Saturday, 8 April 2017

अबलौं नसानी, अब न नसैहौं

भाग - ६
तुलसीदास तुलना के योग्य नहीं हैं। यह अद्भुत काम है। उसी वैदिक संस्कृति, परंपरा और विकास के संसाधनों का हिन्दी में वर्णन किया गोस्वामी जी ने, जो सबके समझने लायक है। तुलसीदासजी ने कहा - 
जासू राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी। 
वह राजा नरक में जाएगा, जिसकी प्रजा को दुख होगा। अब बताइए, कितने मंत्री और अमुक-अमुक नरक में जाएंगे। कभी-कभी लगता है, जेल में तो अब जगह ही नहीं रहेगी, थोड़े दिनों में नेताओं से भर जाएगा। उस समय आज से सैकड़ों वर्ष पहले उन्होंने कहा, 
जाके प्रिय न राम वैदेही 
तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही। 
यह बड़ी विचित्र परंपरा है। हमें संपूर्ण विकास के लिए प्रयास करना है। विकास के लिए आप प्रयास करें, तो आप रामायण, सीता और नाना पुराणों से पूछकर करें, मनमानी न करें। अपने भोजन, वाणी, चरित्र, परिवार की मर्यादा को ध्यान में रखें। 
राम जब आए होंगे विजयी होकर अयोध्या में, तब कितनी अपरंपार भीड़ हुई होगी। आज उनका प्राणबगल्लभ आया है 14 साल बाद। कितनी तड़पन होगी, कैसे लोग मिलना चाह रहे होंगेे, गले लगाना चाह रहे होंगे, चरणों में लिपटना चाह रहे होंगे, क्या देना चाह रहे होंगे, क्या मर्यादित स्वरूप है। राम जी ने सबसे पहले दंडवत प्रणाम गुरु वशिष्ठ को किया। राम जी ने ब्राह्मणों को दंडवत किया। माताओं को प्रणाम किया। इसके बाद लक्ष्मण जी ने किया। फिर भरत जी ने और फिर शत्रुघ्न जी ने राम जी को प्रणाम किया। इस क्रम में वर्णन किया गया है। इससे ज्यादा मर्यादा कहां है? बिना मर्यादा के कुछ नहीं चलने वाला। परिवार नहीं, राज्य नहीं, राष्ट्र नहीं, कुछ और चलने वाला है क्या? सारी मर्यादाएं टूट रही हैं। आप पढ़ें, तो समझ में आएगा कि रामराज्य कैसे होता है। निश्चित रूप से इस ग्रंथ को दुनिया का संविधान होना चाहिए और आज नहीं कल, यह जब होगा, तभी रामराज्य आएगा। तभी यह काम बनेगा। कभी भी प्रतियोगिता होगी, तो विश्वगुरु भारत ही होगा।  
यह रामचरित मानस का देश है। हम अपने उस पुराने स्वरूप को प्राप्त करेंगे, इसके लिए प्रयास करें। गोस्वामी जी ने कहा, रावण का इतना बड़ा ऐश्वर्य था, अब एक आदमी रोने वाला नहीं है। त्रेता में भी राम की जयजयकार हुई और आज भी रामजी की ही जयजयकार होती है। 
तुलसीदास जी अपना जीवन रामजी की कृपा से ही मानते हैं। हम लोग भी ऐसा ही मानते हैं, अपने साधन को महत्व नहीं देते हैं। गोस्वामी जी मानते हैं कि हमें जो कुछ भी मिला - 
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।। 
गोस्वामी जी के चरणों में प्रणाम करते हुए हम उनसे कुछ मांग नहीं रहे। जैसे उन्होंने रामजी से मांगा था, वैसे ही हम लोग भी मांग लेते हैं। उन्होंने रामजी से कहा था, हमें कुछ नहीं चाहिए, जैसे कामी पुरुष को नारी बहुत अच्छी लगती है। वह उसको प्यार करता है। उसके लिए बड़ी भावनाएं होती हैं, वो उसके प्रेमास्पद होती है, लेकिन तभी तक जब तक काम की वृत्ति मन में होती है। लोभ की जब तक वृत्ति होती है, तब तक लोभी को धन अच्छा लगता है, हमेशा नहीं अच्छा लगता। यदि काम हमेशा प्रिय होता, तो पति-पत्नी का झगड़ा नहीं होता और तलाक नहीं होता। ईश्वर सबकी आत्मा है और वह हमेशा प्रिय है, परम प्रेमास्पद है। वेदांत का सिद्धांत है - औरों से तो हम थोड़ी देर के लिए प्रेम करते हैं, मतलब से करते हैं। तुलसीदासजी ने कहा कि रामजी आप हमेशा मुझे प्रिय लगे, यही प्रार्थना है। हम सभी लोगों की भी यही प्रार्थना है। 
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।। 
यह विकास की पराकाष्ठा है, बाकी हमें रोटी, कपड़ा तो मिलना ही मिलना है। तुलसीदास को भी मिलता ही था, ऋषियों को भी मिलता ही था। 
तुलसीदास जी ने कहा था - 
घर-घर मांगे टूप पुनि भूपति पूजे पांय, 
सो तुलसी तब राम बिनु सो अब राम सहाय। 
एक दिन तुलसी टुकड़ा मांगता था और आज राजा चरणों की धूलि के लिए लालायित है, तो हमें और आप सभी लोगों को सबकुछ इसी लोक में ही मिलेगा। हमारा धर्म तो ऐसा नहीं है, जो केवल परलोक की बात करता है। धर्म का तो मतलब ही है, जो अभ्युदय भी दे।
क्रमश:

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