धर्म के ज्ञान से ही व्यक्ति को जीने की कला आती है.
Sunday, 2 October 2016
महर्षि भारद्वाज : राम कथा के अनुपम प्रेमी
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| जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी |
भारद्वाज जी ने भी आभार जताया। भारद्वाज जी ने कहा कि मैंने जीवन में जो भी तप किया था, उसके फलस्वरूप हमें राम जी वनवासी रूप में प्राप्त हुए। वे भले ही लीला कर रहे हैं, किन्तु वे पूर्ण ब्रह्म हैं। वही सृष्टि के पालक, संचालक, संहारक हैं। ऐसे भगवान का दर्शन हुआ, लेकिन उस दर्शन का जो फल है, उसके परिणाम स्वरूप ही आपके दर्शन हुए। हमारा जीवन धन्य हुआ।
महर्षि भारद्वाज ने कहा कि
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।।
सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा।।
भारद्वाज जी ने स्वयं को धन्य माना।
भगवान अपने भक्तों को अपने से भी बड़ा मानते हैं। मेरा तो जीवन धन्य हो गया। उनके दर्शन से भी आपका दर्शन श्रेष्ठ है, उस दर्शन का फल है आपका दर्शन।
राम वियोग से पीडि़त भरत जी को सांत्वना देते हुए भारद्वाज जी ने अनेक तरह की बातें सुनाईं और चाह रहे थे कि भरत के मन में कोई विद्वेष उत्पन्न नहीं हो। अयोध्या का जो ऐतिहासिक और विश्व के लिए गौरव वाला संप्रभुता संपन्न अयोध्या का रघुवंश और वहां का जो साम्राज्य है, वह कोई छोटा-मोटा साम्राज्य नहीं है, पूरी दुनिया के लोग उससे प्रेरणा लेते हैं। वे उसे सर्वस्व सम्मान अर्पित करने की जगह मानते हैं। भरत के मन में यह बात चल रही थी कि अब राम जी हमारे लिए क्या सोचते हैं। राम जी देखेंगे, तो क्या बोलेंगे, कैसा व्यवहार करेंगे और भारद्वाज जी इसका संपूर्ण निराकरण करना चाहते हैं। दूसरे रामायणों में एक संकेत है, भारद्वाज जी ने कहा, जो काम नहीं करना चाहिए ऋषि परंपरा में रहने वालों को, वह भी मैंने किया।
ऋषि को जहां पति-पत्नी शयन, विश्राम कर रहे हों, वहां से गुजरना भी नहीं चाहिए। उन्हें सुनना, देखना नहीं चाहिए। यह बात मालूम होनी चाहिए कि राम जी १४ वर्ष के लिए जा रहे हैं। पिता को दिए वचन के पालन के लिए जा रहे हैं, मैं जानना चाहता था कि राम जी क्या सोच रहे हैं।
महर्षि भारद्वाज ने कहा कि मैंने रात्रि में कान लगाकर सुना कि राम जी, जानकी जी और लक्ष्मण जी क्या बात कर रहे हैं। उनके पूरे वार्तालाप में भरत के लिए कोई कलुषित भावना या प्रतिशोध की भावना नहीं थी। राम जी ने ऐसी कोई चर्चा नहीं की।
कैकयी ने वरदान मांगा था कि राजा हो जाए मेरा बेटा और राम जी वनवासी हो जाएं। भारद्वाज ऋषि के आश्रम में रात्रि भर राम जी सोए नहीं, केवल भरत की चर्चा करते रहे।
सुनहू भरत रघुवर मन माहीं। प्रेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं।।
लखन राम सीतहि अति प्रीति। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती।।
लखन जी, राम जी, जानकी जी के मन में तुम्हारे लिए बहुत प्रेम है। जितना अपने लिए प्रेम है, दूसरों के लिए प्रेम है, उससे भी ज्यादा तुम्हारे लिए प्रेम है। जिसके लिए प्रेम होता है, उसी के लिए चर्चा होती है।
आजकल गुरु जीवन जीने वाले लोग राष्ट्र के लिए चिंतित नहीं रहते, वे सोचते हैं कि हमें राष्ट्र से क्या लेना-देना। राष्ट्र के लिए कितने चिंतित हैं भारद्वाज जी? राम कथा वस्तुत: उनके रोम-रोम में प्रवाहित हो रही है। सही रूपों में प्रवाहित हो रही है, तभी तो उनको राम राज्य के लिए कितनी चिंता है। जब राष्ट्र ही नहीं रहेगा, तब संत कहां रहेंगे, कहां गुरु रहेंगे? ऋषियों को राज्य की बड़ी चिंता रहती है। राज्य अच्छे होंगे, तभी तो अच्छी तरह से धर्म-कर्म होंगे। ऋषि समस्याओं के लिए चिंतित होता था, निदान खोजता था, निदान के लिए समर्पित होता था, तभी समाधान होता था। किसानों का भी राष्ट्र है, कर्मचारियों का भी राष्ट्र है, सबमें राष्ट्रहित की जागरुकता होनी ही चाहिए। भरत जी को बहुत आनंद हुआ। अत्यंत विश्वास की प्राप्ति हुई। ऋषियों को हमारे लिए कितनी चिंता है। कभी भरत जी सोच भी नहीं सकते थे कि राम जी को जंगल में जाना पड़ेगा। भरत जी ने भारद्वाज ऋषि से कहा, आपने मुझे जीवन दान दिया, मैं तो डूबता जा रहा था। राम जी मुझसे कितना प्रेम करते थे, अब वे क्या सोचते होंगे। कितनी दुर्भावना उनके मन में आती होगी। मैं ऋणी हूं। रघुवंश आपका ऋणी रहेगा।
महर्षि भारद्वाज अत्यंंत जागरूक ऋषि है। ऋषि समाज, देश के लिए भी जागरूक होता था। उसे केवल अपनी भलाई की चिंता नहीं रहती थी। उसकी चिंता है कि हमें भी कोई पीड़ा नहीं हो और दूसरों को भी नहीं हो। हमारा जीवन जैसे प्रकाशित हुआ, वैसे ही दूसरों का जीवन भी प्रकाशित हो।
भारद्वाज जी की प्रेरणा से भरत जी को बड़ा संबल मिला। भरत जी भी भारद्वाज जी के आशीर्वाद से राम मिलन की यात्रा में आगे बढ़े।
राम जी को भगवान के रूप में प्रचारित करने का काम, रघुवंशियों के चरित्र को प्रचारित करने का कार्य भारद्वाज जी ने किया। राम जीवन के सबसे बड़े प्रचारक भारद्वाज जी ही है।
आजकल आश्रमों का निर्माण बहुत हो रहा है। संसाधनों के संग्रह से हो रहा है, सत्संग नहीं हो रहा है। संत खोजते हैं कि आश्रम मिल जाएं, संसाधन मिल जाएं, मठ बन जाएं। आश्रम जैसे-तैसे मिल जाता है, लेकिन उनका संतत्व, गुरुत्व अधूरा रह जाता है। वे संपूर्ण संतत्व से बहुत दूर रह जाते हैं। संतत्व को परिपक्व बनाने में आज के लोग पिछड़े जा रहे हैं। महर्षि वाल्मीकि ने कहा था कि वह क्या राष्ट्र है, जहां राम के लिए गौरव न हो। वह आश्रम क्या है, जहां राम चर्चा न हो। आज समाज को कौन-सा ऐसा आदर्श दिया जा सकता है, जिससे परिवर्तन आए, क्रांति आए। राम का संपूर्ण जीवन, उन सभी तत्वों से भरपूर है, अप्लावित है। राम जी मनुष्य जीवन को पूर्ण जीवन बना सकते हैं। कितना बड़ा स्वरूप है भगवान श्रीराम का। महर्षि भारद्वाज के आश्रम में निरंतर राम चर्चा का आयोजन होता रहता था। हमारे आश्रमों में भी जो बड़े संत आज भी हैं, सभी को राम चर्चा से जुडक़र अपने जीवन को दिव्य बनाने का प्रयास करना चाहिए। रामकथा का अर्जन कहीं-कहीं, कभी-कभी देखने को मिलता है। राम कथा रूपी गंगा निरंतर बहती रहनी चाहिए। सबको राम भक्ति की शक्ति मिलनी चाहिए, रामकथा-गंगा कभी बाधित नहीं होनी चाहिए।
जय श्री राम।
महर्षि भारद्वाज : राम कथा के अनुपम प्रेमी
भाग - ३
घर में हम परिवार की चर्चा करते हैं, बाहर निकलते हैं, तो संसार की चर्चा करते हैं, लेकिन हरि चर्चा नहीं होती। राम जी से जुडऩा चाहिए। हमारा विकास होना चाहिए, राम जी से हमें प्रीत होनी चाहिए। वह आजकल नहीं हो रहा है, हमारा जीवन केवल भौतिक बनकर रह जाता है, जीवन का परम उद्देश्य प्राप्त नहीं हो पाता है, हम साधना से दूर रह जाते हैं। सभी मनुष्यों को चाहे वे किसी भी भाषा, चिंतन के हों, संसार के सभी लोगों को ईश्वर के प्रति जुडऩा चाहिए। ईश्वर से जुड़ेंगे, तो हम बोलेंगे, तो दूसरा सुनेगा और दूसरा बोलेगा, तो हम सुनेंगे। जो मर्मज्ञ लोग हैं, जिन्होंने अपना जीवन धन्य कर लिया है या वे जो सामान्य रूप से अभी जान रहे हैं, हमें ईश्वर चर्चा से निरंतरता के साथ जुडऩा चाहिए। सत्संग से ही हमारा जीवन सफल होगा। जो परम ऊंचाई को प्राप्त लोग हैं, जैसे महर्षि याज्ञवल्क्य, उनकी बातों को सुनना ही चाहिए, परम कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
मानव जीवन की सफलता के लिए राम चर्चा होनी ही चाहिए। भगवान की दया से भारद्वाज जी की प्रेरणा से याज्ञवल्क्य जी ने रामकथा को पूरी गहराई के साथ सुनाना शुरू किया। उनमें व्याख्यान की अद्भुत क्षमता थी, श्रोता अच्छे होते हैं, तो वक्ता का मन अति उत्साहित हो जाता है। तो भारद्वाज जी के माध्यम से प्रेरणा प्राप्त करके भगवान की महिमा को उन्होंने सुनाया। उन्हें परमानंद की अनुभूति हुई, जीवन का हर क्षण हर काल हर प्रबंध सभी सार्थक हो गए। अनभिज्ञता की बात कहीं नहीं रह गई।
आज के आश्रमों के सभी लोगों को इससे प्रेरणा लेने की जरूरत है। भौतिक चर्चा के साथ-साथ ईश्वर चर्चा भी होनी चाहिए। इससे ही हमारा जीवन सुधरेगा, हमारे जीवन में क्रांति आएगी, इससे हमारा जीवन प्रभावित होगा। अयोध्या से निकलने के बाद वनवास के लिए भगवान राम जब प्रयाग पहुंचते हैं, तब भारद्वाज जी के आश्रम में रुकते हैं। विशाल आत्मीय भाव और दिव्य तप और जप से भगवान श्रीराम अत्यंत प्रभावित हुए। महर्षि जी को मालूम हुआ कि राम जी को वनवास हुआ है, वे १४ वर्ष के लिए वन में रहेंगे और उनके छोटे भाई भरत राज्य संभालेंगे।
राम जी ने भारद्वाज जी को दंडवत किया, राम जी तपस्वी वेश में हैं। लीला का क्रम चल रहा है, महर्षि को सम्मान देना चाहिए। भारद्वाज जी ने भी उनका बड़ा सम्मान किया। ज्ञान, विज्ञान की चर्चाएं हुईं। राम जी के मन को टटोल करके उन्होंने पूछा, ‘आपके वनवास से रामराज्य की स्थापना में बहुत बल मिलेगा, जहां का राजा ही त्यागी हो, वहां प्रजा का तो विश्वास बनेगा, संबल मिलेगा ही।’
आपकी आज्ञा का पालन होना ही चाहिए। यहां रहूंगा, तो लोगों का आना-जाना लगा रहेगा, यहां एकांत में साधना का अवसर नहीं बनेगा। मैं लोगों की सेवा के लिए आया हूं, मैं यहां रहकर अयोध्या में ही रहने लगूंगा, इसलिए आप मुझे बताइए कि मैं कहां जाऊं।’
भगवान की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए महर्षि भारद्वाज जी ने राम जी को आगे का मार्ग बताया। राम जी वहां चले गए, वहां निवास किया। जीवन में हर तरह के मार्गदर्शकों की जरूरत होती है, शुभचिंतकों की जरूरत होती है। जिन लोगों को ज्ञान, विज्ञान प्राप्त हो, ऐसे लोगों का जीवन की सार्थकता के लिए निर्देशन लेना जरूरी है, इसलिए भगवान श्रीराम ने भारद्वाज जी से निर्देशन लिया। राम जी जब चित्रकूट चले गए, तब भरत जी प्रयाग पहुंचे। भरत जी पूरे दल-बल के साल राम जी को अयोध्या लौटाने के लिए चले थे। वे भारद्वाज जी के आश्रम पहुंचे। जैसे भारद्वाज जी ने राम जी का सम्मान किया था, वैसा ही सम्मान उन्होंने भरत जी का भी किया। भरत जी के साथ गए सभी परिजनों प्रजाजनों का भारद्वाज जी ने सम्मान किया। सत्कार का पूरा प्रबंध किया। जो किसी लौकिक व्यक्ति द्वारा संभव नहीं था, ऐसा सत्कार किया। भरत जी ने भव्यता का अनुभव किया।
क्रमश:
घर में हम परिवार की चर्चा करते हैं, बाहर निकलते हैं, तो संसार की चर्चा करते हैं, लेकिन हरि चर्चा नहीं होती। राम जी से जुडऩा चाहिए। हमारा विकास होना चाहिए, राम जी से हमें प्रीत होनी चाहिए। वह आजकल नहीं हो रहा है, हमारा जीवन केवल भौतिक बनकर रह जाता है, जीवन का परम उद्देश्य प्राप्त नहीं हो पाता है, हम साधना से दूर रह जाते हैं। सभी मनुष्यों को चाहे वे किसी भी भाषा, चिंतन के हों, संसार के सभी लोगों को ईश्वर के प्रति जुडऩा चाहिए। ईश्वर से जुड़ेंगे, तो हम बोलेंगे, तो दूसरा सुनेगा और दूसरा बोलेगा, तो हम सुनेंगे। जो मर्मज्ञ लोग हैं, जिन्होंने अपना जीवन धन्य कर लिया है या वे जो सामान्य रूप से अभी जान रहे हैं, हमें ईश्वर चर्चा से निरंतरता के साथ जुडऩा चाहिए। सत्संग से ही हमारा जीवन सफल होगा। जो परम ऊंचाई को प्राप्त लोग हैं, जैसे महर्षि याज्ञवल्क्य, उनकी बातों को सुनना ही चाहिए, परम कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
मानव जीवन की सफलता के लिए राम चर्चा होनी ही चाहिए। भगवान की दया से भारद्वाज जी की प्रेरणा से याज्ञवल्क्य जी ने रामकथा को पूरी गहराई के साथ सुनाना शुरू किया। उनमें व्याख्यान की अद्भुत क्षमता थी, श्रोता अच्छे होते हैं, तो वक्ता का मन अति उत्साहित हो जाता है। तो भारद्वाज जी के माध्यम से प्रेरणा प्राप्त करके भगवान की महिमा को उन्होंने सुनाया। उन्हें परमानंद की अनुभूति हुई, जीवन का हर क्षण हर काल हर प्रबंध सभी सार्थक हो गए। अनभिज्ञता की बात कहीं नहीं रह गई।
आज के आश्रमों के सभी लोगों को इससे प्रेरणा लेने की जरूरत है। भौतिक चर्चा के साथ-साथ ईश्वर चर्चा भी होनी चाहिए। इससे ही हमारा जीवन सुधरेगा, हमारे जीवन में क्रांति आएगी, इससे हमारा जीवन प्रभावित होगा। अयोध्या से निकलने के बाद वनवास के लिए भगवान राम जब प्रयाग पहुंचते हैं, तब भारद्वाज जी के आश्रम में रुकते हैं। विशाल आत्मीय भाव और दिव्य तप और जप से भगवान श्रीराम अत्यंत प्रभावित हुए। महर्षि जी को मालूम हुआ कि राम जी को वनवास हुआ है, वे १४ वर्ष के लिए वन में रहेंगे और उनके छोटे भाई भरत राज्य संभालेंगे।
राम जी ने भारद्वाज जी को दंडवत किया, राम जी तपस्वी वेश में हैं। लीला का क्रम चल रहा है, महर्षि को सम्मान देना चाहिए। भारद्वाज जी ने भी उनका बड़ा सम्मान किया। ज्ञान, विज्ञान की चर्चाएं हुईं। राम जी के मन को टटोल करके उन्होंने पूछा, ‘आपके वनवास से रामराज्य की स्थापना में बहुत बल मिलेगा, जहां का राजा ही त्यागी हो, वहां प्रजा का तो विश्वास बनेगा, संबल मिलेगा ही।’
आपकी आज्ञा का पालन होना ही चाहिए। यहां रहूंगा, तो लोगों का आना-जाना लगा रहेगा, यहां एकांत में साधना का अवसर नहीं बनेगा। मैं लोगों की सेवा के लिए आया हूं, मैं यहां रहकर अयोध्या में ही रहने लगूंगा, इसलिए आप मुझे बताइए कि मैं कहां जाऊं।’
भगवान की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए महर्षि भारद्वाज जी ने राम जी को आगे का मार्ग बताया। राम जी वहां चले गए, वहां निवास किया। जीवन में हर तरह के मार्गदर्शकों की जरूरत होती है, शुभचिंतकों की जरूरत होती है। जिन लोगों को ज्ञान, विज्ञान प्राप्त हो, ऐसे लोगों का जीवन की सार्थकता के लिए निर्देशन लेना जरूरी है, इसलिए भगवान श्रीराम ने भारद्वाज जी से निर्देशन लिया। राम जी जब चित्रकूट चले गए, तब भरत जी प्रयाग पहुंचे। भरत जी पूरे दल-बल के साल राम जी को अयोध्या लौटाने के लिए चले थे। वे भारद्वाज जी के आश्रम पहुंचे। जैसे भारद्वाज जी ने राम जी का सम्मान किया था, वैसा ही सम्मान उन्होंने भरत जी का भी किया। भरत जी के साथ गए सभी परिजनों प्रजाजनों का भारद्वाज जी ने सम्मान किया। सत्कार का पूरा प्रबंध किया। जो किसी लौकिक व्यक्ति द्वारा संभव नहीं था, ऐसा सत्कार किया। भरत जी ने भव्यता का अनुभव किया।
क्रमश:
महर्षि भारद्वाज : राम कथा के अनुपम प्रेमी
भाग - २
दर्शन शास्त्र में बहुत महत्वपूर्ण बात बताई जाती है, विद्वता कैसे पैदा होती है, जिज्ञासा होती है, तभी विद्वता की शुरुआत होती है। जिज्ञासा वहां होती है, जहां संदेह रहता है, यह नियम है। जिसके सम्बंध में हमारा आकर्षण है, जिससे लाभ या हानि होने वाली है, ज्यों ही हम यह जानने की इच्छा करते हैं, जिज्ञासा होती है, फिर उसके बाद ही समाधान निकलता है, विद्वता उत्पन्न होती है।
भारद्वाज जी ने संदेह जताया। एक राम ने रावण के सभी करीबियों को मारा, जो अपनी पत्नी के अपहरण के बाद विलाप कर रहे थे, एक राम वह भी हैं, जिनकी महिमा गाई जा रही है, क्या वही व्यक्ति सामान्य लोगों के समान रो रहा है, बिलख रहा है, क्या यह वही राम हैं, जिनके नाम का भगवान शंकर जैसे देवता जप करते हैं। भगवान शंकर जी से पार्वती जी ने भी यही पूछा था, रामायण में लिखा है। भगवान शंकर से कहती हैं, आप दिन रात, राम, राम जपते रहते हैं, अत्यंत आदर के साथ जपते हैं। आपकी संपूर्ण शक्ति राम नाम जप रही है। आप जो चाहते हैं, वही होता है।
तो भारद्वाज जी वस्तुत: संशयग्रस्त नहीं हैं। जिज्ञासा के प्रयोजक तत्व हैं, संदेह, संशय, प्रयोजन। जिसे प्रयोजन नहीं होगा, वह संदेह नहीं करेगा, जिसे संदेह नहीं होगा, वह जिज्ञासा नहीं करेगा।
भारद्वाज जी ने जिज्ञासा की, ‘राम तत्व का अवलोकन करके बताइए, हृदय में हलचल है कि ये दो राम हैं या एक ही राम हैं?’
भारद्वाज जी संदेहग्रस्त नहीं हैं, लेकिन लिखा है शास्त्रों में कि ब्रह्म तत्व का ज्ञान होने पर ब्रह्म तत्व की चर्चा बंद नहीं होनी चाहिए, ठीक इसी तरह से राम तत्व का ज्ञान होने के बाद भी राम नाम श्रवण, चिंतन बंद नहीं होना चाहिए। ऐसे ही राम से संयुक्त कोई भी अनुष्ठान बंद नहीं होते। ईश्वर तत्व के ज्ञान के बाद छोटा व्यापार नहीं चलेगा, बड़ा व्यापार भी नहीं चलेगा, वह राम तत्व में ही लगा रहेगा। लोकनीति को ध्यान में रखकर पुरुषार्थ की परंपरा नहीं होती। ब्रह्म चर्चा हो, मर्यादित चर्चा हो। यह अनुपालन नहीं है, यह स्वभाव है। भारद्वाज जी ने महर्षि याज्ञवल्क्य जी जो मेले में आए थे, प्रयाग में आए थे, उनसे प्रश्न किया। प्रश्न के पीछे राम चर्चा के बिना एक क्षण न रहने वाली जो बात है, उसे उजागर किया। महर्षि याज्ञवल्क्य जैसा महात्मा हर किसी को प्राप्त नहीं हो सकता, तो मैं भी जिज्ञासु बनता हूं और ईश्वर को स्मरण करता हूं।
याज्ञवल्क्य जी ने कहा, ‘आप परम ज्ञानी हैं, आप सभी तत्वों से परिचित हैं, आपसे ज्यादा राम जी के सम्बंध में कौन जानता है? मैं समझ रहा हूं आपकी बात को, आप इसी बहाने राम चर्चा करवाना चाहते हैं, नहीं तो आपको कोई संदेह नहीं है, कोई अज्ञान नहीं है। चर्चा होगी, तो असंख्य लोग लाभ उठाएंगे, एक परंपरा शुरू होगी।’
समय ऐसे ही बिताना चाहिए, समय का संपूर्ण सदुपयोग होना चाहिए। भारद्वाज जी का जो प्रश्न है, राम जी के संदर्भ में वह उत्पादक संदेह है। वेदों में लिखा है, स्वाध्याय और प्रवचन से कभी विराम नहीं लेना चाहिए। मोक्ष की चर्चा होती रहनी चाहिए, मोक्ष को सुनना, समझना आवश्यक है।
शास्त्रों में जो तत्व मानव जीवन को उत्कर्ष देने वाले हैं, मानव जीवन की सफलता के जो सफल कारण हैं, उनकी चर्चा हमेशा होती रहनी चाहिए। हम सभी लोगों को इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। महर्षि भारद्वाज को सबकुछ मालूम है राम तत्व के बारे में, लेकिन तब भी वे महर्षि याज्ञवल्क्य के माध्यम से सुनना चाहते हैं, ताकि लोग अधिक से अधिक लाभ उठाएं।
क्रमश:
दर्शन शास्त्र में बहुत महत्वपूर्ण बात बताई जाती है, विद्वता कैसे पैदा होती है, जिज्ञासा होती है, तभी विद्वता की शुरुआत होती है। जिज्ञासा वहां होती है, जहां संदेह रहता है, यह नियम है। जिसके सम्बंध में हमारा आकर्षण है, जिससे लाभ या हानि होने वाली है, ज्यों ही हम यह जानने की इच्छा करते हैं, जिज्ञासा होती है, फिर उसके बाद ही समाधान निकलता है, विद्वता उत्पन्न होती है।
भारद्वाज जी ने संदेह जताया। एक राम ने रावण के सभी करीबियों को मारा, जो अपनी पत्नी के अपहरण के बाद विलाप कर रहे थे, एक राम वह भी हैं, जिनकी महिमा गाई जा रही है, क्या वही व्यक्ति सामान्य लोगों के समान रो रहा है, बिलख रहा है, क्या यह वही राम हैं, जिनके नाम का भगवान शंकर जैसे देवता जप करते हैं। भगवान शंकर जी से पार्वती जी ने भी यही पूछा था, रामायण में लिखा है। भगवान शंकर से कहती हैं, आप दिन रात, राम, राम जपते रहते हैं, अत्यंत आदर के साथ जपते हैं। आपकी संपूर्ण शक्ति राम नाम जप रही है। आप जो चाहते हैं, वही होता है।
तो भारद्वाज जी वस्तुत: संशयग्रस्त नहीं हैं। जिज्ञासा के प्रयोजक तत्व हैं, संदेह, संशय, प्रयोजन। जिसे प्रयोजन नहीं होगा, वह संदेह नहीं करेगा, जिसे संदेह नहीं होगा, वह जिज्ञासा नहीं करेगा।
भारद्वाज जी ने जिज्ञासा की, ‘राम तत्व का अवलोकन करके बताइए, हृदय में हलचल है कि ये दो राम हैं या एक ही राम हैं?’
भारद्वाज जी संदेहग्रस्त नहीं हैं, लेकिन लिखा है शास्त्रों में कि ब्रह्म तत्व का ज्ञान होने पर ब्रह्म तत्व की चर्चा बंद नहीं होनी चाहिए, ठीक इसी तरह से राम तत्व का ज्ञान होने के बाद भी राम नाम श्रवण, चिंतन बंद नहीं होना चाहिए। ऐसे ही राम से संयुक्त कोई भी अनुष्ठान बंद नहीं होते। ईश्वर तत्व के ज्ञान के बाद छोटा व्यापार नहीं चलेगा, बड़ा व्यापार भी नहीं चलेगा, वह राम तत्व में ही लगा रहेगा। लोकनीति को ध्यान में रखकर पुरुषार्थ की परंपरा नहीं होती। ब्रह्म चर्चा हो, मर्यादित चर्चा हो। यह अनुपालन नहीं है, यह स्वभाव है। भारद्वाज जी ने महर्षि याज्ञवल्क्य जी जो मेले में आए थे, प्रयाग में आए थे, उनसे प्रश्न किया। प्रश्न के पीछे राम चर्चा के बिना एक क्षण न रहने वाली जो बात है, उसे उजागर किया। महर्षि याज्ञवल्क्य जैसा महात्मा हर किसी को प्राप्त नहीं हो सकता, तो मैं भी जिज्ञासु बनता हूं और ईश्वर को स्मरण करता हूं।
याज्ञवल्क्य जी ने कहा, ‘आप परम ज्ञानी हैं, आप सभी तत्वों से परिचित हैं, आपसे ज्यादा राम जी के सम्बंध में कौन जानता है? मैं समझ रहा हूं आपकी बात को, आप इसी बहाने राम चर्चा करवाना चाहते हैं, नहीं तो आपको कोई संदेह नहीं है, कोई अज्ञान नहीं है। चर्चा होगी, तो असंख्य लोग लाभ उठाएंगे, एक परंपरा शुरू होगी।’
समय ऐसे ही बिताना चाहिए, समय का संपूर्ण सदुपयोग होना चाहिए। भारद्वाज जी का जो प्रश्न है, राम जी के संदर्भ में वह उत्पादक संदेह है। वेदों में लिखा है, स्वाध्याय और प्रवचन से कभी विराम नहीं लेना चाहिए। मोक्ष की चर्चा होती रहनी चाहिए, मोक्ष को सुनना, समझना आवश्यक है।
शास्त्रों में जो तत्व मानव जीवन को उत्कर्ष देने वाले हैं, मानव जीवन की सफलता के जो सफल कारण हैं, उनकी चर्चा हमेशा होती रहनी चाहिए। हम सभी लोगों को इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। महर्षि भारद्वाज को सबकुछ मालूम है राम तत्व के बारे में, लेकिन तब भी वे महर्षि याज्ञवल्क्य के माध्यम से सुनना चाहते हैं, ताकि लोग अधिक से अधिक लाभ उठाएं।
क्रमश:
महर्षि भारद्वाज : राम कथा के अनुपम प्रेमी
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| जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी |
ऋषियों का राम जी के साथ बड़ा प्रेम था और राम जी को ऋषियों से बड़ा पे्रेम था। ऋषियों की जो श्रेष्ठ परंपरा है, उसके अनुरूप भारद्वाज ऋषि ने मानवीय जीवन को ऋषित्व तक पहुंचाया और अनेक तरह की साधना करके, ईश्वर का साक्षात्कार संपादित करके, संपूर्ण जीवन को ईश्वर और मानवता के लिए समर्पित कर दिया। श्रेष्ठ ऋषि के रूप में भारद्वाज जी का नाम है। उनका निवास तीर्थराज प्रयाग में रहा, तीर्थों का जो राजा है। सनातन धर्म में चीजों का श्रेणीकरण है, सभी ने प्रयाग को तीर्थराज माना है। वहां मुख्य ऋषि के रूप में भारद्वाज जी का स्थान है। प्रयाग में तीन नदियों का संगम है, गंगा, यमुना, सरस्वती। इन तीन नदियों के पावन मंगलमय संगम पर भारद्वाज जी का आश्रम था, जहां वे निवास करते थे। जो भी उन्होंने ज्ञान, विज्ञान, जप, तप, संयम, नियम से अर्जित किया था, उससे वे अनेक लोगों को आलोकित करते थे। सब कुछ ईश्वर के लिए होता है, समष्टि के लिए होता है, संसार के लिए होता है। ऋषि जीवन केवल अपने को लाभान्वित करने के लिए नहीं होता। जैसे परिवार को चलाने के लिए उसका एक मुखिया बनाकर संचालन किया जाता है, ठीक उसी तरह से संत जन जप, तप, संयम, नियम से चलकर संपूर्ण ईश्वर को अर्पित रहते हैं और संपूर्ण संसार को ईश्वर का परिवार मानकर चलते हैं। ईश्वर सबके लिए समान रूप से है। संतों में भी ऋषियों में भी यही दशा या स्थिति होती है। भारद्वाज जी का प्रभाव विलक्षण था। महान चिंतकों में उनकी गणना होती थी, राम कथा को जन जन तक पहुंचाने में, राम कथा को प्रामाणिकता देने और उसे परम उपयोगी बनाने में भारद्वाज जी की बहुत बड़ी भूमिका है, ऐसा सभी लोग मानते हैं। वे निरंतर राम कथा का प्रवाह बनाए रखते थे। अपने आश्रम में राम कथा निरंतर उनकी प्रेरणा से चलती रहती थी। भारद्वाज जी रामभक्ति की परंपरा में अग्रणी ऋषि रहे हैं।
एक स्पष्ट उदाहरण है, अनादि परंपरा है, माघ मास में प्रयाग में मेला लगता है, जगह-जगह से लोग आते हैं, पूरे देश से और आकर नियम-कायदे से निवास करना, स्नान करना जप, तप करना, हवन करना, ईश्वर दर्शन करना और मेले में जहां भी सत्संग हो रहा है, वहां दर्शन-पूजन के लिए जाना, प्रवचन सुनने जाना। इतना बड़ा मेला दुनिया की किसी परंपरा नहीं है। लाखों लोग आते हैं, सत्संग का लाभ उठाते हैं, तो प्राचीन काल में जितने भी ऋषि, महर्षि आते थे, वे सभी भारद्वाज ऋषि के आश्रम में रुकते थे और सबको मान सम्मान मिलता था। वरिष्ठतम ऋषि तो वे थे ही उनसे सभी को लाभ होता था।
एक विचित्र घटना हुई। माघ मेले से महर्षि याज्ञवल्क्य जाने लगे, तो भारद्वाज ने कहा, ‘अभी आप मत जाइए, प्रेरणा हो रही है कि राम कथा सुनूं। राम अलग-अलग हैं या एक हैं? जो राजा दशरथ के यहां जन्म लिए, दशरथ कुमार हुए और सभी लोगों को ज्ञात है कौशल्या जी से उनका जन्म हुआ, वनवास भी हुआ और सीता जी का हरण हुआ, अनेक तरह से राम जी ने विलाप किया, अत्यंत रुष्ट हुए और रावण को मार दिया। एक तो यह राम हैं और दूसरे वो जिनके शंकर जी भी पुजारी हैं, जो श्रेष्ठ देवता हैं, संसार के नियामकों में से हैं। लोग राम जी का नाम लेते हैं, राम, राम, राम, निरंतर करते रहते हैं, ये दोनों राम एक ही हैं या अलग-अलग हैं?’
क्रमश:
Saturday, 24 September 2016
मरा मरा से राम राम तक
समापन भाग
भारत कोई विश्व गुरु ऐसे ही नहीं हो गया था। विश्व गुरुत्व का परम पद हम केवल डॉक्टर, इंजीनियर पैदा करके नहीं पा सकेंगे, जब तक ऋषियों से सम्बंधित भावनाएं जीवन में नहीं अवतरित होंगी, तब तक जीवन कमाऊ और खाऊ ही बना रहेगा।
राम जी और जानकी जी ने अपने बच्चों को जैसे पाला, वह आदर्श है। महर्षि वाल्मीकि मेरुदंड के समान उपयोगी और प्रामाणिक स्तंभ हैं। सारा जीवन उन्होंने राम जी के साथ मिलकर उनके भावों को उनके विचारों को मूर्त रूप देने में उनकी स्थापनाओं को मजबूती और संबल देने में लगाया। ऐसे ऋषियों की जरूरत है।
वैसे आजकल कई गुरुकुल खुल रहे हैं, लेकिन उनमें प्रतिष्ठा की इच्छा ज्यादा है। धन अर्जन की इच्छा ज्यादा है। अभी ऐसे ही एक गुरुकुल में मुझे जाने का अवसर मिला, मैंने देखा, गुरुकुल गौण हो गया है और ऐश्वर्य महत्वपूर्ण हो गया है। मैं कुरुक्षेत्र में गया था एक आश्रम में, सर्दी काल में बच्चों के शरीर पर पूरे वस्त्र नहीं थे, दरिद्रों के बच्चों की तरह, जब वस्त्र ही नहीं मिल रहा था, तो खाने को क्या मिल रहा होगा, जब भोजन ही नहीं मिलेगा, तो संस्कार क्या मिलेगा और विद्या क्या मिलेगी? गुरुकुल का लक्षण ऊपर से दिखता है, लेकिन गहराई में जाइए, तो पता चलता है कि गुरुकुल आज सही नहीं हैं। आज ज्यादातर गुरुकुल पैसा कमाने के लिए ही बनते हैं। सैंकड़ों गुरुकुल चल रहे हैं, लेकिन एक भी बड़ा विद्वान और संत पैदा नहीं कर रहे हैं, यह तो डकैती वाला काम हो रहा है। आज के गुरुकुल अच्छे संस्कार कहां दे रहे हैं। वाल्मीकि के गुरुकुल से अगर तुलना करें, तो पता चलेगा कि हम कितना पीछे हैं। पूरी मानव जाति के लिए वे समर्पित हैं, उनका रोम-रोम पुकार रहा है कि तुम ज्ञान पाओ और जीवन को धन्य बनाओ। ऐसे गुरुकुलों का प्रचलन करना चाहिए, उनसे लाभ उठाने की प्रेरणा भी बढऩी चाहिए। घर से बाहर रहकर बच्चा ऋषि भी बनेगा और साथ-साथ में एमबीएस डॉक्टर, इंजीनियर इत्यादि भी बनेगा। उसकी मनुष्यता पूर्णता को प्राप्त करेगी। ऐसे प्रयत्न सरकार के माध्यम से भी होने चाहिए। सरकार बहुत पैसे खर्च करती है विश्वविद्यालयों, स्कूलों में, लेकिन ऐसे बच्चे तैयार हो रहे हैं, जो केवल कमाएंगे और खाएंगे। जो आंतरिक विकास है अध्याम का, वह नहीं हो रहा है, इसके बिना भारत कभी विश्व गुरु नहीं बनेगा, कभी पूर्ण मानव जीवन नहीं बनेगा।
वाल्मीकि जी बड़े ज्ञाता ऋषि थे, वे राम जी को जानते थे। रामचरितमानस में लिखा है कि राम जी को चित्रकूट में रहने की सलाह वाल्मीकि जी ने ही दी थी। राम जी ने उनसे बहुत श्रद्धा पूर्वक पूछा था, तुलसीदास जी ने लिखा है -
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।।
ऐसा हृदय में समझकर, वह स्थान बतलाइए, जहां मैं सीता और लक्ष्मण सहित जाऊं।
वाल्मीकि जी भी भगवान राम को जान रहे थे, उन्होंने आगे उत्तर दिया -
पँूछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाऊँ।
जहँ न होहु तहँ कहि तुम्हहि देखावौं ठाऊँ।।
अर्थात आप मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं कहा रहूं। यहां मैं आपसे यह पूछते हुए सकुचा रहा हूं कि जहां आप न हों, वह जगह मुझे बता दीजिए, ताकि मैं आपके रहने के लिए जगह दिखा दूं।
उसके बाद राम जी के विराजने के लिए जो-जो स्थान भक्ति भाव से वाल्मीकि जी ने गिनाए, वो उनकी राम भक्ति का अनुपम प्रमाण हैं और अंत में व्यावहारिक रूप से उन्होंने राम जी को चित्रकूट में विराजने की सलाह दी।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि हम लोग भी राम भाव में योगदान करें, इस वातावरण में हमारी भी आहूति हो।
जय श्री राम।
भारत कोई विश्व गुरु ऐसे ही नहीं हो गया था। विश्व गुरुत्व का परम पद हम केवल डॉक्टर, इंजीनियर पैदा करके नहीं पा सकेंगे, जब तक ऋषियों से सम्बंधित भावनाएं जीवन में नहीं अवतरित होंगी, तब तक जीवन कमाऊ और खाऊ ही बना रहेगा।
राम जी और जानकी जी ने अपने बच्चों को जैसे पाला, वह आदर्श है। महर्षि वाल्मीकि मेरुदंड के समान उपयोगी और प्रामाणिक स्तंभ हैं। सारा जीवन उन्होंने राम जी के साथ मिलकर उनके भावों को उनके विचारों को मूर्त रूप देने में उनकी स्थापनाओं को मजबूती और संबल देने में लगाया। ऐसे ऋषियों की जरूरत है।
वैसे आजकल कई गुरुकुल खुल रहे हैं, लेकिन उनमें प्रतिष्ठा की इच्छा ज्यादा है। धन अर्जन की इच्छा ज्यादा है। अभी ऐसे ही एक गुरुकुल में मुझे जाने का अवसर मिला, मैंने देखा, गुरुकुल गौण हो गया है और ऐश्वर्य महत्वपूर्ण हो गया है। मैं कुरुक्षेत्र में गया था एक आश्रम में, सर्दी काल में बच्चों के शरीर पर पूरे वस्त्र नहीं थे, दरिद्रों के बच्चों की तरह, जब वस्त्र ही नहीं मिल रहा था, तो खाने को क्या मिल रहा होगा, जब भोजन ही नहीं मिलेगा, तो संस्कार क्या मिलेगा और विद्या क्या मिलेगी? गुरुकुल का लक्षण ऊपर से दिखता है, लेकिन गहराई में जाइए, तो पता चलता है कि गुरुकुल आज सही नहीं हैं। आज ज्यादातर गुरुकुल पैसा कमाने के लिए ही बनते हैं। सैंकड़ों गुरुकुल चल रहे हैं, लेकिन एक भी बड़ा विद्वान और संत पैदा नहीं कर रहे हैं, यह तो डकैती वाला काम हो रहा है। आज के गुरुकुल अच्छे संस्कार कहां दे रहे हैं। वाल्मीकि के गुरुकुल से अगर तुलना करें, तो पता चलेगा कि हम कितना पीछे हैं। पूरी मानव जाति के लिए वे समर्पित हैं, उनका रोम-रोम पुकार रहा है कि तुम ज्ञान पाओ और जीवन को धन्य बनाओ। ऐसे गुरुकुलों का प्रचलन करना चाहिए, उनसे लाभ उठाने की प्रेरणा भी बढऩी चाहिए। घर से बाहर रहकर बच्चा ऋषि भी बनेगा और साथ-साथ में एमबीएस डॉक्टर, इंजीनियर इत्यादि भी बनेगा। उसकी मनुष्यता पूर्णता को प्राप्त करेगी। ऐसे प्रयत्न सरकार के माध्यम से भी होने चाहिए। सरकार बहुत पैसे खर्च करती है विश्वविद्यालयों, स्कूलों में, लेकिन ऐसे बच्चे तैयार हो रहे हैं, जो केवल कमाएंगे और खाएंगे। जो आंतरिक विकास है अध्याम का, वह नहीं हो रहा है, इसके बिना भारत कभी विश्व गुरु नहीं बनेगा, कभी पूर्ण मानव जीवन नहीं बनेगा।
वाल्मीकि जी बड़े ज्ञाता ऋषि थे, वे राम जी को जानते थे। रामचरितमानस में लिखा है कि राम जी को चित्रकूट में रहने की सलाह वाल्मीकि जी ने ही दी थी। राम जी ने उनसे बहुत श्रद्धा पूर्वक पूछा था, तुलसीदास जी ने लिखा है -
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।।
ऐसा हृदय में समझकर, वह स्थान बतलाइए, जहां मैं सीता और लक्ष्मण सहित जाऊं।
वाल्मीकि जी भी भगवान राम को जान रहे थे, उन्होंने आगे उत्तर दिया -
पँूछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाऊँ।
जहँ न होहु तहँ कहि तुम्हहि देखावौं ठाऊँ।।
अर्थात आप मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं कहा रहूं। यहां मैं आपसे यह पूछते हुए सकुचा रहा हूं कि जहां आप न हों, वह जगह मुझे बता दीजिए, ताकि मैं आपके रहने के लिए जगह दिखा दूं।
उसके बाद राम जी के विराजने के लिए जो-जो स्थान भक्ति भाव से वाल्मीकि जी ने गिनाए, वो उनकी राम भक्ति का अनुपम प्रमाण हैं और अंत में व्यावहारिक रूप से उन्होंने राम जी को चित्रकूट में विराजने की सलाह दी।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि हम लोग भी राम भाव में योगदान करें, इस वातावरण में हमारी भी आहूति हो।
जय श्री राम।
मरा मरा से राम राम तक
भाग - ६
महर्षि वाल्मीकि ने संपूर्ण आत्मीय भाव से जानकी जी और उनके पुत्रों को अपने आश्रम में रखा। राम जी के बच्चों को सशक्त रूप से विकसित किया। उन्होंने राम जी के बच्चों को वीर ही नहीं, विद्वान भी बनाया।
उनके आश्रम का वातावरण अत्यंत सुंदर था। ऐसे दिव्य वातावरण जहां सबकुछ पवित्र है, शुद्ध है, अच्छे जीवन को देने वाला है। ऐसे वातावरण में निर्वासन के प्रताप से जानकी जी पहुंच गईं। उनके बच्चे भी वहीं पल रहे हैं, बहुत ही शुभ हो। विधि विधान से उनका पालन-पोषण संस्कार हुआ। संसार के लिए यह बहुत ही अच्छी घटना हुई। जो लोग सत्य नहीं जानते, वही कहेंगे कि राम जी ने गलत किया। कहते हैं कि जानकी जी को जंगल में छोड़ दिया गया धोबी के कहने पर, लेकिन वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण में धोबी की चर्चा कहीं नहीं है। तुलसीदास जी ने उस प्रकरण को ही छोड़ दिया, क्योंकि उनसे वियोग सहन नहीं हुआ।
राम जी को भी गुरुकुल में रहने का ज्यादा अवसर नहीं मिल पाया था, शिक्षा तो उन्हें मिली थी, वन में रहकर शिक्षा लेने का काम अधूरा रह गया था, जिसे जानकी जी ने अपने बच्चों के माध्यम से पूरा किया। महर्षि वाल्मीकि ने अपने आदि काव्य को सबसे पहले राम जी के बच्चों लव-कुश को पढ़ाया। इस संसार की अद्भुत घटना है कि दुनिया का सबसे पहला आदि काव्य ग्रंथ जो लौकिक भाषा का पहला महाकाव्य है, जो बच्चों की मां के लिए लिखा गया है, पिता के लिए लिखा गया है, उसे बच्चों को ही सबसे पहले पढ़ाया।
लव, कुश रामायण गाते हैं। जहां वे रामायण गाते हैं, वहां लोग एकत्र हो जाते हैं। लोग राम जी के सद्गुण सुनना चाहते हैं, लोग जानकी जी के बारे में जानना चाहते हैं। राम जी के मन में है कि जिस उद्देश्य से सीता आश्रम गई थीं, वह पूरा हुआ, मेरे बेटों को अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई।
महर्षि वाल्मीकि ने केवल कुछ लोगों को ही सुरक्षित नहीं किया, वाल्मीकि रामायण की रचना की, लव, कुश को शिक्षित करके रघुवंश को सिंचित किया और रघुवंश को सिंचित करके विश्व व सृष्टि को सिंचित किया। रघुवंश आदर्श है पूरे संसार के लिए, उसका जयघोष पूरे संसार में हो। यह सभी लोगों के लिए प्रेरणादायक है कि बच्चों को जो शिक्षा देनी है, जरूर दी जाए, बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाया जाए, आधुनिक शिक्षा दी जाए, इसके बिना जीवन का निर्वाह नहीं होगा, लेकिन बच्चों में ऋषि जीवन का भी प्रभाव होना चाहिए, बच्चों को पता होना चाहिए कि ऋषित्व क्या है, तप-त्याग-संयम नियम का क्या सुख है। घर में रहकर बच्चे यह नहीं प्राप्त कर सकते। संसार के लोगों को, विशेषकर भारत के लोगों को ऐसी योजना बनानी चाहिए कि गर्भावस्था में महिलाओं को ऐसे वातावरण में भेजा जाए, जहां सबकुछ अध्यात्ममय है, जहां एक-एक शब्द विशिष्ट है, खाना-पीना, दिनचर्या शुद्ध है, अनुशासित है, दिव्य है, तो इससे होने वाली संतति में महान संस्कार का प्राकट्य होगा, जो उसके संपूर्ण जीवन को प्रेरित करता रहेगा, गुरुत्व देता रहेगा, संबल देता रहेगा, और उसके साथ-साथ में दूसरी जरूरी आधुनिक शिक्षा भी दी जाए। प्रारंभिक काल किसी के लिए भी अच्छा होना चाहिए। बचपन अगर श्रेष्ठ वातावरण में बीत जाए, तो संपूर्ण जीवन आलोकित हो जाता है।
क्रमश:
महर्षि वाल्मीकि ने संपूर्ण आत्मीय भाव से जानकी जी और उनके पुत्रों को अपने आश्रम में रखा। राम जी के बच्चों को सशक्त रूप से विकसित किया। उन्होंने राम जी के बच्चों को वीर ही नहीं, विद्वान भी बनाया।
उनके आश्रम का वातावरण अत्यंत सुंदर था। ऐसे दिव्य वातावरण जहां सबकुछ पवित्र है, शुद्ध है, अच्छे जीवन को देने वाला है। ऐसे वातावरण में निर्वासन के प्रताप से जानकी जी पहुंच गईं। उनके बच्चे भी वहीं पल रहे हैं, बहुत ही शुभ हो। विधि विधान से उनका पालन-पोषण संस्कार हुआ। संसार के लिए यह बहुत ही अच्छी घटना हुई। जो लोग सत्य नहीं जानते, वही कहेंगे कि राम जी ने गलत किया। कहते हैं कि जानकी जी को जंगल में छोड़ दिया गया धोबी के कहने पर, लेकिन वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण में धोबी की चर्चा कहीं नहीं है। तुलसीदास जी ने उस प्रकरण को ही छोड़ दिया, क्योंकि उनसे वियोग सहन नहीं हुआ।
राम जी को भी गुरुकुल में रहने का ज्यादा अवसर नहीं मिल पाया था, शिक्षा तो उन्हें मिली थी, वन में रहकर शिक्षा लेने का काम अधूरा रह गया था, जिसे जानकी जी ने अपने बच्चों के माध्यम से पूरा किया। महर्षि वाल्मीकि ने अपने आदि काव्य को सबसे पहले राम जी के बच्चों लव-कुश को पढ़ाया। इस संसार की अद्भुत घटना है कि दुनिया का सबसे पहला आदि काव्य ग्रंथ जो लौकिक भाषा का पहला महाकाव्य है, जो बच्चों की मां के लिए लिखा गया है, पिता के लिए लिखा गया है, उसे बच्चों को ही सबसे पहले पढ़ाया।
लव, कुश रामायण गाते हैं। जहां वे रामायण गाते हैं, वहां लोग एकत्र हो जाते हैं। लोग राम जी के सद्गुण सुनना चाहते हैं, लोग जानकी जी के बारे में जानना चाहते हैं। राम जी के मन में है कि जिस उद्देश्य से सीता आश्रम गई थीं, वह पूरा हुआ, मेरे बेटों को अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई।
महर्षि वाल्मीकि ने केवल कुछ लोगों को ही सुरक्षित नहीं किया, वाल्मीकि रामायण की रचना की, लव, कुश को शिक्षित करके रघुवंश को सिंचित किया और रघुवंश को सिंचित करके विश्व व सृष्टि को सिंचित किया। रघुवंश आदर्श है पूरे संसार के लिए, उसका जयघोष पूरे संसार में हो। यह सभी लोगों के लिए प्रेरणादायक है कि बच्चों को जो शिक्षा देनी है, जरूर दी जाए, बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाया जाए, आधुनिक शिक्षा दी जाए, इसके बिना जीवन का निर्वाह नहीं होगा, लेकिन बच्चों में ऋषि जीवन का भी प्रभाव होना चाहिए, बच्चों को पता होना चाहिए कि ऋषित्व क्या है, तप-त्याग-संयम नियम का क्या सुख है। घर में रहकर बच्चे यह नहीं प्राप्त कर सकते। संसार के लोगों को, विशेषकर भारत के लोगों को ऐसी योजना बनानी चाहिए कि गर्भावस्था में महिलाओं को ऐसे वातावरण में भेजा जाए, जहां सबकुछ अध्यात्ममय है, जहां एक-एक शब्द विशिष्ट है, खाना-पीना, दिनचर्या शुद्ध है, अनुशासित है, दिव्य है, तो इससे होने वाली संतति में महान संस्कार का प्राकट्य होगा, जो उसके संपूर्ण जीवन को प्रेरित करता रहेगा, गुरुत्व देता रहेगा, संबल देता रहेगा, और उसके साथ-साथ में दूसरी जरूरी आधुनिक शिक्षा भी दी जाए। प्रारंभिक काल किसी के लिए भी अच्छा होना चाहिए। बचपन अगर श्रेष्ठ वातावरण में बीत जाए, तो संपूर्ण जीवन आलोकित हो जाता है।
क्रमश:
मरा मरा से राम राम तक
भाग - ५
राम पूर्णत: आश्वस्त हैं कि सीता कहीं से लांछित नहीं हैं। लंका में पूर्ण विजय की प्राप्ति के बाद जो अग्निपरीक्षा हुई, तो संपूर्ण संसार के लोगों ने सुना-देखा कि सीता पूर्णत: पवित्र हैं। लेकिन जिनके पास अच्छी या शुद्ध दृष्टि नहीं थी, उन लोगों के मन में यह भावना रही होगी कि सीता जी रावण के यहां रही थीं। राम जी के मन में था कि मेरे सम्बंध में कोई अपवाद नहीं होना चाहिए। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में सीता को छोडऩे के पीछे ठोस कारण हैं।
जब कोई गर्भवती होती है, तो इस अवस्था में अभिभावक पूछते हैं कि आपके मन में कोई इच्छा हो, तो बताना। गर्भावस्था में जो इच्छाएं होती हैं, उनका संतति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।
राम जी ने भी सीता जी से पूछा, ‘आप मां बनने वाली हैं कोई भी मन में भावना हो, तो बतलाएं, मैं कोशिश करूंगा पूरी करने की।’
सीता जी ने कहा, ‘मुझे वन की याद बहुत आती है, कितना शांत वातावरण था, प्रकृति की सुंदरता आंखों से निकलती ही नहीं है, कहीं से वेद ध्वनि आ रही है, ऋषियों का आवागमन हो रहा है। लोग जप-तप में लगे हैं। उससे मन को बहुत प्रेरणा मिलती है। ऋषि जीवन स्वीकार करने के लिए प्रेरणा मिलती है। मैं चाहती हूं कि इस जीवन का लाभ लूं। जब बच्चों को आपके जैसा बनाना है, तो आप बहुत मदद नहीं कर पाएंगे। आप व्यस्त रहने वाले राजा हैं, तो बच्चों की जो देखभाल होनी चाहिए, वह नहीं हो पाएगी। आपने तो १४ वर्षों का संन्यासी जीवन बिताया, अयोध्या जी में बच्चे रहेंगे, तो उस जीवन से वंचित रह जाएंगे। उनमें राजसी भाव आ जाएगा, रघुवंशी भाव आ जाएगा, लेकिन ऋषित्व कैसे आएगा? मैं चाहती हूं कि ऋषियों के साथ उनकी छाया में अपने बच्चे बड़े हों। तपस्वी की तरह वे जिएं। ऐसे जीवन का प्रबंध आप कर सकें, तो करें।’
राम जी ने चर्चा की अपने मित्रों, भाइयों से, सभी लोग हिचक रहे थे। कितनी सुन्दर इच्छा है, बच्चे पहले ऋषि बनें, फिर राजा बनें। राम जी ने तपस्वी रहते हुए ही अनेक असुरों व रावण को मारा। कितना सम्मान दिया ऋषियों-महर्षियों को, अभी भी आपकी संपूर्ण जय-जयकार हो रही है।
राम जी ने लक्ष्मण जी से कहा, ‘भाभी को जंगल में छोडक़र आओ।’ इसके लिए जानकी जी ने ही प्रेरित किया था। संदेह को बहाना बनाकर। राम जी भी चाहते थे कि उनके बच्चे केवल महाराजा ही नहीं बनें, ऋषित्व को भी प्राप्त करें। उनमें दोनों साथ-साथ रहे, इसके फलस्वरूप जानकी जी सहर्ष वाल्मीकि जी के आश्रम आ गईं।
कहा गया है, जितना चिंतन बच्चों के लिए मां करती है, उतना कोई नहीं करता। माता की जिम्मेदारियां बड़ी होती हैं। लक्ष्मण जी ने वाल्मीकि जी के आश्रम के आसपास जानकी जी को छोड़ा था। वाल्मीकि जी रघुवंशियों से बहुत प्रभावित थे, उनका आत्मीय भाव था जानकी जी के लिए। उल्लेख मिलता है, सीता जी वनवास काल में राम जी के साथ पहले भी एक बार वाल्मीकि आश्रम जा चुकी थीं। उन्हें वहां बहुत अच्छा लगा था।
जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं, वे आक्रोश प्रकट करते हैं कि राम जी ने जानकी जी को जंगल में छोड़ दिया। यह जानना चाहिए, वन जाने का जो क्रम हुआ, उसमें मूल प्रेरक, मूल भावना जानकी जी की रही और उन्होंने अपनी संतति के भले के लिए ऐसा किया था।
क्रमश:
राम पूर्णत: आश्वस्त हैं कि सीता कहीं से लांछित नहीं हैं। लंका में पूर्ण विजय की प्राप्ति के बाद जो अग्निपरीक्षा हुई, तो संपूर्ण संसार के लोगों ने सुना-देखा कि सीता पूर्णत: पवित्र हैं। लेकिन जिनके पास अच्छी या शुद्ध दृष्टि नहीं थी, उन लोगों के मन में यह भावना रही होगी कि सीता जी रावण के यहां रही थीं। राम जी के मन में था कि मेरे सम्बंध में कोई अपवाद नहीं होना चाहिए। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में सीता को छोडऩे के पीछे ठोस कारण हैं।
जब कोई गर्भवती होती है, तो इस अवस्था में अभिभावक पूछते हैं कि आपके मन में कोई इच्छा हो, तो बताना। गर्भावस्था में जो इच्छाएं होती हैं, उनका संतति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।
राम जी ने भी सीता जी से पूछा, ‘आप मां बनने वाली हैं कोई भी मन में भावना हो, तो बतलाएं, मैं कोशिश करूंगा पूरी करने की।’
सीता जी ने कहा, ‘मुझे वन की याद बहुत आती है, कितना शांत वातावरण था, प्रकृति की सुंदरता आंखों से निकलती ही नहीं है, कहीं से वेद ध्वनि आ रही है, ऋषियों का आवागमन हो रहा है। लोग जप-तप में लगे हैं। उससे मन को बहुत प्रेरणा मिलती है। ऋषि जीवन स्वीकार करने के लिए प्रेरणा मिलती है। मैं चाहती हूं कि इस जीवन का लाभ लूं। जब बच्चों को आपके जैसा बनाना है, तो आप बहुत मदद नहीं कर पाएंगे। आप व्यस्त रहने वाले राजा हैं, तो बच्चों की जो देखभाल होनी चाहिए, वह नहीं हो पाएगी। आपने तो १४ वर्षों का संन्यासी जीवन बिताया, अयोध्या जी में बच्चे रहेंगे, तो उस जीवन से वंचित रह जाएंगे। उनमें राजसी भाव आ जाएगा, रघुवंशी भाव आ जाएगा, लेकिन ऋषित्व कैसे आएगा? मैं चाहती हूं कि ऋषियों के साथ उनकी छाया में अपने बच्चे बड़े हों। तपस्वी की तरह वे जिएं। ऐसे जीवन का प्रबंध आप कर सकें, तो करें।’
राम जी ने चर्चा की अपने मित्रों, भाइयों से, सभी लोग हिचक रहे थे। कितनी सुन्दर इच्छा है, बच्चे पहले ऋषि बनें, फिर राजा बनें। राम जी ने तपस्वी रहते हुए ही अनेक असुरों व रावण को मारा। कितना सम्मान दिया ऋषियों-महर्षियों को, अभी भी आपकी संपूर्ण जय-जयकार हो रही है।
राम जी ने लक्ष्मण जी से कहा, ‘भाभी को जंगल में छोडक़र आओ।’ इसके लिए जानकी जी ने ही प्रेरित किया था। संदेह को बहाना बनाकर। राम जी भी चाहते थे कि उनके बच्चे केवल महाराजा ही नहीं बनें, ऋषित्व को भी प्राप्त करें। उनमें दोनों साथ-साथ रहे, इसके फलस्वरूप जानकी जी सहर्ष वाल्मीकि जी के आश्रम आ गईं।
कहा गया है, जितना चिंतन बच्चों के लिए मां करती है, उतना कोई नहीं करता। माता की जिम्मेदारियां बड़ी होती हैं। लक्ष्मण जी ने वाल्मीकि जी के आश्रम के आसपास जानकी जी को छोड़ा था। वाल्मीकि जी रघुवंशियों से बहुत प्रभावित थे, उनका आत्मीय भाव था जानकी जी के लिए। उल्लेख मिलता है, सीता जी वनवास काल में राम जी के साथ पहले भी एक बार वाल्मीकि आश्रम जा चुकी थीं। उन्हें वहां बहुत अच्छा लगा था।
जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं, वे आक्रोश प्रकट करते हैं कि राम जी ने जानकी जी को जंगल में छोड़ दिया। यह जानना चाहिए, वन जाने का जो क्रम हुआ, उसमें मूल प्रेरक, मूल भावना जानकी जी की रही और उन्होंने अपनी संतति के भले के लिए ऐसा किया था।
क्रमश:
मरा मरा से राम राम तक
भाग - ४
कहा जाता है, सौ करोड़ रामायणों की रचना हुई है। हर बार त्रेता में राम को प्रगट होना है। निरंतर उनके लिए लेखन होता रहता है। जितना राम जी पर लेखन हुआ है, उतना किसी भी अवतार के सम्बंध में लेखन नहीं हुआ। चाहे कोई भी अवतार हो, राम का अवतार सर्वाधिक चर्चित है। भगवान राम के सम्बंध में लेखन अद्भुत है।
हां, वाल्मीकि जी ने यह अवश्य कहा, ‘मैं राम जी के चरित्र का गायन नहीं कर रहा हूं, मैं सीता के चरित्र का गायन कर रहा हूं।’
ग्रंथ की चेतना को महानायक से न जोडक़र उनकी जो प्राण वंदना हैं, उनकी जो अद्र्धांग्नि हैं, उनके नाम से जोड़ा। यह अनोखी बात है, ऐसा दुनिया में कहीं नहीं हुआ कि महानायक को छोडक़र उनकी सहभागिनी के नाम पर ग्रंथ रचा जाए। जहां राम जी की तूती बोल रही हो, जिन्होंने हजारों-हजारों वर्षों तक कण-कण को प्रभावित किया हो, अपना बनाया हो, वहां किसी दूसरे के चरित्र का गायन हो और सभी लोग उसको स्वीकार करें, विरोध न हो, यहां तक कि राम जी भी उसे स्वीकार करते हैं, यह तो अद्भुत बात हो जाएगी। राम जी के साथ महर्षि वाल्मीकि का जीवन पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ जीवन है।
बहुत से लोगों का मानना है कि राम जी का जब अवतार हुआ, तो उसके पहले ही रामायण की रचना हो गई थी, अपनी दिव्य दृष्टि से वाल्मीकि ने देख लिया था। जो कुछ राम जी ने अपने अवतार काल में किया, उससे पहले ही उसका लेखन हो गया, ऐसा सनातन धर्म का पूर्ण विश्वास है। यह ऋषित्व के द्वारा ही संभव है, वह दिव्य प्रज्ञा से भूत, भविष्य को जान लेता है। वह वर्तमान को तो जानता ही जानता है। वाल्मीकि ने समाज के लिए, संसार के लिए बहुत बड़ा काम किया, क्रांति हुई। निश्चित रूप से सीता जी के साथ जो हुआ, उससे लोग आहत रहे होंगे, किन्तु वाल्मीकि रामायण का अध्ययन करने से उन्हें बड़ी शीतलता की प्राप्ति होगी।
लोकरंजन के लिए, लोगों को संतुष्ट करने के लिए, लोगों की भावनाओं को सम्मान देने के लिए गर्भावस्था में ही सीता जी को वनवास पर जाना पड़ा। सीता जी को वाल्मीकि जी की रचना से बहुत बल मिला होगा कि सीता चरित्र के लिए रामायण की रचना हुई। वाल्मीकि के रामायण में सीता चरित्र है, राम चरित्र नहीं है। राम जी महत्वपूर्ण चरित्र हैं, तो उसमें उनकी लीला आनी ही है, किन्तु वाल्मीकि जी स्पष्ट कहते हैं कि मैं सीता चरित्र लिख रहा हूं।
मैं यह नहीं कहने जा रहा कि राम जी ने जो किया, उससे सीता के साथ अन्याय हुआ। मेरे पास ऐसे विचार हैं, जिनसे यह सिद्ध हो सकता है कि भगवान श्रीराम ने सीता जी को अपनी दुर्भावना या संदेह के कारण या सम्मान लेने के लिए गर्भावस्था में वाल्मीकि जी के आश्रम नहीं पहुंचाया था।
क्रमश:
कहा जाता है, सौ करोड़ रामायणों की रचना हुई है। हर बार त्रेता में राम को प्रगट होना है। निरंतर उनके लिए लेखन होता रहता है। जितना राम जी पर लेखन हुआ है, उतना किसी भी अवतार के सम्बंध में लेखन नहीं हुआ। चाहे कोई भी अवतार हो, राम का अवतार सर्वाधिक चर्चित है। भगवान राम के सम्बंध में लेखन अद्भुत है।
हां, वाल्मीकि जी ने यह अवश्य कहा, ‘मैं राम जी के चरित्र का गायन नहीं कर रहा हूं, मैं सीता के चरित्र का गायन कर रहा हूं।’
ग्रंथ की चेतना को महानायक से न जोडक़र उनकी जो प्राण वंदना हैं, उनकी जो अद्र्धांग्नि हैं, उनके नाम से जोड़ा। यह अनोखी बात है, ऐसा दुनिया में कहीं नहीं हुआ कि महानायक को छोडक़र उनकी सहभागिनी के नाम पर ग्रंथ रचा जाए। जहां राम जी की तूती बोल रही हो, जिन्होंने हजारों-हजारों वर्षों तक कण-कण को प्रभावित किया हो, अपना बनाया हो, वहां किसी दूसरे के चरित्र का गायन हो और सभी लोग उसको स्वीकार करें, विरोध न हो, यहां तक कि राम जी भी उसे स्वीकार करते हैं, यह तो अद्भुत बात हो जाएगी। राम जी के साथ महर्षि वाल्मीकि का जीवन पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ जीवन है।
बहुत से लोगों का मानना है कि राम जी का जब अवतार हुआ, तो उसके पहले ही रामायण की रचना हो गई थी, अपनी दिव्य दृष्टि से वाल्मीकि ने देख लिया था। जो कुछ राम जी ने अपने अवतार काल में किया, उससे पहले ही उसका लेखन हो गया, ऐसा सनातन धर्म का पूर्ण विश्वास है। यह ऋषित्व के द्वारा ही संभव है, वह दिव्य प्रज्ञा से भूत, भविष्य को जान लेता है। वह वर्तमान को तो जानता ही जानता है। वाल्मीकि ने समाज के लिए, संसार के लिए बहुत बड़ा काम किया, क्रांति हुई। निश्चित रूप से सीता जी के साथ जो हुआ, उससे लोग आहत रहे होंगे, किन्तु वाल्मीकि रामायण का अध्ययन करने से उन्हें बड़ी शीतलता की प्राप्ति होगी।
लोकरंजन के लिए, लोगों को संतुष्ट करने के लिए, लोगों की भावनाओं को सम्मान देने के लिए गर्भावस्था में ही सीता जी को वनवास पर जाना पड़ा। सीता जी को वाल्मीकि जी की रचना से बहुत बल मिला होगा कि सीता चरित्र के लिए रामायण की रचना हुई। वाल्मीकि के रामायण में सीता चरित्र है, राम चरित्र नहीं है। राम जी महत्वपूर्ण चरित्र हैं, तो उसमें उनकी लीला आनी ही है, किन्तु वाल्मीकि जी स्पष्ट कहते हैं कि मैं सीता चरित्र लिख रहा हूं।
मैं यह नहीं कहने जा रहा कि राम जी ने जो किया, उससे सीता के साथ अन्याय हुआ। मेरे पास ऐसे विचार हैं, जिनसे यह सिद्ध हो सकता है कि भगवान श्रीराम ने सीता जी को अपनी दुर्भावना या संदेह के कारण या सम्मान लेने के लिए गर्भावस्था में वाल्मीकि जी के आश्रम नहीं पहुंचाया था।
क्रमश:
मरा मरा से राम राम तक
भाग - ३
जीवन के किसी क्षेत्र में कोई नया बड़ा आदमी आता है, तो वह बहुत दमखम के साथ लगता है अपने जीवन को सुधारने में। अपने जीवन को परिवर्तित करने में अपने जीवन को सुंदर बनाने में पूरे दमखम के साथ प्रयास करता है। रत्नाकर ने जपना शुरू किया और हजारों वर्षों तक जपा, उन पर दीमक लग गए, जप करते-करते एक जगह, दीमकों ने उन पर घर बना लिया। दीमक के घरों को ही वल्मीक बोलते हैं, इसलिए इनका नाम वाल्मीकि हो गया। संपूर्ण जीवन विशुद्ध हो गया, भगवान का नाम जपते हुए। रोम-रोम से जहां पाप प्रवाहित हो रहा था, वहां रोम-रोम से राम-राम प्रवाहित होने लगा। अध्यात्म और अहिंसा प्रवाहित होने लगी, रोम-रोम में संयम-नियम स्थापित हो गए। पाप की गुंजाइश ही खत्म हो गई, संपूर्ण जीवन विशुद्ध हो गया। इसी क्रम से रत्नाकर डाकू ने पूर्ण महर्षित्व को प्राप्त कर लिया। वाल्मीकि के नाम से तीनों लोक में ख्याति हुई। एक बहुत बड़ी क्रांति आई कि समाज के लिए जो अभिशाप बना हुआ था, जो मानवता के लिए कलंक था, ब्राह्मण जाति के लिए जो कलंक था, आज राम-राम की महिमा से वह मानवता के लिए वरदान बन गया। देवर्षि नारद के गुरुत्व की महिमा से कल्याण हो गया। उन्होंने ऋषित्व को उत्पन्न कर दिया। पूरे समाज के लिए एक आदर्श बना। मानवता का चरम प्राप्त हुआ। शास्त्र विरुद्ध आचरण के सबसे बड़े कर्ता का जीवन पूर्ण शास्त्रीय जीवन हो गया। शास्त्रों के संकेतों को दूर-दूर तक प्रसारित करने वाली जीह्वा से संपन्न जीवन प्राप्त हो गया।
चारों ओर यही चर्चा थी, जो जहां सुनता था, उसे लगता था कि कितना भी तुच्छ जीवन हो, नीच जीवन हो, मर्यादा के विरुद्ध जीवन हो, लेकिन संतत्व की प्राप्ति संभव है। यदि ईश्वर में जीवन को लगाया जाए, तो परिवर्तन होगा। शास्त्रों की आज्ञा की जरूरत है। देवर्षि नारद के बताए मंत्र का सम्मान किया और पूर्ण विश्वास अर्जित किया। उन्होंने तपस्या से वह सब प्राप्त किया, जो वह लूटपाट से कभी प्राप्त नहीं कर सकते थे। राम नाम से सामान्य मनुष्य ही नहीं, मनुष्यता की पराकाष्ठा वाला जीवन भी संभव है। देवर्षि नारद की विद्या काम कर गई। हमारा जीवन कितना भी लांछित हो, निंदनीय हो, अभिशापित हो, कितना भी हमारा जीवन हेय हो, समाज के लिए अत्यंत नाकारा हो, किन्तु सही मार्गों से चलकर भी हम अपने जीवन को सुधार सकते हैं। सुधार ही नहीं सकते, उसे परम सौन्दर्य दे सकते हैं, उसको संसार के लिए मानवता के लिए परम उपयोगी बना सकते हैं, प्रेरणादायक बना सकते हैं। सभी लोगों को एक मार्ग की प्राप्ति हुई।
आम धारणा है, जीवन में, समाज में धन कमाने के लिए भोग के लिए, सम्मान कमाने के लिए व्यक्ति न जाने कितना परिश्रम करता है, लेकिन उतना परिश्रम वह ईश्वर के लिए नहीं करता। लौकिक विद्या को कमाना भी साधारण काम नहीं है, कला के क्षेत्र में बड़े स्वरूप को कमाना भी कोई साधारण काम नहीं है, लेकिन जब आध्यात्मिक कमाई की बात होती है, तो लोग पीछे हट जाते हैं। आध्यात्मिक जीवन को भी उतना ही महत्व देना चाहिए।
वे पूरे संसार के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। महर्षि वाल्मीकि आदिकाव्य के रचयिता हैं, जैसे वेदों के स्तर का दुनिया में कोई ग्रंथ नहीं है। वेद अनादि माने जाते हैं। ब्रह्मा जी भी केवल ग्रहण करते हैं, ऐसा कहा जाता है, वेदों में भी यह वाक्य आया है।
वेदों की तुलना में कोई ग्रंथ किसी जाति, किसी राज्य, किसी संप्रदाय के पास नहीं है। कोई भी वेदों को नहीं काट सकता, उनकी ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता। वेदों को छोड़ दें, तो लौकिक भाषा में, लौकिक संस्कृति में सबसे पहला ग्रंथ महर्षि वाल्मीकि के ग्रंथ को माना गया। यह ध्यान देने योग्य बात है। संपूर्ण संसार में जितनी भाषाएं हैं, उन भाषाओं में किसी भी भाषा के पास महर्षि वाल्मीकि का महाकाव्य वाल्मीकि रामायण जैसा कोई ग्रंथ नहीं है। कितनी बड़ी बात है कि जब वेदों के बाद लौकिक संस्कृति के अनुरूप लौकिक रचना बनी, तो पहली रचना वाल्मीकि जी ने ही रची - वाल्मीकीय रामायण।
वेदों को प्रमाण माना जाता है, महाभारत को, वाल्मीकि रामायण को इतिहास की कोटि में रखा जाता है। इतिहास का प्रतिपादन हुआ। तमाम तरह के विषय वाल्मीकि रामायण में ज्ञान, शरणागति, वेदों का वर्णन, यह अद्भुत महाकाव्य है। सबसे पहले भगवान के चरित्र का वर्णन लौकिक भाषा में हुआ। यह पूर्ण ग्रंथ माना जाता है। वाल्मीकि रामायण में प्रमुखता से राम का वर्णन हुआ। कहा जाता है, वेदों में राम जी का वर्णन नहीं हुआ, किन्तु वाल्मीकि रामायण जैसा बड़ा ग्रंथ बिना आधार के ही लिखा गया था क्या? यदि बिना आधार के लिखा गया होता, तो उसे कोई महत्व नहीं देता, कोई सम्मान नहीं देता। भगवान राम का चरित्र वेदों में भी था, लेकिन वो शाखाएं लुप्त हो गईं। वाल्मीकि रामायण की विशिष्टता और सत्यता पूर्ण प्रमाणित है। राम जी पूर्णावतार हैं, अद्भुत व्यक्तित्व हैं।
११ हजार वर्षों का काल राम जी का रहा। कुछ विद्वानों ने व्याख्या करके यह भी अर्थ निकाला है कि राम जी का शासनकाल ३३ हजार वर्ष का था। राम जी पूर्ण ब्रह्म हैं, अवतारी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, गुणों की खान हैं, कोई भी हेय गुण उनमें नहीं है। संपूर्ण जीवन उनका उदार है। परम प्रेरणास्पद है, संतों को सुख पहुंचाने वाला है।
क्रमश:
जीवन के किसी क्षेत्र में कोई नया बड़ा आदमी आता है, तो वह बहुत दमखम के साथ लगता है अपने जीवन को सुधारने में। अपने जीवन को परिवर्तित करने में अपने जीवन को सुंदर बनाने में पूरे दमखम के साथ प्रयास करता है। रत्नाकर ने जपना शुरू किया और हजारों वर्षों तक जपा, उन पर दीमक लग गए, जप करते-करते एक जगह, दीमकों ने उन पर घर बना लिया। दीमक के घरों को ही वल्मीक बोलते हैं, इसलिए इनका नाम वाल्मीकि हो गया। संपूर्ण जीवन विशुद्ध हो गया, भगवान का नाम जपते हुए। रोम-रोम से जहां पाप प्रवाहित हो रहा था, वहां रोम-रोम से राम-राम प्रवाहित होने लगा। अध्यात्म और अहिंसा प्रवाहित होने लगी, रोम-रोम में संयम-नियम स्थापित हो गए। पाप की गुंजाइश ही खत्म हो गई, संपूर्ण जीवन विशुद्ध हो गया। इसी क्रम से रत्नाकर डाकू ने पूर्ण महर्षित्व को प्राप्त कर लिया। वाल्मीकि के नाम से तीनों लोक में ख्याति हुई। एक बहुत बड़ी क्रांति आई कि समाज के लिए जो अभिशाप बना हुआ था, जो मानवता के लिए कलंक था, ब्राह्मण जाति के लिए जो कलंक था, आज राम-राम की महिमा से वह मानवता के लिए वरदान बन गया। देवर्षि नारद के गुरुत्व की महिमा से कल्याण हो गया। उन्होंने ऋषित्व को उत्पन्न कर दिया। पूरे समाज के लिए एक आदर्श बना। मानवता का चरम प्राप्त हुआ। शास्त्र विरुद्ध आचरण के सबसे बड़े कर्ता का जीवन पूर्ण शास्त्रीय जीवन हो गया। शास्त्रों के संकेतों को दूर-दूर तक प्रसारित करने वाली जीह्वा से संपन्न जीवन प्राप्त हो गया।
चारों ओर यही चर्चा थी, जो जहां सुनता था, उसे लगता था कि कितना भी तुच्छ जीवन हो, नीच जीवन हो, मर्यादा के विरुद्ध जीवन हो, लेकिन संतत्व की प्राप्ति संभव है। यदि ईश्वर में जीवन को लगाया जाए, तो परिवर्तन होगा। शास्त्रों की आज्ञा की जरूरत है। देवर्षि नारद के बताए मंत्र का सम्मान किया और पूर्ण विश्वास अर्जित किया। उन्होंने तपस्या से वह सब प्राप्त किया, जो वह लूटपाट से कभी प्राप्त नहीं कर सकते थे। राम नाम से सामान्य मनुष्य ही नहीं, मनुष्यता की पराकाष्ठा वाला जीवन भी संभव है। देवर्षि नारद की विद्या काम कर गई। हमारा जीवन कितना भी लांछित हो, निंदनीय हो, अभिशापित हो, कितना भी हमारा जीवन हेय हो, समाज के लिए अत्यंत नाकारा हो, किन्तु सही मार्गों से चलकर भी हम अपने जीवन को सुधार सकते हैं। सुधार ही नहीं सकते, उसे परम सौन्दर्य दे सकते हैं, उसको संसार के लिए मानवता के लिए परम उपयोगी बना सकते हैं, प्रेरणादायक बना सकते हैं। सभी लोगों को एक मार्ग की प्राप्ति हुई।
आम धारणा है, जीवन में, समाज में धन कमाने के लिए भोग के लिए, सम्मान कमाने के लिए व्यक्ति न जाने कितना परिश्रम करता है, लेकिन उतना परिश्रम वह ईश्वर के लिए नहीं करता। लौकिक विद्या को कमाना भी साधारण काम नहीं है, कला के क्षेत्र में बड़े स्वरूप को कमाना भी कोई साधारण काम नहीं है, लेकिन जब आध्यात्मिक कमाई की बात होती है, तो लोग पीछे हट जाते हैं। आध्यात्मिक जीवन को भी उतना ही महत्व देना चाहिए।
वे पूरे संसार के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। महर्षि वाल्मीकि आदिकाव्य के रचयिता हैं, जैसे वेदों के स्तर का दुनिया में कोई ग्रंथ नहीं है। वेद अनादि माने जाते हैं। ब्रह्मा जी भी केवल ग्रहण करते हैं, ऐसा कहा जाता है, वेदों में भी यह वाक्य आया है।
वेदों की तुलना में कोई ग्रंथ किसी जाति, किसी राज्य, किसी संप्रदाय के पास नहीं है। कोई भी वेदों को नहीं काट सकता, उनकी ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता। वेदों को छोड़ दें, तो लौकिक भाषा में, लौकिक संस्कृति में सबसे पहला ग्रंथ महर्षि वाल्मीकि के ग्रंथ को माना गया। यह ध्यान देने योग्य बात है। संपूर्ण संसार में जितनी भाषाएं हैं, उन भाषाओं में किसी भी भाषा के पास महर्षि वाल्मीकि का महाकाव्य वाल्मीकि रामायण जैसा कोई ग्रंथ नहीं है। कितनी बड़ी बात है कि जब वेदों के बाद लौकिक संस्कृति के अनुरूप लौकिक रचना बनी, तो पहली रचना वाल्मीकि जी ने ही रची - वाल्मीकीय रामायण।
वेदों को प्रमाण माना जाता है, महाभारत को, वाल्मीकि रामायण को इतिहास की कोटि में रखा जाता है। इतिहास का प्रतिपादन हुआ। तमाम तरह के विषय वाल्मीकि रामायण में ज्ञान, शरणागति, वेदों का वर्णन, यह अद्भुत महाकाव्य है। सबसे पहले भगवान के चरित्र का वर्णन लौकिक भाषा में हुआ। यह पूर्ण ग्रंथ माना जाता है। वाल्मीकि रामायण में प्रमुखता से राम का वर्णन हुआ। कहा जाता है, वेदों में राम जी का वर्णन नहीं हुआ, किन्तु वाल्मीकि रामायण जैसा बड़ा ग्रंथ बिना आधार के ही लिखा गया था क्या? यदि बिना आधार के लिखा गया होता, तो उसे कोई महत्व नहीं देता, कोई सम्मान नहीं देता। भगवान राम का चरित्र वेदों में भी था, लेकिन वो शाखाएं लुप्त हो गईं। वाल्मीकि रामायण की विशिष्टता और सत्यता पूर्ण प्रमाणित है। राम जी पूर्णावतार हैं, अद्भुत व्यक्तित्व हैं।
११ हजार वर्षों का काल राम जी का रहा। कुछ विद्वानों ने व्याख्या करके यह भी अर्थ निकाला है कि राम जी का शासनकाल ३३ हजार वर्ष का था। राम जी पूर्ण ब्रह्म हैं, अवतारी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, गुणों की खान हैं, कोई भी हेय गुण उनमें नहीं है। संपूर्ण जीवन उनका उदार है। परम प्रेरणास्पद है, संतों को सुख पहुंचाने वाला है।
क्रमश:
मरा मरा से राम राम तक
भाग - २
कथा है, देवर्षि नारद को देखकर रत्नाकर टूट पड़े। देवर्षि नारद का जीवन दिव्य जीवन है, रोम-रोम से अद्भुत आभा प्रस्फुटित हो रही है। पूर्णत: निर्लिप्त जीवन है। डाकू रत्नाकर ने सोचा कि आज काफी कमाई होगी, ‘रुको जो भी है, दे दो, नहीं तो मार दूंगा।’
नारद जी ने कहा, ‘मेरे पास कुछ नहीं है, वीणा है और तन पर वस्त्र है, मेरे पास और क्या संपत्ति है?’
वाल्मीकि ने पूछा, ‘वीणा का क्या करते हो?’
देवर्षि ने उत्तर दिया, ‘वीणा बजाता हूं, ब्रह्मा जी ने प्रदान किया है, इस पर हरि कीर्तन करता हूं।’
‘हमें भी बजाकर सुनाओ।’
देवर्षि नारद से अच्छा वीणा कौन बजाएगा? वे तो ईश्वर को सुनाते हैं, सच्चे हृदय से बजाते हैं। संगीत भक्ति की ऊंचाइयों को प्राप्त होता है। वीणा की ध्वनि अनेक हृदयों को प्रभावित करती है। रत्नाकर को भी वीणा की ध्वनि ने प्रभावित किया, नरमी आई, रौद्र रूप में धीमापन आया। अच्छा लगा। उन्हें लगा कि विचित्र परिवर्तन आ रहा है। यही तो सत्संग है। फिर भी लंबे समय का पापी जीवन था, सहज परिवर्तन संभव नहीं था।
उन्होंने कहा, ‘आपकी वीणा अच्छी है, मुझे भी अच्छी लगी। अब आपके साथ क्या व्यवहार किया जाए?’
देवर्षि ने कहा, ‘जो मेरे पास है, मैं दे दूंगा, लेकिन मेरा कुछ प्रश्न है, जिसका आप समाधान करें, तो बहुत ही अच्छा होगा।’
संत मिलते हैं, तो सत्संग होता है। संत मिलता है, तो ईश्वर की चर्चा करता है, परमार्थ की चर्चा, गुणों की चर्चा। जिनका जीवन ऊंचाई को प्राप्त होता है, उनकी चर्चा करता है। जीवन को सुंदर बनाने वाले तत्वों की चर्चा करता है।
देवर्षि ने कहा, ‘आप जो काम करते हैं, यह तो बहुत बुरा है, यह तो महान पाप का जनक है। गलत कर्म जीवन, शरीर, मन को लांछित कर देता है, क्रूर बना देता है। आप जो दूसरों के लिए या दूसरों के साथ कर रहे हैं, उससे उत्पन्न होने वाले पापों के कारण आपकी उतने ही वर्षों तक दुर्गति होगी।’
रत्नाकर ने कहा, ‘मेरा बड़ा परिवार है, उसके पास दूसरा कोई साधन नहीं है जीवन जीने का, खेती नहीं है, नौकरी नहीं है, दूसरा कोई स्रोत नहीं है। जहां से दो रुपए आएं, पोषण हो। परिवार का विकास हो। स्वास्थ बने। ऐसा कोई भी संसाधन नहीं है। मेरी चेष्टा से ही हुई कमाई से ही मेरा परिवार चलता है।’
देवर्षि ने कहा, ‘ अपने परिजनों से पूछो कि तुम्हारे साथ में वे पाप के भागी बनेंगे या नहीं? तुम्हारी पाप की कमाई खाते हैं, तुम्हारा पाप अपने माथे लेंगे या नहीं।’
वाल्मीकि जी को लगा कि ये साधु भागना चाहता है, मुझे घर भेजकर, चालाकी कर रहा है।
यह जानकर देवर्षि ने कहा, ‘यदि मुझ पर विश्वास नहीं है, तो मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि जब तक आप आओगेे नहीं, मैं जाऊंगा नहीं, विश्वास नहीं है, तो मेरे हाथ-पैर बांध दो।’
जैसे पाप से वे भोग कर रहे हैं, उससे होने वाले अधर्म में वे भागीदार बनेंगे या नहीं? यह बात रत्नाकर डाकू को भी ठीक प्रतीत हुई। उसने कहा, ‘ठीक है, मैं आपको बांध देता हूं।’
हाथ-पैर को बांध दिया और तब घर गया। घर जाकर पूछा, ‘मैं जो कमा करके लाता हूं, गलत काम करके, उसके कारण जो पाप उत्पन्न होते हैं, उस पाप में आपकी भागीदारी होगी या नहीं? पाप की कमाई से जो भोजन आता है, उसमें आप सब भागीदारी बनेंगे या नहीं?’
परिजनों ने कहा, ‘पाप में हमारी भागीदारी नहीं है। आप परिवार के मुखिया हैं, आप कहीं से भी संपत्ति लाएं और हमारा पालन-पोषण करें, आपके पाप में हमारी कोई भागीदारी नहीं है, यह बात आप समझ लीजिए।’
यह बात सुनकर रत्नाकर को बड़ा आघात लगा कि अरे, हत्या, लूटपाट से अर्जित धन में ये लोग भोगी हैं, लेकिन जो पाप उत्पन्न हो रहा है, उसमें भागीदार नहीं हैं, तो ये तो बहुत स्वार्थी लोग हो गए। ऐसे लोगों के साथ जीवन नहीं जीना चाहिए। कितना बड़ा पाप हो रहा है और ये लोग बंटवारा करना नहीं चाहते हैं, केवल लाभ लेना चाहते हैं। ये परिवार के लोग नहीं हैं, मेरे सगे नहीं हैं, ये तो दूसरे लोग हैं, मेरे अपने नहीं हैं।
जो दुर्भावना थी, वह उनकी समझ में आ गई। यहां ऐसे ही लोग रहते हैं। हर आदमी को अपनी चिंता है, स्वार्थ की चिंता है। यह बात सर्वत्र व्याप्त है।
वह आकर देवर्षि नारद के चरणों में गिर पड़े। बार-बार आग्रह किया, ‘हमें पाप कर्मों से बाहर निकालें। कैसे हम किए गए पापों की सजा पाएंगे? कैसे हम नवजीवन को प्राप्त करेंगे? कैसे हम सत्कर्म के जीवन का प्राप्त करेंगे, ऐसे जीवन को प्राप्त करेंगे, जो ईश्वर भक्ति से जुड़ा होगा। कैसे हमारा जीवन सुधरेगा। आप ही मार्ग बताइए।’
देवर्षि नारद ने कहा, ‘अपने सनातन धर्म में एक से एक संत महंत हैं, जिनके द्वारा कैसा भी जीव संत जीवन को प्राप्त कर लेता है, आप केवल मन बनाओ कि आपको अच्छा बनना है, आपको बुरे कर्मों से जुड़े नहीं रहना है। यह सबकुछ छोडऩा होगा, न लूट होगी, न हत्या होगी, न झूठ होगा, न फरेब होगा, न ऐसे लोगों की जिम्मेदारी होगी, जिनको केवल फल चाहिए। पूर्ण समर्पित होकर भगवान राम का जो नाम है उसे जपिए, उससे आपका उद्धार होगा। नाम में अद्भुत शक्ति है, यह नाम सबकुछ कर सकता है। आप नाम जपिए। राम, राम, राम, राम, राम करिए आप। यही मंत्र आपको मैं दे रहा हूं, इससे आपके जीवन में पूर्ण परिवर्तन आएगा, पूर्ण सुंदरता आएगी। संपूर्ण जीवन आपका जो अभी लांछित हो गया है, अनेक तरह से अवगुणों से दूषित हो गया है, सब ठीक हो जाएगा।
रत्नाकर ने प्रयास किया, फिर कहा, ‘मेरे मुंह में यह शब्द आ ही नहीं रहा है। राम, राम कह ही नहीं सकता। मेरा शरीर दूषित है, दिव्य शब्द राम मेरे मुंह से उच्चरित नहीं हो सकता। श्रवण और कथन के लिए जो वातावरण चाहिए, जैसी शक्ति चाहिए, वह मेरे पास नहीं है, मैं राम, राम नहीं जप सकता।’
देवर्षि ने कोशिश की, लेकिन रत्नाकर के मुंह से राम शब्द नहीं निकल पाया।
देवर्षि ने कहा, ‘ठीक है, आप राम राम नहीं जप सकते हैं, तो आप मरा, मरा ही जपिए।’
यह रत्नाकर को ठीक लगा, वे जिस गलत व्यवसाय में थे, उसमें मारो, मारो बोलते ही रहते थे, मारो, पीटो, लूटो, काटो। राम, राम तो नहीं जप पाए, पाप की अधिकता के कारण, लेकिन मरा मरा उन्होंने जपना शुरू किया।
क्रमश:
कथा है, देवर्षि नारद को देखकर रत्नाकर टूट पड़े। देवर्षि नारद का जीवन दिव्य जीवन है, रोम-रोम से अद्भुत आभा प्रस्फुटित हो रही है। पूर्णत: निर्लिप्त जीवन है। डाकू रत्नाकर ने सोचा कि आज काफी कमाई होगी, ‘रुको जो भी है, दे दो, नहीं तो मार दूंगा।’
नारद जी ने कहा, ‘मेरे पास कुछ नहीं है, वीणा है और तन पर वस्त्र है, मेरे पास और क्या संपत्ति है?’
वाल्मीकि ने पूछा, ‘वीणा का क्या करते हो?’
देवर्षि ने उत्तर दिया, ‘वीणा बजाता हूं, ब्रह्मा जी ने प्रदान किया है, इस पर हरि कीर्तन करता हूं।’
‘हमें भी बजाकर सुनाओ।’
देवर्षि नारद से अच्छा वीणा कौन बजाएगा? वे तो ईश्वर को सुनाते हैं, सच्चे हृदय से बजाते हैं। संगीत भक्ति की ऊंचाइयों को प्राप्त होता है। वीणा की ध्वनि अनेक हृदयों को प्रभावित करती है। रत्नाकर को भी वीणा की ध्वनि ने प्रभावित किया, नरमी आई, रौद्र रूप में धीमापन आया। अच्छा लगा। उन्हें लगा कि विचित्र परिवर्तन आ रहा है। यही तो सत्संग है। फिर भी लंबे समय का पापी जीवन था, सहज परिवर्तन संभव नहीं था।
उन्होंने कहा, ‘आपकी वीणा अच्छी है, मुझे भी अच्छी लगी। अब आपके साथ क्या व्यवहार किया जाए?’
देवर्षि ने कहा, ‘जो मेरे पास है, मैं दे दूंगा, लेकिन मेरा कुछ प्रश्न है, जिसका आप समाधान करें, तो बहुत ही अच्छा होगा।’
संत मिलते हैं, तो सत्संग होता है। संत मिलता है, तो ईश्वर की चर्चा करता है, परमार्थ की चर्चा, गुणों की चर्चा। जिनका जीवन ऊंचाई को प्राप्त होता है, उनकी चर्चा करता है। जीवन को सुंदर बनाने वाले तत्वों की चर्चा करता है।
देवर्षि ने कहा, ‘आप जो काम करते हैं, यह तो बहुत बुरा है, यह तो महान पाप का जनक है। गलत कर्म जीवन, शरीर, मन को लांछित कर देता है, क्रूर बना देता है। आप जो दूसरों के लिए या दूसरों के साथ कर रहे हैं, उससे उत्पन्न होने वाले पापों के कारण आपकी उतने ही वर्षों तक दुर्गति होगी।’
रत्नाकर ने कहा, ‘मेरा बड़ा परिवार है, उसके पास दूसरा कोई साधन नहीं है जीवन जीने का, खेती नहीं है, नौकरी नहीं है, दूसरा कोई स्रोत नहीं है। जहां से दो रुपए आएं, पोषण हो। परिवार का विकास हो। स्वास्थ बने। ऐसा कोई भी संसाधन नहीं है। मेरी चेष्टा से ही हुई कमाई से ही मेरा परिवार चलता है।’
देवर्षि ने कहा, ‘ अपने परिजनों से पूछो कि तुम्हारे साथ में वे पाप के भागी बनेंगे या नहीं? तुम्हारी पाप की कमाई खाते हैं, तुम्हारा पाप अपने माथे लेंगे या नहीं।’
वाल्मीकि जी को लगा कि ये साधु भागना चाहता है, मुझे घर भेजकर, चालाकी कर रहा है।
यह जानकर देवर्षि ने कहा, ‘यदि मुझ पर विश्वास नहीं है, तो मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि जब तक आप आओगेे नहीं, मैं जाऊंगा नहीं, विश्वास नहीं है, तो मेरे हाथ-पैर बांध दो।’
जैसे पाप से वे भोग कर रहे हैं, उससे होने वाले अधर्म में वे भागीदार बनेंगे या नहीं? यह बात रत्नाकर डाकू को भी ठीक प्रतीत हुई। उसने कहा, ‘ठीक है, मैं आपको बांध देता हूं।’
हाथ-पैर को बांध दिया और तब घर गया। घर जाकर पूछा, ‘मैं जो कमा करके लाता हूं, गलत काम करके, उसके कारण जो पाप उत्पन्न होते हैं, उस पाप में आपकी भागीदारी होगी या नहीं? पाप की कमाई से जो भोजन आता है, उसमें आप सब भागीदारी बनेंगे या नहीं?’
परिजनों ने कहा, ‘पाप में हमारी भागीदारी नहीं है। आप परिवार के मुखिया हैं, आप कहीं से भी संपत्ति लाएं और हमारा पालन-पोषण करें, आपके पाप में हमारी कोई भागीदारी नहीं है, यह बात आप समझ लीजिए।’
यह बात सुनकर रत्नाकर को बड़ा आघात लगा कि अरे, हत्या, लूटपाट से अर्जित धन में ये लोग भोगी हैं, लेकिन जो पाप उत्पन्न हो रहा है, उसमें भागीदार नहीं हैं, तो ये तो बहुत स्वार्थी लोग हो गए। ऐसे लोगों के साथ जीवन नहीं जीना चाहिए। कितना बड़ा पाप हो रहा है और ये लोग बंटवारा करना नहीं चाहते हैं, केवल लाभ लेना चाहते हैं। ये परिवार के लोग नहीं हैं, मेरे सगे नहीं हैं, ये तो दूसरे लोग हैं, मेरे अपने नहीं हैं।
जो दुर्भावना थी, वह उनकी समझ में आ गई। यहां ऐसे ही लोग रहते हैं। हर आदमी को अपनी चिंता है, स्वार्थ की चिंता है। यह बात सर्वत्र व्याप्त है।
वह आकर देवर्षि नारद के चरणों में गिर पड़े। बार-बार आग्रह किया, ‘हमें पाप कर्मों से बाहर निकालें। कैसे हम किए गए पापों की सजा पाएंगे? कैसे हम नवजीवन को प्राप्त करेंगे? कैसे हम सत्कर्म के जीवन का प्राप्त करेंगे, ऐसे जीवन को प्राप्त करेंगे, जो ईश्वर भक्ति से जुड़ा होगा। कैसे हमारा जीवन सुधरेगा। आप ही मार्ग बताइए।’
देवर्षि नारद ने कहा, ‘अपने सनातन धर्म में एक से एक संत महंत हैं, जिनके द्वारा कैसा भी जीव संत जीवन को प्राप्त कर लेता है, आप केवल मन बनाओ कि आपको अच्छा बनना है, आपको बुरे कर्मों से जुड़े नहीं रहना है। यह सबकुछ छोडऩा होगा, न लूट होगी, न हत्या होगी, न झूठ होगा, न फरेब होगा, न ऐसे लोगों की जिम्मेदारी होगी, जिनको केवल फल चाहिए। पूर्ण समर्पित होकर भगवान राम का जो नाम है उसे जपिए, उससे आपका उद्धार होगा। नाम में अद्भुत शक्ति है, यह नाम सबकुछ कर सकता है। आप नाम जपिए। राम, राम, राम, राम, राम करिए आप। यही मंत्र आपको मैं दे रहा हूं, इससे आपके जीवन में पूर्ण परिवर्तन आएगा, पूर्ण सुंदरता आएगी। संपूर्ण जीवन आपका जो अभी लांछित हो गया है, अनेक तरह से अवगुणों से दूषित हो गया है, सब ठीक हो जाएगा।
रत्नाकर ने प्रयास किया, फिर कहा, ‘मेरे मुंह में यह शब्द आ ही नहीं रहा है। राम, राम कह ही नहीं सकता। मेरा शरीर दूषित है, दिव्य शब्द राम मेरे मुंह से उच्चरित नहीं हो सकता। श्रवण और कथन के लिए जो वातावरण चाहिए, जैसी शक्ति चाहिए, वह मेरे पास नहीं है, मैं राम, राम नहीं जप सकता।’
देवर्षि ने कोशिश की, लेकिन रत्नाकर के मुंह से राम शब्द नहीं निकल पाया।
देवर्षि ने कहा, ‘ठीक है, आप राम राम नहीं जप सकते हैं, तो आप मरा, मरा ही जपिए।’
यह रत्नाकर को ठीक लगा, वे जिस गलत व्यवसाय में थे, उसमें मारो, मारो बोलते ही रहते थे, मारो, पीटो, लूटो, काटो। राम, राम तो नहीं जप पाए, पाप की अधिकता के कारण, लेकिन मरा मरा उन्होंने जपना शुरू किया।
क्रमश:
आदिकवि महर्षि वाल्मीकि : मरा मरा से राम राम तक
महर्षि वाल्मीकि जी अनूखे जीवन के ऋषि हैं। मानव जीवन पराकाष्ठा का जीवन है। हर आदमी अपने विकास के लिए प्रयास करता है और विकास होता ही है। सभी क्षेत्रों में हम अपना विकास चाहते हैं। धीरे-धीरे विकास होता है, लेकिन इस विकास का जो अंतिम क्रम है, वह ऋषित्व ही है। जहां विद्या की पराकाष्ठा है, तप की भी पराकाष्ठा है। मानवीय गुणों की पराकाष्ठा है। उनका जीवन संपूर्ण संसार के लिए है। इस स्थिति में महर्षि वाल्मीकि अनुपम हैं।
महर्षि वाल्मीकि का जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ। पिछले कर्मों के आधार पर पारिवारिक सामाजिक आधार पर उनके जीवन में एक मोड़ आता है और जीविका का जो साधन है, जीवन निर्वाह के जो सही रास्ते हैं, उन्हें छोडक़र अत्यंत गिरे हुए रास्ते को वे पकड़ लेते हैं। मारकाट का जीवन, लूटपाट का जीवन, कदाचार, पापाचार का जीवन, उनकी सभी तरह की भावना विकृत थी, जो भी मिला, उसे लूटना, जो नहीं देता है, उसकी हत्या कर देना। ऐसे वे अपने जीवन का संचालन कर रहे थे, इस आधार पर जो आई हुई संपत्ति, संसाधन हैं, उससे परिवार का पोषण करते थे। परिवार का पोषण तो अनादि कर्म है, परिवार में जो बड़ा है, वो अपने से जुड़े हुए लोगों का पोषण करता है, लेकिन शक्ति और धन अर्जन का तरीका सही होना चाहिए। शास्त्रों के अनुरूप होना चाहिए, समाज की मर्यादा से भी सही हो, शासन की जो नियमावली है, कानून-कायदे हैं, उसके अनुरूप भी सही हो, तो ही सही रूप से सही जीवन, सही भावनाएं रहती हैं। महर्षि वाल्मीकि यानी तत्कालीन जीवन में रत्नाकर का जीवन अनेक पापों के साथ चल रहा है। उनका जीवन भ्रष्ट है। गलत संसाधनों के आधार पर उनका जीवन चल रहा था, वे समाज के लिए अभिशाप के रूप में हो गए थे, हर आदमी उनकी निंदा करता था कि ये कैसा आदमी है, ब्राह्मण होकर इतना निंदनीय और हेय जीवन जी रहा है।
अचानक एक घटना होती है, दुर्भाग्यपूर्ण जीवन के अंत का एक संयोग बनता है। वैदिक सनातन धर्म के शास्त्रों में यह बात बार-बार दोहराई जाती है, किसी के जीवन में संत का प्रवेश हो, तो भला होता है। जब संत जुड़ता है किसी व्यक्ति के साथ, तो उसके जीवन में प्राण आता है, परिवर्तन आता है। क्रांति आती है, वह शुभ ही होती है। जीवन के विकास का बड़ा साधन बनाती है क्रांति। धीरे-धीरे जीवन ऊंचाई की ओर बढऩे लगता है और पराकाष्ठा को प्राप्त होता है। संतों के साथ जीवन के शुभ के लिए सशक्त साधन के रूप में सनातन धर्म मान्य है। समाज को अनादि काल से संत लोग प्रभावित करते रहे हैं, अपने ज्ञान, विज्ञान से सुधार करते रहे हैं, अपने सदाचार से ज्ञान, विज्ञान से, अपने उदार भाव, अपनी मानवीय भावना से, परमार्थ की भावना से।
क्रमश:
Saturday, 16 July 2016
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
समापन भाग
हमें विश्वामित्र जी से प्रेरणा लेनी चाहिए। हम लडऩा भी जानते है और शास्त्रार्थ में पराजित करना भी जानते हैं। भारतीय संस्कृति में केवल पढऩा या शास्त्र तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। हम केवल ज्ञानवान नहीं हैं, हमारे पास धन भी रहना चाहिए। हमारे पास ज्ञान भी रहना चाहिए।
शक्ति होनी चाहिए कि आज जो भारत भूमि को लांछित कर रहा है, रामराज्य को लांछित कर रहा है, हम उन्हें निश्चित रूप से सबक सिखा दें, इस तरह का सामथ्र्य भी हमारे पास होना चाहिए, इसके लिए हमें विश्वामित्र जी से प्र्रेरणा लेनी चाहिए। विश्वामित्र जी हर दृष्टि से समर्थ रहे। हमारा जीवन अपने लिए, समाज, परिवार की रक्षा, संरक्षण के लिए होना चाहिए। हमारा जीवन मानवता के लिए वरदान होना चाहिए। ज्ञान भी चाहिए और शक्ति भी चाहिए और धर्म के माध्यम से चाहिए। विश्वामित्र जी ने अपने को ऐसा बनाया था कि आज भी हमें गौरव है। इस देश में वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषि-संत हमारे लिए प्रेरणा स्रोत हैं, उनका ज्ञान, उनका जीवन हमारे लिए आदर्श है, उनका इतिहास हमारे साथ है। भगवान से प्रार्थना है कि ऋषियों की प्रेरणा, उनका ज्ञान, उनकी नीति, उनके द्वारा किया गया प्रयोग सभी के जीवन में आए और हम लोग अपने देश, संसार, मानवता को सभी दृष्टि से लांछित होने से बचाएं। संतत्व को लांछित होने से बचाएं। गुरुत्व लांछित हो रहा है, भारत भूमि की वंदना लांछित हो रही है। धर्मज्ञान, अध्यात्म लांछित हो रहा है, हमें सुधार की दिशा में बढऩा ही चाहिए।
कितना प्रभाव था विश्वामित्र जी का जनकपुर में, अनेक राजा-महाराजा आए थे, कोई विश्वामित्र जी के साथ आंख नहीं मिला सकता था, जनक जी ने स्वयं को धन्य माना कि आप राम जी को लेकर आए। वशिष्ठ ने भी स्वयं को धन्य माना। कहीं कोई कमी नहीं है, दूसरों को सम्मान देने में स्नेह देने में। जब दो परिपूर्ण विभूतियां एक दूसरे के साथ सही ढंग से जुड़ेंगी, तभी तो समाज को लाभ होगा, नहीं तो समाज अपनी संपत्ति को खो देगा, बिखर जाएगा।
हमें ऋषियों से गौरव लेना है, ज्ञान लेना है, दिशा लेनी है। रामजी को परिपूर्ण जीवन मिला। गृहस्थ जीवन बिना दान-त्याग के अधूरा होता है। हम कह सकते हैं कि विश्वामित्र जी ने ही जानकी जी से राम जी का विवाह करवाया। यह भी अद्भुत घटना है। जनकपुर में रामजी हैं, उस विवाह में वशिष्ठ जी भी पहुंचते हैं, वहां विश्वामित्र जी पहले से हैं, कहीं कोई संतुलन नहीं बिगड़ता है। दोनों एक दूसरे के लिए भरपूर सम्मान रखते हैं, एक दूसरे का प्रभाव बढ़ाते हुए रामराज्य को सशक्त करते हैं। यदि हम इन ऋषियों से कुछ भी सीखते हैं, तो हमारा खोया हुआ जगतगुरुत्व, खोया हुआ जो संसार का नेतृत्व है, जो खोया हुआ हमारा वैभव है, वह हमें अवश्य प्राप्त हो जाएगा।
जय श्रीराम
हमें विश्वामित्र जी से प्रेरणा लेनी चाहिए। हम लडऩा भी जानते है और शास्त्रार्थ में पराजित करना भी जानते हैं। भारतीय संस्कृति में केवल पढऩा या शास्त्र तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। हम केवल ज्ञानवान नहीं हैं, हमारे पास धन भी रहना चाहिए। हमारे पास ज्ञान भी रहना चाहिए।
शक्ति होनी चाहिए कि आज जो भारत भूमि को लांछित कर रहा है, रामराज्य को लांछित कर रहा है, हम उन्हें निश्चित रूप से सबक सिखा दें, इस तरह का सामथ्र्य भी हमारे पास होना चाहिए, इसके लिए हमें विश्वामित्र जी से प्र्रेरणा लेनी चाहिए। विश्वामित्र जी हर दृष्टि से समर्थ रहे। हमारा जीवन अपने लिए, समाज, परिवार की रक्षा, संरक्षण के लिए होना चाहिए। हमारा जीवन मानवता के लिए वरदान होना चाहिए। ज्ञान भी चाहिए और शक्ति भी चाहिए और धर्म के माध्यम से चाहिए। विश्वामित्र जी ने अपने को ऐसा बनाया था कि आज भी हमें गौरव है। इस देश में वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषि-संत हमारे लिए प्रेरणा स्रोत हैं, उनका ज्ञान, उनका जीवन हमारे लिए आदर्श है, उनका इतिहास हमारे साथ है। भगवान से प्रार्थना है कि ऋषियों की प्रेरणा, उनका ज्ञान, उनकी नीति, उनके द्वारा किया गया प्रयोग सभी के जीवन में आए और हम लोग अपने देश, संसार, मानवता को सभी दृष्टि से लांछित होने से बचाएं। संतत्व को लांछित होने से बचाएं। गुरुत्व लांछित हो रहा है, भारत भूमि की वंदना लांछित हो रही है। धर्मज्ञान, अध्यात्म लांछित हो रहा है, हमें सुधार की दिशा में बढऩा ही चाहिए।
कितना प्रभाव था विश्वामित्र जी का जनकपुर में, अनेक राजा-महाराजा आए थे, कोई विश्वामित्र जी के साथ आंख नहीं मिला सकता था, जनक जी ने स्वयं को धन्य माना कि आप राम जी को लेकर आए। वशिष्ठ ने भी स्वयं को धन्य माना। कहीं कोई कमी नहीं है, दूसरों को सम्मान देने में स्नेह देने में। जब दो परिपूर्ण विभूतियां एक दूसरे के साथ सही ढंग से जुड़ेंगी, तभी तो समाज को लाभ होगा, नहीं तो समाज अपनी संपत्ति को खो देगा, बिखर जाएगा।
हमें ऋषियों से गौरव लेना है, ज्ञान लेना है, दिशा लेनी है। रामजी को परिपूर्ण जीवन मिला। गृहस्थ जीवन बिना दान-त्याग के अधूरा होता है। हम कह सकते हैं कि विश्वामित्र जी ने ही जानकी जी से राम जी का विवाह करवाया। यह भी अद्भुत घटना है। जनकपुर में रामजी हैं, उस विवाह में वशिष्ठ जी भी पहुंचते हैं, वहां विश्वामित्र जी पहले से हैं, कहीं कोई संतुलन नहीं बिगड़ता है। दोनों एक दूसरे के लिए भरपूर सम्मान रखते हैं, एक दूसरे का प्रभाव बढ़ाते हुए रामराज्य को सशक्त करते हैं। यदि हम इन ऋषियों से कुछ भी सीखते हैं, तो हमारा खोया हुआ जगतगुरुत्व, खोया हुआ जो संसार का नेतृत्व है, जो खोया हुआ हमारा वैभव है, वह हमें अवश्य प्राप्त हो जाएगा।
जय श्रीराम
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
भाग - ७
सबसे पहले राम जी ने कहा -
निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाईं।
आप निर्भय होकर यज्ञ कीजिए। रामजी ने विश्वामित्र जी को कहा, जो राक्षस आएंगे, उन्हें मैं कालकलवित कर दूंगा। आप यज्ञ कीजिए।
धर्म का सबसे बड़ा कृत्य है यज्ञ। देवता जितना देते हैं, उसके बदले में हम भी उन्हें दें, उनका अभिनंदन करें, हमारी मानवता हमारा व्यक्तित्व देवत्व को प्राप्त करेगा। देवत्व से ईश्वरत्व को प्राप्त करेगा। जीवन की सबसे बड़ी ऊंचाई यही होती है कि हम अपने बच्चे को कैसे ऊंचाई तक ले जाएं। तो विश्वामित्र जी का और वशिष्ठ जी का, दोनों का ऋषित्व मिलकर एक बहुत बड़े संसार के उपकार का मार्ग प्रशस्त करता है। लोग कहा करते हैं कि राम जी अद्भुत हैं, ऋषि के समान हैं, ऋषि जैसे दो तत्वों को मिलाता है, एक पक्ष विश्वामित्र और दूसरा पक्ष वशिष्ठ जी हैं। एक का जन्म ही ब्रह्मर्षि के परिवार में हुआ है और एक का जन्म हुआ क्षत्रिय परिवार में, दोनों ने धीरे-धीरे संयम-नियम करते हुए जीवन को बड़ा किया और बहुत बड़ी दूरी थी दोनों के बीच, लेकिन वह भी धीरे-धीरे कम होती चली गई। परिपूर्ण, अटल रूप से दोनों के हित साथ हुए और दानों को राम जी ने जोड़ा। कौशल्या और कैकयी की दूरी को कम किया, उत्तर और दक्षिण को जोड़ा, ऐसे ही रामजी ने विश्वामित्र जी और वशिष्ठ जी को जोड़ा। दोनों ऋषियों ने मिलकर संपूर्ण जीवन में धर्म राज्य-अध्यात्म राज्य को बढ़ाया, यह पे्ररणा लेने वाली बात है।
रामजी जैसा सोचने की जरूरत है। विश्वामित्र और वशिष्ठ की तरह सोचने की जरूरत है। हमारे जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है धर्म की स्थापना, हम संतों और आचार्यों के जीवन का, लेकिन अब तो सभी लोग धन एकत्र करने लगे कि कैसे मठ बड़ा हो जाए, कैसे गाडिय़ां बड़ी हो जाएं। कैसे हमारे जीवन का वैभव बढ़े, कैसे हमारा संग्रह प्रभाव बढ़े। कैसे रोज हमारा नाम अखबारों में आए। हम कैसे समाज के नेता हो जाएं, ये तमाम तरह इच्छाएं बलवती हो रही हैं। गृहस्थ जीवन में अर्थ और भोग ही जैसे प्रधान होता है, वैसे ही आज के संतों का मुख्य रूप से उद्देश्य केवल मान-सम्मान, धन-दौलत है।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं, जैसे आपने वशिष्ठ-विश्वामित्र को एक साथ जोड़ा, दोनों को साथ लेकर संपूर्ण मानवता के लिए अपने को अर्पित किया। असंख्य जीवों का उद्धार किया। कैसी अनुपमता जीवन में प्रकट हुई, ठीक इसी तरह के परिवर्तन आज के संत समाज में होने चाहिए। ऐसा हुआ, तो बहुत लाभ होगा और पूरे विश्व को लाभ होगा। धन, विद्या, शक्ति इत्यादि सबमें वृद्धि होगी। आज जो अभाव दिख रहा है, एक दूसरे को सहन नहीं करने से उपजा अभाव है, कहीं-कहीं लगता है कि केवल हम हम ही हों, दूसरा कोई न हो, यह गलत प्रवृत्ति है। भगवान की दया से विश्वामित्र जी कहते थे कि हमारे एक हाथ में वेद है और एक हाथ में धनुष हैं।
हम दोनों ही दिशाओं में समर्थ हैं। शास्त्र भी है और शक्ति भी है। जिसके जीवन में केवल शास्त्र ही हो, उसका जीवन अधूरा है और जिसके जीवन में केवल शक्ति हो, उसका जीवन भी अधूरा है। भारतीय संस्कृति की विशेषता है। यह ध्यान देने की बात है कि हमने धन बल को बढ़ाया, तप बल को नहीं बढ़ाया, इसलिए देश पराजित हो गया। लंबे समय तक के लिए गुलाम हो गया।
क्रमश:
सबसे पहले राम जी ने कहा -
निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाईं।
आप निर्भय होकर यज्ञ कीजिए। रामजी ने विश्वामित्र जी को कहा, जो राक्षस आएंगे, उन्हें मैं कालकलवित कर दूंगा। आप यज्ञ कीजिए।
धर्म का सबसे बड़ा कृत्य है यज्ञ। देवता जितना देते हैं, उसके बदले में हम भी उन्हें दें, उनका अभिनंदन करें, हमारी मानवता हमारा व्यक्तित्व देवत्व को प्राप्त करेगा। देवत्व से ईश्वरत्व को प्राप्त करेगा। जीवन की सबसे बड़ी ऊंचाई यही होती है कि हम अपने बच्चे को कैसे ऊंचाई तक ले जाएं। तो विश्वामित्र जी का और वशिष्ठ जी का, दोनों का ऋषित्व मिलकर एक बहुत बड़े संसार के उपकार का मार्ग प्रशस्त करता है। लोग कहा करते हैं कि राम जी अद्भुत हैं, ऋषि के समान हैं, ऋषि जैसे दो तत्वों को मिलाता है, एक पक्ष विश्वामित्र और दूसरा पक्ष वशिष्ठ जी हैं। एक का जन्म ही ब्रह्मर्षि के परिवार में हुआ है और एक का जन्म हुआ क्षत्रिय परिवार में, दोनों ने धीरे-धीरे संयम-नियम करते हुए जीवन को बड़ा किया और बहुत बड़ी दूरी थी दोनों के बीच, लेकिन वह भी धीरे-धीरे कम होती चली गई। परिपूर्ण, अटल रूप से दोनों के हित साथ हुए और दानों को राम जी ने जोड़ा। कौशल्या और कैकयी की दूरी को कम किया, उत्तर और दक्षिण को जोड़ा, ऐसे ही रामजी ने विश्वामित्र जी और वशिष्ठ जी को जोड़ा। दोनों ऋषियों ने मिलकर संपूर्ण जीवन में धर्म राज्य-अध्यात्म राज्य को बढ़ाया, यह पे्ररणा लेने वाली बात है।
रामजी जैसा सोचने की जरूरत है। विश्वामित्र और वशिष्ठ की तरह सोचने की जरूरत है। हमारे जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है धर्म की स्थापना, हम संतों और आचार्यों के जीवन का, लेकिन अब तो सभी लोग धन एकत्र करने लगे कि कैसे मठ बड़ा हो जाए, कैसे गाडिय़ां बड़ी हो जाएं। कैसे हमारे जीवन का वैभव बढ़े, कैसे हमारा संग्रह प्रभाव बढ़े। कैसे रोज हमारा नाम अखबारों में आए। हम कैसे समाज के नेता हो जाएं, ये तमाम तरह इच्छाएं बलवती हो रही हैं। गृहस्थ जीवन में अर्थ और भोग ही जैसे प्रधान होता है, वैसे ही आज के संतों का मुख्य रूप से उद्देश्य केवल मान-सम्मान, धन-दौलत है।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं, जैसे आपने वशिष्ठ-विश्वामित्र को एक साथ जोड़ा, दोनों को साथ लेकर संपूर्ण मानवता के लिए अपने को अर्पित किया। असंख्य जीवों का उद्धार किया। कैसी अनुपमता जीवन में प्रकट हुई, ठीक इसी तरह के परिवर्तन आज के संत समाज में होने चाहिए। ऐसा हुआ, तो बहुत लाभ होगा और पूरे विश्व को लाभ होगा। धन, विद्या, शक्ति इत्यादि सबमें वृद्धि होगी। आज जो अभाव दिख रहा है, एक दूसरे को सहन नहीं करने से उपजा अभाव है, कहीं-कहीं लगता है कि केवल हम हम ही हों, दूसरा कोई न हो, यह गलत प्रवृत्ति है। भगवान की दया से विश्वामित्र जी कहते थे कि हमारे एक हाथ में वेद है और एक हाथ में धनुष हैं।
हम दोनों ही दिशाओं में समर्थ हैं। शास्त्र भी है और शक्ति भी है। जिसके जीवन में केवल शास्त्र ही हो, उसका जीवन अधूरा है और जिसके जीवन में केवल शक्ति हो, उसका जीवन भी अधूरा है। भारतीय संस्कृति की विशेषता है। यह ध्यान देने की बात है कि हमने धन बल को बढ़ाया, तप बल को नहीं बढ़ाया, इसलिए देश पराजित हो गया। लंबे समय तक के लिए गुलाम हो गया।
क्रमश:
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
भाग - ६
वशिष्ठ जी और विश्वामित्र जी की आध्यात्मिकता में कहीं भी कोई खोटापन होता, कहीं मन में प्रतिस्पद्र्धा होती, तो ऐसा संभव नहीं होता। वशिष्ठ जी स्वयं लेकर जाते राम जी को या नहीं जाने देते, लेकिन वशिष्ठ जी श्रेष्ठ भावों को समझ रहे थे। आज के ऋषियों-संतों को देखना चाहिए, यदि आज ऐसी स्थिति हो, तो वे क्या करेंगे। विश्वामित्र जी लेने आए हैं, पहली बार राम जी को, ऐसे कर्म के लिए जाना है और इसी यात्रा में विवाह का भी योग बनना है। तो वशिष्ठ जी के स्थान पर कोई अन्य संत या ऋषि होता या आज का कोई धर्माचार्य होता, तो अपने शिष्य को देता क्या? दशरथ जी चाहते भी, तो मना कर देता या कहता कि मैं लेकर आऊंगा, लेकिन धन्य हैं वशिष्ठ जी, उनका ऋषित्व विशिष्ट है, उनमें कहीं से भी कोई त्रुटि नहीं है। इसलिए उन्होंने दशरथ जी को समझाया। समझाया कि राम जी क्यों आए हैं। राम तो संपूर्ण विश्व के लिए राम हैं, संपूर्ण विश्व में धर्म की संस्थापना के लिए राम जी आए हैं। रामराज्य की संस्थापना के लिए आए हैं, सब जगह प्रेम हो, अच्छे संस्कार हों, इसके लिए आए हैं। उस जगह के निर्माण के लिए आए हैं, जहां - सबहीं करें परस्पर प्रीति।
सबके लिए सबके मन में प्रेम हो, सभी लोग जीवन के चरमोत्कर्ष को प्राप्त करके जीवन जीएं। दशरथ जी ने वशिष्ठ जी के कहने पर राम-लक्ष्मण को जाने दिया। आज तक राम, लक्ष्मण के गुरु वशिष्ठ जी थे, लेकिन उन्होंने अपने शिष्यों को कहा कि ये केवल मेरे ही शिष्य नहीं हैं, अब विश्वामित्र जी के भी शिष्य हैं।
आश्वस्त होने के बाद दशरथ जी ने सहर्ष कहा -
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आना नहिं कोऊ।।
यात्रा के दौरान विश्वामित्र जी ने अनेक तरह की शिक्षाओं, साधनाओं से राम जी को परिचित कराया। ऐसे दिव्यास्त्र दिए, जो इन्हें साक्षात भगवान शंकर से मिले थे। ईश्वर के रूप में राम जी सबकुछ जानते हैं, लेकिन तब भी लोकाचार के लिए राम जी को कई शिक्षाओं से विभूषित किया।
आज के आचार्यों, धर्माचार्यों को सीखना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन में लोगों को पे्ररणा लेनी चाहिए। सभी दृष्टियों से लौकिक और अलौकिक अवस्थाओं को जानने वाले शिष्य को कोई दूसरे को देता है क्या? मानवता के प्रति भले का भाव वशिष्ठ जी जैसा किसी के पास दिखता है क्या? आज के संतों में वैसा समर्पण है क्या? आज तो ज्यादातर लोग गर्त में जा रहे हैं। आज दो रुपया देने वाला चेला भी दूसरे मठ में जाता है, तो उसके गुरु को बुरा लगता है। बड़े-बड़े संत वेषधारी आचार्य बड़े-बड़े धर्माचार्य एकदम तड़पने लगते हैं कि कहां चला गया चेला, निकम्मा है, गधा है। बहुत विकृत्ति आई है धर्माचार्यों में।
विश्वामित्र जी को कितना अच्छा लगा होगा, वशिष्ठ जी उनका भरपूर सम्मान कर रहे हैं, अपने शिष्यों को मेरे साथ भेज रहे हैं। कैसा अनुभव हुआ होगा उन्हें, यह वैदिक सनातन धर्म का सुख जिसका कोई विकल्प नहीं है। ऐसे चरित्र कहां मिलेंगे, सभी लोगों को ऐसे ऋषियों, संतों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
तो रामजी गए उनके साथ ऋषि-मानवता सेवा के लिए। रामजी के बोल तभी पहली बार निकलते हैं, उसके पहले उनके वचन का कोई उदाहरण नहीं मिलता, तुलसीदास जी ने पहली बार राम जी को बोलते हुए विश्वामित्र जी के साथ ही दिखाया। जब यज्ञ प्रारंभ होने वाला था, तब सबसे पहले राम जी ने जो कहा, उसे तुलसीदास जी ने लिखा, उसके पहले उनके किसी वचन को नहीं लिखा। इतनी बड़ी आयु तक वे सावधान थे कि जब राम-वचन की शुरुआत करूंगा, तो जिसके लिए ईश्वर ने अवतार लिया है, उसके लिए करूंगा।
आज खा लिया, आज वहां जाने का मन है, आज यह खेलूंगा, जैसी बालपन वाली बातों का विवरण तुलसीदास जी ने नहीं किया। ईश्वर का अवतार कोई ऐसी बातों के लिए होता है क्या, ईश्वर जिसके लिए आते हैं, उसी का महत्व है।
क्रमश:
वशिष्ठ जी और विश्वामित्र जी की आध्यात्मिकता में कहीं भी कोई खोटापन होता, कहीं मन में प्रतिस्पद्र्धा होती, तो ऐसा संभव नहीं होता। वशिष्ठ जी स्वयं लेकर जाते राम जी को या नहीं जाने देते, लेकिन वशिष्ठ जी श्रेष्ठ भावों को समझ रहे थे। आज के ऋषियों-संतों को देखना चाहिए, यदि आज ऐसी स्थिति हो, तो वे क्या करेंगे। विश्वामित्र जी लेने आए हैं, पहली बार राम जी को, ऐसे कर्म के लिए जाना है और इसी यात्रा में विवाह का भी योग बनना है। तो वशिष्ठ जी के स्थान पर कोई अन्य संत या ऋषि होता या आज का कोई धर्माचार्य होता, तो अपने शिष्य को देता क्या? दशरथ जी चाहते भी, तो मना कर देता या कहता कि मैं लेकर आऊंगा, लेकिन धन्य हैं वशिष्ठ जी, उनका ऋषित्व विशिष्ट है, उनमें कहीं से भी कोई त्रुटि नहीं है। इसलिए उन्होंने दशरथ जी को समझाया। समझाया कि राम जी क्यों आए हैं। राम तो संपूर्ण विश्व के लिए राम हैं, संपूर्ण विश्व में धर्म की संस्थापना के लिए राम जी आए हैं। रामराज्य की संस्थापना के लिए आए हैं, सब जगह प्रेम हो, अच्छे संस्कार हों, इसके लिए आए हैं। उस जगह के निर्माण के लिए आए हैं, जहां - सबहीं करें परस्पर प्रीति।
सबके लिए सबके मन में प्रेम हो, सभी लोग जीवन के चरमोत्कर्ष को प्राप्त करके जीवन जीएं। दशरथ जी ने वशिष्ठ जी के कहने पर राम-लक्ष्मण को जाने दिया। आज तक राम, लक्ष्मण के गुरु वशिष्ठ जी थे, लेकिन उन्होंने अपने शिष्यों को कहा कि ये केवल मेरे ही शिष्य नहीं हैं, अब विश्वामित्र जी के भी शिष्य हैं।
आश्वस्त होने के बाद दशरथ जी ने सहर्ष कहा -
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आना नहिं कोऊ।।
यात्रा के दौरान विश्वामित्र जी ने अनेक तरह की शिक्षाओं, साधनाओं से राम जी को परिचित कराया। ऐसे दिव्यास्त्र दिए, जो इन्हें साक्षात भगवान शंकर से मिले थे। ईश्वर के रूप में राम जी सबकुछ जानते हैं, लेकिन तब भी लोकाचार के लिए राम जी को कई शिक्षाओं से विभूषित किया।
आज के आचार्यों, धर्माचार्यों को सीखना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन में लोगों को पे्ररणा लेनी चाहिए। सभी दृष्टियों से लौकिक और अलौकिक अवस्थाओं को जानने वाले शिष्य को कोई दूसरे को देता है क्या? मानवता के प्रति भले का भाव वशिष्ठ जी जैसा किसी के पास दिखता है क्या? आज के संतों में वैसा समर्पण है क्या? आज तो ज्यादातर लोग गर्त में जा रहे हैं। आज दो रुपया देने वाला चेला भी दूसरे मठ में जाता है, तो उसके गुरु को बुरा लगता है। बड़े-बड़े संत वेषधारी आचार्य बड़े-बड़े धर्माचार्य एकदम तड़पने लगते हैं कि कहां चला गया चेला, निकम्मा है, गधा है। बहुत विकृत्ति आई है धर्माचार्यों में।
विश्वामित्र जी को कितना अच्छा लगा होगा, वशिष्ठ जी उनका भरपूर सम्मान कर रहे हैं, अपने शिष्यों को मेरे साथ भेज रहे हैं। कैसा अनुभव हुआ होगा उन्हें, यह वैदिक सनातन धर्म का सुख जिसका कोई विकल्प नहीं है। ऐसे चरित्र कहां मिलेंगे, सभी लोगों को ऐसे ऋषियों, संतों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
तो रामजी गए उनके साथ ऋषि-मानवता सेवा के लिए। रामजी के बोल तभी पहली बार निकलते हैं, उसके पहले उनके वचन का कोई उदाहरण नहीं मिलता, तुलसीदास जी ने पहली बार राम जी को बोलते हुए विश्वामित्र जी के साथ ही दिखाया। जब यज्ञ प्रारंभ होने वाला था, तब सबसे पहले राम जी ने जो कहा, उसे तुलसीदास जी ने लिखा, उसके पहले उनके किसी वचन को नहीं लिखा। इतनी बड़ी आयु तक वे सावधान थे कि जब राम-वचन की शुरुआत करूंगा, तो जिसके लिए ईश्वर ने अवतार लिया है, उसके लिए करूंगा।
आज खा लिया, आज वहां जाने का मन है, आज यह खेलूंगा, जैसी बालपन वाली बातों का विवरण तुलसीदास जी ने नहीं किया। ईश्वर का अवतार कोई ऐसी बातों के लिए होता है क्या, ईश्वर जिसके लिए आते हैं, उसी का महत्व है।
क्रमश:
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
भाग - ५
ऐसे धर्म भी हैं, जिनके कथित संतों को भक्तों ने ही मार दिया। दंड विधान था ही नहीं। लोग एक हत्या नहीं झेल पाते, लेकिन यहां सौ पुत्रों की हत्या हो गई, फिर भी वशिष्ठ निर्लिप्त थे, गुणों की क्या ऊंचाई है। ऐसा किसी धर्म में नहीं मिलेगा, मानवता के लिए यह अनुकरणीय है, अच्छे संस्कार होने चाहिए, जो भी अच्छा कार्य करे, उसकी प्रशंसा की प्रवृत्ति होनी चाहिए। हर कोई पवित्र जीवन को प्राप्त करे, बदले की कोई भावना नहीं रहे, तब जो समाज बनेगा, वह वरदान स्वरूप होगा।
वस्तुत: यही जीवन का अद्भुत क्रम है, जो हम विश्वामित्र जी के जीवन में देखते हैं। हम अपने जीवन का ध्यान करें, अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए बल को बढ़ाने के लिए तप को बढ़ाने के लिए, जो भी आंतरिक भावों को बढ़ाने के लिए सकारात्मक है, हम निरंतर साधना करें, तप करें, जप करें, संयम-नियम करें। ऐसा करते-करते धीरे-धीरे हमारा विकास होता जाएगा। हम अपने जीवन को भी सार्थक करेंगे और दूसरे के जीवन को भी। रामराज्य जो दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मानक राज्य है, जहां लोग सभी दृष्टि से संपन्न और आनंदित थे, जहां किसी तरह का संताप नहीं था, जहां किसी तरह का विरोध नहीं था, जहां परस्पर प्रेम था, उस रामराज्य को अनेक लोगों ने अपना बल दिया होगा, प्रयास किया होगा। अपना सर्वस्व अर्पित किया होगा, लेकिन विश्वामित्र जी भी वशिष्ठ जी के समान ही रामराज्य के संस्थापकों में गिने जा सकते हैं। यह अद्भुत घटना है, राम जी पहली बार विश्वामित्र जी के आचार्यत्व में ही घर से निकलते हैं। ईश्वर मानवता के लिए ही आता है, समाज के परिष्कार के लिए आता है, वैदिक सनातन धर्म की यही मान्यता है। धर्म का सबसे बड़ा स्वरूप यज्ञ को माना जाता है। धर्म के अनेक रूप है, दान भी धर्म है, दया भी धर्म है, सेवा भी धर्म है, तीर्थाटन भी धर्म है, माता-पिता गुरु, गऊ, दरिद्रनारायण की सेवा भी धर्म है, धर्म के अनेक विकल्प हैं, लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान यज्ञ का है। देवताओं को सम्बोधित करके जब समर्पण होता है, तब यज्ञ संपन्न होता है।
तो भगवान के अवतारों में आदर्श अवतार है भगवान श्री राम का। धर्म के सर्वश्रेष्ठ कर्म के संपादन के लिए यज्ञ की सुरक्षा में अपने को अर्पित करने के लिए विश्वामित्र जी के आचार्यत्व में अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ राम जी वन जाते हैं। तैंतीस हजार वर्षों का काल है राम जी का, लेकिन कर्म का पहला प्रयोग, उसके लिए जो पहली यात्रा हुई, वह विश्वामित्र जी के साथ ही शुरू हुई। कौन सेवा के क्षेत्र में, धर्म के क्षेत्र में लेने आया, कौन लेकर गया, यह बहुत महत्व रखता है। विश्वामित्र जी ने ही राम जी को मांगा और दशरथ जी से मांगकर ले गए। उन्हें मालूम था कि भगवान प्रकट हुए हैं, मैं अयोध्या जाऊंगा, तब राम जी मिलेंगे।
राम जी लौकिक दृष्टि से विश्वामित्र जी के भी शिष्य हैं। व्यावहारिक दृष्टि से मानवीय दृष्टि से विश्वामित्र जी को शाष्टांग प्रणाम करते हैं, लेकिन वास्तव में विश्वामित्र जी भक्त हैं राम जी के। उन्हें मालूम है कि मैंने जो तप किया था, उसका फल हैं राम जी। फल देने वाले भी यही हैं और मुख्य लक्ष्य भी यही हैं, उनके लिए ही मैंने तप किया था। विश्वामित्र जी ले गए राम जी को यज्ञ रक्षा के लिए। पहले यह बात समझ में नहीं आ रही थी महाराजा दशरथ जी को, राम जी को भेजने को तैयार नहीं हो रहे थे।
दशरथ जी को राम जी बहुत प्रिय थे, प्रेम अतुलनीय था, अपने प्राणों से अधिक पे्रम वे अपने पुत्र राम जी से करते थे। यह बात ध्यान देने योग्य है कि वशिष्ठ जी ने कहा कि मैं लेकर आता हूं, दशरथ जी राम जी को भेजने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं, मैं समझाऊंगा, तैयार करूंगा।
क्रमश:
ऐसे धर्म भी हैं, जिनके कथित संतों को भक्तों ने ही मार दिया। दंड विधान था ही नहीं। लोग एक हत्या नहीं झेल पाते, लेकिन यहां सौ पुत्रों की हत्या हो गई, फिर भी वशिष्ठ निर्लिप्त थे, गुणों की क्या ऊंचाई है। ऐसा किसी धर्म में नहीं मिलेगा, मानवता के लिए यह अनुकरणीय है, अच्छे संस्कार होने चाहिए, जो भी अच्छा कार्य करे, उसकी प्रशंसा की प्रवृत्ति होनी चाहिए। हर कोई पवित्र जीवन को प्राप्त करे, बदले की कोई भावना नहीं रहे, तब जो समाज बनेगा, वह वरदान स्वरूप होगा।
वस्तुत: यही जीवन का अद्भुत क्रम है, जो हम विश्वामित्र जी के जीवन में देखते हैं। हम अपने जीवन का ध्यान करें, अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए बल को बढ़ाने के लिए तप को बढ़ाने के लिए, जो भी आंतरिक भावों को बढ़ाने के लिए सकारात्मक है, हम निरंतर साधना करें, तप करें, जप करें, संयम-नियम करें। ऐसा करते-करते धीरे-धीरे हमारा विकास होता जाएगा। हम अपने जीवन को भी सार्थक करेंगे और दूसरे के जीवन को भी। रामराज्य जो दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मानक राज्य है, जहां लोग सभी दृष्टि से संपन्न और आनंदित थे, जहां किसी तरह का संताप नहीं था, जहां किसी तरह का विरोध नहीं था, जहां परस्पर प्रेम था, उस रामराज्य को अनेक लोगों ने अपना बल दिया होगा, प्रयास किया होगा। अपना सर्वस्व अर्पित किया होगा, लेकिन विश्वामित्र जी भी वशिष्ठ जी के समान ही रामराज्य के संस्थापकों में गिने जा सकते हैं। यह अद्भुत घटना है, राम जी पहली बार विश्वामित्र जी के आचार्यत्व में ही घर से निकलते हैं। ईश्वर मानवता के लिए ही आता है, समाज के परिष्कार के लिए आता है, वैदिक सनातन धर्म की यही मान्यता है। धर्म का सबसे बड़ा स्वरूप यज्ञ को माना जाता है। धर्म के अनेक रूप है, दान भी धर्म है, दया भी धर्म है, सेवा भी धर्म है, तीर्थाटन भी धर्म है, माता-पिता गुरु, गऊ, दरिद्रनारायण की सेवा भी धर्म है, धर्म के अनेक विकल्प हैं, लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान यज्ञ का है। देवताओं को सम्बोधित करके जब समर्पण होता है, तब यज्ञ संपन्न होता है।
तो भगवान के अवतारों में आदर्श अवतार है भगवान श्री राम का। धर्म के सर्वश्रेष्ठ कर्म के संपादन के लिए यज्ञ की सुरक्षा में अपने को अर्पित करने के लिए विश्वामित्र जी के आचार्यत्व में अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ राम जी वन जाते हैं। तैंतीस हजार वर्षों का काल है राम जी का, लेकिन कर्म का पहला प्रयोग, उसके लिए जो पहली यात्रा हुई, वह विश्वामित्र जी के साथ ही शुरू हुई। कौन सेवा के क्षेत्र में, धर्म के क्षेत्र में लेने आया, कौन लेकर गया, यह बहुत महत्व रखता है। विश्वामित्र जी ने ही राम जी को मांगा और दशरथ जी से मांगकर ले गए। उन्हें मालूम था कि भगवान प्रकट हुए हैं, मैं अयोध्या जाऊंगा, तब राम जी मिलेंगे।
राम जी लौकिक दृष्टि से विश्वामित्र जी के भी शिष्य हैं। व्यावहारिक दृष्टि से मानवीय दृष्टि से विश्वामित्र जी को शाष्टांग प्रणाम करते हैं, लेकिन वास्तव में विश्वामित्र जी भक्त हैं राम जी के। उन्हें मालूम है कि मैंने जो तप किया था, उसका फल हैं राम जी। फल देने वाले भी यही हैं और मुख्य लक्ष्य भी यही हैं, उनके लिए ही मैंने तप किया था। विश्वामित्र जी ले गए राम जी को यज्ञ रक्षा के लिए। पहले यह बात समझ में नहीं आ रही थी महाराजा दशरथ जी को, राम जी को भेजने को तैयार नहीं हो रहे थे।
दशरथ जी को राम जी बहुत प्रिय थे, प्रेम अतुलनीय था, अपने प्राणों से अधिक पे्रम वे अपने पुत्र राम जी से करते थे। यह बात ध्यान देने योग्य है कि वशिष्ठ जी ने कहा कि मैं लेकर आता हूं, दशरथ जी राम जी को भेजने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं, मैं समझाऊंगा, तैयार करूंगा।
क्रमश:
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