Monday, 3 June 2019

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

समापन भाग
अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के लिए जो शास्त्रीय क्रियाएं हैं, इनको मनमानी ढंग से जीने के कारण ही दुनिया में राक्षसी भाव बढ़ रहा है। सुख बहुत कम होता जा रहा है। रिश्ते टूट रहे हैं, सुंदरता कम हो रही है। संसार का जो आकर्षण था, वह कम हो रहा है। घुटन हो रही है। बड़ी विडंबना है, इसलिए प्रह्लाद जी के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए। 
ज्ञान किसके लिए - यह कैसा ज्ञान कि बम बना दिया, लाखों लोगों को मार दिया। यह कौन-सा ज्ञान कि हर आदमी से हम ईष्र्या ही कर रहे हैं। यह कौन-सा ज्ञान कि हमारी सारी शक्ति अपने को सजाने में ही लग गई। क्या हम जीवन भर रजिस्टर ही लिखेंगे? हम जीवन भर लोहा पर लोहा ही ठोंकेंगे?  
एक बार सूरत में किसी से पूछा कि एक आभूषण बनाने वाले को क्या देते हो। उत्तर मिला कि सौ रुपया, डेढ़ सौ रुपया एक दिन में देते हैं। वहां सौ से ज्यादा कारीगर थे। बतलाइए। ये सारा जीवन लग गया आभूषण बनाने में तो कुछ नहीं हुआ। यदि सही दिशा होती, तो ईश्वर का आभूषण बन जाता। वरदान हो जाता। इसीलिए हम अपने कर्म का इस रूप से उपयोग करें, भूलें नहीं। बंगला बना लेंगे, तो बच नहीं जाएंगे। कुछ भी कीजिएगा, मरने से नहीं बचिएगा। दुख से नहीं बचिएगा। छप्पन भोग भी खाइएगा, तो दुख और मरने से नहीं बचिएगा। बड़ा परिवार, बड़ी गाड़ी से जुडक़र नहीं, सुख सागर से जुडक़र हम आनंद पाएं। उसके लिए कर्म करें। जैसे प्रह्लाद जी ने किया। वे ईश्वर सेवा के मार्ग में कभी किसी से नहीं डरे। 
भगवान की दया से मैं भी नहीं डरता था। अपने गुरुजी के सामने भी अवसर देखकर सही बात बोल देता था। मेरे गुरुदेव जमींदार परिवार के थे। जब उन्हें अवसर मिले, तो जमींदारी की कथा सुनाते रहते थे, मैं चरण दबाता रहता था। कुछ महीने जब हो गए। एक बार मैंने गुरुजी से बड़े संतों के नाम लेकर पूछता गया कि वो संत कैसे परिवार के थे। मैं संतों के नाम लेकर पूछता गया, गुरुजी बताते गए कि ये भी गरीब परिवार के थे। 
फिर मैंने पूछा, आपके गुरुजी की क्या स्थिति थी?
मेरे गुरुदेव ने कहा, उनके पास भी ज्यादा संसाधन नहीं थे।
तब मैंने कहा, इसका मतलब गरीब का बच्चा भी संत हो सकता है। जरूरी नहीं कि बड़े जमींदार का ही हो। यदि ऐसा हो कि गरीब का नहीं हो सकता है, तो मैं तो जमींदार परिवार में नहीं जन्मा, तो मैं चला जाऊं क्या? 
गुरुजी को लग गया कि अरे यह तो मुझे ही कह रहा है, तो उन्होंने कहा कि शिष्य ऐसी बात बोलता है क्या?
मैंने पूछा, यह कहां लिखा है कि गुरु रोज अपनी जमींदारी की बात करें। 
मैंने कह दिया, कहिए तो मैं चलता हूं झोला उठाए। किसी और दरवाजे को खटखटाता हूं, जिस दरवाजे पर लिखा हो कि नहीं सामान्य परिवार का बच्चा भी संत हो सकता है, ऋषि हो सकता है, ज्ञानी हो सकता है, धन्य जीवन का हो सकता है। प्रह्लाद जी की तरह ही मैंने बिना भय के अपना विचार प्रस्तावित किया। गुरुजी के गांव में कई हजार एकड़ जमीन थी, जहां वो जन्मे थे। तो मैंने कह दिया। जब नहीं कहेगा आदमी, तो कैसे चलेगा। 
प्रह्लाद जी लड़ गए कि आपको जो करना है, करो, किन्तु मैं अपना महापथ नहीं छोड़ूंगा। ध्यान रहे सभी श्रेष्ठ जो अवदान हैं, वो शास्त्रों से, ऋषियों से ही हमें प्राप्त हुए हैं। तभी हमारा जीवन धन्य हो जाएगा। जीवन की सारी कठिनाइयां दूर हो जाएंगी। 
जय सियाराम

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - ८
सभी लोगों को भगवान उज्ज्वल अनुपम प्रेरणा दे रहे हैं। कहीं कोई पिता है, यदि वह गलत बोलता है, तो वो नहीं है पिता। अगर गलत बोलता है, तो वह नहीं है पुत्र। पिता डकैती करने के लिए कहेगा, तो करेंगे क्या? गलत भावना का समर्थन भी नहीं करना चाहिए। भयभीत नहीं होना चाहिए। ईश्वर रक्षक हैं। 
मेरे जीवन में भी व्यवधान आए। मेरे पिता गुरुजी बड़े विद्वान थे। बड़े गुरु के शिष्य थे, लेकिन आश्रम की सेवा को चंदा लाना, कमरा बनाना, यही सबको बहुत महत्व देते थे। मांग-मांग कर लाना। व्यसनी नहीं थे, चरित्रवान थे, वंश बड़ा था, पढ़े भी थे, किन्तु वे हमें भी बोलते थे, आपको ऐसे ही करना है। उसका हमने थोड़ा भी पालन नहीं किया। मैं कहता हूं- भक्त हमें जो धन देते हैं, उसका हम पूर्ण सदुपयोग करते हैं राम भाव के प्रचार-प्रसार में। 
सभी लोगों को अपनी शक्ति का उपयोग प्रह्लाद जी की रीति से करना चाहिए। वो चंद्रमा हैं, जिसका सबको लाभ उठाना चाहिए। वे कभी मरने वाले नहीं हैं, उनका महापथ कभी मरने वाला नहीं है। यह पथ प्रह्लाद जी का ही नहीं है, यह पथ वेदों का है, स्मृतियों, पुराणों का है। परमार्थ का जीवन केवल कीर्तन करने के लिए नहीं है। केवल मंच पर कहे और फिर लग गए मांगने कि आप कितनी दक्षिणा देंगे। आज के संत जब किसी मंच पर कथा करने आते हैं, तो पहले ही अनुबंध कर लेते हैं। 
सुदामा जी जब गए भगवान के यहां, कई कथाकार कहते हैं कि सुदामा जी से बड़ा कोई दरिद्र ही नहीं हुआ। ऐसे कथाकारों से बड़ा दरिद्र कोई नहीं है। बोलते हैं कि लाइए चावल जैसे सुदामा जी लाए थे और मेरा बोरा भर दीजिए। दक्षिणा के लिए रूठ जाते हैं। 
एक बार एक जगह भागवत सप्ताह का उद्घाटन करने मैं गया था। वहां एक कथाकार ने कहा कि साढ़े तीन सौ कथाएं मैंने की, किन्तु इतना फिसड्डी पंडाल कहीं नहीं लगा, सूर्य की रोशनी तक नहीं रुक रही है। मंच विमान जैसा बनवाया था। मैंने कहा, वाह, जिस भगवान ने नंगे पांव गायों के पीछे चलकर अपने मित्रों के साथ सेवा का परम आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया, उसी भगवान की कथा कहने वाला कथाकार पंडाल में आती धूप पर ही प्रवचन करने लग गया। यह भी बतला दिया कि अब तक कितनी कथाएं कर चुका हूं। 
मैंने मैल छुड़ा दिया उद्घाटन भाषण में। यह कोई बात नहीं, मुझे २९ साल हो गए रामानंदाचार्य हुए, कभी भी किसी को नहीं कहा कि आपका मंच कैसा है, पंडाल कैसा है, दक्षिणा कैसी है, आपका भोजन कैसा है। 
प्रह्लाद जी का अनुकरण करना है। सारी यातनाओं को झेलकर प्रह्लाद जी वैसे ही हो गए जैसे चंद्रमा और सूर्य हैं, जैसे वायु हैं। जिनका कोई जोड़ नहीं है। एक से एक लोग हुए सनातन धर्म में जिन्होंने परम पुरुषार्थ की प्राप्ति के व्यवहार को बतलाया। केवल रोटी और भोग के लिए हमें व्यवहार नहीं करना है, हमें केवल धर्म के लिए व्यवहार नहीं करना है। 
सबसे उत्तम मोक्षीय व्यवहार ही होता है, इसी के लिए मानव जीवन है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए जो व्यवहार है, उसका सभी को लाभ लेना चाहिए। हमें सुधार करना होगा। एक ही बार में कोई चाहे कि मैं चौथे पायदान पर पहुंच जाऊं, तो उसके पैर ही टूटेंगे। ऊंचाई पर पहुंचने के लिए आवश्यक है कि पहला पायदान, दूसरा पायदान, तीसरा पायदान आवश्यक है। धीरे-धीरे बढ़ें। 
पहला पायदान - हम अर्थ को शुद्ध करें, अर्थीय व्यवहार सुधारें, अर्थ पाने के व्यवहार को शास्त्रीय बनाएं। उसके आधार पर धन अर्जित करें। 
दूसरा पायदान - हम भोग की प्राप्ति के अनुरूप व्यवहार को शुद्ध करें। 
तीसरा पायदान - हम अपने धर्म के संपादन की जो क्रियाएं हैं, जिन्हें हम व्यवहार कहेंगे, उनको भी शुद्ध करें। दान भी व्यवहार का बड़ा स्वरूप है। आज दान ही देने नहीं आ रहा है लोगों को। आयकर चुराकर दान दे रहे हैं। लूटपाट करके दान दे रहे हैं। दान के पात्र, स्थान, काल का ध्यान नहीं है। आज लोग दान दे रहे हैं कि इससे हमारा उपकार होगा, इससे हमारा धन लौटेगा। जैसे उद्योगपति लोग नेताओं को देते हैं कि नेता जी सत्ता में आएंगे, तो लाभ देंगे। यहां केवल लोगों में लेने की भावना है कि क्या लौटेगा, हमारा कैसे उपकार होगा। दान में बिल्कुल दिखावा नहीं, वर्णन नहीं करते हुए दान करना है। अभी जो राष्ट्राध्यक्ष लोग हैं, जो राजनीति से, समाजसेवा से जुड़े हैं लोग, जो नकली संत, सब यह बताने में जुटे हैं कि मैंने यह किया, मैंने वह किया। भक्त ऐसा नहीं करते। भक्त कहता है ठाकुर जी ने किया, हमने क्या किया। हममें कहां क्षमता है कि हम समुद्र पार कर जाएं, लंका जला दें। हनुमान जी ने कहा कि ये सब तो हमारे राम जी ने किया। सैनिक कभी नहीं बोलता कि मैं विजयी हो गया, वह देश प्रेम और लोगों को श्रेय देता है। 
क्रमश:

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - ७
क्या कहा प्रह्लाद जी ने सुनिए। कहा कि प्रभु, हमें आपसे कुछ नहीं चाहिए। भगवान ने कहा कि मांगों बहुत खुश हूं। प्रह्लाद जी ने कहा, मैंने वणिक भक्ति नहीं की है। बनिया वाली भक्ति नहीं की, सामान देना और उसके बदले में पैसा लेना। एक हाथ से लो, एक हाथ से दो। हमने आपकी सेवा की, समर्पित हुआ, भजन किया, स्मरण किया, जो भी नवधा भक्ति के स्वरूप हैं, किन्तु ये सब हमारे किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए नहीं हैं। इसके लिए हमें कोई ‘रिटर्निंग गिफ्ट’ नहीं चाहिए। यह सब हमने आपकी सेवा के लिए किया। इसका कोई सकाम उद्देश्य नहीं था। जो किया, निष्काम भाव से किया। हमारे पास जो भी आपका दिया था, वो आपको दिया, कुछ लेने के लिए नहीं दिया। 
भक्त अपने स्वामी के लिए सर्वस्व अर्पित करता है, उसकी खुशहाली के लिए उसके बदले में कभी नहीं कहता कि हमें भी आप कुछ दीजिए। यही भक्ति का सबसे बड़ा सिद्धांत है - तत्सुखे सुखम्
उसके सुख में सुखी रहना। अपने सुख की परवाह नहीं करना। ऐसी गोपियां हुईं, तुलसीदास जी हुए, अनेक संत हुए, जिन्होंने कभी नहीं कहा कि हमें कुछ चाहिए। हमने वणिक भक्ति नहीं की। 
तो प्रह्लाद जी के बहुत मना करने बावजूद नरसिंह भगवान ने जोर देकर कहा कि मांगो, कुछ मांगो। 
तब प्रह्लाद जी ने कहा, ऐसी कृपा करें भगवान कि मेरी इच्छा ही जल जाए। जिस बीज को हम दग्ध भाव कर देते हैं, मतलब सिंकाई हो गई, तो उसमें से अंकुर नहीं निकलते हैं। आशीर्वाद दीजिए कि मेरे मन में कोई इच्छा ही नहीं हो। सारी इच्छाएं जल जाएं। अब क्या इच्छा, जब आप मिल गए। जब मेरा मन आपका हो गया, हमारी इन्द्रियां आपकी हो गईं, अब क्या? इच्छा दुखदायक है, नहीं चाहिए कुछ भी। 
यहां तक कह दिया प्रह्लाद जी ने, कोई जब संपूर्ण इच्छाओं को छोड़ता है, तो देवता हो जाता है। प्रयास करना चाहिए कि कम से कम इच्छाएं हों। जैसे गृहिणी कम इच्छा करे, सास-ससुर की सेवा करे, परिवार की सेवा करे, कोई इच्छा न करे कि यहां ले चलो, वहां ले चलो, ये चाहिए, वो चाहिए। इच्छाएं सब खत्म होंगी, तो वह देवी बन जाएगी। 
प्रह्लाद जी ने कहा - ईश्वर को समर्पित होकर इच्छाओं से हीन होकर भगवान के सदृश हो जाता है जीव। आज भी प्रह्लाद जी का जोड़ नहीं है। अभावग्रस्त परिवेश वाले कोल, भील का कोई जोड़ नहीं मिल रहा है, गोपियां तो उनसे श्रेष्ठ स्थिति में हैं, आलवार संतों का कोई जोड़ नहीं मिल रहा है। अनेक महात्मा, ऋषि, संत इस देश में हुए, जिन्होंने बिना स्वार्थ संसार की सेवा की। आवश्यकता है प्रह्लाद जी से सीखने की, उनसे प्रेरणा लेने की। प्रह्लाद जी ने बहुत कहने के बाद भी कुछ भी नहीं मांगा। कह दिया, नहीं चाहिए। 
मैं पहले भी कह चुका हूं, जो भगवान की सभी दृष्टि से सेवा करेगा, जो ऐसी भक्ति करेगा, उसे लोक और परलोक, दोनों मिलेंगे। उसका कोई अभाव शेष नहीं रहेगा। दुनिया का कोई ऐसा सोपान नहीं, कोई ऐसा गंतव्य नहीं, इसलिए नहीं चाहने पर भी प्रह्लाद जी को भगवान ने राजा बना दिया। किसी को बड़ा फल देना हो, तो पात्र को ही देगा, अपनों को ही देगा, प्रिय को ही देगा। जो मूर्ख है, वह अक्षम बेटे को, पापी बेटे को भी दे देता है। यहां तो ईश्वर को दिया ईश्वर ने। 
ऐसे ही संसार के लोगों को धैर्य के साथ सभी कामों में लगे रहना चाहिए। मैंने भी जीवन में अभाव में ही शुरुआत की, किन्तु मुझे भगवान ने सब दिया, रोटी कपड़ा, मान, स्नेह, आत्मीयता, किन्तु मैं हमेशा ध्यान रखता हूं कि मेरा जो ईश्वरीय समर्पण है, वह कभी नीचे नहीं हो जाए। संपूर्ण वरीयता रहनी चाहिए। जो मिला हुआ प्रसाद है भक्ति, ज्ञान, उनका प्रयोग बना रहे। 
क्रमश:

Tuesday, 7 May 2019

Why does sadness happen ?

Jagadguru Ramanandacharya Swami Shriramnareshacharya ji  


Why is so much suffering in the world? One day I was going to a village in Bihar. People of different nature, different ages, shapes and stages were there. Those people had spread a variety of discussions, but there was no solution for those discussions. Someone was asking why people are not accepting the parents, They were talking about corruption also. There were one or another curiosity in every man's mind, but solution was not being done by that group of people. From seeing, It seemed that people are curious, there is a desire to know. It is written in the scriptures that curiosity occurs only when there is a doubt and when its meaning is proved. There is nobody in the world without curiosity. Everyone has some meaning and doubts too. So the discussion was going on, why people are getting corrupt, why limitations are being lost. The people asked me to say something on this. I said that you are discussing well, but this discussion should have a solution somewhere, it is not happening.
I said, look, I am trying to convince you from a business example. Everyone in the business has to get help from someone else. Not all people do big business with their own capital or money. There is a large percentage of people, who start a business with a loan from the bank or others. Some people start a business by taking loans from friends and relatives. The man who takes the money and does not return it, His credibility begins to end in the market.
People are hesitant to give loans to him. People will call him a thief or a wrong person. The man will be out of the market. It is a matter of common world, so I believe that all the dis-arrangements or dislikes are all because we are not paying the loans from where we have taken. We have the debt of the Gods, who give us air, give water, give the sky, give the earth, but we forget.
When a man is born, he is born with three loans. Paternal debt, sage debt and DEV debt. Every person is born as debtor. Those born in the families of Tata-Birla will also be born with these three loans. Rich or poor, everyone will need oxygen, light and water. After taking birth we receive rituals, We get wisdom, these all are debt given by sages or Rishis. At their time they had traditionally received the rituals and wisdom from The God. Now It is debt, our ancestors have given us. With all these people we move forward with debt and do not pay these loans in the same way, like borrowed from the market, but have not paid. The one who does not pay the debt, he will never prosper, he will never succeed, he will never be calm. We all should strive to repay these loans. Due to not repaying these loans, there are all the chaos in the world. There are all the problems. 
Everyone was very happy and said that this need to be propagated. Who will not pay the parent’s debt ? Who will not pay the nation's debt ? If We walk on the roads of the nation, but do not accept the nation or the government, how it will go on ? Who does not believe in God, how it will go on ? The original father is the same. All the people of the world need to associate with the tradition that there should be a feeling of gratitude towards where you have got strength for your development.
What you got from the Rishis, What you took from the deities, what you received from the ancestors, it all must be considered.
In the scriptures it has been said to perform five Yajna, the Rishi Yajna, Dev Yagya, Pitra Yagna, Bhoot Yajna, Manushya Yajna. Feeding cows, feeding birds, serving poor, attending visitors and food to the guests is necessary. The person who does these Five Yajna or deeds in his life, is happy and is saved from all suffering.

Sunday, 5 May 2019

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - 6
अंत में इस व्यवहार का संसार में लाखों लोगों ने अनुकरण करके जीवन को धन्य बनाया। प्रह्लाद जी अकेले नहीं हुए, प्रह्लाद जी के जैसे वैदिक सनातन धर्म में असंख्य महान लोग हुए, जिन्होंने पूरा जीवन ईश्वर को समर्पित कर दिया, जिन्होंने जीवन के परम लाभ को प्राप्त किया और ईश्वर जैसा ही हो गए। संसार में न जाने कितने लोग मिट गए, कितने लोग लुट गए, कितने लोग असंख्य भोग के साधनों से जुड़ गए, कितने लोगों ने खूब दान किया, भामाशाह जैसे असंख्य लोग हुए, किन्तु मोक्ष की प्राप्ति के लिए जिन्होंने व्यवहार किया और जीवन को धन्य बनाया, वे ईश्वर जैसे हो गए। इसी परंपरा में प्रह्लाद हैं। 
जैसे सभी नदियों का गंतव्य समुद्र है, वैसे ही मनुष्य को भी जानना चाहिए कि उसका परम गंतव्य ईश्वर है। गुरुओं के बताए रास्ते पर चलकर ज्ञान प्राप्त करके उच्च स्तर पर पहुंचे। हिरण्यकश्यप ने बहुत कोशिश की कि प्रह्लाद जी अपने विश्वास से हट जाएं, किन्तु प्रह्लाद जी नहीं हटे। जो विपरीत परिस्थितियां हैं, जो विपरीत मन वाले लोग हैं, वे सही काम करने वालों को मुश्किल में डालते हैं। ईष्र्या, द्वेष में रहकर लोग अच्छे लोगों को परेशान करते हैं, किन्तु अच्छा रास्ता छोडऩा नहीं चाहिए, अडिग रहना चाहिए। उसी से विजय मिलती है। जीवन सही है, तो उसे धन्य बनाएगा, सुयश देगा। लोक भी देगा और परलोक भी देगा। गलत नीति से चलने वालों का एक बड़ा उदाहरण हिरण्यकश्यप हैं। भोग के लिए अहंकार के लिए जीवन जी रहे हैं। इन्हें कोई मतलब नहीं है ईश्वर से, धर्म से, सदाचार से, मर्यादा से। बेटा, पत्नी से कोई मतलब नहीं है। 
हिरण्यकश्यप का पथ गर्त में ले जाने का पथ है। सर्वश्रेष्ठ जीवन को परम लांछित करने का महापथ है। प्रह्लाद जी का महापथ है, ईश्वर का पथ है। लिखा है भागवत में कि प्रह्लाद जी को मारने के लिए हिरण्यकश्यप ने बहुत प्रयास किए। कुचलवाने का प्रयास हुआ, पहाड़ से फेंकवाने का प्रयास हुआ, होलिका की गोद में बैठाकर जलाने का षड्यंत्र हुआ, किन्तु प्रह्लाद के विरुद्ध किसी गलत कार्य में हिरण्यकश्यप सफल नहीं हो पाए। 
एक दिन हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को चुनौती देते हुए कहा, तुम्हारा ईश्वर व्यापक है, तो इस जलते-तपते खंभे में प्रकट हो जाए। 
ईश्वर की व्यापकता का अगर अहसास हो जाए, तो जीवन में आमूलचूल परिवर्तन हो जाए, किन्तु ऐसा नहीं होता है। यह तो मन में आता है कि कहां के पार्षद हैं, कहां के विधायक हैं, यह तो अहसास होता है, छोटा जो स्वरूप है, किन्तु यह बात मन में नहीं आती कि ईश्वर व्यापक है। कण-कण में है। बहुत बड़ा सिद्धांत है। घड़े की मिट्टी व्यापक है। कारण व्यापक होता है। वैसे ही संसार में ईश्वर व्यापक है, क्योंकि ईश्वर ही संसार हो गया है। 
हिरण्यकश्यप को ईश्वर की सर्वव्यापकता पर विश्वास नहीं है। यह विश्वास तभी आएगा, जब आदमी गुरु के सान्निध्य में जाकर वेदों, स्मृतियों को पढ़ेगा। प्रह्लाद जी की अग्नि परीक्षा हो रही है, तो भगवान खंभे से ही प्रकट हो गए। नरसिंह स्वरूप प्रकट हो गया। धरती कांप गई। विशाल नर और सिंह का संधि स्वरूप - विकराल रूप प्रकट हुआ। सृष्टि संहारक स्वरूप उत्पन्न हो गया। भगवान ने सबसे पहले हिरण्यकश्यप को उठाया और उसका अंत किया। 
ईश्वर का ऐसा स्वरूप देख लोग घबरा गए, लगा कि सबका विनाश हो जाएगा। सभी ने वंदना की, किन्तु भगवान शांत नहीं हो रहे थे। सभी ने फिर प्रह्लाद जी से कहा कि प्रभु इस रूप में आपके लिए ही प्रकट हुए हैं, आप प्रार्थना करें। यह नियम है कि जो व्यक्ति किसी से नहीं मान रहा है, उसका जो सबसे अधिक प्रिय है, उससे मनवाने की कोशिश की गई। प्रह्लाद जी भगवान के परम लाड़ले हैं। परम प्रेरणास्पद हैं भगवान। सब लोगों ने कहा, तो प्रह्लाद जी ने प्रार्थना की। बड़ी लंबी प्रार्थना की। भक्ति की महिमा को विस्तार से बतलाया, भगवान की परम उदारता को बतलाया। जाति, रंग, नस्ल का कोई बंधन नहीं। चांडाल भी भक्ति कर रहा है, तो वह ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ है। उसमें लिखा है कि ब्राह्मण अपने पुण्य से ब्राह्मण हुआ, यह शास्त्र-सम्मत है, किन्तु यदि उसने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन को ईश्वर की सेवा में नहीं लगाया, प्रेम और वंदना में नहीं लगाया, तो उससे तो चांडाल भी श्रेष्ठ है। प्रह्लाद जी ने नरसिंह प्रभु से प्रार्थना करते हुए बहुत लाड़-प्यार किया। प्रह्लाद जी ने खूब सहलाया प्रभु को, तो वे शांत हुए। खुश हुए, कहा कि कुछ मांगो।
क्रमश:

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - 5
मुझे तो कोई मित्र मिलता ही नहीं था। छोटी आयु में भगवान ने मेरी बनावट ऐसी की थी कि मेरी किसी से मित्रता नहीं होती थी। मेरे जीवन से दूसरों का ऐसा अंतर होता था कि मैं कह नहीं पाता था और न कोई मुझे मित्र कह पाता था। साधु जीवन में आने पर भी लोग मुझे मित्र कहने में हिचकते हैं। एक बार एक आदमी ने कहा कि मैं उनका मित्र हूं, तो उठ के चल पड़ा, कैसा मित्र? कहां उनका जीवन, एक घंटा लगाते थे कपड़ा पहनने में, अपनी दाढ़ी दांत से ही काटते रहते थे, वो बाद में बिगड़ गए, किसी युवती के साथ जुड़ गए। संन्यासी जीवन उनका गड़बड़ा गया। पहनने का ठिकाना नहीं, कभी इधर देखेगा, कभी उधर देखेगा। स्वभाव, उद्देश्य, ज्ञान, विज्ञान की साम्यता नहीं, तो कैसी मित्रता? हमने सोचा कि भगवान को ही मित्र बनाएंगे। 
राम जी को सखा भाव बहुत प्रिय है। अंगद को भी राम जी सखा बोलते हैं। नल, नील को भी बोलते हैं। लगता है कि पूरे संसार के जीवों को भगवान सखा मान रहे हैं। कोल, भील, किरात, किसी को नौकर नहीं मान रहे हैं। 
जब राम जी अयोध्या आए, तो वानरों की ओर संकेत करके गुरु वशिष्ठ से कहा कि ये मेरे मित्र हैं। इन्होंने मेरे युद्ध रूपी जहाज को संभाला। राम जी ने सुग्रीव को मित्र बनाया, किन्तु जब सुग्रीव को समझ आ गई, तो वह स्वयं को राम जी का दास ही मान रहा था। पूर्ण समर्पण भी ईश्वर के साथ। पूर्ण समर्पण पार्टी, जाति, परिवार को नहीं करना है। जिसने हमें पूर्ण जीवन दिया है, जिससे जुडक़र ही पूर्णता हुई है, उसी को समर्पित होना है। अपने समस्त कर्मों को ईश्वरीय चासनी में भिगोना होगा। वैसा ही करना होगा, जैसा ईश्वर करते हैं और जैसा वे सबसे चाहते हैं। 
प्रह्लाद जी ने कहा कि वाणी, आंखें, मन भी, हमारे हाथ भी, हमारे पैर भी, हमारा रोम-रोम, हमारी सांस-सांस, हमारी चेष्टा, इन्द्रियां, ज्ञानेन्द्रियां, परमेन्द्रियां भगवान के लिए समर्पित और श्रेष्ठ जीवन की हैं। यह मोक्षीय व्यवहार है। मैं कहना चाह रहा हूं, जीवन का जो सर्वश्रेष्ठ व्यवहार का स्वरूप है, वह यही है कि हम ईश्वर के लिए अपने संपूर्ण जीवन को समर्पित करें। उसके लिए ज्ञान, शिक्षा की संप्राप्ति करके जीवन जीएं। यह सृष्टि और समाज का वरदान जीवन होगा। जिन संतों ने, जिन ऋषियों ने, जिन समाजसेवियों ने संपूर्ण रीति से अपने को समर्पित कर दिया, सृष्टि के लिए संसार के लिए वही बड़े लोग इतिहास में हैं। इनमें जाति का बंधन नहीं है, कोई भी हो सकता है। 
महात्मा गांधी का जन्म वैश्य परिवार में हुआ था, कभी चर्चा नहीं होती कि बनिया राष्ट्रपिता कैसे हो गया। उस समय किसी का व्यक्तित्व नहीं था वैसा। अपने को ईश्वर के लिए समर्पित कर देना। उन्होंने अपने को राष्ट्र को पूर्ण समर्पित कर दिया, तो उन्हें राष्ट्रपिता बना दिया गया। यहां जाति नहीं चलती। रूप नहीं चला, बहुत लोग विद्वान थे, गांधी जी से भी धनवान थे, तमाम तरह की बातें बड़ी थीं, किन्तु गांधी जी ही महान कहलाए। वैसे ही जीव जब ईश्वर को अपना संपूर्ण अर्पित करता है, तो ही आगे बढ़ता है। 
प्रह्लाद जी के पिता के मन में यह बात समा नहीं रही थी कि मेरे अतिरिक्त कोई ईश्वर शक्तिशाली है। मेरा बेटा ही मुझे ईश्वर नहीं मान रहा है, यह कोई बेटा है क्या? जो आदमी बड़े उद्देश्य का होता है, वह छोटे उद्देश्य वालों को बड़ा ही बेकार लगता है। हिरण्यकश्यप मान रहे हैं कि बेटा मेरा दुश्मन है। विपरीत धारा वाला है। प्रह्लाद जी जीवन के सर्वश्रेष्ठ मोक्षीय व्यवहार के बहुत बड़े उदाहरण हैं। मोक्ष अंतिम व्यवहार और परम पुरुषार्थ की पराकाष्ठा है। ईश्वर के बढ़े अनुग्रह से असंख्य जीवन के पुण्य प्रभाव से जो मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है, जो परम लाभ है, यह जीवन - ऋषि जीवन है। 
यह परमार्थ नहीं है, यह व्यवहार है। जैसे सिर पर सामान रखकर बेचना, कुदाल चलाना, छोटी-मोटी नौकरी करना व्यापार है, वैसे ही लाखों लोगों को जीवन देना, मकान देना, यह भी तो व्यापार है। वैसे ही व्यवहार की पराकाष्ठा सबसे बड़ी ऊंचाई। उसके सामने एवरेस्ट की ऊंचाई तक कम है। और ऊंचाई...ऊंचाई का जो अंतिम स्वरूप है, वह व्यवहार है मोक्षीय व्यवहार। 
क्रमश:

Wednesday, 1 May 2019

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - ४
जब हम सुनेंगे ईश्वर को, तो कहां से सुनेंगे, किससे सुनेंगे। संसार में अनेक धर्मों की परंपराएं खड़ी हो गई हैं, जिनको सीधे-सीधे लोग बोलते हैं कि सब धर्म बराबर हैं। तो आइंस्टीन भी बराबर और पटाखा बनाने वाला भी बराबर। बर्तन बनाने वाला भी बराबर और बर्तन धोने वाली भी बराबर। कई लोग हैं, जो माता-पिता को ही बर्तन धोने में लगा देते हैं, क्योंकि वे नौकर नहीं रख सकते। तो हमें ऐसा नहीं मानना है कि किसी को भी सुनें ईश्वर के लिए। हम वेदों को सुनेंगे। बराबरी कैसे होगी? वो तो लूटने आए थे, कुछ लोग आज भी वही काम कर रहे हैं। गौतम बुद्ध के लोग भी आगे चलकर विक्षिप्त हुए, सनातन धर्म को अपशब्द बोलकर। मांस, मदिरा इत्यादि का सेवन सब करने लगे। सारे दुव्र्यसन करने लगे। तो हम केवल वेदों को ही सुनें।
कहा प्रह्लाद जी ने कि हमें उस ईश्वर को जानना है। केवल सुनने के लिए ही नहीं, उस ईश्वर की वाणी का वाचन भी करें। सुनें, देखें और बोलें। हमें उसका स्मरण भी करना है। तीनों इन्द्रियां साथ हैं। सुनना, गायन करना और मन से स्मरण करना। स्मरण से प्रेम उत्पन्न होता है ज्ञान और परिपक्व होता है। 
प्रह्लाद जी ने कहा कि ईश्वर को ही जानना है। भक्ति और ज्ञान का स्वरूप स्मरण है। तेल की धारा टूटती नहीं है, वैसे ही स्मरण है, जो टूटे ना। ऐसे स्मरण से उत्पन्न प्रेम ही भक्ति है। 
कई बार अपने स्वजनों के बीच भी कई महीनों के बाद बातचीत होती है, किन्तु मन में स्मरण रहता है, अपनत्व निरंतर रहता है, तो लगता ही नहीं है कि कितने दिन बीत गए और बात ही नहीं हुई। हमारा कोई भी अनुयायी हो, समर्थक हो, अपने को बल देने वाला हो, अपने को अपना मानने वाला हो, उससे बातचीत नहीं हुई, किन्तु स्मरण से परस्पर जुड़े रहे। हमने जो कहा है, उसने जो कहा है, उसके आधार पर स्मरण होता है। स्मरण का अर्थ है अनुभव होगा, तो संस्कार उत्पन्न होंगे, उन्हीं संस्कारों से उद्बोधक की प्राप्ति होगी। भगवान का स्मरण करें। अभी चुनाव होना है, तो पूरे देश के लोग लगे हैं। अपशब्द बोले जा रहे हैं। तमाम आरोप लग रहे हैं। लोकतंत्र को घटिया बना रहे हैं लोग। मन उसी में जा रहा है। यदि हम ईश्वर को सुनेंगे-गाएंगे-स्मरण करेंगे, उससे जो हमारा ज्ञान परिपक्व होगा, तो ईश्वर के दर्शन होंगे, तो हमारा उसमें प्रेम बढ़ेगा। प्रेमी का स्तर कैसा है, उसी से तो प्रेम का स्तर तय होता है। हम जिससे प्रेम करते हैं, वह कैसा है। किसी का दुष्ट ही प्रेमास्पद है, किसी का कुत्ता ही प्रेमास्पद है। पीने वाला है नाचने वाला है। प्रह्लाद जी ने कहा कि हम ईश्वर से प्रेम करेंगे, जो दुनिया का सबसे बड़ा है, किसी भी दुर्गुण से युक्त नहीं है। उसी की हम चरण सेवा करेंगे। पादसेवनम् 
उसी की हम पूजा करेंगे। संपूर्ण साधनों से उसकी हम वंदना करेंगे। उसको प्रणाम करेंगे। उसी को हम अपना मित्र बनाएंगे। हमें मित्रों की आवश्यकता होती है, जो हमारी बराबरी का हो, जिसे हम मानें कि ये मेरे जैसा है, मैं इसके जैसा हूं, स्वच्छ भाव से हम जुड़ें। भगवान के सामने सुग्रीव और विभीषण की क्या योग्यता है, किन्तु भगवान ने सखा बना लिया। जैसे पत्नी का अपहरण करने वाले रावण को हमें दंडित करना है, वैसे ही सुग्रीव की भी पत्नी का अपहरण हुआ है, उनके लिए भी लडऩा है। जैसे मैं संसार के लोगों में श्रेष्ठ भावनाओं का प्रसार करता हूं, ठीक वैसे ही ये भी करेंगे। विभीषण लंका को अयोध्या बनाएंगे और सुग्रीव किष्किन्धा को बनाएंगे। बहुत बड़े क्षेत्र को अयोध्या जैसा बनाएंगे। भगवान को मित्र बनाना है। तमाम लोग दुनिया में हैं, जिनका कोई मित्र नहीं है। समान संस्कार और दीक्षा चरित्र, कत्र्तव्य के लोग नहीं हैं। मित्रता का बड़ा अकाल है। ऐसे-ऐसे लोगों को मित्र लोग बना लेते हैं। 
क्रमश:

Monday, 29 April 2019

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - 3
वैदिक सनातन धर्म की परंपरा में पुनर्जन्म पर परम विश्वास है। अब तो दुनिया की तमाम परंपराएं, संप्रदाय, पंथ और लोग पुनर्जन्म में विश्वास करने लगे हैं। बड़ी लंबी विवेचना है पुनर्जन्म के सम्बंध में। 
प्रह्लाद जी का चिंतन देखिए, अरे... ईश्वर के बिना कौन-सा संसार। हम तमाम लोगों को सुनते हैं, देखते हैं, उनके लिए करते हैं, तमाम विषयों से हम अपनी इन्द्रियों को जोड़ते हैं, स्मरण करते हैं, चिंतन करते हैं, निश्चय करते हैं, अहंकार करते हैं कि ये मेरा है, ये मेरा है, यही अहंकार है। किन्तु इन सभी संसाधनों का जो मुख्य व्यवहार है, वह ईश्वर है। हम सुनेंगे, तो ईश्वर को सुनेंगे। हम देखेंगे, तो ईश्वर को देखेंगे। 
वेदों ने कहा - आत्मा वा रे द्रष्टव्य:।  
आत्मा का ही दर्शन करो, देखो उसको, देखने योग्य है वो, उसका साक्षात्कार करो, उसकी अपरोक्षानुभूति करो, जो ज्ञान की अनुभूति का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप है, वही है देखने योग्य, उसको देखो। सिनेमा देख करके, क्रिकेट देखकर जीवन किसी का बड़ा नहीं हुआ है और न कभी होगा। सफल वैज्ञानिक प्रयोगशाला में जितना समय लगाते हैं, उतना समय वे सिनेमा देखने में नहीं लगाते। सिनेमा, क्रिकेट में थोड़ी देर के लिए आनंद मिलता है, ताली बजा दिए और बस हो गया। संसार जिनसे अपेक्षा करता है और गौरवान्वित होता है, वो तो प्रयोगशाला में रहकर साधना करते हैं, जंगल में रहकर साधना करते हैं, विकास के क्रम में लगकर साधना करते हैं।
तो प्रह्लाद जी ने कहा, यह तो आत्मा ही देखने योग्य है... ईश्वर । आत्मा का एक अर्थ जीवात्मा भी होता है। हमें अपने को देखना चाहिए, किन्तु लोग व्यवहार में दूसरों को ही देख रहे हैं। अपना भी तो देखो। मन कैसा है, क्रिया कैसी है, तुम्हारी इच्छाएं कैसी हैं, तुम्हारे संकल्प कैसे हैं, उसको भी देखो। दूसरे को देख रहे हैं कि ये पतित है और तू क्या है। अपना देख ही नहीं रहा है, तो आत्मा-परमात्मा, दोनों को देखें, जिसमें परमात्मा मुख्य हुआ, उसी को हमें देखना है। उसी को हमें सुनना है। ऐसा नहीं है कि हम रास्ता किसी से पूछ रहे हैं और वो बतलावे, तो हम नहीं सुनें। ऐसा नहीं है कि जो हमारी जिम्मेदारियां हैं, उनको हम नहीं सुनें, उनको सुनना ही होगा। किन्तु संसार के जो लौकिक व्यवहार और जिम्मेदारियां हैं, उनको भी उसका साधन बनाना है, इसका मुख्य लक्ष्य वहीं पहुंचने का है। तो प्रह्लाद जी ने कहा, 
श्रवणं कीर्तनम विष्णो: - हमें सुनना भी उसी को है, जो वेदों ने कहा था, आत्मा वा रे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य:।  
ईश्वर को देखना है, तो आप कैसे देखेंगे, उसके प्रतिपादक शास्त्रों को सुनिए। ईश्वर को यदि आपको जानना है, तो ज्ञान का सबसे बड़ा साधन तो श्रवण है। श्रवण माने शब्दों को कानों से ग्रहण करना और उनके अर्थों के माध्यम से पूरे वाक्य के अर्थ का ज्ञान करना, इसको शब्द बोध कहते हैं। पहले हम शब्दों को सुनते हैं, यह प्रत्यक्ष हुआ, पद ज्ञान हुआ, शब्द ज्ञान हुआ, फिर उन शब्दों के अर्थ जो होते हैं, उनका ज्ञान हुआ कि इस शब्द का अर्थ क्या है। फिर उन सभी शब्दों के अर्थ जुड़ जाते हैं रेल के डिब्बों की तरह और उनका एक बोध तैयार होता है, उसको ही बोलते हैं शब्दबोध। वाक्यार्थबोध। तो ईश्वर को सुनना चाहिए। नहीं सुनने के कारण ही आज पतन हो रहा है। जब विद्यार्थी नहीं सुनेगा अपने अध्यापक के वचनों को, तो न परीक्षा में अच्छी श्रेणी से उत्तीर्ण होगा और न वो विद्वान हो पाएगा, उसको समझ नहीं हो पाएगी। तो भगवान को सुनना है। वेदों के, पुराणों के, इतिहासों के माध्यम से सुनना है। ईश्वर प्रतिपादन की जो विधा हमें अनादि काल से प्राप्त हुई, वो दुनिया में कहीं नहीं है। जैसे अरबपति के सामने दूसरे व्यवसायी लगता है कि ये तो भिखमंगे हैं। लोग पढ़ते हैं अखबारों में कि मात्र डेढ़ सौ या दो सौ उद्यमी घरानों के पास अपने देश की ७५ प्रतिशत संपदा है। बाकी लोग तो हो गए सीताराम, उनके पास क्या है, कुछ भी नहीं है।
क्रमश:

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

भाग - २
प्रह्लाद जी की जो शिक्षा है, वह हिरण्यकश्यप की विचारधारा से मेल नहीं खा रही है। हिरण्यकश्यप की विचारधारा में कोई ईश्वर नहीं, कोई शास्त्र नहीं, कोई वेद नहीं, कोई पुराण नहीं। प्रह्लाद जी को शिक्षा मिलनी थी, मिली। ईश्वर के बनाए संसार में मिली। हिरण्यकश्यप क्या बनाएंगे आकाश को, सूर्य को, चंद्रमा को। उन्हें भी मालूम है कि मैं नहीं बना सकता, किन्तु उनका ध्यान इस पर नहीं जा रहा है कि इसका निर्माता कोई और हो सकता है, मुझसे बड़ा, मुझसे ज्यादा पराक्रम संपन्न, ज्यादा ज्ञानी कोई हो सकता है। पिछले पापों के कारण, सही शिक्षा नहीं मिलने के कारण हिरण्यकश्यप के साथ ऐसा हुआ। शास्त्रों पर विश्वास करने वाले श्रेष्ठजनों का आशीष उस पर नहीं था। उसका जीवन सही सांचे में नहीं ढला था। उसमें पिछले जन्म के असंख्य पापों का बाहुल्य भी था। ज्ञान की प्राप्ति तभी सही होती है, जब हमारे पिछले पाप नष्ट हो जाएं, मन साफ हो जाए, तभी ज्ञान, तभी प्रेम, तभी श्रेष्ठ भाव प्रगट होते हैं। जैसे खेत परिपूर्ण रूप से साफ हो जाए, बीज को अंकुरित होने से रोकने वाले तत्व जब खेत से निकाल दिए जाएं, तभी उसमें फसल उगती है। यदि खेत में पत्थर हैं, शुष्कता है, घास है, तमाम अवरोधक हैं, तो फसल नहीं होती, बीज अंकुरित, पुष्पित, पल्लवित और फलित नहीं होता। वो अपने पापों के कारण उस ज्ञान को नहीं प्राप्त कर पा रहा है, जिस ज्ञान से जीवन को सही प्रकाश, सही प्रेरणा, सही कार्यकारिता मिल पाए। अर्जुन ने भगवान से पूछा था कि महाराज, ज्ञान कब प्राप्त होगा, तो भगवान ने कहा, 
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। 
यानी कई जन्मों के बाद ज्ञान की प्राप्ति होती है। अर्जुन ने पूछ लिया कि भगवान इतने जन्म क्यों? भगवान ने कहा कि जब तक सब पाप नष्ट नहीं होंगे, तो मन मलीन रहेगा और उसमें वैसे ही ज्ञान नहीं उत्पन्न होता है, जैसे अस्त-व्यस्त, अंकुर विरोधी अवरोधकों से भरे खेत में बीजारोपण व्यर्थ हो जाता है। 
माता-पिता बच्चे को समझाते-बोलते रहते हैं कि बेटा ये नहीं करो, वो करो, किन्तु नहीं समझ में आती बात। अध्यापक बोलते हैं सभी बच्चों को, मगर नहीं समझ में आती बात। कुछ को आती है, तो जज, कलक्टर, इंजीनियर, विद्वान हो जाते हैं, बाकी नहीं हो पाते। तो इसका मूल कारण मन की अयोग्यता, मन की अयोग्यता मतलब पापों का बाहुल्य है, मन उसके लायक नहीं है। तो प्रह्लाद जी के पिताश्री का वैसा ही मन है। ऐसे न जाने कितने लोग दुनिया में हैं, जो ईश्वर पर विश्वास नहीं करतेे, जो सही जीवन नहीं जी रहे हैं, वो सब हिरण्यकश्यप हैं, शिशुपाल हैं, रावण हैं। 
प्रह्लाद जी का बड़ा ही उत्कृष्ट पुण्य है, तो उनका मन निर्मल है और उसमें जो गुरु लोग शास्त्र मर्यादित प्रेरणाएं दे रहे हैं, उपदेश दे रहे हैं, उसको वो समझ रहे हैं और उन्होंने समझ लिया कि जीवन का सही व्यवहार क्या है। कैसे जीवन में प्रयास करना चाहिए। जीवन में कैसी इच्छा होनी चाहिए और क्या ज्ञान होना चाहिए। 
पूछते थे हिरण्यकश्यप कि तुम क्या पढ़ते हो, कौन-सा उत्तम ज्ञान, तो उन्होंने कहा कि हमारा संपूर्ण जीवन जब ईश्वर में लगे, जब हमारी बाह्य अंग-प्रत्यंग इन्द्रियां और भीतरी इन्द्रियां, भीतरी अंग-प्रत्यंग संपूर्ण रीति से जब भगवान की सेवा में लगें, उनको जानने में, उनकी इच्छा करने में, उनके लिए कत्र्तव्य करने में, तो ही समझना चाहिए कि यही उत्तम अध्ययन, उत्तम ज्ञान है।
हम केवल खाने में, केवल सांसारिक विषयों के भोग में और सांसारिक सुख में ध्यान लगा रहे हैं, तो हमें समझना चाहिए कि हमने ज्ञान तो प्राप्त किया, किन्तु उत्तम ज्ञान प्राप्त नहीं किया। वो प्रथम श्रेणी की विद्या नहीं हुई। पिछले असंख्य जन्मों के पुण्य-प्रताप से इस तरह की पृष्ठभूमि प्रह्लाद जी को मिली। भगवान की दया से जैसे हमारे आचार्य लोग कहते हैं - जैसे पहली बार ही अध्यापक ने बतलाया और उस विद्यार्थी को समझ में आ गया, तो समझना चाहिए कि वो प्रथम श्रेणी का विद्यार्थी है। जिसको कुछ ज्यादा प्रयास से समझ में आया, तो वह मध्यम श्रेणी का विद्यार्थी हुआ और जिसको वर्षों लग गए, असंख्य बार अध्यापक, गुरुजन और बड़े लोग कह रहे हैं, तब समझ में आया, तो यह तृतीय श्रेणी का विद्यार्थी हुआ। 
क्रमश:

Saturday, 27 April 2019

प्रह्लाद ने प्रभु से क्या मांगा

(दुख, पाप का समाधान और इच्छाओं पर नियंत्रण की शिक्षा)
(जगद्गुरू रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के प्रवचन के संपादित अंश)

मनुष्य जीवन प्राप्ति के बाद संपूर्ण जीवन व्यवहारमय है, उस व्यवहार को कैसा होना चाहिए, उसका स्वरूप, उसका उद्देश्य, उसकी बारीकियां, उसका मूल, उसका विस्तार, उसकी प्रेरणा, इन सब बातों की पहले चर्चा हुई। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हैं। दर्शनशास्त्र में पढ़ाया जाता है कि पहले हम जानते हैं, ज्ञान प्राप्त करते हैं, फिर ज्ञान से इच्छा उत्पन्न होती है कि ये हमें मिल जाता, ये मेरा हो जाता, इसी का नाम इच्छा है। और फिर हम इच्छा से एक कदम आगे बढ़ते हैं, प्रयत्न करते हैं, व्यापार करते हैं, उसको प्राप्त करने के लिए। ज्ञान से उत्पन्न, इच्छा से उत्पन्न क्रिया द्वारा जो वस्तु प्राप्ति का प्रयास करते हैं, ये जो क्रिया है वही व्यवहार है। ये समस्त क्रियाएं जो मनुष्य जीवन में प्राप्त होती हैं, इन्हीं को व्यवहार कहते हैं। क्रिया का नाम ही व्यवहार है। उस क्रिया का मूल इच्छा और इच्छा का मूल ज्ञान। मनुष्य क्रिया से कभी दूर नहीं रह सकता, क्योंकि शरीर जिसको मिला है, उसको तो क्रिया करनी ही पड़ती है। वो कभी उससे वंचित नहीं रह सकता है, ये बड़ी ही स्वाभाविक बात है और दर्शनशास्त्र का भी इसमें पूरा समर्थन है। चिंतन की सबसे सूक्ष्म विधा है कि हम क्रिया से कभी भी रहित नहीं हो सकते। 
भगवान ने गीता में कहा - 
न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठ्यत्यकर्मकृत्। 
कर्म से रहित होकर कोई शरीरधारी एक क्षण भी नहीं रह सकता। शरीर है, तो क्रिया करनी ही पड़ेगी। बैठना भी क्रिया, सोना भी क्रिया, सांस लेना भी क्रिया, रक्तों का प्रवाह भी क्रिया, शरीर में तमाम नाडिय़ां काम कर रही हैं। लगता तो है कि कुछ कर नहीं रही हैं, लेकिन वो सब क्रियाशील हैं। कोई जीवन ही नहीं है क्रिया के बिना, तो ऐसी स्थिति में क्रिया का परिष्कार किया ऋषियों, विद्वानों ने, महामनिषियों ने। तो मनमानी नहीं चलेगी। जैसे भोजन में मनमानी नहीं चलेगी। जो व्यवस्था है, उसमें या ऑक्सीजन में मनमानी नहीं चलेगी, नाक से ही लेना है, चाहे सिलेंडर से लीजिए, चाहे प्राकृतिक लीजिए। 
इस क्रम में जिन लोगों ने इन क्रियाओं को मनमानी नहीं किया, वे देवता हो गए। जो दिव्य दृष्टि संपन्न हुआ ऋषियों द्वारा, उनको भी शक्ति देने वाले शास्त्रों द्वारा, वे सर्वोच्च जीवन को, सर्वोत्कृष्ट जीवन को, सफल जीवन को प्राप्त हुए, क्योंकि उनका व्यवहार बहुत व्यवस्थित हुआ। तो इसी क्रम में बहुत अच्छा उदाहरण है प्रह्लाद जी का, जिनका सारा वातावरण ही विपरीत है, जहां उनका जन्म हुआ है, जो उनके पिताश्री हैं हिरण्यकश्यप, वो आसुरी भाव की पराकाष्ठा के हैं। उन्हें कोई विश्वास नहीं शास्त्रों में, उन्हें कोई विश्वास नहीं परलोक में, उन्हें कोई विश्वास नहीं परंपरा में, उन्हें कोई विश्वास नहीं पुण्य में, ऋषियों के जीवन में, संतों के जीवन में, ब्राह्मणों के जीवन में। जो इस सृष्टि के श्रेष्ठ अभिव्यक्ति हैं ईश्वर की, उनमें गाय है, तुलसी जी हैं और तमाम ग्रह, नक्षत्र तारे हैं। वे शिक्षित होने के लिए प्रह्लाद जी को भेज तो देते हैं कि आप अच्छा पढि़ए। हर पिता-माता का मन होता है कि उनके बच्चे पढ़ें, किन्तु हिरण्यकश्यप उस शिक्षा को नहीं शिक्षा मान रहे हैं, जिसमें ईश्वर का अस्तित्व हो। जबकि इस सृष्टि की परिकल्पना, इसका चिंतन, इसके साथ संबद्धता, इसके माध्यम से जीवन का उत्कर्ष तब तक संभव नहीं है, जब तक इसमें यह भाव नहीं जोड़ा जाए कि ये सृष्टि किसी मनुष्य की रचना नहीं है। किसी शासन की, किसी धनपति की, किसी कलाकार शिरोमणि की, किसी की नहीं है। ये हम सब लोगों द्वारा आज और कल कभी संभव नहीं है कि हम संसार को बना सकें, जबकि आदमी घिरा हुआ है कार्यों से, निर्माण से, वो वैसे ही समझता है कि मैंने इसको बनाया है। इसी को तो इतिहास कहते हैं कि उन्होंने इसको तोड़ा है, इसको बनया है, यही तो इतिहास है। इन्होंने नागासाकी को तोड़ा, लेकिन ये भी है कि इन्होंने इतनी बड़ी मंजिल बनाई, सडक़ बनाई। बम बनाया और तमाम जीवन के लिए उपयोगी चीजें बनाईं। यही तो बात होती है कि ये इसका लडक़ा है और उन्होंने इसके लडक़े को मारा। ये विद्वान है, ये मूर्ख है। इन्होंने विद्वान बनाया, किन्तु जहां पर मनुष्य की गति नहीं है, वहां आम आदमी चिंतन नहीं कर पाता है।  
क्रमश:

Thursday, 27 December 2018

रावण कैसे भटक गया

समापन भाग 
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।  
पिछले जन्मों में भी आप ही रहे, कल भी आप ही रहेंगे। ऐसा ही जीवन और ऐसा ही व्यवहार और चिंतन, ऐसे ही संस्कार जब हम प्राप्त करेंगे, चिंतन की जो सर्वश्रेष्ठ अनुपम परंपरा है, तो हमारा जीवन अपने और दूसरों के लिए वरदान हो जाएगा। हमें बल सुकून सुंदरता देगा। भगवान से प्रार्थना है कि सभी लोगों को शास्त्र ज्ञान की परंपरा के अनुसार मंडित करें, व्यवहार का जीवन दें, व्यवहार को शुद्ध करें। 
मैं कहा करता हूं कि भारत के प्रधानमंत्री अभी स्वच्छता अभियान चला रहे हैं, किन्तु इस स्वच्छता से लोकतंत्र सशक्त नहीं होगा। इस स्वच्छता से पार्टी का सामंजस्य सुदृढ़ नहीं होगा, परिवार का नहीं होगा, मानवता का नहीं होगा। जब तक हमारा मन शुद्ध नहीं होगा, हमारा चित्त शुद्ध नहीं होगा, हमारी बुद्धि शुद्ध नहीं होगी, हमारा अहंकार शुद्ध नहीं होगा, तब तक केवल झाडू लगाने से कुछ नहीं होगा। आज कितना गंदा है लोगों का मन। कोई दुर्गंध तो थोड़ी दूर तक प्रभावित करती है, किन्तु ये जो मन की दुर्गंध है, वह दूर तक प्रभावित करती है और आज कर रही है। 
हमारा व्यवहार शुद्ध हो, शास्त्रों की कसौटी पर कसा हुआ हो, उसके माध्यम से परिपूर्णता व्यापकता हो, यही काम किया भारत के ब्राह्मणों ने, शास्त्रों ने संपूर्ण संसार को चरित्र की शिक्षा दी और चरित्र में सब व्यवहार आ गए। एक भी व्यवहार नहीं छूटा। यहां अब लोग केवल याद करवाते हैं, ऐसे ही क्लास में पढ़ा दिया और कोई चरित्र की शिक्षा नहीं दी। 
दिल्ली के एक विद्वान बता रहे थे कि मैंने अपने कुलपति को कहा, लडक़े-लड़कियां परिसर में अश्लील मुद्रा में बैठे रहते हैं, आप उनको रोकिए। 
कुलपति ने कहा कि इससे हमारा कोई मतलब नहीं कि किससे कौन चिपक कर बैठा है। हमारा काम केवल पढ़ाना है। 
यह विश्वविद्यालय के कुलपति कह रहे हैं, तो परिणाम यह कि बच्चे मार रहे हैं अपने अध्यापकों को, जूतों से मार रहे हैं। यही स्थिति शिक्षण संस्थानों में कम या ज्यादा हो रही है। सुधारने की जरूरत है, केवल मोक्ष के लिए नहीं, अपने लिए भी यह लाभदायक है। यह हमारा पूर्ण विश्वास है। यह कोई रटी रटाई बात नहीं है। यह कोई आकाश का फूल नहीं। श्री राम ने, ऋषियों ने, हमारे पूर्वजों ने, हमारे ब्राह्मणों ने, संत जनों ने इसका प्रयोग करके सृष्टि को वरदान स्वरूप बनाया था। शास्त्रों की आवश्यकता सदा रहेगी, उचित व्यवहार की आवश्यकता संसार को सदा रहेगी, जिससे हमारा जीवन परिपूर्ण होगा और उसको बहुत सुदृढ़ता से स्थापित करने की आवश्यकता है। 
जय सियाराम

रावण कैसे भटक गया

भाग - 10
जो लोग अपना जीवन भी नहीं संभाल पा रहे, वो संसार कैसे संभालेंगे? बहुत बड़ी विडंबना है। व्यवहार ऐसा हो कि हमारा अपना जीवन भी अच्छा हो जाए और हमारा परिवार भी सुधरे। शास्त्र में भी कई लोग विद्वान हो जाते हैं, किन्तु उन्हें व्यवहार करने नहीं आता। संस्कृत जो लोग पढ़े हुए हैं, उनके लिए लोग मजाक करते हैं कि इनमें तोतारटंत लोग ज्यादा होते हैं, उनको व्यवहार करने नहीं आता। जहाज पर चलने नहीं आता। तमाम बातें जो संस्कृत वालों को नहीं आतीं, गिनाई जाती हैं। किन्तु मैं तो संस्कृत पढ़ा हूं, लेकिन मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि व्यावहारिक दृष्टि से संस्कृत के अलावा और कुछ पढ़े रहते, तो ज्यादा अच्छा होता। थोड़ी बहुत नहीं, संपूर्ण शिक्षा व्यवहार की अपने संस्कृत साहित्य में है। ऋषियों के साहित्य में है, धर्म साहित्य में है। कैसे परिवार में रहना, कैसे पड़ोस में रहना, कैसे देश में रहना, कैसे दुनिया में रहना, सब तरह की शिक्षाएं संस्कृत में हैं, इसीलिए पढ़ाई के साथ अपने व्यवहार को जोडक़र, जैसे आधार कार्ड को सबसे जोड़ा जा रहा है, ठीक उसी तरह मैं कह रहा हूं कि हम अपने व्यवहार को जो शास्त्र में है, जो शास्त्रों से निकला परिपूर्ण ज्ञान है, उस ज्ञान से हम अपने व्यवहार को जोड़ें। 
यह व्यवहार है कि हमें भोजन कैसे करना है। खड़े होकर नहीं करना है, बैठकर करना है। गीता में लिखा है कि शास्त्रों से पूछकर भोजन करना है। राजस है या तामस है? सात्विक भोजन करेंगे, तभी मन विशुद्ध होगा। भोजन बहुत साफ-सुथरा, सात्विक हो। साफ-सुथरा होगा भोजन, तभी उससे ऊर्जा उत्पन्न होगी। कंकड़ बीनिए, धोइए, सुखाइए, साफ भूमि हो और उसके बाद भोजन को अत्यंत शुद्धता के साथ बनाइए। नहा धोकर बनाइए, चप्पल नहीं पहनकर, कहीं बाल में, नाक में हाथ नहीं डालकर, किसी अन्य का स्पर्श नहीं करके, भोजन बनाइए। उस पर किसी की दृष्टि न पड़े। 

गीताकार ने कहा कि अपने लिए भोजन नहीं बनाना, अपने लिए बनाए तो पाप हो जाएगा। जो अपने लिए भोजन बनाते हैं, वो पाप के लिए ही बनाते हैं। क्या तुमने गेहूं बनाया या चावल बनाया है? इनको बनाने वाला मालिक कोई और है, किन्तु तुम अपना मान रहे हो। किसी दूसरे की संपत्ति को अपना मानने लगें, तो गलती होगी। आप कभी भोजन अपने लिए नहीं बनाएं, सदा ईश्वर के लिए बनाएं। जैसे नौकर मालिक को करता है, ईश्वर को अर्पित करिए भोजन। फिर देखिए, आपका तन-मन सही में पुष्ट होगा। भोजन से कपड़ा तक सारा व्यवहार, एक-एक चेष्टा, सबकुछ विशुद्ध होगा, तो हमारा जीवन सभी क्षेत्रों में परिपूर्ण होगा। भले ही हमारे पास धन नहीं हो, किन्तु हम सुदामा होंगे। सुदामा नहीं टोक रहे कि भगवान ने हमें कुछ नहीं दिया। 
लिखा है भागवत में कि सुदामा जी जब भगवान के यहां से लौटकर आए, तो भगवान ने साक्षात कुछ नहीं दिया। सम्मान तो बहुत किया, किन्तु कुछ दिया नहीं। हीरे-जवाहरात, कपड़े-लत्ते। दूसरा कोई होता, तो नाराज हो जाता कि कभी आपके यहां नहीं आऊंगा। आप क्या मित्र हो, मैं गरीब ब्राह्मण हूं, मुझे कुछ नहीं दिया। जैसे द्वारिकाधीश हैं कृष्ण, तो सुदामा भी द्वारिकाधीश हैं, भले महल नहीं है। 
शास्त्रों ने लिखा है कि ईश्वर को जानने वाला ईश्वर हो जाता है। 
बह्मविद्ब्रह्मेव भवति। 
सुदामा ब्रह्म को पहचानने वाले संत हैं, वे ब्रह्म के समान हो गए। उन्हें वही आनंद चित्त की अवस्था प्राप्त है, वही विश्वास की अवस्था, वही श्रद्धा की अवस्था प्राप्त है, जो भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त है। तो सुदामा ने मांगा नहीं कुछ भी, दूसरा होता, तो हंगामा ही कर देता। खरी-खोटी सुनाता। अनशन पर बैठ जाता। सुदामा जी ने भी विचार किया कि भगवान ने कुछ दिया नहीं, अपनी भाभी के लिए, परिवार के लिए दिया नहीं। मेरे निर्वाह के लिए, समृद्धि के लिए कुछ नहीं दिया। 
यहां चिंतन की क्या अवस्था या विशेषता है, उसे समझिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि भगवान गरीब हो गए हैं। वैसे भगवान तो कभी गरीब नहीं हो सकते। संपूर्णता में जिसको सबकुछ प्राप्त है, उसे ही भगवान कहते हैं। भग माने संपूर्ण ऐश्वर्य। धर्म संपूर्ण, वैराग्य संपूर्ण, ज्ञान संपूर्ण, संपूर्ण जिसके पास हो ऐश्वर्य। भग वाले को भगवान कहते हैं। भगवान की गरीबी कैसे आएगी, वह तो समग्र धर्मशाली, धनशाली है। ऐसा नहीं कि कंजूस हो गए भगवान। फिर सुदामा ने सोचा कि ऐसा क्यों सोचें, भगवान तो परम उदार हैं, कल्याणकारी गुणों के समुद्र हैं। प्रेम, लगाव, शक्ति का समुद्र हैं। कभी भी भगवान पाप नहीं करते। 
जितने दुर्भाव हमारे मन में आते हैं, उसका मूल कारण पाप ही है। चाहे क्रोध हो, लोभ हो, द्वेष हो, सबके मूल में बैठा है पाप। भगवान कैसे अनुदार हो जाएंगे, वे तो परमोदार हैं। सुदामा जी ने समाधान निकाला, अद्भुत भगवान की कृपा है, भगवान ने हमारे परित्याग को, हमारा जो समष्टि के लिए समर्पित जीवन है, रोम-रोम से बाहर से भीतर से जो हमारा समुदाय की सेवा के लिए जीवन है, उससे कहीं हम अलग न हो जाएं। कहीं हम भोगी न हो जाएं, कहीं हम संतुष्ट न हो जाएं, कहीं हमारा भजन न छूट जाए, इसलिए भगवान ने नहीं दिया। कहीं हमारी विशिष्टता लुप्त न हो जाए, कहीं हम समाज के लिए जीना छोडक़र अपने लिए ही न जीने लगें, इसलिए भगवान ने हमें कोई भौतिक संसाधन नहीं दिया।  
यह विचारों की महान अवस्था, इससे बड़ा व्यवहार क्या होगा। सुदामा ने कितना बड़ा समाधान किया। अब तो लोग ऋण लेकर व्यक्तिगत संपत्ति बना लेते हैं, दिवालिया घोषित हो जाते हैं। बड़े शहरों में हजारों लोग पूर्ण संपत्तिवान होकर भी अपना दिवाला निकाल रहे हैं। कोई १० हजार तो कोई ५ हजार करोड़ रुपए का, ऐसे लोगों को कब और कैसे सुकून मिलेगा? कैसे शांति मिलेगी? कभी नहीं मिलेगी। 
यहां तो द्वारिकाधीश ने अद्भुत प्रेम की वर्षा करके, समर्पण की धारा बहा दी। सुदामा टस से मस नहीं हो रहे हैं, यह व्यवहार है, व्यवहार का चरम है। हमारी गरीबी हमारे कर्मों के कारण है, तो क्या करेगा मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री? हमारी गरीबी, बुढ़ापा, इसे कोई रोकेगा, हमारी कुरूपता भी एक गरीबी है, इसको कौन रोकेगा? हमारा निर्वंश होना भी गरीबी है, इसे कौन रोकेगा? कौन दुनिया में माता-पिता की बराबरी कर सकता है, किन्तु माता-पिता को भी एक दिन खोना ही है। होना ही है एक दिन अनाथ। हमें समझना होगा कि संसार क्या है? विकास क्या है? परिवार क्या है? इसलिए हम लोग कहते हैं कि हमारे भगवान ही सबकुछ हैं। क्रमश:

रावण कैसे भटक गया

भाग - 9
अपनी जो संस्कृति है, वह ज्ञान की परिपक्व अवस्था की बात करती है। अभी भी ऐसे संत हैं, जो सही जीवन, सही विधि से जुडक़र लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं। हम सब लोगों को क्या करना चाहिए, समय निकालकर स्वाध्याय करें, जिनके प्रतिपादित मूल्य कभी नहीं बदलेंगे। जैसे सूर्य और चंद्रमा नहीं बदलते। जैसे इस अनादि सृष्टि का लाभ, उसका संपादन नहीं बदलता, वैसे ही हमारे शास्त्रों में अमर मूल्य का परिपालन कभी भी नहीं बदलता। जीवन को पूर्णता देने वाले मूल्यों से जुडक़र अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए। 
आज लगने लगा है कि गलत काम किए बिना कोई बड़ा नहीं हो सकता, तो ये गलत बात है। सही मार्ग पर चलकर भी बड़ा आदमी हुआ जा सकता है। 
मैं गया था संत ज्ञानेश्वर के गुरु जी निवृत्तिनाथ की समाधि पर। निवृत्तिनाथ जी उनके बड़े भाई भी थे। संत ज्ञानेश्वर ने १८ साल की आयु में जीवित समाधि ले ली। उन्होंने अपने जीवन में महत्वपूर्ण ग्रंथ रचे, गीता के ७०० पदों की ९००० से अधिक छंदों में व्याख्या की मराठी में। दुनिया का इतिहास नहीं है कि १८ साल की आयु में इस तरह का परिपूर्ण जीवन। जीवन में केवल लिखने-पढऩे का नहीं, सीखे हुए के आधार पर अपने रोम-रोम को परिपक्व बनाना, सर्वश्रेष्ठ अवस्था को प्राप्ति करना और उसके माध्यम से संसार से पूर्ण विरागी हो जाना। जो काम था, जल्दी किया और इस संसार से चलते बने। ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। निवृत्तिनाथ जी के यहां मैं गया त्रियंबकेश्वर, तो हैरान हो गया कि कैसे लोग खड़े होकर गा रहे हैं, प्रवचन हो रहा है, अद्भुत है। वहां जाकर लग नहीं रहा था कि संसार में ही है यह जगह। 
हमारा संपूर्ण जीवन व्यवहार ही है। हमारा कदम-कदम है, हमारा कर्म हमारी चितवन, चलना, बैठना, खाना, पीना, सबकुछ व्यवहार है। व्यवहार के बिना तो जीवन मृत है। व्यवहार नहीं तो जीवन कैसा? यदि हमारा सबकुछ व्यवहार है, तो हम सोचें कि हमारे व्यवहार से कैसे हमें सही जीवन प्राप्त होगा। बोलना भी व्यवहार है, लेकिन केवल बोलना ही हो और कार्य व चरित्र में वह नहीं दिखे, तो क्या मतलब?
इसलिए हमारे संपूर्ण व्यवहार का मूल ज्ञान है और ज्ञान का मूल वेद हैं, पुराण, स्मृतियां हैं। केवल भारतीय संविधान से व्यवहार को पूर्णता प्राप्त नहीं होगी। संविधान नहीं बोलता कि माता को देवी बोलो, पिता को देव बोलो। संविधान यहां तक पहुंचता ही नहीं है। देवत्व क्या है, संविधान नहीं बतलाता। सत्य का क्या मतलब है। सत्य का जो स्वरूप है, पहले पायदान से अंतिम पायदान तक सत्य की आवश्यकता है। हमारा संविधान यह नहीं बोल रहा कि आप शुद्ध आहार लीजिए, नहीं तो आपका मन विकसित नहीं होगा। अशुद्ध आहार से आप कभी भी हरिश्चंद्र या सत्य बोलने वाले नहीं बनेंगे, अंदर-बाहर से सशक्त नहीं बनेंगे। खेत ही अच्छा नहीं है, तो बीज क्या करेगा? 
तमाम तरह के जो संगठन हैं, उनके अपने जो विचार हैं, वो अधूरे हैं। जब वे शास्त्रों से गुरुओं के माध्यम से प्राप्त होंगे, तो ही विचार के सही व्यवहार को देंगे। विचार में सही व्यवहार होना चाहिए। बोलने-बैठने में सही व्यवहार। अभी तो लोगों को पता ही नहीं है कि बड़ों के सामने पैर पर पैर रखकर नहीं बैठते। एक बार जर्मनी की दो लड़कियां मोक्षपुरी पर पीएचडी करने आई थीं, तो मेरे यहां आईं, तो कहा गया, महाराज इनको मोक्षपुरी पर बतलाइए। 
वो २७ -२८ साल की थीं, घुटनों के ऊपर जो पहनते हैं, वो कपड़ा पहने। दोनों ने मेरी ओर ही पैर कर लिया। मैंने सोचा, ये मोक्षपुरी पर पीएचडी करने आई हैं! फिर मैंने पूछा, जैसा पैर आपने मेरी ओर किया, वैसा कभी अपनी क्लास में किया क्या? उन्होंने कहा, नहीं किया। 
अपने से बड़ों के यहां कभी किया क्या? कहीं ऑफिस में किया क्या? हम आपकी पीएचडी के एक निर्देशक होंगे, किन्तु आपने ये क्या किया, ये कौन-सी संस्कृति है? जो अपने से वरिष्ठ हैं, उन्हें सम्मान दें। ऐसे ही जीवन के सभी क्षेत्रों में अपने व्यवहार को शास्त्रों से जोडक़र शुद्ध करेंगे, मर्यादित करेंगे, प्रचार-प्रसार करेंगे, तो हमारा जीवन सही होगा। इसीलिए अपना देश विश्व गुरु कहलाता था। संसार को सिखलाने वाला कहलाता था। संसार के सभी लोगों को मनु ने चरित्र की शिक्षा दी। क्रमश:

रावण कैसे भटक गया

भाग - 8
कल ही एक व्यक्ति बतला रहे थे कि एक आदमी को हमने जैसे-तैसे करके बड़ी गद्दी दिलवा दी। गद्दी दिलाने के लिए जाल फरेब किया, तो वह गद्दी कितने दिन चलेगी और वह महंत कितने दिन चलेगा, वस्तुत: साधु होगा या नहीं होगा। कैसे बड़ा उदार होगा, कैसे उसमें तमाम विशिष्टताएं होंगी, कैसे उसका जीवन चमचमाएगा, हो ही नहीं सकता। गलत पद्धति हो गई, उद्देश्य गलत, शिक्षा गलत, उसका निर्माण गलत। 
आज कोई कह ही नहीं रहा कि कहां से शुरुआत होगी, कहां से शुरू करें। अभ्यास की आवश्यकता है। शास्त्रों ने इस बात को बार-बार दोहराया है। जैसे अपनी दूकान नहीं बंद कर रहे हो, जैसे अपने दूसरे काम बंद नहीं कर रहे हो, वैसे ही आप अभ्यास बंद मत करो। जो ज्ञान प्राप्त किया है, उसे अभ्यास से बढ़ाइए। देखिए आपकी वैराग्य की स्थिति क्या है, आपके विश्वास की स्थिति क्या है, विश्वास के अभाव में भी लोगों का जीवन बिगड़ रहा है। शास्त्रीय लोगों में विश्वास नहीं है। जाति में परिवार में नहीं और परलोक में विश्वास नहीं है। इसमें श्रद्धावान जरूर होना चाहिए। श्रद्धावान ऐसा नहीं कि अंध भक्त हो जाएं। श्रद्धा का अर्थ है - शास्त्रों में पूर्ण विश्वास हो और उन शास्त्रों के आधार पर जिन्होंने अपने जीवन को परिपूर्ण कर लिया है, उन पर विश्वास हो - यही श्रद्धा है। आस्तिक बुद्धि को श्रद्धा कहते हैं।
यह भी होता है कि लोग पुरानी चीजों, प्राचीन ज्ञान से दूर भागने लगते हैं। मुंह से खाने की परंपरा या तरीका पुराना है, तो क्या नाक से खाने लगोगे? सडक़ पर ही चलना है या सडक़ पर नहीं चलकर कहीं और चलने लगोगे? हवाई जहाज उड़ता है, उसके उडऩे का तंत्र व्यवस्थित है, यह रोज नहीं बदलता है। इसलिए हम केवल कपड़ा बदलते हैं, केवल कार बदलकर, सोफा बदलकर, मित्र बदलकर, कारोबार बदलकर, आभूषण बदलकर जीवन को परमपथ पर ले जाना चाहेंगे, तो यह बिल्कुल ढकोसला हो जाएगा। जो बना है परंपरा से, जो बने हैं संयम-नियम, उनके आधार पर यदि हम अपने जीवन को ले चलेंगे, तो हमारा जीवन धन्य होगा। इसलिए व्यवहार को दुरुस्त करने की आवश्यकता है। तमाम लोग ऐसे हैं, जो बहुत बड़ी-बड़ी बात बोलते हैं, किन्तु उनका व्यवहार शून्य होता है। 
हमने छोटी आयु में एक कहानी पढ़ी थी - आज भी वह कहानी पढ़ाई जाती है। किसी तोते को उसके पालक ने सिखाया था कि शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, उसमें मत फंसना। कंठस्थ हो गया। एक बार शिकारी आया, जाल बिछाया और दाना डाला, पास ही बैठ गया कि देखें, कौन फंसता है, तो वही तोता आया। तोते ने तो केवल याद किया था मालिक के शब्दों को, बार-बार सुनकर अभ्यास करके, किन्तु उसे यह नहीं पता था कि शिकारी कौन होगा, दान क्या होगा, कैसे आएगा, कैसे जाल बिछाएगा, फंसने का क्या अर्थ है, कैसे हम फंसने से बचेंगे, यह कुछ नहीं पता था। ठीक इसी तरह से तमाम अच्छी बात करने वाले लोग हैं, किन्तु पहले बतलाया जा चुका है, ज्ञान को परिपक्व बनाना पड़ता है। ज्ञान जब परिपक्व होता है, तभी लाभ देता है। 
ऐसे ही तमाम लोग हैं - रामायण या भागवत पर बोल रहे हैं। लोकतंत्र पर बोल रहे हैं, तमाम विधाओं पर बोल रहे हैं, स्वच्छता पर बोल रहे हैं, कुरीतियों को दूर करना है, लेकिन ये तोते के जैसा बोल रहे हैं। तोता भी बोलता था, किन्तु आकर जाल में फंस गया। शिकारी ने फंसा लिया। तो हम अपने ज्ञान को परिपक्व ज्ञान बनाएं, तब हमारा व्यवहार शुद्ध होगा, इसलिए हमारे यहां कहा जाता है कि केवल अधकचरा ज्ञान विष के समान होता है। ज्ञान पचना चाहिए, चरित्र में उतरना चाहिए। दुुनिया में जितने दुराचारी हुए, उन्हें भी पता था कि झूठ नहीं बोलना है, चोरी नहीं करना है, गलत आहार नहीं लेना है, गलत स्त्री को साथ नहीं लेना है, दूसरे की स्त्री को नहीं देखना है, कहीं से भी लांछित नहीं होना है, छल-कपट नहीं करना है, किन्तु वे नहीं कर सके। क्रमश:

रावण कैसे भटक गया

भाग - ७
लिखा है शास्त्र में - सब लोग मुक्त हों। कुम्हार जैसे मिट्टी से घड़ा बना लेता है, घड़ा अलग करके रख देता है, किन्तु चक्का चलता रहता है, क्योंकि उसमें गति है, चलने की शक्ति है। घड़ा भले ही हट गया, किन्तु चक्र चलता है। जीवन में भी ऐसा ही होना चाहिए। आप बन गए, तो चक्र को चलने दें, उससे आप मुक्त हो जाएं। 
भगवान की दया से जीवित रहते ही लोगों को ज्ञान हो जाता है। दुनिया में जितने वैज्ञानिक नहीं हुए हैं, उससे ज्यादा दुनिया में मुक्त पुरुष हुए हैं। एक से एक ऋषि, महात्मा, संत हुए हैं, जिन्होंने पूरे संसार को आलोकित किया है।
हम मनुष्यों की इतनी बड़ी आबादी हो गई, लगभग ७ अरब लोग संसार में हैं, किन्तु व्यवस्थित जीवन के लोगों का प्रतिशत कम हो गया। आज बहुत कम लोग हैं, जिनका जीवन सही मार्ग पर चल रहा है, जिन्हें स्वयं सुख मिल रहा है, संतोष मिल रहा है। जिनका जीवन दूसरों के लिए भी प्रेरणादायक है, ऐसे बहुत कम प्रतिशत लोग हैं। यहां तो जब हम देखते हैं, तो उन महान लोगों से इतिहास के पृष्ठ भरे पड़े हैं, जिनका जीवन धन्य, प्रेरक था। संस्कारितों का प्रतिशत कम हो रहा है। श्रेष्ठ उद्देश्य वालों की, महापथ पर आरूढ़ लोगों की संख्या बहुत कम हो रही है, यह चिंता की बात है। आज हम नजर दौड़ाते हैं, तो सोचते हैं कि किसके हाथ में नेतृत्व आ गया है, ऐसा कौन है, जो वस्तुत: राष्ट्रभक्त है। जो मातृभूमि के सेवक हैं, बहुत कम हैं ऐसे लोग। 
जो लोग आज मोक्ष के लिए जी रहे हैं, उनमें भी कमी आई है। गाड़ी नहीं हो, तो चलेगा, माला नहीं हो, तो चलेगा। हमारी भी वर्दी है, प्रेरक है, बतलाती है कि हम साधु हैं, किन्तु भगवान की दया से हमारा जीवन धार्मिक लिबास और बाह्य स्वरूप से ठीक होकर भी यदि हमारा जीवन केवल धन के लिए है, केवल भोग के लिए है, तो हमारा बाहरी स्वरूप कभी भी हमें श्रेष्ठ जीवन नहीं दे सकता। सभी क्षेत्रों में जो गिरावट आई है और जो गिरावट राष्ट्र को प्रभावित कर रही है, पूरी मानवता, पूरी जाति को प्रभावित कर रही है। सही शिक्षा के अभाव में, वेदों, दर्शनशास्त्रों की शिक्षा के अभाव में, शिक्षा की परिपक्वता के अभाव में, शिक्षा को चरित्र में नहीं उतारने के कारण ही सभी क्षेत्रों में विकृतियां आई हैं। उन लोगों को देखकर, जो बहुत समृद्ध हैं, हमें अपने जीवन को नहीं ढालना चाहिए। हमें उन लोगों को जीवन में ढालना चाहिए, जिन्होंने अपने जीवन की परिपूर्णता को प्राप्त कर संपूर्ण समाज को आलोकित किया और बल दिया। किन्तु अनेक लोग आलोकित व्यक्ति को नहीं देखते। हम तो पड़ोस वाले को देखते हैं कि कहां से पैसा लाकर बंगला बना लिया, कहां से गाड़ी ले आया, हमें भी ऐसे ही करना है। मालूम हो जाता है कि पड़ोसी गलत विधि से लाया है, तो भी फर्क नहीं पड़ता, लोग केवल यह सोचते हैं कि इसका हो गया, तो ऐसी ही किसी गलत विधि से मेरा भी हो जाए। जबकि गलत विधि से जो शक्ति आएगी, परिवार, प्रभाव आएगा, चाहे ज्ञान हो, वो कभी भी कारगर नहीं होगा। वस्तुत: सफल नहीं होगा। तो शिक्षा को हमें बदलने की आवश्यकता है। संयम हो और बढ़े। हमारा कदम-कदम शास्त्र की मर्यादा में होना चाहिए। 
हमारे कमाने का तरीका भी सही होना चाहिए। न्याय से अर्जित धन को ही स्वीकार करने के लिए शास्त्रों ने कहा, किसी तरह से कमाया और दे दिया, तो दान नहीं कहलाएगा। न्यायार्जित धन का परित्याग दान है। न्यायपूर्वक जो धन अर्जित किया है, शास्त्रों की रीति से किया है, जो संविधान है, उसके भी नियम-कायदे के अनुरूप किया है, उससे जो धन अर्जित होगा, वही पवित्र होगा। उससे ही आपको सही जीवन मिलेगा, संतति को अच्छा स्वरूप मिलेगा। सबकुछ मिलेगा, अगर आपने ऐसे कमाया। 
यदि कहीं से झूठ से पाकिटमारी से धन लाए, फरेब से, जैसे-तैसे, उससे कुछ नहीं होगा। कहीं से भी लाई गई पत्नी वंश का गौरव नहीं बढ़ाएगी, उससे तो वर्णसंकर ही पैदा होना है। उससे हमारा जीवन नहीं सुधरेगा। क्रमश: