Tuesday, 4 October 2011

मीडिया में महाराज

(राजस्थान पत्रिका में रविवार को महाराज जगदगुरु के सम्बन्ध में २ अक्टूबर को प्रकाशित सामग्री)
संस्कृत का संरक्षण मेरा उद्देश्य
बारह साल की उम्र में बिहार के भोजपुर से अपना गांव परसिया छोड़कर साधु बने स्वामी रामनरेशाचार्य संस्कृत में निरंतर लुप्त हो रही हजारों साल पुरानी न्याय दर्शन, वैशेषिक और वैष्णव दर्शन की परंपरा को पुनर्जीवित करने में लगे हुए हैं। काशी की विद्वत परंपरा के विद्वान आचार्य बदरीनाथ शुक्ल से 10 वर्षो तक विद्याध्ययन करने के बाद रामनरेशाचार्य ने ऋषिकेश के कैलाश आश्रम में बिना किसी जाति-पांति व वर्ग का भेद किए हजारों विद्यार्थियों व साधुओं को न्याय दर्शन, वैशेषिक और वैष्णव दर्शन पढ़ाया। संस्कृत के दुर्लभ व लगभग अप्राप्त ग्रंथों का प्रकाशन कर रामनरेशाचार्य ने विलुप्त होते अनेक ग्रंथों को भी बचाया है।
अपने जीवन के छह दशक पूरे कर रहे रामनरेशाचार्य काशी में जगद्गुरू रामानंदाचार्य के मुख्य आचार्य पीठ "श्रीमठ" में 1988 से "जगद्गुरू रामानंदाचार्य" के पद पर अभिषिक्त होने के बाद भी अनेक देशी-विदेशी छात्रों को संस्कृत मे निबद्ध भारतीय दर्शन की जटिल शास्त्र प्रक्रिया को निरंतर सहज रूप से पढ़ा रहे हैं। देश के अनेक क्षेत्रों में संस्कृत विद्यालयों की स्थापना कर रामनरेशाचार्य विद्यार्थियों को सारी सुविधाएं भी निशुल्क ही उपलब्ध करवाते हैं। आदिवासी क्षेत्र में रामनरेशाचार्य ने संस्कृत की एक ऎसी अलख जगाई है कि वहां स्थापित विद्यालयों में हजारों छात्र समान रूप से बिना किसी भेद-भाव के संस्कृत पढ़ रहे हैं।

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