया की गोद में कुछ आगे बढक़र गहरे तक रचा-बसा श्रीमठ, मानो मां की गोद में अधिकार भाव से विराजमान कोई दुलारी संतान। श्रीमठ की पांचवीं मंजिल पर बालकनी में खड़े होकर जब आगे-पीछे देखता हूं, तो लगता है, बनारस ने श्रीमठ को आगे खड़ा कर दिया है कि तुम आगे रहो, ताकि हम पीछे सुरक्षित रहें। श्रीमठ को देखकर अनायास यह अनुभूति होती है और समझ में आता है कि आखिर क्या होता है, बची हुई थोड़ी-सी जगह में खुद को बचाए रखना। श्रीमठ की यह बची हुई जगह आकार में अत्यंत छोटी है, लेकिन अपने अंतस में अनंतता और अपनी भाव गुरुता को संजोए हुए, प्रेम से सराबोर, भक्ति के अनहद नाद से गुंजायमान। संसार के अत्यंत कठिन व छलिया समय में क्या होता है सन्तत्व, यह केवल श्रीमठ को देखकर ही अनुभूत किया जा सकता है। यहाँ आकर जो अनुभूतियाँ होती हैं, वो दुर्लभ हैं और निस्संदेह, इन अनुभवों का सम्पूर्ण अनुवाद असंभव है।
बताते हैं जब गंगा जी का संसार में अवतरण नहीं हुआ था तब भी यह भूमि पावन थी. इस जगह को कभी श्री विष्णु ने अपना स्थाई निवास बनाया था. ग्रंथों में इस स्थान का उल्लेख धर्मनद नाम से भी हुआ है. इस तीर्थ को सतयुग में धर्मनद, त्रेता में धूतपापक, द्वापर में विन्दुतीर्थ एवं कलियुग में पंचनद नाम से जाना गया। धर्मनद तीर्थ तब भी था, जब गंगा जी नहीं थीं। धर्मनद तीर्थ पर दो पवित्र जल धाराएं मिलती थीं - धूतपापा और किरणा। यह संगम स्थल तब भी बहुत पुण्यकारी था। बाद में जब गंगा जी आईं, तो उनके साथ यमुना और सरस्वती भी थीं। बनारस की दो पावन धाराओं का मिलन तीन नई पावन धाराओं से हुआ और इस तरह से धर्मनद तीर्थ पंचनद तीर्थ कहलाने लगा।
पंचनद को ही लोगों ने बाद में पंचगंगा कर दिया, भगवान विष्णु द्वारा पवित्र किये गए इसी पंचगंगा घाट पर अनेक वैष्णव संतों ने निवास किया, जगदगुरु रामानन्द जी, श्री वल्लभाचार्य जी, संत एकनाथ, समर्थगुरु रामदास, महात्मा तैलंगस्वामी इत्यादि ने यहीं डेरा डाला. गंगा जी के आने के बाद बनारस में घाट तो खूब बन गए, ज्यादातर घाटों का विकास राजाओं ने करवाया, किन्तु संतों की कृपा व प्रेरणा से जो घाट बना, वह तो केवल पंचगंगा है. ग्रंथों में यह भी आया है कि इस घाट पर स्नान सर्वाधिक पुण्यकारी है. जो लोग इस तथ्य को जानते हैं, वे यहां स्नान व सीताराम दर्शन के लिए अवश्य आते हैं।
उर्जा से भरपूर कबीर को यहीं आसरा मिला, यहीं आकर गुरु की खोज पूरी हुई. पंचगंगा घाट की सीढिय़ों पर ही किसी रात लेट गए थे कबीर, और जगदगुरु रामानन्द जी सुबह-सुबह घाट की सीढियां उतर रहे थे, उनके पाँव कबीर पर पड़ गए थे, कबीर भी यही चाहते थे, जगदगुरु रामानन्द जी ने उन्हें हाथों से पकडक़र उठा लिया था, कष्ट मिटाते हुए कहा था, बच्चा राम राम कहो, तुम्हारा कल्याण होगा. उसके बाद पूरे बनारस को पता चल गया कि एक निम्न जाति के कबीर को जगदगुरु रामानन्द जी ने अपना शिष्य बना लिया है. कबीर से जुडी इसके बाद की भी रोचक कथा है, जिसे आप सब जानते हैं.
पंचगंगा घाट श्रीमठ आकर रोम हर्षित हो उठते हैं, बिल्कुल यहीं रहते होंगे आचार्य जगदगुरु श्री रामानन्द जी। यहां कभी विराजती होंगी - कबीर, रैदास, पीपा, धन्ना, सेन और गोस्वामी तुलसीदास जैसी अतुलनीय विभूतियां। यहां पत्थरों के स्पर्श में भी जादू-सा है। जहां आप पांव भी रखते हैं, तो लगता है, ओह, जरा प्रेम से रखा जाए। पंचगंगा घाट के पत्थर इतिहास नहीं बताते, लेकिन यह अनुभूति अवश्य करा देते हैं कि देखो, आए हो, तो जरा ध्यान से, जरा प्यार से, भाव विभोर हो, जरा याद तो करो कि यहां क्या-क्या हुआ होगा। यहां लाखों वैष्णवों, रामानन्दियों ने खरबों बार जपा होगा - सीताराम-सीताराम। यह भूमि पवित्र हो गई, तभी तो बची हुई है।
पंचगंगा घाट बनारस के प्राचीनतम पक्के घाटों में शामिल है। 16 वीं सदी में यहां जयपुर-आमेर के राजा मानसिंह ने भी घाट का निर्माण करवाया था। 18वीं सदी में जीर्णोद्धार का कुछ काम महारानी अहिल्याबाई ने भी करवाया। पहले श्रीमठ काफी विस्तृत था, लेकिन ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि यवनों ने इसे लगभग पूरी तरह से तोड़ दिया। यहां विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दुख और रोष होता है, श्रीमठ की जगह यवनों ने अपना विशाल धर्मस्थल बना लिया, जो आज भी श्रीमठ के पीछे स्थित है। यह आक्रमण इस बात का प्रमाण है कि श्रीमठ का भारतीय संस्कृति में कैसा उच्चतम स्थान रहा होगा कि जिसे ध्वस्त करके ही शत्रु आगे बढ़ सकते थे। बनारस में गंगा घाट क्षेत्र में ऐसा विनाशकारी अधार्मिक अतिक्रमण और कहीं नहीं दिखता। उस पावन स्थली को ध्वस्त किया गया, उस महान तीर्थ को ध्वस्त किया गया, जहां से कभी भारतीय संस्कृति को सशक्त करने वाला महान नारा गूंजा था कि जाति-पांति पूछे नहि कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।
रामजी की कृपा से पूजनीय है यह धर्मस्थल, जहां ब्राह्मणवाद सम्पूर्ण समाज को समर्पित हो जाता है, जहां चर्मकार रैदास के लिए भी जगह है, तो जाट किसान धन्ना के लिए भी, जहां कबीर जुलाहे को सिर आंखों पर बिठाया जाता है, जहां जात से नाई सेन भी पूजे जाते हैं और जहां राजपूत राजा पीपा को भी सन्त बना दिया जाता है। जहां वर्णभेद नहीं, लिंगभेद नहीं, वर्गभेद नहीं। जहां भगवान के द्वार सबके लिए खुले हैं, जहां पहुंचकर पद्मावती और सुरसरी सन्त हो गईं। ऐसा श्रीमठ हमले का शिकार हुआ, तो उसके पीछे का षडयंत्र प्रत्येक भारतीय को पता होना चाहिए। 

श्रीमठ के मंदिर, रसोईघर और विद्यार्थियों के रहने की जगह के पीछे विशाल धार्मिक अतिक्रमण

आक्रमण व विध्वंस के उपरांत कभी बस आचार्य रामानन्द जी की पादुकाओं का स्थान ही शेष रह गया था, फिर कभी दो मंजिल की एक छोटी-सी इमारत बनी, लेकिन अब थोड़ी-सी जगह में पांच मंजिली इमारत खड़ी है, भीतर-बाहर से पवित्र, प्रेरक, उज्ज्वल। विनाश व विध्वंस के अनगिनत प्रयासों के बावजूद श्रीमठ आज हमारे समय का एक बचा हुआ अकाट्य और महान सत्य है। ऐतिहासिक भारतीय संकोच का जीता-जागता उदाहरण है। हम आक्रमणकारी नहीं हैं, हम हो नहीं सकते। हम अतिक्रमणकारी नहीं हैं, हम हो नहीं सकते। हम छीनते नहीं, क्योंकि छीन नहीं सकते। हम खुद को बदलते-बनाते चलते हैं। हम दूसरों की लकीर छोटी नहीं करते, अपनी छोटी ही सही, लेकिन जितनी भी लकीर है, उसे बचाते-बढ़ाते चलते हैं और चल रहे हैं। ठीक ऐसे ही चल रहा है श्रीमठ।
लोग कहते हैं कि मठों में बड़ा विलास और वैभव होता है, लेकिन सीधा-सादा श्रीमठ इस आधुनिक-प्रचारित तथ्य को सिरे से नकार देता है। श्रीमठ अपने भले होने की मौन गवाही देता है। अर्थात अपने होने में श्रीमठ ने उसी सज्जनता, सादगी और सीधेपन को बचाया है, जिसे आचार्य श्री रामानन्द जी ने बचाया था, जिसे कबीर ने पुष्ट किया और गोस्वामी तुलसीदास जी ने घर-घर पहुंचा दिया।
यह परम सौभाग्य है कि आज श्रीमठ के पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी भी सादगी के अतुलनीय प्रतिमान हैं। अपनी सम्पूर्ण सशक्त उपस्थिति के साथ वे इस कठिन काल में भी न्यायसिद्ध विद्वतापूर्ण सच्ची राम भक्ति के महान प्रमाण हैं। जैसे वे हैं, वैसा ही आज का श्रीमठ है, सीधा-सच्चा-सज्जन-बेलाग। आचार्य श्री में थोड़ी-सी भी असक्तता होती, तो श्री राम विरोधी विशालकाय भौतिक अभियान श्रीमठ को धकियाता-मिटाता समाप्त कर देता और बाकी बचे हुए को गंगा मैया की लहरें बहा ले जातीं। आज श्रीमठ खड़ा है, गंगा मैया को बताते हुए कि मां, मैं अब यहां से नहीं डिगने वाला। बनारस के गंगा तट पर वरुण घाट से अस्सी घाट तक इतना बेजोड़ राष्ट्र को सशक्त करने वाला दूसरा कोई मठ नहीं है।
यह बात सही है कि आक्रमण के कारण बीच में काफी लंबे समय तक श्रीमठ की गद्दी एक तरह से खाली हो गई थी। कोई रखवाला नहीं था, किन्तु रामभक्त वैष्णव सन्तों के आशीर्वाद और प्रेरणा से रामानन्दाचार्य श्री भगवदाचार्य जी ने श्रीमठ के नवोद्धार की नींव रखी। उनके उपरान्त रामानन्दाचार्य शिवरामाचार्य जी महाराज ने समृद्ध परंपरा की बागडोर रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी को थमा दी। आज श्रीमठ अपनी सुप्तावस्था से काफी आगे निकल आया है, जाति से परे जाकर सन्त सेवा जारी है, यहां से एक से एक विद्वान निकल रहे हैं, समाज, संस्कृति और संस्कृत की सेवा हो रही है। श्रीमठ आज हर पल जागृत है, आज उसकी पताका चहुंओर दृश्यमान होने लगी है। अब चिंता की कोई बात नहीं। आज वह जितना सशक्त है, उतना ही शालीन है। कोई शोर-शराबा नहीं, कोई ढोल-धमाका नहीं, केवल सेवाभाव, भक्तिभाव, रामभाव और सीताराम-सीताराम-सीताराम . . . .

Thursday, 17 May 2012

श्रीमठ : हमारी आध्यात्मिक राजधानी

भाग -  दो
सीतानाथ से प्रवर्तित वैदिक राममन्त्र एवं अनादि रामभक्ति धारा को मध्यकाल में (१४वीं-१५वीं शताब्दी) में परमसिद्ध, विलक्षण संगठनवादी, लोकोत्तर उदार, अदम्य उत्साही स्वामी रामानन्द जी ने अनुपम तीव्रता प्रदान किया, जिसके कारण देश के कोने-कोने में राम भक्ति की परम मंगलमयी धारा फैल गई। वर्तमान भौतिक विनाशक वातावरण के बावजूद रामानन्द सम्प्रदाय के आश्रमों, अनुयायियों, सन्तों एवं प्रचार का जोड़ किसी दूसरे सम्प्रदाय के साथ नहीं है। इस सम्प्रदाय से निकली हुई अनेक शााखायें आज लोक कल्याण योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। जिनमें प्रमुख रूप से कबीर सम्प्रदाय, निराकारी सम्प्रदाय, रविदासी सम्प्रदाय, घीसापन्थी सम्प्रदाय, रामस्नेही सम्प्रदाय, गरीबदासी इत्यादि का नाम विशेष उल्लेखनीय है।


कुछ समानताओं को देखकर हिन्दी साहित्य के कुछ विद्वानों ने रामनुज सम्प्रदाय के अन्तर्गत ही रामानन्द सम्प्रदाय को स्वीकार किया है। आंशिक समानताओं के आधार पर तो सभी सम्प्रदायों को एकरूप में ही स्वीकार किया जा सकता है। अलग-अलग मानने की कोई आवश्यकता नहीं। इसी आंशिक साम्य के कारण किसी ने आद्य शंकराचार्य को प्रच्छन्न बौद्ध कहा था। उन्हें शंकराचार्य भी बौद्ध के रूप में दिखाई दिए, जिन्होंने बौद्धों के अवैदिक महल को भारत भूमि से उखाडऩे में अनुपम भूमिका निभायी। न्याय दर्शन के द्वितीय सूत्र - दुखजन्मप्रवृत्ति दोषिमिथ्या ज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्ग: के भाष्य की व्याख्या करते हुए वार्तिककार उद्योतकार ने सम्प्रदाय शब्द की व्याख्या में लिखा है-
शिष्याचार्यसम्बन्धस्याविच्छेदेन शास्त्रप्राप्ति सम्प्रदाय: - इसका भाव यह है - शास्त्र की वह प्राप्ति जो शिष्य एवं आचार्य के अविच्छिन्न सम्बन्ध के द्वारा हो, उसे ही सम्प्रदाय कहते हैं। स्वामी राघवानन्द जी ने स्वामी रामानन्द जी को राममन्त्र का उपदेश किया तथा रामोपासना में प्रवृत्त किया। जिसके आधार पर सुनिश्चित होता है कि उन्हें भी अपनी अविच्छिन्न गुरु परम्परा से राम मन्त्र का उपदेश वैदिक सनातन धर्मोद्यान के परम संरक्षक स्वामी राघवानन्द जी कभी भी नहीं कर सकते थे। रामानुज सम्प्रदाय में कभी भी मुख्य रूप से राममन्त्र का उपदेश नहीं होता रहा है। श्री सीताराम कभी भी परमोपास्य के रूप में मान्य नहीं रहे हैं। अतएवं स्वामी राघवानन्द जी को या तो शास्त्र मर्यादा विमुख स्वच्छन्दचारी स्वीकार करना पड़ेगा या ऐसी वैदिक परम्परा में जोडऩा पड़ेगा, जिसमें राममन्त्र एवं रामोपासना का अनादि अविच्छिन्न प्रवाह हो। सभी सम्प्रदायाचार्यों ने अपने परमोपास्य को ही अपने सम्प्रदाय का मूल तथा परमाचार्य माना है। संन्यासी सम्प्रदाय भगवान शंकर को, रामानुज सम्प्रदाय भगवान लक्ष्मीनाथ इत्यादि। इसी क्रम से रामानन्द सम्प्रदाय का मूल एवं परमाचार्य किसी भी प्रकार से लक्ष्मीनाथ नहीं हो सकते। पूर्व लेखकों का लेखन ही जिनके लेखन का मूल आधार है, ऐसे वैदिक मर्यादाओं के ज्ञान से शून्य स्वतन्त्र चिंतन शक्ति से रहित भारतीय परम्पराओं के शत्रु एवं पाश्चात्य विचारों को ही परमवेद मानने वाले लोगों ने आंखों पर पट्टी बांधकर रामानन्द सम्प्रदाय को रामानुज सम्प्रदाय के अन्तर्गत मान लिया। अन्य भी अनेक तर्क हैं, जिन्हें विस्तार के भय से उद्धृत नहीं किया जा रहा है। स्वामी भगवदाचार्य की जीवनी में इसकी विस्तृत चर्चा द्रष्टव्य है।
प्राय: परम्परा के सम्बन्ध में रामानुज सम्प्रदाय एवं रामानन्द सम्प्रदाय एक है या रामानुज सम्प्रदाय की शाखा रामानन्द सम्प्रदाय हैं, ऐसा बताने वाले लोग श्रीनाभा स्वामी जी के भक्तमाल के - रामानुज पद्धति प्रताप अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यो - को उद्धृत किया करते हैं। इस छप्पय के पद्धति पद से स्वामी रामानन्द जी को रामानुज सम्प्रदायान्तर्गत सिद्ध करने का प्रयास किया करते हैं, किन्तु यहां जो पद्धति पद है, उससे सम्प्रदायानुयायी अर्थ करना नितान्त असंगत है। पद्धति शब्द सिद्धान्त का वाचक है न कि सम्प्रदाय का। स्वामी रामानन्द और स्वामी रामानुज के विशिष्टाद्वैत में बहुत कुछ साम्य भी है। दोनों आचार्यों को तत्वत्रय स्वीकृत हैं। अत: प्रतीत होता है कि कतिपय स्थानों पर सिद्धान्तत: दोनों के निकट होने के कारण पाठ भेद से रामानुज पद्धति पद का प्रचार हो गया। यद्यपि दोनों आचार्यों के इष्ट, मन्त्र उपासना पद्धति में भारी भेद है। भक्तमाल की कई प्रतियों में रामानन्द पद्धति का पाठ है। भक्तमाल में पद्धति शब्द सम्प्रदाय, पथ, मार्ग, परिपाटी के पर्यायवाची के रूप में आया है। छप्पय में रामानन्द पद्धति का प्रयोग प्रसंग को देखते हुए सर्वाधिक उपयुक्त लगता है। छप्पय में स्वामी जी की परम्परा का थोड़ा-सा वर्णन करके उनके यश का वर्णन हुआ है। अत: रामानन्द पद्धति प्रताप अवनि अमृत ह्वै अनुयर्यो (जिसका अर्थ हुआ - स्वामी रामानन्द जी का सिद्धान्त अमृत बनकर पृथ्वी पर फैला) सर्वथा प्रसंगानुकूल ही है। 

पवित्र श्रीमठ में लगे इस चित्र में आपके बाएं से दाएं - जगदगुरु रामानन्दाचार्य जी महाराज, जगदगुरु रामानन्दाचार्य श्री भगवदाचार्य जी महाराज, जगदगुरु रामानन्दाचार्य श्री शिवरामाचार्य जी महाराज एवं वर्तमान पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज।


श्री स्वामी भगवदाचार्य के अनुसार कुछ प्रतियों में रामानुज पद्धति पाठ भी है। जिसका अर्थ है - श्रीराम जी ही जिसके सर्वश्रेष्ठ उपास्य देवता हैं, ऐसी पद्धति का पृथ्वी पर प्रचार हुआ। इस पाठ (रामानुज पद्धति) और रामानन्द पद्धति में कोई सैद्धान्तिक विरोध नहीं है। स्वामी रामानन्दजी के सिद्धान्त से श्रीरामजी ही सर्वश्रेष्ठ उपास्य देव हैं। अत: रामानन्द पद्धति और रामानुज पद्धति, दोनों का एक ही भाव होने के कारण कोई विरोध नहीं है। इन तीनों पाठों में से किसी के द्वारा यह नहीं सिद्ध होता कि स्वामी रामानन्दाचार्य जी रामानुज सम्प्रदाय के दीक्षित शिष्य थे और रामानन्द सम्प्रदाय रामानुज सम्प्रदायान्तर्गत है।
शताब्दियों बाद श्रीमठ अपनी गौरवमयी आध्यात्मिक धारा की परिपुष्टि की दिशा में अग्रसर हो चला है। आचार्य प्रवर स्वामी रामानन्द जी ने अपनी परमोदात्त भावना से समाज के प्रत्येक वर्ग को श्रीराम भक्ति के परम मंगलमय महापथ पर चलाकर परमकल्याण से जोड़ते हुए देश को विखण्डन से बचाया था। श्रीमठ पथ विमुख समाज को अपने आदर्श एवं स्वरूप ज्ञान द्वारा पथारूढ़ करेगा। फलत: यह समाज और देश विखण्डन से बचेगा तथा अपनी शक्ति का उपयोग अपने अभ्युत्थान में करेगा। श्री सीतानाथ के चरणों में मेरी यही अभ्यर्थना एवं मंगल कामना है।  
(जगदगुरु की कलम से)

Tuesday, 15 May 2012

श्रीमठ : हमारी आध्यात्मिक राजधानी

आचार्य प्रवर स्वामी रामानन्दाचार्य जी ने महाप्रयाण के पहले अपने अन्तिम उद्बोधन में कहा था - भगवत्स्मरण ही जीवन का सार है। इसके द्वारा जीवन परम शान्ति को प्राप्त कर धन्य-धन्य हो जाता है। आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक इन तीनों ही दुखों की समूल निवृत्ति हो जाती है। परमानन्द-सिन्धु श्रीसीताराम जी के नित्य धाम साकेत लोक को प्राप्त कर उनकी समीपता, नित्य लीलाओं का दर्शन एवं सेवा के माध्यम से दिब्यानन्दसिन्धु में गोता लगाता है।’
स्वामी जी के इन भावों को परिपुष्ट करती है भगवान श्रीकृष्ण की ये वाणियां -
तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
अन्तकाले च मामेव स्मरणमुक्त्वा कलेवरम्।।
य: प्रयाति स सद्भावं याति नास्त्यत्र संषय:।।
हम जिसका पुन:-पुन: स्मरण करते हैं, उनमें ही हमारा प्रेम बढ़ता है। जब हम संसार का स्मरण करते हैं, तब हमारा प्रेम संसार में बढ़ता है। इसी क्रम में परमेश्वर का स्मरण उसमें प्रेम प्रकर्ष को उत्पन्न करता है, जो जीवन को कृतार्थ करता है। सुख सिन्धु का स्मरण ही सुखदाय हो सकता है, संसार का नहीं, क्योंकि वह तो दुखमय है, सुख रहित है। तभी तो गीता की सुस्पष्ट घोषणा है - अनित्यमसुखं लोकम् - अनित्य संसार नित्य सुखप्रद कैसे हो सकता है?
सगुण तथा निर्गुण रामभक्ति के माध्यम-गोमुख रामानन्दाचार्य की तप:स्थली एवं आध्यात्मिक राजधानी श्रीमठ भगवत् स्मरण का ही सर्वश्रेष्ठ स्मारक केन्द्र था। इसका पर उद्देश्य जन-जन में भगवत् स्मरण की गंगा को प्रवाहित करना था, जिसमें सभी संकुचित भेदभावों को छोडक़र लोग गोता लगावें एवं जीवन को परमोज्ज्वल बनावें। इस क्रम को अपूर्व सफलता मिली, जिसे आज भी रामभक्ति के विशालतम क्षेत्र एवं रामचरित्र के प्रति परम जनाकर्षण से मापा जा सकता है। श्रीमठ से प्रवाहित श्रीराम स्मारिका गंगा ने समाज के उन दरवाजों का भी स्पर्श किया तथा उनसे निकलने वाले लोगों को समान रीति से कृतार्थ किया, जिनकी छाया भी लोगों को अपवित्र बनाती थी। परमसन्त रविदास, संत शिरोमणि कबीर, धन्ना जाट एवं सेनानाई आदि इसके परम दृष्टान्त हैं। समाज के सभी वर्गों ने इससे शीतलता प्राप्त किया। एक दूसरे के बीच खाई मिट गई। विभिन्न तटों के बीच में सेतु का निर्माण हुआ। समाज विखण्डन की भयावह ज्वाला से बच गया। प्रत्येक के हृदय में दूसरों के प्रति सहानुभूति एवं स्नेह का उदय हुआ। इन व्यावहारिक लाभों से विशिष्ट होते हुए लोगों ने परम शान्ति को भी प्राप्त किया।
अनेक साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि श्रीमठ संसार के तत्कालीन आध्यात्मिक केन्द्रों में सर्वश्रेष्ठ था। भारत देश ही नहीं, संसार के सभी भागों से साधक एवं जिज्ञासु श्रीमठ में आते थे तथा पूर्णता को प्राप्त कर लौटते थे। इतिहासकारों का मानना है कि बारह प्रधान शिष्यों के अतिरिक्त स्वामी जी के पांच सौ विरक्त शिष्य थे, जो श्रीमठ में ही रहते थे। झोपड़ी से लेकर महल पर्यन्त के लोगों का आध्यात्मिक पिपासा की तृप्ति के लिए यहां आना-जाना था। तत्कालीन श्रीमठ की विशालता, भव्यता एवं जनाकर्षण के चश्मे से वर्तमान श्रीमठ को पहचानना उतना ही कठिन है, जितनी कठिनता सुदामा को अपनी झोपड़ी पहचानने में हुई थी। इसको देख श्रीमठ से प्रवाहित रामभक्तिगंगा के घाटों का आकलन करना किसी के लिए सम्भव नहीं है। पूरे देश में फैले श्रीमठ के अनुयायी आश्रमों तथा सन्तों की नामावली का संग्रह भी वर्तमान श्रीमठ में नहीं रखा जा सकता। यह दशा श्रीमठ की तब से हुई, जब औरंगजेब ने श्रीमठ का विध्वंस कर दिया। संसार का सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक केन्द्र भयावह खण्डहर में बदल गया। राम-नाम संकीर्तन के बदले नमाज की धारा चल पड़ी। राम भक्तों की जमघट मौलवी-मुल्लों में बदल गई। दीर्घ काल तक रिक्तता एवं सूनापन की दशा बनी रही। लोगों ने धीरे-धीरे खण्डहर श्रीमठ की परिधि को घेरना शुरू किया। यह क्रम इतना प्रबल रहा कि श्रीमठ का सम्पूर्ण क्षेत्र घिर गया। आचार्य निष्ठा के क्षेत्र में कुम्भकर्ण तथा स्वकीर्ति मात्रैकशरण-साम्प्रदायिक-सिद्धान्तानभिज्ञ महन्तों, सन्तों एवं भक्तों की जब तक निद्रा खुली, तब तक उतना ही स्थान बच पाया था, जितना वर्तमान श्रीमठ का स्वरूप है। किसी विदेशी महिला अन्वेषक ने खोज किया है कि श्रीमठ की प्राचीन परिधि लगभग पांच किलोमीटर में थी।
संसार के सर्वश्रेष्ठ प्रकाशक को भी आज प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है। यही तो श्रीराघव के संसार का वैचित्र्य है। वस्तुत: श्रीराघव ही शाश्वत, परम तथा निरपेक्ष प्रकाशक एवं स्मारक हैं तथा सर्वश्रेष्ठ स्मरणीय भी हैं। अपौरुषेय वेद की यही घोषणा है - तस्य भाषा सर्वमिदं विभाति। यही भाव हम सभी लोगों के संतोष का एकमात्र अवलम्ब है। श्रीमठ रामानन्द सम्प्रदाय का मूल एवं परम श्रद्धापरक पीठ है।
क्रमश:

Monday, 7 May 2012

ढोंगियों का बहिष्कार कीजिए

सनातन धर्म के अनुसार इस सृष्टि को ईश्वर ने बनाया है, मनुष्य ने नहीं। भगवान ने संसार को बनाने के बाद वेदों को बनाया और वेद ही इस सृष्टि का संविधान हैं। जैसे हमारी शासन व्यवस्था संविधान से चलती है, उसी तरह यह सम्पूर्ण संसार भी वेदों से संचालित होता है। ईश्वर ही इस सृष्टि का मुख्य संचालक है। उसकी जगह और कोई नहीं ले सकता। यह सही है कि वेदों में तंत्र, मंत्र, यज्ञ का भी वर्णन है। लेकिन इनको भी विशेष योग्यता प्राप्त लोगों को ही कराने का अधिकार है। अगर किसी में इनको साधने की क्षमता नहीं है और वह तंत्र-मंत्र करवा रहा है, तो अनर्थ निश्चित है। जैसे - जिसमें मिसाइल बनाने की योग्यता है, वह मिसाइल बनाए, तो कोई दिक्कत नहीं है, अगर पटाखे बनाने वाला मिसाइल बनाएगा, तो वह विनाशकारी ही सिद्ध होगा। हमारा धर्म कभी भी इस तरह के तंत्र-मंत्र की इजाजत नहीं देता, लेकिन कुछ ढोंगी बाबा धर्म का चोला ओढ़कर, जनता को मूर्ख बनाओ अभियान में लगे हुए हैं। ये ढोंगी तंत्र, मंत्र के नाम पर जनता को मूर्ख बनाकर आम लोगों की गाढ़ी कमाई पर डाका डाल रहे हैं। ऐसे अधर्मियों के चेहरे का नकाब अवश्य उतरना चाहिए। अगर कोई इलाज के लिए डॉक्टर के बजाय झोलाछाप नीम-हकीमों के पास जाएगा, तो उसे मरने से कौन रोक सकता है। धर्म की आड़ में गलत काम करने वाले ऐसे पोंगापंथियों से समाज को सतर्क रहने की जरूरत है। बड़े धर्माचार्यों या धर्म की स्थापना में लगे हुए मनीषियों, महर्षियों और संतों को इनके खिलाफ खड़ा होना चाहिए। लोगों को मुखर और प्रखर होकर इनके खिलाफ अभियान छेडऩा चाहिए।

एक बार मेरे पास एक  सज्जन आए, उन्होंने कहा कि चन्द्रास्वामी आपसे मिलना चाहते हैं। मैंने उनसे मिलने से मना कर दिया। जब रामालय ट्रस्ट का गठन हो रहा था, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव चाहते थे कि उस ट्रस्ट में चन्द्रास्वामी भी हों। मैंने राव से पूछा कि वे चन्द्रास्वामी को क्यों लेना चाहते हैं, जबकि उन्हें तो धर्म का क, ख, ग भी नहीं आता। इस तरह हमने उनको ट्रस्ट में घुसने ही नहीं दिया। हमारे देश में एक रविशंकर जी भी हैं, जो लोगों को जीने के तरीके बताने के नाम पर ही लूट में लगे हुए हैं। बाबा रामदेव योग के नाम पर जनता को लूटने में लगे हुए हैं। योग का जितना अवमूल्यन बाबा रामदेव ने किया, उतना किसी ने नहीं किया। एक दिन आसाराम बापू बनारस आए, लोगों को दीक्षा बेचने लगे। हमने खड़े होकर कहा कि जो व्यक्ति दीक्षा बेच रहा हो, वह साधु कैसे हो सकता है। दिक्कत यह है कि हम लोग मुखर और निर्भीक होकर उनके खिलाफ नहीं बोल पा रहे हैं। बड़े लोग उनसे लाभान्वित हो रहे हैं। दुर्भाग्य है कि राजनेता भी इन पाखंडियों को प्रश्रय प्रदान कर रहे हैं, जो गलत है। जो भी व्यक्ति आध्यात्मिक समाधान के लिए इनके पास जा रहे हैं, उन्हें पहले जानकारी लेनी चाहिए कि कौन सही है और कौन गलत। हमारे पूर्वजों ने भी इस बात को समझा कि पोगापंथी समाज को मूर्ख बना सकते हैं, इसलिए उन्होंने एक कहावत लिखी कि पानी पीओ छानकर और गुरु बनाओ जानकर। जब हम मटकी लेते हैं, तो अगल-बगल से बजाकर देखते हैं कि कहीं वह खराब न हो, उसमें कहीं छेद न हो। कोई भी धार्मिक गुरु यह नहीं कहता कि हम आपको मुकदमा जीतवा देंगे, नौकरी लगवा देंगे, असाध्य बीमारी दूर कर देंगे। अगर धर्म का हवाला देकर कोई ऐसा करने का दावा करता है, तो वह सिवाय पाखंडी के और कोई नहीं हो सकता। इनके पाखंड को रोकने का काम प्रशासन का कम और समाज का ज्यादा है। धर्माचार्यों को भी आगे आकर ऐसे पांखडियों पर हमला बोलना चाहिए। साधु समाज की भी यह जिम्मेदारी है कि ऐसे ठगों के बारे में लोगों को सावचेत करे। आश्चर्य है कि नए धर्माचार्य तो परामर्श शुल्क तक ले रहे हैं। इन ढोंगियों का समाज को सम्मान नहीं, बल्कि बहिष्कार करना चाहिए।

(राजस्थान पत्रिका व पत्रिका में २२ अप्रेल को मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित महाराज के विचार)

Wednesday, 4 April 2012

धर्म क्या है?

भाग - ग्यारह
हमारे यहां कहा जाता है कि प्रेम का उत्पादन भी धन से ही होता है। श्रेष्ठ कर्म भी धन से होते हैं। गीता में भगवान ने कहा, चार तरह से लोग मेरा भजन करते हैं। कुछ लोग कठिनाई दूर करने के लिए। कुछ लोग समृद्ध के लिए। कुछ लोग ज्ञान की प्राप्ति के लिए और कुछ लोग जो सब जान गए हैं, वे भी भजन करते हैं। उनकी योग्यता क्या होनी चाहिए, उनका धर्मात्मा होना जरूरी है। धर्म की सामग्री जिसके पास नहीं है, उसका क्षेत्र ईश्वर तक नहीं जा पाएगा। दुनिया में कई लोग मजाक उड़ाते हैं कि देखिए, दुख हो गया, तो चिल्ला रहे हैं, किन्तु दुनिया में करोड़ों दुखी ऐसे भी हैं, जिनके मुंह से एक बार भी नहीं निकलता है कि हे ईश्वर मेरा दुख दूर करो। वह तभी निकलेगा, जब धर्म की प्रतिष्ठा होगी।
जैसे पैसे से पैसा कमाया जाता है, बड़ी रकम होगी, तभी न फैक्टरी खुलेगी, बड़ी रकम होगी, तभी तो ठेका मिलेगा, वैसे ही धर्म से धर्म कमाया जाता है। आज धर्म कमाने वालों की कमी होने लगी है। साधु भी अब यही सोचने लगे हैं कि शिष्य बस लिफाफा दे दें, फिर जो मन में आए करें।
एक शिष्य ने अपने गुरु से कहा, ‘वह अमीर तो आपकी निंदा कर रहा था। जबकि आप उसे कितना मानते हैं।’
गुरु ने कहा, ‘अरे ऐसी निंदा का क्या? वह समय-समय पर हमें धन भेज देता है, गाड़ी भेजता हूं तो उस पर लकड़ी लादकर भेज देता है, हमें और क्या? निंदा करना है, तो करो।’
वस्तुत: यह तो भोग हो गया। महात्मा भी भोग में लग गए हैं। लेकिन किसी को यदि यह आकांक्षा हो कि यश हो, प्रेम भी बढ़े, तो धार्मिक होना पड़ेगा। जैसे लोग समय-समय पर शरीर की जांच करवाते हैं, ठीक उसी तरह से धन बढऩे पर यह टेस्ट करना चाहिए कि धन का उपयोग, विनियोग कहा हो रहा है, अगर सही हो रहा है, तो समझना चाहिए कि धन हमें देवता बनाने के लिए आया है।
पैसे का उपयोग सही होना चाहिए और मुझे पता है यह कैसे होता है। मैं पूछता हूं, बिड़ला ज्यादा धनवान हैं या हम। बिड़ला जी को धर्म का क ख ग नहीं आता, किन्तु मैं धर्म का मास्टर हूं। प्रयोग भी करता हूं। आप मंदिर बना लो, लेकिन आप लोगों को नहीं कह सकते कि मंदिर आओ। मैं ही लोगों को कहूंगा कि लक्ष्मी नारायण जी का मंदिर है, जाओ, वह नहीं कह सकेंगे। मेरा धर्म बड़ा धर्म है, उनको छोटा है। मुझे एक रुपया मिलता है, तो धर्म में सवा रुपया खर्च करके पचीस पैसा कर्ज में रहता हूं। दुनिया का कौन धनी ऐसा करता होगा? अभी भी मुझ पर कर्ज है। हमारी बराबरी अमीर करेंगे क्या? दो-दो रुपए जोडऩे वाले, जगह-जगह से दो रुपए बचाने वालों से मेरी क्या तुलना?
धन आने में कोई दिक्कत नहीं है, धन का विनियोग सही होना चाहिए। धन केवल पत्नी पर खर्च करने के लिए नहीं है, माता-पिता में भी लगे। माता-पिता की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।
दुनिया में जितने लोग हैं, सब हिन्दू धर्म के आंशिक अनुवाई हैं। हम उस धर्म के अनुवाई हैं, जिससे कोई बच नहीं सकता। हमारा धर्म बनावटी नहीं है, नैसर्गिक है। मैं आपको उदाहरण देता हूं, आप कहीं जा रहे हैं, एक दुर्घटना हुई, किसी को चोट लगी, वह सडक़ पर पड़ा तड़प रहा है, खून से लथपथ। तब क्या आपको कुछ-कुछ होता है, यही दया है। हमें यह नैसर्गिक शक्ति मिली हुई है। कोई तड़प रहा है, तो हमारे मन में आता है कि ओह, इसका दुख दूर हो जाता। भले हम डॉक्टर न हों, सर्जरी नहीं कर सकते हों, लेकिन लगता है कि काश! तड़पने वाले का दुख-दर्द दूर हो जाता।
धर्म नैसर्गिक शक्ति का नाम है। धर्म नहीं होता, तो बूढ़े, बुजुर्गों को कौन संभालता? धर्म नहीं होता, शादी-विवाह, भाईचारा कहां से होता? पश्चिम में क्या है? काम पूरा किया और वस्त्रहीन होकर समुद्र किनारे लेट गए, ऐसे दुनिया चलेगी क्या? धर्म करना जरूरी है। धर्म चर्चा जरूरी है।
अभी जो सुख हम ले रहे हैं, यह ऐतिहासिक क्षण है, धर्म चिंतन का क्षण है। कल पता नहीं, हममें से कौन रहेगा, कौन नहीं रहेगा। यह भी देखिए, अभी इसी समय कई लोग गिट्टी डाल रहे हैं। हम सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के श्रेष्ठ भाव का चिंतन कर रहे हैं। उधर, हमारे सामने मजदूर काम कर रहे हैं, वे भी अपने धर्म का पालन कर रहे हैं, लेकिन उनका जीवन उतना श्रेष्ठ नहीं है। हालांकि वे भी धार्मिक हैं, वे निर्माण कर रहे हैं। उन्हें ईश्वर भक्त कहने में कोई हर्ज नहीं है।
विष्णु पुराण के एक श्लोक का भाव मैं आपको सुनाता हूं। अगर कोई अपने कत्र्तव्य का सही तरीके से पालन करता है, तो वह भगवद् सेवा कर रहा है। वह डंके की चोट पर कहे कि मैं किसी पुजारी से कम नहीं हूं, उसे सद्गति मिलेगी ही मिलेगी। उसकी मानवता पूर्ण विकसित होगी ही होगी, क्योंकि वह भी धर्म का पालन कर रहा है।
समापन

धर्म क्या है?

भाग - दस
विनोबा भावे कहते थे, जो मजदूर हैं, वही शेषनाग हैं, यदि ये नहीं होते, तो पृथ्वी को धारण कौन करता?
मेहतर माने महत्तर। महान काम जो करता है, उसको महत्तर बोलते हैं, वही बिगडक़र मेहतर हो गया। महत्त शब्द से तरप प्रत्यय करने पर महत्तर बनता है, दो में जो महान हो। अपना ही आदमी जब मल-मूत्र साफ करता है, तो बहुत मुश्किल से सुबह वाली बेला बीतती है, किन्तु जो दिन भर यही काम करता है, उसे महान का दर्जा होना ही चाहिए। किन्तु लोग उससे ही घृणा करने लगे। हमारे धर्म ने कभी यह नहीं कहा कि महत्तर से घृणा करो।
हमने कहा, तुम भी नहाकर आओ। वैसे बारह बजे तक जो झाड़ू लगाएगा, वह सुबह मंदिर कैसे आएगा, तो कहा गया, तुम शिखर का दर्शन करो, तो तुम्हें बराबरी का फल मिलेगा। इसमें क्या समस्या है? पति को एड्स हो जाए, तो पत्नी बोले कि मैं आपकी पत्नी हूं, लेकिन आप दूर रहेंगे, तो हमारा जीवन सुरक्षित होगा। क्या दिक्कत है, वह कैसे व्याभिचारिणी हुई? आचार का वर्गीकरण, विद्या का वर्गीकरण, धर्म का वर्गीकरण हो, किन्तु ईश्वर के आधार पर घृणा नहीं होनी चाहिए। यहां तो भगवान ने सबरी को भी स्वीकार किया। कुब्जा जिसके सभी अंग टेढ़े-मेढ़े थे, लेकिन उसमें भावना आसक्ति की थी कि भगवान एक बार आलिंगन कर लें, भगवान ने इच्छा पूरी की, गले लगा लिया, तो सारे अंग ठीक हो गए, कुब्जा सुन्दरी हो गई।
भगवान का जो अवतार है, ये साम्यवाद के प्रयोग की पराकाष्ठा है। ये जो कथाकार हैं, जो पाउडर लगातार मंच पर बैठकर कथा कर रहे हैं, ये तो गलत कर रहे हैं। ये तो उस बात को कह ही नहीं रहे हैं कि भगवान ने श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों को, जो धर्म का श्रेष्ठ स्वरूप है, उसे बिछा दिया सडक़ों पर।
सभी के साथ खेलना, सभी के साथ दूध पीना, दूसरों के लिए चोरी करना। ईश्वर मक्खन भी चुराता है, तो सम वितरण करता है, अपने लिए नहीं, अपने भूखे साथियों के लिए चुराता है।
एक मित्र ने कहा कि साधु लोग भी अब दो नंबर का पैसा ले रहे हैं। साधु अगर सहज है और जो दो नंबर का पैसा है, उससे भंडारा कर दिया गरीब से ब्राह्मण तक सबको भोजन करा दिया, तो इससे बढिय़ा क्या हुआ। उस ब्राहण को दान दे, जो वेद पढऩे या पढ़ाने में लगा है, तो क्या बुरा है? आज साधुओं को बहुत सारी जो दक्षिणा मिल रही है, वह ऐसी ही मिल रही है। वे जीवित इसलिए हैं, क्योंकि वे उस पैसे का सदुपयोग करते हैं।
जो अपनी मानसिकता को मेंटेन करके या संभाल करके नहीं चलेगा, वह कदम-कदम पर शोकग्रस्त होगा। मानसिकता को मेंटन रखने का एकमात्र संसाधन धर्म है, जैसे टेंपरेचर को मेंटन रखना है। सादगी पूर्ण जीवन और सद् चिंतन नहीं होगा, तो कोई इस संसार में एक क्षण भी सुख से नहीं रह सकेगा। आप जिस अपेक्षा से आए हैं, उस अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुआ, तो आप तुरंत शोकग्रस्त हो जाएंगे। अपमानित हो जाएंगे। अमरीकियों ने जो सोचकर बराक ओबामा को राष्ट्रपति बनाया था, वह यदि नहीं हुआ, तो बराक जी क्या करेंगे? मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने थे, इच्छाएं पूरी नहीं हुईं, तो वे क्या करेंगे? हर आदमी की अपनी सीमा और शक्ति है। ऐसी स्थिति में भी धर्म का पारिपालन होना चाहिए और लोग जान ही नहीं रहे हैं धर्म भोग को भी देता है और धन को भी देता है।
चोरी करके भी धर्म कमाया जाता है, धन कमाया जाता है, झूठ बोलकर भी धर्म कमाया जाता है। आज धार्मिक लोग भी ढोंग करके धन और भोग कमा रहे हैं। संन्यासी जीवन में धन की प्रधानता नहीं होनी चाहिए, धन आया है, तो उसका उपयोग समाज के लिए होना चाहिए। गृहस्थ जीवन में भोग प्रधान नहीं होना चाहिए, वह भी धर्म प्रधान होगा, तब उन्नति होगी, बच्चे ठीक होंगे, परिवार ठीक होगा। बहुत धन हो गया, धर्म नहीं हुआ, तो किडनी डैमेज होगी, जीवन का सबकुछ बिगड़ जाएगा। ऐसे ही नेताओं का है, धार्मिक आचरण नहीं रहेगा, तो आपने जो धन कमाया है, भोग कमाया है, वह आपको जेल पहुंचा देगा। बहुत से नेता जेल में सड़ रहे हैं। कई अधर्मी और पापी जेल में हैं, इसलिए धन जरूर आए, लेकिन उसका सही रास्ते से उपयोग हो, तो धन आपको और बढ़ा देगा, बड़ा बना देगा।
क्रमश:

धर्म क्या है?

भाग : नौ
आज भी लोग समझ नहीं रहे हैं, अभी किसी को सुख मिलने लगे, तो उसे चिंतन करना चाहिए कि कैसे मिल रहा है। मैं अपने जीवन के बारे में आपको सुनाता है, मुझसे बड़े-बड़े तपस्वी रामानंद संप्रदाय में हुए हैं। मुझसे बड़े विद्वान रामानंद संपद्राय में हुए हैं। मुझे लोग कहते हैं कि मैं विद्वान हूं। यह सुनकर मैंने कहीं कहा, पढ़ाने-लिखाने का मेरा ध्ंाधा बंद हो गया, जबसे संत-महात्माओं के क्षेत्र में आ गया, उतना अच्छा नहीं कर पा रहा हूं। एक महात्मा राजेन्द्र दास जी ने कहा कि अभी भी जो विद्वान हैं, अधिकांश लोग आपके विद्यार्थी हैं, इससे बढिय़ा क्या चाहिए।
आज कई बड़े विद्वान संत हैं, कई तो मेरे मित्र भी हैं, उनसे कोई जाकर पूछे एक आदमी का नाम बतलाइए, जिसे आपने गद्दी पर बैठने से पहले पढ़ाया हो और जो विद्वान हो और एक ऐसे आदमी का नाम बतलाइए, जिसे आपने गद्दी पर बैठने के बाद पढ़ाया हो, बहुतों के पास एक नाम नहीं मिलेगा। इस रामनरेशाचार्य ने अपने साथियों को, जो लोग मेरे साथ पढ़ते थे, उनको भी पढ़ाया। अपने आगे वालों को भी पढ़ाया और पीछे वालों की बात छोडि़ए। और मेरे शिष्य ऐसे विद्वान लोग हैं, जो जहां भी जाएंगे, यही कहेंगे कि मैं महाराज का विद्यार्थी हूं, हालांकि उनमें से बहुतों को मैं भूल भी चुका हूं।
मेरे द्वारा पढ़ाए गए ऐसे लोगों को भी विद्वान माना गया, जिन्हें मैं विद्वान नहीं मानता था। किसी की निंदा नहीं कर रहा हूं, लेकिन शिक्षक के रूप में मेरे उत्पादन दायरा बहुत बड़ा था। अब लगता है, कुछ छोटा हो गया है।
अब मैं अपने विषय पर आता हूं। मुझसे बड़े विद्वान और बड़े-बड़े तपस्वी और बड़ी आयु के लोग, जिनको श्रेय नहीं मिला, काम करने का मंच नहीं मिला, वह मुझे मिला। रामानंदाचार्य की पीठ में मुझे अवसर मिला। मैं बहुत चिंतन करता हूं कि मेरी कौन-सी विद्या थी, क्या धर्म था, कौन लोग मेरे सहयोगी थे, लेकिन अब लगता है, वस्तुत: राम जी का अनुग्रह और मेरा पिछला पुण्य काम कर रहा है। उसी पुण्य की बदौलत मुझे जब कोई मिल जाता है, तो मैं समझ जाता हूं कि पुण्य का प्रताप था। अपने यहां कहा जाता है कि आपका हमारा कोई लेना-देना था, इसलिए हम साथ आ गए या मिल गए, इसका मतलब ही है कि कोई पुण्य था, जिसने मिलाया।
हिन्दू धर्म माने विश्व का धर्म। हिन्दू धर्म माने सिर्फ हिन्दुओं का नहीं। विश्व में जो मानव हैं, उनके लिए जो धर्म बना, उसी का नाम हिन्दू धर्म है। भले ही उसे कोई बारह आना मानता है, कोई तेरह आना, तो कोई पांच आना। यह जो धर्म बना, वह तो सबके लिए था। सूर्य उगा हो और कोई दरवाजा-खिडक़ी बंद करके बैठा हो, तो इसमें सूर्य का क्या दोष है?
किसी के पास भी एक अलग धर्म मार्ग नहीं है। जैनियों के पास अहिंसा धर्म, बौद्धों के पास क्षणिकवाद, यह तो हम पहले से कह ही रहे हैं। गुरुग्रंथ साहब का पाठ हो रहा है, संपूर्ण गुरुग्रंथ साहब में राम, हरि, कृष्ण का भजन है, उसमें रामानंदाचार्य के चेलों के वचन हैं। लेकिन आज उनको पता ही नहीं है कि रामानंद कौन थे, कबीर दास जी के गुरु कौन थे। ये बतलाइए, जिन संतों के वचनों को पढक़र आप बहुत बड़े धार्मिक बन रहे हैं और उसके मूल का आपको पता ही नहीं है, यह क्या बात हुई? जैसे कोई यह जाने ही नहीं कि उसकी पार्टी का अध्यक्ष कौन है, तो किसी छोटे कार्यकर्ता से पार्टी चलेगी क्या?
हिन्दू धर्म को वर्गीकरण के लिए दोषी ठहराया जाता है। वर्गीकरण भला कहां नहीं है? क्या अफसर को ज्यादा वेतन नहीं मिलता है, क्योंकि वह ज्यादा पढ़ा-लिखा है, ज्यादा जिम्मेदारी के पद पर है, उसे अलग से केबिन देकर बैठाया जाता है, सबको बैठने के लिए अलग से केबिन नहीं मिलता। हुआ न वर्गीकरण? पहले अध्यापक का जो वेतन था, वह एक सैनिक का नहीं था, लेकिन बाद में धीरे-धीरे सुधार हुआ। नौकरी में फर्क है या नहीं। कोई उत्सव होता है, तो कई लोग तो अब अतिथियों व सम्बंधियों का भी वर्गीकरण करते हैं। किसी को कम सुविधा किसी को ज्यादा सुविधा। धर्म ने वर्गीकरण किया था, तो क्या गलत है? मंदिर में कौन जाएगा, मंदिर में कौन वेद पढ़ेगा, यह तय हुआ, तो इसमें क्या बात हो गई? जिस आदमी को हनुमान चालीसा का भी ज्ञान नहीं है, उससे कोई पूछे कि धर्म क्या है, तो वह क्या बतलाएगा? उसको पता नहीं है, ‘चोदनालक्षणोह्यर्थो धर्म:।’ महर्षि जैमिनी द्वारा लिखित यह धर्म का प्रतिपादक दर्शन है। पूर्वमीमांसा दर्शन में यही सूत्र बनाया गया। वेद के प्रतिपादित जो प्रयोजनमान अर्थ है, उसको धर्म कहते हैं। धर्म वह है, जिसे वेद ने हमारे कल्याण के साधन के रूप में प्रतिपादित किया हे। लिखा गया है कि शत्रु को मारने के लिए सोमयाग करना चाहिए, किन्तु वेदों ने कहा कि ये धर्म नहीं है, क्योंकि इससे शत्रु तो मर जाएगा, किन्तु बाद में नर्क जानना पड़ेगा। धर्म कल्याण के लिए है, विनाश के लिए नहीं। धर्म का ऐसा ही स्वरूप है जमीन से आकाश तक।
अब ज्यादातर लोगों को पता नहीं है कि धर्म का क्या मतलब है। धर्म का ऐसा क्रम जो जमीन से लेकर आकाश तक है। विद्यार्थी का, भाई का, मां का, पिता का ज्ञान। जिसमें धर्म नहीं होगा, वह पत्नी नहीं होगी। जिसको धर्म का ज्ञान नहीं होगा, वह पति नहीं बन सकेगा, जिसको धर्म को ज्ञान नहीं होगा, वह न छात्र बनेगा न किसान बनेगा। धर्म के ज्ञान से ही कुछ बना जा सकता है।
क्रमश: