Wednesday, 26 June 2013

हरिद्वार में चातुर्मास

महाराज जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रानरेशाचार्य जी महाराज इस बार पावन नगरी हरिद्वार में विराजेंगे. निर्माणाधीन राम मंदिर परिस वा उसके निकट ही चातुर्मास का आयोजन होगा. 22 जुलाई को इसका शुभारंभ होगा. इस का में अनेक प्रकार के धार्मिक, सामाजिक कार्यक्रम होंगे. जल्द ही आप सभी को विस्तृत कार्यक्रम की सूचना प्रदान की जायेगी. गत वर्ष तीर्थ राज प्रया में चातुर्मास आयोजित हुआ था, वर्ष 2011 में इंदौर में और वर्ष 2010 में सूरत और 2009 में जयपुर में. महाराज के चातुर्मास अतुलनीय होते हैं. धार्मिक चर्चा के साथ साथ आज के आधुनिक प्रासंगिक विषयों पर भी खूब चर्चा होती है और राम क्ति की रसधारा निरंतर प्रवाहित होती रह्ती है. महाराज के द्वार सबके लिए खुले रहते हैं, रामानंद संप्रदाय का एक तरह से यही ध्येय वाक्य है - जात पाँत पूछे नहीं कोई हरि को भजे सो हरि का होई.

Sunday, 21 April 2013

Sunday, 14 April 2013

जगदगुरु साक्षात्कार भाग - ३

प्रश्न : अक्सर धर्म, समूह में जा कर कर्मकाण्ड का रूप ले लेता है। वह अनुष्ठानों के चक्कर में सामूहिक आरतियों और नमाजों में बदल जाता है। अनुदान और जड़ हो जाता है। तो धर्म अन्तर्मन की साधना है या बाहर का शोर और झांकी?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : भगवान की आराधना की कई विधियां हैं - पूजन की, अर्चन की। कोई ध्यान करता है, वह पूजन है, कोई नाम लेता है, उसका वह भी पूजन है। उनकी परिक्रमा करता है और उनके गुणों का गान करता है, यह भी पूजन है। श्रवणं कीर्तन विश्व स्मरणं। ये सब स्वरूप हैं आराधना के। उसी में यह भी स्वरूप है कि हम भगवान को स्नान करा दें, माला पहना दें। सूक्ष्मता में जाने के लिए स्थूलता से जाना पड़ता है। जैसे आप यहां आए हैं, तो हमने आपको थोड़ा-सा प्रसाद दिलवाया है, लेकिन उसके पहले और बाद में ज्यादातर वाणी से, भावना से, मन से भी आपका सत्कार और आत्मीय भाव का प्रदर्शन कर रहा हूं। इसीलिए मूर्ति आराधना को नकारा नहीं जा सकता।
प्रश्न : मेरा आशय भारी तादाद में बैठायी जा रही मूर्तियों और उनके जल विसर्जन . . .
स्वामी राममनरेशाचार्य जी : भले आदमी! लोगों की संख्या पर तो नियंत्रण नहीं कर रहे हो, मूर्तियों की चिन्ता आपको सता रही है - एक सवाल अरब लोग हो गए हैं हम। सरकार ने अरबों, खरबों लगा दिया, लोग खा गए और परिवान नियोजन धरा रह गया। क्या और समस्याएं नहीं हैं? उन पर नियंत्रण नहीं, आराध्य देव की मूर्ति बनी तो जल की समस्या बढ़ गई क्या? आप देखिए कि जो मांइयां  एक बाल्टी में काम चला लेती थीं, वो पच्चीस बाल्टियों का उपयोग करती हैं। इतने कपड़े हैं लोगों के पास जैसे प्रदर्शनी का सामान हो। इन संसाधनों के साथ बेपरवाही का, अपव्यय का तथ्य तो है ही इसलिए ये जो पक्ष है स्थूल दृष्टि का है। मैं तो चाह रहा हूं कि हर आदमी के घर में मूर्ति हो। बिड़ला जी का एक बड़ा घराना है उनके घर में इतना सुन्दर मंदिर है, जितना हमारे मठ में नहीं है। और परिवार के प्रत्येक सदस्य के अपने ठाकुर जी हैं, जब हमारी पत्नी, हमारी बेटी, अल्मारी हमारी, अटैची हमारी तो ठाकुर जी भी हमारे अपने। विसर्जन की कौन-सी समस्या है? नहीं विसर्जन करेंगे, तो उनकी जो प्राण प्रतिष्ठा वाली रीति है, उसी रीति से बोल दिया कि गच्छ-गच्छ। जहां से आए हैं, वहीं जाइए और एक जगह रख दिया प्रतिमा को। आज जो अपव्यय की फूहड़ झांकी दिखाई पड़ रही है, क्या ये सुखद है? महंगे-महंगे कपड़े बण्डलों में आ रहे हैं, बड़े-बड़े क्लब बन रहे हैं, बढ़ रहे हैं। रात्रि में नाचने वाले नर्तक बढ़ रहे हैं, पीने और नाचने वालों की तादाद ज्यादा है या मूर्तियों की? इसी प्रसंग में मैंने एक बार दिल्ली के पुरुषोत्तम अग्रवाल जी से उनके यह कहने पर कि धार्मिक आयोजनों में बहुत पैसे खर्च किए जा रहे हैं और उनकी उपलब्धि नहीं है - कहा था कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में जितने पैसे खर्च होते हैं, उतने पूरे तीर्थ में नहीं होते। भले आदमी और उसका उत्पादन क्या है? कौन-सा वैज्ञानिक तैयार किया आपने? और उस कैम्पस में क्या हो रहा है? उसकी भी खबर हमको है।
प्रश्न : सादगी और मितव्ययिता का आदर्श तो गांधी जी ने भी रखा था?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : वो होनी चाहिए, किन्तु भगवान को भोग तो लगे। आपकी जो आर्थिक स्थिति है, जो सामाजिक और वैचारिक स्थिति है, उसके आधार पर आराधना होनी चाहिए। क्या राय है?
प्रश्न : आप प्रतिवर्ष संस्कृत के विद्वान को एक बड़ी मानद राशि एवं अन्य उपहार देकर सम्मानित करते हैं, इसके पीछे आपकी क्या मंशा है?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : इसके पीछे सद्विचार, सद्इच्छा, सद्चरित्र, रचनाधर्मिता, राष्ट्रीयबोध और मानवधर्मिता का सम्मान है। ये सम्मान उन्हीं लोगों को दिया जाता है, जिन्होंने अपने जीवन को तथ्यों के संग्रह में लगाया, श्रेष्ठ मूल्यों को, विचारों को अपने जीवन में उतारा, बड़े पैमाने पर लिखा-पढ़ा और जिनका आचार और धन दोनों पवित्र हैं। आचार, शुचिता और अर्थ राम आधार के दृढ़ स्तंभ हैं। यह इसलिए नहीं करता कि बहुत पैसा है मेरा पास या मेरा नाम छपे अखबारों में, न-न, यह कतई नहीं। यह श्रेष्ठ मूल्यों का सम्मान है, जिनसे समाज में सही वातावरण तैयार होगा और विद्वान सर्वत्र पूज्यन्ते की भी बात तो है ही। यह विडम्बना है कि जितने लोग सत्ता की जय-जयकार करते हैं, उतने लोग विद्वान की जय-जयकार नहीं करते। जबकि राजा से अधिक स्थायी जीवन विद्वान का होता है। अकबर का क्या जीवन है? बाबर का? शाहजहां का तो रोड ही है न? लेकिन तुलसीदास का? रामचरितमानस की जरूरत तो बाथरूम में भी है। तो विद्वान जितना समाज को देता है, वह अपना सम्पूर्ण दे देता है। जबकि वणिक वृत्ति आमदनी का कुछ प्रतिशत ही देती है और ये सम्मान आजकल के पुरस्कारों की भांति नहीं है, जो सम्बन्ध, भाईवाद, जाति और क्षेत्र को देखकर दिए जाते हैं। पहले ही तय हो जाता है- वो सब यहां नहीं है। पूरे देश में किसी आश्रम की ओर से मिलने वाला एक लाख रुपए का पहला पुरस्कार है यह। आज तक जिन लोगों को दिया गया है, उनका कोई जोड़ नहीं है।
क्रमश:

जगदगुरु साक्षात्कार भाग - २

प्रश्न : हमारे राष्ट्रीय समाज में राम जन्मभूमि का प्रश्न पहले से ही विद्यमान है, उसका अभी तक कोई हल नहीं निकला। क्या उसके समाधान की कोई दिशा आप देखते हैं? और यह एक नया मुद्दा?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : जब मैं नया-नया यहां पर रामानन्दाचार्य बनकर आया था, तो पत्रकारवार्ता में एक पत्रकार ने कहा था कि इस गड़े हुए भूत को उखाडऩे की क्या जरूरत है? आपके प्रश्न की ध्वनि भी वैसी ही है। बहुत दिनों से जो चल रहा है, यदि उसका समाधान नहीं हुआ है, तो उसको क्या वैसे ही छोड़ दिया जाए? देश में बहुत दिनों से गरीबी चल रही है, तो उसकी चिन्ता हमें नहीं करनी चाहिए क्या? छोड़ दें उस मुद्दे को? मैंने कभी कहा था, मान लीजिए कोई वामपंथी सरकार आ जाए और कल्पना कीजिए कि गांधी की समाधि को उखाड़ फेंके? जैसे रूस में लेनिन के साथ हुआ और फिर कांग्रेसी सरकार आवे और कहे कि हम महात्मा गांधी की समाधि को फिर बनाएंगे, तो क्या उनको यह उत्तर दिया जा सकता है कि यह गड़े हुए भूत को उखाडऩा है और जो हो गया, सो हो गया। तो यह गड़ा हुआ भूत नहीं है, यह हमारी आस्था का, गौरव का, उल्लास का, हमारे श्रेष्ठ धर्म पर जो चोट हुई है, उसका प्रश्न है। हम उसको पुन: प्रतिष्ठा देंगे, तो हमारी जो पीड़ाएं हैं, हीन भावनाएं हैं, उससे उबरेंगे। हमारे तमाम उत्कर्ष जो दबे हुए हैं, वह खुलेंगे। वहां मंदिर बनाना चाहिए। अब वो मामला न्यायपालिका में है, जो सर्वोच्च है। इस मामले को जानबूझकर लटकाया गया है। हमारे राष्ट्राध्यक्षों और राजनयिकों को यह आभास नहीं है कि यह देश के लिए कैन्सर होगा। मैंने एक बार राजीव गांधी जी से कहा था कि यदि इस मामले को आप लोग लम्बाएंगे, तो अनिष्ट होगा। आप जाएंगे, आपकी पार्टी भी जाएगी और आप ये हश्र देख रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी कैसे सडक़ पर आ गई थी और जब दस वर्ष बाद सत्ता में आई भी तो दूसरों के सहारे सरकार चलानी पड़ रही है। ये कैसा मामला है, जिसका निर्णय ही नहीं हो पा रहा। फैजाबाद की फाइलों में राम जी का मामला सड़ रहा है, जबकि तमाम फाइलें रोज निकलती हैं, निर्णय होते हैं, अरे! न्याय, न्याय है, वो किसी को भी मिलना चाहिए। अभी तमाम विधायक, मंत्री सब फांसी को जा रहे हैं। वो होगा। किसी से आपको क्या लग रहा है- सच बात बोलने में।
दूसरी बात, लोगों को समझाया जाए। मेरा माना है कि बुद्धितत्व पक्षपाती होती है। वाचस्पति एक दार्शनिक हुए उन्होंने लिखा है - तत्व पक्षपातो ही गोपाय स्वभाव:। किन्तु आज तक कोई संगोष्ठी हुई क्या? इसके लिए एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हो। दोनों पक्ष के चुनिन्दा लोग इक_े हों और बात हो कि आप क्या चाहते हैं? आपस में कटकर मरना चाहते हैं? व्यापार नहीं चाहते हैं? भाईचारा नष्ट हो जाए? मानवीय भावना, धार्मिक भावना नष्ट हो जाए? यह सब हो या सद्भावना का विकास हो। रामजन्मभूमि में बाबरी मस्जिद का क्या औचित्य है? उनका तीर्थ है क्या वहां? सरजू के लिए उनके मन में क्या महत्व है? अरे! बाबर ने गलती की, उसको मानो कि गलती हुई और कहो कि आप मन्दिर बनाइए, नहीं तो सारा देश गुजरात बन जाएगा और ऐसे गुजरात में न मैं जाऊंगा, न कोई मौलवी जाएगा, न कांग्रेसी जाएगा न भाजपाई जाएगा। निरीह लोग मारे जाएंगे जो संसार का सबसे गर्हित कर्म है। यदि यह बात राष्ट्रीय स्तर पर समझा दी जाए, तो लोग मानेंगे, यह वैचारिक तरीका है।
प्रश्न : अच्छा तो धर्म बाहर का उपादान है या भीतर का विश्वास? 
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : दोनों, दोनों है। उदाहरण लीजिए - हम सत्य में निष्ठावान हैं, सत्य की निष्ठा भीतरी चीज है, लेकिन जब हम सत्य में निष्ठावान होंगे, तो वाणी का प्रयोग करेंगे। उसके अनुसार आचरण करेंगे, तो वो बाहर आ गया। ये ऊर्जा है आप उसे दूसरे शब्दों में समझें कि आप भोजन करते हैं, तो ऊर्जा बनती है, वो दिखती नहीं है, लेकिन जब हम उसका उपयोग करते हैं, तो उसका उत्पादन  दिखता है। ऊर्जा जो भोजन से, वायु से तमाम चीजों से बनी है, लेकिन जब उससे कुछ किया तो दिखा, ये देखिए (तौलिए को एक जगह से दूसरी जगह उठाकर रखते हुए)। इस तरह धर्म ऊर्जा है। व्यवस्थित कर्मों के द्वारा शास्त्रों, पुराणों द्वारा निर्धारित जो अत्यंत परिष्कृत कर्म है, वह धर्म है। मैं लोगों को कहता हूं कि कर्म करने से कोई बच नहीं सकता, लेकिन कर्म करने की जो अत्यंत परिष्कृत विधा है, उसी को धर्म कहते हैं। कोई आदमी भूखा है, चिल्ला रहा है, दरिद्र है, परिस्थितियों से टूटा हुआ है, जब आप उसे दो रुपए देते हैं, तो उससे जो आपकी ऊर्जा बनती है, तुरंत जैसे ग्लूकोज पीने से बनती है। वो ऐसा भीतरी उत्पादान नहीं है, जिसे छुपा ही रहना है, अंत:करण में। वह बाहर प्रकट होता है और वही सही समाज का निर्माण करता है। धर्म जिसकी अपेक्षा सारे संसार को है। ऊर्जा तो जब किसी को मारते हैं, तब भी लगती है, सहलाते हैं तब भी। वह नकारात्मक है ये पुण्यात्मक।
क्रमश:

Sunday, 31 March 2013

स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का एक साक्षात्कार

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी का यह साक्षात्कार जो कला समय के संपादक श्री सत्येन्द्र शर्मा जी ने २९ अक्टूबर २००७ को श्रीमठ, पंचगंगा घाट, वाराणसी में लिया था। वह साक्षात्कार आज भी बहुत प्रासंगिक हैं - हम उस साक्षात्कार को साभार यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :-
प्रश्न : रामसेतु इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा है, जिसकी गूँज बाहर तक सुनाई दे रही है। आप क्या सोचते हैंï?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : रामसेतु की चर्चा अपने यहां इतिहास, पुराणों में पर्याप्त मात्रा में हुई है। उसके माध्यम से भगवान श्रीराम के द्वारा नियोजित, संरक्षित, प्रेरित सेना जाकर के लंका में आसुरी शक्ति के विनाश के लिए कारगर हुई, तो उसका वह स्वरूप अब नहीं है, लेकिन अवशिष्ट भाग तो उससे जुड़ा ही हुआ है। मेरा मानना है कि उसका मूल्यांकन प्राचीन और आधुनिक, दोनों दृष्टियों से होना चाहिए। पुरातात्विक दृष्टि से प्राचीन धरोहरों को संरक्षित रखा जाना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में वर्णित है कि कलयुग में स्थान की पूजा होती है - कलौ स्थानानि पूज्यन्ते। हो सकता है कालक्रम से गंगा भूमि में समा जाए और उसका यह प्रवाह न रहे, लेकिन उस क्षेत्र को प्रणाम कर शक्ति अर्जित करेंगे। पुराणों में कहा गया है कि धार्मिक, आध्यात्मिक शक्ति के केन्द्र यदि उस रूप में नहीं हैं, तो भी उस स्थान को महत्व मिलना चाहिए, क्योंकि उसके पूजन व दर्शन से शक्ति मिलती है। इसी तरह रामसेतु की महिमा का वर्णन करते हुए बतलाया गया है कि जो उस स्थान का दर्शन या पूजन करेगा, उसे दिव्यधाम की प्राप्ति होगी। हालांकि देश पुरातत्व के लिए जाने कहां-कहां क्या-क्या कर रहा है, परन्तु रामसेतु के महत्व को ओझल करके, व्यापारिक महत्व को प्रमुखता देना यह कहीं से भी अच्छा नहीं है। मैं समझता हूँ कि इस धन का गौरव भारत भूमि को ही नहीं, संसार की भूमि को करना चाहिए। आखिर जिस आतंकवाद की समस्या से पूरी दुनिया विह्वल हो रही है, उस आतंकवाद के निराकरण में रामसेतु की जितनी भूमिका है, उतनी इतिहास में कहीं नहीं। मेरा मानना है कि सरकार की अपनी जो लोकतांत्रिक दृष्टि है, उसमें रामसेतु को महत्व देते हुए व्यापार के लिए कोई दृूसरा रास्ता निकाला जाना चाहिए, क्योंकि हमारा कत्र्तव्य है कि उस स्थल को हम संरक्षित रखें। इतना ही नहीं, उसे प्रेरणा भी लें कि हमें भी इसी तरह की भूमिका का निर्वाह करना है - जैसा श्रीराम ने किया।
प्रश्न - रामसेतु को वैज्ञानिक या तकनीकी दृष्टि से अप्रामाणिक और भौगोलिक दृष्टि से बालू का उठान माना गया है, तो क्या आस्था के आगे तर्क या प्रमाण को तिलांजलि दे दें?
स्वामी रामनरेशाचार्य जी : यह आस्था भर की बात नहीं है, वरन प्रमाण भी है , जो आस्था कपोल कल्पित, अनुपयोगी और कसौटी में खरी नहीं उतरती, वह लुप्त होती जाती है। तमाम परम्पराएं लुप्त हो गईं, वार्ताएं और संस्कार लुप्त हो गए, लेकिन न वाल्मीकि रामायण लुप्त हुई और न उसकी बातें और न ही राम लुप्त हुए।
विज्ञान की कसौटी में जो नहीं आएगा, क्या वह सब हमारी आस्था और विश्वास को निगल जाएगा? विज्ञान की कसौटी में माता-पिता का महत्व कहां प्रमाणित है, मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, यह विज्ञान के थर्मामीटर में नहीं है और पूरी दुनिया में इसकी मान्यता है। इसलिए हमारी आस्थाओं को शक्ति देने वाली परंपराओं को, जिनसे समाज का निर्माण होता है, उसके आधार पर हम चलते हैं। वेद, इतिहास और पुराणादि से जो सन्देश हमें मिलते हैं, उनको हल्के से मत लीजिए, वह अन्ध श्रद्धा नहीं है। उसके पीछे जो जीवन दृष्टि, विकास हमसे जुड़ा हुआ है, उसे हम देखें। नकली चावल से भात नहीं बनता। भात बन रहा है, तो अपने असली होने का प्रमाण दे रहा है। विज्ञान ने ही तो उसको देखा कि वह स्थल भरा हुआ है, ऊंचा है, भिन्न है और इतिहास तो है ही - परम्परा है, आस्था भी है। गीता में भगवान ने कहा है, यो यत् श्रृद्धत सएव सा। आस्था ही मनुष्य का आखिरी स्वरूप होता है। आप कहां श्रद्धावान हैं - परिवार के लिए जाति के लिए या राष्ट्र के लिए। यदि हम राम के कृतित्व में आस्थावान हैं, राम की संस्कृति में आस्थावान हैं, तो हम अंध श्रद्धालु नहीं हैं। विज्ञान की जहां सीमाएं हैं, जहां उसकी समझ नहीं है, वहां आस्था ही उसका पोषण कर रही है और अनादि काल से कर रही है।  
क्रमश:

Wednesday, 12 December 2012

अच्छा कैसे सोचा जाए?

चौथा भाग


इसी तरह से हम लोगों का जीवन गलत इच्छाओं, खानपान के कारण, गलत संसर्ग के कारण जो नकारात्मक सोच से जुड़ा हुआ है, वह अवश्य सुधर सकता है। जब कोल, भील बदल सकते हैं, तो आधुनिक शिक्षा में जो बच्चे पढ़ रहे हैं, वे तो सुधरेंगे ही, ये बच्चे संस्कारी घरों के हैं। हमारे नेताओं का जीवन भी तो कोल, भीलों से तो अच्छा है। जिनके जीवन में कोई सद्गुण नहीं थे, लेकिन वे भी भगवान को देखकर सुधर गए, सकारात्मक सोचने लगे। जिनका जीवन अच्छा है, जो सकारात्मक हैं, वैसे लोगों को वर्चस्व मिले, बढ़ावा मिले, उनके संसर्ग में लोगों को लाया जाए और राष्ट्र उसी तरह की शिक्षा की व्यवस्था करे कि अध्यात्म शिक्षा लोग पढ़ें, वेदों शास्त्रों में लोगों का विश्वास बढ़े।
कौन कहेगा? वेद ही तो कहेगा कि किसी की हिंसा न करो। अभी तो काशी में वेदांत शास्त्र के बहुत बड़े विद्वान थे, उन्होंने अंतिम दिनों में आत्महत्या कर ली। शास्त्र तो यह पढ़ा रहे थे कि जो ब्रह्म चिंतन करेगा, वह ब्रह्म हो जाएगा, मुक्त हो जाएगा, उसके जीवन में कोई क्लेश नहीं होगा, सबको समान देखेगा, लेकिन जिन्होंने अपना जीवन ही वेद पढ़ाने में लगा दिया, वे भले ही वेदांत पढ़े थे, पढ़ाते थे, परन्तु उनका चित्त मलिन हो गया, धन की इच्छा, सम्मान की इच्छा इतनी विकृत्त ढंग से पैदा हुई कि उसने उन्हें रेलवे के इंजन के पास पहुंचा दिया।
अब तो धार्मिक जगत के भी जो लोग हैं, उनका स्वरूप भी सबके सामने आया है। योगासान कराते-कराते दवाई बेचने लगे, कोई भी ऐसा पैसे का काम नहीं है, जो नहीं कर रहे हैं। ऐसे तमाम लोग लाल कपड़ा पहनकर दाढ़ी बढ़ाकर महात्मा की उपाधि प्राप्त करके काफी कुछ वही कर रहे हैं, जो शास्त्रीय धारा से उल्टा है, नकारात्मक है। केवल पैसा, भोग और सम्मान के लिए जीवन जी रहे हैं। उनके सत्संगों में चर्चे होते हैं, लेकिन इससे राष्ट्र, मानवता, धर्म का कोई लाभ नहीं हो रहा है, क्योंकि जब वे स्वयं ही भोगी हैं, शास्त्रीय मार्यदाओं से रहित हैं, शास्त्र का ज्ञान नहीं है, शास्त्र में विश्वास नहीं है, उसके प्रयोग में विश्वास नहीं है, किसी तरह से केवल धन चाहिए। तो ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है, ब्राह्मणों में भी संतों में भी, मैं इन सभी लोगों के लिए कह रहा हूं। पूरे राष्ट्र को यह प्रयास करना चाहिए। केवल जल शुद्ध हो जाए, तभी नहीं चलेगा, भोजन सामग्री शुद्ध हो जाए, केवल इससे नहीं चलेगा। एक लेख मैंने पढ़ा कि बिहार सरकार सबसे ज्यादा ध्यान दे रही है कि कैसे शराब की ज्यादा से ज्यादा बिक्री हो कि राजस्व आए। जब लोग शराब पीएंगे, तो उनका चित्त नकारात्मक होगा या सकारात्मक होगा? नीतीश सरकार रोड बनवा रही है, अमन चैन के लिए प्रयास कर रही है, उद्योग बढ़ाने का प्रयास कर रही है, लेकिन जब राजस्व कमाने के लिए शराब को बढ़ावा दिया जाएगा, तो सब बेकार हो जाएगा। रोड क्या करेगा, स्कूल क्या करेंगे, विवि क्या करेंगे, जब मन ही नकारात्मक हो जाएगा? केवल कमाई की भावना से मंडित होकर हमारा काम कदापि नहीं चलेगा।
नकारात्मक जीवन के कारण लोगों का जो चैतन्य है, जो कत्र्तव्य है, उद्देश्य है, वह बहुत छोटा हो गया है, उस पर कोई नियंत्रण नहीं है, न समाज का न देश का। इसलिए लोग जैसे-तैसे जीवन जी रहे हैं और उसी में अपनी भी बर्बादी हो रही है। गुटखा खाकर भले ही हम मरेंगे, लेकिन गुटखा जरूर खाएंगे, गुटखा पर बहुत पहले ही प्रतिबंध लग जाना चाहिए था कि जो गुटखा खाएगा, उसे जेल हो जाएगी, जो बेचेगा, बनाएगा उसको जेल हो जाएगी। लोग हत्या करके बाहर घूम रहे हैं, लोग उन्हें कह ही नहीं रहे हैं। यह नकारात्मक चिंतन का परिणाम है।
इतिहास है कि चोरों ने चोरी छोड़ दी राम जी को देखकर। इसलिए इन सभी बातों के लिए शास्त्रों से जुडऩा जरूरी है। शास्त्र कहते हैं वैसा जीवन जीना होगा।
अभी महात्मा गांधी का चिंतन कहां हो रहा है। एक खबर थी कि पाकिस्तान और भारत ने मिलकर २ अक्टूबर को गांधी जी का जन्मदिन मनाया। यह सकारात्मक चिंतन हुआ। कई मुद्दों में भारत और पाकिस्तान के बीच द्वेष है, लेकिन अखंड भारत माता के ही दोनों अंग हैं। गांधी जी इस भूमि का मोल समझते थे, इसलिए उनका जीवन भी भगवान की दया से ईश्वरीय भावना से जुड़ा था। सर्वथा नकारात्मक नहीं था, सर्वथा सकारात्मक था। उन्होंने सबको समान रूप से पे्रेम दिया।

मनुष्य जीवन अत्यंत महत्वपूर्ण जीवन है, इससे अच्छा उत्पादन सृष्टि में नहीं है, जैसा आनंद मिलना चाहिए, जैसी सुन्दरता मिलनी चाहिए, आज वैसी नहीं मिल रही है, क्योंकि हमारे विचार नकारात्मक हैं। हम सकारात्मक विचारों से जुड़ें, हम दूसरे का बुरा न करें, ऐसा चिंतन होना चाहिए। हमारा भी विकास हो, दूसरों का भी विकास हो, खुशहाली बढ़े सुन्दरता बढ़े। इस संसार में परिवर्तन की जरूरत है, तभी तो रामराज्य आएगा। रोड बनाने, हवाई जहाज बनाने, मोबाइल या केवल विश्वविद्यालय के विकास से रामराज्य नहीं आएगा, रामराज्य तभी आएगा, जब नकारात्मका चिंतन का निवारण होगा और सकारात्मक चिंतन होगा।
समापन

Tuesday, 11 December 2012

अच्छा कैसे सोचा जाए?

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी
 -तीसरा भाग-
 


महात्मा गांधी जब व्यापक रूप से सकारात्मक हो गए, तो पूरे देश में लोगों को लगा कि अब अपना काम केवल खेती, नौकरी, व्यवसाय करना ही नहीं होना चाहिए, अपनी मातृभूमि के लिए भी हमें आगे आना चाहिए। जो परतंत्रता है, कितना भी कष्ट सहकर निद्रा का परित्याग करके तमाम तरह के मोह माया के बंधनों को त्याग कर लोग आगे आए। केवल हमारे घर वाली बुढिय़ा माई ही हमारी मां नहीं है, रिश्तेदारी की मां ही मां नहीं है, सबसे बड़ी मां भारत माता है। गांधी जी रोम-रोम में नकारात्मक भावना से रहित और सकारात्मक भावना के थे। तभी उनको देखकर-सुनकर लोगों का जीवन अच्छा बना।
आजकल समाज में नकारात्मक जीवन के लोगों का बाहुल्य होता जा रहा है, सकारात्मक जीवन के लोग कम हो गए हैं। यह सोच ही बंद हो गई है कि सच्चाई से भी पैसा कमाया जा सकता है, बंद हो गई यह सोच कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से भी नेता बना जा सकता है, बस पैसा-पैसा-पैसा, गुंडागर्दी, जाति, चापलूसी इत्यादि, यानी किसी तरह से नेता बनना है और सत्ता हस्तगत करना है, यह गलत है। आज हमें ऐसे लोगों का साथ देना चाहिए, जिनका जीवन सकारात्मक है। सकारात्मक जीवन वालों का सम्मान होना चाहिए।
आज शिक्षा जो दी जा रही है, उसमें बहुत बड़ा दोष है। नई पढ़ाई, एमबीएम, एमबीबीएस, एमटेक इत्यादि पढ़ाइयों का ही वर्चस्व होता जा रहा है, इससे तो आदमी केवल पैसा कमाएगा। पढ़ाई हो रही है, लेकिन जीवन की श्रेष्ठता, शुद्धि तो नहीं बढ़ रही है। जीवन केवल अपने लिए ही नहीं जीना है, दूसरों के लिए भी जीना है। कोई कुछ भी पढ़ाई करे, लेकिन अध्यात्म शास्त्र की पढ़ाई अनिवार्य होनी चाहिए।
प्लूटो ने कहा था कि दुनिया की बागडोर दार्शनिकों के हाथ में देनी चाहिए। मैं कह रहा हूं, दुनिया के हर व्यक्ति को दार्शनिक होना चाहिए, तभी वह नकारात्मक सोच से बचेगा।
गलत भोग नहीं होना चाहिए। गलत दृष्टि से भोग करना, गलत कपड़ा पहनना, गलत जगह रहना नहीं होना चाहिए। अब तो ऐसी भी घटनाएं सुनने में आ रही हैं कि किसी का भोग भी करना और उसको मार भी डालना। प्यार भी किया और मार दिया। यह कैसी सोच हैï? यह नितांत नकारात्मक सोच है। आजकल जिस माता-पिता ने हमारा पालन-पोषण किया, उसके लिए भी हम नकारात्मक सोच रखने लगे हैं। बीस-पच्चीस साल पालने-पोसने वाले माता-पिता से भले नहीं, लेकिन हम साल-दो साल पहले मिलीे पत्नी से ही प्यार करेंगे या संभव है, पत्नी से भी नहीं करेंगे, किसी पड़ोसी औरत से ही करेंगे, जिससे भोग मिलेगा, उसे ही पत्नी मानेंगे। ऐसे कैसे चलेगा? ये तो नकारात्मक बातें हो गईं। ये सारी गलत पद्धतियां हैं। 



जो राष्ट्र हमारे लिए सबकुछ करता है, उसके लिए हमारे मन में कोई भाव नहीं है? जो देश हमारे लिए शिक्षा, रक्षा, सडक़ सुविधा इत्यादि की व्यवस्था करता है, उसके लिए हमारे मन में भाव क्यों नहीं है? मेरा कहना है, तमाम शिक्षाओं के साथ अध्यात्म शिक्षा की पढ़ाई जरूरी है। जो आत्मा के सम्बंध में चिंतन प्रदान करती है। पता चलता है कि आत्मा और परमात्मा का स्वरूप, दोनों में सम्बंध क्या है। अभी तो नेता लोग अपनी जाति का वोट ले लेते हैं और बस मिल गई चुनावी सफलता। बहुजन सर्वजन हो गया, सरकार बन गई, इसके बाद कोई पूछ ही नहीं रहा है कि कहां गए सर्वजन वाले लोग। जो राष्ट्र व राज्य को चला रहे हैं, देश के धुरंधर लोग हैं, और वे कुछ नहीं कर रहे हैं। हर आदमी का चिंतन सिमट करके एकदम छोटा-सा हो गया है। इसलिए भगवान की दया से लोगों के शिक्षा में परिवर्तन हो, भोजन जीवन और जीवन जीने की पद्धति में परिवर्तन हो। ध्यान दीजिए -
कुंभकर्ण और रावण का जो जीवन है, वह बहुत नकारात्मक है, कुंभकर्ण केवल खाता है और पीता है, मदिरा-मांस, पशुओं का मांस। केवल खा रहा है और सो जा रहा है। उसको कोई लेना-देना नहीं है कि परिवार, पत्नी, बच्चे, समाज, लंका का क्या हाल है, बिरादरी का हाल क्या है। रावण भी केवल अपने ही भोग में लगा है, इतनी पत्नियां, इतना भोग, कहीं कोई ठिकाना नहीं, किसी का विमान छीन लेना, कन्याओं का अपहरण करना। रावण नकारात्मक चिंतन का है, क्योंकि उसको भोजन ठीक नहीं है, मन ठीक नहीं है।
रावण ने कहा कि मैं भजन नहीं कर सकता ईश्वर का, मैं अपने चित्त को परम शक्ति को नहीं दे सकता, क्योंकि मेरा चित्त मन तामस है, जब चित्त तामस होगा, कुंभकर्ण का और रावण का, तो सकारात्मक चिंतन नहीं होगा।
कुंभकर्ण, रावण के इर्दगिर्द जो चाटुकार लोग थे, जो हां में हां मिलाते थे, उनके भोग में सहभागी बनकर अपना उल्लू सिधा करते थे, अपना संकल्प पूरा करते थे, ऐसे लोगों से बचने की जरूरत है। कहा जाता था कि रावण पूजा भी करता था भगवान शंकर की, तो वह भी अपनी नकारात्मकता और भोग के लिए करता था, शास्त्र के विपरीत आचरण के लिए करता था। कुंभकर्ण का जीवन भी नकारात्मक जीवन है, विभीषण का जीवन नकारात्मक नहीं है क्योंकि उसका आहार-व्यवहार इत्यादि शुद्ध है, इसलिए वह लंका में रहकर भी जानकी जी के पक्ष में है, वह हरण के पक्ष में नहीं है, राम जी के पक्ष में है। समाज और अपने राष्ट्र के पक्ष में है। ऐसे विभीषण ने अत्याचार या नकारात्मक का विरोध कर दिया। जोरदार काम हुआ, जो लंका सम्पूर्ण दृष्टि से दुर्गंधित हो रही थी, वह लंका सुन्दर हो गई।
क्रमश:

Saturday, 8 December 2012

कैसे अच्छा सोचा जाए?

दूसरा भाग

श्रीराम का जब अवतार हुआ, तो जंगल के लोग चोरी-चमारी, लूटपाट, तमाम तरह के बलात्कार, मांस, मदिरा का सेवन, अभक्ष्य का सेवन, किसी तरह से धनवान बनना, ताकतवर बनना, ऐसा सारा गलत काम वे लोग करते थे। लिखा है कि चित्रकूट वाले प्रसंग में आता है कि जंगल के लोगों ने कहा, हमारी सबसे बड़ी सेवा यही है कि हम आपका सामान चुरा नहीं लेते हैं, धन, कमंडल, कपड़ा इत्यादि जो आपके पास है। वही कोल-भील लोग राम जी के संसर्ग में आकर ऐसे हो गए, जैसे बड़े-बड़े ऋषि महर्षि थे, सबने अपने दुष्कर्मों को छोड़ दिया, जो नकारात्मक थे, जो अपने लिए, समाज के लिए मानवता के लिए अभिशाप थे, उनका जीवन अच्छा हो गया, वे सब राम भाव में आ गए। राम जी को अपना सब-कुछ मान लिया। शुद्ध मानव स्वरूप हो गए।

यह ऐसे ही हुआ है, राम जो हैं हमारे हैं, वे केवल दूसरों के नहीं हैं। जैसे वे पूरी सृष्टि के हैं, वैसे ही हमारे हैं। इसलिए हम अपने जीवन को उनके लिए अर्पित करेंगे, संसार के लिए अर्पित करेंगे। जो आदमी संसार के लिए अर्पित हो गया, जो जाति, अड़ोस-पड़ोस सबके लिए अर्पित हो गया, वो वास्तव में अर्पित हो गया। तो सबसे बड़ी बात है कि ईश्वर विश्वास के अभाव में लोग नकारात्मक जीवन के होते जा रहे हैं। ईश्वर पर विश्वास होने पर आदमी का प्रेम बढ़ेगा, उसके निर्देश पर जीवन बिताएगा और सम्पूर्ण जीवन ईश्वर के लोगों का मानकर, पूरा संसार ईश्वर का रूप है मानकर, आदमी उसके निर्देश से ऐसे-ऐसे कर्मों का संपादन करेगा कि सारा संसार एकदम सकारात्मक भावों से जुड़ जाएगा। अयोध्या में सभी लोग एक दूसरे से प्रेम करते थे, ऐसा लिखा है रामायण में, तो प्रेम तो विकास की पराकाष्ठा है। भोजन होना, कपड़ा होना, मकान होना, ये भी विकास के लक्षण हैं, लेकिन विकास का सबसे बड़ा व अंतिम स्वरूप है या परिणति है कि हम आपस में एक दूसरे से प्रेम करें। कहा कि कैसे प्रेम करते थे लोग, ऐसे प्रेम करते थे कि ईश्वर के द्वारा जो निर्दिष्ट जीवन है, उसका पालन करते थे, शास्त्रों ने जो बताया कि ऐसा करो वैसा करो, वैसा ही करते थे।
राम को केन्द्र बिन्दु मानकर हमें वही करना है, जो ईश्वर करता है, दूसरा कोई भी सूत्र नहीं है समाज में। कोई भी ऐसा झगड़ा नहीं, कोई भी ऐसा धन प्रकल्प नहीं, कोई भी ऐसी व्यवस्था नहीं कि जिसके आधार पर हम पूरे संसार में सकारात्मक भावना उत्पन्न कर सकें, कैसे हम अपने पूरे संसार को अपना समझेंगे? कैसे हम राष्ट्र को अपना समझेंगे, कैसे हम अपनी बिरादरी को अपना समझेंगे, परिवार में सभी लोग अच्छे नहीं हैं, बिरादरी में अच्छे नहीं हैं, राष्ट्र की और भी बुरी समस्या है, पता चलता रहता है कि मुखिया लोग ही अच्छे नहीं हैं, रोज अखबार में आता रहता है इतना घोटाला हुआ, राष्ट्र के मुखिया लोग इतने परिवारवादी हैं, जातिवादी हैं, दुव्र्यसनी हैं। तमाम तरह की बुराई उनकी प्रकाश में आती हैं, तो कैसे हमारा समाज के साथ सकारात्मक चिंतन होगा, तो एक ही सूत्र है, जैसे एक सूत्र तमाम फूलों को एक साथ जोड़ देता है, वैसे एक ही सूत्र है ईश्वर, जो सम्पूर्ण संसार के लोगों को एक धागे में जोड़ सकता है और ईश्वर पर विश्वास करें, तो स्वत: यह लग जाएगा कि सम्पूर्ण संसार एक है। जैसे हम अपने विकास के लिए प्रयास करते हैं कि हम धनवान हो जाएं, बलवान हो जाएं, हमारा सम्मान बढ़ जाए, हमारा प्रेम बढ़ जाए, विद्या बढ़ जाए, जैसे इसके लिए हम प्रयास करते हैं, वैसे ही हम औरों के लिए नकारात्मक भाव छोडक़र सबके लिए सकारात्मक भाव के हो जाएंगे कि सब तो हमारे ही ईश्वर हैं।
एक जगह लिखा है, गोस्वामी जी से किसी ने पूछा कि आपको सभी लोगों से बहुत प्रेम है, आप इतनी चिंता करते हैं कि संसार के सभी लोगों का भला हो जाए, सभी लोग सुन्दर और सुखी हो जाएं, धनवान हो जाएं, सभी लोगों का जीवन परमोत्कर्ष को प्राप्त करे, इसका क्या कारण है। तुलसीदास जी ने जवाब दिया कि सब हमारे राम जी के हैं, मैं तो सबका नौकर हूं। ऐसी स्थिति में सकारात्मक सोच का सबसे बड़ा यही तरीका है।

अर्जुन अपने जीवन में नकारात्मक जीवन का हो गया था कि मैं अब युद्ध नहीं करूंगा, मैं घर में नहीं रहूंगा, संन्यासी हो जाऊंगा, जो राज परिवार में पला बढ़ा, शिक्षित हुआ वह कह रहा है संन्यासी बनूंगा, जबकि अपने अधिकार के लिए लडऩे का समय। उसे लग रहा है कि सब लोग मर जाएंगे, तब भगवान ने एक लंबा प्रवचन करके, गीता का उपदेश करके अर्जुन को समझाया कि आत्मा नित्य है, वह मरने वाला नहीं है, यह न समझो कि जैसे शरीर नष्ट होगा, तो आत्मा का विनाश हो जाएगा। नकारात्मक चिंतन से जुडऩे की जरूरत नहीं है, तुम्हें सोचना है कि युद्ध करना चाहिए या नहीं। वस्तुत: शरीर का नाश होता है कि आत्मा का होता है? न्याय के लिए लडऩा है या नहीं लडऩा है? या अन्याय से ही युक्त रहना है? शोक और मोह के बादल अर्जुन के मन में मंडरा रहे थे, जो उसे नकारात्मक और कत्र्तव्य से भटका रहे थे, सारा जीवन उसका कुरूपता से घिरता जा रहा था, उस अर्जुन को भगवान ने गीता का प्रवचन किया और नकारात्मक चिंतन को भगाया, तो अर्जुन तैयार हो गया और बोला, 
- नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत!
स्थितोस्मि गलतसन्देह: करिष्ये वचनं तव।।
अर्थात, हे अच्युत आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया। मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, संशयरहित होकर स्थित हूं। आपकी आज्ञा का पालन करूंगा। आप जो कहेेंगे मैं करूंगा।
वस्तुत: मोहग्रस्त होने से ही आदमी नकारात्मक जीवन का होता है, जब सही ज्ञान नहीं हो कत्र्तव्य का, अपने परिवार का, अपने राष्ट्र का, मानवता का कि यह कैसा संसार है, इसके लिए हमें खूब प्रयास करना चाहिए, अभी जो आनंद मिल रहा है, उससे बहुत ज्यादा आनंद मिलेगा।
अर्जुन ने प्रतिज्ञा की, आप जो कहेंगे, मैं वही करूंगा, यह ज्ञान जब तक नहीं आएगा, ईश्वर के माध्यम से सम्पूर्ण संसार ईश्वर का रूप है, उसकी आज्ञा का पालन करके और अपना भी विकास करना है और इस जीवन को दूसरों के भी उपयोग में लाना है, ऐसा विचार जब हो जाता है, तो भगवान की दया से आदमी सकारात्मक सोच का हो जाता है। क्रमश:

Monday, 22 October 2012

कैसे अच्छा सोचा जाए?

सकारात्मक चिंतन का अभिप्राय है कि जो समाज के लिए उपयोगी है, जो समाज के लिए मान्य है, जो अपने लिए उपयोगी है, उसके लिए चिंतन करना। दूसरी ओर, जाति की मान्यता, समाज, परिवार की मान्यता, बड़े समुदाय की मान्यता से अलग हटकर सोचना नकारात्मक चिंतन है। वैसे तो व्यापकता में जाएंगे, तो नकारात्मक चिंतन को परिभाषित करना बहुत कठिन हो जाएगा। समुदाय की जो सोच है, ज्ञान बढ़ाने की, धन बनाने की, प्रेम बढ़ाने की, इससे अलग हटकर चिंतन करना या जो चिंतन जाति के लिए है, परिवार, राष्ट्र, जाति, संविधान के लिए है, उससे अलग हटकर चिंतन करना नकारात्मक चिंतन है।
पहले इसके कारण पर चिंतन करते हैं, तो सबसे पहले चिंतन का जो आधार है, उसे देखें। हम लोगों के यहां अंत:करण के चार भेद बतलाए जाते हैं - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। मन तो संकल्प, विकल्प करता है, ये ऐसा है, ये वैसा है। चित्त चिंतन करता है और जब किसी बात का निश्चय करना होता है, तो यह काम बुद्धि करती है और अहंकार तो होता ही रहता है, मैं-मैं की भावना या अहम् अहम् की जो भावना है, मैं गोरा हूं, मैं ब्राह्मण हूं, धनवान हूं, इत्यादि अहंकार ही है।

तो चित्त से जुड़ा है चिंतन। हम लोगों को दर्शन शास्त्र में पढ़ाया गया था कि चित्त जब सात्विक होता है, तभी वह सही चिंतन कर पाता है और उसमें सही भावनाएं, सही ज्ञान उत्पन्न होता है। जो सकारात्मक ज्ञान का स्वरूप है, वह चित्त के सात्विक होने पर ही उत्पन्न होता है। यदि हम चाहते हैं कि सबसे पहले हमारा चिंतन शुद्ध हो, जो हमारे जीवन को उत्कर्ष दे, उज्ज्वलता दे, तो इसके लिए हमारे चित्त का शुद्ध होना जरूरी है। जैसे खेत जब शुद्ध हो, तभी उसमें बीजारोपण सफल होता है और वह फसल को देने वाला बन पाता है। यदि खेत खराब हो, उसमें पत्थर हों, ज्यादा पानी हो या जरूरत से कम पानी हो, खर-पतवार ज्यादा हों या कोई और विकृति हो, तो उसमें बीजारोपण विफल हो जाता है। ठीक उसी तरह से सही चित्त में ही सही चिंतन आता है। इसके लिए आवश्यक है कि चित्त शुद्ध हो और इसके लिए शुद्ध आहार का होना जरूरी है। वेदों में लिखा है कि जो सात्विक आहार ग्रहण करते हैं, उनका ही मन शुद्ध होता है। सात्विक आहार का अर्थ है, जो राजस नहीं है, बहुत दिनों का बना हुआ नहीं है, जला हुआ नहीं है, बासी नहीं है, सड़ा हुआ, गला हुआ, ज्यादा मसाला वाला, तेल नहीं है, जो दुर्गंधित नहीं है। आहार शाकाहार होना चाहिए। सकारात्मक सोच के लिए शुद्ध चित्त की आवश्यकता है, शुद्ध चित्त तभी होगा, जब आहार शुद्ध होगा और जब शुद्ध व्यवहार होगा। और जिन लोगों का चित्त सकारात्मक है, उनका संसर्ग करें, उनके साथ बैठना-बोलना आवश्यक है। यहां तक कि चित्त की शुद्धि पर कपड़ा इत्यादि का भी प्रभाव पड़ता है। इस बात का महत्व है कि व्यक्ति किस रंग का कपड़ा पहनता है, जैसे उजला कपड़ा सात्विक माना जाता है, केसरिया, पीला, गुलाबी रंग भी सात्विक माना जाता है। सकारात्मक चिंतन के लिए आवश्यक है कि आदमी शास्त्रों में विश्वास करे, क्योंकि शास्त्र ही बतलाएंगे, गुरु ही बतलाएगा कि हमें कैसा चिंतन करना चाहिए कि हमारा विकास हो। हर आदमी को ईश्वर से चित्त मिला है, वह कुछ न कुछ विचार करता रहता है, निश्चय करता है, लेकिन समाज और जीवन को सुंदरता देने वाला, हमारे जीवन का सही उपयोग करने वाला, राष्ट्र को सही दिशा और विकास देने वाला, हमारे माध्यम से जो होगा, पूरी मानवता के लिए हम कैसे कारगर हो सकेंगे, इसके लिए जो चिंतन देगा, वो तो शास्त्र देगा, शास्त्रों को जानने वाले और उसका प्रयोग करने वाले गुरु देंगे। नकारात्मक चिंतन इसलिए हो रहा है, क्योंकि मन शुद्ध नहीं है, आहार, व्यवहार शुद्ध नहीं है, कोई राष्ट्रीय स्तर पर काम नहीं हो रहा है, लोग कैसे मांस, मदिरा और तमाम अभक्ष्य जो नहीं खाना चाहिए, वो सब खा रहे हैं। जब खेत ही शुद्ध नहीं होगा, तो फसल कहां से शुद्ध होगी? जब जल ही शुद्ध नहीं होगा, जब सामग्री शुद्ध नहीं होगी, तो मन कैसे शुद्ध होगा? मन से ही चित्त बनता है। भोजन से ही चित्त बनता है। तो शास्त्रों का विश्वास नहीं होने से, गुरु का विश्वास नहीं होने से लोगों का चिंतन नकारात्मक होता जा रहा है। शास्त्र ही बतलाएंगे, गुरु ही बतलाएंगे कि हमें क्या चिंतन करना है, चिंतन का सही स्वरूप क्या हो? रावण का चिंतन करना है या राम का करना है। अपनी पत्नी का चिंतन करना है या दूसरी लडक़ी का चिंतन करना है। धन कमाने के गलत रास्ते का चिंतन करना है या सही रास्ते का। विकसित होने के लिए सही रास्ते का चिंतन करना है या गलत रास्ते का चिंतन करना है। जीवन को स्वार्थी बनाना है या संयमी बनाना है, यह सब कौन बतलाएगा, शास्त्र ही बतलाएंगे, गुरु ही बतलाएंगे। तो वास्तव में इसका अभाव होने के कारण लोग नकारात्मक होते जा रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदमी का जब तक ईश्वर में विश्वास नहीं होता, उसका काम नहीं चलता। ईश्वर में अविश्वास के कारण हमें यह समझ ही नहीं आता है कि हमारे जीवन का परम लाभ या परम गंतव्य या परम कत्र्तव्य क्या है, हम एक छोटे से दायरे में ही रहकर अपना जीवन बिता देना है, कहीं से भी आए, कहीं भी सो लिए, जैसे-तैसे पैसे भी कमा लिए, किसी के साथ भी जुड़ गए, हमें क्या लेना है समाज से, जाति से, राष्ट्र से या मानवता से, ये तो बिना मतलब का है, हमें एटम बम से क्या लेना है, चंद्रलोक में जाने से क्या लेना है, हमें विभिन्न तरह के विकास से क्या लेना है? आदमी जब शास्त्रों के माध्यम से ईश्वर से जुड़ता है, तो देखता है कि जैसे हमें अपना जीवन प्रिय है, वैसे ही पूरा संसार हमारा ही है। जब पूरे संसार को ईश्वर चला रहा है, जो वायु देता है, प्रकाश देता है, जल देता है आकाश देता है, जिसने हमारे जीवन की रक्षा की, उसे बनाया, संवारा, जो सम्पूर्ण सृष्टि का उत्पादक, पालक और नियंता है, सबकुछ उसके पास है, उसीका यह संसार है, वह हमारा है, तो हम उसके लिए प्रयास करें, उसके लोगों के लिए प्रयास करें, उसकी रीति से प्रयास करें, हमारा जो नकारात्मक चिंतन है, वह सकारात्मक चिंतन में बदलेगा। तो जब तक ईश्वरीय भावना नहीं होगी, काम नहीं चलेगा।
क्रमश:

Thursday, 20 September 2012

जगदगु़रु महाराज की प्रवचन पुस्तिका का लोकार्पण

भारत में रामभक्ति की अविरल धारा के जनक आचार्यश्री रामानंद जी के प्राकट्य धाम हरित माधव मंदिर, प्रयाग, इलाहाबाद में २ सितम्बर संध्या के समय अनेक विद्वानों की उपस्थिति में ‘दु:ख क्यों होता है?’ पुस्तिका का लोकार्पण हुआ। रामानंद संप्रदाय की मूल पीठ श्रीमठ, वाराणसी के पीठाधीश्वर रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सानिध्य में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष जटाशंकर जी और देश के प्रसिद्ध संस्कृत समाचारवाचक बलदेवानंद सागर जी ने के इस पुस्तिका का विमोचन किया। इस पावन अवसर पर दिल्ली से आए प्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय भी मंच पर विराजमान थे।
श्रीमठ से अनेक
ग्रंथों का प्रकाशन हुआ है, किन्तु यह पुस्तिका या ग्रंथ इस मामले में एक शुरुआत है कि इसमें रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज के प्रवचन संकलित हैं। प्रवचन समकालीन समस्याओं पर केन्द्रित हैं, इसमें रामभक्ति से लेकर हिग्स बोसोन या ईश्वरीय कण की वैज्ञानिक खोज पर भी विस्तृत चर्चा है। इस प्रवचन ग्रंथ से यह समझने में सहायता मिलती है कि धर्म क्या है? आज की समस्याओं का समाधान क्या है? दु:ख क्यों होता है? सुख कैसे होगा? कन्या भ्रूण हत्या से लेकर आतंकवाद और प्रतिशोध जैसे विषय पर भी इसमें प्रवचन संकलित हैं। 
पुस्तिका विमोचन अवसर पर प्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय, विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास, ज्ञानेश उपाध्याय, रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष जटाशंकर जी और प्रसिद्ध संस्कृत समाचारवाचक बलदेवानंद सागर जी। 

इस अवसर पर अपने उद्बोधन में स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने कहा,‘तुलसीदास जी ने कहा है, निरंतर सुनिए, निरंतर गाइए और निरंतर स्मरण कीजिए, मैं भी निरंतर बोल रहा हूं, निरंतर सुन रहा हूं, निरंतर स्मरण कर रहा हूं, किन्तु लिखने या लिखवाने का अवसर नहीं आया। लिखने का काम अब ज्ञानेश जी ने किया है।’ उन्होंने यह भी कहा, ‘मैं पुस्तिका को पढ़ रहा था, मेरे मन में बार-बार प्रश्न आ रहा था, क्या यह मैंने ही कहा था या ज्ञानेश जी को ही ज्ञान हो गया और उन्होंने लिख दिया। अब विश्वास नहीं होता, ये मेरे ही शब्द हैं। किन्तु ध्यान दीजिए, गीता बस एक बार श्री कृष्ण के मुख से निकली थी। ऐसा नहीं है कि जब कहा जाए, कृष्ण गीता सुनाने लगें, एक विशेष अवसर व प्रयोजन था, जब गीता अवतरित हुई।’
डॉ. जटाशंकर जी ने कहा, ‘धर्म प्रत्येक व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाने का कार्य करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि धार्मिक आचरण, दूसरों की सेवा, दया, करुणा से व्यक्ति के दु:ख कम होते हैं।’ उन्होंने पुस्तिका में प्रवचन में उल्लिखित महर्षि वेदव्यास जी के श्लोक - को विशेष रूप से याद किया। इस श्लोक में महर्षि वेदव्यास कह रहे हैं कि मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूं, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से मोक्ष तो सिद्ध होता ही है, अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते? जटाशंकर जी ने कहा, ‘आज वास्तव में धर्म की पुकार को सुनने की आवश्यकता है। शास्त्र हमें समाधान बता सकते हैं, हमारे दु:ख दूर करने के उपाय बता सकते हैं।’
श्री बलदेवानंद सागर जी ने पुस्तिका के शीर्षक की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘बुरे आचरण के कारण ही दु:ख होता है। यह पुस्तिका एक पावन व प्रशंसनीय प्रयास है, पुस्तिका के माध्यम से रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के विचार मुद्रित अवस्था में लोगों तक पहुंचेंगे, जिससे समाज और देश का भला होगा।’ प्रस्तुत पुस्तिका में स्वामी रामनरेशाचार्य जी का परिचय लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्री रामबहादुर राय जी ने कहा, ‘रामानंद संप्रदाय अकेला ऐसा संप्रदाय है, जिसमें सभी जाति और धर्म के लोगों के लिए जगह है। यह देश के लिए एक अत्यंत उपयोगी संप्रदाय है। यह देश को एक सूत्र में पिरोने का काम कर सकता है।’ उन्होंने स्वामी रामनरेशाचार्य जी की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘यह एक ऐसे सच्चे, सहज और प्रखर संत हैं, जिनसे देश को बहुत आशाएं हैं। देश में ऐसे संत बहुत कम हैं, जो वास्तव में देश और समाज के भले के लिए सोच रहे हैं।’
जयपुर से आए वरिष्ठ पत्रकार व पुस्तिका के संयोजक व संपादन सेवक ज्ञानेश उपाध्याय ने कहा, ‘आज के अत्यंत दुष्कर समय में महाराज स्वामी रामनरेशाचार्य जी के रूप में एक सूर्य उगा हुआ है, हमें अपने-अपने दरवाजे-झरोखे खोल लेने चाहिए और उनके प्रवचन प्रकाश को अपने भीतर उतरने देना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘यह पुस्तिका एक बड़े अभाव की छोटी पूर्ति है। यह एक सिलसिले की शुरुआत है, जो राम जी और जगदगुरु के आशीर्वाद से आगे निरंतर रहेगा।’ उन्होंने स्वामी रामनरेशाचार्य जी को समकालीन समाज और पत्रकारों के लिए अत्यंत उपयोगी बताते हुए और लोकार्पण स्थल के निकट ही बह रही गंगा जी की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘जैसे गंगा मैया की तुलना केवल गंगा मैया से हो सकती है, जैसे सागर की तुलना केवल सागर से हो सकती है, जैसे राम जी की तुलना केवल राम जी से हो सकती है, ठीक उसी प्रकार महाराज जी (स्वामी रामनरेशाचार्य जी) की तुलना केवल महाराज जी से ही हो सकती है।’
दु:ख क्यों होता है? - पुस्तिका के निर्माण में पग-पग पर सहयोगी रहे संस्कृत के जयपुरवासी रामभक्त विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास ने लोकार्पण कार्यक्रम का अत्यंत कुशल व व्यापक बहुमुखी संचालन करके इस अवसर को ऐतिहासिक और पावन बना दिया। उन्होंने पुस्तिका के मुद्रक प्रिंट ओ लैंड के स्वामी श्री सत्यनारायण अग्रवाल की भी प्रशंसा करते हुए कहा, ‘यह प्रयास था कि पुस्तिका ज्यादा मोटी या कीमती न हो, ऐसी हो कि सहजता से जन-जन तक पहुंचे और रामभक्ति का प्रसार हो।’ उन्होंने कहा, ‘रामभक्ति समाधान की संभावनाओं का अनंत आकाश है, जिसके माध्यम से हमारे सारे दु:ख दूर हो सकते हैं। यह अत्यंत प्रसन्नता की बात है कि महाराज जी के आशीर्वाद से इंटरनेट पर आज एक ऐसा ब्लॉग है, जिसके माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी के श्रीमुख से निकले पावन मार्गदर्शक शब्द पूरे संसार में प्रचार-प्रसार पा रहे हैं। रामभक्ति की यह यात्रा सतत रहनी चाहिए।’
वाराणसी सेआए विद्वान एवं श्रीमठ के प्रकाशन का दायित्व संभालने वाले डॉ. उदय प्रताप सिंह ने लोकार्पण के अवसर पर उपस्थित विद्वजनों, संतों और श्रद्धालुओं का आभार जताते हुए कहा, ‘पुस्तिका के रूप में एक अच्छा प्रयास सामने आया है, महाराज के प्रवचन प्रकाशित हुए हैं, यह दायित्व मेरा था, लेकिन मीडिया में होने के कारण ज्ञानेश उपाध्याय मुझसे इस मामले में आगे निकल गए हैं। उनको मेरी तरफ से बधाई है।’
लोकार्पण के अवसर पर हरित माधव मंदिर में बड़ी संख्या में संत, विद्वजन, भक्त और सेवक उपस्थित थे, सभी ने रामभक्ति धारा और पुस्तिका का आनंद लिया। लोकार्पण के उपरांत भव्य भंडारे का भी आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में उपस्थित जनों ने प्रसाद पाया। कार्यक्रम स्थल के निकट ही ‘दु:ख क्यों होता है?’ पुस्तिका के लिए एक स्टॉल लगाई गई थी, जिस पर रखी सभी पुस्तिकाएं देखते-देखते बिक गईं। करीब ७८ पृष्ठ और २५ रुपये कीमत वाली पुस्तिका में श्री रामबहादुर राय द्वारा लिखित महाराज जी के परिचय के उपरांत महाराज जी के १३ प्रवचन अंश हैं और सबसे अंत में रामानंद संप्रदाय की मूल गद्दी वाराणसी में गंगा किनारे पंचगंगा घाट पर स्थित श्रीमठ पर लिखा गया एक फीचर है, जिसमें श्रीमठ के कल और आज के बारे में जाना जा सकता है। पुस्तिका के कवर पृष्ठ पर महाराज जी का चित्र और पिछले कवर पृष्ठ पर महाराज जी की प्रिय प्रार्थना महाकवि जयदेव रचित मंगलगीतम - श्रितकमलाकुचमण्डल. . . भी मुद्रित है।
जय श्री राम

Thursday, 6 September 2012

गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम स्थल प्रयागराज में महाराज

गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम स्थल प्रयागराज में महाराज

विभिन्न मुद्राओं में जगदगुरु

प्रयाग में चातुर्मास स्थल हरित माधव मंदिर आचार्य रामानंदाचार्य प्राकट्य धाम के परिसर में जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज 
  




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Monday, 25 June 2012

प्रयाग में होगा चातुर्मास महोत्सव



जगदगुरु रामानन्दाचार्य पद पर प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के सान्निध्य में प्रयाग अर्थात इलाहाबाद में दिनांक ३ जुलाई २०१२ आषाढ़ पूर्णिमा से दिव्य चातुर्मास महोत्सव का शुभारम्भ होने जा रहा है, जिसका समापन ३० सितम्बर २०१२ को भाद्र पूर्णिमा के दिन होगा।
उल्लेखनीय है कि गंगा, यमुना के संगम की पावन धर्म नगरी प्रयाग आदि जगदगुरु रामानन्दाचार्य की जन्मस्थली है, अत: यहां जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के चातुर्मास का अति विशेष महत्व है। प्रयाग के ठाकुर हरित माधव मंदिर, ४५/४२, मोरी दारागंज की पावन स्थली पर जगदगुरु अपनी साधु-संत मंडली के साथ ९० दिनों तक विराजमान रहेंगे। इन नब्बे दिनों के दौरान अनेक धार्मिक कार्यक्रम नियमित रूप से होंगे, तो कुछ विशेष व दुर्लभ धार्मिक आयोजन भी होंगे। हिन्दू संतों में चातुर्मास की परंपरा का एक तरह से लोप हो गया था, जिसे स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने एक तरह से पुनजीर्वित किया है, जिसे वे पूरे भक्ति, भाव निरंतर मनाते आ रहे हैं। इस दौरान वे संतों के साथ-साथ आम जनों को भी सहज उपलब्ध होते हैं, सुबह से देर रात तक भक्तों की शंकाओं का समाधान करते, उन्हें सच्ची रामभक्ति का मार्ग बताते जगदगुरु एक अदभुत, व्यापक व दुर्लभ छवि प्रस्तुत करते हैं। पिछले वर्ष आपने इन्दौर में चातुर्मास किया था और उसके पहले वर्ष सूरत में, वे भारत में घूम-घूमकर भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में रामभक्ति की अलख जगाते रहे हैं। उनके चातुर्मास में देश भर से विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान भी जुटते रहे हैं। विद्वतजन गोष्ठी और धर्माचार्य सम्मेलन की खास महत्ता रही है।



दैनिक कार्यक्रम 
परमप्रभु श्रीराम जी का पूजन    प्रात: ६ से ८
श्रीराम यज्ञ हवनात्मक            प्रात: ८ से ८-३०
देवर्षि पितृतर्पण यज्ञ                प्रात: ८-३० से ९
आचार्य पूजन                         प्रात: ९ से ९-३०
स्वाध्याय(रामतापनीयोपनिषद्)
एवं शाण्डिय भक्ति सूत्र              प्रात: १० से १२
श्रावण में प्रति सोमवार रुद्राभिषेक    मध्याह्न ११ से २
प्रवचन संतों एवं विद्वानों द्वारा    सायं ६ से ७
मंगलाशीर्वचन-आचार्यश्री द्वारा    रात्रि ७ से ८

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विशेष आयोजन
गुरु पूर्णिमा महोत्सव                   ३ जुलाई, मंगलवार
गोस्वामी तुलसीदास जयन्ती महोत्सव     २५ जुलाई, बुधवार
गणेश महोत्सव                          ५ अगस्त, रविवार
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव        १० अगस्त, शुक्रवार
नन्द महोत्सव                            ११ अगस्त, शनिवार
विद्वज्जन संगोष्ठी
धर्माचार्य सम्मेलन
समापन महोत्सव                        ३० सितम्बर

Monday, 11 June 2012

समस्याओं का समाधान

समापन भाग
कोई निराश न हो, सुधार और रामभाव की संभावना सदा बनी हुई है। ए. राजा भी जेल में गए, करुणानिधि की बेटी भी जेल में गई, एक आदर्श खड़ा हुआ कि बड़े लोग भी जेल जा सकते हैं। आने वाले दिनों में कौन आदमी जेल में पहुंच गया और वहीं सड़ गया, पता नहीं चलेगा। जो गलत हैं, उन्हें दंड मिलेगा।
लोग भूल जाते हैं, अर्जुन सिंह के पिताजी भ्रष्टाचार के मामले में जेल गए थे। बाद में कांग्रेस ने उन्हें विधानसभा चुनाव लडऩे के लिए टिकट दिया। नेहरू जी प्रचार करने के लिए गए थे, भाषण देकर मंच से नीचे उतरे, तो एक स्वतंत्रता सेनानी ने कहा कि पंडित जी आप इस चोर का प्रचार करने के लिए वोट मांग रहे हैं? तो पंडित जी फिर मंच पर चढ़े और वहां से कहा, मैं शर्मिंदगी के साथ अपनी बात को वापस लेता हूं, मैंने कहा था कि इनको वोट दीजिए, अब कहता हूं, आप इनको वोट मत दीजिए, भले कांग्रेस यहां हार जाए, मुझे खुशी होगी कि भ्रष्ट आदमी चुनाव नहीं जीता।
यह बहुत बड़ी बात है, कांग्रेस भी भूल गई है। कांग्रेसियों को कहना चाहिए कि उनकी पार्टी ऐसी पार्टी है, जो अपने नेता को जेल भेज सकती है। समझौता नहीं किया। ए. राजा को उसी सिद्धांत के आधार पर जेल ले जाया गया, लोकपाल के आधार पर वे नहीं गए। पुराने कानून व आधार पर ही न जाने कितने अपराधी जेल में सड़ रहे हैं। आपको मालूम होगा कि चारा घोटाले में दोषी कई लोग मर गए, दस-दस साल का कारावास हो गया। यह वही कानून है, जो संविधान लेखन के समय बना था। सभी समस्याओं की जड़ है आदमी का ईश्वरीय धारा से दूर होना, सभी समस्याओं का समाधान है कि आदमी शास्त्रों के निर्देश से जुड़े, श्रेष्ठ जनों की प्रेरणा से जुड़े और राम भाव के साथ जुडक़र अभियान चलावे। कहीं कोई दिक्कत नहीं होगी। हम लोगों को देखिए, बड़ाई मैं नहीं कर रहा हूं, २३-२४ साल हो गए मुझे रामानन्दाचार्य बने हुए। कहीं एक रुपया भी अपने नाम से नहीं जुड़ा। पैसा आता है, आप ही देते हो, खर्च होता है। किसी ने कहा कि कुछ जमा कर लीजिए, बुढ़ापे में काम आएगा, तो मैंने कहा, मेरे जितने चेले हैं, क्या सब हमसे पहले ही मर जाएंगे, जो मेरे साथ रहेंगे, मैं उनसे कहूंगा कि ऐ दवाई के लिए भेजना, अपनी दवाई में कितना खर्च करते हो, तो मुझे भी भेजना, दवाई की जरूरत है। आज जो हम कमा रहे हैं भावों का धन, हमारे बाद भी हमारे कुछ लोग मरेंगे। अभिप्राय यह कि इतने दिनों में एक रुपया भी जमा नहीं हो पाया, काहे का डिपोजिट, आपको तो बतला दूं, तो हैरान हो जाएंगे। मठ में जो दो ढाई लाख रुपए थे, वो भी १९९७ से ब्लॉक हैं, उसका व्याज भी आना बंद है। फिर भी श्रीमठ चल रहा है।
मैं कई बार लोगों को मजाक में कहता हूं, कुछ दिनों में हम भी पुट्टापर्थी (अमीर) होने वाले हैं, मालामाल होने वाले हैं। पहले ज्यादा साधन नहीं था, साधन अभी जो बढ़ा है, उसमें आप भी हिस्सेदार हैं, आगे जब साधन और बढ़ेगा, तो भोगने के लिए क्या बाहर से लोग आएंगे? हमारे पास जो भी साधन या धन होगा, हमें मिल-बांटकर उपभोग करना है। अभी मैंने नहीं खाया, आप ही प्रसाद लाते हैं, आप ही खाते हैं। हमारे पास जो भाव है, उसे आप प्रचारित करें। हमारे पास जो भी कुछ है, उसमें आप सबकी हिस्सेदारी है। पैसा बहुत आ जाए और सच्ची प्रतिष्ठा न हो, तो कैसे चलेगा? पिछले दिनों जबलपुर के जिस आश्रम में मैंने महायज्ञ करवाया, वह जूना अखाड़े का है। दूसरा कोई आता, तो जूना अखाड़े वाले जगह नहीं देते, धकिया देते। मैं वहां गया, तो उन्होंने सोचा होगा कि रामनरेशाचार्य तो जूना अखाड़े के ही हैं, छोड़ो इन्हें। दूसरा कोई बैठता, तो वे बैठने नहीं देते। मैं कहता हूं, कोई संन्यासी महात्मा वहां आता है, तो इनकी सेवा करो, भेदभाव नहीं करना। श्रीमठ या काशी में भी हमारे यहां कोई संन्यासी आ जाए, तो सेवा होती है। अभी एक छात्र ने निवेदन किया कि हमें सहयोग चाहिए, मैं पढ़ता हूं, मेरे पीछे कोई सहयोग देने वाला नहीं है, मैंने उसके लिए १००० रुपया महीना तय कर दिया, कहा, चिंता मत करो, जरूरत पड़ी तो और दूंगा, अलग साल सहयोग और बढ़ा दूंगा। तुम्हें कहीं जाना होगा, तो टिकट भी बनवा दूंगा, कपड़ा और अन्य आवश्यकता भी पूरी करूंगा, जीवन भर खूब पढ़ो, पूरी मदद करूंगा। मेरा कहना है, कोई आदमी श्रेष्ठ चिंतन में है, तो उसे सहयोग मिलना चाहिए, पैसे का यही उपयोग सबसे बड़ा है।
रामचन्द्र भगवान की जय।

समस्याओं का समाधान

भाग - छह
आज जातिवाद एक बड़ी समस्या बना हुआ है। लगता है, पहले से बढ़ गया है। जातिगत जनगणना भी हुई है। कई लोगों को जाति की राजनीति में बड़ा आनन्द आ रहा है। यह कहा जाता है कि अरहर की दाल को और जाति को जितना पकाया या मथा जाए, उतना ही आनंद बढ़ता है। मैं बतला दूं, बनारस में हमारे लंबे जीवन में एक भी आदमी नहीं मिला, जिसने हमारी जाति के आधार पर हमारा पक्ष लिया हो। बिहार जातिवादियों का देश है, जातिवाद की शुरुआत ही वहां से हुई है। जैसे पहाड़ों पर बर्फ गिरती है, तो तराई के इलाकों तक ठंड स्वत: आ जाती है, ठीक उसी तरह जितनी भावनाएं हैं, भली या बुरी, वे सब बिहार से चलती हैं और देश भर में फैल जाती हैं। महात्मा गांधी ने वहीं से आंदोलन शुरू किया। जब कांग्रेस के विरुद्ध पहला आंदोलन शुरू हुआ, तो बिहार से ही शुरू हुआ, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व किया। कोई भी क्रांति होगी, तो उस क्रांति का सूत्रपात उसका, उत्स और उसे ऊर्जा देना, उसको रास्ता देना और उसको सारी बौद्धिक कौशल देना, बिहार से ही शुरुआत होती है। इतने ऊर्जावान लोग और कहीं होते ही नहीं हैं। अभी आपने सुना होगा कि वहां एक डीजीपी हैं अभयानंद जी। जब नीतीश मुख्यमंत्री हुए, तो उन्होंने अपनी बिरादरी के आदमी को ही डीजीपी बनावा दिया, लेकिन वह सफल नहीं हुआ, फिर उत्तर प्रदेश के एक ब्राह्मण को बनाया, जो किसी की बात नहीं सुनते थे, उसके बाद अभयानन्द जी आए। अभ्यानन्द जी के पास जब लालू यादव के काल में कोई काम नहीं था, तब उन्होंने गरीब बच्चों को आईआईटी कोचिंग कराना शुरू किया, सुपर थर्टी नाम से संस्थान खोला। तीस गरीब बच्चों को वे चुनते थे, उन्हें पढ़ाते थे, हर तरह की सुविधा देते थे और उनमें से अधिकांश बच्चों का आईआईटी में चयन हो जाता था। आईपीएस अभयानन्द जी और उनकी मित्रमंडली ने यह बड़ा काम किया। उन लोगों ने देश भर को बतला दिया कि यह है पढ़ाई का तरीका। पढ़ाई ऐसे भी हो सकती है, पैसा ही सबकुछ नहीं है।
वे डीजीपी हो गए। मैंने किसी पत्रिका में पढ़ा कि लाखों-लाख जो अवैध हथियार बिहार में जप्त हुए हैं, उनमें लगे लोहे को गलाकर उससे कुदाली और हसुआ बनवा रहे हैं अभयानन्द जी। यह आदमी इतना ईमानदार है कि मैं गया में था, लोग बोले कि अभयानन्द जी प्रणाम करेंगे, यह काफी पहले की बात है। लेकिन वे नहीं आ पाए, तो मैंने पूछा कि क्या हुआ। जवाब मिला, जो किराये की गाड़ी लेकर ससुराल आए थे, वह रास्ते में खराब हो गई, जो समय आपके यहां लगना था, वह रोड पर ही लग गया। वे निजी काम के लिए सरकारी वाहन के इस्तेमाल से बचते हैं। उनके पिताजी भी पुलिस अधिकारी थे। बताते हैं कि पिता जी जो भी बोलते थे, अभयानन्द जी सिर झुकाकर मानते थे। व्यवहार कुशल हैं, प्रणाम करेंगे, सिफारिश भी सुनेंगे, लेकिन वही करेंगे, जो उचित होगा, गलत काम नहीं करेंगे। काम सरकारी वही होगा, जो सही होगा। ऐसे ही पुलिस अधिकारी चाहिए, ऐसे लोगों को आगे लाकर काम करना-कराना चाहिए। ऐसा नहीं है कि देश चलाने लायक लोग नहीं हैं।
उत्तर प्रदेश में मायावती ने एक वैश्य को डीजीपी बनवाया था। ये अधिकारी ऐसे थे कि मायावती भी अन्याय की बात करेंगी, तो वे विरोध करेंगे, भले ही इस्तीफा दे दें। जाति ही सबकुछ नहीं है। चरित्रवान कहीं भी पैदा हो सकता है, उसका जाति से कोई सम्बंध नहीं है। महात्मा गांधी भी तो वैश्य थे। जाति के आधार पर गाली देने की परंपरा बहुत गलत है। श्रेष्ठ लोगों का हर स्थिति में सम्मान होना चाहिए, लेकिन आज लोग श्रेष्ठता का सम्मान कम करने लगे हैं। आप कीजिए, अभी से शुरू कीजिए, ऊर्जा फैलेगी और ईमानदार और श्रेष्ठ लोगों का एक समूह तैयार होगा। पुलिस के अच्छे अधिकारियों को अभी कह दिया जाए कि सुधार कीजिए, काम कीजिए, तो ये एक सप्ताह में किसी भी राज्य को रामराज्य जैसा बना देंगे, एक गलत काम नहीं हो सकेगा, लेकिन अच्छे पुलिस अधिकारियों, अच्छे प्रशासनिक अधिकारियों को काम नहीं करने दिया जाता है।  क्रमश:

समस्याओं का समाधान

भाग - पांच
आज के समय में श्री माधवाचार्य जी बहुत अच्छे महात्मा हैं। विहिप के संस्थापकों में रहे हैं, उनको देखने से ही लगता है कि वे ऋषि समान हैं। एक बार वे श्रीमठ आए थे, वहां ऋंगेरी के शंकराचार्य जी भी थे, द्वारिका-जोशी मठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद जी भी थे, मैं भी था। मंच पर हम बैठे थे। सभा के उपरांत मैंने किसी से पूछा, ‘आपको सबसे तेजस्वी कौन लग रहा था?’
उन्होंने पूछा, ‘आपको बुरा तो नहीं लगेगा?’
मैंने कहा, ‘नहीं बुरा लगेगा, बताइए।’
तब उन्होंने कहा, ‘माधवाचार्य जी सबसे अच्छे महात्मा लग रहे थे।’
वास्तव में माधवाचार्य जी का बोलना, उठना, बैठना ऐसा है कि उसमें कहीं से कोई नकलीपना नहीं है। आज तो कई महंत ऐसे बैठते हैं, जैसे कोई अहिरावण बैठा हो। बैठा नहीं जा रहा है कि कमर में दर्द है, ऐसे-ऐसे बैठे रहते हैं कि चित्र खराब हो जाता है। दिखावा वाले महंत यह भी सोचते हैं कि कहीं लोग यह न समझ लें कि छोटा वाला महंत है। क्या अकड़ कर बैठने से कोई बड़ा महात्मा हो जाएगा? अकड़ कर बैठने से तो सिनेमा की शूटिंग तक खराब हो जाती है, तो अध्यात्म की शूटिंग कहां चलने वाली है? यदि कोई आदमी फिल्म की शूटिंग करा रहा हो, तो प्रसंग के अनुसार उसे हंसना, मुस्कराना, रोना पड़ता है। प्रसंग है कि मुस्कराना है और वहां कोई अट्ठाहास करने लगे, तो कैसे चलेगा? धर्म के क्षेत्र में अकडऩा कैसे चलेगा? सबसे बढक़र शालीनता बनी रहनी चाहिए। हमारे राष्ट्र का सौभाग्य है, आज भी अच्छे-अच्छे संत हैं, एक से एक बड़े संत हैं, लेकिन क्या कभी रामदेव जी ने या अन्ना हजारे ने उन्हें पूछा है? कभी नहीं पूछा। वे तो ऐसे लोगों को साथ रखते हैं, जिनकी सनातन धर्म में कोई खास जगह नहीं है। महात्मा माधवाचार्य जी उन लोगों में से हैं, यदि उनको कहना होगा, तो वे सोनिया गांधी और मनमोहन ङ्क्षसह को भले बहुत प्रेम कर रहे हों, लेकिन वे जरूर कह देंगे कि यह गलत हो रहा है।
एक बार हमसे उन्होंने कहा कि विज्ञप्ति जारी की जाए, राष्ट्रहित में जारी की जाए। विज्ञप्ति तैयार हुई, उसे जब शंकराचार्य जी को दिखाया गया कि हम दोनों ये जारी कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि जो पापी हैं, अपने आप ही मर जाएंगे, आप लोग क्यों राजनीति में पडक़र ये कष्ट उठाना चाहते हैं। विज्ञप्ति जारी नहीं हुई। तो माधवाचार्य जी को कहीं से कोई लागलपेट नहीं है। इतना बड़ा विद्वान, धनवान और धर्म के लिए काम करने वाले महात्माओं में दस लोग होंगे, तो एक नाम माधवाचार्य जी का है।
हमने समझना होगा कि रामजी ही रामराज्य के संस्थापक पुरुष हैं। हिन्दू राष्ट्र का अर्थ ही रामराज्य है। लफंगों का राष्ट्र नहीं। मैंने पहले भी कहा था कि मांस खाना, शराब पीना और सारे गलत काम करना, यदि यह चलता रहे और यदि इसे हिन्दू राष्ट्र कहा जाए, तो इससे तो धर्मनिरपेक्ष शासन ही ठीक है। मैं किसी की निंदा कर रहा था, जो मांस भी खाते थे, शराब भी पीते थे और श्रीराम का नारा भी लगा रहे थे, तो इससे अच्छा है कि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र ही बना रहे।
चाहे कांग्रेस के माध्यम से आए या भाजपा या वामपंथियों के माध्यम से आए, रामराज्य की कल्पना तभी साकार होगी, जब शास्त्रीय भावनाओं को या उपनिषद की भावनाओं को, रामजी की भावना पर लोग ध्यान लगाएंगे और रामजी के अभियान से प्रेरणा लेंगे।
संसार में बिन लादेन या दाऊद सबसे बड़े अपराधी नहीं हुए, संसार में रावण जैसा आतंकवादी या व्याभिचारी कोई नहीं हुआ। सबसे बड़ा आतंकवादी कौन - रावण। सबसे बड़ा व्याभिचारी कौन - रावण। नैतिकता ताक पर रखने वाला सबसे बड़ा अपराधी कौन - रावण। सबसे ज्यादा धन का संग्रहकर्ता कौन - रावण। ऐसे रावण को रामजी ने जड़ से उखाड़ दिया और स्वयं कुछ भी नहीं लिया, वहीं का वहीं दे दिया, विभीषण को दे दिया। हां, उससे पहले विभीषण को उत्तराधिकार के लिए तैयार किया, उत्तराधिकारी जोरदार होगा, तभी तो विरासत को बहुत दिन तक बनाए रख पाएगा। अभी कल्पना करिए सब काला धन स्विस बैंक से आ जाए, तो फिर चला जाएगा। जब तक अभी जो लोग हैं, नहीं सुधरेंगे, लोगों में राष्ट्रीय भावना, ईश्वरीय भावना, धार्मिक भावना नहीं होगी, तब तक धन नहीं रुकेगा, फिर काला होकर विदेश चला जाएगा। इसलिए इन भावनाओं को संजोना होगा, ताकि धर्म और धन की शुचिता बनी रहे। रामजी इन भावनाओं को तैयार करते हैं, अपनी सेना को पहले ही तैयार कर दिया कि आपका आचार भी पवित्र है, धर्म भी पवित्र, धन भी पवित्र है। धन का सदुपयोग कैसे होगा, इसके लिए पूरी सेना सौ प्रतिशत तैयार है। अभी तो उत्तराधिकारी बनने के लिए ही झगड़ा चल रहा है। एक से एक लोग लगे हुए हैं, पद के पीछे। कहां से क्या हड़प लिया जाए, यही षडयंत्र जारी हैं।
पहले अच्छी टीम तैयार होनी चाहिए, रामजी से प्रेरणा लेनी चाहिए। रामजी ने जिसको साथ लिया, उसको इतना सक्षम बना दिया कि वह लंका को संभाल सकता था, विभीषण ने संभाला, सुग्रीव ने संभाला, निषादराज ने अपने राज को संभाला, कहीं भरत जी को राजा बनाकर भेजा, कई लोगों को राजा बनाया और अपने बेटों को रामायण गायन में लगा दिया। कुश और लव रामायण गा रहे हैं। आइए, इस अद्भुत, अतुलनीय आदर्श से हम सीखें और समस्याओं का समाधान करें। क्रमश:

Sunday, 10 June 2012

श्रीमठ दर्शन



श्रीमठ के सामने गंगा और उस पार श्रीमठ का ही एक आश्रम है, जहाँ गोशाला भी है, श्रीमठ में बच्चों और छात्रों के लिए वहीं से रोज दूध आता है  

बोट (बड़ा वाला ) जो एक भक्त ने श्रीमठ को भेंट किया है.

यह हजारा है, हजार दीपों का स्टैंड. इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने १८वी सदी में काशी विश्वनाथ मंदिर और श्रीमठ का जीर्णोधार करवाया था, तभी यह हजारा बना. इसके बगल में एक छोटा हजारा भी है. देव दीपावली को इसे रौशन किया जाता है, तब देखने के लिए बनारस भर के लोग जुटते हैं और गंगा की रौनक देखने लायक हो जाती है. हजारा के लिए आइना बन जाती है गंगा मैया.

श्रीमठ की चौथी मंजिल की बालकनी या गलियारा, जो हमेशा के लिए याद रह जाता है.  
श्री विधान जी, अर्थात श्रीमठ के हनुमंत, सीधे सज्जन मृदुभाषी संत, जब जगदगुरु श्रीमठ में नहीं होते हैं तो विधान जी ही पूरी देख रेख करते हैं, संतों की सेवा में कोई कमी नहीं, श्रीमठ में रहकर पढ़ रहे छोटे छोटे बच्चों से घिरे रहने वाले, विधान जी सबके बाबा हैं, कोई बालक नेपाल से आया है तो कोई बिहार से तो कोई पूर्वोत्तर भारत से, तो कोई राजस्थान से, विधान जी कहते हैं, हमारा क्या त्याग है, त्याग तो इन बच्चों का है, घर बार से दूर, माता पिता से दूर, बस दो बार खाना मिलता है, सन्यासी का जीवन है, त्याग तो इन बच्चों का है. हम तो इनकी उम्र में चार पांच बार खाते थे, जेब में भूजा रखते थे, जब भूख लगी खा लिया, बच्चे हैं, पढ़ लिख लेंगे तो कोई घर सांसारिक जीवन में लौट जाएगा तो कोई सन्यासी बन जाएगा, कोई कहीं पढ़ाने लगेगा.
एक बालक बहुत विद्वान भी है, उसे संस्कृत में काफी कुछ याद है, मैं उससे पूछता हूँ, क्या घर लौटना चाहते हो? वह बालक जवाब देता है, नहीं घर नहीं लौटूंगा, यहीं रहूँगा पढूंगा.
विधान जी की छत्र छाया में बच्चे खुश हैं,  और विधान जी तो तब खुश होते हैं जब जगदगुरु श्रीमठ में विराजते हैं, विधान जी बहुत भाव बिभोर होकर कहते हैं, हमारे लिए तो वही राम हैं.

Wednesday, 6 June 2012

श्रीमठ दर्शन

श्रीमठ की तीसरी मंजिल पर विराजमान पावन चरण पादुका और जगदगुरु रामानंदाचार्य जी महाराज
श्रीमठ की बाईं ओर के घाट और गंगा जी 

श्रीमठ की दायीं ओर के घाट और गंगा जी   

श्रीमठ के ठीक सामने का घाट और श्रीमठ की बोट (सबसे बड़ी वाली), बनारस की गलियों में जब भीड़ रहती है, तब महाराज जगदगुरु इसी बोट के सहारे दूसरी घाट पर जाकर वहां किसी सड़क वाहन में विराजते हैं. श्रीमठ तक किसी सड़क वाहन के जाने की सुविधा नहीं है. श्रीमठ से करीब एक सवा किलोमीटर दूर वाहन छोड़ देना पड़ता है, और फिर गलियों से होते हुए करीब दस- बारह जगह मुड़ने के बाद गंगा और श्रीमठ के दर्शन होते हैं. जब गलियों में ज्यादा भीड़ नहीं होती और जगदगुरु के पास पूरा समय होता है तो वे भी गलियों से होते हुए लोगों को दर्शन देते हुए निकलते हैं.


बस इतना ही बचा है श्रीमठ, ऊपरी मंजिल अर्थात पांचवी मंजिल पर महाराज के विश्राम का कमरा है, यह कमरा भी छोटा ही है, सुविधा के बहुत जरूरी सामान ही यहाँ हैं. जब यह कमरा नहीं बना था तब महाराज वर्षों तक चतुर्थ मंजिल में रामजी के बगल वाले छोटे से कमरे में रहते थे

चतुर्थ मंजिल पर रामजी के मंदिर के बाहर हॉल में महाराज के बैठने का स्थान झूला. यहाँ महाराज आगंतुकों से मिलते हैं.



समस्या का समाधान

भाग - चार
श्याम मनोहर कृष्ण तो एक ही थे, उनकी हजारों गोपियों और पत्नियां थीं, किन्तु किसी का ‘हार्ट फेल’ नहीं हुआ। किसी ने कृष्ण के विरुद्ध याचिका दायर नहीं की। गोपियां यदि मिलकर हंगामा करतीं, तो भागवत की कथा ही नहीं होती। आप कल्पना कीजिए, जिन्होंने अपना रोम-रोम श्यामसुन्दर को दे दिया, उनसे अधिक समर्पण, प्रेम, सेवा की भावना, आत्मीय भावना या जितने श्रेष्ठ भाव हैं, वो किसी में नहीं हैं और उसके बाद भी कोई बनावट नहीं है। फिर भी लोग कहते हैं कि कृष्ण जी बहुत प्रेमी हैं और भक्ति के आचार्य के रूप में गोपियों को देखा जाता है, उनसे ज्यादा प्रयोग और ज्ञान किसी को भक्ति का नहीं है। आचार्य क्या है? जिसने सर्वस्व को समझा और जिसने सम्पूर्ण जीवन का सार समझा और जीवन में उतारा, उसी को आचार्य कहते हैं। आज तो आचार्य बनाने वालों को ही आचार्य शब्द के अर्थ का ज्ञान नहीं है। भ्रष्टाचार और आतंकवाद के विरुद्ध आंदोलन करने वाले को भ्रष्टाचार का ज्ञान नहीं है। अन्ना हजारे से कोई पूछे कि भ्रष्टाचार आपको सिर्फ धन का ही दिख रहा है? आज तो ऐसी स्थिति हो गई है कि कोई घर आता है, तो कोई पानी भी नहीं पूछता। आचार्य भी आते हैं, तो कोई बैठने को नहीं कहता। मेरे सामने लोग कुर्सी पर बैठने में संकोच करते हैं, किन्तु जिनके पैरों में कष्ट होता है, उन्हें मैं स्वयं कुर्सी पर बैठने के लिए कहता हूं, यही शिष्टाचार है। यदि आचार्य ही भ्रष्ट होंगे, तो उनका कोई महत्व नहीं रह जाएगा। मैं कह देता हूं कि वरिष्ठता का हनन करके लोकतंत्र में यदि किसी जूनियर को आगे ले आया जा रहा है, तो यह भ्रष्टाचार है या नहीं? ऐसे सामाजिक-मानसिक भ्रष्टाचार के सामने धन का भ्रष्टाचार भी छोटा लगता है। सास आए और बहू बैठने को भी न कहे, तो कैसे चलेगा?
आज लोगों को भ्रष्टाचार का वास्तविक स्वरूप ही समझ में नहीं आ रहा है। ऐसे भ्रष्ट आचरण पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चला रहे लोग भी चुप हैं।
रामजी का जो अभियान है, उसे देखना चाहिए। रामजी ने साधन का संग्रह नहीं किया, किसी पार्टी या किसी जाति या किसी अमुक की कोई भी अपेक्षा नहीं की, जो मिलता गया, उसे जोड़ लिया, सुग्रीव मिले, तो उन्हें जोड़ा, जामवंत मिले, तो उनको जोड़ा। निषादराज मिले, तो उनको और अनेक-अनेक व्यक्तियों को अपने साथ जोड़ा।
रामजी ने कहा कि हमारे पास कुछ नहीं है कि आपको वेतन देंगे, जैसे मैं फलाहार करता हूं, आप भी करिए, नंगे पांव मैं हूं, आप भी चलिए।
आप सोचिए, यदि मैं रोज इत्र लगाकर यहां बन-ठनकर ब्यूटीपार्लर से सजकर आऊं, तो मैं आपको कैसा उपदेश दूंगा या कैसा उपदेश दे सकूंगा। आज यही हो रहा है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन करने वालों को चुनाव प्रचार में नहीं जाना चाहिए था। मेरा कहना है, कांग्रेस ने चालीस साल निरंतर राज किया, तो अवश्य उसका पैसा विदेशी बैंक में होगा, किन्तु जिन्होंने छह साल राज किया, उनका भी तो होगा, भले कुछ कम ही हो। उन लोगों को साथ नहीं जोडऩा चाहिए था, यदि आपने उनको जोड़ा, तो लगा कि आप उनके इशारे पर काम कर रहे हैं। ये लोग रामराज्य की बात क्या करेंगे? इनके साथ कितने सच्चे लोग हैं? रामजी के अभियान में बहुत लोग थे और सभी त्यागी, समर्पित, नि:स्वार्थ। क्या रामराज्य चंद लोगों के दम पर ही आ जाएगा? ध्यान रहे, रामराज्य लानेे के लिए त्रेता युग में भी रामजी को सेना बनानी पड़ी थी। आज अनेक बड़े-बड़े संत हैं, उन्हें साथ नहीं लिया जा रहा है। आंदोलन या अभियान कैसे चलेगा, यह पता ही नहीं है। जिस आदमी को यह ज्ञान नहीं है कि अनशन कैसे तोड़ा जाता है, किसके हाथों से रस पिया जाता है, वह कैसे और कितना सफल होगा?
उधर रामजी को देखिए, अपने समय के महान चिंतकों, मनिषियों, ऋषियों के पास आश्रमों में जा-जाकर रामजी दंडवत करते हैं। रामराज्य की स्थापना के कुछ सूत्र हैं, उन्हें अपनाना पड़ेगा। जो सात्विक जीवन के लोग हैं, जिनके जीवन में दाग मात्र नहीं हैं, उनसे आप सहयोग लें, प्रेरणा प्राप्त करें, उनसे आपका आधार बन जाएगा। यह आपके लिए औषधि बन जाएगी। शल्य क्रिया की भी आपके पास तैयारी होनी चाहिए। जैसे अफगानिस्तान में नाटो सेना वाले संहार करते हैं और बाद में जाकर सडक़ बनाना, विधानसभा बनाना और इसमें भारत से भी सहयोग दिया जाता है। शल्य क्रिया के उपरांत दवा देना, मरहम पट्टी करना यह सब जरूरी है। सकारात्मक परिवर्तन की तैयारी हर तरह से होनी चाहिए। रामराज्य में विचारों से परिवर्तन होगा, उसके लिए प्रयास करना होगा, किन्तु आज दुनिया का कौन-सा संगठन है, जो रामजी के अभियान से प्रेरणा ले रहा है?
सभी ऋषियों, मुनियों के आश्रम में रामजी जाते हैं, वोट मांगने के लिए नहीं जाते हैं, उनके विचारों का संग्रह करने, उन विचारों का प्रयोग करने, उन विचारों को अपने जीवन में उतारने के लिए जाते हैं। जरा देखिए तो कि गुरु वशिष्ठ जी के प्रति रामजी में कितना आदर का भाव है। जब आप श्रेष्ठ जन के प्रति आदर का भाव ही नहीं रखेंगे, तो आप क्या श्रेष्ठ पद का उपयोग कर पाएंगे? रामजी ने विश्वास के साथ शुरुआत किया कि राम भाव के विकास की परंपरा, योजना चलनी चाहिए।
हम दुनिया की बात बाद में करेंगे, अपने देश में जिन लोगों ने शताब्दियों तक समाज को प्रभावित किया, जिनके जीवन में क्षण-क्षण में राष्ट्रीय भावना है, मानवता की भावना है, राम राज्य की भावना है, वे सभी लोग पवित्र जीवन के लोग हैं, इनका आचरण और धर्म भी पवित्र है। शास्त्रों से जो ऊर्जा निकल रही है, ये उसके पक्षधर हैं। आज भ्रष्टाचार कहां नहीं हो रहा है? आदि शंकराचार्य ने चार मठ बनाए थे, उनके किसी मठ पर उनका कोई भाई-भतीजा नहीं है, किन्तु अब मठों में क्या हो रहा है, यह भी तो देखा जाए। राम भाव के प्रकाश में जीवन सुधार की आवश्यकता है। क्रमश: