धर्म के ज्ञान से ही व्यक्ति को जीने की कला आती है.
Saturday, 24 September 2016
मरा मरा से राम राम तक
समापन भाग
भारत कोई विश्व गुरु ऐसे ही नहीं हो गया था। विश्व गुरुत्व का परम पद हम केवल डॉक्टर, इंजीनियर पैदा करके नहीं पा सकेंगे, जब तक ऋषियों से सम्बंधित भावनाएं जीवन में नहीं अवतरित होंगी, तब तक जीवन कमाऊ और खाऊ ही बना रहेगा।
राम जी और जानकी जी ने अपने बच्चों को जैसे पाला, वह आदर्श है। महर्षि वाल्मीकि मेरुदंड के समान उपयोगी और प्रामाणिक स्तंभ हैं। सारा जीवन उन्होंने राम जी के साथ मिलकर उनके भावों को उनके विचारों को मूर्त रूप देने में उनकी स्थापनाओं को मजबूती और संबल देने में लगाया। ऐसे ऋषियों की जरूरत है।
वैसे आजकल कई गुरुकुल खुल रहे हैं, लेकिन उनमें प्रतिष्ठा की इच्छा ज्यादा है। धन अर्जन की इच्छा ज्यादा है। अभी ऐसे ही एक गुरुकुल में मुझे जाने का अवसर मिला, मैंने देखा, गुरुकुल गौण हो गया है और ऐश्वर्य महत्वपूर्ण हो गया है। मैं कुरुक्षेत्र में गया था एक आश्रम में, सर्दी काल में बच्चों के शरीर पर पूरे वस्त्र नहीं थे, दरिद्रों के बच्चों की तरह, जब वस्त्र ही नहीं मिल रहा था, तो खाने को क्या मिल रहा होगा, जब भोजन ही नहीं मिलेगा, तो संस्कार क्या मिलेगा और विद्या क्या मिलेगी? गुरुकुल का लक्षण ऊपर से दिखता है, लेकिन गहराई में जाइए, तो पता चलता है कि गुरुकुल आज सही नहीं हैं। आज ज्यादातर गुरुकुल पैसा कमाने के लिए ही बनते हैं। सैंकड़ों गुरुकुल चल रहे हैं, लेकिन एक भी बड़ा विद्वान और संत पैदा नहीं कर रहे हैं, यह तो डकैती वाला काम हो रहा है। आज के गुरुकुल अच्छे संस्कार कहां दे रहे हैं। वाल्मीकि के गुरुकुल से अगर तुलना करें, तो पता चलेगा कि हम कितना पीछे हैं। पूरी मानव जाति के लिए वे समर्पित हैं, उनका रोम-रोम पुकार रहा है कि तुम ज्ञान पाओ और जीवन को धन्य बनाओ। ऐसे गुरुकुलों का प्रचलन करना चाहिए, उनसे लाभ उठाने की प्रेरणा भी बढऩी चाहिए। घर से बाहर रहकर बच्चा ऋषि भी बनेगा और साथ-साथ में एमबीएस डॉक्टर, इंजीनियर इत्यादि भी बनेगा। उसकी मनुष्यता पूर्णता को प्राप्त करेगी। ऐसे प्रयत्न सरकार के माध्यम से भी होने चाहिए। सरकार बहुत पैसे खर्च करती है विश्वविद्यालयों, स्कूलों में, लेकिन ऐसे बच्चे तैयार हो रहे हैं, जो केवल कमाएंगे और खाएंगे। जो आंतरिक विकास है अध्याम का, वह नहीं हो रहा है, इसके बिना भारत कभी विश्व गुरु नहीं बनेगा, कभी पूर्ण मानव जीवन नहीं बनेगा।
वाल्मीकि जी बड़े ज्ञाता ऋषि थे, वे राम जी को जानते थे। रामचरितमानस में लिखा है कि राम जी को चित्रकूट में रहने की सलाह वाल्मीकि जी ने ही दी थी। राम जी ने उनसे बहुत श्रद्धा पूर्वक पूछा था, तुलसीदास जी ने लिखा है -
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।।
ऐसा हृदय में समझकर, वह स्थान बतलाइए, जहां मैं सीता और लक्ष्मण सहित जाऊं।
वाल्मीकि जी भी भगवान राम को जान रहे थे, उन्होंने आगे उत्तर दिया -
पँूछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाऊँ।
जहँ न होहु तहँ कहि तुम्हहि देखावौं ठाऊँ।।
अर्थात आप मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं कहा रहूं। यहां मैं आपसे यह पूछते हुए सकुचा रहा हूं कि जहां आप न हों, वह जगह मुझे बता दीजिए, ताकि मैं आपके रहने के लिए जगह दिखा दूं।
उसके बाद राम जी के विराजने के लिए जो-जो स्थान भक्ति भाव से वाल्मीकि जी ने गिनाए, वो उनकी राम भक्ति का अनुपम प्रमाण हैं और अंत में व्यावहारिक रूप से उन्होंने राम जी को चित्रकूट में विराजने की सलाह दी।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि हम लोग भी राम भाव में योगदान करें, इस वातावरण में हमारी भी आहूति हो।
जय श्री राम।
भारत कोई विश्व गुरु ऐसे ही नहीं हो गया था। विश्व गुरुत्व का परम पद हम केवल डॉक्टर, इंजीनियर पैदा करके नहीं पा सकेंगे, जब तक ऋषियों से सम्बंधित भावनाएं जीवन में नहीं अवतरित होंगी, तब तक जीवन कमाऊ और खाऊ ही बना रहेगा।
राम जी और जानकी जी ने अपने बच्चों को जैसे पाला, वह आदर्श है। महर्षि वाल्मीकि मेरुदंड के समान उपयोगी और प्रामाणिक स्तंभ हैं। सारा जीवन उन्होंने राम जी के साथ मिलकर उनके भावों को उनके विचारों को मूर्त रूप देने में उनकी स्थापनाओं को मजबूती और संबल देने में लगाया। ऐसे ऋषियों की जरूरत है।
वैसे आजकल कई गुरुकुल खुल रहे हैं, लेकिन उनमें प्रतिष्ठा की इच्छा ज्यादा है। धन अर्जन की इच्छा ज्यादा है। अभी ऐसे ही एक गुरुकुल में मुझे जाने का अवसर मिला, मैंने देखा, गुरुकुल गौण हो गया है और ऐश्वर्य महत्वपूर्ण हो गया है। मैं कुरुक्षेत्र में गया था एक आश्रम में, सर्दी काल में बच्चों के शरीर पर पूरे वस्त्र नहीं थे, दरिद्रों के बच्चों की तरह, जब वस्त्र ही नहीं मिल रहा था, तो खाने को क्या मिल रहा होगा, जब भोजन ही नहीं मिलेगा, तो संस्कार क्या मिलेगा और विद्या क्या मिलेगी? गुरुकुल का लक्षण ऊपर से दिखता है, लेकिन गहराई में जाइए, तो पता चलता है कि गुरुकुल आज सही नहीं हैं। आज ज्यादातर गुरुकुल पैसा कमाने के लिए ही बनते हैं। सैंकड़ों गुरुकुल चल रहे हैं, लेकिन एक भी बड़ा विद्वान और संत पैदा नहीं कर रहे हैं, यह तो डकैती वाला काम हो रहा है। आज के गुरुकुल अच्छे संस्कार कहां दे रहे हैं। वाल्मीकि के गुरुकुल से अगर तुलना करें, तो पता चलेगा कि हम कितना पीछे हैं। पूरी मानव जाति के लिए वे समर्पित हैं, उनका रोम-रोम पुकार रहा है कि तुम ज्ञान पाओ और जीवन को धन्य बनाओ। ऐसे गुरुकुलों का प्रचलन करना चाहिए, उनसे लाभ उठाने की प्रेरणा भी बढऩी चाहिए। घर से बाहर रहकर बच्चा ऋषि भी बनेगा और साथ-साथ में एमबीएस डॉक्टर, इंजीनियर इत्यादि भी बनेगा। उसकी मनुष्यता पूर्णता को प्राप्त करेगी। ऐसे प्रयत्न सरकार के माध्यम से भी होने चाहिए। सरकार बहुत पैसे खर्च करती है विश्वविद्यालयों, स्कूलों में, लेकिन ऐसे बच्चे तैयार हो रहे हैं, जो केवल कमाएंगे और खाएंगे। जो आंतरिक विकास है अध्याम का, वह नहीं हो रहा है, इसके बिना भारत कभी विश्व गुरु नहीं बनेगा, कभी पूर्ण मानव जीवन नहीं बनेगा।
वाल्मीकि जी बड़े ज्ञाता ऋषि थे, वे राम जी को जानते थे। रामचरितमानस में लिखा है कि राम जी को चित्रकूट में रहने की सलाह वाल्मीकि जी ने ही दी थी। राम जी ने उनसे बहुत श्रद्धा पूर्वक पूछा था, तुलसीदास जी ने लिखा है -
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।।
ऐसा हृदय में समझकर, वह स्थान बतलाइए, जहां मैं सीता और लक्ष्मण सहित जाऊं।
वाल्मीकि जी भी भगवान राम को जान रहे थे, उन्होंने आगे उत्तर दिया -
पँूछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाऊँ।
जहँ न होहु तहँ कहि तुम्हहि देखावौं ठाऊँ।।
अर्थात आप मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं कहा रहूं। यहां मैं आपसे यह पूछते हुए सकुचा रहा हूं कि जहां आप न हों, वह जगह मुझे बता दीजिए, ताकि मैं आपके रहने के लिए जगह दिखा दूं।
उसके बाद राम जी के विराजने के लिए जो-जो स्थान भक्ति भाव से वाल्मीकि जी ने गिनाए, वो उनकी राम भक्ति का अनुपम प्रमाण हैं और अंत में व्यावहारिक रूप से उन्होंने राम जी को चित्रकूट में विराजने की सलाह दी।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि हम लोग भी राम भाव में योगदान करें, इस वातावरण में हमारी भी आहूति हो।
जय श्री राम।
मरा मरा से राम राम तक
भाग - ६
महर्षि वाल्मीकि ने संपूर्ण आत्मीय भाव से जानकी जी और उनके पुत्रों को अपने आश्रम में रखा। राम जी के बच्चों को सशक्त रूप से विकसित किया। उन्होंने राम जी के बच्चों को वीर ही नहीं, विद्वान भी बनाया।
उनके आश्रम का वातावरण अत्यंत सुंदर था। ऐसे दिव्य वातावरण जहां सबकुछ पवित्र है, शुद्ध है, अच्छे जीवन को देने वाला है। ऐसे वातावरण में निर्वासन के प्रताप से जानकी जी पहुंच गईं। उनके बच्चे भी वहीं पल रहे हैं, बहुत ही शुभ हो। विधि विधान से उनका पालन-पोषण संस्कार हुआ। संसार के लिए यह बहुत ही अच्छी घटना हुई। जो लोग सत्य नहीं जानते, वही कहेंगे कि राम जी ने गलत किया। कहते हैं कि जानकी जी को जंगल में छोड़ दिया गया धोबी के कहने पर, लेकिन वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण में धोबी की चर्चा कहीं नहीं है। तुलसीदास जी ने उस प्रकरण को ही छोड़ दिया, क्योंकि उनसे वियोग सहन नहीं हुआ।
राम जी को भी गुरुकुल में रहने का ज्यादा अवसर नहीं मिल पाया था, शिक्षा तो उन्हें मिली थी, वन में रहकर शिक्षा लेने का काम अधूरा रह गया था, जिसे जानकी जी ने अपने बच्चों के माध्यम से पूरा किया। महर्षि वाल्मीकि ने अपने आदि काव्य को सबसे पहले राम जी के बच्चों लव-कुश को पढ़ाया। इस संसार की अद्भुत घटना है कि दुनिया का सबसे पहला आदि काव्य ग्रंथ जो लौकिक भाषा का पहला महाकाव्य है, जो बच्चों की मां के लिए लिखा गया है, पिता के लिए लिखा गया है, उसे बच्चों को ही सबसे पहले पढ़ाया।
लव, कुश रामायण गाते हैं। जहां वे रामायण गाते हैं, वहां लोग एकत्र हो जाते हैं। लोग राम जी के सद्गुण सुनना चाहते हैं, लोग जानकी जी के बारे में जानना चाहते हैं। राम जी के मन में है कि जिस उद्देश्य से सीता आश्रम गई थीं, वह पूरा हुआ, मेरे बेटों को अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई।
महर्षि वाल्मीकि ने केवल कुछ लोगों को ही सुरक्षित नहीं किया, वाल्मीकि रामायण की रचना की, लव, कुश को शिक्षित करके रघुवंश को सिंचित किया और रघुवंश को सिंचित करके विश्व व सृष्टि को सिंचित किया। रघुवंश आदर्श है पूरे संसार के लिए, उसका जयघोष पूरे संसार में हो। यह सभी लोगों के लिए प्रेरणादायक है कि बच्चों को जो शिक्षा देनी है, जरूर दी जाए, बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाया जाए, आधुनिक शिक्षा दी जाए, इसके बिना जीवन का निर्वाह नहीं होगा, लेकिन बच्चों में ऋषि जीवन का भी प्रभाव होना चाहिए, बच्चों को पता होना चाहिए कि ऋषित्व क्या है, तप-त्याग-संयम नियम का क्या सुख है। घर में रहकर बच्चे यह नहीं प्राप्त कर सकते। संसार के लोगों को, विशेषकर भारत के लोगों को ऐसी योजना बनानी चाहिए कि गर्भावस्था में महिलाओं को ऐसे वातावरण में भेजा जाए, जहां सबकुछ अध्यात्ममय है, जहां एक-एक शब्द विशिष्ट है, खाना-पीना, दिनचर्या शुद्ध है, अनुशासित है, दिव्य है, तो इससे होने वाली संतति में महान संस्कार का प्राकट्य होगा, जो उसके संपूर्ण जीवन को प्रेरित करता रहेगा, गुरुत्व देता रहेगा, संबल देता रहेगा, और उसके साथ-साथ में दूसरी जरूरी आधुनिक शिक्षा भी दी जाए। प्रारंभिक काल किसी के लिए भी अच्छा होना चाहिए। बचपन अगर श्रेष्ठ वातावरण में बीत जाए, तो संपूर्ण जीवन आलोकित हो जाता है।
क्रमश:
महर्षि वाल्मीकि ने संपूर्ण आत्मीय भाव से जानकी जी और उनके पुत्रों को अपने आश्रम में रखा। राम जी के बच्चों को सशक्त रूप से विकसित किया। उन्होंने राम जी के बच्चों को वीर ही नहीं, विद्वान भी बनाया।
उनके आश्रम का वातावरण अत्यंत सुंदर था। ऐसे दिव्य वातावरण जहां सबकुछ पवित्र है, शुद्ध है, अच्छे जीवन को देने वाला है। ऐसे वातावरण में निर्वासन के प्रताप से जानकी जी पहुंच गईं। उनके बच्चे भी वहीं पल रहे हैं, बहुत ही शुभ हो। विधि विधान से उनका पालन-पोषण संस्कार हुआ। संसार के लिए यह बहुत ही अच्छी घटना हुई। जो लोग सत्य नहीं जानते, वही कहेंगे कि राम जी ने गलत किया। कहते हैं कि जानकी जी को जंगल में छोड़ दिया गया धोबी के कहने पर, लेकिन वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण में धोबी की चर्चा कहीं नहीं है। तुलसीदास जी ने उस प्रकरण को ही छोड़ दिया, क्योंकि उनसे वियोग सहन नहीं हुआ।
राम जी को भी गुरुकुल में रहने का ज्यादा अवसर नहीं मिल पाया था, शिक्षा तो उन्हें मिली थी, वन में रहकर शिक्षा लेने का काम अधूरा रह गया था, जिसे जानकी जी ने अपने बच्चों के माध्यम से पूरा किया। महर्षि वाल्मीकि ने अपने आदि काव्य को सबसे पहले राम जी के बच्चों लव-कुश को पढ़ाया। इस संसार की अद्भुत घटना है कि दुनिया का सबसे पहला आदि काव्य ग्रंथ जो लौकिक भाषा का पहला महाकाव्य है, जो बच्चों की मां के लिए लिखा गया है, पिता के लिए लिखा गया है, उसे बच्चों को ही सबसे पहले पढ़ाया।
लव, कुश रामायण गाते हैं। जहां वे रामायण गाते हैं, वहां लोग एकत्र हो जाते हैं। लोग राम जी के सद्गुण सुनना चाहते हैं, लोग जानकी जी के बारे में जानना चाहते हैं। राम जी के मन में है कि जिस उद्देश्य से सीता आश्रम गई थीं, वह पूरा हुआ, मेरे बेटों को अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई।
महर्षि वाल्मीकि ने केवल कुछ लोगों को ही सुरक्षित नहीं किया, वाल्मीकि रामायण की रचना की, लव, कुश को शिक्षित करके रघुवंश को सिंचित किया और रघुवंश को सिंचित करके विश्व व सृष्टि को सिंचित किया। रघुवंश आदर्श है पूरे संसार के लिए, उसका जयघोष पूरे संसार में हो। यह सभी लोगों के लिए प्रेरणादायक है कि बच्चों को जो शिक्षा देनी है, जरूर दी जाए, बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाया जाए, आधुनिक शिक्षा दी जाए, इसके बिना जीवन का निर्वाह नहीं होगा, लेकिन बच्चों में ऋषि जीवन का भी प्रभाव होना चाहिए, बच्चों को पता होना चाहिए कि ऋषित्व क्या है, तप-त्याग-संयम नियम का क्या सुख है। घर में रहकर बच्चे यह नहीं प्राप्त कर सकते। संसार के लोगों को, विशेषकर भारत के लोगों को ऐसी योजना बनानी चाहिए कि गर्भावस्था में महिलाओं को ऐसे वातावरण में भेजा जाए, जहां सबकुछ अध्यात्ममय है, जहां एक-एक शब्द विशिष्ट है, खाना-पीना, दिनचर्या शुद्ध है, अनुशासित है, दिव्य है, तो इससे होने वाली संतति में महान संस्कार का प्राकट्य होगा, जो उसके संपूर्ण जीवन को प्रेरित करता रहेगा, गुरुत्व देता रहेगा, संबल देता रहेगा, और उसके साथ-साथ में दूसरी जरूरी आधुनिक शिक्षा भी दी जाए। प्रारंभिक काल किसी के लिए भी अच्छा होना चाहिए। बचपन अगर श्रेष्ठ वातावरण में बीत जाए, तो संपूर्ण जीवन आलोकित हो जाता है।
क्रमश:
मरा मरा से राम राम तक
भाग - ५
राम पूर्णत: आश्वस्त हैं कि सीता कहीं से लांछित नहीं हैं। लंका में पूर्ण विजय की प्राप्ति के बाद जो अग्निपरीक्षा हुई, तो संपूर्ण संसार के लोगों ने सुना-देखा कि सीता पूर्णत: पवित्र हैं। लेकिन जिनके पास अच्छी या शुद्ध दृष्टि नहीं थी, उन लोगों के मन में यह भावना रही होगी कि सीता जी रावण के यहां रही थीं। राम जी के मन में था कि मेरे सम्बंध में कोई अपवाद नहीं होना चाहिए। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में सीता को छोडऩे के पीछे ठोस कारण हैं।
जब कोई गर्भवती होती है, तो इस अवस्था में अभिभावक पूछते हैं कि आपके मन में कोई इच्छा हो, तो बताना। गर्भावस्था में जो इच्छाएं होती हैं, उनका संतति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।
राम जी ने भी सीता जी से पूछा, ‘आप मां बनने वाली हैं कोई भी मन में भावना हो, तो बतलाएं, मैं कोशिश करूंगा पूरी करने की।’
सीता जी ने कहा, ‘मुझे वन की याद बहुत आती है, कितना शांत वातावरण था, प्रकृति की सुंदरता आंखों से निकलती ही नहीं है, कहीं से वेद ध्वनि आ रही है, ऋषियों का आवागमन हो रहा है। लोग जप-तप में लगे हैं। उससे मन को बहुत प्रेरणा मिलती है। ऋषि जीवन स्वीकार करने के लिए प्रेरणा मिलती है। मैं चाहती हूं कि इस जीवन का लाभ लूं। जब बच्चों को आपके जैसा बनाना है, तो आप बहुत मदद नहीं कर पाएंगे। आप व्यस्त रहने वाले राजा हैं, तो बच्चों की जो देखभाल होनी चाहिए, वह नहीं हो पाएगी। आपने तो १४ वर्षों का संन्यासी जीवन बिताया, अयोध्या जी में बच्चे रहेंगे, तो उस जीवन से वंचित रह जाएंगे। उनमें राजसी भाव आ जाएगा, रघुवंशी भाव आ जाएगा, लेकिन ऋषित्व कैसे आएगा? मैं चाहती हूं कि ऋषियों के साथ उनकी छाया में अपने बच्चे बड़े हों। तपस्वी की तरह वे जिएं। ऐसे जीवन का प्रबंध आप कर सकें, तो करें।’
राम जी ने चर्चा की अपने मित्रों, भाइयों से, सभी लोग हिचक रहे थे। कितनी सुन्दर इच्छा है, बच्चे पहले ऋषि बनें, फिर राजा बनें। राम जी ने तपस्वी रहते हुए ही अनेक असुरों व रावण को मारा। कितना सम्मान दिया ऋषियों-महर्षियों को, अभी भी आपकी संपूर्ण जय-जयकार हो रही है।
राम जी ने लक्ष्मण जी से कहा, ‘भाभी को जंगल में छोडक़र आओ।’ इसके लिए जानकी जी ने ही प्रेरित किया था। संदेह को बहाना बनाकर। राम जी भी चाहते थे कि उनके बच्चे केवल महाराजा ही नहीं बनें, ऋषित्व को भी प्राप्त करें। उनमें दोनों साथ-साथ रहे, इसके फलस्वरूप जानकी जी सहर्ष वाल्मीकि जी के आश्रम आ गईं।
कहा गया है, जितना चिंतन बच्चों के लिए मां करती है, उतना कोई नहीं करता। माता की जिम्मेदारियां बड़ी होती हैं। लक्ष्मण जी ने वाल्मीकि जी के आश्रम के आसपास जानकी जी को छोड़ा था। वाल्मीकि जी रघुवंशियों से बहुत प्रभावित थे, उनका आत्मीय भाव था जानकी जी के लिए। उल्लेख मिलता है, सीता जी वनवास काल में राम जी के साथ पहले भी एक बार वाल्मीकि आश्रम जा चुकी थीं। उन्हें वहां बहुत अच्छा लगा था।
जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं, वे आक्रोश प्रकट करते हैं कि राम जी ने जानकी जी को जंगल में छोड़ दिया। यह जानना चाहिए, वन जाने का जो क्रम हुआ, उसमें मूल प्रेरक, मूल भावना जानकी जी की रही और उन्होंने अपनी संतति के भले के लिए ऐसा किया था।
क्रमश:
राम पूर्णत: आश्वस्त हैं कि सीता कहीं से लांछित नहीं हैं। लंका में पूर्ण विजय की प्राप्ति के बाद जो अग्निपरीक्षा हुई, तो संपूर्ण संसार के लोगों ने सुना-देखा कि सीता पूर्णत: पवित्र हैं। लेकिन जिनके पास अच्छी या शुद्ध दृष्टि नहीं थी, उन लोगों के मन में यह भावना रही होगी कि सीता जी रावण के यहां रही थीं। राम जी के मन में था कि मेरे सम्बंध में कोई अपवाद नहीं होना चाहिए। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में सीता को छोडऩे के पीछे ठोस कारण हैं।
जब कोई गर्भवती होती है, तो इस अवस्था में अभिभावक पूछते हैं कि आपके मन में कोई इच्छा हो, तो बताना। गर्भावस्था में जो इच्छाएं होती हैं, उनका संतति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।
राम जी ने भी सीता जी से पूछा, ‘आप मां बनने वाली हैं कोई भी मन में भावना हो, तो बतलाएं, मैं कोशिश करूंगा पूरी करने की।’
सीता जी ने कहा, ‘मुझे वन की याद बहुत आती है, कितना शांत वातावरण था, प्रकृति की सुंदरता आंखों से निकलती ही नहीं है, कहीं से वेद ध्वनि आ रही है, ऋषियों का आवागमन हो रहा है। लोग जप-तप में लगे हैं। उससे मन को बहुत प्रेरणा मिलती है। ऋषि जीवन स्वीकार करने के लिए प्रेरणा मिलती है। मैं चाहती हूं कि इस जीवन का लाभ लूं। जब बच्चों को आपके जैसा बनाना है, तो आप बहुत मदद नहीं कर पाएंगे। आप व्यस्त रहने वाले राजा हैं, तो बच्चों की जो देखभाल होनी चाहिए, वह नहीं हो पाएगी। आपने तो १४ वर्षों का संन्यासी जीवन बिताया, अयोध्या जी में बच्चे रहेंगे, तो उस जीवन से वंचित रह जाएंगे। उनमें राजसी भाव आ जाएगा, रघुवंशी भाव आ जाएगा, लेकिन ऋषित्व कैसे आएगा? मैं चाहती हूं कि ऋषियों के साथ उनकी छाया में अपने बच्चे बड़े हों। तपस्वी की तरह वे जिएं। ऐसे जीवन का प्रबंध आप कर सकें, तो करें।’
राम जी ने चर्चा की अपने मित्रों, भाइयों से, सभी लोग हिचक रहे थे। कितनी सुन्दर इच्छा है, बच्चे पहले ऋषि बनें, फिर राजा बनें। राम जी ने तपस्वी रहते हुए ही अनेक असुरों व रावण को मारा। कितना सम्मान दिया ऋषियों-महर्षियों को, अभी भी आपकी संपूर्ण जय-जयकार हो रही है।
राम जी ने लक्ष्मण जी से कहा, ‘भाभी को जंगल में छोडक़र आओ।’ इसके लिए जानकी जी ने ही प्रेरित किया था। संदेह को बहाना बनाकर। राम जी भी चाहते थे कि उनके बच्चे केवल महाराजा ही नहीं बनें, ऋषित्व को भी प्राप्त करें। उनमें दोनों साथ-साथ रहे, इसके फलस्वरूप जानकी जी सहर्ष वाल्मीकि जी के आश्रम आ गईं।
कहा गया है, जितना चिंतन बच्चों के लिए मां करती है, उतना कोई नहीं करता। माता की जिम्मेदारियां बड़ी होती हैं। लक्ष्मण जी ने वाल्मीकि जी के आश्रम के आसपास जानकी जी को छोड़ा था। वाल्मीकि जी रघुवंशियों से बहुत प्रभावित थे, उनका आत्मीय भाव था जानकी जी के लिए। उल्लेख मिलता है, सीता जी वनवास काल में राम जी के साथ पहले भी एक बार वाल्मीकि आश्रम जा चुकी थीं। उन्हें वहां बहुत अच्छा लगा था।
जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं, वे आक्रोश प्रकट करते हैं कि राम जी ने जानकी जी को जंगल में छोड़ दिया। यह जानना चाहिए, वन जाने का जो क्रम हुआ, उसमें मूल प्रेरक, मूल भावना जानकी जी की रही और उन्होंने अपनी संतति के भले के लिए ऐसा किया था।
क्रमश:
मरा मरा से राम राम तक
भाग - ४
कहा जाता है, सौ करोड़ रामायणों की रचना हुई है। हर बार त्रेता में राम को प्रगट होना है। निरंतर उनके लिए लेखन होता रहता है। जितना राम जी पर लेखन हुआ है, उतना किसी भी अवतार के सम्बंध में लेखन नहीं हुआ। चाहे कोई भी अवतार हो, राम का अवतार सर्वाधिक चर्चित है। भगवान राम के सम्बंध में लेखन अद्भुत है।
हां, वाल्मीकि जी ने यह अवश्य कहा, ‘मैं राम जी के चरित्र का गायन नहीं कर रहा हूं, मैं सीता के चरित्र का गायन कर रहा हूं।’
ग्रंथ की चेतना को महानायक से न जोडक़र उनकी जो प्राण वंदना हैं, उनकी जो अद्र्धांग्नि हैं, उनके नाम से जोड़ा। यह अनोखी बात है, ऐसा दुनिया में कहीं नहीं हुआ कि महानायक को छोडक़र उनकी सहभागिनी के नाम पर ग्रंथ रचा जाए। जहां राम जी की तूती बोल रही हो, जिन्होंने हजारों-हजारों वर्षों तक कण-कण को प्रभावित किया हो, अपना बनाया हो, वहां किसी दूसरे के चरित्र का गायन हो और सभी लोग उसको स्वीकार करें, विरोध न हो, यहां तक कि राम जी भी उसे स्वीकार करते हैं, यह तो अद्भुत बात हो जाएगी। राम जी के साथ महर्षि वाल्मीकि का जीवन पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ जीवन है।
बहुत से लोगों का मानना है कि राम जी का जब अवतार हुआ, तो उसके पहले ही रामायण की रचना हो गई थी, अपनी दिव्य दृष्टि से वाल्मीकि ने देख लिया था। जो कुछ राम जी ने अपने अवतार काल में किया, उससे पहले ही उसका लेखन हो गया, ऐसा सनातन धर्म का पूर्ण विश्वास है। यह ऋषित्व के द्वारा ही संभव है, वह दिव्य प्रज्ञा से भूत, भविष्य को जान लेता है। वह वर्तमान को तो जानता ही जानता है। वाल्मीकि ने समाज के लिए, संसार के लिए बहुत बड़ा काम किया, क्रांति हुई। निश्चित रूप से सीता जी के साथ जो हुआ, उससे लोग आहत रहे होंगे, किन्तु वाल्मीकि रामायण का अध्ययन करने से उन्हें बड़ी शीतलता की प्राप्ति होगी।
लोकरंजन के लिए, लोगों को संतुष्ट करने के लिए, लोगों की भावनाओं को सम्मान देने के लिए गर्भावस्था में ही सीता जी को वनवास पर जाना पड़ा। सीता जी को वाल्मीकि जी की रचना से बहुत बल मिला होगा कि सीता चरित्र के लिए रामायण की रचना हुई। वाल्मीकि के रामायण में सीता चरित्र है, राम चरित्र नहीं है। राम जी महत्वपूर्ण चरित्र हैं, तो उसमें उनकी लीला आनी ही है, किन्तु वाल्मीकि जी स्पष्ट कहते हैं कि मैं सीता चरित्र लिख रहा हूं।
मैं यह नहीं कहने जा रहा कि राम जी ने जो किया, उससे सीता के साथ अन्याय हुआ। मेरे पास ऐसे विचार हैं, जिनसे यह सिद्ध हो सकता है कि भगवान श्रीराम ने सीता जी को अपनी दुर्भावना या संदेह के कारण या सम्मान लेने के लिए गर्भावस्था में वाल्मीकि जी के आश्रम नहीं पहुंचाया था।
क्रमश:
कहा जाता है, सौ करोड़ रामायणों की रचना हुई है। हर बार त्रेता में राम को प्रगट होना है। निरंतर उनके लिए लेखन होता रहता है। जितना राम जी पर लेखन हुआ है, उतना किसी भी अवतार के सम्बंध में लेखन नहीं हुआ। चाहे कोई भी अवतार हो, राम का अवतार सर्वाधिक चर्चित है। भगवान राम के सम्बंध में लेखन अद्भुत है।
हां, वाल्मीकि जी ने यह अवश्य कहा, ‘मैं राम जी के चरित्र का गायन नहीं कर रहा हूं, मैं सीता के चरित्र का गायन कर रहा हूं।’
ग्रंथ की चेतना को महानायक से न जोडक़र उनकी जो प्राण वंदना हैं, उनकी जो अद्र्धांग्नि हैं, उनके नाम से जोड़ा। यह अनोखी बात है, ऐसा दुनिया में कहीं नहीं हुआ कि महानायक को छोडक़र उनकी सहभागिनी के नाम पर ग्रंथ रचा जाए। जहां राम जी की तूती बोल रही हो, जिन्होंने हजारों-हजारों वर्षों तक कण-कण को प्रभावित किया हो, अपना बनाया हो, वहां किसी दूसरे के चरित्र का गायन हो और सभी लोग उसको स्वीकार करें, विरोध न हो, यहां तक कि राम जी भी उसे स्वीकार करते हैं, यह तो अद्भुत बात हो जाएगी। राम जी के साथ महर्षि वाल्मीकि का जीवन पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ जीवन है।
बहुत से लोगों का मानना है कि राम जी का जब अवतार हुआ, तो उसके पहले ही रामायण की रचना हो गई थी, अपनी दिव्य दृष्टि से वाल्मीकि ने देख लिया था। जो कुछ राम जी ने अपने अवतार काल में किया, उससे पहले ही उसका लेखन हो गया, ऐसा सनातन धर्म का पूर्ण विश्वास है। यह ऋषित्व के द्वारा ही संभव है, वह दिव्य प्रज्ञा से भूत, भविष्य को जान लेता है। वह वर्तमान को तो जानता ही जानता है। वाल्मीकि ने समाज के लिए, संसार के लिए बहुत बड़ा काम किया, क्रांति हुई। निश्चित रूप से सीता जी के साथ जो हुआ, उससे लोग आहत रहे होंगे, किन्तु वाल्मीकि रामायण का अध्ययन करने से उन्हें बड़ी शीतलता की प्राप्ति होगी।
लोकरंजन के लिए, लोगों को संतुष्ट करने के लिए, लोगों की भावनाओं को सम्मान देने के लिए गर्भावस्था में ही सीता जी को वनवास पर जाना पड़ा। सीता जी को वाल्मीकि जी की रचना से बहुत बल मिला होगा कि सीता चरित्र के लिए रामायण की रचना हुई। वाल्मीकि के रामायण में सीता चरित्र है, राम चरित्र नहीं है। राम जी महत्वपूर्ण चरित्र हैं, तो उसमें उनकी लीला आनी ही है, किन्तु वाल्मीकि जी स्पष्ट कहते हैं कि मैं सीता चरित्र लिख रहा हूं।
मैं यह नहीं कहने जा रहा कि राम जी ने जो किया, उससे सीता के साथ अन्याय हुआ। मेरे पास ऐसे विचार हैं, जिनसे यह सिद्ध हो सकता है कि भगवान श्रीराम ने सीता जी को अपनी दुर्भावना या संदेह के कारण या सम्मान लेने के लिए गर्भावस्था में वाल्मीकि जी के आश्रम नहीं पहुंचाया था।
क्रमश:
मरा मरा से राम राम तक
भाग - ३
जीवन के किसी क्षेत्र में कोई नया बड़ा आदमी आता है, तो वह बहुत दमखम के साथ लगता है अपने जीवन को सुधारने में। अपने जीवन को परिवर्तित करने में अपने जीवन को सुंदर बनाने में पूरे दमखम के साथ प्रयास करता है। रत्नाकर ने जपना शुरू किया और हजारों वर्षों तक जपा, उन पर दीमक लग गए, जप करते-करते एक जगह, दीमकों ने उन पर घर बना लिया। दीमक के घरों को ही वल्मीक बोलते हैं, इसलिए इनका नाम वाल्मीकि हो गया। संपूर्ण जीवन विशुद्ध हो गया, भगवान का नाम जपते हुए। रोम-रोम से जहां पाप प्रवाहित हो रहा था, वहां रोम-रोम से राम-राम प्रवाहित होने लगा। अध्यात्म और अहिंसा प्रवाहित होने लगी, रोम-रोम में संयम-नियम स्थापित हो गए। पाप की गुंजाइश ही खत्म हो गई, संपूर्ण जीवन विशुद्ध हो गया। इसी क्रम से रत्नाकर डाकू ने पूर्ण महर्षित्व को प्राप्त कर लिया। वाल्मीकि के नाम से तीनों लोक में ख्याति हुई। एक बहुत बड़ी क्रांति आई कि समाज के लिए जो अभिशाप बना हुआ था, जो मानवता के लिए कलंक था, ब्राह्मण जाति के लिए जो कलंक था, आज राम-राम की महिमा से वह मानवता के लिए वरदान बन गया। देवर्षि नारद के गुरुत्व की महिमा से कल्याण हो गया। उन्होंने ऋषित्व को उत्पन्न कर दिया। पूरे समाज के लिए एक आदर्श बना। मानवता का चरम प्राप्त हुआ। शास्त्र विरुद्ध आचरण के सबसे बड़े कर्ता का जीवन पूर्ण शास्त्रीय जीवन हो गया। शास्त्रों के संकेतों को दूर-दूर तक प्रसारित करने वाली जीह्वा से संपन्न जीवन प्राप्त हो गया।
चारों ओर यही चर्चा थी, जो जहां सुनता था, उसे लगता था कि कितना भी तुच्छ जीवन हो, नीच जीवन हो, मर्यादा के विरुद्ध जीवन हो, लेकिन संतत्व की प्राप्ति संभव है। यदि ईश्वर में जीवन को लगाया जाए, तो परिवर्तन होगा। शास्त्रों की आज्ञा की जरूरत है। देवर्षि नारद के बताए मंत्र का सम्मान किया और पूर्ण विश्वास अर्जित किया। उन्होंने तपस्या से वह सब प्राप्त किया, जो वह लूटपाट से कभी प्राप्त नहीं कर सकते थे। राम नाम से सामान्य मनुष्य ही नहीं, मनुष्यता की पराकाष्ठा वाला जीवन भी संभव है। देवर्षि नारद की विद्या काम कर गई। हमारा जीवन कितना भी लांछित हो, निंदनीय हो, अभिशापित हो, कितना भी हमारा जीवन हेय हो, समाज के लिए अत्यंत नाकारा हो, किन्तु सही मार्गों से चलकर भी हम अपने जीवन को सुधार सकते हैं। सुधार ही नहीं सकते, उसे परम सौन्दर्य दे सकते हैं, उसको संसार के लिए मानवता के लिए परम उपयोगी बना सकते हैं, प्रेरणादायक बना सकते हैं। सभी लोगों को एक मार्ग की प्राप्ति हुई।
आम धारणा है, जीवन में, समाज में धन कमाने के लिए भोग के लिए, सम्मान कमाने के लिए व्यक्ति न जाने कितना परिश्रम करता है, लेकिन उतना परिश्रम वह ईश्वर के लिए नहीं करता। लौकिक विद्या को कमाना भी साधारण काम नहीं है, कला के क्षेत्र में बड़े स्वरूप को कमाना भी कोई साधारण काम नहीं है, लेकिन जब आध्यात्मिक कमाई की बात होती है, तो लोग पीछे हट जाते हैं। आध्यात्मिक जीवन को भी उतना ही महत्व देना चाहिए।
वे पूरे संसार के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। महर्षि वाल्मीकि आदिकाव्य के रचयिता हैं, जैसे वेदों के स्तर का दुनिया में कोई ग्रंथ नहीं है। वेद अनादि माने जाते हैं। ब्रह्मा जी भी केवल ग्रहण करते हैं, ऐसा कहा जाता है, वेदों में भी यह वाक्य आया है।
वेदों की तुलना में कोई ग्रंथ किसी जाति, किसी राज्य, किसी संप्रदाय के पास नहीं है। कोई भी वेदों को नहीं काट सकता, उनकी ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता। वेदों को छोड़ दें, तो लौकिक भाषा में, लौकिक संस्कृति में सबसे पहला ग्रंथ महर्षि वाल्मीकि के ग्रंथ को माना गया। यह ध्यान देने योग्य बात है। संपूर्ण संसार में जितनी भाषाएं हैं, उन भाषाओं में किसी भी भाषा के पास महर्षि वाल्मीकि का महाकाव्य वाल्मीकि रामायण जैसा कोई ग्रंथ नहीं है। कितनी बड़ी बात है कि जब वेदों के बाद लौकिक संस्कृति के अनुरूप लौकिक रचना बनी, तो पहली रचना वाल्मीकि जी ने ही रची - वाल्मीकीय रामायण।
वेदों को प्रमाण माना जाता है, महाभारत को, वाल्मीकि रामायण को इतिहास की कोटि में रखा जाता है। इतिहास का प्रतिपादन हुआ। तमाम तरह के विषय वाल्मीकि रामायण में ज्ञान, शरणागति, वेदों का वर्णन, यह अद्भुत महाकाव्य है। सबसे पहले भगवान के चरित्र का वर्णन लौकिक भाषा में हुआ। यह पूर्ण ग्रंथ माना जाता है। वाल्मीकि रामायण में प्रमुखता से राम का वर्णन हुआ। कहा जाता है, वेदों में राम जी का वर्णन नहीं हुआ, किन्तु वाल्मीकि रामायण जैसा बड़ा ग्रंथ बिना आधार के ही लिखा गया था क्या? यदि बिना आधार के लिखा गया होता, तो उसे कोई महत्व नहीं देता, कोई सम्मान नहीं देता। भगवान राम का चरित्र वेदों में भी था, लेकिन वो शाखाएं लुप्त हो गईं। वाल्मीकि रामायण की विशिष्टता और सत्यता पूर्ण प्रमाणित है। राम जी पूर्णावतार हैं, अद्भुत व्यक्तित्व हैं।
११ हजार वर्षों का काल राम जी का रहा। कुछ विद्वानों ने व्याख्या करके यह भी अर्थ निकाला है कि राम जी का शासनकाल ३३ हजार वर्ष का था। राम जी पूर्ण ब्रह्म हैं, अवतारी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, गुणों की खान हैं, कोई भी हेय गुण उनमें नहीं है। संपूर्ण जीवन उनका उदार है। परम प्रेरणास्पद है, संतों को सुख पहुंचाने वाला है।
क्रमश:
जीवन के किसी क्षेत्र में कोई नया बड़ा आदमी आता है, तो वह बहुत दमखम के साथ लगता है अपने जीवन को सुधारने में। अपने जीवन को परिवर्तित करने में अपने जीवन को सुंदर बनाने में पूरे दमखम के साथ प्रयास करता है। रत्नाकर ने जपना शुरू किया और हजारों वर्षों तक जपा, उन पर दीमक लग गए, जप करते-करते एक जगह, दीमकों ने उन पर घर बना लिया। दीमक के घरों को ही वल्मीक बोलते हैं, इसलिए इनका नाम वाल्मीकि हो गया। संपूर्ण जीवन विशुद्ध हो गया, भगवान का नाम जपते हुए। रोम-रोम से जहां पाप प्रवाहित हो रहा था, वहां रोम-रोम से राम-राम प्रवाहित होने लगा। अध्यात्म और अहिंसा प्रवाहित होने लगी, रोम-रोम में संयम-नियम स्थापित हो गए। पाप की गुंजाइश ही खत्म हो गई, संपूर्ण जीवन विशुद्ध हो गया। इसी क्रम से रत्नाकर डाकू ने पूर्ण महर्षित्व को प्राप्त कर लिया। वाल्मीकि के नाम से तीनों लोक में ख्याति हुई। एक बहुत बड़ी क्रांति आई कि समाज के लिए जो अभिशाप बना हुआ था, जो मानवता के लिए कलंक था, ब्राह्मण जाति के लिए जो कलंक था, आज राम-राम की महिमा से वह मानवता के लिए वरदान बन गया। देवर्षि नारद के गुरुत्व की महिमा से कल्याण हो गया। उन्होंने ऋषित्व को उत्पन्न कर दिया। पूरे समाज के लिए एक आदर्श बना। मानवता का चरम प्राप्त हुआ। शास्त्र विरुद्ध आचरण के सबसे बड़े कर्ता का जीवन पूर्ण शास्त्रीय जीवन हो गया। शास्त्रों के संकेतों को दूर-दूर तक प्रसारित करने वाली जीह्वा से संपन्न जीवन प्राप्त हो गया।
चारों ओर यही चर्चा थी, जो जहां सुनता था, उसे लगता था कि कितना भी तुच्छ जीवन हो, नीच जीवन हो, मर्यादा के विरुद्ध जीवन हो, लेकिन संतत्व की प्राप्ति संभव है। यदि ईश्वर में जीवन को लगाया जाए, तो परिवर्तन होगा। शास्त्रों की आज्ञा की जरूरत है। देवर्षि नारद के बताए मंत्र का सम्मान किया और पूर्ण विश्वास अर्जित किया। उन्होंने तपस्या से वह सब प्राप्त किया, जो वह लूटपाट से कभी प्राप्त नहीं कर सकते थे। राम नाम से सामान्य मनुष्य ही नहीं, मनुष्यता की पराकाष्ठा वाला जीवन भी संभव है। देवर्षि नारद की विद्या काम कर गई। हमारा जीवन कितना भी लांछित हो, निंदनीय हो, अभिशापित हो, कितना भी हमारा जीवन हेय हो, समाज के लिए अत्यंत नाकारा हो, किन्तु सही मार्गों से चलकर भी हम अपने जीवन को सुधार सकते हैं। सुधार ही नहीं सकते, उसे परम सौन्दर्य दे सकते हैं, उसको संसार के लिए मानवता के लिए परम उपयोगी बना सकते हैं, प्रेरणादायक बना सकते हैं। सभी लोगों को एक मार्ग की प्राप्ति हुई।
आम धारणा है, जीवन में, समाज में धन कमाने के लिए भोग के लिए, सम्मान कमाने के लिए व्यक्ति न जाने कितना परिश्रम करता है, लेकिन उतना परिश्रम वह ईश्वर के लिए नहीं करता। लौकिक विद्या को कमाना भी साधारण काम नहीं है, कला के क्षेत्र में बड़े स्वरूप को कमाना भी कोई साधारण काम नहीं है, लेकिन जब आध्यात्मिक कमाई की बात होती है, तो लोग पीछे हट जाते हैं। आध्यात्मिक जीवन को भी उतना ही महत्व देना चाहिए।
वे पूरे संसार के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। महर्षि वाल्मीकि आदिकाव्य के रचयिता हैं, जैसे वेदों के स्तर का दुनिया में कोई ग्रंथ नहीं है। वेद अनादि माने जाते हैं। ब्रह्मा जी भी केवल ग्रहण करते हैं, ऐसा कहा जाता है, वेदों में भी यह वाक्य आया है।
वेदों की तुलना में कोई ग्रंथ किसी जाति, किसी राज्य, किसी संप्रदाय के पास नहीं है। कोई भी वेदों को नहीं काट सकता, उनकी ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता। वेदों को छोड़ दें, तो लौकिक भाषा में, लौकिक संस्कृति में सबसे पहला ग्रंथ महर्षि वाल्मीकि के ग्रंथ को माना गया। यह ध्यान देने योग्य बात है। संपूर्ण संसार में जितनी भाषाएं हैं, उन भाषाओं में किसी भी भाषा के पास महर्षि वाल्मीकि का महाकाव्य वाल्मीकि रामायण जैसा कोई ग्रंथ नहीं है। कितनी बड़ी बात है कि जब वेदों के बाद लौकिक संस्कृति के अनुरूप लौकिक रचना बनी, तो पहली रचना वाल्मीकि जी ने ही रची - वाल्मीकीय रामायण।
वेदों को प्रमाण माना जाता है, महाभारत को, वाल्मीकि रामायण को इतिहास की कोटि में रखा जाता है। इतिहास का प्रतिपादन हुआ। तमाम तरह के विषय वाल्मीकि रामायण में ज्ञान, शरणागति, वेदों का वर्णन, यह अद्भुत महाकाव्य है। सबसे पहले भगवान के चरित्र का वर्णन लौकिक भाषा में हुआ। यह पूर्ण ग्रंथ माना जाता है। वाल्मीकि रामायण में प्रमुखता से राम का वर्णन हुआ। कहा जाता है, वेदों में राम जी का वर्णन नहीं हुआ, किन्तु वाल्मीकि रामायण जैसा बड़ा ग्रंथ बिना आधार के ही लिखा गया था क्या? यदि बिना आधार के लिखा गया होता, तो उसे कोई महत्व नहीं देता, कोई सम्मान नहीं देता। भगवान राम का चरित्र वेदों में भी था, लेकिन वो शाखाएं लुप्त हो गईं। वाल्मीकि रामायण की विशिष्टता और सत्यता पूर्ण प्रमाणित है। राम जी पूर्णावतार हैं, अद्भुत व्यक्तित्व हैं।
११ हजार वर्षों का काल राम जी का रहा। कुछ विद्वानों ने व्याख्या करके यह भी अर्थ निकाला है कि राम जी का शासनकाल ३३ हजार वर्ष का था। राम जी पूर्ण ब्रह्म हैं, अवतारी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, गुणों की खान हैं, कोई भी हेय गुण उनमें नहीं है। संपूर्ण जीवन उनका उदार है। परम प्रेरणास्पद है, संतों को सुख पहुंचाने वाला है।
क्रमश:
मरा मरा से राम राम तक
भाग - २
कथा है, देवर्षि नारद को देखकर रत्नाकर टूट पड़े। देवर्षि नारद का जीवन दिव्य जीवन है, रोम-रोम से अद्भुत आभा प्रस्फुटित हो रही है। पूर्णत: निर्लिप्त जीवन है। डाकू रत्नाकर ने सोचा कि आज काफी कमाई होगी, ‘रुको जो भी है, दे दो, नहीं तो मार दूंगा।’
नारद जी ने कहा, ‘मेरे पास कुछ नहीं है, वीणा है और तन पर वस्त्र है, मेरे पास और क्या संपत्ति है?’
वाल्मीकि ने पूछा, ‘वीणा का क्या करते हो?’
देवर्षि ने उत्तर दिया, ‘वीणा बजाता हूं, ब्रह्मा जी ने प्रदान किया है, इस पर हरि कीर्तन करता हूं।’
‘हमें भी बजाकर सुनाओ।’
देवर्षि नारद से अच्छा वीणा कौन बजाएगा? वे तो ईश्वर को सुनाते हैं, सच्चे हृदय से बजाते हैं। संगीत भक्ति की ऊंचाइयों को प्राप्त होता है। वीणा की ध्वनि अनेक हृदयों को प्रभावित करती है। रत्नाकर को भी वीणा की ध्वनि ने प्रभावित किया, नरमी आई, रौद्र रूप में धीमापन आया। अच्छा लगा। उन्हें लगा कि विचित्र परिवर्तन आ रहा है। यही तो सत्संग है। फिर भी लंबे समय का पापी जीवन था, सहज परिवर्तन संभव नहीं था।
उन्होंने कहा, ‘आपकी वीणा अच्छी है, मुझे भी अच्छी लगी। अब आपके साथ क्या व्यवहार किया जाए?’
देवर्षि ने कहा, ‘जो मेरे पास है, मैं दे दूंगा, लेकिन मेरा कुछ प्रश्न है, जिसका आप समाधान करें, तो बहुत ही अच्छा होगा।’
संत मिलते हैं, तो सत्संग होता है। संत मिलता है, तो ईश्वर की चर्चा करता है, परमार्थ की चर्चा, गुणों की चर्चा। जिनका जीवन ऊंचाई को प्राप्त होता है, उनकी चर्चा करता है। जीवन को सुंदर बनाने वाले तत्वों की चर्चा करता है।
देवर्षि ने कहा, ‘आप जो काम करते हैं, यह तो बहुत बुरा है, यह तो महान पाप का जनक है। गलत कर्म जीवन, शरीर, मन को लांछित कर देता है, क्रूर बना देता है। आप जो दूसरों के लिए या दूसरों के साथ कर रहे हैं, उससे उत्पन्न होने वाले पापों के कारण आपकी उतने ही वर्षों तक दुर्गति होगी।’
रत्नाकर ने कहा, ‘मेरा बड़ा परिवार है, उसके पास दूसरा कोई साधन नहीं है जीवन जीने का, खेती नहीं है, नौकरी नहीं है, दूसरा कोई स्रोत नहीं है। जहां से दो रुपए आएं, पोषण हो। परिवार का विकास हो। स्वास्थ बने। ऐसा कोई भी संसाधन नहीं है। मेरी चेष्टा से ही हुई कमाई से ही मेरा परिवार चलता है।’
देवर्षि ने कहा, ‘ अपने परिजनों से पूछो कि तुम्हारे साथ में वे पाप के भागी बनेंगे या नहीं? तुम्हारी पाप की कमाई खाते हैं, तुम्हारा पाप अपने माथे लेंगे या नहीं।’
वाल्मीकि जी को लगा कि ये साधु भागना चाहता है, मुझे घर भेजकर, चालाकी कर रहा है।
यह जानकर देवर्षि ने कहा, ‘यदि मुझ पर विश्वास नहीं है, तो मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि जब तक आप आओगेे नहीं, मैं जाऊंगा नहीं, विश्वास नहीं है, तो मेरे हाथ-पैर बांध दो।’
जैसे पाप से वे भोग कर रहे हैं, उससे होने वाले अधर्म में वे भागीदार बनेंगे या नहीं? यह बात रत्नाकर डाकू को भी ठीक प्रतीत हुई। उसने कहा, ‘ठीक है, मैं आपको बांध देता हूं।’
हाथ-पैर को बांध दिया और तब घर गया। घर जाकर पूछा, ‘मैं जो कमा करके लाता हूं, गलत काम करके, उसके कारण जो पाप उत्पन्न होते हैं, उस पाप में आपकी भागीदारी होगी या नहीं? पाप की कमाई से जो भोजन आता है, उसमें आप सब भागीदारी बनेंगे या नहीं?’
परिजनों ने कहा, ‘पाप में हमारी भागीदारी नहीं है। आप परिवार के मुखिया हैं, आप कहीं से भी संपत्ति लाएं और हमारा पालन-पोषण करें, आपके पाप में हमारी कोई भागीदारी नहीं है, यह बात आप समझ लीजिए।’
यह बात सुनकर रत्नाकर को बड़ा आघात लगा कि अरे, हत्या, लूटपाट से अर्जित धन में ये लोग भोगी हैं, लेकिन जो पाप उत्पन्न हो रहा है, उसमें भागीदार नहीं हैं, तो ये तो बहुत स्वार्थी लोग हो गए। ऐसे लोगों के साथ जीवन नहीं जीना चाहिए। कितना बड़ा पाप हो रहा है और ये लोग बंटवारा करना नहीं चाहते हैं, केवल लाभ लेना चाहते हैं। ये परिवार के लोग नहीं हैं, मेरे सगे नहीं हैं, ये तो दूसरे लोग हैं, मेरे अपने नहीं हैं।
जो दुर्भावना थी, वह उनकी समझ में आ गई। यहां ऐसे ही लोग रहते हैं। हर आदमी को अपनी चिंता है, स्वार्थ की चिंता है। यह बात सर्वत्र व्याप्त है।
वह आकर देवर्षि नारद के चरणों में गिर पड़े। बार-बार आग्रह किया, ‘हमें पाप कर्मों से बाहर निकालें। कैसे हम किए गए पापों की सजा पाएंगे? कैसे हम नवजीवन को प्राप्त करेंगे? कैसे हम सत्कर्म के जीवन का प्राप्त करेंगे, ऐसे जीवन को प्राप्त करेंगे, जो ईश्वर भक्ति से जुड़ा होगा। कैसे हमारा जीवन सुधरेगा। आप ही मार्ग बताइए।’
देवर्षि नारद ने कहा, ‘अपने सनातन धर्म में एक से एक संत महंत हैं, जिनके द्वारा कैसा भी जीव संत जीवन को प्राप्त कर लेता है, आप केवल मन बनाओ कि आपको अच्छा बनना है, आपको बुरे कर्मों से जुड़े नहीं रहना है। यह सबकुछ छोडऩा होगा, न लूट होगी, न हत्या होगी, न झूठ होगा, न फरेब होगा, न ऐसे लोगों की जिम्मेदारी होगी, जिनको केवल फल चाहिए। पूर्ण समर्पित होकर भगवान राम का जो नाम है उसे जपिए, उससे आपका उद्धार होगा। नाम में अद्भुत शक्ति है, यह नाम सबकुछ कर सकता है। आप नाम जपिए। राम, राम, राम, राम, राम करिए आप। यही मंत्र आपको मैं दे रहा हूं, इससे आपके जीवन में पूर्ण परिवर्तन आएगा, पूर्ण सुंदरता आएगी। संपूर्ण जीवन आपका जो अभी लांछित हो गया है, अनेक तरह से अवगुणों से दूषित हो गया है, सब ठीक हो जाएगा।
रत्नाकर ने प्रयास किया, फिर कहा, ‘मेरे मुंह में यह शब्द आ ही नहीं रहा है। राम, राम कह ही नहीं सकता। मेरा शरीर दूषित है, दिव्य शब्द राम मेरे मुंह से उच्चरित नहीं हो सकता। श्रवण और कथन के लिए जो वातावरण चाहिए, जैसी शक्ति चाहिए, वह मेरे पास नहीं है, मैं राम, राम नहीं जप सकता।’
देवर्षि ने कोशिश की, लेकिन रत्नाकर के मुंह से राम शब्द नहीं निकल पाया।
देवर्षि ने कहा, ‘ठीक है, आप राम राम नहीं जप सकते हैं, तो आप मरा, मरा ही जपिए।’
यह रत्नाकर को ठीक लगा, वे जिस गलत व्यवसाय में थे, उसमें मारो, मारो बोलते ही रहते थे, मारो, पीटो, लूटो, काटो। राम, राम तो नहीं जप पाए, पाप की अधिकता के कारण, लेकिन मरा मरा उन्होंने जपना शुरू किया।
क्रमश:
कथा है, देवर्षि नारद को देखकर रत्नाकर टूट पड़े। देवर्षि नारद का जीवन दिव्य जीवन है, रोम-रोम से अद्भुत आभा प्रस्फुटित हो रही है। पूर्णत: निर्लिप्त जीवन है। डाकू रत्नाकर ने सोचा कि आज काफी कमाई होगी, ‘रुको जो भी है, दे दो, नहीं तो मार दूंगा।’
नारद जी ने कहा, ‘मेरे पास कुछ नहीं है, वीणा है और तन पर वस्त्र है, मेरे पास और क्या संपत्ति है?’
वाल्मीकि ने पूछा, ‘वीणा का क्या करते हो?’
देवर्षि ने उत्तर दिया, ‘वीणा बजाता हूं, ब्रह्मा जी ने प्रदान किया है, इस पर हरि कीर्तन करता हूं।’
‘हमें भी बजाकर सुनाओ।’
देवर्षि नारद से अच्छा वीणा कौन बजाएगा? वे तो ईश्वर को सुनाते हैं, सच्चे हृदय से बजाते हैं। संगीत भक्ति की ऊंचाइयों को प्राप्त होता है। वीणा की ध्वनि अनेक हृदयों को प्रभावित करती है। रत्नाकर को भी वीणा की ध्वनि ने प्रभावित किया, नरमी आई, रौद्र रूप में धीमापन आया। अच्छा लगा। उन्हें लगा कि विचित्र परिवर्तन आ रहा है। यही तो सत्संग है। फिर भी लंबे समय का पापी जीवन था, सहज परिवर्तन संभव नहीं था।
उन्होंने कहा, ‘आपकी वीणा अच्छी है, मुझे भी अच्छी लगी। अब आपके साथ क्या व्यवहार किया जाए?’
देवर्षि ने कहा, ‘जो मेरे पास है, मैं दे दूंगा, लेकिन मेरा कुछ प्रश्न है, जिसका आप समाधान करें, तो बहुत ही अच्छा होगा।’
संत मिलते हैं, तो सत्संग होता है। संत मिलता है, तो ईश्वर की चर्चा करता है, परमार्थ की चर्चा, गुणों की चर्चा। जिनका जीवन ऊंचाई को प्राप्त होता है, उनकी चर्चा करता है। जीवन को सुंदर बनाने वाले तत्वों की चर्चा करता है।
देवर्षि ने कहा, ‘आप जो काम करते हैं, यह तो बहुत बुरा है, यह तो महान पाप का जनक है। गलत कर्म जीवन, शरीर, मन को लांछित कर देता है, क्रूर बना देता है। आप जो दूसरों के लिए या दूसरों के साथ कर रहे हैं, उससे उत्पन्न होने वाले पापों के कारण आपकी उतने ही वर्षों तक दुर्गति होगी।’
रत्नाकर ने कहा, ‘मेरा बड़ा परिवार है, उसके पास दूसरा कोई साधन नहीं है जीवन जीने का, खेती नहीं है, नौकरी नहीं है, दूसरा कोई स्रोत नहीं है। जहां से दो रुपए आएं, पोषण हो। परिवार का विकास हो। स्वास्थ बने। ऐसा कोई भी संसाधन नहीं है। मेरी चेष्टा से ही हुई कमाई से ही मेरा परिवार चलता है।’
देवर्षि ने कहा, ‘ अपने परिजनों से पूछो कि तुम्हारे साथ में वे पाप के भागी बनेंगे या नहीं? तुम्हारी पाप की कमाई खाते हैं, तुम्हारा पाप अपने माथे लेंगे या नहीं।’
वाल्मीकि जी को लगा कि ये साधु भागना चाहता है, मुझे घर भेजकर, चालाकी कर रहा है।
यह जानकर देवर्षि ने कहा, ‘यदि मुझ पर विश्वास नहीं है, तो मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि जब तक आप आओगेे नहीं, मैं जाऊंगा नहीं, विश्वास नहीं है, तो मेरे हाथ-पैर बांध दो।’
जैसे पाप से वे भोग कर रहे हैं, उससे होने वाले अधर्म में वे भागीदार बनेंगे या नहीं? यह बात रत्नाकर डाकू को भी ठीक प्रतीत हुई। उसने कहा, ‘ठीक है, मैं आपको बांध देता हूं।’
हाथ-पैर को बांध दिया और तब घर गया। घर जाकर पूछा, ‘मैं जो कमा करके लाता हूं, गलत काम करके, उसके कारण जो पाप उत्पन्न होते हैं, उस पाप में आपकी भागीदारी होगी या नहीं? पाप की कमाई से जो भोजन आता है, उसमें आप सब भागीदारी बनेंगे या नहीं?’
परिजनों ने कहा, ‘पाप में हमारी भागीदारी नहीं है। आप परिवार के मुखिया हैं, आप कहीं से भी संपत्ति लाएं और हमारा पालन-पोषण करें, आपके पाप में हमारी कोई भागीदारी नहीं है, यह बात आप समझ लीजिए।’
यह बात सुनकर रत्नाकर को बड़ा आघात लगा कि अरे, हत्या, लूटपाट से अर्जित धन में ये लोग भोगी हैं, लेकिन जो पाप उत्पन्न हो रहा है, उसमें भागीदार नहीं हैं, तो ये तो बहुत स्वार्थी लोग हो गए। ऐसे लोगों के साथ जीवन नहीं जीना चाहिए। कितना बड़ा पाप हो रहा है और ये लोग बंटवारा करना नहीं चाहते हैं, केवल लाभ लेना चाहते हैं। ये परिवार के लोग नहीं हैं, मेरे सगे नहीं हैं, ये तो दूसरे लोग हैं, मेरे अपने नहीं हैं।
जो दुर्भावना थी, वह उनकी समझ में आ गई। यहां ऐसे ही लोग रहते हैं। हर आदमी को अपनी चिंता है, स्वार्थ की चिंता है। यह बात सर्वत्र व्याप्त है।
वह आकर देवर्षि नारद के चरणों में गिर पड़े। बार-बार आग्रह किया, ‘हमें पाप कर्मों से बाहर निकालें। कैसे हम किए गए पापों की सजा पाएंगे? कैसे हम नवजीवन को प्राप्त करेंगे? कैसे हम सत्कर्म के जीवन का प्राप्त करेंगे, ऐसे जीवन को प्राप्त करेंगे, जो ईश्वर भक्ति से जुड़ा होगा। कैसे हमारा जीवन सुधरेगा। आप ही मार्ग बताइए।’
देवर्षि नारद ने कहा, ‘अपने सनातन धर्म में एक से एक संत महंत हैं, जिनके द्वारा कैसा भी जीव संत जीवन को प्राप्त कर लेता है, आप केवल मन बनाओ कि आपको अच्छा बनना है, आपको बुरे कर्मों से जुड़े नहीं रहना है। यह सबकुछ छोडऩा होगा, न लूट होगी, न हत्या होगी, न झूठ होगा, न फरेब होगा, न ऐसे लोगों की जिम्मेदारी होगी, जिनको केवल फल चाहिए। पूर्ण समर्पित होकर भगवान राम का जो नाम है उसे जपिए, उससे आपका उद्धार होगा। नाम में अद्भुत शक्ति है, यह नाम सबकुछ कर सकता है। आप नाम जपिए। राम, राम, राम, राम, राम करिए आप। यही मंत्र आपको मैं दे रहा हूं, इससे आपके जीवन में पूर्ण परिवर्तन आएगा, पूर्ण सुंदरता आएगी। संपूर्ण जीवन आपका जो अभी लांछित हो गया है, अनेक तरह से अवगुणों से दूषित हो गया है, सब ठीक हो जाएगा।
रत्नाकर ने प्रयास किया, फिर कहा, ‘मेरे मुंह में यह शब्द आ ही नहीं रहा है। राम, राम कह ही नहीं सकता। मेरा शरीर दूषित है, दिव्य शब्द राम मेरे मुंह से उच्चरित नहीं हो सकता। श्रवण और कथन के लिए जो वातावरण चाहिए, जैसी शक्ति चाहिए, वह मेरे पास नहीं है, मैं राम, राम नहीं जप सकता।’
देवर्षि ने कोशिश की, लेकिन रत्नाकर के मुंह से राम शब्द नहीं निकल पाया।
देवर्षि ने कहा, ‘ठीक है, आप राम राम नहीं जप सकते हैं, तो आप मरा, मरा ही जपिए।’
यह रत्नाकर को ठीक लगा, वे जिस गलत व्यवसाय में थे, उसमें मारो, मारो बोलते ही रहते थे, मारो, पीटो, लूटो, काटो। राम, राम तो नहीं जप पाए, पाप की अधिकता के कारण, लेकिन मरा मरा उन्होंने जपना शुरू किया।
क्रमश:
आदिकवि महर्षि वाल्मीकि : मरा मरा से राम राम तक
महर्षि वाल्मीकि जी अनूखे जीवन के ऋषि हैं। मानव जीवन पराकाष्ठा का जीवन है। हर आदमी अपने विकास के लिए प्रयास करता है और विकास होता ही है। सभी क्षेत्रों में हम अपना विकास चाहते हैं। धीरे-धीरे विकास होता है, लेकिन इस विकास का जो अंतिम क्रम है, वह ऋषित्व ही है। जहां विद्या की पराकाष्ठा है, तप की भी पराकाष्ठा है। मानवीय गुणों की पराकाष्ठा है। उनका जीवन संपूर्ण संसार के लिए है। इस स्थिति में महर्षि वाल्मीकि अनुपम हैं।
महर्षि वाल्मीकि का जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ। पिछले कर्मों के आधार पर पारिवारिक सामाजिक आधार पर उनके जीवन में एक मोड़ आता है और जीविका का जो साधन है, जीवन निर्वाह के जो सही रास्ते हैं, उन्हें छोडक़र अत्यंत गिरे हुए रास्ते को वे पकड़ लेते हैं। मारकाट का जीवन, लूटपाट का जीवन, कदाचार, पापाचार का जीवन, उनकी सभी तरह की भावना विकृत थी, जो भी मिला, उसे लूटना, जो नहीं देता है, उसकी हत्या कर देना। ऐसे वे अपने जीवन का संचालन कर रहे थे, इस आधार पर जो आई हुई संपत्ति, संसाधन हैं, उससे परिवार का पोषण करते थे। परिवार का पोषण तो अनादि कर्म है, परिवार में जो बड़ा है, वो अपने से जुड़े हुए लोगों का पोषण करता है, लेकिन शक्ति और धन अर्जन का तरीका सही होना चाहिए। शास्त्रों के अनुरूप होना चाहिए, समाज की मर्यादा से भी सही हो, शासन की जो नियमावली है, कानून-कायदे हैं, उसके अनुरूप भी सही हो, तो ही सही रूप से सही जीवन, सही भावनाएं रहती हैं। महर्षि वाल्मीकि यानी तत्कालीन जीवन में रत्नाकर का जीवन अनेक पापों के साथ चल रहा है। उनका जीवन भ्रष्ट है। गलत संसाधनों के आधार पर उनका जीवन चल रहा था, वे समाज के लिए अभिशाप के रूप में हो गए थे, हर आदमी उनकी निंदा करता था कि ये कैसा आदमी है, ब्राह्मण होकर इतना निंदनीय और हेय जीवन जी रहा है।
अचानक एक घटना होती है, दुर्भाग्यपूर्ण जीवन के अंत का एक संयोग बनता है। वैदिक सनातन धर्म के शास्त्रों में यह बात बार-बार दोहराई जाती है, किसी के जीवन में संत का प्रवेश हो, तो भला होता है। जब संत जुड़ता है किसी व्यक्ति के साथ, तो उसके जीवन में प्राण आता है, परिवर्तन आता है। क्रांति आती है, वह शुभ ही होती है। जीवन के विकास का बड़ा साधन बनाती है क्रांति। धीरे-धीरे जीवन ऊंचाई की ओर बढऩे लगता है और पराकाष्ठा को प्राप्त होता है। संतों के साथ जीवन के शुभ के लिए सशक्त साधन के रूप में सनातन धर्म मान्य है। समाज को अनादि काल से संत लोग प्रभावित करते रहे हैं, अपने ज्ञान, विज्ञान से सुधार करते रहे हैं, अपने सदाचार से ज्ञान, विज्ञान से, अपने उदार भाव, अपनी मानवीय भावना से, परमार्थ की भावना से।
क्रमश:
Saturday, 16 July 2016
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
समापन भाग
हमें विश्वामित्र जी से प्रेरणा लेनी चाहिए। हम लडऩा भी जानते है और शास्त्रार्थ में पराजित करना भी जानते हैं। भारतीय संस्कृति में केवल पढऩा या शास्त्र तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। हम केवल ज्ञानवान नहीं हैं, हमारे पास धन भी रहना चाहिए। हमारे पास ज्ञान भी रहना चाहिए।
शक्ति होनी चाहिए कि आज जो भारत भूमि को लांछित कर रहा है, रामराज्य को लांछित कर रहा है, हम उन्हें निश्चित रूप से सबक सिखा दें, इस तरह का सामथ्र्य भी हमारे पास होना चाहिए, इसके लिए हमें विश्वामित्र जी से प्र्रेरणा लेनी चाहिए। विश्वामित्र जी हर दृष्टि से समर्थ रहे। हमारा जीवन अपने लिए, समाज, परिवार की रक्षा, संरक्षण के लिए होना चाहिए। हमारा जीवन मानवता के लिए वरदान होना चाहिए। ज्ञान भी चाहिए और शक्ति भी चाहिए और धर्म के माध्यम से चाहिए। विश्वामित्र जी ने अपने को ऐसा बनाया था कि आज भी हमें गौरव है। इस देश में वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषि-संत हमारे लिए प्रेरणा स्रोत हैं, उनका ज्ञान, उनका जीवन हमारे लिए आदर्श है, उनका इतिहास हमारे साथ है। भगवान से प्रार्थना है कि ऋषियों की प्रेरणा, उनका ज्ञान, उनकी नीति, उनके द्वारा किया गया प्रयोग सभी के जीवन में आए और हम लोग अपने देश, संसार, मानवता को सभी दृष्टि से लांछित होने से बचाएं। संतत्व को लांछित होने से बचाएं। गुरुत्व लांछित हो रहा है, भारत भूमि की वंदना लांछित हो रही है। धर्मज्ञान, अध्यात्म लांछित हो रहा है, हमें सुधार की दिशा में बढऩा ही चाहिए।
कितना प्रभाव था विश्वामित्र जी का जनकपुर में, अनेक राजा-महाराजा आए थे, कोई विश्वामित्र जी के साथ आंख नहीं मिला सकता था, जनक जी ने स्वयं को धन्य माना कि आप राम जी को लेकर आए। वशिष्ठ ने भी स्वयं को धन्य माना। कहीं कोई कमी नहीं है, दूसरों को सम्मान देने में स्नेह देने में। जब दो परिपूर्ण विभूतियां एक दूसरे के साथ सही ढंग से जुड़ेंगी, तभी तो समाज को लाभ होगा, नहीं तो समाज अपनी संपत्ति को खो देगा, बिखर जाएगा।
हमें ऋषियों से गौरव लेना है, ज्ञान लेना है, दिशा लेनी है। रामजी को परिपूर्ण जीवन मिला। गृहस्थ जीवन बिना दान-त्याग के अधूरा होता है। हम कह सकते हैं कि विश्वामित्र जी ने ही जानकी जी से राम जी का विवाह करवाया। यह भी अद्भुत घटना है। जनकपुर में रामजी हैं, उस विवाह में वशिष्ठ जी भी पहुंचते हैं, वहां विश्वामित्र जी पहले से हैं, कहीं कोई संतुलन नहीं बिगड़ता है। दोनों एक दूसरे के लिए भरपूर सम्मान रखते हैं, एक दूसरे का प्रभाव बढ़ाते हुए रामराज्य को सशक्त करते हैं। यदि हम इन ऋषियों से कुछ भी सीखते हैं, तो हमारा खोया हुआ जगतगुरुत्व, खोया हुआ जो संसार का नेतृत्व है, जो खोया हुआ हमारा वैभव है, वह हमें अवश्य प्राप्त हो जाएगा।
जय श्रीराम
हमें विश्वामित्र जी से प्रेरणा लेनी चाहिए। हम लडऩा भी जानते है और शास्त्रार्थ में पराजित करना भी जानते हैं। भारतीय संस्कृति में केवल पढऩा या शास्त्र तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। हम केवल ज्ञानवान नहीं हैं, हमारे पास धन भी रहना चाहिए। हमारे पास ज्ञान भी रहना चाहिए।
शक्ति होनी चाहिए कि आज जो भारत भूमि को लांछित कर रहा है, रामराज्य को लांछित कर रहा है, हम उन्हें निश्चित रूप से सबक सिखा दें, इस तरह का सामथ्र्य भी हमारे पास होना चाहिए, इसके लिए हमें विश्वामित्र जी से प्र्रेरणा लेनी चाहिए। विश्वामित्र जी हर दृष्टि से समर्थ रहे। हमारा जीवन अपने लिए, समाज, परिवार की रक्षा, संरक्षण के लिए होना चाहिए। हमारा जीवन मानवता के लिए वरदान होना चाहिए। ज्ञान भी चाहिए और शक्ति भी चाहिए और धर्म के माध्यम से चाहिए। विश्वामित्र जी ने अपने को ऐसा बनाया था कि आज भी हमें गौरव है। इस देश में वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषि-संत हमारे लिए प्रेरणा स्रोत हैं, उनका ज्ञान, उनका जीवन हमारे लिए आदर्श है, उनका इतिहास हमारे साथ है। भगवान से प्रार्थना है कि ऋषियों की प्रेरणा, उनका ज्ञान, उनकी नीति, उनके द्वारा किया गया प्रयोग सभी के जीवन में आए और हम लोग अपने देश, संसार, मानवता को सभी दृष्टि से लांछित होने से बचाएं। संतत्व को लांछित होने से बचाएं। गुरुत्व लांछित हो रहा है, भारत भूमि की वंदना लांछित हो रही है। धर्मज्ञान, अध्यात्म लांछित हो रहा है, हमें सुधार की दिशा में बढऩा ही चाहिए।
कितना प्रभाव था विश्वामित्र जी का जनकपुर में, अनेक राजा-महाराजा आए थे, कोई विश्वामित्र जी के साथ आंख नहीं मिला सकता था, जनक जी ने स्वयं को धन्य माना कि आप राम जी को लेकर आए। वशिष्ठ ने भी स्वयं को धन्य माना। कहीं कोई कमी नहीं है, दूसरों को सम्मान देने में स्नेह देने में। जब दो परिपूर्ण विभूतियां एक दूसरे के साथ सही ढंग से जुड़ेंगी, तभी तो समाज को लाभ होगा, नहीं तो समाज अपनी संपत्ति को खो देगा, बिखर जाएगा।
हमें ऋषियों से गौरव लेना है, ज्ञान लेना है, दिशा लेनी है। रामजी को परिपूर्ण जीवन मिला। गृहस्थ जीवन बिना दान-त्याग के अधूरा होता है। हम कह सकते हैं कि विश्वामित्र जी ने ही जानकी जी से राम जी का विवाह करवाया। यह भी अद्भुत घटना है। जनकपुर में रामजी हैं, उस विवाह में वशिष्ठ जी भी पहुंचते हैं, वहां विश्वामित्र जी पहले से हैं, कहीं कोई संतुलन नहीं बिगड़ता है। दोनों एक दूसरे के लिए भरपूर सम्मान रखते हैं, एक दूसरे का प्रभाव बढ़ाते हुए रामराज्य को सशक्त करते हैं। यदि हम इन ऋषियों से कुछ भी सीखते हैं, तो हमारा खोया हुआ जगतगुरुत्व, खोया हुआ जो संसार का नेतृत्व है, जो खोया हुआ हमारा वैभव है, वह हमें अवश्य प्राप्त हो जाएगा।
जय श्रीराम
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
भाग - ७
सबसे पहले राम जी ने कहा -
निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाईं।
आप निर्भय होकर यज्ञ कीजिए। रामजी ने विश्वामित्र जी को कहा, जो राक्षस आएंगे, उन्हें मैं कालकलवित कर दूंगा। आप यज्ञ कीजिए।
धर्म का सबसे बड़ा कृत्य है यज्ञ। देवता जितना देते हैं, उसके बदले में हम भी उन्हें दें, उनका अभिनंदन करें, हमारी मानवता हमारा व्यक्तित्व देवत्व को प्राप्त करेगा। देवत्व से ईश्वरत्व को प्राप्त करेगा। जीवन की सबसे बड़ी ऊंचाई यही होती है कि हम अपने बच्चे को कैसे ऊंचाई तक ले जाएं। तो विश्वामित्र जी का और वशिष्ठ जी का, दोनों का ऋषित्व मिलकर एक बहुत बड़े संसार के उपकार का मार्ग प्रशस्त करता है। लोग कहा करते हैं कि राम जी अद्भुत हैं, ऋषि के समान हैं, ऋषि जैसे दो तत्वों को मिलाता है, एक पक्ष विश्वामित्र और दूसरा पक्ष वशिष्ठ जी हैं। एक का जन्म ही ब्रह्मर्षि के परिवार में हुआ है और एक का जन्म हुआ क्षत्रिय परिवार में, दोनों ने धीरे-धीरे संयम-नियम करते हुए जीवन को बड़ा किया और बहुत बड़ी दूरी थी दोनों के बीच, लेकिन वह भी धीरे-धीरे कम होती चली गई। परिपूर्ण, अटल रूप से दोनों के हित साथ हुए और दानों को राम जी ने जोड़ा। कौशल्या और कैकयी की दूरी को कम किया, उत्तर और दक्षिण को जोड़ा, ऐसे ही रामजी ने विश्वामित्र जी और वशिष्ठ जी को जोड़ा। दोनों ऋषियों ने मिलकर संपूर्ण जीवन में धर्म राज्य-अध्यात्म राज्य को बढ़ाया, यह पे्ररणा लेने वाली बात है।
रामजी जैसा सोचने की जरूरत है। विश्वामित्र और वशिष्ठ की तरह सोचने की जरूरत है। हमारे जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है धर्म की स्थापना, हम संतों और आचार्यों के जीवन का, लेकिन अब तो सभी लोग धन एकत्र करने लगे कि कैसे मठ बड़ा हो जाए, कैसे गाडिय़ां बड़ी हो जाएं। कैसे हमारे जीवन का वैभव बढ़े, कैसे हमारा संग्रह प्रभाव बढ़े। कैसे रोज हमारा नाम अखबारों में आए। हम कैसे समाज के नेता हो जाएं, ये तमाम तरह इच्छाएं बलवती हो रही हैं। गृहस्थ जीवन में अर्थ और भोग ही जैसे प्रधान होता है, वैसे ही आज के संतों का मुख्य रूप से उद्देश्य केवल मान-सम्मान, धन-दौलत है।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं, जैसे आपने वशिष्ठ-विश्वामित्र को एक साथ जोड़ा, दोनों को साथ लेकर संपूर्ण मानवता के लिए अपने को अर्पित किया। असंख्य जीवों का उद्धार किया। कैसी अनुपमता जीवन में प्रकट हुई, ठीक इसी तरह के परिवर्तन आज के संत समाज में होने चाहिए। ऐसा हुआ, तो बहुत लाभ होगा और पूरे विश्व को लाभ होगा। धन, विद्या, शक्ति इत्यादि सबमें वृद्धि होगी। आज जो अभाव दिख रहा है, एक दूसरे को सहन नहीं करने से उपजा अभाव है, कहीं-कहीं लगता है कि केवल हम हम ही हों, दूसरा कोई न हो, यह गलत प्रवृत्ति है। भगवान की दया से विश्वामित्र जी कहते थे कि हमारे एक हाथ में वेद है और एक हाथ में धनुष हैं।
हम दोनों ही दिशाओं में समर्थ हैं। शास्त्र भी है और शक्ति भी है। जिसके जीवन में केवल शास्त्र ही हो, उसका जीवन अधूरा है और जिसके जीवन में केवल शक्ति हो, उसका जीवन भी अधूरा है। भारतीय संस्कृति की विशेषता है। यह ध्यान देने की बात है कि हमने धन बल को बढ़ाया, तप बल को नहीं बढ़ाया, इसलिए देश पराजित हो गया। लंबे समय तक के लिए गुलाम हो गया।
क्रमश:
सबसे पहले राम जी ने कहा -
निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाईं।
आप निर्भय होकर यज्ञ कीजिए। रामजी ने विश्वामित्र जी को कहा, जो राक्षस आएंगे, उन्हें मैं कालकलवित कर दूंगा। आप यज्ञ कीजिए।
धर्म का सबसे बड़ा कृत्य है यज्ञ। देवता जितना देते हैं, उसके बदले में हम भी उन्हें दें, उनका अभिनंदन करें, हमारी मानवता हमारा व्यक्तित्व देवत्व को प्राप्त करेगा। देवत्व से ईश्वरत्व को प्राप्त करेगा। जीवन की सबसे बड़ी ऊंचाई यही होती है कि हम अपने बच्चे को कैसे ऊंचाई तक ले जाएं। तो विश्वामित्र जी का और वशिष्ठ जी का, दोनों का ऋषित्व मिलकर एक बहुत बड़े संसार के उपकार का मार्ग प्रशस्त करता है। लोग कहा करते हैं कि राम जी अद्भुत हैं, ऋषि के समान हैं, ऋषि जैसे दो तत्वों को मिलाता है, एक पक्ष विश्वामित्र और दूसरा पक्ष वशिष्ठ जी हैं। एक का जन्म ही ब्रह्मर्षि के परिवार में हुआ है और एक का जन्म हुआ क्षत्रिय परिवार में, दोनों ने धीरे-धीरे संयम-नियम करते हुए जीवन को बड़ा किया और बहुत बड़ी दूरी थी दोनों के बीच, लेकिन वह भी धीरे-धीरे कम होती चली गई। परिपूर्ण, अटल रूप से दोनों के हित साथ हुए और दानों को राम जी ने जोड़ा। कौशल्या और कैकयी की दूरी को कम किया, उत्तर और दक्षिण को जोड़ा, ऐसे ही रामजी ने विश्वामित्र जी और वशिष्ठ जी को जोड़ा। दोनों ऋषियों ने मिलकर संपूर्ण जीवन में धर्म राज्य-अध्यात्म राज्य को बढ़ाया, यह पे्ररणा लेने वाली बात है।
रामजी जैसा सोचने की जरूरत है। विश्वामित्र और वशिष्ठ की तरह सोचने की जरूरत है। हमारे जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है धर्म की स्थापना, हम संतों और आचार्यों के जीवन का, लेकिन अब तो सभी लोग धन एकत्र करने लगे कि कैसे मठ बड़ा हो जाए, कैसे गाडिय़ां बड़ी हो जाएं। कैसे हमारे जीवन का वैभव बढ़े, कैसे हमारा संग्रह प्रभाव बढ़े। कैसे रोज हमारा नाम अखबारों में आए। हम कैसे समाज के नेता हो जाएं, ये तमाम तरह इच्छाएं बलवती हो रही हैं। गृहस्थ जीवन में अर्थ और भोग ही जैसे प्रधान होता है, वैसे ही आज के संतों का मुख्य रूप से उद्देश्य केवल मान-सम्मान, धन-दौलत है।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं, जैसे आपने वशिष्ठ-विश्वामित्र को एक साथ जोड़ा, दोनों को साथ लेकर संपूर्ण मानवता के लिए अपने को अर्पित किया। असंख्य जीवों का उद्धार किया। कैसी अनुपमता जीवन में प्रकट हुई, ठीक इसी तरह के परिवर्तन आज के संत समाज में होने चाहिए। ऐसा हुआ, तो बहुत लाभ होगा और पूरे विश्व को लाभ होगा। धन, विद्या, शक्ति इत्यादि सबमें वृद्धि होगी। आज जो अभाव दिख रहा है, एक दूसरे को सहन नहीं करने से उपजा अभाव है, कहीं-कहीं लगता है कि केवल हम हम ही हों, दूसरा कोई न हो, यह गलत प्रवृत्ति है। भगवान की दया से विश्वामित्र जी कहते थे कि हमारे एक हाथ में वेद है और एक हाथ में धनुष हैं।
हम दोनों ही दिशाओं में समर्थ हैं। शास्त्र भी है और शक्ति भी है। जिसके जीवन में केवल शास्त्र ही हो, उसका जीवन अधूरा है और जिसके जीवन में केवल शक्ति हो, उसका जीवन भी अधूरा है। भारतीय संस्कृति की विशेषता है। यह ध्यान देने की बात है कि हमने धन बल को बढ़ाया, तप बल को नहीं बढ़ाया, इसलिए देश पराजित हो गया। लंबे समय तक के लिए गुलाम हो गया।
क्रमश:
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
भाग - ६
वशिष्ठ जी और विश्वामित्र जी की आध्यात्मिकता में कहीं भी कोई खोटापन होता, कहीं मन में प्रतिस्पद्र्धा होती, तो ऐसा संभव नहीं होता। वशिष्ठ जी स्वयं लेकर जाते राम जी को या नहीं जाने देते, लेकिन वशिष्ठ जी श्रेष्ठ भावों को समझ रहे थे। आज के ऋषियों-संतों को देखना चाहिए, यदि आज ऐसी स्थिति हो, तो वे क्या करेंगे। विश्वामित्र जी लेने आए हैं, पहली बार राम जी को, ऐसे कर्म के लिए जाना है और इसी यात्रा में विवाह का भी योग बनना है। तो वशिष्ठ जी के स्थान पर कोई अन्य संत या ऋषि होता या आज का कोई धर्माचार्य होता, तो अपने शिष्य को देता क्या? दशरथ जी चाहते भी, तो मना कर देता या कहता कि मैं लेकर आऊंगा, लेकिन धन्य हैं वशिष्ठ जी, उनका ऋषित्व विशिष्ट है, उनमें कहीं से भी कोई त्रुटि नहीं है। इसलिए उन्होंने दशरथ जी को समझाया। समझाया कि राम जी क्यों आए हैं। राम तो संपूर्ण विश्व के लिए राम हैं, संपूर्ण विश्व में धर्म की संस्थापना के लिए राम जी आए हैं। रामराज्य की संस्थापना के लिए आए हैं, सब जगह प्रेम हो, अच्छे संस्कार हों, इसके लिए आए हैं। उस जगह के निर्माण के लिए आए हैं, जहां - सबहीं करें परस्पर प्रीति।
सबके लिए सबके मन में प्रेम हो, सभी लोग जीवन के चरमोत्कर्ष को प्राप्त करके जीवन जीएं। दशरथ जी ने वशिष्ठ जी के कहने पर राम-लक्ष्मण को जाने दिया। आज तक राम, लक्ष्मण के गुरु वशिष्ठ जी थे, लेकिन उन्होंने अपने शिष्यों को कहा कि ये केवल मेरे ही शिष्य नहीं हैं, अब विश्वामित्र जी के भी शिष्य हैं।
आश्वस्त होने के बाद दशरथ जी ने सहर्ष कहा -
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आना नहिं कोऊ।।
यात्रा के दौरान विश्वामित्र जी ने अनेक तरह की शिक्षाओं, साधनाओं से राम जी को परिचित कराया। ऐसे दिव्यास्त्र दिए, जो इन्हें साक्षात भगवान शंकर से मिले थे। ईश्वर के रूप में राम जी सबकुछ जानते हैं, लेकिन तब भी लोकाचार के लिए राम जी को कई शिक्षाओं से विभूषित किया।
आज के आचार्यों, धर्माचार्यों को सीखना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन में लोगों को पे्ररणा लेनी चाहिए। सभी दृष्टियों से लौकिक और अलौकिक अवस्थाओं को जानने वाले शिष्य को कोई दूसरे को देता है क्या? मानवता के प्रति भले का भाव वशिष्ठ जी जैसा किसी के पास दिखता है क्या? आज के संतों में वैसा समर्पण है क्या? आज तो ज्यादातर लोग गर्त में जा रहे हैं। आज दो रुपया देने वाला चेला भी दूसरे मठ में जाता है, तो उसके गुरु को बुरा लगता है। बड़े-बड़े संत वेषधारी आचार्य बड़े-बड़े धर्माचार्य एकदम तड़पने लगते हैं कि कहां चला गया चेला, निकम्मा है, गधा है। बहुत विकृत्ति आई है धर्माचार्यों में।
विश्वामित्र जी को कितना अच्छा लगा होगा, वशिष्ठ जी उनका भरपूर सम्मान कर रहे हैं, अपने शिष्यों को मेरे साथ भेज रहे हैं। कैसा अनुभव हुआ होगा उन्हें, यह वैदिक सनातन धर्म का सुख जिसका कोई विकल्प नहीं है। ऐसे चरित्र कहां मिलेंगे, सभी लोगों को ऐसे ऋषियों, संतों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
तो रामजी गए उनके साथ ऋषि-मानवता सेवा के लिए। रामजी के बोल तभी पहली बार निकलते हैं, उसके पहले उनके वचन का कोई उदाहरण नहीं मिलता, तुलसीदास जी ने पहली बार राम जी को बोलते हुए विश्वामित्र जी के साथ ही दिखाया। जब यज्ञ प्रारंभ होने वाला था, तब सबसे पहले राम जी ने जो कहा, उसे तुलसीदास जी ने लिखा, उसके पहले उनके किसी वचन को नहीं लिखा। इतनी बड़ी आयु तक वे सावधान थे कि जब राम-वचन की शुरुआत करूंगा, तो जिसके लिए ईश्वर ने अवतार लिया है, उसके लिए करूंगा।
आज खा लिया, आज वहां जाने का मन है, आज यह खेलूंगा, जैसी बालपन वाली बातों का विवरण तुलसीदास जी ने नहीं किया। ईश्वर का अवतार कोई ऐसी बातों के लिए होता है क्या, ईश्वर जिसके लिए आते हैं, उसी का महत्व है।
क्रमश:
वशिष्ठ जी और विश्वामित्र जी की आध्यात्मिकता में कहीं भी कोई खोटापन होता, कहीं मन में प्रतिस्पद्र्धा होती, तो ऐसा संभव नहीं होता। वशिष्ठ जी स्वयं लेकर जाते राम जी को या नहीं जाने देते, लेकिन वशिष्ठ जी श्रेष्ठ भावों को समझ रहे थे। आज के ऋषियों-संतों को देखना चाहिए, यदि आज ऐसी स्थिति हो, तो वे क्या करेंगे। विश्वामित्र जी लेने आए हैं, पहली बार राम जी को, ऐसे कर्म के लिए जाना है और इसी यात्रा में विवाह का भी योग बनना है। तो वशिष्ठ जी के स्थान पर कोई अन्य संत या ऋषि होता या आज का कोई धर्माचार्य होता, तो अपने शिष्य को देता क्या? दशरथ जी चाहते भी, तो मना कर देता या कहता कि मैं लेकर आऊंगा, लेकिन धन्य हैं वशिष्ठ जी, उनका ऋषित्व विशिष्ट है, उनमें कहीं से भी कोई त्रुटि नहीं है। इसलिए उन्होंने दशरथ जी को समझाया। समझाया कि राम जी क्यों आए हैं। राम तो संपूर्ण विश्व के लिए राम हैं, संपूर्ण विश्व में धर्म की संस्थापना के लिए राम जी आए हैं। रामराज्य की संस्थापना के लिए आए हैं, सब जगह प्रेम हो, अच्छे संस्कार हों, इसके लिए आए हैं। उस जगह के निर्माण के लिए आए हैं, जहां - सबहीं करें परस्पर प्रीति।
सबके लिए सबके मन में प्रेम हो, सभी लोग जीवन के चरमोत्कर्ष को प्राप्त करके जीवन जीएं। दशरथ जी ने वशिष्ठ जी के कहने पर राम-लक्ष्मण को जाने दिया। आज तक राम, लक्ष्मण के गुरु वशिष्ठ जी थे, लेकिन उन्होंने अपने शिष्यों को कहा कि ये केवल मेरे ही शिष्य नहीं हैं, अब विश्वामित्र जी के भी शिष्य हैं।
आश्वस्त होने के बाद दशरथ जी ने सहर्ष कहा -
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आना नहिं कोऊ।।
यात्रा के दौरान विश्वामित्र जी ने अनेक तरह की शिक्षाओं, साधनाओं से राम जी को परिचित कराया। ऐसे दिव्यास्त्र दिए, जो इन्हें साक्षात भगवान शंकर से मिले थे। ईश्वर के रूप में राम जी सबकुछ जानते हैं, लेकिन तब भी लोकाचार के लिए राम जी को कई शिक्षाओं से विभूषित किया।
आज के आचार्यों, धर्माचार्यों को सीखना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन में लोगों को पे्ररणा लेनी चाहिए। सभी दृष्टियों से लौकिक और अलौकिक अवस्थाओं को जानने वाले शिष्य को कोई दूसरे को देता है क्या? मानवता के प्रति भले का भाव वशिष्ठ जी जैसा किसी के पास दिखता है क्या? आज के संतों में वैसा समर्पण है क्या? आज तो ज्यादातर लोग गर्त में जा रहे हैं। आज दो रुपया देने वाला चेला भी दूसरे मठ में जाता है, तो उसके गुरु को बुरा लगता है। बड़े-बड़े संत वेषधारी आचार्य बड़े-बड़े धर्माचार्य एकदम तड़पने लगते हैं कि कहां चला गया चेला, निकम्मा है, गधा है। बहुत विकृत्ति आई है धर्माचार्यों में।
विश्वामित्र जी को कितना अच्छा लगा होगा, वशिष्ठ जी उनका भरपूर सम्मान कर रहे हैं, अपने शिष्यों को मेरे साथ भेज रहे हैं। कैसा अनुभव हुआ होगा उन्हें, यह वैदिक सनातन धर्म का सुख जिसका कोई विकल्प नहीं है। ऐसे चरित्र कहां मिलेंगे, सभी लोगों को ऐसे ऋषियों, संतों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
तो रामजी गए उनके साथ ऋषि-मानवता सेवा के लिए। रामजी के बोल तभी पहली बार निकलते हैं, उसके पहले उनके वचन का कोई उदाहरण नहीं मिलता, तुलसीदास जी ने पहली बार राम जी को बोलते हुए विश्वामित्र जी के साथ ही दिखाया। जब यज्ञ प्रारंभ होने वाला था, तब सबसे पहले राम जी ने जो कहा, उसे तुलसीदास जी ने लिखा, उसके पहले उनके किसी वचन को नहीं लिखा। इतनी बड़ी आयु तक वे सावधान थे कि जब राम-वचन की शुरुआत करूंगा, तो जिसके लिए ईश्वर ने अवतार लिया है, उसके लिए करूंगा।
आज खा लिया, आज वहां जाने का मन है, आज यह खेलूंगा, जैसी बालपन वाली बातों का विवरण तुलसीदास जी ने नहीं किया। ईश्वर का अवतार कोई ऐसी बातों के लिए होता है क्या, ईश्वर जिसके लिए आते हैं, उसी का महत्व है।
क्रमश:
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
भाग - ५
ऐसे धर्म भी हैं, जिनके कथित संतों को भक्तों ने ही मार दिया। दंड विधान था ही नहीं। लोग एक हत्या नहीं झेल पाते, लेकिन यहां सौ पुत्रों की हत्या हो गई, फिर भी वशिष्ठ निर्लिप्त थे, गुणों की क्या ऊंचाई है। ऐसा किसी धर्म में नहीं मिलेगा, मानवता के लिए यह अनुकरणीय है, अच्छे संस्कार होने चाहिए, जो भी अच्छा कार्य करे, उसकी प्रशंसा की प्रवृत्ति होनी चाहिए। हर कोई पवित्र जीवन को प्राप्त करे, बदले की कोई भावना नहीं रहे, तब जो समाज बनेगा, वह वरदान स्वरूप होगा।
वस्तुत: यही जीवन का अद्भुत क्रम है, जो हम विश्वामित्र जी के जीवन में देखते हैं। हम अपने जीवन का ध्यान करें, अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए बल को बढ़ाने के लिए तप को बढ़ाने के लिए, जो भी आंतरिक भावों को बढ़ाने के लिए सकारात्मक है, हम निरंतर साधना करें, तप करें, जप करें, संयम-नियम करें। ऐसा करते-करते धीरे-धीरे हमारा विकास होता जाएगा। हम अपने जीवन को भी सार्थक करेंगे और दूसरे के जीवन को भी। रामराज्य जो दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मानक राज्य है, जहां लोग सभी दृष्टि से संपन्न और आनंदित थे, जहां किसी तरह का संताप नहीं था, जहां किसी तरह का विरोध नहीं था, जहां परस्पर प्रेम था, उस रामराज्य को अनेक लोगों ने अपना बल दिया होगा, प्रयास किया होगा। अपना सर्वस्व अर्पित किया होगा, लेकिन विश्वामित्र जी भी वशिष्ठ जी के समान ही रामराज्य के संस्थापकों में गिने जा सकते हैं। यह अद्भुत घटना है, राम जी पहली बार विश्वामित्र जी के आचार्यत्व में ही घर से निकलते हैं। ईश्वर मानवता के लिए ही आता है, समाज के परिष्कार के लिए आता है, वैदिक सनातन धर्म की यही मान्यता है। धर्म का सबसे बड़ा स्वरूप यज्ञ को माना जाता है। धर्म के अनेक रूप है, दान भी धर्म है, दया भी धर्म है, सेवा भी धर्म है, तीर्थाटन भी धर्म है, माता-पिता गुरु, गऊ, दरिद्रनारायण की सेवा भी धर्म है, धर्म के अनेक विकल्प हैं, लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान यज्ञ का है। देवताओं को सम्बोधित करके जब समर्पण होता है, तब यज्ञ संपन्न होता है।
तो भगवान के अवतारों में आदर्श अवतार है भगवान श्री राम का। धर्म के सर्वश्रेष्ठ कर्म के संपादन के लिए यज्ञ की सुरक्षा में अपने को अर्पित करने के लिए विश्वामित्र जी के आचार्यत्व में अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ राम जी वन जाते हैं। तैंतीस हजार वर्षों का काल है राम जी का, लेकिन कर्म का पहला प्रयोग, उसके लिए जो पहली यात्रा हुई, वह विश्वामित्र जी के साथ ही शुरू हुई। कौन सेवा के क्षेत्र में, धर्म के क्षेत्र में लेने आया, कौन लेकर गया, यह बहुत महत्व रखता है। विश्वामित्र जी ने ही राम जी को मांगा और दशरथ जी से मांगकर ले गए। उन्हें मालूम था कि भगवान प्रकट हुए हैं, मैं अयोध्या जाऊंगा, तब राम जी मिलेंगे।
राम जी लौकिक दृष्टि से विश्वामित्र जी के भी शिष्य हैं। व्यावहारिक दृष्टि से मानवीय दृष्टि से विश्वामित्र जी को शाष्टांग प्रणाम करते हैं, लेकिन वास्तव में विश्वामित्र जी भक्त हैं राम जी के। उन्हें मालूम है कि मैंने जो तप किया था, उसका फल हैं राम जी। फल देने वाले भी यही हैं और मुख्य लक्ष्य भी यही हैं, उनके लिए ही मैंने तप किया था। विश्वामित्र जी ले गए राम जी को यज्ञ रक्षा के लिए। पहले यह बात समझ में नहीं आ रही थी महाराजा दशरथ जी को, राम जी को भेजने को तैयार नहीं हो रहे थे।
दशरथ जी को राम जी बहुत प्रिय थे, प्रेम अतुलनीय था, अपने प्राणों से अधिक पे्रम वे अपने पुत्र राम जी से करते थे। यह बात ध्यान देने योग्य है कि वशिष्ठ जी ने कहा कि मैं लेकर आता हूं, दशरथ जी राम जी को भेजने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं, मैं समझाऊंगा, तैयार करूंगा।
क्रमश:
ऐसे धर्म भी हैं, जिनके कथित संतों को भक्तों ने ही मार दिया। दंड विधान था ही नहीं। लोग एक हत्या नहीं झेल पाते, लेकिन यहां सौ पुत्रों की हत्या हो गई, फिर भी वशिष्ठ निर्लिप्त थे, गुणों की क्या ऊंचाई है। ऐसा किसी धर्म में नहीं मिलेगा, मानवता के लिए यह अनुकरणीय है, अच्छे संस्कार होने चाहिए, जो भी अच्छा कार्य करे, उसकी प्रशंसा की प्रवृत्ति होनी चाहिए। हर कोई पवित्र जीवन को प्राप्त करे, बदले की कोई भावना नहीं रहे, तब जो समाज बनेगा, वह वरदान स्वरूप होगा।
वस्तुत: यही जीवन का अद्भुत क्रम है, जो हम विश्वामित्र जी के जीवन में देखते हैं। हम अपने जीवन का ध्यान करें, अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए बल को बढ़ाने के लिए तप को बढ़ाने के लिए, जो भी आंतरिक भावों को बढ़ाने के लिए सकारात्मक है, हम निरंतर साधना करें, तप करें, जप करें, संयम-नियम करें। ऐसा करते-करते धीरे-धीरे हमारा विकास होता जाएगा। हम अपने जीवन को भी सार्थक करेंगे और दूसरे के जीवन को भी। रामराज्य जो दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मानक राज्य है, जहां लोग सभी दृष्टि से संपन्न और आनंदित थे, जहां किसी तरह का संताप नहीं था, जहां किसी तरह का विरोध नहीं था, जहां परस्पर प्रेम था, उस रामराज्य को अनेक लोगों ने अपना बल दिया होगा, प्रयास किया होगा। अपना सर्वस्व अर्पित किया होगा, लेकिन विश्वामित्र जी भी वशिष्ठ जी के समान ही रामराज्य के संस्थापकों में गिने जा सकते हैं। यह अद्भुत घटना है, राम जी पहली बार विश्वामित्र जी के आचार्यत्व में ही घर से निकलते हैं। ईश्वर मानवता के लिए ही आता है, समाज के परिष्कार के लिए आता है, वैदिक सनातन धर्म की यही मान्यता है। धर्म का सबसे बड़ा स्वरूप यज्ञ को माना जाता है। धर्म के अनेक रूप है, दान भी धर्म है, दया भी धर्म है, सेवा भी धर्म है, तीर्थाटन भी धर्म है, माता-पिता गुरु, गऊ, दरिद्रनारायण की सेवा भी धर्म है, धर्म के अनेक विकल्प हैं, लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान यज्ञ का है। देवताओं को सम्बोधित करके जब समर्पण होता है, तब यज्ञ संपन्न होता है।
तो भगवान के अवतारों में आदर्श अवतार है भगवान श्री राम का। धर्म के सर्वश्रेष्ठ कर्म के संपादन के लिए यज्ञ की सुरक्षा में अपने को अर्पित करने के लिए विश्वामित्र जी के आचार्यत्व में अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ राम जी वन जाते हैं। तैंतीस हजार वर्षों का काल है राम जी का, लेकिन कर्म का पहला प्रयोग, उसके लिए जो पहली यात्रा हुई, वह विश्वामित्र जी के साथ ही शुरू हुई। कौन सेवा के क्षेत्र में, धर्म के क्षेत्र में लेने आया, कौन लेकर गया, यह बहुत महत्व रखता है। विश्वामित्र जी ने ही राम जी को मांगा और दशरथ जी से मांगकर ले गए। उन्हें मालूम था कि भगवान प्रकट हुए हैं, मैं अयोध्या जाऊंगा, तब राम जी मिलेंगे।
राम जी लौकिक दृष्टि से विश्वामित्र जी के भी शिष्य हैं। व्यावहारिक दृष्टि से मानवीय दृष्टि से विश्वामित्र जी को शाष्टांग प्रणाम करते हैं, लेकिन वास्तव में विश्वामित्र जी भक्त हैं राम जी के। उन्हें मालूम है कि मैंने जो तप किया था, उसका फल हैं राम जी। फल देने वाले भी यही हैं और मुख्य लक्ष्य भी यही हैं, उनके लिए ही मैंने तप किया था। विश्वामित्र जी ले गए राम जी को यज्ञ रक्षा के लिए। पहले यह बात समझ में नहीं आ रही थी महाराजा दशरथ जी को, राम जी को भेजने को तैयार नहीं हो रहे थे।
दशरथ जी को राम जी बहुत प्रिय थे, प्रेम अतुलनीय था, अपने प्राणों से अधिक पे्रम वे अपने पुत्र राम जी से करते थे। यह बात ध्यान देने योग्य है कि वशिष्ठ जी ने कहा कि मैं लेकर आता हूं, दशरथ जी राम जी को भेजने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं, मैं समझाऊंगा, तैयार करूंगा।
क्रमश:
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
भाग - ४
बाद में वे राजर्षी के रूप में प्रतिष्ठित हुए, लेकिन यहां भी मेनका के सौंदर्य ने उन्हें पराजित कर दिया, तपश्चर्या को नष्ट कर लिया। काम ने उनके तप को निगल लिया। तब उन्हें ग्लानि हुई, लज्जा हुई, इसके बाद उन्होंने फिर तपस्या की। उनका दुनिया भर में डंका बजा। इसके बाद के घटनाक्रम में विश्वामित्र जी ने वशिष्ठ जी के पुत्रों को मार दिया।
ध्यान देने की बात है, काम और क्रोध, दोनों ही तपश्चर्या के घोर विरोधी हैं। जब हम आध्यात्मिक जीवन में कुछ करना चाहते हैं, तो हमें अनेक तरह के दुर्गुणों से बचना चाहिए। अवरोधकों से हमें दूरी बनाकर रखना चाहिए। सबसे मुख्य है कि हमें काम और क्रोध से बचना चाहिए। विश्वामित्र जी तो दोनों से ही पराजित हो रहे हैं। मेनका के रूप में काम ने पराजित कर दिया और क्रोध के रूप में विश्वामित्र जी के पुत्रों को मारकर अपने तपस्वी जीवन को लांछित कर लिया। जो काम और क्रोध पर ही विजय नहीं प्राप्त करेगा, वह कभी जीवन के सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता, कभी ऋषित्व को प्राप्त नहीं कर सकता, ईश्वरीय जीवन को प्राप्त नहीं कर सकता, वह अपने जीवन की परमावस्था को नहीं प्राप्त सकता। ऐसी स्थिति में सौ बच्चों की हानि के बावजूद वशिष्ठ जी का चित्त अत्यंत व्यवस्थित था, कहीं से कोई चिंता नहीं, कहीं से कोई लांछना नहीं, कहीं से कोई भेद नहीं, पूर्ण रूप से वे शांत हैं। कहीं भी कितनी भी बड़ी हानि हो जाए, लेकिन मन में विकृति नहीं आनी चाहिए, तभी आदमी आध्यात्मिक जीवन में ऊंचाई प्राप्त करता है।
जब वशिष्ठ जी शांत रहे, तो यह बात विश्वामित्र जी को बहुत खली। उन्हें लगा कि राजर्षित्व से ब्रह्मर्षित्व को प्राप्त करना चाहिए। ऐसे कर्मों से तो कोई राजर्षि नहीं बनता था, तो ब्रह्मर्षि क्या बनेगा? गलत आचरण वाला, काम, क्रोध का शिकार व्यक्ति संत कैसे होगा? जो ऋषि के ही पुत्रों को मार दे, वह संत कैसे बनेगा, उन्हें ग्लानि हुई, उन्होंने नए सिरे से अपने जीवन को संवारा। अद्भुत तप किया। जो लोग ऊंचाई पर जाने का प्रयास करते हैं, उन्हें प्रलोभन मिलते हैं, लेकिन भटकना नहीं चाहिए। दृष्टि अपने लक्ष्य पर रहनी चाहिए। जो आकाश पर जा रहा है, वही जमीन पर गिरता है। तप के क्रम में उन्होंने काम और क्रोध पर विजय प्राप्त की, इस क्रम में अनेक तरह के विघ्नों को उन्होंने पार किया। वे ऋषित्व की विशिष्टतम स्थिति में पहुंचे। उनका संपूर्ण संसार जय-जयकार करने लगा। उन्होंने सभी देवताओं, ऋषियों को प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी आए और कहा कि मैं बहुत प्रसन्न हूं। तुम वरदान मांगो।
तब ब्रह्मा जी को उन्होंने कहा कि आप मुझे वरदान दीजिए ब्रह्मर्षि बनने का। उन्होंने कहा, वशिष्ठ जी यदि ये उपाधि दें, सम्मान से दें, तब मुझे संतोष होगा। ब्रह्मा जी की प्रेरणा से वशिष्ठ जी आए, वशिष्ठ जी विश्वामित्र जी भी के तप के बारे में जानते थे, इसलिए विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि मनाने में देर नहीं की।
ब्रह्मर्षि के रूप में उन्होंने विश्वामित्र को सम्मान दिया। प्रसन्नता व्यक्त की। इस घटना के बाद विश्वामित्र जी सर्वश्रेष्ठ ऊंचाई पर पहुंचे। लेकिन सबसे बड़ी ऊंचाई तो सनातन धर्म की हुई, यहां केवल प्रभाव से उपाधियां नहीं मिलतीं, आध्यात्मिक जगत में कोई संस्था उपाधि नहीं बांटती, लोग उपाधि नहीं बांटते। जब तक व्यक्ति सही मायने में ऊंचाई पर नहीं पहुंचते, तब तक उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता। विश्वामित्र जी ने वशिष्ठ जी का कितना विरोध किया था, कितना लांछित किया था, इसके बावजूद वशिष्ठ जी में लालसा नहीं थी। दुनिया के इतिहास में शायद ही कोई ऐसी घटना है।
इस घटना से प्रेरणा लेनी चाहिए कि अपना दुश्मन भी अगर सुधार करता है, आंतरिक-आध्यात्मिक श्रेष्ठ गुणों, मानवता को वरदान स्वरूप जो ऊंचाई को प्राप्त करता है, तो उसे हमें सहर्ष गले लगाना है और अपनी हानि के बावजूद उसे सम्मान देना है। किसी तरह का विद्वेष नहीं रखना है, लेकिन आज की दुनिया में यह काम बंद हो गया है, आज जो संत समाज है, आज जो साधकों का समाज है, उसमें यह काम कम हुआ है, लेकिन वास्तव में सनातन धर्म में ऐसा नहीं होना चाहिए।
क्रमश:
बाद में वे राजर्षी के रूप में प्रतिष्ठित हुए, लेकिन यहां भी मेनका के सौंदर्य ने उन्हें पराजित कर दिया, तपश्चर्या को नष्ट कर लिया। काम ने उनके तप को निगल लिया। तब उन्हें ग्लानि हुई, लज्जा हुई, इसके बाद उन्होंने फिर तपस्या की। उनका दुनिया भर में डंका बजा। इसके बाद के घटनाक्रम में विश्वामित्र जी ने वशिष्ठ जी के पुत्रों को मार दिया।
ध्यान देने की बात है, काम और क्रोध, दोनों ही तपश्चर्या के घोर विरोधी हैं। जब हम आध्यात्मिक जीवन में कुछ करना चाहते हैं, तो हमें अनेक तरह के दुर्गुणों से बचना चाहिए। अवरोधकों से हमें दूरी बनाकर रखना चाहिए। सबसे मुख्य है कि हमें काम और क्रोध से बचना चाहिए। विश्वामित्र जी तो दोनों से ही पराजित हो रहे हैं। मेनका के रूप में काम ने पराजित कर दिया और क्रोध के रूप में विश्वामित्र जी के पुत्रों को मारकर अपने तपस्वी जीवन को लांछित कर लिया। जो काम और क्रोध पर ही विजय नहीं प्राप्त करेगा, वह कभी जीवन के सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता, कभी ऋषित्व को प्राप्त नहीं कर सकता, ईश्वरीय जीवन को प्राप्त नहीं कर सकता, वह अपने जीवन की परमावस्था को नहीं प्राप्त सकता। ऐसी स्थिति में सौ बच्चों की हानि के बावजूद वशिष्ठ जी का चित्त अत्यंत व्यवस्थित था, कहीं से कोई चिंता नहीं, कहीं से कोई लांछना नहीं, कहीं से कोई भेद नहीं, पूर्ण रूप से वे शांत हैं। कहीं भी कितनी भी बड़ी हानि हो जाए, लेकिन मन में विकृति नहीं आनी चाहिए, तभी आदमी आध्यात्मिक जीवन में ऊंचाई प्राप्त करता है।
जब वशिष्ठ जी शांत रहे, तो यह बात विश्वामित्र जी को बहुत खली। उन्हें लगा कि राजर्षित्व से ब्रह्मर्षित्व को प्राप्त करना चाहिए। ऐसे कर्मों से तो कोई राजर्षि नहीं बनता था, तो ब्रह्मर्षि क्या बनेगा? गलत आचरण वाला, काम, क्रोध का शिकार व्यक्ति संत कैसे होगा? जो ऋषि के ही पुत्रों को मार दे, वह संत कैसे बनेगा, उन्हें ग्लानि हुई, उन्होंने नए सिरे से अपने जीवन को संवारा। अद्भुत तप किया। जो लोग ऊंचाई पर जाने का प्रयास करते हैं, उन्हें प्रलोभन मिलते हैं, लेकिन भटकना नहीं चाहिए। दृष्टि अपने लक्ष्य पर रहनी चाहिए। जो आकाश पर जा रहा है, वही जमीन पर गिरता है। तप के क्रम में उन्होंने काम और क्रोध पर विजय प्राप्त की, इस क्रम में अनेक तरह के विघ्नों को उन्होंने पार किया। वे ऋषित्व की विशिष्टतम स्थिति में पहुंचे। उनका संपूर्ण संसार जय-जयकार करने लगा। उन्होंने सभी देवताओं, ऋषियों को प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी आए और कहा कि मैं बहुत प्रसन्न हूं। तुम वरदान मांगो।
तब ब्रह्मा जी को उन्होंने कहा कि आप मुझे वरदान दीजिए ब्रह्मर्षि बनने का। उन्होंने कहा, वशिष्ठ जी यदि ये उपाधि दें, सम्मान से दें, तब मुझे संतोष होगा। ब्रह्मा जी की प्रेरणा से वशिष्ठ जी आए, वशिष्ठ जी विश्वामित्र जी भी के तप के बारे में जानते थे, इसलिए विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि मनाने में देर नहीं की।
ब्रह्मर्षि के रूप में उन्होंने विश्वामित्र को सम्मान दिया। प्रसन्नता व्यक्त की। इस घटना के बाद विश्वामित्र जी सर्वश्रेष्ठ ऊंचाई पर पहुंचे। लेकिन सबसे बड़ी ऊंचाई तो सनातन धर्म की हुई, यहां केवल प्रभाव से उपाधियां नहीं मिलतीं, आध्यात्मिक जगत में कोई संस्था उपाधि नहीं बांटती, लोग उपाधि नहीं बांटते। जब तक व्यक्ति सही मायने में ऊंचाई पर नहीं पहुंचते, तब तक उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता। विश्वामित्र जी ने वशिष्ठ जी का कितना विरोध किया था, कितना लांछित किया था, इसके बावजूद वशिष्ठ जी में लालसा नहीं थी। दुनिया के इतिहास में शायद ही कोई ऐसी घटना है।
इस घटना से प्रेरणा लेनी चाहिए कि अपना दुश्मन भी अगर सुधार करता है, आंतरिक-आध्यात्मिक श्रेष्ठ गुणों, मानवता को वरदान स्वरूप जो ऊंचाई को प्राप्त करता है, तो उसे हमें सहर्ष गले लगाना है और अपनी हानि के बावजूद उसे सम्मान देना है। किसी तरह का विद्वेष नहीं रखना है, लेकिन आज की दुनिया में यह काम बंद हो गया है, आज जो संत समाज है, आज जो साधकों का समाज है, उसमें यह काम कम हुआ है, लेकिन वास्तव में सनातन धर्म में ऐसा नहीं होना चाहिए।
क्रमश:
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
भाग - ३
यह कितना महान देश है, अतिथिदेव भव का देश है। वशिष्ठ जी ने अपने तप और शक्ति के दम पर उनके यहां विराजमान कामधेनु पुत्री नंदिनी की कृपा से विश्वामित्र जी और उनकी सेना का पूरा सम्मान किया। कल्पना नहीं कर सकते थे विश्वामित्र जी, अतिथि सत्कार की कोई ऐसी विधा या कर्म नहीं था, जो वशिष्ठ जी ने नहीं किया। परंपराओं का भरपूर पालन हुआ, अतिथि गदगद हो गए। बहुत बड़ी घटना हो गई। सैनिकों को आश्चर्य हो गया। सभी को लगा कि यह सम्मान तो कहीं प्राप्त ही नहीं हुआ था, पता नहीं कहां से आज ईश्वर तुल्य महर्षि अपनी संपूर्ण सदश्चर्या की शक्ति को लेकर अपनी गऊ नंदिनी की पूरी महिमा को लगाकर सम्मान कर रहा है, बहुत गदगद हुए विश्वामित्र जी।
यहीं से वशिष्ठ और विश्वामित्र के संबंध की शुरुआत हुई। विश्वामित्र जी का मन ललचा गया नन्दिनी की महिमा देखकर। उन्होंने कहा, यह गऊ आप हमें दे दीजिए।
विश्वामित्र जी के पास दान लेने की योग्यता नहीं है, लेकिन वे मांगने लगे। वे अपने धर्म से हटने लगे। लालच वश भी यदि वे ऐसा कर रहे हैं, तो भी वे अपने स्थान से गिर रहे हैं। उन्होंने यह नहीं सोचा कि मुझे वशिष्ठ जी को देना चाहिए, लेकिन मैं मांग रहा हूं।
वशिष्ठ जी ने कहा कि मैं इसके द्वारा अपने यज्ञ सफल बनाता हूं, मेरी संपूर्ण व्यवस्था का यह मूल स्रोत है, सबका सत्कार मैं इससे करता हूं, संसाधन अर्जन से लेकर हर सुविधा मैं इसी से लेता हूं, इसलिए मैं गऊ नहीं दे सकता, क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है मेरे पास। विकल्प होता, तो मैं दे देता।
यह ध्यान देने की बात है कि विश्वामित्र जी ने जो याचना की थी, वह क्षत्रिय धर्म के खिलाफ थी। वे ऋषि पर आक्रमण नहीं कर सकते थे, राजा पालक होता है, वह मांगने वाला नहीं होता, देने वाला होता है। राजा को ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए कि वह ऋषियों को देने की बजाय मांगने लग जाए।
ऋषि से आध्यात्मिक शक्ति का लाभ उठाना चाहिए, उससे कुछ मांगना, लेना नहीं चाहिए। विश्वामित्र जी ने गलत काम किया। उनका जो प्रजापालक स्वरूप था, वह सब यहां लुप्त हो गया और नंदिनी को बलात ले जाने का उन्होंने प्रयास किया, तो लांछित हो गए, इतिहास उन्हें इसके लिए कभी माफ नहीं करेगा। महाराजा ने अपनी संपूर्ण शक्तियों को नंदिनी के लालच में लांछित कर लिया। गर्त में पहुंचा दिया, अशोभनीय कार्य किया। वशिष्ठ जी के मना करने पर भी वे बलात नंदिनी को ले जाने लगे, लेकिन वशिष्ठ जी शांत बैठे थे, कोई हलचल नहीं, बाहर भी नहीं, मन में भी नहीं, धैर्य की जो अवस्था होती है, संत की जो अवस्था होती है, लाभ और हानि में भी वह समान स्वरूप में रहता है।
नंदिनी ने जाते हुए उनकी ओर देखा, कहा कि आप चाहते हैं, तो मैं अपनी सुरक्षा के लिए कुछ करूं।
वशिष्ठ जी ने भरे हृदय से कहा, करो।
तो नंदिनी ने भयानक क्रोध किया, अपने नथुनों से असंख्य सैनिकों को पैदा कर दिया, जो सैनिक कामधेनु पुत्री नंदिनी की दिव्य शक्ति से पैदा हुए थे, उन्होंने विश्वामित्र जी की सेना को पराजित कर दिया। अद्भुत और अनुपम प्रताप दिखा। इस बड़ी हार से विश्वामित्र बहुत लज्जित हुए। क्षत्रिय बल का घमंड टूटा, वे सोचते थे, क्षत्रिय बल से कोई भी बड़ा नहीं है, लेकिन उन्हें लगा कि क्षत्रिय बल से ब्रह्म बल बड़ा है, ज्यादा प्रभावी है। तभी उन्होंने यह संकल्प लिया कि मैं भी तप करूंगा। मैं भी ऋषि शक्ति को प्राप्त करूंगा। वे तप में जुट गए, आगे बढ़ते गए।
क्रमश:
यह कितना महान देश है, अतिथिदेव भव का देश है। वशिष्ठ जी ने अपने तप और शक्ति के दम पर उनके यहां विराजमान कामधेनु पुत्री नंदिनी की कृपा से विश्वामित्र जी और उनकी सेना का पूरा सम्मान किया। कल्पना नहीं कर सकते थे विश्वामित्र जी, अतिथि सत्कार की कोई ऐसी विधा या कर्म नहीं था, जो वशिष्ठ जी ने नहीं किया। परंपराओं का भरपूर पालन हुआ, अतिथि गदगद हो गए। बहुत बड़ी घटना हो गई। सैनिकों को आश्चर्य हो गया। सभी को लगा कि यह सम्मान तो कहीं प्राप्त ही नहीं हुआ था, पता नहीं कहां से आज ईश्वर तुल्य महर्षि अपनी संपूर्ण सदश्चर्या की शक्ति को लेकर अपनी गऊ नंदिनी की पूरी महिमा को लगाकर सम्मान कर रहा है, बहुत गदगद हुए विश्वामित्र जी।
यहीं से वशिष्ठ और विश्वामित्र के संबंध की शुरुआत हुई। विश्वामित्र जी का मन ललचा गया नन्दिनी की महिमा देखकर। उन्होंने कहा, यह गऊ आप हमें दे दीजिए।
विश्वामित्र जी के पास दान लेने की योग्यता नहीं है, लेकिन वे मांगने लगे। वे अपने धर्म से हटने लगे। लालच वश भी यदि वे ऐसा कर रहे हैं, तो भी वे अपने स्थान से गिर रहे हैं। उन्होंने यह नहीं सोचा कि मुझे वशिष्ठ जी को देना चाहिए, लेकिन मैं मांग रहा हूं।
वशिष्ठ जी ने कहा कि मैं इसके द्वारा अपने यज्ञ सफल बनाता हूं, मेरी संपूर्ण व्यवस्था का यह मूल स्रोत है, सबका सत्कार मैं इससे करता हूं, संसाधन अर्जन से लेकर हर सुविधा मैं इसी से लेता हूं, इसलिए मैं गऊ नहीं दे सकता, क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है मेरे पास। विकल्प होता, तो मैं दे देता।
यह ध्यान देने की बात है कि विश्वामित्र जी ने जो याचना की थी, वह क्षत्रिय धर्म के खिलाफ थी। वे ऋषि पर आक्रमण नहीं कर सकते थे, राजा पालक होता है, वह मांगने वाला नहीं होता, देने वाला होता है। राजा को ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए कि वह ऋषियों को देने की बजाय मांगने लग जाए।
ऋषि से आध्यात्मिक शक्ति का लाभ उठाना चाहिए, उससे कुछ मांगना, लेना नहीं चाहिए। विश्वामित्र जी ने गलत काम किया। उनका जो प्रजापालक स्वरूप था, वह सब यहां लुप्त हो गया और नंदिनी को बलात ले जाने का उन्होंने प्रयास किया, तो लांछित हो गए, इतिहास उन्हें इसके लिए कभी माफ नहीं करेगा। महाराजा ने अपनी संपूर्ण शक्तियों को नंदिनी के लालच में लांछित कर लिया। गर्त में पहुंचा दिया, अशोभनीय कार्य किया। वशिष्ठ जी के मना करने पर भी वे बलात नंदिनी को ले जाने लगे, लेकिन वशिष्ठ जी शांत बैठे थे, कोई हलचल नहीं, बाहर भी नहीं, मन में भी नहीं, धैर्य की जो अवस्था होती है, संत की जो अवस्था होती है, लाभ और हानि में भी वह समान स्वरूप में रहता है।
नंदिनी ने जाते हुए उनकी ओर देखा, कहा कि आप चाहते हैं, तो मैं अपनी सुरक्षा के लिए कुछ करूं।
वशिष्ठ जी ने भरे हृदय से कहा, करो।
तो नंदिनी ने भयानक क्रोध किया, अपने नथुनों से असंख्य सैनिकों को पैदा कर दिया, जो सैनिक कामधेनु पुत्री नंदिनी की दिव्य शक्ति से पैदा हुए थे, उन्होंने विश्वामित्र जी की सेना को पराजित कर दिया। अद्भुत और अनुपम प्रताप दिखा। इस बड़ी हार से विश्वामित्र बहुत लज्जित हुए। क्षत्रिय बल का घमंड टूटा, वे सोचते थे, क्षत्रिय बल से कोई भी बड़ा नहीं है, लेकिन उन्हें लगा कि क्षत्रिय बल से ब्रह्म बल बड़ा है, ज्यादा प्रभावी है। तभी उन्होंने यह संकल्प लिया कि मैं भी तप करूंगा। मैं भी ऋषि शक्ति को प्राप्त करूंगा। वे तप में जुट गए, आगे बढ़ते गए।
क्रमश:
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
भाग - २
विश्वामित्र का कद बढ़ा, तो संयम, नियम से बढ़ा, उन्होंने अपने जीवन को पकाया, स्वयं उच्च अवस्था को प्राप्त किया, तो उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि प्राप्त हुई। ये उपाधि वैसी नहीं थी, जिसे पैसा देकर प्राप्त किया जाए। आजकल दुनिया में जो उपाधियां बंट रही हैं, वैसे पहले उपाधि नहीं बंटती थी। अब किसी के प्रभाव में आकर भी ये उपाधियां दे दी जाती हैं। कसौटियों पर खरा उतरकर ही विश्वामित्र जी को ब्रह्मर्षित्व की प्राप्ति हुई। संसार के धर्मों के लिए यह एक मानक है और परम सनातन है, जो भी कसौटी पर खरा उतरता है, चाहे वह किसी जाति का हो, किसी आयु का, किसी अवस्था का, किसी भाषा का हो, स्वभाव का हो, उसे ऊंचाई मिलनी चाहिए। समाज, संप्रदाय को, परंपरा को उनका अनुसरण करना चाहिए, विश्वामित्र जी को संसार में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ।
ब्राह्मण को सर्वोच्च माना जाता है और उसने ऐसे काम भी किए हैं, मानवता का उद्धार करना, जितना संयम, उद्यम, अपने को पका-पका कर परम तत्व को प्राप्त करना, मंगल भाव को प्राप्त करना, उसका उपयोग समाज के लिए करना। तो ब्राह्मण ने जितना किया है, उतना किसी ने नहीं किया, इसलिए ब्रह्मर्षित्व की उपाधि कोई केवल ब्राह्मणों की उपाधि नहीं है, यह मानवता की श्रेष्ठ उपाधि है, इससे बड़ी उपाधि हो ही नहीं सकती। जो ईश्वर को जान ले, जो ईश्वर की व्यवस्था को समझ ले, जीवन में उतार ले, जो संपूर्ण संसार के लिए हो गया, जिसमें कोई विद्वेष नहीं है, कोई भी विकृति नहीं है, कदाचार नहीं है, भ्रष्टाचार नहीं है, जिसमें छोडऩे योग्य कुछ नहीं है, उस अवस्था को प्राप्त करना। संसार की सबसे बड़ी उपाधि विश्वामित्र जी ने प्राप्त की। यह उन्होंने तप और त्याग के आधार पर प्राप्त किया, यह बल या धन से प्राप्त स्थान नहीं है। किसी को प्रभावित करके प्राप्त स्थान नहीं है।
राजा विश्वामित्र अपनी सेना के साथ जंगल में विहार कर रहे थे, पर्याप्त मात्रा में सैनिक उनके साथ थे। जितने साधन आवश्यक होते हैं, वो सब थे, बड़ा ही प्रताप था। ऐसी अवस्था में भी वशिष्ठ जी ने उन्हें आकर्षित किया। वे वशिष्ठ जी के आश्रम पहुंच गए। अतिथि तो देव समान होता है। वशिष्ठ जी ने उनका पूरा सत्कार किया। विश्वामित्र जी को कहा कि आप हमें सत्कार का अवसर दें, यहां आप जो कहेंगे, हो जाएगा।
विश्वामित्र जी को लगा कि ये ऋषि हैं, मेरे पास इतनी बड़ी सेना है, सबका सम्मान, सत्कार ये ऋषि कैसे करेंगे। इनका आश्रम छोटा-सा है, इसमें कुछ ही लोग हैं, संसाधन भी अल्प हैं, ऐसी अवस्था में इतनी बड़ी सेना का पालन ये कैसे कर सकते हैं। बहुत महंगा पड़ेगा। उन्होंने मना किया, लेकिन वशिष्ठ जी ने कहा कि सब हो जाएगा, आप आतिथ्य देने के लिए तैयार हो जाइए। बहुत आग्रह करने के बाद राजा विश्वामित्र ने स्वीकार किया कि ठीक है, हम मना नहीं कर सकते।
संसार का, संपूर्ण सृष्टि का, संपूर्ण मानवता का, सबसे तेजस्वी ऊर्जावान, अपनी अंतरात्मा व व्यक्तित्व को निखारने वाला, जिसका जीवन ईश्वर तुल्य जीवन है, जिसके जीवन में रोम-रोम से संयम-नियम-तप झलक रहे हैं, ऐसा ऋषि एक राजा के सम्मान के लिए कह रहा है और बहुत कायदे से कह रहा है, अपनी अंतरात्मा से कह रहा है। बहुत बड़ी बात है। यह क्रम अनुकरणीय क्रम है, वैदिक सनातन धर्म का एक आदर्श क्रम है।
क्रमश:
विश्वामित्र का कद बढ़ा, तो संयम, नियम से बढ़ा, उन्होंने अपने जीवन को पकाया, स्वयं उच्च अवस्था को प्राप्त किया, तो उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि प्राप्त हुई। ये उपाधि वैसी नहीं थी, जिसे पैसा देकर प्राप्त किया जाए। आजकल दुनिया में जो उपाधियां बंट रही हैं, वैसे पहले उपाधि नहीं बंटती थी। अब किसी के प्रभाव में आकर भी ये उपाधियां दे दी जाती हैं। कसौटियों पर खरा उतरकर ही विश्वामित्र जी को ब्रह्मर्षित्व की प्राप्ति हुई। संसार के धर्मों के लिए यह एक मानक है और परम सनातन है, जो भी कसौटी पर खरा उतरता है, चाहे वह किसी जाति का हो, किसी आयु का, किसी अवस्था का, किसी भाषा का हो, स्वभाव का हो, उसे ऊंचाई मिलनी चाहिए। समाज, संप्रदाय को, परंपरा को उनका अनुसरण करना चाहिए, विश्वामित्र जी को संसार में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ।
ब्राह्मण को सर्वोच्च माना जाता है और उसने ऐसे काम भी किए हैं, मानवता का उद्धार करना, जितना संयम, उद्यम, अपने को पका-पका कर परम तत्व को प्राप्त करना, मंगल भाव को प्राप्त करना, उसका उपयोग समाज के लिए करना। तो ब्राह्मण ने जितना किया है, उतना किसी ने नहीं किया, इसलिए ब्रह्मर्षित्व की उपाधि कोई केवल ब्राह्मणों की उपाधि नहीं है, यह मानवता की श्रेष्ठ उपाधि है, इससे बड़ी उपाधि हो ही नहीं सकती। जो ईश्वर को जान ले, जो ईश्वर की व्यवस्था को समझ ले, जीवन में उतार ले, जो संपूर्ण संसार के लिए हो गया, जिसमें कोई विद्वेष नहीं है, कोई भी विकृति नहीं है, कदाचार नहीं है, भ्रष्टाचार नहीं है, जिसमें छोडऩे योग्य कुछ नहीं है, उस अवस्था को प्राप्त करना। संसार की सबसे बड़ी उपाधि विश्वामित्र जी ने प्राप्त की। यह उन्होंने तप और त्याग के आधार पर प्राप्त किया, यह बल या धन से प्राप्त स्थान नहीं है। किसी को प्रभावित करके प्राप्त स्थान नहीं है।
राजा विश्वामित्र अपनी सेना के साथ जंगल में विहार कर रहे थे, पर्याप्त मात्रा में सैनिक उनके साथ थे। जितने साधन आवश्यक होते हैं, वो सब थे, बड़ा ही प्रताप था। ऐसी अवस्था में भी वशिष्ठ जी ने उन्हें आकर्षित किया। वे वशिष्ठ जी के आश्रम पहुंच गए। अतिथि तो देव समान होता है। वशिष्ठ जी ने उनका पूरा सत्कार किया। विश्वामित्र जी को कहा कि आप हमें सत्कार का अवसर दें, यहां आप जो कहेंगे, हो जाएगा।
विश्वामित्र जी को लगा कि ये ऋषि हैं, मेरे पास इतनी बड़ी सेना है, सबका सम्मान, सत्कार ये ऋषि कैसे करेंगे। इनका आश्रम छोटा-सा है, इसमें कुछ ही लोग हैं, संसाधन भी अल्प हैं, ऐसी अवस्था में इतनी बड़ी सेना का पालन ये कैसे कर सकते हैं। बहुत महंगा पड़ेगा। उन्होंने मना किया, लेकिन वशिष्ठ जी ने कहा कि सब हो जाएगा, आप आतिथ्य देने के लिए तैयार हो जाइए। बहुत आग्रह करने के बाद राजा विश्वामित्र ने स्वीकार किया कि ठीक है, हम मना नहीं कर सकते।
संसार का, संपूर्ण सृष्टि का, संपूर्ण मानवता का, सबसे तेजस्वी ऊर्जावान, अपनी अंतरात्मा व व्यक्तित्व को निखारने वाला, जिसका जीवन ईश्वर तुल्य जीवन है, जिसके जीवन में रोम-रोम से संयम-नियम-तप झलक रहे हैं, ऐसा ऋषि एक राजा के सम्मान के लिए कह रहा है और बहुत कायदे से कह रहा है, अपनी अंतरात्मा से कह रहा है। बहुत बड़ी बात है। यह क्रम अनुकरणीय क्रम है, वैदिक सनातन धर्म का एक आदर्श क्रम है।
क्रमश:
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र
नित नई राह निकाल बढ़े
महाराज गाधि जी के पुत्र थे विश्वामित्र जी। राज परिवार के थे, क्षत्रिय वंश में समाज के विस्तार का, शक्तियों को बढ़ाने का शौक होता है, बहुत तरह की अच्छाइयां और बुराइयां होती हैं। वे प्रजापालक भी थे, लोगों के संरक्षण की चिंता करना, अच्छे राजाओं में इनकी गणना होती थी, ये पुरुषार्थी राजा थे, यह नहीं कि दूसरे के द्वारा अर्जित धन संपदा से ही संतुष्ट हो गए, दूसरों से अर्जित करके ही जीवन जीने का उनमें विश्वास नहीं था। एक पुरुषार्थी अपने जीवन में जिन ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है, वैसा उन्होंने किया। केवल मनोरथ करने से किसी की सिद्धि नहीं होती, जंगल का सिंह भी अगर बैठा रहे या सोया रहे, तो उसके पास कोई भी नहीं आएगा। राजा को ही प्रयास करना पड़ता है। जब कोई पुरुषार्थी होगा, तभी तो उसके मनोरथ पूरे होंगे। वे जीवन भर पुरुषार्थ करते रहे। कभी विराम नहीं लिया। भगवान की दया से ईश्वर के आशीर्वाद से इन्हें सभी क्षेत्रों में सफलता मिली। उनके जीवन से सबसे बड़ी प्रेरणा ही यही है कि व्यक्ति को पुरुषार्थी होना चाहिए। अच्छी चीजों के लिए प्रयास करना चाहिए। जो जीवन को समृद्ध करने वाला है, जो समाज को समृद्ध करने वाला है, मानवता को समृद्ध करने वाला है, इस तरह के पुरुषार्थ को कभी बंद नहीं करना चाहिए। निष्क्रिय जीवन ठीक नहीं है। पूर्णता के बाद भी पुरुषार्थ नहीं छोडऩा चाहिए। पुरुषार्थ को कभी विराम नहीं देना चाहिए। उसे कुंठित नहीं करना चाहिए। जीवन में जो भी शक्ति मिली है, उसके साथ हमें लगे रहना चाहिए, परिवार, समाज के लिए, अपने लिए। जीवन के सभी क्षेत्रों में विश्वामित्र जी ने काम किया, विद्या, तप के क्षेत्र में, राजा के क्षेत्र में भी, बल के क्षेत्र में भी, अनेक तरह की सिद्धियों को प्राप्त किया। सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह है कि ब्रह्मणत्व को प्राप्त कर लिया, राजर्षि से ब्रह्मर्षि पद को प्राप्त कर लिया और संतों की सर्वश्रेष्ठ ऊंचाई को प्राप्त किया।
विश्वामित्र जी का जीवन अद्भुत जीवन है, उनके जीवन से सनातन वैदिक धर्म की उदारता का भी परिचय मिलता है।
ईसाइयों का सबसे प्रमुख देश अमरीका है, जो दुनिया का नेतृत्व कर रहा है, अमरीका दुनिया के संरक्षक के रूप में स्वयं को देखता है और उसकी मान्यता भी है, तो अमरीका का जो प्रजातांत्रिक जीवन है, उस जीवन में भी उद्धार आसान नहीं है।
वरिष्ठ जॉर्ज बुश के कार्यकाल में एक अश्वेत व्यक्ति को संतत्व की उपाधि मिली। ईसाई धर्म को इससे पहले २ हजार साल हो गए थे, किसी भी अश्वेत आदमी को संतत्व हासिल नहीं हुआ था। किसी अश्वेत व्यक्ति को आगे नहीं बढ़ाया गया था, लेकिन अपने वैदिक सनातन धर्म में उदारता महत्वपूर्ण है, अनुकरणीय है, यहां क्षत्रिय ब्रह्मर्षि हो गया। जब उन्होंने प्रयास किया राजर्षि से ब्रह्मर्षि होने का, तो विधिवत सम्मान हुआ, ब्रह्मा ने भी उन्हें मान्यता प्रदान की और महर्षि वशिष्ठ ने भी कहा कि ये ब्रह्मर्षि हैं, उन्हें गले लगाया, उनका अभिनंदन किया। इससे सनातन धर्म की उदारता ही प्रकट होती है। रंग के आधार पर यदि धर्म का या गरिमा का या ऊंचाई का निर्धारण हो, तो वह कौन-सा मानव धर्म हुआ, वह ऐसे में विश्व धर्म या मानव धर्म नहीं हो सकता। जो जिसके लायक है, जिस गरिमा को प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहा है, सही ऊंचाई पर पहुंचता है, तो उसे यथोचित पद मिलना चाहिए। किन्तु दूसरे संप्रदायों में इस गुण का बहुत अभाव रहा है। सिख पंथ में तो गुरु परंपरा को ही विराम दे दिया गया, गुरुग्रंथ साहब को ही गुरु के रूप में मान लिया गया। क्या यह सोचने वाली बात नहीं हो गई कि केवल ग्रंथ गुरु कैसे होगा? ग्रंथ को पढऩे वाला, जानने वाला, अपने जीवन में उतारने वाला, उसे दूसरों को समझाने की क्षमता वाला गुरु होता है। हमारे यहां वेदों की अनुपम महिमा है, लेकिन इनको जो समझे, अपने जीवन में उतारे, वही गुरु होगा। चौबीसवें तीर्थंकर के बाद जैनों ने तीर्थंकरों की परंपरा को बंद कर दिया। बौद्ध भी किनारे होने लगे हैं, दलाई लामा निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कोई पूछने वाला नहीं है।
क्रमश:
Sunday, 12 June 2016
महर्षि वशिष्ठ : ऐसा साधु न कोय
समापन भाग
कालीदास ने लिखा है - रघुवंशी राजाओं का प्राण योगियों की तरह छूट रहा है, तो इसके लिए तो अभ्यास करना पड़ेगा। संयम, नियम, तप से चलना पड़ेगा। गुरु वशिष्ठ आदर्श हैं संतों के, गुरुत्व के, संतत्व के। जितनी भी आध्यात्मिक ऊंचाइयां हैं, उसके अंतिम सोपान हैं वशिष्ठ जी। उन्होंने रघुवंश को ऊंचाई पर पहुंचाया और स्वयं पीछे रहकर संरक्षण का काम किया। निर्देशक मुख्य होता है, वह हर तरह के सुधार के लिए आग्रह करता है, प्रेरित करता है और ब्राह्मण, ऋषि, गुरु हमेशा पर्दे के पीछे रहता है, शासन के लिए आगे आने की परंपरा नहीं थी। सीधे शासन चलाना ब्राह्मणों का काम नहीं था।
कहने को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू भी ब्राह्मण थे, लेकिन ब्राह्मणत्व के लिए जो प्रयास होने चाहिए थे, जो गुण होने चाहिए थे, वो उनमें नहीं थे, लेकिन यदि ब्राह्मणत्व के जरूरी गुण उस वंश को प्राप्त हुए होते, तो यह वंश और भी ऊंचाई पर होता। उन्होंने शासक के रूप में ऊंचाइयों को प्राप्त नहीं किया जैसा रघुवंशी लोग प्राप्त करते थे। आध्यात्मिक ऊर्जा का लाभ देश को मिले, इसके लिए कोई प्रयास नहीं था।
जैसे अध्यापक बहुत अच्छा मिल जाए, लेकिन विद्यार्थी बहुत प्रयास नहीं करेंगे, पहलवान गुरु मिल जाए, शिष्य प्रयास न करे, तो सफल नहीं हो सकता। वैसे ही कितना बड़ा ही वैज्ञानिक अध्यापक हो जाए और विद्यार्थी प्रयास न करे, तो क्या लाभ होगा, इसलिए गुरु वशिष्ठ को मानक बनाकर चलना होगा। संपूर्ण संसार के लोग देश के लिए उनको प्रेरक स्तंभ बनाकर उनके अनुसार जीवन जीएं, आज भी जो पुराणों में संदर्भ हैं, विश्वास हैं, इस आधार पर हम अपने जीवन को जीएं, तो हमारा वंश ही रघुवंश हो जाएगा। हमारा जीवन ही राम जी के जैसा हो जाएगा। हमारा संपूर्ण प्रयास राम राज्य का संस्थापक प्रयास हो जाएगा। गुरु वशिष्ठ जी कहीं गए नहीं हैं, सप्त ऋषियों के रूप में मान्यता के आधार पर मौजूद हैं, बहुत खिन्न होकर भारत भूमि को देख रहे हैं, जहां रघुवंश आलोकित हो रहा था, वह भूमि कैसी हो गई। हमारे जो विचार हैं, कृतित्व हैं, जो आदर्श थे, जिसके आधार पर लोगों को प्रेरित होना था, जिससे लोग लोक, परलोक दोनों को बनाते, वो कहां गए। वशिष्ठ जी आज भी सप्तऋषि मंडल में विराजमान रहकर प्रेरित करने के लिए तत्पर हैं। कोई भी चाहे कि हमारे जीवन में रामराज्य आए, राम जी हमारे यहां प्रकट हों, रघु जी हमारे यहां प्रकट हों, हम असंख्य लोगों के लिए गंगा को लाने वाले भगीरथ जी की भूमिका में आ जाएं, तो वशिष्ठ जी से प्रेरणा लेनी पड़ेगी।
दोनों ही पक्षों में कमी आई है। संत लोग वशिष्ठ बनने के लिए प्रयासरत नहीं हैं, गाड़ी लिया, गद्दी पर बैठे, मौज से जीवन जी रहे हैं, उनमें यह इच्छा ही नहीं कि लोग उन्हें तपस्वी कहें, उन्हें तो बस पैसे की जरूरत है।
जैसे अभिनेता प्रदर्शन के लिए धन मांगते हैं, वैसे ही संत लोग भी मांगने लगे हैं। ऐसे लोग भी धर्म मंच पर विराजमान होने लगे हैं, जिनमें कोई तप-त्याग नहीं है। यह भी माना जाने लगा है कि जो जितना ज्यादा नंगा है, वह उतना ही बड़ा संत है, जिसके गले में जनेऊ है, वही ब्राह्मण है, जो बहुत बड़-बड़ करता है, वही बड़ा विद्वान है। जो चुनाव जीत जाए, वही नेता है, ये नई परिभाषाएं हैं।
पहले लोग केवल ज्ञान से बड़े नहीं होते थे, वे कर्म से बड़े होते थे, वे अपने लोगों, मानवता और संसार के लिए जीते थे। जैसे संतों ने केवल अपने लिए काम नहीं किया, सबके लिए काम किया। सभी के लिए जो काम करता है, वही तो ईश्वर है, जो अपने लिए काम करता है, वह मनुष्य है, जो अपने लिए भी नहीं करे, दूसरों के लिए भी नहीं करने दे, वह राक्षस है।
जो अपना संपूर्ण जीवन समाज के लिए दे, साधु का मतलब ही यही है कि वह अपनी संपूर्ण ऊर्जा दूसरों के लिए लगा दे। वह स्वयं भी आनंद के सागर में होता है और दूसरों को भी आनंद सागर में ले जाता है, दूसरों को भी धन्य जीवन के लिए, राष्ट्र जीवन के लिए तैयार करता है। वशिष्ठ जी आचार्य शिरोमणि हैं, जिनसे आचार्य भी सीख सकते हैं। मैं प्रार्थना करता हूं कि आप स्वयं के लोगों को शक्ति दें आशीर्वाद दें, प्रेरणा दें, शक्ति दें, हमें वशिष्ठ जैसे गुरु प्राप्त हों।
अभी तो साधु इसी बात में लगे हैं कि हमारा शिष्य हमें दक्षिणा दे। जजमान कहां डूब रहा है, उससे पुरोहित का कोई लेना-देना नहीं है। संत से सम्बंध को महत्व देना चाहिए, यह सम्बंध भोग के लिए नहीं है, लेकिन आज समाज में लोग संतों से भोग के लिए भी जुडऩे लगे हैं, इससे बुरी बात क्या हो सकती है? संत भी समाज से केवल पैसे के लिए सम्बंध बना रहे हैं, आज के ज्यादातर संतों, पुरोहितों को भी केवल भोग चाहिए। वैदिक सनातन धर्म को वशिष्ठ जी प्राप्त हुए, इसका गौरव है, पूरी दुनिया के इतिहास में वशिष्ठ जैसे गुरु किसी पंथ-संप्रदाय में नहीं हुए हैं। ऐसे पुरोहित गुरु न पहले हुए थे, न आज हैं और न कल होंगे।
हमारे देश को संपूर्ण रघुवंश जैसा होना चाहिए, संपूर्ण दुनिया रघुवंश जैसी हो जाए, रामराज्य की संस्थापना भारत में हो, पूरी दुनिया में हो। रामराज्य केवल भारत का राज्य नहीं था, पूरी दुनिया का राज्य था। रामराज्य में सभी राज्य समाहित थे, उन्हीं नियमों-कायदों से जुड़े हुए थे। आज कलयुग में भी अच्छे प्रयास जारी हैं, हम वशिष्ठ जी जैसा जीवन अपनाकर असंख्य लोगों का उद्धार करें। तभी हम अच्छे जीवन को जी सकेंगे।
जय श्रीराम
कालीदास ने लिखा है - रघुवंशी राजाओं का प्राण योगियों की तरह छूट रहा है, तो इसके लिए तो अभ्यास करना पड़ेगा। संयम, नियम, तप से चलना पड़ेगा। गुरु वशिष्ठ आदर्श हैं संतों के, गुरुत्व के, संतत्व के। जितनी भी आध्यात्मिक ऊंचाइयां हैं, उसके अंतिम सोपान हैं वशिष्ठ जी। उन्होंने रघुवंश को ऊंचाई पर पहुंचाया और स्वयं पीछे रहकर संरक्षण का काम किया। निर्देशक मुख्य होता है, वह हर तरह के सुधार के लिए आग्रह करता है, प्रेरित करता है और ब्राह्मण, ऋषि, गुरु हमेशा पर्दे के पीछे रहता है, शासन के लिए आगे आने की परंपरा नहीं थी। सीधे शासन चलाना ब्राह्मणों का काम नहीं था।
कहने को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू भी ब्राह्मण थे, लेकिन ब्राह्मणत्व के लिए जो प्रयास होने चाहिए थे, जो गुण होने चाहिए थे, वो उनमें नहीं थे, लेकिन यदि ब्राह्मणत्व के जरूरी गुण उस वंश को प्राप्त हुए होते, तो यह वंश और भी ऊंचाई पर होता। उन्होंने शासक के रूप में ऊंचाइयों को प्राप्त नहीं किया जैसा रघुवंशी लोग प्राप्त करते थे। आध्यात्मिक ऊर्जा का लाभ देश को मिले, इसके लिए कोई प्रयास नहीं था।
जैसे अध्यापक बहुत अच्छा मिल जाए, लेकिन विद्यार्थी बहुत प्रयास नहीं करेंगे, पहलवान गुरु मिल जाए, शिष्य प्रयास न करे, तो सफल नहीं हो सकता। वैसे ही कितना बड़ा ही वैज्ञानिक अध्यापक हो जाए और विद्यार्थी प्रयास न करे, तो क्या लाभ होगा, इसलिए गुरु वशिष्ठ को मानक बनाकर चलना होगा। संपूर्ण संसार के लोग देश के लिए उनको प्रेरक स्तंभ बनाकर उनके अनुसार जीवन जीएं, आज भी जो पुराणों में संदर्भ हैं, विश्वास हैं, इस आधार पर हम अपने जीवन को जीएं, तो हमारा वंश ही रघुवंश हो जाएगा। हमारा जीवन ही राम जी के जैसा हो जाएगा। हमारा संपूर्ण प्रयास राम राज्य का संस्थापक प्रयास हो जाएगा। गुरु वशिष्ठ जी कहीं गए नहीं हैं, सप्त ऋषियों के रूप में मान्यता के आधार पर मौजूद हैं, बहुत खिन्न होकर भारत भूमि को देख रहे हैं, जहां रघुवंश आलोकित हो रहा था, वह भूमि कैसी हो गई। हमारे जो विचार हैं, कृतित्व हैं, जो आदर्श थे, जिसके आधार पर लोगों को प्रेरित होना था, जिससे लोग लोक, परलोक दोनों को बनाते, वो कहां गए। वशिष्ठ जी आज भी सप्तऋषि मंडल में विराजमान रहकर प्रेरित करने के लिए तत्पर हैं। कोई भी चाहे कि हमारे जीवन में रामराज्य आए, राम जी हमारे यहां प्रकट हों, रघु जी हमारे यहां प्रकट हों, हम असंख्य लोगों के लिए गंगा को लाने वाले भगीरथ जी की भूमिका में आ जाएं, तो वशिष्ठ जी से प्रेरणा लेनी पड़ेगी।
दोनों ही पक्षों में कमी आई है। संत लोग वशिष्ठ बनने के लिए प्रयासरत नहीं हैं, गाड़ी लिया, गद्दी पर बैठे, मौज से जीवन जी रहे हैं, उनमें यह इच्छा ही नहीं कि लोग उन्हें तपस्वी कहें, उन्हें तो बस पैसे की जरूरत है।
जैसे अभिनेता प्रदर्शन के लिए धन मांगते हैं, वैसे ही संत लोग भी मांगने लगे हैं। ऐसे लोग भी धर्म मंच पर विराजमान होने लगे हैं, जिनमें कोई तप-त्याग नहीं है। यह भी माना जाने लगा है कि जो जितना ज्यादा नंगा है, वह उतना ही बड़ा संत है, जिसके गले में जनेऊ है, वही ब्राह्मण है, जो बहुत बड़-बड़ करता है, वही बड़ा विद्वान है। जो चुनाव जीत जाए, वही नेता है, ये नई परिभाषाएं हैं।
पहले लोग केवल ज्ञान से बड़े नहीं होते थे, वे कर्म से बड़े होते थे, वे अपने लोगों, मानवता और संसार के लिए जीते थे। जैसे संतों ने केवल अपने लिए काम नहीं किया, सबके लिए काम किया। सभी के लिए जो काम करता है, वही तो ईश्वर है, जो अपने लिए काम करता है, वह मनुष्य है, जो अपने लिए भी नहीं करे, दूसरों के लिए भी नहीं करने दे, वह राक्षस है।
जो अपना संपूर्ण जीवन समाज के लिए दे, साधु का मतलब ही यही है कि वह अपनी संपूर्ण ऊर्जा दूसरों के लिए लगा दे। वह स्वयं भी आनंद के सागर में होता है और दूसरों को भी आनंद सागर में ले जाता है, दूसरों को भी धन्य जीवन के लिए, राष्ट्र जीवन के लिए तैयार करता है। वशिष्ठ जी आचार्य शिरोमणि हैं, जिनसे आचार्य भी सीख सकते हैं। मैं प्रार्थना करता हूं कि आप स्वयं के लोगों को शक्ति दें आशीर्वाद दें, प्रेरणा दें, शक्ति दें, हमें वशिष्ठ जैसे गुरु प्राप्त हों।
अभी तो साधु इसी बात में लगे हैं कि हमारा शिष्य हमें दक्षिणा दे। जजमान कहां डूब रहा है, उससे पुरोहित का कोई लेना-देना नहीं है। संत से सम्बंध को महत्व देना चाहिए, यह सम्बंध भोग के लिए नहीं है, लेकिन आज समाज में लोग संतों से भोग के लिए भी जुडऩे लगे हैं, इससे बुरी बात क्या हो सकती है? संत भी समाज से केवल पैसे के लिए सम्बंध बना रहे हैं, आज के ज्यादातर संतों, पुरोहितों को भी केवल भोग चाहिए। वैदिक सनातन धर्म को वशिष्ठ जी प्राप्त हुए, इसका गौरव है, पूरी दुनिया के इतिहास में वशिष्ठ जैसे गुरु किसी पंथ-संप्रदाय में नहीं हुए हैं। ऐसे पुरोहित गुरु न पहले हुए थे, न आज हैं और न कल होंगे।
हमारे देश को संपूर्ण रघुवंश जैसा होना चाहिए, संपूर्ण दुनिया रघुवंश जैसी हो जाए, रामराज्य की संस्थापना भारत में हो, पूरी दुनिया में हो। रामराज्य केवल भारत का राज्य नहीं था, पूरी दुनिया का राज्य था। रामराज्य में सभी राज्य समाहित थे, उन्हीं नियमों-कायदों से जुड़े हुए थे। आज कलयुग में भी अच्छे प्रयास जारी हैं, हम वशिष्ठ जी जैसा जीवन अपनाकर असंख्य लोगों का उद्धार करें। तभी हम अच्छे जीवन को जी सकेंगे।
जय श्रीराम
महर्षि वशिष्ठ : ऐसा साधु न कोय
भाग -६
आज जो संत का सम्मान होना चाहिए, जो सम्मान पुरोहित का होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। समाज में इसमें बहुत अंतर आ गया है। लोग केवल औपचारिक रूप से संतों से जुड़ते हैं, गुरु से जुड़ते हैं, लाभ उठाने की प्रेरणा और उसके लिए समर्पित होना, सेवा भावी होना और उसके लिए निष्ठावान होना चाहिए। संत के लिए, गुरु के लिए, जैसे रघुवंशी लोग थे, आज वैसे लोग नहीं हो रहे हैं। रघुवंशियों के मन में अपने पुरोहित के प्रति कितना विश्वास था।
ताडक़ा, सुबाहू, मारीच इत्यादि राक्षस बहुत तंग कर रहे थे यज्ञ में, जब विश्वामित्र जी यज्ञ रक्षा के लिए राम, लक्ष्मण को लेने आए, तो दशरथ जी ने मना कर दिया, मेरे बच्चे छोटे हैं, राम के बिना एक क्षण नहीं रह सकता। ये क्या लड़ेंगे राक्षसों से, ये तो बहुत छोटे हैं। मैं नहीं दूंगा पुत्र।
गुरु वशिष्ठ जी ने तत्काल कहा, राम जी आपकी गोद में बैठने के लिए आए हैं क्या, पूरे संसार को बनाने वाले संहार करने वाले हैं, इनको आप क्या समझ रहे हैं। अरे, ये तो आए ही हैं इसी काम के लिए कि यज्ञ की रक्षा कैसे हो, वेदों, ब्राह्मणों, साधुओं, संतों, तपस्वियों की सेवा के लिए, समाज के लिए काम करने वालों के लिए, पूरे संसार में अच्छे भाव हों, इसके लिए राम जी आए हैं, केवल आपके आंगन में खेलने के लिए नहीं आए हैं, इसलिए इन्हें जाने दीजिए।
दशरथ जी ने अपनी गलती को समझा और राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया। वरना विश्वामित्र नाराज हो जाते, यज्ञ की रक्षा नहीं होती, शापित कर देते दशरथ जी को, राम जी अगर जाते नहीं हैं, तो चारों भाइयों का विवाह तब नहीं हुआ होता। जो राम जी की महानता है, उनका जो जीवन है, उसका प्रारंभ विश्वामित्र जी के साथ ही हुआ। वशिष्ठ जी केवल केवल ज्ञानी ही नहीं हैं, सफल अध्यापक हैं। कौन-सा ऐसा ज्ञान विज्ञान है, जो वशिष्ठ में नहीं है। जो पढ़ेगा, उन्हें जानेगा, उसका लौकिक और आध्यात्मिक जीवन आलोकित होगा, इसलिए गुरु वशिष्ठ को प्राप्त करने के लिए हमें रघुवंशियों जैसा बनना चाहिए और रघुवंशियों जैसा बनने के लिए हमें गुरु वशिष्ठ को प्राप्त करना चाहिए और गुरु वशिष्ठ जैसा बनने के लिए हमें गुरु वशिष्ठ से प्रेरणा लेनी चाहिए। हमें अपने जीवन को सभी अच्छी क्रियाओं से जोडऩा चाहिए। हमारा जीवन रामराज्य का जीवन होगा, हमारा जीवन रघुवंशियों का जीवन होगा। गुरु वशिष्ठ की प्रेरणा से उनके मार्ग पर चलकर ही रामराज्य आ सकता है।
आज गुरुओं में संयम, नियम, तप की बहुत कमी आ गई है, यह बड़ी चिंता का विषय है। ऐसा नहीं है कि बीज नष्ट हो गया हो, संख्या कम हो गई हो, हां, वोल्टेज कम हो गया है। उतनी शक्ति नहीं रही। एक बड़ी विडंबना है, लोकतंत्र में बहुत कम लोग हैं, जो गुरु वशिष्ठ से सीखकर राज्य का संचालन करते हैं।
एक बड़े विद्वान कह रहे थे कि एक नेता उनके यहां बहुत आया करते थे, जब मुख्यमंत्री हो गए, तब भी शुरू में एक महीना में एक बार मिलने लगे, एक साल बीत गए, तो दो महीने में एक बार मिलने लगे, बाद में छह महीने में एक बार मिलने लगे, पांचवा साल आया, तो एक ही बार मिले, लेकिन जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, तो एक बार भी नहीं मिले। वे राजनीति शास्त्र के विद्वान हैं, वो सुना रहे थे मुझसे जबलपुर में। तो आज की जो राजशाही है, जो राजनेता हैं, बड़े शिक्षाविद् हैं, लौकिक शिक्षा और ऐसे ही विभिन्न क्षेत्रों के जो लोग हैं, उन्होंने चमत्कार का लाभ उठाया और बाद में मान लिया कि यह मेरा ही काम है।
ऐसे लोग अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन नहीं लाते हैं। आध्यात्मिक ऊर्जा या किसी ढंग के संत, पुरोहित से अपने को नहीं जोड़ते हैं। वे सोचते हैं कि जो मैं कर रहा हूं, मैं वहीं करूंगा, केवल हमें लाभ मिलना चाहिए। अभी क्षत्रियों में कम लोग हैं, जो संध्या वंदन करते होंगे, लेकिन वेदों में लिखा गया है कि ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों को जनेऊ पहनना चाहिए। वैश्य लोग सर्वथा दूर हो गए, वे संतों की सन्निधि में कम रहते हैं, बस कुछ देर के लिए मिले, आशीर्वाद लिया, चिंता है कि हमारा धन बढ़े, हम समृद्ध हों, लेकिन हमारा परलोक भी ठीक हो जाए, हमारी संतति भी शुद्ध हो, ऐसी कोई चिंता नहीं है।
ऐसा आज के समाज में हो रहा है। संतों, ब्राह्मणों, विद्वानों से आशीर्वाद का संपर्क है, वास्तविक लाभ उठाना नहीं चाहते। उनके विचारों के अनुसार अपने जीवन क्रम को बनाना नहीं चाहते। केवल गुरु वशिष्ठ आशीर्वाद दे दें, काम तो आज के लोग अपनी मनमर्जी से ही करेंगे।
राम जी सबकुछ जानते हैं। तुलसीदास जी ने लिखा है...
गुरुगृँह गए पढऩ रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई।
वशिष्ठ जी वेद-पुराण सुनाते हैं, राम जी अत्यंत आदर के साथ सुनते हैं, जैसे कुछ जानते ही नहीं हों। उन्हें सब मालूम है। परमात्मा हैं, तो कौन-सा ज्ञान होगा, जो उनमें नहीं होगा, लेकिन इसके बाद भी वे अपने गुरु की पूरी बात सुनते हैं। समाज का भी बड़ा दूषण है, जो लाभ उठाना चाहिए पुरोहित से, ब्राह्मण से, संत से, गुरु से, वह नहीं उठाया जा रहा है। लोग अपने जीवन की गतिविधियों को नहीं सुधार रहे हैं, केवल गुरु महाराज का आशीर्वाद मिले, मैं खूब कमाऊं, खूब भोग करूं, थोड़े रुपए इनको भी दे दूं, बस इतना ही सम्बंध रह गया है। इसलिए समाज में जितना लाभ होना चाहिए लोगों को, उतना नहीं हो रहा है।
आज गायत्री जपने में बड़ी क्षमता है। कहा जाता है ब्राह्मणों ने जो ज्ञान अर्जित किया, वह गायत्री की महिमा से किया, व्रत, तप की महिमा से पूरे संसार में झंडा फहरा दिया। तो आज बड़ी दोष की अवस्था है, लोग ज्ञान से लाभ नहीं लेना चाहते हैं, केवल चमत्कार का लाभ चाहते हैं। रघुवंशी लोग केवल आशीर्वाद का चमत्कार नहीं चाहते थे।
क्रमश:
आज जो संत का सम्मान होना चाहिए, जो सम्मान पुरोहित का होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। समाज में इसमें बहुत अंतर आ गया है। लोग केवल औपचारिक रूप से संतों से जुड़ते हैं, गुरु से जुड़ते हैं, लाभ उठाने की प्रेरणा और उसके लिए समर्पित होना, सेवा भावी होना और उसके लिए निष्ठावान होना चाहिए। संत के लिए, गुरु के लिए, जैसे रघुवंशी लोग थे, आज वैसे लोग नहीं हो रहे हैं। रघुवंशियों के मन में अपने पुरोहित के प्रति कितना विश्वास था।
ताडक़ा, सुबाहू, मारीच इत्यादि राक्षस बहुत तंग कर रहे थे यज्ञ में, जब विश्वामित्र जी यज्ञ रक्षा के लिए राम, लक्ष्मण को लेने आए, तो दशरथ जी ने मना कर दिया, मेरे बच्चे छोटे हैं, राम के बिना एक क्षण नहीं रह सकता। ये क्या लड़ेंगे राक्षसों से, ये तो बहुत छोटे हैं। मैं नहीं दूंगा पुत्र।
गुरु वशिष्ठ जी ने तत्काल कहा, राम जी आपकी गोद में बैठने के लिए आए हैं क्या, पूरे संसार को बनाने वाले संहार करने वाले हैं, इनको आप क्या समझ रहे हैं। अरे, ये तो आए ही हैं इसी काम के लिए कि यज्ञ की रक्षा कैसे हो, वेदों, ब्राह्मणों, साधुओं, संतों, तपस्वियों की सेवा के लिए, समाज के लिए काम करने वालों के लिए, पूरे संसार में अच्छे भाव हों, इसके लिए राम जी आए हैं, केवल आपके आंगन में खेलने के लिए नहीं आए हैं, इसलिए इन्हें जाने दीजिए।
दशरथ जी ने अपनी गलती को समझा और राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया। वरना विश्वामित्र नाराज हो जाते, यज्ञ की रक्षा नहीं होती, शापित कर देते दशरथ जी को, राम जी अगर जाते नहीं हैं, तो चारों भाइयों का विवाह तब नहीं हुआ होता। जो राम जी की महानता है, उनका जो जीवन है, उसका प्रारंभ विश्वामित्र जी के साथ ही हुआ। वशिष्ठ जी केवल केवल ज्ञानी ही नहीं हैं, सफल अध्यापक हैं। कौन-सा ऐसा ज्ञान विज्ञान है, जो वशिष्ठ में नहीं है। जो पढ़ेगा, उन्हें जानेगा, उसका लौकिक और आध्यात्मिक जीवन आलोकित होगा, इसलिए गुरु वशिष्ठ को प्राप्त करने के लिए हमें रघुवंशियों जैसा बनना चाहिए और रघुवंशियों जैसा बनने के लिए हमें गुरु वशिष्ठ को प्राप्त करना चाहिए और गुरु वशिष्ठ जैसा बनने के लिए हमें गुरु वशिष्ठ से प्रेरणा लेनी चाहिए। हमें अपने जीवन को सभी अच्छी क्रियाओं से जोडऩा चाहिए। हमारा जीवन रामराज्य का जीवन होगा, हमारा जीवन रघुवंशियों का जीवन होगा। गुरु वशिष्ठ की प्रेरणा से उनके मार्ग पर चलकर ही रामराज्य आ सकता है।
आज गुरुओं में संयम, नियम, तप की बहुत कमी आ गई है, यह बड़ी चिंता का विषय है। ऐसा नहीं है कि बीज नष्ट हो गया हो, संख्या कम हो गई हो, हां, वोल्टेज कम हो गया है। उतनी शक्ति नहीं रही। एक बड़ी विडंबना है, लोकतंत्र में बहुत कम लोग हैं, जो गुरु वशिष्ठ से सीखकर राज्य का संचालन करते हैं।
एक बड़े विद्वान कह रहे थे कि एक नेता उनके यहां बहुत आया करते थे, जब मुख्यमंत्री हो गए, तब भी शुरू में एक महीना में एक बार मिलने लगे, एक साल बीत गए, तो दो महीने में एक बार मिलने लगे, बाद में छह महीने में एक बार मिलने लगे, पांचवा साल आया, तो एक ही बार मिले, लेकिन जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, तो एक बार भी नहीं मिले। वे राजनीति शास्त्र के विद्वान हैं, वो सुना रहे थे मुझसे जबलपुर में। तो आज की जो राजशाही है, जो राजनेता हैं, बड़े शिक्षाविद् हैं, लौकिक शिक्षा और ऐसे ही विभिन्न क्षेत्रों के जो लोग हैं, उन्होंने चमत्कार का लाभ उठाया और बाद में मान लिया कि यह मेरा ही काम है।
ऐसे लोग अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन नहीं लाते हैं। आध्यात्मिक ऊर्जा या किसी ढंग के संत, पुरोहित से अपने को नहीं जोड़ते हैं। वे सोचते हैं कि जो मैं कर रहा हूं, मैं वहीं करूंगा, केवल हमें लाभ मिलना चाहिए। अभी क्षत्रियों में कम लोग हैं, जो संध्या वंदन करते होंगे, लेकिन वेदों में लिखा गया है कि ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों को जनेऊ पहनना चाहिए। वैश्य लोग सर्वथा दूर हो गए, वे संतों की सन्निधि में कम रहते हैं, बस कुछ देर के लिए मिले, आशीर्वाद लिया, चिंता है कि हमारा धन बढ़े, हम समृद्ध हों, लेकिन हमारा परलोक भी ठीक हो जाए, हमारी संतति भी शुद्ध हो, ऐसी कोई चिंता नहीं है।
ऐसा आज के समाज में हो रहा है। संतों, ब्राह्मणों, विद्वानों से आशीर्वाद का संपर्क है, वास्तविक लाभ उठाना नहीं चाहते। उनके विचारों के अनुसार अपने जीवन क्रम को बनाना नहीं चाहते। केवल गुरु वशिष्ठ आशीर्वाद दे दें, काम तो आज के लोग अपनी मनमर्जी से ही करेंगे।
राम जी सबकुछ जानते हैं। तुलसीदास जी ने लिखा है...
गुरुगृँह गए पढऩ रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई।
वशिष्ठ जी वेद-पुराण सुनाते हैं, राम जी अत्यंत आदर के साथ सुनते हैं, जैसे कुछ जानते ही नहीं हों। उन्हें सब मालूम है। परमात्मा हैं, तो कौन-सा ज्ञान होगा, जो उनमें नहीं होगा, लेकिन इसके बाद भी वे अपने गुरु की पूरी बात सुनते हैं। समाज का भी बड़ा दूषण है, जो लाभ उठाना चाहिए पुरोहित से, ब्राह्मण से, संत से, गुरु से, वह नहीं उठाया जा रहा है। लोग अपने जीवन की गतिविधियों को नहीं सुधार रहे हैं, केवल गुरु महाराज का आशीर्वाद मिले, मैं खूब कमाऊं, खूब भोग करूं, थोड़े रुपए इनको भी दे दूं, बस इतना ही सम्बंध रह गया है। इसलिए समाज में जितना लाभ होना चाहिए लोगों को, उतना नहीं हो रहा है।
आज गायत्री जपने में बड़ी क्षमता है। कहा जाता है ब्राह्मणों ने जो ज्ञान अर्जित किया, वह गायत्री की महिमा से किया, व्रत, तप की महिमा से पूरे संसार में झंडा फहरा दिया। तो आज बड़ी दोष की अवस्था है, लोग ज्ञान से लाभ नहीं लेना चाहते हैं, केवल चमत्कार का लाभ चाहते हैं। रघुवंशी लोग केवल आशीर्वाद का चमत्कार नहीं चाहते थे।
क्रमश:
महर्षि वशिष्ठ : ऐसा साधु न कोय
भाग -५
जैसे सूर्य का प्रकाश बहुत काम करता है, लेकिन ब्रह्मर्षि नहीं बना सकता, वह संसार की सभी वस्तुओं को बनाता है, लेकिन क्या वह कोई ब्रह्म ज्ञानी पैदा करेगा, क्या कोई रघुवंश को पैदा करेगा? रघुवंशी सूर्यवंशी ही हैं, लेकिन रघुवंशियों को जो ज्ञान हुआ, वह वशिष्ठ जी के कारण ही हुआ।
आज सभी गुरुओं को गुरु वशिष्ठ से प्रेरणा लेनी चाहिए, वह नहीं हो रहा है। गुरु वशिष्ठ होने के लिए बड़े त्याग ज्ञान की जरूरत है। रोग रहित रहने की कामना, तमाम तरह की जीवन की कमियों से दूर रहने की कामना। राजा का पद तो तुच्छ है, जिस अवस्था में पुरोहित रहता है, अपने जजमान के यहां, वहां राजा नतमस्तक होता है, जिसके चरणों की धूल के लिए तरसता रहता है। उसके आशीर्वाद से ही वह राजा है, वैभवशाली है, उसका ज्ञान बढ़ रहा है, उसके वंश की वृद्धि हो रही है। आज के संतों को गुरु़ वशिष्ठ से प्रेरणा लेनी चाहिए, तभी उनके जजमान का वंश रघुवंश के समान होगा, वहां राम जी प्रगट होंगे और रामराज्य की स्थापना होगी।
राम जी के जंगल जाने के बाद भी रघुवंश चला, भरत के दौर में भी रघुवंश आगे बढ़ा। अध्यात्म रामायण में लिखा है भरत जी अनशन करने लगे कि राम जी साथ चलेंगे, तभी अनशन तोडूंगा, नहीं तो शरीर छोड़ दूंगा।
गुरु वशिष्ठ ने कहा कि तुम क्या बालकपन कर रहे हो, एक बार आंख घुमाया, तो भरत जी आकर चरणों में बैठ गए। यदि भरत जी शरीर छोड़ देते, तो राम जी बहुत मुश्किल में पड़ जाते, जंगल से लौटना भी नहीं था, पिता जी ने जो वरदान दिया था, वह यदि नहीं पूरा होता, तो पाप लगता, वे जो स्वर्ग में गए थे नीचे उतर आते। राम जी बार-बार दोहराते हैं, पिता की कीर्ति अनुकरणीय है, अनुपम है, उसके लिए हम लोगों को प्रयास करना चाहिए, उन्होंने माता जी को वरदान दिया था, यदि वह वरदान पूरा नहीं करते हैं, तो निश्चित रूप से कीर्ति नष्ट होगी। हम लोग पुत्र होकर क्या करेंगे, हमारा पुत्रत्व तब नष्ट हो जाएगा, जब पिता स्वर्ग से नीचे आ जाएंगे। तो इन सभी क्रमों, स्थानों व्यवस्थाओं में गुरु वशिष्ठ की अहम भूमिका है और गुरु वशिष्ठ कहीं से भी लालची नहीं हैं, क्रोधी नहीं हैं, संपूर्ण ज्ञानी हैं। वे केवल ज्ञानी ही नहीं हैं, ज्ञान उनके रोम-रोम में उतरा हुआ है। संसार में तमाम व्यावहारिक कर्म के वे ज्ञाता हैं, नियामक हैं, प्रेरक हैं, आज के गुरुओं को निस्संदेह प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम भी गुरु वशिष्ठ के जैसे बनें। हमारा ज्ञान ऐसा बढ़े कि हम ईश्वर के सदृश हो जाएं, हमारा नियम, संयम, प्रतिष्ठा, हमारी समाधि, हमारा द्वंद्व, काम करने का गुण ऊंचाई को प्राप्त हो, हम अपने कमाए हुए धन से अपना भी भला करें, अपने जजमान का भी भला करें, राज्य का भी भला करें। हमारा इतना वोल्टेज हो या इतनी ऊर्जा हो तप, ज्ञान, विज्ञान की कि उससे संपूर्ण संसार लाभान्वित हो। संपूर्ण संसार पे्ररित हो। इसके लिए हमें गुरु वशिष्ठ से प्रेरणा लेकर और गुरु वशिष्ठ के समान बनकर लोगों को लाभान्वित करना चाहिए। यह संतत्व की पराकाष्ठा है। यदि किसी को संत में निष्ठा नहीं हो रही है, तो उसे वशिष्ठ जी को ही संत में रूप में देखते हुए प्रेरणा लेनी चाहिए।
क्रमश:
जैसे सूर्य का प्रकाश बहुत काम करता है, लेकिन ब्रह्मर्षि नहीं बना सकता, वह संसार की सभी वस्तुओं को बनाता है, लेकिन क्या वह कोई ब्रह्म ज्ञानी पैदा करेगा, क्या कोई रघुवंश को पैदा करेगा? रघुवंशी सूर्यवंशी ही हैं, लेकिन रघुवंशियों को जो ज्ञान हुआ, वह वशिष्ठ जी के कारण ही हुआ।
आज सभी गुरुओं को गुरु वशिष्ठ से प्रेरणा लेनी चाहिए, वह नहीं हो रहा है। गुरु वशिष्ठ होने के लिए बड़े त्याग ज्ञान की जरूरत है। रोग रहित रहने की कामना, तमाम तरह की जीवन की कमियों से दूर रहने की कामना। राजा का पद तो तुच्छ है, जिस अवस्था में पुरोहित रहता है, अपने जजमान के यहां, वहां राजा नतमस्तक होता है, जिसके चरणों की धूल के लिए तरसता रहता है। उसके आशीर्वाद से ही वह राजा है, वैभवशाली है, उसका ज्ञान बढ़ रहा है, उसके वंश की वृद्धि हो रही है। आज के संतों को गुरु़ वशिष्ठ से प्रेरणा लेनी चाहिए, तभी उनके जजमान का वंश रघुवंश के समान होगा, वहां राम जी प्रगट होंगे और रामराज्य की स्थापना होगी।
राम जी के जंगल जाने के बाद भी रघुवंश चला, भरत के दौर में भी रघुवंश आगे बढ़ा। अध्यात्म रामायण में लिखा है भरत जी अनशन करने लगे कि राम जी साथ चलेंगे, तभी अनशन तोडूंगा, नहीं तो शरीर छोड़ दूंगा।
गुरु वशिष्ठ ने कहा कि तुम क्या बालकपन कर रहे हो, एक बार आंख घुमाया, तो भरत जी आकर चरणों में बैठ गए। यदि भरत जी शरीर छोड़ देते, तो राम जी बहुत मुश्किल में पड़ जाते, जंगल से लौटना भी नहीं था, पिता जी ने जो वरदान दिया था, वह यदि नहीं पूरा होता, तो पाप लगता, वे जो स्वर्ग में गए थे नीचे उतर आते। राम जी बार-बार दोहराते हैं, पिता की कीर्ति अनुकरणीय है, अनुपम है, उसके लिए हम लोगों को प्रयास करना चाहिए, उन्होंने माता जी को वरदान दिया था, यदि वह वरदान पूरा नहीं करते हैं, तो निश्चित रूप से कीर्ति नष्ट होगी। हम लोग पुत्र होकर क्या करेंगे, हमारा पुत्रत्व तब नष्ट हो जाएगा, जब पिता स्वर्ग से नीचे आ जाएंगे। तो इन सभी क्रमों, स्थानों व्यवस्थाओं में गुरु वशिष्ठ की अहम भूमिका है और गुरु वशिष्ठ कहीं से भी लालची नहीं हैं, क्रोधी नहीं हैं, संपूर्ण ज्ञानी हैं। वे केवल ज्ञानी ही नहीं हैं, ज्ञान उनके रोम-रोम में उतरा हुआ है। संसार में तमाम व्यावहारिक कर्म के वे ज्ञाता हैं, नियामक हैं, प्रेरक हैं, आज के गुरुओं को निस्संदेह प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम भी गुरु वशिष्ठ के जैसे बनें। हमारा ज्ञान ऐसा बढ़े कि हम ईश्वर के सदृश हो जाएं, हमारा नियम, संयम, प्रतिष्ठा, हमारी समाधि, हमारा द्वंद्व, काम करने का गुण ऊंचाई को प्राप्त हो, हम अपने कमाए हुए धन से अपना भी भला करें, अपने जजमान का भी भला करें, राज्य का भी भला करें। हमारा इतना वोल्टेज हो या इतनी ऊर्जा हो तप, ज्ञान, विज्ञान की कि उससे संपूर्ण संसार लाभान्वित हो। संपूर्ण संसार पे्ररित हो। इसके लिए हमें गुरु वशिष्ठ से प्रेरणा लेकर और गुरु वशिष्ठ के समान बनकर लोगों को लाभान्वित करना चाहिए। यह संतत्व की पराकाष्ठा है। यदि किसी को संत में निष्ठा नहीं हो रही है, तो उसे वशिष्ठ जी को ही संत में रूप में देखते हुए प्रेरणा लेनी चाहिए।
क्रमश:
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