Sunday, 6 October 2013

सद्चरित्र भी पढि़ए-पढ़ाइए - ३

यदि किसी व्यक्ति का खान-पान घर में ही बिगड़ चुका हो, संयमित-नियंत्रित न हो, तो वह दुकानों या उत्सवों में कहीं भी खान-पान में संयमित नहीं हो सकता, वह जहां खाएगा-पीएगा अनियंत्रित हो जाएगा। वासना सभी को होती है, कितना भी बड़ा आदमी हो, आश्रम में हो या संस्था में हो, सबमें इन्द्रियां हैं, सबका मन होता है कि हमें यह मिल जाता, किन्तु मन को समझाना पड़ता है, तभी वह संयमित होता है।
जब छूट मिल गई घर में, छूट मिल गई विश्वविद्यालय में, छूट मिल गई सडक़ पर, तो विकृति बढ़ती गई, शराब पीते-पीते जैसे आदमी पियक्कड़ हो जाता, सिगरेट पीते-पीते जैसे चेन स्मोकर हो जाता है, वैसे ही व्यक्ति चरित्र का पतन होने पर कहीं भी अपने को रोक नहीं पाता है। कोई वस्तु हो या स्त्री, कैसे भी प्राप्त करने की चेष्टा करता है। तो विश्वविद्यालयों का वातावरण सुधरना चाहिए, वो अच्छी शिक्षा के लिए ही बने हैं।
इधर एक विकृति ज्यादा दिख रही है, युवक-युवती मुंह बांधकर सिर ढककर एक दूसरे से चिपककर सडक़ों पर निकलने लगे हैं। गाड़ी पर बैठने का भी एक तरीका है, जो मुद्रा या आचरण गाड़ी पर आवश्यक नहीं है, उसे अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। पहले कड़ी सुरक्षा होती थी, पंजाब में जब आतंकवाद था, लोगों को मुंह बांधकर वाहन चलाने नहीं दिया जाता था, आज भी गाडिय़ों पर से काले शीशे उतार दिए जाते हैं। कुंभ मेले में ही जितनी गाडिय़ां आईं, किसी पर काला शीशा नहीं रहने दिया गया। यह सुरक्षा के लिए जरूरी है, किन्तु मुंह बांधकर यात्रा को कैसे अनुमति दी जा रही है। खुलेआम सडक़ पर गलत मुद्रा में किसी को जाने क्यों दिया जा रहा है? कड़ाई होनी चाहिए, पूछताछ होनी चाहिए, कोई भाई-बहन है, पति-पत्नी है, तो प्रमाण दे और उन्हें शालीनता से जाने दिया जाए, किन्तु बाकी लोगों पर रोक लगनी चाहिए। मुंह छिपाकर यात्रा की छूट से भी वास्तव में वासना बढ़ रही है। अनेक युवा व लोग रोज साथी बदलने लगे हैं। सुबह किसी के साथ दोपहर किसी के साथ, संध्या को किसी के साथ, तो रात किसी के साथ। यह समाज को क्या हो गया है? एक चरित्रवान समाज में केवल वैध सम्बंधों को ही बढ़ावा देना होगा। विश्वविद्यालय के परिसर, सडक़ और सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी तरह के अश्लील आचरण पर रोक लगनी चाहिए। सख्त कानून बनना चाहिए।
इधर, टेलीविजन से भी वासना को बढ़ावा मिला है। अनेक टीवी चैनलों ने विकृतियों को उकसाने का काम किया है। अश्लीलता को रोकना चाहिए। लोग फिल्म में देखते हैं, तो उनका भी मन होता है, मनुष्य का स्वभाव है, देखकर आदमी सीखता है। इतने बड़े प्रसारण दुनिया भर में चल रहे हैं, इन चैनलों से हमारा क्या लाभ है? जो लाभदायक हैं, उन्हें इजाजत मिले, लेकिन जो गलत हैं, उन पर रोक लगनी चाहिए। गलत हवा को रोकना होगा। सजा निर्धारित होनी चाहिए। विकृत मानसिकता का व्यक्ति अब मरने या नपुंसक होने की भी चिंता नहीं करता, मानो अच्छा चिंतन ही खतरे में पड़ गया हो।
जो अपराधी हैं, जो बलात्कारी हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई तेजी से होनी चाहिए, त्वरित न्याय होना चाहिए और फिर उसका प्रचार किया जाना चाहिए। दोषी को भी बताया जाए और बाकी लोगों को भी खूब बताया जाए कि दंड क्यों दिया जा रहा है। इसका जितना प्रचार संभव है, किया जाए। लोगों को शिक्षा मिलनी चाहिए।
पहले के समय में चरित्र का महत्व था, लेकिन अब लोग या सरकार भी चरित्र देखकर फैसला नहीं लेती है। चरित्रहीन लोग भी बड़े पदों पर बैठ जाते हैं। हर तरह की पढ़ाई हो रही है, तो चरित्र निर्माण का भी पाठ्यक्रम हो, चरित्र की पढ़ाई हो, चरित्रवान लोगों का सम्मान होना चाहिए। प्रशासन में भी अच्छे लोगों को जगह मिलनी चाहिए। डिग्री और संपत्ति के आधार पर निर्णय होता है, लेकिन चरित्र के आधार पर भी निर्णय होना चाहिए। चरित्र ठीक नहीं है, तो बड़ा काम नहीं मिलना चाहिए, चुनावी टिकट नहीं मिलना चाहिए।
अब सरकार की बात, जिसके पास रोजगार नहीं हो, प्रकाश नहीं हो, जीवन के लिए, कहीं से कोई आधार नहीं हो, तो वह क्या करेगा? बेरोजगारों की बड़ी फौज खड़ी हो जाएगी, तो क्या होगा? कहा गया है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है, हर आदत बिगडऩे लगती है पीने, खाने, जीने में। नशा करना, जहां मन भटक गया, वहां चले जाना। तमाम वर्जनाओं को छोडक़र वासना की पूर्ति में लग जाना। नि:संदेह युवाओं की बहुत उपेक्षा हो रही है। सरकार को इन युवाओं को रोजगार देना चाहिए। अधिक से अधिक मात्रा में रोजगार हो। रोजगार देने के बाद निगरानी की आवश्यकता है। स्पष्ट होना चाहिए कि ऑफिस में गलत होने पर निकाल देंगे। यह बाध्यकारी होना चाहिए, यदि आपने मर्यादा के खिलाफ कुछ किया है, तो हम वेतन काट लेंगे, जुर्माना करेंगे। जो लोग प्रशासन में हैं, उन्हें चरित्रवान होना चाहिए और चरित्र के लिए दूसरों पर भी कड़ाई होनी चाहिए। हमारा इतना बड़ा देश है, कहा जाता है कि युवाओं का देश है। यहां एक से एक मेधावी युवा हुए हैं। निश्चित रूप से यहां के लोगों में ऊर्जा है, इस ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए सकार को विभिन्न योजनाओं को बढ़ावा देना चाहिए। चरित्र के आधार पर राष्ट्रीय, शासकीय और जिला स्तर पर सम्मान हो। जैसे शरीर और पैसे का मूल्यांकन होता है, वैसे ही चरित्र के लिए भी मूल्यांकन होना चाहिए। यदि आज तक अभद्र व्यवहार नहीं किया, किसी लडक़ी या शिक्षक के साथ गलत नहीं किया, बिना अर्थ कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं किया, तो इसके लिए भी अंक होने चाहिए। जैसे खेलकूद और चित्र के भी अंक जुड़ते हैं, एनसीसी के भी अंक जुड़ते हैं, ठीक उसी तरह से चरित्र के भी अंक जुडऩे चाहिए। अच्छा चरित्र होगा, तो ज्यादा अंक दिया जाए। बाकी विषयों के अंक के साथ चरित्र का भी अंक जोड़ा जाए। राष्ट्र के स्तर पर चरित्र सुधार के लिए सरकार को ऐसे उपाय करने होंगे। सरकार चरित्रवान लोगों को सामाजिक रूप से आगे बढ़ाए, सम्मानित कराए, रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए। आवेदन में एक कॉलम दे दें कि जो चरित्रवान लोग होंगे, उन्हें अच्छा पद मिलेगा, अच्छी तरक्की दी जाएगी।
क्रमश:

Friday, 4 October 2013

सद्चरित्र भी पढि़ए-पढ़ाइए

चित्र श्री हिमांशु व्यास जी ने लिए हैं
भाग - २
बच्चों को जैसे बहुत-सी बातों की शिक्षा दी जाती है, वैसे ही उन्हें यह शिक्षा भी देनी चाहिए कि माता-पिता जहां चाहेंगे, वहीं विवाह करना होगा। बच्चों को साफ बताना होगा कि घर में भी ठीक से रहना होगा। संयम से नहीं रहेंगे, तो बहुत महत्व नहीं मिलेगा या संपत्ति में भागीदारी नहीं मिलेगी। ऐसे तमाम तरह के नियंत्रण घर-परिवार में पहले होते थे, किन्तु अब उसमें काफी छूट हो गई है। पारिवारिक वातावरण में भी संयम का भाव नहीं रह पाया है। मेरा मानना है कि पहले से ही बच्चों को अगर यह बात कही जाए कि हम अपनी परंपरा के हिसाब से ही आपकी शादी करेंगे, यह निर्णय हम सोच-समझकर लेंगे, तो बच्चा या किशोर समझेगा और संयम में रहेगा। कई परिवार ऐसे हैं, जहां माता-पिता पहले ही यह बात स्पष्ट कर देते हैं, तो देखा गया है कि इन परिवारों के बच्चे संयम के साथ सही मार्ग पर चलते हैं और जिन परिवारों में आवश्यकता से अधिक स्वतंत्रता दी जाती है, वहां बच्चों में संयम कम होता है और उनके गलत मार्ग पकडऩे की आशंका ज्यादा रहती है।
किसी लडक़ी को यदि यह ज्ञात हो जाए कि फलां लडक़ा गलत है, तो उससे दूर ही रहना चाहिए। कभी भी मित्र या जीवन साथी के रूप में किसी अपराधी, अराजक, अभद्र, असंयमी, अनुशासनहीन व्यक्ति का चयन नहीं करना चाहिए। किन्तु यह कौन बताएगा? इसका माता-पिता पर सर्वाधिक उत्तरदायित्व है। बच्चों को माता-पिता के नियंत्रण में रहना चाहिए, तभी परिवार बचेंगे। जो इस तरह के गलत लोग हैं उनका बहिष्कार हो, बिरादरी से, समाज से अलग किया जाए। कई घटनाएं होती हैं, जब लोग अपने भटके हुए बच्चों को जान से मार देते हैं, किन्तु यह गलत है, तरीके में सुधार होना चाहिए। हत्या बिल्कुल गलत है, वास्तव में भटके हुए लोगों का सामाजिक परिष्कार होना चाहिए। समझाकर सुधारना चाहिए, फिर भी यदि कोई समाज विरोधी गलत कार्य करे, तो उसके साथ खान-पान का व्यवहार नहीं रखें, उससे बोले नहीं, गलत और चरित्रहीन व्यक्तियों का बहिष्कार ज्यादा अच्छा उपाय है। गलत आदमी को किनारे कर दीजिए, उपेक्षित छोड़ दीजिए, वह स्वयं सुधर जाएगा या अपने अंत को प्राप्त हो जाएगा।
चरित्र निर्माण पर सरकार को भी पूरा ध्यान देना चाहिए। सरकार के पास संसाधन है, तो बच्चियों को अलग से शिक्षा दी जाए, उनके लिए अलग शिक्षण संस्थाओं को बढ़ावा देना चाहिए। चिंतन, मनन, अध्ययन का लडक़ों के लिए अलग स्थान हो, लड़कियों के लिए अलग स्थान हो, तो उनमें संयम बढ़ेगा, भटकाव कम होगा।
एक बार मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति से मिला, तो उनसे पूछा, 'आपके विश्वविद्यालय के परिसर में लडक़े-लड़कियां किस रूप में रहते हैं, क्या उस पर आपका कोई नियंत्रण है?Ó
तो उन्होंने उत्तर दिया, 'हम केवल पढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं, कौन कहां किससे गले मिल रहा है, कौन कहां बैठ रहा है? हमें इससे क्या लेना-देना?Ó
ध्यान दीजिए, यह एक कुलपति के शब्द हैं, जिस पर पूरे विश्वविद्यालय परिसर का उत्तरदायित्व है। यदि विश्वविद्यालय परिसर में कुछ गलत हो रहा है, तो इसके लिए सीधे कुलपति की ही जिम्मेदारी बनती है। प्राचीन काल में आश्रमों में क्या होता था, अभी आश्रमों में क्या होता है, आश्रम या मठ के प्रमुख पर ही उत्तरदायित्व होता है। आश्रम में कौन-कैसे उठेगा, बैठेगा, रहेगा, इसका उत्तरदायित्व आश्रम के प्रमुख पर ही होता है आज भी। लगभग हर आश्रम और यहां तक कि अस्पतालों में भी व्यवहार की अपनी आचार संहिता होती है, जिसके अनुरूप ही उस परिसर में सबको व्यवहार करना पड़ता है। विश्वविद्यालय जो शिक्षा की इतनी बड़ी संस्था है, उसमें कोई आचार संहिता ही नहीं है कि लडक़े कैसे बोलते हैं, कैसे बैठते हैं, कैसे दिखते हैं, किस तरह से व्यवहार कर रहे हैं, क्या सोचते हैं, कोई संहिता ही नहीं है? कुलपति को ही जब संयमित आचार-विचार की चिंता नहीं है, तब विश्वविद्यालयों के परिसर में विकृतियों को पनपने और बढऩे से कौन रोक सकता है? प्रकृति का ऐसा विधान है कि स्त्री और पुरुष के बीच एक दूसरे के प्रति स्वाभाविक आकर्षण होगा, किन्तु यदि संयम नहीं होगा, तो विकृति होगी ही और वह परिसर ही नहीं, उसके बाहर सडक़ों पर भी दिखेगी।
क्रमश:

Thursday, 3 October 2013

जगद्‌गुरू का एक पावन संकल्प

 हरिद्वार में निर्माणाधीन राम मंदिर

 सप्तऋषि मार्ग, हरिद्वार स्थित यह निर्माणाधीन मंदिर ऋषीकेश जाने वाले मार्ग पर शान्तिकुंज के बाद पड़ता है.  

Wednesday, 25 September 2013

सद्चरित्र भी पढि़ए-पढ़ाइए

(महाराज का एक प्रवचन - युवाओं की स्थिति और बढती अनैतिकता पर)
सबसे पहले युवाओं को यह समझ लेना चाहिए कि सच्चा सुख और सम्मान किसमें है। आज जीवन के संदर्भ में युवाओं की सोच बदली है। हर युवा सोच रहा है कि मेरी शिक्षा अच्छी होनी चाहिए, मेरा स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए और मेरा प्रभाव भी बढऩा चाहिए। आज के समय में पढऩे वालों की संख्या और पढऩे वालों का स्तर, दोनों बढ़ा है। युवाओं को यह बात समझ में आ गई है कि अच्छी शिक्षा होगी, तभी हम संपन्न और प्रतिष्ठित हो सकेंगे, सुखमय जीवन बिता सकेंगे। बहुत से युवा व्यायाम व शरीर बनाने में लगे हैं, वे समझ गए हैं कि शरीर स्वस्थ रहेगा, तभी हम जीवन का उपभोग कर सकेंगे, इसलिए जगह-जगह व्यायामशालाएं खुल रही हैं। पहले वाले बच्चों की तुलना में आज के बच्चे शरीर पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। इसके साथ ही, यह बात भी उनके मन में आनी चाहिए कि धन की जो वासना है, केवल उसे ही अगर तुष्ट करने में लगे रहेंंगे, तो परिवार, समाज, देश या संसार में कभी भी बड़े आदमी नहीं हो सकेंगे। यह बात शुरू से ही बच्चों और युवाओं के मन में बैठानी चाहिए। उन्हें समझाना चाहिए कि केवल धन कमाना ही सबकुछ नहीं है। नि:संदेह, बच्चे पढऩे में जितनी दिलचस्पी अब लेते हैं, उतनी पहले नहीं लेते थे। समय बदल गया है, अब युवा जितना अपना ध्यान रखते हैं, उतना पहले नहीं रखते थे, जिस तरह से ये संस्कार उनमें विकसित हुए हैं, उसी तरह से उनमें अच्छाई का संस्कार भी विकसित होना चाहिए। अच्छाई हो, चरित्र हो। शिक्षा होगी, पैसा होगा, स्वास्थ्य होगा, लेकिन सारा कुछ तब धरा रह जाएगा, यदि चरित्र अच्छा नहीं होगा। अच्छा चरित्र नहीं होगा, तो हम कभी विशिष्ट जीवन को प्राप्त नहीं कर पाएंगे।
अभी जो घर का वातावरण है, उसमें धन की उपलब्धता बढ़ी है। बच्चों को जितना पैसा नहीं देना चाहिए, उतना दिया जा रहा है। छोटी उम्र में ज्यादा पैसे मिलने लगे हैं। मेरे गुरुजी, जिस गुरु से मेरी दीक्षा हुई थी, यह कहते थे, 'छोटी आयु में आदमी पैसे से बिगड़ता है।Ó जब तक मैं छोटा था, उन्होंने मेरे पास दो पैसे नहीं रहने दिए। जिस वस्तु की मुझे आवश्यकता पड़ती थी, गुरुजी ही मुझे दिला देते थे। आज भी अपने देश में जो अच्छे परिवार हैं, उनमें बच्चों को जो वस्तु चाहिए, वह परिवार के बड़े ही उन्हें देते हैं, पैसा नहीं देते, जब कपड़ा चाहिए, कपड़ा देते हैं, जब पुस्तक-कॉपी, भोजन, मनोरंजन, जो भी चाहिए, बड़े ही सोच-समझकर देते हैं। बच्चों को पैसे की जरूरत नहीं पड़ती, उनका पैसों से सीधे कोई सरोकार नहीं रहता है। ऐसे में, वे पैसे द्वारा उत्पन्न होने वाली विकृतियों से बच जाते हैं। 
कोई संदेह नहीं, मध्यवर्गीय परिवारों के पास भी पैसा खूब हो गया है। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हमें बच्चों के पालन-पोषण के प्रति सावधान रहना चाहिए। जैसे हम बच्चों को पटाखे देते हैं, राइफल तो नहीं देते, बच्चों को चाकू और ब्लेड से भी बचाते हैं। हम चाहते हैं कि बच्चे सुरक्षित रहें, लेकिन कहीं न कहीं पैसा बच्चों और युवाओं के जीवन को असुरक्षित बना रहा है। इस पर अभिभावकों को ध्यान देना चाहिए। जो अभिभावक बच्चों को पॉकेट मनी या पैसे देते हैं और खर्च का हिसाब नहीं लेते, वो गलत करते हैं। बच्चों से अवश्य पूछना चाहिए कि कहां कितना खर्च किया।
बच्चों और युवाओं को लेकर चिंता बढ़ी है, वासना बढ़ रही है, तो विकृति भी बढ़ रही है। मेरा मानना है, मोबाइल की आवश्यकता बच्चों को नहीं है। मोबाइल पर नियंत्रण होना चाहिए। अभिभावक जांच तो करें कि कहां-कहां बात हुई, कहीं बच्चा गलत राह पर तो नहीं है। ऑफिसों में बड़े लोगों पर भी निगरानी रखी जाती है कि वे जहां-तहां फोन न करें। अनावश्यक फोन करने में समय बर्बाद होता है, बिल में पैसे बर्बाद होते हैं, सम्मान भी प्रभावित होता है। ऑफिस में तो फोन और बिल पर नियंत्रण है, लेकिन घर में नहीं है। बच्चों को मोबाइल फोन दे दिया है, कई बच्चे रात्रि में भी जहां चाहे, बात कर रहे हैं और अभिभावक कुछ पूछ भी नहीं रहे हैं। घर में खुलेपन का वातावरण बढ़ा है, अनुशासन घटा है। 
क्रमशः

Tuesday, 24 September 2013

भाई-भाव बचाइए

समापन भाग
सोचकर देखिए, यदि राम जी नहीं होते, तो भरत जी का कार्य कैसे चलता? भरत जी नहीं होते, तो राम जी का कार्य कैसे चलता? यदि लक्ष्मण नहीं होते, तो कैसे होता? भरत नहीं होते, १४ वर्ष तक राम जंगल में रहते, तो अयोध्या की क्या दशा होती? भाइयों ने मिलकर वन और राज्य दोनों में जीवन को सहज बना दिया, श्रेष्ठतम बना दिया। एक दूसरे के लिए समर्पित होकर ये ऐसे भाई बने कि संसार के लिए उदाहरण बन गए। 
लक्ष्मण जी भाई हैं, लक्ष्मण जी ने राम जी के लिए १४ वर्षों तक शयन नहीं किया। पूरी रात जागते हैं, जब राम सोते हैं। लिखा है रामायणों में, जितनी सेवाएं राम जी की होती थीं, उन सभी का संपादन लक्ष्मण जी स्वयं करते थे। झोंपड़ी बनाने से लेकर फल-मूल देना। पहरेदारी करना। यहां तक विद्वान कहा करते हैं कि यदि राम जी को तकिये की आवश्यकता है, तो लक्ष्मण जी तकिया के रूप में प्रस्तुत हो जाते हैं, फल-मूल की आवश्यकता हो, तो फल-मूल के रूप में प्रस्तुत हो जाते हैं, लक्ष्मण जी में ऐसी शक्ति है। कहने का अर्थ यह कि भाई के प्रति सर्वांगीण समर्पण है। ऐसा भाई ही कर सकता है। राम जी ने भातृत्व को कभी लांछित नहीं होने दिया, उसे सदा बढ़ाया। उन्होंने धन और भोग को महत्व नहीं दिया। अन्य सम्बंधों को भातृत्व के पोषक के रूप में माना। और आज आदमी भूल जाता है, जहां पत्नी आई, जहां बच्चे हुए, तो भाई का सम्बंध दूर का सम्बंध हो जाता है। जो पत्नी है, वही असली सम्बंधी बन जाती है, उसके लिए आदमी चोरी करता है, तमाम दूषित कर्मों को करता है। जिसके साथ जीवन में एक साथ खाया, एक ही मां के एक ही गर्भ में दोनों रहे, साथ में मां की गोद में पलना, साथ में सोना, साथ में पलना, साथ में शिक्षित होना, भातृत्व की कोई तुलना नहीं है।
किन्तु दूसरा पक्ष भी है, औरंगजेब ने भाइयों को मरवा दिया राजा बनने के लिए, भाई के समर्थक पिता को जेल में बंद करवा दिया। ऐसे ही अब पत्नी के लिए भाई की हत्या तक हो जाती है। गद्दी के लिए लोग भाई को छोड़ देते हैं। केवल भोग और धन की लिप्सा के कारण ऐसा होता है, नहीं तो दुनिया में कोई शक्ति नहीं है, जो भातृत्व को प्रभावित कर सके। सम्बंधों में जो विकृतियां आई हैं, जिसके कारण से भातृत्व लांछित हो रहा है, उसके संदर्भ में हमें दृष्टि प्राप्त करने के लिए राम चरित्र का चिंतन करना चाहिए। विभिन्न रामायणों में राम चरित्र का वर्णन है और राम किसी भी स्तर पर भातृत्व का परिस्कार करना नहीं छोड़ते।
१४ वर्ष बाद भी भरत राजा रहना चाहें, तब भी चलेगा। भरत में जरा भी राज चलाने का भाव हो, तो राम जंगल चले जाएंगे, ऐसा राम जी ही सोच सकते हैं। वह मेरा भाई है, राजा बनना चाहता है, तो ठीक है, कोई बात नहीं, दोनों एक ही है। जैसे मैं परिपालन करूंगा प्रजा का, वह मुझसे अच्छा करेगा।
कई बार वार्ता में लोग कहते थे कि लक्ष्मण जी की ओर से भी कई बार यह बात आई कि हो सकता है, भरत को राज मद हो गया हो। लिखा है कि जब मालूम हुआ लक्ष्मण जी को कि भरत जी सेना लेकर आ रहे हैं, साथ में अपार जनता आ रही है, तो लक्ष्मण जी बड़े नाराज हुए, उन्होंने कहा कि मैं आज ही समाप्त कर दूंगा। इसे राज मद हो गया है। राम जी ने कहा, तू मूर्ख है लक्ष्मण, राज मद जिन्हें होता है, वो और लोग हैं, कभी भी भरत को राज मद नहीं हो सकता। भरत में विकृति आ ही नहीं सकती। वह विकृतियों से परे हैं। कई बार लोग ऐसे बहकावे में आ जाते हैं, किन्तु राम जी ने लक्ष्मण को डांटा और समझाया कि ऐसा नहीं सोचते। राम जी का भरत पर दृढ़ विश्वास है, क्योंकि वे भरत जी का मन जानते हैं। राम जी ने भरत के बारे में कहा :-
मसक फँूक मकु मेरु उड़ाई। होई न नृपमदु भरतहि भाई।
लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।
मच्छर की फँूक से चाहे पहाड़ उड़ जाए। किन्तु हे भाई, भरत को राज मद नहीं हो सकता। हे लक्ष्मण, मैं तुम्हारी और पिता की सौगन्ध खाकर कहता हूं, भरत के समान पवित्र और उत्तम भाई संसार में नहीं है।
एक और प्रसंग है, जब भरत जी मनाने गए, तो गुरु वशिष्ठ जी ने भरत जी की खूब प्रशंसा की, इतनी बड़ाई रामचरितमानस में किसी की नहीं हुई है, जितनी वशिष्ठ जी ने की। वशिष्ठ जी ने कहा, जो भरत कहते हैं, उसे सुनिए और उस पर अमल कीजिए।
भाई की इतनी बड़ाई सुनकर राम जी को कोई ईष्र्या नहीं हुई। वशिष्ठ जी ने कहा कि भरत जी जो कहेंगे और जैसा करेंगे, वही धर्म है, धर्म का कोई और अर्थ नहीं है, भरत जो बोलते हैं, वह धर्म है, भरत जैसा आचरण करते हैं, वह धर्म है, धर्म के मानक पुरुष हैं भरत। मैं भरत से बहुत प्रभावित हूं।
यह सुनकर राम जी बहुत खुश हुए। अयोध्या कांड के चित्रकूट के प्रसंग में राम जी ने कहा कि मेरे जीवन में इससे ज्यादा उत्कर्ष और क्या होगा, जिस रघुवंश को वशिष्ठ जी ने ही पाला-बढ़ाया, सुन्दर बनाया, रघुवंशियों के लिए आप सबकुछ हैं, और आपने ही हमें गरिमा प्रदान की और आप ही भरत से प्रभावित हैं, मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि मेरे भाई के लिए संसार का सबसे बड़ा ज्ञान शिरोमणि और इतना बड़ा तपस्वी और इतना बड़ा ऋषि, इतना बड़ा संयमी, जिसका कोई जोड़ नहीं हो, वह भरत की इतनी अनुशंसा कर रहा है, मेरा जीवन धन्य हुआ, मुझे गौरव है भरत का भाई होने का। आज अगर मंच पर कोई बड़े नेता के सामने छोटे नेता की ऐसी प्रशंसा कर दे, तो पार्टी उस छोटे नेता को निकाल बाहर करेगी। दूसरे की प्रशंसा सुनकर लोगों को ईष्र्या होने लगती है। सहिष्णुता समाप्त हो गई है, भाई को भिन्न समझने लगे हैं लोग, जैसे कोई और दूसरा सहयोगी होता है। ऐसे कैसे सम्बंध चलेगा?
मैं सभी लोगों को आगाह करना चाहता हंू कि भातृत्व को गरिमा देने की आवश्यकता है, संसार में भातृत्व की आवश्यकता है, भातृत्व को सुन्दर बनाने की आवश्यकता है। जिस भातृत्व के बिना हमारा कोई व्यवहार नहीं चलता, कोई बड़प्पन नहीं चलता, कोई भी विकास का मार्ग प्रशस्त नहीं होता, उस भातृत्व को किसी भी स्तर पर बिगडऩे नहीं देना चाहिए और उसके लिए सम्पूर्ण सामग्री हमें रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण और अन्य रामायणों से मिलती है। इतनी अच्छी सामग्री है कि जिसकी कोई सीमा नहीं है। राम जी का सम्पूर्ण चरित्र ही रामराज्य का संस्थापक है, किन्तु राम राज्य की संस्थापना राम जी आए, तब से ही नहीं हुई, राम जी वन से लौटकर राजा बने, तभी से राम राज्य नहीं शुरू हुआ, राम राज्य तो तब शुरू हुआ, जब तपस्वी वेश धारण करके भरत जी ने राम राज्य का संचालन किया। राम राज्य की शुरुआत तो भरत जी के राज्य संभालते ही हो गई थी। राम राज्य के संस्थापक राम नहीं, बल्कि भातृत्व शिरोमणि भरत हैं।
यदि कोई राम राज्य की स्थापना अपने जीवन में करना चाहता है, तो वह अपने उच्च व्यवहार से भरत की तरह भ्राता प्राप्त करे और भरत जैसा भ्राता प्राप्त करने के लिए राम जैसा भ्राता बने। लोलुपता का त्याग करे, सहिष्णु बने, राम जी के समान, श्रेष्ठ भावों का स्रोत होने की आवश्यकता है। भातृत्व के लिए अच्छा परिवेश बनाने की आवश्यकता है।
राम जी भाइयों के बिना खाते नहीं हैं, भाइयों के बिना सोते नहीं हैं। भाइयों के बिना एक पल भी बिताना नहीं चाहते। पति-पत्नी के अंतरंग जीवन को छोडक़र और जो तमाम प्रशासनिक व्यवस्थाएं हैं, कहीं भी राम अपने भाइयों के बिना नहीं रहते। छाया के जैसे भाई हैं। राम राज्य या राम दरबार का एक चित्र बहुधा देखने को मिलता है, जिसमें हनुमान जी भी हैं, तीनों भाई भी हैं और राजा के रूप में राम, जानकी जी के साथ बैठे हैं, क्या बात है! जैसे बाल्यावस्था में चारों भाई साथ थे, वैसे ही जीवन की चरम आयु में भी चारों भाई साथ रहे। यह भातृत्व का सबसे बड़ा नमूना है। हम प्रयास करें कि भातृत्व को हम लोग पुन: स्थापित करें, ताकि जीवन में उच्च भावनाओं की प्रतिष्ठा हो। परिवार, समाज, देश में राम भाव की संस्थापन हो।
जय सियाराम...

भाई-भाव बचाइए

भाग : ७
तुलनात्मक अध्ययन की सनातन अनादि परंपरा है। राम जी ज्यादा समर्पित हैं या भरत जी। राम जी में ज्यादा पे्रम की भावना है या भरत जी में, कौन ज्यादा प्रेमी है, लोग तुलनात्मक अध्ययन करते हैं। लोग तुलना करके निष्कर्ष निकालते हैं कि भरत जी की तपस्या राम जी से भी बड़ी है। राम जी पत्नी के साथ थे, भरत जी नंदीग्राम में अकेले रह रहे हैं। राजा और राज्य भावना का पालन करते हुए तपस्वी हैं, क्या बात है! अयोध्या से करीब १४ किलोमीटर दूर था नंदीग्राम। सभी दृष्टियों से, यहां तक लिखा है कि बड़े-बड़े ऋषियों के रोंगटे खड़े हो रहे हंै, वे भरत का तपस्वी जीवन देखकर लजा रहे हैं :-
सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं।
देखि दसा मुनिराज लजाहीं।।
भरत का जो यह इतना बड़ा प्रेम है, उस प्रेम को जीवन देने वाले और खाद-पानी डालने वाले राम जी ही हैं। राम जी यदि भातृत्व के पोषक के रूप में हमेशा अपने को तैयार नहीं रखते, तो भरत का भातृत्व लुप्त हो जाता। इसके लिए लिखा है कि
भरत सरिस को राम सनेही। जग जपु रामु राम जपु जेही।
दुनिया में कौन भरत के समान राम का स्नेही होगा। संसार राम-राम जपता है और राम जी भरत-भरत जपते हैं। जब कोई भाई सम्बंधों को महत्व देकर, निर्वाह के लिए तत्पर होगा, तभी भातृत्व सम्बंध जीवित रहेगा और दूसरे सम्बंध उसी को मजबूत करने के लिए होंगे। यह नहीं कि उसको तोडऩे के लिए हो जाएं। बाप-बेटा का सम्बंध हो या पति-पत्नी का सम्बंध हो, चाहे कोई सम्बंध हो, उसे यह मानना होगा कि वह भातृत्व सम्बंध का पोषक बने, भातृत्व का संवद्र्धक बने, तभी भातृत्व बचेगा और उससे जो शक्ति मिलेगी, जो एक अच्छा वातावरण तैयार होगा, वह सारे सम्बंधों को आदर्श रूप बना देगा और उससे सम्पूर्ण वातावरण ही पवित्र हो जाएगा। जो सम्बंधों में खोटापन आया है, उसका निषेध किया जाए और राम जी का जो सम्बंध निर्वाहक स्वरूप है, जो भातृत्व निर्वाहक स्वरूप है, उसका अनुकरण किया जाए। राजा बनने के बाद भी भरत जी का जीवन देखिए, वह भी अनुकरणीय है। आज के राजाओं को भरत जी से अपनी तुलना करनी चाहिए।
राम जी का भी विवाह हुआ था, पुत्र हुए, उन्होंने अपने जीवन में न जाने कितने संपर्क बनाए, किन्तु कभी भी उन्होंने इन सम्बंधों को भातृत्व को तोडऩे वाला नहीं बनने दिया। राम-भरत के जैसे आदर्श भातृत्व में गुरु वशिष्ठ का भी बड़ा योगदान है। गुरु वशिष्ठ कहीं भी भातृत्व को तोडऩे के लिए नहीं, भातृत्व को बढ़ाने के लिए हैं। मैं फिर दोहरा रहा हूं, भातृत्व का आधार वो सम्बंध हैं, जिनके बारे में वेदों ने कहा - पितृ देवोभव, मातृ देवोभव। माता-पिता को वेदों ने ईश्वर तुल्य बता दिया। जो सम्बंध ईश्वर तुल्य है, वही आधार है भातृत्व का। इससे बड़ा और कौन सम्बंध होगा?
मैं इसको बहुत ही गहराई से अनुभव करते हुए प्रस्तुत करना चाह रहा हूं कि भातृत्व को संसार में पुन: बल मिलना चाहिए। उसको महत्व मिलना चाहिए। यदि कोई गलती भी हो गई हो भ्राता से, उसे क्षमा करके सम्बंध आगे चलाना चाहिए। गलती किससे नहीं होती? कौन दुनिया में सम्बंधी है, जो गलती नहीं करता? कौन दुनिया में सम्बंध है, जो कभी हानि नहीं पहुंचाता? कौन सम्बंध ऐसा है, जिससे कभी न कभी हमारा मन आहत नहीं होता? पुत्र से कई बार लोगों को कष्ट हो जाता है, पुत्र ही बड़ी हानि पहुंचा देता है, किन्तु पुत्र को कितने लोगों ने घर से बाहर कर दिया, पत्नी को कितने लोगों ने घर से बाहर कर दिया? जो लोग बाहर कर रहे हैं, अपनी वासना की लोलुपता के कारण कर रहे हैं, दूसरी औरत पर आकृष्ट हो गए, भोग और अर्थ से प्रभावित होने के कारण कर रहे हैं। इसी तरह कुछ गलतियों के आधार पर भाई के प्रति मन मैला नहीं करना चाहिए।
हम अपने जीवन में न जाने कितने लोगों से सम्बंध जोड़ते हैं व्यापार के लिए, जीविका के लिए, बड़ा बनने के लिए और तमाम तरह के जो उद्यम हैं जीवन के विकास के लिए, हम कितने सम्बंधों को निर्माण करते हैं, उन सम्बंधों की कोई औकात नहीं है भातृत्व के सामने। भातृत्व की रक्षा के लिए हमें बहुत सचेत होने, सहिष्णु होने, उदार होने की आवश्यकता है। यदि भातृत्व सशक्त हुआ, तो जीवन के सभी अंग पुष्ट हो जाएंगे और हमारा भरपूर विकास होगा। परिवार का होगा, अड़ोस-पड़ोस का होगा, राज्य का और देश और दुनिया का होगा।
क्रमश:

भाई-भाव बचाइए

भाग : 6
आज सम्बंध निर्वाह के लिए बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है। बहुत बड़ा मन होना चाहिए। अत्यंत उदार मन होना चाहिए, नहीं तो यदि भरत को कहते राम जी कि मैं तो राजा बनने वाला था, तुम्हारे कारण ही मुझे जंगल आना पड़ा, तो मेरा पूर्ण विश्वास है कि भरत जी जीते नहीं, वहीं तड़प-तड़प करके राम जी के सामने ही शरीर को स्वाहा कर देते, जीवन को राख बना देते। राम जी को पूर्ण विश्वास के साथ लगता है कि मेरा भरत गलत नहीं है, यदि वैसा है, तो भी मेरा भाई ही है।
एक ऐसा उदाहरण मैं देना चाहता हूं, जिससे आपको लगेगा, वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि राम जी जब लंका विजय से लौटे, तो प्रयाग-इलाहाबाद से हनुमान जी को भेजा कि जाओ, भरत जी को सूचित करो कि मैं आ रहा हूं। लंका से मैं प्रयाग आ गया हूं, अब अयोध्या आना है मुझे।
बड़ी मनोवैज्ञानिक और स्वाभाविक बात का उल्लेख किया है महर्षि वाल्मीकि ने, राम जी ने क्या खूब कहा हनुमान जी को, पता करो पहले जाकर कि भरत १४ वर्षों से राज भार संभाल रहे हैं, कहीं उनके मन में राज्य-आसक्ति तो नहीं उत्पन्न हो गई कि मैं ही राजा रहता, तो बहुत अच्छा होता। किसी को राज्य देने की क्या जरूरत है, दूसरे रामायण में यह नहीं लिखा है, लेकिन वाल्मीकि बहुत स्वाभाविक बात कहते हैं, गद्दी मिल जाने के बाद क्या उसे छोडऩे की इच्छा होती है? प्रभुता पाकर किसमें मद नहीं आता। किस में यह भाव नहीं आता कि मैं ही भोग करूं, यह भाव हर आदमी में आ जाता है। तो राम जी ने कहा कि पता कर लेना, यदि भरत का मन हो गया हो, तो अपना भाई ही तो है, मैं राजा रहूं या भरत रहें, इसमें क्या समस्या है। अपने १४ साल जंगल में रहे, अपने जीवन भर जंगल में रहेंगे, किन्तु राजा तो भरत रहें, हमें कोई समस्या नहीं है। हम धीरे से यहीं से लौट जाएंगे, मुझे भरत से लडऩा नहीं है। कोई अपनों से लड़ता है क्या, लड़ाई तो दूसरों से होती है अपने अधिकार के लिए। जो मैं हूं, वही भरत हैं।
तो जाकर हनुमान जी ने पता किया, भरत जी की भावनाओं को देखा। भरत जी तो एक-एक क्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जैसे बस जीवन इसी के लिए टिका हुआ हूं, निर्धारित समय पर यदि राम नहीं आते हैं, तो भरत का जीवन अत्यंत कठिन है। भरत का जो समर्पण है, जो राम जी के लिए अगाध श्रद्धा का भाव है, विश्वास का भाव है। वह अतुलनीय है।
हनुमान जी भरत जी से मिलकर लौट गए और राम जी से कहा, चलिए, आप जल्दी चलिए अयोध्या। अब देर मत कीजिए।
एक और प्रकरण सुनाना चाहूंगा। जब भगवान ने बाली को मारा, तो बाली ने पूछा कि आपने हमें क्यों मारा, आप कौन होते हैं मारने वाले, राम जी ने उत्तर दिया कि तुम अपने भाई की पत्नी को ही रख लिए हो, ऐसा रघुवंश के विधान में या राज्य में नहीं होता। राम जी को कोई संकोच नहीं लगा, इसलिए वे कहते हैं कि हमारे भाई भरत राजा हैं अभी, रघुवंश शिरोमणि है हमारे भरत, मैं उन्हीं के अनुसार जंगल में रघुवंशियों के नियम-कानून, रक्षा, उसका परिपालन और जो उसका विरोध करता है, उसको दंड देने के लिए अधिकृत हूं।
अर्थात बड़ा भाई, राम जैसा महान व्यक्ति, अपने छोटे भाई का अनुचर बनकर उसकी आज्ञा का पालक बनकर जीवन बिता रहा है, क्या बात है! ऐसे ही भातृत्व बनता है। 
आजकल तो आदमी भाई की बड़ाई सुन ले, तो खून खौलने लगता है, ईष्र्या की भावना पनपने लगती है, राम जी ने कहा, मैं भरत की आज्ञा के अनुसार रघुवंश के नियमों का परिपालक हूं, राजा मेरा भाई भरत है और मैं भरत की ओर से नियुक्त हूं जंगल में। यह पिता जी ने कहा था, किन्तु अब भरत राजा हैं। जो रघुवंशियों के संविधान की अवमानना करेगा, जो उसको नहीं मानेगा, जो परिपालन नहीं करेगा, उसको जो दंड रधुवंश के संविधान में है, वह मैं दूंगा। हमारे यहां कोई नियम नहीं है कि भाई जीवित हो और उसकी पत्नी को बड़ा भाई अपनी पत्नी बना ले, इसलिए मैंने आपको मारा, कहीं से कोई गलत काम नहीं किया। यह गहराई से चिंतन की बात है, भरत का आज्ञापालक राम जी स्वयं को मान रहे हैं। जैसे राजा का आज्ञाकारी सेवक होता है, उस तरह से स्वयं को मान रहे हैं।
यहां तक लिखा है कि अयोध्या जी में चरण पादुका को रखकर भरत जी राज्य का संचालन करते हैं। नंदीग्राम में व्रत, नियम, संयम के साथ रहते हैं, कोई आज्ञा लेनी हो, तो चरण पादुका जी से लेते हैं, उसका पूजन भी करते हैं और वैसा जीवन व्यतीत करते हैं, जैसा राम जी वन में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, तपस्वी जीवन, वनवासी जीवन, उदासीन जीवन।
क्रमश:

Saturday, 21 September 2013

भाई-भाव बचाइए - भाग : 5

राम जी ने अपने काल में न जाने कितने लोगों को सखा बनाया, मैं बार-बार यह कहा करता हूं। सुग्रीव उनको अपना स्वामी मानते हैं, विभीषण उनको स्वामी मानते हैं, लेकिन भगवान ने हनुमान जी को भी सखा कहा। हनुमान जी तो दास भक्ति में सबसे बड़े माने जाते हैं, किन्तु जब अयोध्या में लौटे, तो भगवान ने गुरु वशिष्ठ जी से कहा :-ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे।
मैं कहता हूं कि राम राज्य का जो संस्थापक सम्बंध है, वह सखा भाव है। सबको भगवान सखा कहते हैं और उसी तरह से व्यवहार करते हैं। सुग्रीव के साथ भी सखा भाव, जबकि सुग्रीव स्वयं को सेवक ही मानते हैं, जामवंत, नल, नील सब सखा। सखा सम्बंध को राम जी ने खूब फैलाया। राम जी निरंतर कहते हैं, ये सभी लोग हमारे सखा हैं। यदि इन सम्बंधों को इससे भी आगे महत्व देना हो और विकसित करना हो, और श्रेष्ठता के साथ प्रकट करना हो, तो राम जी कहते हैं :-
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।
ये सब सखा मेरे भरत भाई के समान हैं, लक्ष्मण भाई के समान हैं। सखा सम्बंध की संस्थापना के लिए रामजी ने खूब प्रयास किए। उनका सबसे प्रिय और हार्दिक आकर्षण का केन्द्र सम्बंध सखा भाव ही है। तभी वो अपने सभी सेवकों को भी सखा कह रहे हैं, लंका से अयोध्या में जाने पर, किन्तु उसे भी तुलना देनी हो, उपमान खड़ा करना हो, तो यही कहते हैं, ये हमें भरत के समान प्रिय हैं।
भरत जी के लिए एक जगह लिखा है, जब अयोध्या से गए राम जी को मनाने के लिए। देखिए, इसके लिए होने वाली वार्ता में कितना दम है। सभी लोगों ने भरत जी को मनाया कि आप राजा बन जाइए, राम जी भी नहीं हैं, पिताजी भी नहीं हैं, अयोध्या की बड़ी दुर्दशा है, सभी लोग विकल हैं राम विरह में। लगता नहीं है कि लोग रह पाएंगे, सारी अयोध्या, सारी प्रजा ही नष्ट हो जाएगी, तो भरत जी ने कहा, मैं नहीं रुक सकता, मेरे पूरे शरीर में जलन हो रही है, हृदय में जलन हो रही है, जबतक भाई को नहीं मिलूंगा, उनका दर्शन नहीं करूंगा, उनके भावों को नहीं पढ़ूंगा, तब तक मैं जीवन नहीं जी सकता, मैं जलकर राख हो जाऊंगा। आप भले ही कह रहे हैं, राजा बनिए, किन्तु मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि जिस आदमी के कारण राम जी जंगल चले गए, उस आदमी को राजा बनाकर आपको क्या मिलेगा, मैं लांछित हूं, चिंतित हूं, कहीं से मेरा जीवन सम्मानजनक नहीं है, श्रेष्ठ नहीं है, कहीं से भी मेरा जीवन प्रशस्त नहीं है।
लिखा है तुलसीदास जी ने : भरत जी बोल रहे हैं :-
कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।
तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज।।
किन्तु भरत जी के साथ राम जी ने ऐसा व्यवहार किया कि उनके मन में जो संदेह की ज्वाला थी, जो उनके मन में विभ्रम की भावना थी, मन में जो कुत्सित विचार आ रहे थे कि भाई राम मेरे बारे में ऐसा सोचते होंगे, वैसा सोचते होंगे। राम जी ने भरत जी को इतना संतुष्ट किया कि जहां भरत जी राजा बनने के नाम पर चिढ़ रहे थे, भाग खड़े हो रहे थे, झुंझला रहे थे, वहां उन्होंने चरण पादुका जी देकर उन्हें राजा बनने के लिए तैयार कर लिया। लिखा है रामायण में, जब भरत जी वन में राम जी के पास गए, तो राम जी को दूर से ही यह कहकर कि त्राहिमाम-त्राहिमाम-त्राहिमाम, मेरी रक्षा करें, मेरी रक्षा करें,... दूर से ही प्रणाम करते हुए निकट आए और राम जी के चरणों में गिर गए, तब राम जी ने भरत को बरबस उठाया और गले से लगा लिया। जो मिलन हुआ, तुलसीदास जी ने लिखा है कि उस मिलन को देखकर जितने भी संस्कारी जीव थे, उनको तो समाधि लग ही गई, वे संसार को भूल ही गए, समाधिस्थ हो गए, किन्तु जो अपान थे, वे भी समाधिस्थ हो गए। उनका गलत चित्त भी समाधि में बाधक नहीं बना।
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।
अपवित्र जीवन वाले भी समाधिस्थ हो गए। अरे ऐसा मिलन! जिस व्यक्ति के कारण राम जी को जंगल आना पड़ा, उस व्यक्ति से ऐसे मिल रहे हैं! जैसे सागर के समान सागर ही है, हिमालय के समान हिमालय ही है, ठीक उसी तरह से भरत और राम मिलन के समान केवल राम और भरत का मिलन ही है, दूसरा हो ही नहीं सकता।

क्रमश:

भाई-भाव बचाइए - भाग : 4

विवाह तो बाद में होता है। २५-३० वर्ष का होने के बाद होता है। विवाह का असली स्वरूप तो धर्म का संस्थापन है। अपने यहां माना गया है कि धर्म की संस्थापना में पत्नी की अहम भूमिका है। लक्ष्मी के रूप में कन्या को लाया जाता है। ब्राह्मण लोग संकल्प करवाते हैं, लक्ष्मीस्वरूपा कन्या को हम विष्णुस्वरूप वर को दे रहे हैं। लक्ष्मी छली नहीं हैं, वह सबका पोषण करती हैं, क्षमता के अनुसार पोषण करती हैं, भेदभाव नहीं करतीं। किन्तु आज जो पत्नी की भावना है, वह भोग प्रधान भावना है। पत्नी आएगी वासना की संतुष्टि का माध्यम बनेगी, उससे हमें संतति की प्राप्ति होगी, वह संतति बुढ़ापे में हमारी सहयोगी होगी। पत्नी और पुत्र-पुत्री से सम्बंध के मूल में धर्म का भाव समाप्त होकर भोग और धन का भाव आ गया है। लडक़ा होगा, तो राज्य संभालेगा, कमाएगा, तो परिवार समृद्ध होगा, बुढ़ापे का सहारा बनेगा। लोग सोचते हैं - पत्नी के बिना हमारा समय कैसे बीतेगा, भोग की जो भावना है, उसकी संतुष्टि कैसे होगी। पहले जो सर्वश्रेष्ठ भाव थे कि पत्नी लोक और परलोक, दोनों को सुधारने के लिए कारण बनेगी, धर्म ही लोक को ठीक करता है और परलोक को भी ठीक करता है, किन्तु यह भाव ओझल हो रहा है और भोग का भाव बढ़ रहा है। इन सम्बंधियों की अपेक्षा भातृत्व घटता जा रहा है। शादी हो जाती है, तो आदमी का माता-पिता से प्रेम, भाई, बहन से प्रेम, अन्य स्वाभाविक सम्बंधियों से प्रेम दबने लग जाता है। आज सम्बंध तो भोग और काम पर आधारित हो गया, अत: आवश्यक है कि इन सम्बंधों को महत्व धर्म के रूप में दिया जाए, उसी रूप में संवारा जाए, पुत्र को भी कहा जाए कि तुम मेरे धर्म पुत्र हो, आए हो, तो पितरों के लिए पिंडदान करोगे, बगीचा लगाया है, उसे बचाओगे, भातृत्व को भी समर्पित होगे, जैसे मेरे लिए भाव रखते हो, उसी तरह से मेरे भाई के लिए भी रखोगे, अपने भाई के लिए भी रखोगे, भले हम शरीर से अलग-अलग लगते हैं, किन्तु हम एक हैं।
भातृत्व पर आज जो खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, बहुत गलत हो रहा है। इच्छा तो यही होती है कि अर्थ और काम के झंझावात में भातृत्व सम्बंध कभी नहीं उड़ें, किन्तु वास्तविक स्थिति यह है कि भातृत्व को धक्का पहुंचाने वाले जो सम्बंध हैं, उनमें पत्नी से सम्बंध की ज्यादा बड़ी भूमिका है। शादी हुई नहीं कि भातृत्व कमजोर पडऩे लगता है, पुत्र हुआ नहीं कि लगने लगता है कि ये हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण और उपयोगी सम्बंधी हैं, भातृत्व उतना उपयोगी नहीं है। जबकि भातृत्व तो प्राकृतिक रूप से मिला था, उसे कुंडली दिखलाकर बाजा-गाजा करके नहीं स्थापित किया गया। जीवन में २५ साल बाद जो सम्बंध उत्पन्न हुआ है, वह पुराने सम्बंधों की रक्षा के लिए है, उन्हें बढ़ाने और सुन्दर बनाने और सशक्त बनाने के लिए है, किन्तु होता यह है कि बाद में होने वाला सम्बंध पुराने सम्बंध के लिए घातक बन जाता है। लडक़े-लड़कियां और पत्नी घातक बन गए।
जो भी सम्बंध दुनिया में हैं, उसमें ध्यान में रखा जाए कि माता-पिता के साथ जो सम्बंध है, भातृत्व का जो सम्बंध है, बहनों के साथ जो सम्बंध है, उसकी रक्षा में ही बाकी सम्बंधों का उपयोग है। यदि पत्नी इसमें साथ नहीं दे, तो पत्नी से सम्बंध घाटे का हुआ न। एक सम्बंध बचाने में कई सम्बंध बलि चढ़ गए।

क्रमश:

भाई भाव बचाइए - भाग : ३

वनवास के लिए जाते हुए जब इलाहाबाद में राम पहुंचे, जानकी जी और लक्ष्मण के साथ, तो रात्रि विश्राम कर कर रहे हैं, तो वहां कान लगाकर महर्षि भरद्वाज ने सुना कि क्या बात करते हैं, उन्हें पता था कि राम राजा बनते-बनते जंगल को जा रहे हैं, तो उन्हें शंका थी कि राम के मन में भरत के लिए रोष होगा, शिकायत होगी, कैकेयी के लिए गलत भावना होगी, किन्तु ऐसा कुछ नहीं था।
राम जी को मनाने के क्रम में वन के लिए निकले भरत जी महर्षि भरद्वाज जी के पास आए, तब भरत जी को बहुत पीडि़त और चिंतित देखकर, महर्षि भरद्वाज ने भरत जी को समझाने के लिए कई तरह के प्रयास किए, भरत की शंकाओं के निवारण के प्रयास किए। कई तरह के प्रश्न किए महर्षि भरद्वाज ने, कई तरह की बात की। राम जी के बारे में भरत जी के मन में बन रही भावना को दूर किया। महर्षि भरद्वाज ने समझाया, 'मैं ऋषि हूं, हम उदासीन जीवन जीते हैं, हम गलत ढंग से किसी के पक्षधर नहीं होते, हम सबको अपना मानते हैं, हम सबकी भलाई का प्रयास करते हैं। मैं आपको एक ऐसी बात बतलाने जा रहा हूं, जिसे सुनकर आपको महान आश्चर्य होगा।
भरत जी ने कहा, 'बतलाइए।
भरद्वाज जी ने उत्तर दिया, 'जो कार्य व्यक्ति को नहीं करना चाहिए, वह मैंने किया। पति-पत्नी सो रहे हैं और कोई ऋषि जीवन का व्यक्ति कान लगाकर रात्रि में उनकी बात सुने, तो इससे गिरा हुआ कर्म क्या होगा, किन्तु राज्य-राष्ट्र के चरित्र को ध्यान में रखकर मैंने यह कार्य किया। जैसे ऋषि केवल दाढ़ी नहीं बढ़ाता, केवल माला ही नहीं पहनता, वह राष्ट्रहित के लिए जागता भी है, इसलिए मैंने सोचा कि राष्ट्र प्रधान है, व्यक्ति नहीं, इसलिए मैंने कान लगाकर सुना कि राम जी जानकी जी और लक्ष्मण जी के साथ बात क्या करते हैं? लिखा है तुलसीदास जी ने कि सम्पूर्ण रात्रि में भरत ही चर्चा का विषय रहे, चर्चा में एक बार भी भरत के लिए भत्र्सना का भाव नहीं आया, एक बार भी भरत की निंदा नहीं हुई, एक बार भी कोई गलत बात नहीं हुई, भरत की प्रशंसा में ही सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत हो गई।
इसका अभिप्राय है कि भरत के लिए राज्य विच्छेद काल में और उसके बाद और सम्पूर्ण १४ वर्षों के वनवास काल में और वहां से लौट के आने के बाद भी हजारों वर्षों तक राम जी ने राज्य किया। इतने वर्षों में न जाने कितनी वार्ताएं हुई हैं, कितने लोगों से वनवास की चर्चा हुई होगी, किन्तु राम जी ने कभी नहीं कहा कि भरत गलत हैं। सारा कुछ जो हो रहा था, भरत के लिए ही हो रहा था, लेकिन उन्होंने कभी नहीं कहा। राम मानते हैं कि पुत्र का पहला कत्र्तव्य है कि पिता की भावना के लिए अपने को समर्पित करे, इसमें कहीं से कोई विकृति नहीं है, मैं राजा बनता हूं या भरत बनते हैं, क्या अंतर है?
इस सम्बंध में मैं भाव प्रकट करना चाह रहा हूं, जैसे हम अपने लिए कोई बुराई नहीं सोचते, हम अपने लिए कभी षड्यंत्र नहीं करते, हम स्वयं को कभी धोखा नहीं देते, हम स्वयं के लिए खलनायक नहीं होते, वैसे ही भाई को अभेद की भावना से सम्भालना चाहिए। भ्राता जो मेरा है, मेरे समान है, मुझमें और उसमें अभिन्नता है, मैं और वो, दोनों एक हैं। जैसे हम अपने लिए सदा असली भाव रखते हैं, कभी नकली नहीं रखते, खाने में, पढऩे में, लिखने में, जितने भी व्यवहार दुनिया में हैं, हम अपने लिए बहुत सम्भल कर व्यवहार करते हैं, मंशा के साथ व्यवहार करते हैं, वैसे ही भाई के लिए भी व्यवहार होना चाहिए। यदि इसी भावना से भाई के साथ व्यवहार करें, अभेद की भावना से, तो भगवान की दया से भातृत्व कभी भी लांछित नहीं होगा। कभी भी वह खलनायक नहीं होगा। निकृष्ट पृष्ठभूमि का नहीं होगा। 

क्रमश:

Saturday, 14 September 2013

भाई-भाव बचाइए, भाग - 2

भातृत्व तो पुराना सम्बंध हो गया। माता-पिता को यदि छोड़ दिया जाए, तो दुनिया में जितने भी हमारे सम्बंधी बनते हैं, वे भातृत्व के बाद ही होते हैं, चाहे पत्नी के साथ सम्बंध हो, बच्चों के साथ सम्बंध हो या सखा या मित्र के साथ सम्बंध हो। ये सम्बंध तो सयाने होने पर बनते हैं, किन्तु भाई से सम्बंध तो जन्म के बाद ही बन जाता है। अत: यह सम्बंध बहुत सशक्त है। यह इतना प्रशस्त सम्बंध रहा है कि दुनिया में सभी लोग मिल सकते हैं, किन्तु भाई नहीं मिल सकता। बड़े और उपयोगी सम्बंध के रूप में इसकी मान्यता रही है। अभी जो बाधित हो रहा है, तमाम कुसंस्कारों से ग्रसित हो रहा है। तमाम तरह के जो समाज, व्यक्ति, परिवार को लांछित करने वाली परिस्थितियां हैं, वो भातृत्व को लांछित कर रही हैं, तो इसका मुख्य कारण है कि हमारा जीवन भोग और काम प्रधान हो गया है। अर्थ और काम के लिए ही हम सम्बंधों का निर्वाह करने लगे हैं। धन और काम की प्रधानता होने के कारण भातृत्व बाधित हो रहा है। लांछित होता जा रहा है। सम्बंध निर्वाहकों में, सम्बंध संस्थापकों में दुनिया के सबसे श्रेष्ठ प्राणी मनुष्य के रूप में राम जी अपने सम्पूर्ण जीवन में उन सभी सम्बंधों को जो सकारात्मक हैं, जो समाज की मांग हैं, जो समाज को बढ़ाने वाले हैं, उन सभी को राम जी ने चरम पर पहुंचाया। भावों की ऊंचाई तक सम्बंधों को ले गए। सम्बंधों के मामले में राम जी का चरित्र अनुकरणीय हो गया। राम जी ने जैसे अपने भातृत्व का निर्वाह किया, वह तो अद्भुत है। भातृत्व को कभी लांछित नहीं होने दिया, तो इसका सबसे पहला कारण है कि भगवान राम ने धन और काम को महत्व नहीं दिया। यदि धन और अपनी इच्छा को महत्व देते, तो लड़ाई करनी चाहिए थी, भरत के लिए राजगद्दी छोडक़र जंगल जाने की आवश्यकता नहीं थी। हम लोग कहा करते हैं, अयोध्या उसे कहते हैं, जहां अर्थ और काम के लिए लड़ाई नहीं होती है। अयोध्या का मतलब - जहां युद्ध नहीं होते, धन के लिए या भोग के लिए। संसार में लड़ाई का मूल क्या है? कहा जाता है कि धर्म के लिए भी लड़ाई होती है, किन्तु मेरा मानना है और दूसरे चिंतकों का भी मानना है कि लड़ाइयों का मूल धन और भोग है। यहां तक कि जंगली जानवर भी खाने के लिए और भोग के लिए ही लड़ते हैं, हाथी भी लड़ते हैं, बाघ और कुत्ते बिल्ली भी।
राम का भातृत्व अत्यंत उदात्त है, कैसा अतुलनीय उन्होंने अपना जीवन बनाया, कैसे अनुपम ढंग से उन्होंने उसका पालन किया, इसका मुख्य कारण है कि उन्होंने कभी धन और भोग को महत्व नहीं दिया। धन को महत्व देते, तो उन्हें कहना चाहिए था कि यह हमारे पिताजी की आज्ञा नहीं है, उनके अनुकूल भावना नहीं है, दशरथ जी तो राम जी के जंगल जाने की बात पर डांवाडोल हो गए हैं, वे अपने धर्म से अलग होना चाहते हैं। सभी रामायणों में यह बात लिखित है। दशरथ जी ने कई बार दोहराया कि मैं भले नरक चला जाऊं, मेरी जो भी दुर्गति हो, किन्तु मेरा राम मेरी आंखों से ओझल न हो। किन्तु राम जी अपने पिता दशरथ जी से कहते हैं कि जब आपने माता कैकेयी को दो वरदान मांगने के लिए संकल्प किया था कि आप कभी भी मांग लेना, तो अभी यदि वे मांगती हैं, तो उनका मांगना उचित है, जब आप उनको देंगे, तो हमें पिता-पुत्र की भावना का निर्वाह करते हुए, पिता के लिए सम्पूर्ण समर्पित होते हुए वरदान के परिपालन के लिए मुझे जंगल जाना ही चाहिए और भरत को राजा होना चाहिए, इसमें अधर्म कहां से आ गया। इसमें मैं नहीं जाऊं, यह बात कहां से आ गई, यदि आप वरदान नहीं देते हैं, तो आपका धर्म जाता है और मैं नहीं जाता हूं जंगल, तो मेरा पुत्रत्व लांछित होता है।
शास्त्र में लिखा है कि अपने पिता को 'पुम्Ó नामक नरक में नहीं जाने दे, वही पुत्र होता है। यदि धन को महत्व देते श्री राम, भोग को महत्व देते, तो जंगल कभी नहीं जाते। अयोध्या में तो धन, ऐश्वर्य सबकुछ प्राप्त था, जंगल में ये सब प्राप्त नहीं था। ऐसी समृद्धशाली-खुशहाल अयोध्या को छोडक़र, जिसे लेकर कुबेर भी लज्जित होते हैं, इन्द्र भी सिहरन को प्राप्त करते हैं, उस राज्य को छोडक़र जंगल जाने की बात नहीं होती। संसार में जबसे धन और भोग को लोग ज्यादा महत्व देने लगे हैं, तबसे भातृत्व लांछित होने लगा है। राम जी ने धन और भोग को महत्व नहीं दिया, वे जंगल में चले गए, उन्होंने कभी मन में भी नहीं आने दिया कि यह षड्यंत्र है और इस षड्यंत्र में भरत की भागीदारी है। अपनी सम्पूर्ण चर्चा में चाहे सामने हुई हो या पीछे हुई हो, कभी उन्होंने यह नहीं कहा कि कैकेयी दोषी हैं, मैं बड़ा लडक़ा हूं, मुझे राजा होना चाहिए। भरत को कोई अधिकार नहीं है। किन्तु राम जी ने ऐसा कुछ नहीं कहा।
आज भातृत्व का स्वरूप गंदा होता जा रहा है, इसका अर्थ है कि हमारे जो दूसरे सम्बंधी हैं, वो सभी लोग धर्म और मोक्ष को या राष्ट्र को, विकास को या परिवार विकास को, अपने व्यक्तित्व के दूसरे सकारात्मक विकास को महत्व नहीं देकर सम्बंध को महत्व नहीं देकर, केवल भोग और अर्थ को महत्व देने लगे हैं। इसलिए ये सम्बंध लंाछित हो रहा है।

क्रम:

भाई-भाव बचाइए

चित्र श्री हिमांशु व्यास जी ने लिए हैं
मनुष्य इस संसार का एक भाग है और वह सदा अपने को विकसित करना चाहता है। अपने को बड़े दायरे में पहुंचाना चाहता है। इसके लिए अनेक तरह के कारणों को खोजता है, अनेक तरह के सम्बंधों को बनाता है और मित्र बनाता है, सहयोगी बनाता है, कुछ लोगों को पिता का दर्जा देता है, कुछ लोगों को बराबरी का दर्जा देता है। कुछ लोगों को सखा बनाता है। उसे आगे बढऩे के लिए बहुत सारे सम्बंधों की आवश्यकता पड़ती है, बहुत सारे संसाधनों की जरूरत पड़ती है। सम्बंध को विकसित किए बिना कोई बड़ा नहीं हो सकता। सम्बंध जरूर विकसित होने चाहिए। किन्तु सम्बंध जितने भी हों, कम हैं, बाकी सम्बंधों से भातृत्व की बराबरी का कोई प्रश्न नहीं है। अन्य सम्बंध तो बनाए जा सकते हैं, जन्म लेने के बाद, आवश्यकता के अनुसार, अपनी समझ के अनुसार, मनुष्य सम्बंधों का निर्माण करता है, सम्बंधों को चित्त में रखता है, किन्तु भातृत्व तो स्वयं बनता है, बनाया नहीं जाता। एक माता-पिता से जब हम जन्म को प्राप्त करते हैं, एक ही मां के गर्भ में रहकर जब हम अस्तित्व में आते हैं। कोई हमारे पहले आता है, तो बड़ा भाई हो जाता है, हम बाद में आते हैं, छोटे भाई हो जाते हैं, हमारे बाद जो आता है, वह हमारा छोटा भाई हो जाता है। यह सम्बंध अकृत्रिम है। बाकी सम्बंधों को कृत्रिम कहा जा सकता है, जो बाद में बनते हैं। इस सम्बंध का मूल समान माता-पिता से पैदा होना है, माता-पिता की समानता है। जिनके माता-पिता एक हैं, उन बच्चों में भातृत्व होता है। इस सम्बंध को इतना महत्व इसलिए पूरे संसार में मिला, क्योंकि यह कृत्रिम नहीं है। कहा जाता है और सभी लोग स्वीकार करते होंगे, भारत भर में यह बात तो बहुत जोर-शोर से कही जाती है कि पुत्र भले ही कुपुत्र हो सकता है, दूसरे सम्बंध भी बिगड़ सकते हैं। बाकी सम्बंध सहयोगी दृष्टि खो सकते हैं, किन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती। दूसरे सम्बंध, स्वजन, परिजन तमाम तरह की वाहियात बातों से जुड़ जाते हैं, दुर्गुणों और दोषों से ग्रस्त हो जाते हैं, किन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती, उसका स्तर नहीं गिरता। वह हमेशा ही अपने बच्चों के लिए बहुत उदार और बहुत समर्पित और एक मालिक जैसी महान, समुद्र के जैसी गहरे आत्मीय भाव से युक्त होती है। यही आधार है भातृत्व सम्बंध का। भाई किसी को इसलिए मानते हैं, क्योंकि जिस मां से मैंने जीवन प्राप्त किया, जिस मां के गर्भ में रहकर मैंने बाल रूप को प्राप्त किया, जिस मां के साथ रहकर मैंने अपनी अबोध अवस्था को बड़े रूप में परिवर्तित किया, उसी तरह से किसी और ने कभी किया, जिससे हमारा भातृत्व सम्बंध बना। भातृत्व का भी कारण मातृत्व ही है। मां आधार है, जो कभी भी कुमाता नहीं हो सकती। जब कारण मजबूत है, तो कार्य मजबूत होगा ही। यह नियम है कि कारण में जो गुण होते हैं, वही कार्य में आते हैं। यह दर्शन शास्त्र की पुरानी युक्ति है। तो माता में जैसे श्रेष्ठ भाव हैं, समर्पित भाव हैं, कभी भी उसमें संकुचित भाव अपने संतति के लिए नहीं आता, वह भाव स्वाभाविक रूप से भाइयों में प्रेषित होता है। भाव हैं, वासनाएं हैं, उसके लिए संस्कार हैं, जो तौर-तरीके हैं, मेरे भाई में भी आए हैं और निश्चित रूप से भाई में भी मां के जैसा ही विचार होगा, मां के जैसा ही समर्पित भाव होगा। भाई भी मां के जैसा ही दुर्गुणों से दूर होगा।
इसलिए भातृत्व को महत्व देने की पुरानी परंपरा है। यह सर्वश्रेष्ठ आधार है, अन्य सम्बंधों का आधार उतना मजबूत नहीं है, इतना बड़ा नहीं है, इतना व्यवस्थित और समर्पित नहीं है। भातृत्व का आधार संसार में सबसे सशक्त होता है। भगवान की दया से, माता के सारे संस्कार पुत्रों में आते हैं, संतति में आते हैं, तो आदमी सोचता है कि जैसी मेरी मां है, वैसे ही मेरे भाई हैं। मां जैसे जीवन भर सम्बंध का निर्वाह करती है निश्छल भाव से समर्पित होकर, वैसे ही मेरा भाई भी करेगा। मेरे लोक और परलोक दोनों का ही साधक होगा, विशेष सम्बंध वाला होगा।  
क्रम:

Wednesday, 11 September 2013

अच्छा कैसे सोचा जाये? - पुस्तिका के लोकार्पण कार्यक्रम की हरिद्वार में प्रकाशित ख़बरें अमर उजाला में प्रकाशित

अमर उजाला में प्रकाशित

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित

बद्री विशाल में प्रकाशित

हरिश्चन्द्र उवाच में प्रकाशित

दैनिक हाक में प्रकाशित

Tuesday, 10 September 2013

अच्छा कैसे सोचा जाये? - पुस्तिका का लोकार्पण

जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज के ९ प्रवचन इस पुस्तिका में प्रकाशित हैं. इसके अलावा जगद्गुरु का परिचय, श्रीमठ परिचय और पिछले वर्ष प्रयाग में २ सितम्बर को हुए दुःख क्यों होता है? पुस्तिका के लोकार्पण की रिपोर्ट भी इस पुस्तिका में सम्मिलित है. 92  पेज की इस पुस्तिका का लोकार्पण महाराज जी की उपस्थिति में वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय एवं जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य रामानुज देवनाथन जी के कर कमलों से ३ सितम्बर को हरिद्वार में संपन्न हुआ. इस अवसर पर राजस्थान के पूर्व मंत्री व विधायक नरपत सिंह राजवी एवं हरिद्वार के संस्कृत विश्विद्यालय के कुलपति आचार्य महावीर अग्रवाल सहित बड़ी संख्या में साधु, संत, विद्वान, पत्रकार एवं अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित थे. अत्यंत सफल लोकार्पण कार्यक्रम का सञ्चालन विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास जी ने किया. पुस्तिका के सयोजन संपादन सेवक जयपुर के ज्ञानेश उपाध्याय हैं. इस पुस्तिका के आवरण चित्र ख्यात फोटोग्राफर श्री हिमांशु व्यास जी ने लिए हैं. पुस्तिका प्रिंट ओ लैंड जयपुर द्वारा मुद्रित की गयी है.

Tuesday, 27 August 2013

जगद्गुरु महाराज जी कृपा से प्रस्तुत पुस्तिका - अच्छा कैसे सोचा जाए? - का लोकार्पण 3 सितंबर को हरिद्वार में होगा, यह मुख्य पृष्ठ है, इस अवसर पर आचार्य रामानुज देवनाथ, कुलपति, जगद्गुरु रामनंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विवि, विधायक श्री नरपत सिंह जी राजवी, जाने माने पत्रकार श्री रामबहादुर राय की उपस्थिति प्रस्तावित है। जय शियाराम -
दोनों चित्र जाने माने फोटो जर्नलिस्ट श्री हिमांशु व्यास ने महाराज के जयपुर प्रवास के समय लिए थे.      

Wednesday, 26 June 2013

हरिद्वार में चातुर्मास

महाराज जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रानरेशाचार्य जी महाराज इस बार पावन नगरी हरिद्वार में विराजेंगे. निर्माणाधीन राम मंदिर परिस वा उसके निकट ही चातुर्मास का आयोजन होगा. 22 जुलाई को इसका शुभारंभ होगा. इस का में अनेक प्रकार के धार्मिक, सामाजिक कार्यक्रम होंगे. जल्द ही आप सभी को विस्तृत कार्यक्रम की सूचना प्रदान की जायेगी. गत वर्ष तीर्थ राज प्रया में चातुर्मास आयोजित हुआ था, वर्ष 2011 में इंदौर में और वर्ष 2010 में सूरत और 2009 में जयपुर में. महाराज के चातुर्मास अतुलनीय होते हैं. धार्मिक चर्चा के साथ साथ आज के आधुनिक प्रासंगिक विषयों पर भी खूब चर्चा होती है और राम क्ति की रसधारा निरंतर प्रवाहित होती रह्ती है. महाराज के द्वार सबके लिए खुले रहते हैं, रामानंद संप्रदाय का एक तरह से यही ध्येय वाक्य है - जात पाँत पूछे नहीं कोई हरि को भजे सो हरि का होई.

Sunday, 21 April 2013

Sunday, 14 April 2013

जगदगुरु साक्षात्कार भाग - ३

प्रश्न : अक्सर धर्म, समूह में जा कर कर्मकाण्ड का रूप ले लेता है। वह अनुष्ठानों के चक्कर में सामूहिक आरतियों और नमाजों में बदल जाता है। अनुदान और जड़ हो जाता है। तो धर्म अन्तर्मन की साधना है या बाहर का शोर और झांकी?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : भगवान की आराधना की कई विधियां हैं - पूजन की, अर्चन की। कोई ध्यान करता है, वह पूजन है, कोई नाम लेता है, उसका वह भी पूजन है। उनकी परिक्रमा करता है और उनके गुणों का गान करता है, यह भी पूजन है। श्रवणं कीर्तन विश्व स्मरणं। ये सब स्वरूप हैं आराधना के। उसी में यह भी स्वरूप है कि हम भगवान को स्नान करा दें, माला पहना दें। सूक्ष्मता में जाने के लिए स्थूलता से जाना पड़ता है। जैसे आप यहां आए हैं, तो हमने आपको थोड़ा-सा प्रसाद दिलवाया है, लेकिन उसके पहले और बाद में ज्यादातर वाणी से, भावना से, मन से भी आपका सत्कार और आत्मीय भाव का प्रदर्शन कर रहा हूं। इसीलिए मूर्ति आराधना को नकारा नहीं जा सकता।
प्रश्न : मेरा आशय भारी तादाद में बैठायी जा रही मूर्तियों और उनके जल विसर्जन . . .
स्वामी राममनरेशाचार्य जी : भले आदमी! लोगों की संख्या पर तो नियंत्रण नहीं कर रहे हो, मूर्तियों की चिन्ता आपको सता रही है - एक सवाल अरब लोग हो गए हैं हम। सरकार ने अरबों, खरबों लगा दिया, लोग खा गए और परिवान नियोजन धरा रह गया। क्या और समस्याएं नहीं हैं? उन पर नियंत्रण नहीं, आराध्य देव की मूर्ति बनी तो जल की समस्या बढ़ गई क्या? आप देखिए कि जो मांइयां  एक बाल्टी में काम चला लेती थीं, वो पच्चीस बाल्टियों का उपयोग करती हैं। इतने कपड़े हैं लोगों के पास जैसे प्रदर्शनी का सामान हो। इन संसाधनों के साथ बेपरवाही का, अपव्यय का तथ्य तो है ही इसलिए ये जो पक्ष है स्थूल दृष्टि का है। मैं तो चाह रहा हूं कि हर आदमी के घर में मूर्ति हो। बिड़ला जी का एक बड़ा घराना है उनके घर में इतना सुन्दर मंदिर है, जितना हमारे मठ में नहीं है। और परिवार के प्रत्येक सदस्य के अपने ठाकुर जी हैं, जब हमारी पत्नी, हमारी बेटी, अल्मारी हमारी, अटैची हमारी तो ठाकुर जी भी हमारे अपने। विसर्जन की कौन-सी समस्या है? नहीं विसर्जन करेंगे, तो उनकी जो प्राण प्रतिष्ठा वाली रीति है, उसी रीति से बोल दिया कि गच्छ-गच्छ। जहां से आए हैं, वहीं जाइए और एक जगह रख दिया प्रतिमा को। आज जो अपव्यय की फूहड़ झांकी दिखाई पड़ रही है, क्या ये सुखद है? महंगे-महंगे कपड़े बण्डलों में आ रहे हैं, बड़े-बड़े क्लब बन रहे हैं, बढ़ रहे हैं। रात्रि में नाचने वाले नर्तक बढ़ रहे हैं, पीने और नाचने वालों की तादाद ज्यादा है या मूर्तियों की? इसी प्रसंग में मैंने एक बार दिल्ली के पुरुषोत्तम अग्रवाल जी से उनके यह कहने पर कि धार्मिक आयोजनों में बहुत पैसे खर्च किए जा रहे हैं और उनकी उपलब्धि नहीं है - कहा था कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में जितने पैसे खर्च होते हैं, उतने पूरे तीर्थ में नहीं होते। भले आदमी और उसका उत्पादन क्या है? कौन-सा वैज्ञानिक तैयार किया आपने? और उस कैम्पस में क्या हो रहा है? उसकी भी खबर हमको है।
प्रश्न : सादगी और मितव्ययिता का आदर्श तो गांधी जी ने भी रखा था?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : वो होनी चाहिए, किन्तु भगवान को भोग तो लगे। आपकी जो आर्थिक स्थिति है, जो सामाजिक और वैचारिक स्थिति है, उसके आधार पर आराधना होनी चाहिए। क्या राय है?
प्रश्न : आप प्रतिवर्ष संस्कृत के विद्वान को एक बड़ी मानद राशि एवं अन्य उपहार देकर सम्मानित करते हैं, इसके पीछे आपकी क्या मंशा है?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : इसके पीछे सद्विचार, सद्इच्छा, सद्चरित्र, रचनाधर्मिता, राष्ट्रीयबोध और मानवधर्मिता का सम्मान है। ये सम्मान उन्हीं लोगों को दिया जाता है, जिन्होंने अपने जीवन को तथ्यों के संग्रह में लगाया, श्रेष्ठ मूल्यों को, विचारों को अपने जीवन में उतारा, बड़े पैमाने पर लिखा-पढ़ा और जिनका आचार और धन दोनों पवित्र हैं। आचार, शुचिता और अर्थ राम आधार के दृढ़ स्तंभ हैं। यह इसलिए नहीं करता कि बहुत पैसा है मेरा पास या मेरा नाम छपे अखबारों में, न-न, यह कतई नहीं। यह श्रेष्ठ मूल्यों का सम्मान है, जिनसे समाज में सही वातावरण तैयार होगा और विद्वान सर्वत्र पूज्यन्ते की भी बात तो है ही। यह विडम्बना है कि जितने लोग सत्ता की जय-जयकार करते हैं, उतने लोग विद्वान की जय-जयकार नहीं करते। जबकि राजा से अधिक स्थायी जीवन विद्वान का होता है। अकबर का क्या जीवन है? बाबर का? शाहजहां का तो रोड ही है न? लेकिन तुलसीदास का? रामचरितमानस की जरूरत तो बाथरूम में भी है। तो विद्वान जितना समाज को देता है, वह अपना सम्पूर्ण दे देता है। जबकि वणिक वृत्ति आमदनी का कुछ प्रतिशत ही देती है और ये सम्मान आजकल के पुरस्कारों की भांति नहीं है, जो सम्बन्ध, भाईवाद, जाति और क्षेत्र को देखकर दिए जाते हैं। पहले ही तय हो जाता है- वो सब यहां नहीं है। पूरे देश में किसी आश्रम की ओर से मिलने वाला एक लाख रुपए का पहला पुरस्कार है यह। आज तक जिन लोगों को दिया गया है, उनका कोई जोड़ नहीं है।
क्रमश:

जगदगुरु साक्षात्कार भाग - २

प्रश्न : हमारे राष्ट्रीय समाज में राम जन्मभूमि का प्रश्न पहले से ही विद्यमान है, उसका अभी तक कोई हल नहीं निकला। क्या उसके समाधान की कोई दिशा आप देखते हैं? और यह एक नया मुद्दा?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : जब मैं नया-नया यहां पर रामानन्दाचार्य बनकर आया था, तो पत्रकारवार्ता में एक पत्रकार ने कहा था कि इस गड़े हुए भूत को उखाडऩे की क्या जरूरत है? आपके प्रश्न की ध्वनि भी वैसी ही है। बहुत दिनों से जो चल रहा है, यदि उसका समाधान नहीं हुआ है, तो उसको क्या वैसे ही छोड़ दिया जाए? देश में बहुत दिनों से गरीबी चल रही है, तो उसकी चिन्ता हमें नहीं करनी चाहिए क्या? छोड़ दें उस मुद्दे को? मैंने कभी कहा था, मान लीजिए कोई वामपंथी सरकार आ जाए और कल्पना कीजिए कि गांधी की समाधि को उखाड़ फेंके? जैसे रूस में लेनिन के साथ हुआ और फिर कांग्रेसी सरकार आवे और कहे कि हम महात्मा गांधी की समाधि को फिर बनाएंगे, तो क्या उनको यह उत्तर दिया जा सकता है कि यह गड़े हुए भूत को उखाडऩा है और जो हो गया, सो हो गया। तो यह गड़ा हुआ भूत नहीं है, यह हमारी आस्था का, गौरव का, उल्लास का, हमारे श्रेष्ठ धर्म पर जो चोट हुई है, उसका प्रश्न है। हम उसको पुन: प्रतिष्ठा देंगे, तो हमारी जो पीड़ाएं हैं, हीन भावनाएं हैं, उससे उबरेंगे। हमारे तमाम उत्कर्ष जो दबे हुए हैं, वह खुलेंगे। वहां मंदिर बनाना चाहिए। अब वो मामला न्यायपालिका में है, जो सर्वोच्च है। इस मामले को जानबूझकर लटकाया गया है। हमारे राष्ट्राध्यक्षों और राजनयिकों को यह आभास नहीं है कि यह देश के लिए कैन्सर होगा। मैंने एक बार राजीव गांधी जी से कहा था कि यदि इस मामले को आप लोग लम्बाएंगे, तो अनिष्ट होगा। आप जाएंगे, आपकी पार्टी भी जाएगी और आप ये हश्र देख रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी कैसे सडक़ पर आ गई थी और जब दस वर्ष बाद सत्ता में आई भी तो दूसरों के सहारे सरकार चलानी पड़ रही है। ये कैसा मामला है, जिसका निर्णय ही नहीं हो पा रहा। फैजाबाद की फाइलों में राम जी का मामला सड़ रहा है, जबकि तमाम फाइलें रोज निकलती हैं, निर्णय होते हैं, अरे! न्याय, न्याय है, वो किसी को भी मिलना चाहिए। अभी तमाम विधायक, मंत्री सब फांसी को जा रहे हैं। वो होगा। किसी से आपको क्या लग रहा है- सच बात बोलने में।
दूसरी बात, लोगों को समझाया जाए। मेरा माना है कि बुद्धितत्व पक्षपाती होती है। वाचस्पति एक दार्शनिक हुए उन्होंने लिखा है - तत्व पक्षपातो ही गोपाय स्वभाव:। किन्तु आज तक कोई संगोष्ठी हुई क्या? इसके लिए एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हो। दोनों पक्ष के चुनिन्दा लोग इक_े हों और बात हो कि आप क्या चाहते हैं? आपस में कटकर मरना चाहते हैं? व्यापार नहीं चाहते हैं? भाईचारा नष्ट हो जाए? मानवीय भावना, धार्मिक भावना नष्ट हो जाए? यह सब हो या सद्भावना का विकास हो। रामजन्मभूमि में बाबरी मस्जिद का क्या औचित्य है? उनका तीर्थ है क्या वहां? सरजू के लिए उनके मन में क्या महत्व है? अरे! बाबर ने गलती की, उसको मानो कि गलती हुई और कहो कि आप मन्दिर बनाइए, नहीं तो सारा देश गुजरात बन जाएगा और ऐसे गुजरात में न मैं जाऊंगा, न कोई मौलवी जाएगा, न कांग्रेसी जाएगा न भाजपाई जाएगा। निरीह लोग मारे जाएंगे जो संसार का सबसे गर्हित कर्म है। यदि यह बात राष्ट्रीय स्तर पर समझा दी जाए, तो लोग मानेंगे, यह वैचारिक तरीका है।
प्रश्न : अच्छा तो धर्म बाहर का उपादान है या भीतर का विश्वास? 
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : दोनों, दोनों है। उदाहरण लीजिए - हम सत्य में निष्ठावान हैं, सत्य की निष्ठा भीतरी चीज है, लेकिन जब हम सत्य में निष्ठावान होंगे, तो वाणी का प्रयोग करेंगे। उसके अनुसार आचरण करेंगे, तो वो बाहर आ गया। ये ऊर्जा है आप उसे दूसरे शब्दों में समझें कि आप भोजन करते हैं, तो ऊर्जा बनती है, वो दिखती नहीं है, लेकिन जब हम उसका उपयोग करते हैं, तो उसका उत्पादन  दिखता है। ऊर्जा जो भोजन से, वायु से तमाम चीजों से बनी है, लेकिन जब उससे कुछ किया तो दिखा, ये देखिए (तौलिए को एक जगह से दूसरी जगह उठाकर रखते हुए)। इस तरह धर्म ऊर्जा है। व्यवस्थित कर्मों के द्वारा शास्त्रों, पुराणों द्वारा निर्धारित जो अत्यंत परिष्कृत कर्म है, वह धर्म है। मैं लोगों को कहता हूं कि कर्म करने से कोई बच नहीं सकता, लेकिन कर्म करने की जो अत्यंत परिष्कृत विधा है, उसी को धर्म कहते हैं। कोई आदमी भूखा है, चिल्ला रहा है, दरिद्र है, परिस्थितियों से टूटा हुआ है, जब आप उसे दो रुपए देते हैं, तो उससे जो आपकी ऊर्जा बनती है, तुरंत जैसे ग्लूकोज पीने से बनती है। वो ऐसा भीतरी उत्पादान नहीं है, जिसे छुपा ही रहना है, अंत:करण में। वह बाहर प्रकट होता है और वही सही समाज का निर्माण करता है। धर्म जिसकी अपेक्षा सारे संसार को है। ऊर्जा तो जब किसी को मारते हैं, तब भी लगती है, सहलाते हैं तब भी। वह नकारात्मक है ये पुण्यात्मक।
क्रमश:

Sunday, 31 March 2013

स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का एक साक्षात्कार

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी का यह साक्षात्कार जो कला समय के संपादक श्री सत्येन्द्र शर्मा जी ने २९ अक्टूबर २००७ को श्रीमठ, पंचगंगा घाट, वाराणसी में लिया था। वह साक्षात्कार आज भी बहुत प्रासंगिक हैं - हम उस साक्षात्कार को साभार यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :-
प्रश्न : रामसेतु इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा है, जिसकी गूँज बाहर तक सुनाई दे रही है। आप क्या सोचते हैंï?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : रामसेतु की चर्चा अपने यहां इतिहास, पुराणों में पर्याप्त मात्रा में हुई है। उसके माध्यम से भगवान श्रीराम के द्वारा नियोजित, संरक्षित, प्रेरित सेना जाकर के लंका में आसुरी शक्ति के विनाश के लिए कारगर हुई, तो उसका वह स्वरूप अब नहीं है, लेकिन अवशिष्ट भाग तो उससे जुड़ा ही हुआ है। मेरा मानना है कि उसका मूल्यांकन प्राचीन और आधुनिक, दोनों दृष्टियों से होना चाहिए। पुरातात्विक दृष्टि से प्राचीन धरोहरों को संरक्षित रखा जाना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में वर्णित है कि कलयुग में स्थान की पूजा होती है - कलौ स्थानानि पूज्यन्ते। हो सकता है कालक्रम से गंगा भूमि में समा जाए और उसका यह प्रवाह न रहे, लेकिन उस क्षेत्र को प्रणाम कर शक्ति अर्जित करेंगे। पुराणों में कहा गया है कि धार्मिक, आध्यात्मिक शक्ति के केन्द्र यदि उस रूप में नहीं हैं, तो भी उस स्थान को महत्व मिलना चाहिए, क्योंकि उसके पूजन व दर्शन से शक्ति मिलती है। इसी तरह रामसेतु की महिमा का वर्णन करते हुए बतलाया गया है कि जो उस स्थान का दर्शन या पूजन करेगा, उसे दिव्यधाम की प्राप्ति होगी। हालांकि देश पुरातत्व के लिए जाने कहां-कहां क्या-क्या कर रहा है, परन्तु रामसेतु के महत्व को ओझल करके, व्यापारिक महत्व को प्रमुखता देना यह कहीं से भी अच्छा नहीं है। मैं समझता हूँ कि इस धन का गौरव भारत भूमि को ही नहीं, संसार की भूमि को करना चाहिए। आखिर जिस आतंकवाद की समस्या से पूरी दुनिया विह्वल हो रही है, उस आतंकवाद के निराकरण में रामसेतु की जितनी भूमिका है, उतनी इतिहास में कहीं नहीं। मेरा मानना है कि सरकार की अपनी जो लोकतांत्रिक दृष्टि है, उसमें रामसेतु को महत्व देते हुए व्यापार के लिए कोई दृूसरा रास्ता निकाला जाना चाहिए, क्योंकि हमारा कत्र्तव्य है कि उस स्थल को हम संरक्षित रखें। इतना ही नहीं, उसे प्रेरणा भी लें कि हमें भी इसी तरह की भूमिका का निर्वाह करना है - जैसा श्रीराम ने किया।
प्रश्न - रामसेतु को वैज्ञानिक या तकनीकी दृष्टि से अप्रामाणिक और भौगोलिक दृष्टि से बालू का उठान माना गया है, तो क्या आस्था के आगे तर्क या प्रमाण को तिलांजलि दे दें?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : यह आस्था भर की बात नहीं है, वरन प्रमाण भी है , जो आस्था कपोल कल्पित, अनुपयोगी और कसौटी में खरी नहीं उतरती, वह लुप्त होती जाती है। तमाम परम्पराएं लुप्त हो गईं, वार्ताएं और संस्कार लुप्त हो गए, लेकिन न वाल्मीकि रामायण लुप्त हुई और न उसकी बातें और न ही राम लुप्त हुए।
विज्ञान की कसौटी में जो नहीं आएगा, क्या वह सब हमारी आस्था और विश्वास को निगल जाएगा? विज्ञान की कसौटी में माता-पिता का महत्व कहां प्रमाणित है, मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, यह विज्ञान के थर्मामीटर में नहीं है और पूरी दुनिया में इसकी मान्यता है। इसलिए हमारी आस्थाओं को शक्ति देने वाली परंपराओं को, जिनसे समाज का निर्माण होता है, उसके आधार पर हम चलते हैं। वेद, इतिहास और पुराणादि से जो सन्देश हमें मिलते हैं, उनको हल्के से मत लीजिए, वह अन्ध श्रद्धा नहीं है। उसके पीछे जो जीवन दृष्टि, विकास हमसे जुड़ा हुआ है, उसे हम देखें। नकली चावल से भात नहीं बनता। भात बन रहा है, तो अपने असली होने का प्रमाण दे रहा है। विज्ञान ने ही तो उसको देखा कि वह स्थल भरा हुआ है, ऊंचा है, भिन्न है और इतिहास तो है ही - परम्परा है, आस्था भी है। गीता में भगवान ने कहा है, यो यत् श्रृद्धत सएव सा। आस्था ही मनुष्य का आखिरी स्वरूप होता है। आप कहां श्रद्धावान हैं - परिवार के लिए जाति के लिए या राष्ट्र के लिए। यदि हम राम के कृतित्व में आस्थावान हैं, राम की संस्कृति में आस्थावान हैं, तो हम अंध श्रद्धालु नहीं हैं। विज्ञान की जहां सीमाएं हैं, जहां उसकी समझ नहीं है, वहां आस्था ही उसका पोषण कर रही है और अनादि काल से कर रही है।  
क्रमश: