Monday, 29 October 2018

श्रीराम मार्ग पर चलें सदा

भाग - ९
चैतन्य महाप्रभु ने कहा कि यदि किसी को भक्त बनना है, भगवान का भजन करना है, तो मान की इच्छा छोड़ो और मान देने की इच्छा से जुड़ो। हमें दूसरों को मान देना है। हमें मान चाहिए, हम चाहते हैं कि सब लोग हमारी जयजयकार करें। ऐसे महान भाव के चैतन्य महाप्रभु प्रचारक हैं। मान देने की परंपरा, मर्यादा निभाने की परंपरा बच्चों को शुरू से ही बतलानी चाहिए। जब पिता जी आएं, तो आप खड़े हो जाओ, उन्हें प्रणाम करो, ये शुरू से सिखाना होगा। पिता जी बड़े हैं, उनका मान-सम्मान करें। इससे समाज जुड़ेगा, मानवता का विकास होगा। सार्थकता बढ़ेगी। इसलिए भगवान राम जी जब उठते हैं, तो सबसे पहले भगवान को प्रणाम करके, जो कुलदेवता हैं, माता-पिता को, ब्राह्मणों को, जितने भी बड़े लोग हैं, सबको प्रणाम करते हैं। 
प्रणाम बहुत-बहुत बड़ी साधना है। प्रणाम समाज का बहुत बड़ा जोडऩे वाला द्रव है। सम्मान ही आदमी को चाहिए। सारे लोग भोजन ही नहीं मांगते, कपड़ा ही नहीं मांगते, किन्तु सम्मान सबको अच्छा लगता है। आज भी लोग हाथ जुड़वाते हैं, जो हाथ जुड़वाने, प्रणाम करवाने का उपक्रम चल रहा है, किन्तु अधिकांश परिवारों में अब बंद हो रहा है। बच्चों को नहीं सिखलाते और स्वयं भी नहीं करते हैं। अब तो लोग घुटने में ही हाथ लगा देते हैं। यह कोई बात हुई क्या? कुछ दिनों में पेट में लगा देंगे, उसके बाद छाती में लगा देंगे, गला में लगा देंगे, सिर में लगा देंगे, ये कोई प्रणाम की पद्धति हुई क्या? वरिष्ठ खड़ा है और छोटा ही बैठ गया। ये मर्यादा की बात हुई क्या? 
पूरी दुनिया का मूल तंत्र है प्रणाम, हमें किसी को पिघलाना है, हमें किसी को अपना बनाना है, तो उसको हम प्रणाम करें और सब बातें तो गौण हैं। ये शिक्षा देनी ही चाहिए कि जब तक बड़े खड़े हैं, तब तक छोटों को बैठना नहीं है। कैसे हाथ जोडऩा है, कैसे चरण स्पर्श करना है। किस तरह से उन्हें बोलना है कि जी प्रणाम, हाथ जोडक़र। ये सिखाना घर के विद्यालय का कार्य है। 
अभी तो आधुनिक शिक्षा पद्धति में बच्चे बैठे रहते हैं और अध्यापक खड़े रहकर पढ़ाते हैं। बतलाइए, अब क्या शिक्षा होगी। अब कक्षा में हाथ नहीं जोडऩा है, बस अपनी जगह खड़े हो जाइए और फिर बैठ जाइए, बेचारा अध्यापक खड़ा रहेगा। उसे देर तक खड़ा रहना है। ऐसा सेना में होगा क्या? ऐसा तो नहीं होगा। जितनी बार बड़ा अधिकारी जाता है, उतनी बार छोटा अधिकारी सैल्यूट मारता है। 
सभी लोगों को बच्चों को सैनिक बनाना है। जो सेना में प्रोटोकॉल है, केवल वही नहीं, जो संतों में प्रोटोकॉल है, वो भी बताना है। जो मार्यादाएं सेना में हैं, जो मर्यादाएं दूसरे संस्थानों में हैं, उसके साथ ही हमें संतत्व की शिक्षा भी देनी चाहिए। जो हमें आदर देता है, मर्यादा के साथ सारे व्यवहार करता है, वही तो संत है। शुरू से ही शिक्षा हो और शिक्षा की जो विवेचना है, वो ऐसे दी जाए कि अपरोक्ष ज्ञान हो जाए। अपनों के साथ दूसरों को भी प्रेरित करने की भी शिक्षा देनी है। भगवान की दया से जो बड़ी प्रसिद्ध है कि राम जी जब उठते थे, तब सभी बड़ों को प्रणाम करते थे। 
गुरु माने बड़ा होता है। व्याकरण में एक सूत्र है - दीर्घं च - जो बड़ा है अपने से, वो अपना गुरु है। जो आयु में बड़ा है, वो भी गुरु है। धन में जो बड़ा है, वो गुरु है। जो अपने से रूप में बड़ा है, बल में बड़ा है, प्रभाव में बड़ा है, तो उसको प्रणाम कीजिए। जिसको बड़प्पन प्राप्त है, वो गुरु है। 
अभी तो लोगों को यही समझ नहीं आ रहा है कि गुरुओं को कैसे प्रणाम किया जाए।  ये वो देश है, जहां प्रणाम करके लोग पत्थर को भी पिघला देते हैं। द्वारिकाधीश तो सुदामा को प्रणाम करते हैं। द्वारिकाधीश को समग्र ऐश्वर्य प्राप्त है, जो समृद्धशाली हैं, वो भी अपने गरीब ब्राह्मण संत साथी को प्रणाम करते हैं। इस तरह की प्रेम की वर्षा और मर्यादा की संस्थापना अनुकरणीय है, अद्भुत है और दूसरा इसका कोई उदाहरण नहीं है। भगवान की दया से जीवन के इन महत्वपूर्ण तथ्यों को बच्चों को विद्यालय जाने से पहले और बाद में भी बार-बार बतला देना चाहिए। 
क्रमश:

श्रीराम मार्ग पर चलें सदा

भाग - ८
सनातन धर्म में दूसरों को यश देना आवश्यक है। दूसरों को यश नहीं देने से बिखराव होता है। जो दूसरों को यश दे, उसे ही यशोदा कहते हैं। संत जन कहते हैं और शास्त्रों में भी वर्णित है कि सबको यश, प्रशंसा मिलती है किसी कार्य की सफलता के बाद, यही यश है। उसे आदमी निगलना चाहता है कि हमने ही किया। समुदाय को सहयोगियों में यश का बंटवारा करने की प्रवृत्ति सिकुड़ती जा रही है, जबकि राम जी सबको ही यश देते हैं। 
आज हम देखते हैं कि जो बड़े नेता हैं, जो राष्ट्राध्यक्ष हैं, जो बड़े अधिकारी हैं, जो भी जहां बड़प्पन या बड़े पद से जुड़े हैं, वो इस मामले में कंजूसी कर देते हैं। अच्छे संसाधन व अच्छी शिक्षा देने में कभी कंजूसी न करें। आपको जो यश मिला है, उसका बंटवारा करें। इसी को यशोदा कहते हैं। 
संत शिरोमणि डोंगरे जी कहते थे, जब कोई आता था नंद जी के घर बधाई देने के लिए, तब यशोदा जी कहती थीं कि आपके ही आशीर्वाद से लल्ला कितना सुंदर, कितना संस्कारी, कितना मनमोहक हुआ है, जो वैभव इसके रोम-रोम में आया है, आपके  आशीर्वाद से ही है। आपने मंगल कामना की, आपने भगवान से कामना की, आपने संयम-नियम किया, आपने उपासना की, इस बच्चे को आने के लिए। नहीं तो मेरी पात्रता नहीं दिख रही थी कि ये मेरे यहां आते। वो सबको यश देती थीं, इसलिए उनका नाम रख दिया यशोदा। जो धन देता है, उसे धनद बोलते हैं। जो कंबल देता है, उसे कंबलदा कहते हैं, ऐसे ही जो यश दे, उसे यशोदा कहते हैं। तो शुरू से बच्चों को ये शिक्षा दी जाए, जीवन के विकास के लिए यह ज्ञान का बीजारोपण है। जीवन के महान विकसित महल की यह बहुत मजबूत प्रशंसनीय नींव है कि हम बच्चों को शुरू से ही ये सिखलाएं कि कैसे यश को बांटना, धन को बांटना, ज्ञान को बांटना, भोजन को बांटना, अपने सबकुछ को बांटना है, जो उपलब्धियां हैं, उनको बांटना है। फिर आदमी राम राज्य का रक्षक, सिपाही होता है। इसी सूत्र को लेकर भरत जी ने राम जी की चरण पादुका को सिंहासन पर स्थापित किया। 
अभी जो दृश्य हैं, बहुत-बहुत विकृतियां हैं। कोई दूसरों को कुछ भी देना नहीं चाहता। दूसरों को कोई महत्व देना नहीं चाहता। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि उनको बचपन से यह शिक्षा नहीं दी गई। हमारा इतिहास इसका उज्ज्वल उदाहरण है, अनुपम प्रकाशक है। जब लोगों को उचित शिक्षा दी जाती थी, तभी सम्मिलित या संयुक्त परिवार चलते थे। सम्मिलित परिवार और तमाम संगठनों के टूटने का एकमात्र यही कारण है। मिलकर रहने की शिक्षा शास्त्रों के आधार पर दी जाती थी, उदाहरण बतलाए जाते थे कि देखिए लोगों ने दूसरों को कैसे यश दिया। अयोध्या लौटने के बाद राम जी ने वानरों को बहुत महत्व दिया। गुरु वशिष्ठ से कहा कि ये नहीं होते, तो हम कुछ नहीं कर पाते। इन्होंने ही हमारा जो युद्ध स्वरूप जहाज था, उसमें बेड़ा का काम किया। थामे रखने का, भटकने नहीं देने का, बहने नहीं देने का काम इन्होंने किया, ये हमारे मित्र हैं। 
क्या बात है, कहां राम और कहां ये उनके मित्र वानर, भालू इत्यादि। कहीं से कोई तुलना नहीं है, कहीं से कोई बराबरी नहीं है। बराबरी में मित्रता होती है। धन की बराबरी, रूप की बराबरी, प्रभाव की बराबरी, यश की बराबरी। कहीं से भी इन वानरों की भगवान राम जी से बराबरी नहीं है, किन्तु भगवान ने कहा, ये मेरे मित्र हैं। 
राम जी ने कहा - 
ए सब सखा सुनहू मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेेरे।।
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।
ये कैसी मित्रता है, कैसी समानता है? भगवान संकेत दे रहे हैं कि यदि इनको हम महत्व नहीं देंगे, तो संपूर्ण संस्कृति विद्रूप हो जाएगी। मानवता ही लज्जित हो जाएगी, क्योंकि इन्होंने मेरे लिए अपने प्राणों को हथेली पर रखकर प्रयास किया, तो हमको कहना है कि हमने जो विजय प्राप्त किया, हमने जो ये सारा सुयश प्राप्त किया, आप उसमें बड़े सहयोगी हैं, सबसे बड़े भागीदार हैं। 
मैं इन आख्यानों के माध्यम से कहना चाह रहा हूं कि हमें अपने बच्चों को बुढ़ापे और जवानी में नहीं, बाल्यावस्था से ही संपूर्ण उपलब्धियों को परस्पर बांट करके संपूर्ण जीवन जीने की शिक्षा देनी चाहिए। इसका अभाव हो गया है। अभी तो दुनिया का सबसे बड़ा सिद्धांत हो गया है, बांटो और राज करो। दूसरों को निगल जाओ और अपने अस्तित्व को बरकरार रखो। हमें मतलब नहीं है कि आपका क्या होगा। हमें मतलब इसी से है, हम सबसे बड़े हैं, हम सबसे सुंदर हैं, सबसे धनवान हैं, संपूर्ण संसार में हमारा दबदबा है, आपका क्या हो रहा है, इससे हमें क्या मतलब? इसलिए अपने देश में इस पद्धति का जीवन, जो ये वैदिक जीवन पद्धति है, जो पौराणिक, ऐतिहासिक हमारी जीवन पद्धति है, जिसका प्रचलन अनादि काल से हमारे परिवार और संस्कृति में था। कहां कृष्ण और कहां सुदामा? कहां ये राजाधिराजा और कहां वो संत, गरीब ब्राह्मण, जिसके पैरों में कुछ नहीं होता था। उसके सामने लोग नतमस्तक होते थे। मालूम है, जैसे कि हम राज्य साम्राज्य के विस्तार में तत्पर हैं, ठीक वैसे ही ब्राह्मण भी तत्पर हैं। वैसे ही हमारे गुरु भी, संत भी तत्पर हैं, हम सब एक हैं, कोई भेद नहीं। ये हमारा बहुत बड़ा पक्ष है, जिसको इसी तरह से बड़े परिवारों में संस्कारी परिवारों में शुरू से ये बात बताई जाती है कि कैसे हमारा जीवन हो। सम्मान देने का भाव बच्चों में शुरू से डालना चाहिए। इसे ही अंग्रेजी में प्रोटोकाल कहते हैं - क्या किसकी मर्यादा है। आज मैं देखता हूं - पिता जी खड़े रहते हैं और बेटा बैठ जाता है। बतलाइए, कहीं ऐसा होता है क्या कि पुलिस का बड़ा अधिकारी खड़ा है और छोटा अधिकारी बैठ जाए। ऐसा तो नहीं होता, ऐसा कोर्ट में भी नहीं होता। सेना में नहीं होता, बड़े संगठन में ऐसा होगा क्या? बड़ा अधिकारी महाप्रबंधक खड़ा हो और द्वारपाल बैठ जाए, ऐसा तो नहीं होता है। कहीं भी नहीं होता। बड़ा जब तक खड़ा है, तब तक छोटा भी खड़ा रहेगा। बड़ा यदि बैठा है, तो छोटा भी बैठ सकता है, किन्तु पूछ कर बैठेगा। आज सम्मान देने का भाव बहुत ही कम हो रहा है, प्रोटोकॉल लोग समझ ही नहीं रहे हैं। 
अमानिना मानदेय: कीर्तनीय: सदा हरि:।
क्रमश:

श्रीराम मार्ग पर चलें सदा

भाग - ७ 
ये जीवन की, सनातन धर्म की परंपरा है, जो वेदों से प्रेरित होती है। ईश्वर भी ऐसा ही करता है - बांटकर शक्ति का वितरण करता है। वायु देव करते हैं, वरुण देव करते हैं। पृथ्वी कभी नहीं बोलती किसी गरीब को, किसी छोटी जाति के आदमी को, किसी मूर्ख को, किसी कुरूप को कि यहां तो ऋषि बैठते हैं, तो तू यहां क्यों बैठा है, यहां तो कोई धनवान बैठता है, तू क्यों बैठा है। वैसे ही वायु देव, वरुण देव पक्षपात की दृष्टि से देखने लग जाएं, विषम दृष्टि से शक्ति देने लग जाएं, तो संसार का सत्यानाश हो जाएगा। 
केवल भोजन ही नहीं, जो हमें ज्ञान प्राप्त हुआ है, जो हमें यश प्राप्त हुआ है और संसार के जो दूसरे संसाधन और बल प्राप्त हुए हैं, उनको भी हमें बांटना चाहिए। सनातन धर्म में प्रकिया रही है कि गुरु से पढक़र आपस में बड़े व समझदार लोग अपने साथियों के साथ मिलकर ज्ञान का वितरण करते हैं। मैंने भी पढ़ते समय अपने साथ पढऩे वालों को उन बातों को समझाया-बतलाया-पढ़ाया, जो मैंने अपने गुरुओं से सीखा। यह ज्ञान बांटने की प्रशस्त प्रक्रिया है।
गुरु वशिष्ठ से पढऩे के बाद राम जी भी यही करते थे। वे अपने साथियों के साथ, अपने भाइयों के साथ, अपने परिजन के साथ बैठकर अपने ज्ञान का वितरण करते हैं। चर्चा होती है कि हमने ऐसा समझा, आपने कैसा समझा। आपको वह समझ में आ गया क्या, जो गुरुजी ने समझाया, यदि नहीं आया, तो मैं जो कह रहा हूं, आप प्रयास करें, ग्रहण करें। ज्ञान का वितरण राम जी अपने सभी भाइयों के साथ करते थे। गुरु वशिष्ठ से पढऩे के बाद राम जी अपने साथियों, अपने भाइयों के साथ बैठकर उस ज्ञान का बंटवारा करते थे। बैठकर बोलते थे कि हम ऐसा समझे हैं, आप भी समझिए और आप समझ गए हों, तो हमें भी सुनाइए। राम जी ऐसा नहीं मानते कि मुझे समझ में आ गया, मुझे इससे क्या मतलब कि दूसरों की समझ में आए या न आए। 
आज के आधुनिक संस्थानों में भी यह प्रक्रिया प्रचलित की जा रही है कि बच्चों के अध्ययन समूह बना दिए जाते हैं। बच्चे मिलकर चर्चा करें और मिलकर पढ़ें, मिलकर समझें। एक छात्र ने समझ लिया, तो वह दूसरों को भी समझा दे। जिसने जो समझा, वो बताए। अपनी समझ का वितरण करे। महामानव होने के लिए, जीवन में सफल होने के लिए तथ्यों को मिलकर संग्रहित करना है। उद्देश्य केवल भोजन ही नहीं, कपड़ा ही नहीं, ज्ञान भी है। ज्ञान को भी आपको बांटना है। याद करके उस ज्ञान को अपने साथियों में बांटिए। भगवान की दया से उन्हें भी उस ज्ञान से जोडि़ए, जिस ज्ञान को आपने प्राप्त कर लिया है। जब हम संस्कृत पढ़ते थे, तो बोलते थे कि हम लगा रहे हैं पाठ। जो पढ़ा है, उसे दूसरों से पूछना, दूसरों को सुनाना और अपनी समझ को परिपक्व बनाते थे। 
आज अनेक लोग अपनी नोट बुक दूसरों को नहीं देते हैं। कोशिश करते हैं कि केवल हमें समझ में आए, दूसरों को नहीं आए, तो कब राष्ट्र का विकास होगा, कब मानवता का विकास होगा? हर कोई यही सिद्ध करने में लगा है कि हमने ही सबकुछ किया, हमारे ही प्रयास से देश में हमारी पार्टी जीती है। हमारे ही प्रयास से यह प्रांत चला और हमने खूब पैसा कमाया, हमारे ही प्रयास से इस परिवार को सुयश प्राप्त हुआ। हर आदमी जीवन के जो लाभ हैं, उन्हें अपने कृतित्व और अपने संकल्प और अपनी चेष्टा के साथ जोडक़र अपने वर्तमान जीवन को, अपने भविष्य को कुंठित कर देता है। 
शुरू से ही शिक्षा दी जाए कि आपने ही सबकुछ नहीं किया, दूसरों ने भी किया है। सीखना चाहिए - रघुवंश के विकास से। रघुवंश के उत्कर्ष का, उसकी अत्यंत विशिष्टता का यही कारण था कि रघुवंशियों का कोई जोड़ नहीं था। राम जी जब वन विहार के लिए भी जाते थे, तो सभी मित्रों को यशस्वी बनाते हैं कि मैंने ही नहीं मारा, सभी लोगों ने मिलकर मारा है। सभी लोगों की सहायता से ही ऐसा हो पाया, आप सभी नहीं होते, तो ऐसा नहीं हो पाता। 
क्रमश:

Friday, 19 October 2018


श्रीराम मार्ग पर चलें सदा

भाग - ६ 
अब यह बहुत बड़ा प्रदूषण हो गया है, शुरू से ही चोरी से खाकर, चोरी से देखकर चोरी से जाकर, दूसरों को छोडक़र संपूर्ण जीवन को जीने की प्रक्रिया बनती जा रही है, जिसके कारण समाज टूट रहा है। समाज गंदा हो रहा है, उसके उपयोगी संगठन टूटे रहे हैं। इस बात की शिक्षा जैसे राम जी ने पिता दशरथ जी को दी, ठीक उसी तरह से भाई भरत जी को भी दी। अयोध्यावासियों और संसार को संदेश दिया कि बांटकर खाओ।
एक दिन हमारे एक भक्त ने बतलाया, जो पुलिस की सेवा में हैं, कि मैं एक दिन रसगुल्ले लाया और पत्नी से कहा, ‘सबको दीजिए एक-एक रसगुल्ला।’ सभी लोग हैं परिवार में, बड़ा परिवार है। तीन भाइयों का परिवार है, किन्तु उनकी पत्नी ने अपने बेटे को दो रसगुल्ले दे दिए और बाकी सबको एक-एक दिया। पति का इतना पवित्र जीवन है कि लोग चर्चा करते हैं। अब वे पुलिस सेवा से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं, अद्भुत प्रेरक है उनका जीवन। उनका नाम है देवेन्द्र राय। देवेन्द्र राय ने पत्नी को बुलाया और पूछा, ‘आपको अपने बेटे को महामानव बनाना है या राक्षस बनाना है?’ 
पत्नी ने पूछा, ‘आप ये क्या पूछ रहे हैं? ये क्या बात हुई?’
देवेन्द्र राय ने कहा, ‘जब मै खरीद कर लाया हूं और मैंने ही कहा कि सभी को एक-एक रसगुल्ला दिया जाए, तो आपने अपने बेटे को दो रसगुल्ला देकर उसे क्या बनाया?’ 
उसकी मां ही चोरी कर रही है, पक्षपात कर रही है, तो फिर क्या होगा? एक अतिरिक्त रसगुल्ला ज्ञान बढ़ा देगा क्या, उसके पुण्य को बढ़ा देगा क्या, बेटे को पहलवान बना देगा क्या, उसका भाग्य बना देगा क्या? एक अतिरिक्त रसगुल्ला जीवन को कौन-सी विशिष्ट विधा में पारंगत बना देगा। आपकी यह पक्षतापी बुद्धि, आपकी यह चोरी की बुद्धि, आपकी यह धृतराष्ट्र वाली बुद्धि आपको भी राक्षस बना देगी और आपके बेटे को भी बना देगी। 
ऐसे उन्होंने अपनी पत्नी को झंकझोरा कि दुबारा वो पक्षपात नहीं कर सकीं। आज उनके दोनों बेटे जीवन में सबके लिए काम कर रहे हैं, वो अनुकरणीय हैं। निश्चित रूप से पिता की शिक्षा का प्रभाव है। 
परिपालन की राम जी की पद्धति है, उसके माध्यम से मैं बताना चाहता हूं कि प्रारंभ से ही बहुत बड़ी दृष्टि वाला होकर, जीवन के उपयोग को, जीवन की सार्थकता को, जीवन के बड़प्पन को साबित करने का संकल्प लेना चाहिए कि सदैव बांटकर खाना है। मुंह के समान बांटकर खाना है। 
जबकि आज शिक्षा ये हो रही कि कैसे छिपाकर अपने बेटे को बहुत-बहुत दे दें। मोक्ष की जो अवस्था है, उसमें कहा जाता है कि भोगे साम्यम्। भगवान सबकुछ अपने बराबर कर देते हैं। कौन मालिक होगा, जो अपने जैसा नौकरों को खिलाएगा। कौन मालिक होगा, जो अपने जैसा सबको पहनाएगा? 
एक हमारे भक्त हैं, बहुत अच्छा जीवन है उनका हीरे की दुनिया में। लगभग ६००० कर्मचारी उनकी फेक्ट्री में काम करते हैं। मेरे संपर्क में पूरे विश्व में उनके जैसा कोई नहीं है - गोविंदभाई ढोलकिया। उनका नियम है कि वो अपने व्यापार में कोई गलत काम नहीं करते हैं। पांच से छह लाख रुपये रोज सफेद धन दान करते हैं। ये उनकी विशेषता है कि उनके यहां ६००० लोगों का भोजन साथ बनता है। वे और उनके सभी पार्टनर भी भोजन साथ करते हैं, एक ही भोजन सभी करते हैं और अलग से किसी को विशेष कुछ नहीं मिलता। एक हरी मिर्च भी किसी को अलग से विशेष रूप से नहीं मिलती है। ऐसे-ऐसे लोग काम करते हैं उनके यहां, जिनकी लाखों रुपए तनख्वाह है। खूब प्रतिष्ठा है, किन्तु सभी एक समान भोजन करते हैं। 
अभी तो कई लोग इसीलिए कमा रहे हैं कि अलग से खाएं, दूसरों से अलग पहनें, दूसरों से अलग घूमें, दूसरों से अलग आनंद करें, दूसरों से अलग जीवन जीएं। ऐसे लोग सोचते हैं कि हम कैसे वो वस्त्र पहनेंगे, जो गरीब पहनते हैं। लोग लगे हैं कि हमारा सबकुछ अलग हो, खाना-पीना, रहना, आभूषण अलग हो, तभी तो हमारे कमाने की सार्थकता है, जबकि वास्तव में मनुष्य जीवन की सार्थकता तभी होगी, जब हम बांटकर खाएंगे। 
क्रमश:

श्रीराम मार्ग पर चलें सदा

भाग - ५ 
बच्चों को बांटकर खाने की आदत हो। उसका व्याख्यान, उसका प्रयोग और उसका हर दृष्टि से विश्लेषण करने की आवश्यकता है कि हम बांट करके खाएं। इसलिए जो मोक्ष का बड़ा स्वरूप है, उसका यही अर्थ है कि भोग में साम्यता होती है। अपने प्रयास से जब जीव मुक्त हो जाता है, तो वह भगवान के बराबर हो जाता है, उसका रूप और उसकी आवाज, इत्यादि सब भगवान स्वरूप हो जाता है। इतना ही नहीं, उसका भोग भी भगवान जैसा हो जाता है। भगवान अपने धाम में जो ग्रहण करते हैं, वही सभी मुक्त जीवों को भी मिलता है। तो भोजन की जो समानता है, भोग की जो समानता, वो बच्चों को शुरू से ही देना चाहिए, जबकि परिवारों में अब बड़ी विकृति आ रही है कि जो ज्यादा कमाने वाले सदस्य हैं, वो अपने बच्चों को ज्यादा खिला देते हैं, कपड़ा भी अलग से, उनकी देख-रेख भी अलग से करते हैं। जो घर में काम या सेवा करने वाले सेवक हैं, उनका भी भोजन अलग कर देते हैं। कई परिवारों में भोजन भी अलग-अलग पकने लगता है। ये जो पद्धति है, नहीं बांटकर खाने वाली, भोजन की समानता से दूर रहने वाली और छिपाकर-छिपकर खाने वाली, ये हमारे जीवन को कभी सार्वभौम स्वरूप नहीं दे पाती। वो उस स्वरूप को नहीं देती, जिसको देखकर मानवता गदगद हो जाए, शरीर तृप्त हो जाए और उसका सौंदर्य भी बढ़ जाए, उसकी व्यापकता बढ़ जाए। 
हमारे बच्चों के प्रशिक्षण की बड़ी अद्भुत बात है। हम सब लोगों को ये ध्यान रखना चाहिए कि जब हम बच्चों को खुशी दें, भोजन, कपड़ा, सम्मान, स्नेह दें, शिक्षा दें, तो उसमें ध्यान रखा जाए कि उसके साथ समानता का व्यवहार हो, उससे उसे उचित संदेश मिले। उसे कहा भी जाए कि बांट करके खाना चाहिए और बांटकर जो खाता है, वही बड़ा मनुष्य होता है। अकेले में नहीं खाना चाहिए। 
इसी अभिप्राय में दान की भी महिमा है, आप कमाए हैं, तो दीजिए दूसरों को। महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है कि जब भरत जी गए राम जी को मनाने के लिए तब राम जी से कहा कि भरत ये तो बतलाओ आपका चेहरा म्लान क्यों है, मुरझाया हुआ है, चेहरा क्यों दिव्य नहीं है, उसकी रशमियां क्यों ओझल हो रही हैं, ये क्या मामला है? राम जी ने कई तरह के प्रश्न किए। ये वाल्मीकि रामायण में है। राम जी ने भरत जी से पूछा, कहीं ऐसा तो नहीं है कि आपके यहां गायों की सेवा बंद हो गई हो। ऐसा तो नहीं कि आपके यहां वेद ध्वनि नहीं हो रही हो, यज्ञ नहीं हो रहे हों? ऐसा तो नहीं है कि आप भगवान और माता-पिता का आदर नहीं कर रहे, ब्राह्मण का आदर नहीं कर रहे, गायों का नहीं कर रहे? अनेक ऐसे प्रश्न वाल्मीकि रामायण में वर्णित हैं, जो राम जी ने भरत जी की म्लानता को लेकर शंका की थी, उन्होंने अंत में यह भी पूछा था कि ऐसा तो नहीं है कि तुम कहीं अकेले ही तो नहीं खाते हो। 
बांटकर नहीं खाने से भी चेहरा म्लान होता है। बांटकर के खाना चाहिए, नहीं तो कभी भी मनुष्यता विकसित नहीं होती, वरदान नहीं बन पाती, प्रेरक नहीं बन पाती। 
वाल्मीकि रामायण के इस प्रसंग को तुलसीदास जी ने तुरंत ले लिया और बड़े ही मनोरम ढंग से प्रस्तुत किया। राम जी चरण पादुका देकर भरत जी को विदा कर रहे हैं। तुलसीदास जी ने लिखा है कि भरत जी सोच रहे थे, चरण पादुका तो मिल गई, किन्तु वे चिंतित थे कि चरण पादुका को राजा बनाकर १४ वर्षों तक कैसे रहूंगा। भगवान ने चरण पादुका तो दे दिया, लेकिन चरण पादुका रखने से ही राज्य की सेवा कैसे की जाएगी। १४ वर्षों तक चरण पादुका जी को राजा मानकर, उन्हीं से आज्ञा लेकर भरत जी ने राम राज्य की नींव रखी। राम राज्य की सेवा की और खूब-खूब यशस्वी और कारगर राज्य विकसित किया। भरत जी इस बात के लिए सूत्र चाहते थे। भरत जी चरण पदुका को अत्यंत आदर के साथ सिर पर धारण करके राम जी के चरणों में ध्यान लगाए हुए थे कि अब भइया, हमें बतलाएंगे कि वो क्या सूत्र है। राम राज्य का सूत्र केवल सेना नहीं, बड़े-बड़े हथियार और तमाम तरह की गाडिय़ां नहीं, और तमाम तरह के जीतने के, सुयश के जो संसाधन होते हैं, वो नहीं हैं। रामराज्य तभी स्थापित होगा, जब हम बांटकर खाएंगे। हम भोजन में समानता का परिचय देंगे, तो वहां तुलसीदास जी ने एक चौपाई लिख दिया कि मुखिया को कैसा होना चाहिए, मुखिया जो परिवार का बड़ा है, अपने संस्थान का बड़ा है। तो उसके लिए वाल्मीकि रामायण से प्रेरित चौपाई है। रामजी ने सूत्र दिया कि यदि तुम्हें रामराज्य स्थापित करना है, यदि तुम्हें यशस्वी राजा बनना है, तो चरण पादुका के माध्यम से, सेवा के माध्यम से, तो इसको ध्यान में रखो - 
मुखिया मुखु सो चाहिए, खान पान कहुं एक।
पालइ-पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक।।
मुखिया को मुख के समान होना चाहिए। जैसे मुख खाता है, जिससे पोषक सामग्री शरीर के भीतर जाती है और उससे जो ऊर्जा मिलती है, रक्त बनता है, तमाम तरह के पोषक तत्व बनते हैं, तो सारे पोषक तत्व मुंह में नहीं आ जाते। जिस अंग को जितनी जरूरत है, बिना भेदभाव किए, बिना विषमता किए, सभी अंगों को आवश्यकता अनुरूप शक्ति-पोषकता प्राप्त होती है। सारा पोषक तत्व केवल मुंह ही रखने लगे, तो मुंह इतना बड़ा हो जाएगा, राक्षस जैसा दिखने लगेगा, भयावह हो जाएगा। हमें यह उपदेश बार-बार देना चाहिए कि बच्चे बांटकर खाना खाएं, सभी तो अपने भाई हैं, सभी तो अपने परिवार के लोग हैं, सबके साथ खेलते हो, तो खाओ बांटकर, तो हमारा जीवन वरदान हो जाएगा - अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपनी जाति के लिए और अपने राष्ट्र के लिए, संपूर्ण मानवता के लिए। 
क्रमश:

श्रीराम मार्ग पर चलें सदा

भाग - ४ 
हमें भोग के रूप में उसे नहीं लेना है। केवल शरीर बढ़ाना है, सुंदरता बढ़ाना है, इसके लिए नहीं लेना है। हमें भोजन भगवान के जूठे के रूप में लेना है। इससे संपूर्ण जीवन धीरे-धीरे यज्ञ से जुड़ जाएगा, वह कभी भोगी नहीं होगा। वह भगवान का जूठा ग्रहण करके परममानव ही रहेगा, उसकी तमाम बुरी आदतें समाप्त हो जाएंगी।
तो पिता राम जी को बुला रहे हैं, रामचरितमानस में लिखा है तुलसीदास जी ने - भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा। 
भोजन के लिए दशरथ जी बुला रहे हैं, किन्तु अपने साथियों को छोडक़र राम जी आ नहीं रहे हैं। बाल मित्रों के साथ मिलकर अपने आनंद को बढ़ा रहे हैं, उनके साथ मिलकर वे अपने शरीर की, स्वास्थ्य की तमाम गतिविधियों को मजबूत बना रहे हैं। साथियों को छोडक़र नहीं आ रहे हैं। जो राम मर्यादा के, संस्कारों के आदर्श हैं, वे देवता के तुल्य पिता की आज्ञा का पालन नहीं कर रहे हैं। ये तो बहुत गलत है, ऐसा कैसे कर रहे हैं, यहां तक कि कौशल्या जी को कहा कि बुलाकर लाइए। कौशल्या जी जब जाती हैं, तो राम जी कभी भाग जाते हैं, कभी ओझल हो जाते हैं। तो इस बात को देखा राम जी ने बहुत देर तक कि पिता जी बुला रहे हैं, तो फिर आ गए। शरीर पर धूली लगी हुई है। सारा बाहर-भीतर ऊपर-नीचे धूल कण लिपटे हुए हैं।
विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है, हर आदमी को धूल में लेटने का अभ्यास करना चाहिए, तब उसे लगेगा कि स्वाभाविक जीवन क्या है, पृथ्वी से जुड़ा हुआ जीवन क्या है। अभी हर आदमी हवाई जहाज वाली यात्रा करके बड़ा होना चाहता है। पृथ्वी से ही सभी अन्न निकलते हैं, तमाम औषधियां निकलती हैं। जीवन निर्वाह के सभी साधन निकलते हैं, किन्तु धूल-मिट्टी से ही हम जुड़े रहना नहीं चाहते हैं।  मुख पर पाउडर तो हम लगाना चाहते हैं, इत्र हम लगाना चाहते हैं, जबकि हमारे शरीर में पृथ्वी तत्व की प्रधानता है। पृथ्वी से हमें सामंजस्य स्थापित करना चाहिए।
लिखा तुलसीदास जी ने - 
धूसर धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए।।
राजकीय वैभव होने के बावजूद भगवान का शरीर धूल से सना हुआ है और ऐसे ही रूप में राम जी अपने पिता दशरथ जी की गोद में बैठ जाते हैं। दशरथ जी ने भी परहेज नहीं किया कि उनके कपड़े गंदे हैं, हाथ गंदे हैं और बैठाकर खाना खिलाने लगे। किन्तु राम जी का मन वहीं अपने साथियों में लगा हुआ है। वे बार-बार अपने साथियों को देखते हैं और ये समझने की बात है कि भले ही वे अत्यंत समृद्ध और यशस्वी वंश के भूपति दशरथ जी के गोद में बैठकर भोजन कर रहे हैं, ऐसे दशरथ जी, जिन्हें आगे बढक़र इंद्र भी सम्मान देते थे, स्थान देते थे। वैसे पिता राजा की गोद में बैठकर भी राम जी का चित्त साथियों और खेल में लगा हुआ है और वे राजा की गोद से भाग जाते हैं। राम जी भोजन करते हुए दौडक़र चले जाते हैं, दूध-दही मुंह में लगा हुआ है। 
इस शिक्षा का एक बड़ा संकेत है, जो हमें बच्चों को सिखाना चाहिए, जो संपूर्ण संसार के बच्चों के लिए मनुष्यों को माता-पिता को, संरक्षकों-अभिभावकों को कि राम जी का संकेत है कि जो आदमी अकेले खाता है समुदाय को छोडक़र, अपनों को छोडक़र, वह कभी भी बड़ा मनुष्य नहीं हो पाता, वह कभी भी ऋषित्व, संतत्व, कभी देवत्व को, कभी इस संसार के लिए प्रेरक स्थान को प्राप्त नहीं कर सकेगा। मनुष्य जीवन का चरम है - कभी अकेले नहीं खाना, जब खाना बांटकर खाना। 
आज बहुत बड़ी विडंबना है। आज समाज टूट रहा है। जातियां टूट रही हैं, परिवार टूट रहे हैं, पार्टियां टूट रही हैं, देश विखंडित हो रहे हैं, तो इसका मूल कारण है अकेले भोग की भावना। अकेले सुसज्जित होने की भावना, अकेले सम्मानित होने की भावना। इसलिए संतों ने, अपने शास्त्रों ने कहा कि बांट करके खाइए। राम जी यही संकेत कर रहे हैं कि पिता जी आप बहुत अच्छे हैं, रघुवंश के शिरोमणि हैं। आपको खूब-खूब पुण्य प्राप्त है, तभी तो मैं आपके घर आया और पिता-माता के रूप में आपको स्वीकार किया, किन्तु इसमें यह अभी जोडऩे की बात है कि केवल राम को खिलाकर आपको ऐश्वर्य प्राप्त नहीं होगा, वह तो सबको खिलाकर ही होगा। राम बनने के लिए आपको आवश्यक है आप भी भोजन में समदर्शिता और सर्वव्यापकता अर्जित करें, तो अच्छा होगा। 
क्रमश:

श्रीराम मार्ग पर चलें सदा

भाग - ३ 
हम सभी लोगों को सत्य बोलना चाहिए। वेद वाक्य है सत्यम् वद। यह ज्ञान ज्ञात है कि सत्य बोलना चाहिए, किन्तु हम असत्य ही बोलते हैं। हम डरते नहीं कि झूठ गलत है, झूठ विकास नहीं होने देगा, झूठ हमें ऋषि नहीं बनाएगा, महामानव नहीं बनाएगा, देवता नहीं बनाएगा। झूठ जीवन में कभी भी संपूर्णता नहीं आने देगा। यह हम ध्यान नहीं रखते। तो मेरा अपनी परंपरा व अपने सनातन धर्म के अनुसार यह कहना है कि परंपरा से प्राप्त जो मानव जीवन की सार्थकता के जो विशिष्ट साधन हैं, हम उन बातों को कहें बच्चों को, जो सच हैं और बार-बार कहें। आप उन बातों पर ध्यान दें, जो आपको सर्वश्रेष्ठ जीवन प्राप्त होगा। अभी आपको और विकास करना है, धीरे-धीरे ऋषित्व को प्राप्त करना है, देवत्व को प्राप्त करना है। यह पहला ज्ञान होगा।
फिर बार-बार उसको कहा जाए, तो बच्चे का ज्ञान परिपक्व होगा। बार-बार कहा जाएगा, तभी बच्चे को यह लगेगा कि मम्मी-पापा, परिवार के सभी लोग कह रहे हैं कि तुम्हें बड़ा मनुष्य बनना है, तुम्हें अपने समाज के लिए, संपूर्ण संसार के लिए, स्वयं अपने लिए बड़ा मनुष्य बनना है, सबसे विशिष्ट बनना है। बच्चा जब ये जान लेगा, तब उसका ज्ञान दूसरी अवस्था में आएगा। बार-बार पकाने से ज्ञान हमारे चरित्र में उतरेगा। फिर उसको बतलाया जाए कि आपको ये बात दूसरों को भी बतलानी है। जो अच्छा सीख लिया, वह दूसरों को भी सिखाओ। 
ये शिक्षाएं लोग शुरू से देते हैं। लोग कहते हैं कि बेटा झूठ नहीं बोलना चाहिए, बड़ों का आदर करना चाहिए, किन्तु इसके लिए जितना अभ्यास करवाना चाहिए, उसमें कमी हो जाती है। कैसे विचारों को परिपक्व बनाना है। अभ्यास आवश्यक है, पहले स्वयं में उसे परिपक्व बनाना और उसके बाद दूसरों को चरित्रवान बनाना। ये जो प्रकिया है, उससे बच्चों को अनेक माता-पिता, संत-महात्मा भी नहीं जोड़ते हैं। बच्चों को केवल सुना दिया जाता है, झूठ नहीं बोलना, चोरी नहीं करना, हिंसा नहीं करना, बड़ों का अपमान नहीं करना, अनावश्यक अपनी शक्ति को समाप्त नहीं करना। तमाम जो विषमताएं हैं - जैसे अधिक खाना, अधिक सोना, कहीं भी घूमना, कहीं भी देखना - ये समाप्त नहीं हो पाती हैं। सुधार के लिए, सच्ची शिक्षा के लिए ज्ञान को परिपक्व बनाना होगा, चरित्र में उतारना होगा। बच्चा जब यह जान जाएगा, तो वह स्वयं करने लगेगा। इसके बाद दूसरों को बताने लगेगा। बच्चों को कहिए कि आप अपने छोटे भाई-बहन को बताओ, बड़ों को बताओ, औरों को भी बताओ। 
इस क्रम में अपनी परंपरा में अनेक आदर्श उदाहरण हैं। तमाम चरित्रों का वर्णन है। चाहे ऋषियों का हो, संतों का हो, राजाओं का हो, आचार्यों का हो या ईश्वर का हो, इसमें सर्वश्रेष्ठ रूप से राम चरित्र को महत्व दिया जाता है। राम चरित्र निर्विवाद चरित्र है, सबसे बड़ा चरित्र है। और भगवान की दया से लोगों के लिए अनुकरणीय चरित्र है। आदर्श रूप है। उस चरित्र की कल्पना, उस तरह के चरित्र का वर्णन और उसका जो सारा स्वरूप है, वह कहीं भी दूसरी जगह प्राप्त नहीं है। राम जी का जो काल है, ११ हजार वर्षों का है, कहीं जिक्र मिलता है कि ३३ हजार वर्ष का है। राम जी संपूर्ण सृष्टि के लोगों के लिए प्रेरक हैं। उनका चरित्र, चिंतन, व्यवहार कैसे तैयार हुआ, इससे अच्छा उदाहरण किसी और चरित्र में कैसे मिलेगा। तो राम जी को एक उदाहरण के लिए लिया जा सकता है कि राम जी के जन्म के बाद उनके गुरु वशिष्ठ, जो अद्भुत ज्ञानशाली, उस वंश के परम संरक्षक, ऋषित्व से परिपूर्ण थे, रघुकुल के शुभचिंतक थे, वे राम जी के समस्त संस्कारों को पूर्ण करवाते हैं। राम जी के सभी भाइयों का संस्कार साथ होता है। 
एक उदाहरण है, जब भगवान अपने साथियों के साथ खेलने में लगे हुए हैं। छोटी आयु में खेलने का बड़ा महत्व रहता है। मनोरंजन भी हो रहा है, शरीर का व्यायाम भी हो रहा है। शरीर के शौष्ठव संपादन की व्यवस्था हो रही है, यह बड़ी प्रेरक, आनंददायक और जीवन को आनंदित करने वाली बेला है। और तब पिता राजा दशरथ जी राम जी को बुला रहे हैं कि आइए भोजन कीजिए। 
रामायण के निर्माताओं ने यहां यह नहीं लिखा कि दशरथ जी सभी साथियों को बुला रहे हैं। कहा गया कि राजा दशरथ भोजन कर रहे हैं, तो भोजन के अपने अवसर पर राम जी को बुलाया। आओ राघव भोजन करो हमारे साथ। आध्यात्मिक परंपरा में जो भूख मिटाने की जो प्रक्रिया है, उसमें यह नहीं कहते कि आइए भोजन करना है। कहते हैं, आइए भगवान का प्रसाद ले लें। इसका भी हमें अभ्यास करना चाहिए, यह सुन-सुनकर जब बच्चा बड़ा होगा, तो उसे लगेगा कि संसार में सबकुछ ईश्वर का बनाया हुआ है। 
क्रमश:

श्रीराम मार्ग पर चलें सदा

भाग - २ 
हमें बच्चे को केवल आयु नहीं देना है, केवल उसे बड़ा ही नहीं करना है। उसे उन सभी संस्कारों को देना है, जिनके आधार पर वह अपने लिए और अपने परिवार के लिए और संपूर्ण संसार, मानवता के लिए सहयोगी बने। बलवान हो, विद्वान हो और सार्थकता-सुंदरता बढ़ाने में कारगर हो, इसलिए मनमानी नहीं करके हमें परंपरागत प्राप्त जो संस्कार हैं, जो शिक्षा के स्वरूप हैं, जो ज्ञान के स्वरूप हैं, जो प्रामाणिक हैं और जो हमें दिव्य दृष्टियों से सम्पन्न ऋषियों, आचार्यों, गुरुओं से प्राप्त हैं और उनका मूल वेद, शास्त्र हों, जिनका कोई जोड़ नहीं है और जो वस्तुत: सभी दृष्टि से निर्विवाद, प्रामाणिक और कारगर हैं। इसकी बड़ी आवश्यकता है कि हम उससे शिक्षित हों। हम उदाहरणों, इतिहासों, विचारों से बच्चे को शिक्षा दें, चाहे वो शब्द ज्ञान की शिक्षा हो, वाक्य ज्ञान की शिक्षा हो। बोलने-बैठने की शिक्षा हो, वो सब प्रामाणिक रूप से होनी चाहिए और उसमें कहीं से भी दिखावटी-मिलावटी काम नहीं हो। ऐसा नहीं हो कि केवल कल्पनाओं के आधार पर शिक्षित किया जाए। ऐसा नहीं हो कि जहां-तहां से अनुकरण कर ली गई शिक्षा हो। शिक्षा का ऐसा आधार होना चाहिए, जो बहुत-बहुत वर्षों से चला आ रहा है। वह शिक्षा दी जाए, जो बहुत-बहुत वर्षों से शिष्ट-श्रेष्ठ जीवन तैयार करने में प्रामाणिक हो चुकी है, मान्य हो चुकी है। इसके लिए आवश्यक है कि हम जो बतलाएं, वो प्रामाणिक हो, मनमानी नहीं हो। आज की बड़ी विडंबना है कि पूरे संसार में अधिकांश लोग मनमानी संस्कारों के आधार पर बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं, सयाना कर रहे हैं। जो बच्चों को मनुष्य नहीं बनाकर, महामानव नहीं बनाकर, ऋषित्व नहीं देकर, देवत्व नहीं देकर, सृष्टि के लिए वरदान नहीं बनाकर उन्हें पाश्विक जीवन, राक्षसी जीवन, आतंकवादी जीवन, भोगी जीवन दे देते हैं। 
हमें एक तो सबसे पहले बच्चों को ये बताना जरूरी है कि ये जो जीवन आपको मिला है, वो बहुत ही महत्वपूर्ण जीवन है। लोग अपने बच्चों से कहते हैं कि आपको प्रधानमंत्री बनना है, आपको राजा बनना है, सबसे बड़ा एक्टर बनना है, सबसे बड़ा क्रिकेटर बनना है, आपको सबसे ज्यादा धनवान बनना है। लोग ये बातें बच्चों को सिखलाते हैं, जैसे जीवन का सब कुछ वहीं है। जब हम प्राचीन परंपरा को ध्यान में रखकर बात करते हैं, तो जो बात निकलती है, वह है - आपको सर्वश्रेष्ठ मनुष्य बनना है। मनुष्य जीवन सबसे सर्वश्रेष्ठ जीवन है। उसके अनुकूल हमें स्वयं का विकास करके मनुष्य का जीवन प्राप्त हो। जैसे लंका में बोलते हैं कि उस राक्षस की आकृति मनुष्यों की तरह थी। वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि राम जी की सेना में मात्र सात मनुष्य थे। राम जी, लक्ष्मण जी, विभीषण जी, और विभीषण जी के साथ आए हुए चार अन्य सहयोगी-अनुयायी, जो उनके मंत्री थे। तो आकृति हमारी मनुष्य की हो और हमारा संपूर्ण ज्ञान और क्रिया अनियंत्रित हो, अमर्यादित हो, मनमानी हो, तो हमें वो राक्षस बना देती है, जैसे लंका के लोगों को बना दिया। इसलिए आज भी व्यवहार देखकर किसी को कहा जाता है कि ये दिखता तो मनुष्य है, किन्तु प्रवृत्तियां तो राक्षस जैसी हैं, इसमें कहीं से भी मनुष्यता नहीं है।
अत: बच्चों को पहली शिक्षा यही दी जाए कि मनुष्य जीवन की जो अपूर्वता है, मनुष्य जीवन की जो विशेषता है, अन्य जीवनों से बड़ा जो इसका स्वरूप है, यह सर्वश्रेष्ठ स्वरूप है। अतुलनीय स्वरूप है, इस बात को बतलाकर हमें आगे बढऩा है। हमें ये नहीं कहना है कि आपको ये या वो करना है, आपको वस्तुत: मनुष्य बनना है। आपको मनुष्य का सही स्वरूप प्राप्त करना है। तब हम मनुष्य से धीरे-धीरे श्रेष्ठ होते हुए ऋषित्व को प्राप्त करेंगे। मनुष्य से देवत्व को प्राप्त कर सकते हैं। उस पद या अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं, जैसे इतिहास में वर्णित संत जन, ऋषि जन, राजा जन और तमाम समाज के लिए वरदान समाज उद्धारक लोग हुए हैं। वैसे ही बच्चों को मनुष्य जीवन की महिमा और उसकी विशेषता, श्रेष्ठता, मनुष्यता को बढ़ाने वाले संस्कारों को देने की आवश्यकता है। इस देश के ऋषियों ने पूरे संसार को चरित्र की शिक्षा दी है, ऐसा मनु ने लिखा है, जिनकी वाणी को ईश्वर की समकक्षता प्राप्त है। मनु ने कहा है कि हमारे लोग केवल ज्ञान-विज्ञान को याद करके धन्य नहीं होते थे। ऐसा नहीं कि किसी बात को हमने कहीं से सीखा-सुना और बोलने लग गए। ज्ञान जब प्राप्त होता है, तो उसकी पहली अवस्था बचपना की अवस्था होती है। अपरिपक्व अवस्था, कच्ची व्यवस्था होती है। ज्ञान पका हुआ नहीं होता, इसे परोक्ष ज्ञान कहते हैं। फिर ज्ञान पकता है, उसको अपरोक्ष ज्ञान कहते हैं। फिर वो हमारे चरित्र में उतरता है। फिर हम दूसरों को भी उस ज्ञान से और उसके दोनों स्वरूपों से जोड़ते हैं और अपने चरित्र, व्यवहार से प्रेरित करते हैं। 
क्रमश:

श्रीराम मार्ग पर चलें सदा

(श्रीराम का बचपन और मानव होने का व्यावहारिक प्रशिक्षण)
(जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी के प्रवचन से)
संसार के सभी मनुष्य भगवान की विशेष कृपा और अपने जन्मजन्मांतरों के पुण्यों के फलस्वरूप ही मनुष्य जीवन को प्राप्त करते हैं, यही अपना वैदिक सिद्धांत है। मनुष्य जीवन से बड़ा उत्पादन, बड़ा सृजन इस सृष्टि में ईश्वर का और कुछ नहीं है। जो संपूर्ण संसार है, मनुष्य के लिए ही है, चाहे वो पृथ्वी हो, जल हो, थल हो, तो हमें इतना अच्छा जीवन मिला है, इस जीवन का अधिक से अधिक उत्तम से उत्मोत्तम उपयोग हो। मनुष्य केवल अपने लिए भी सुखदायी, अपने लिए ही स्थायी और अपने लिए ही सुंदर, मजबूत और हर दृष्टि से संपन्न न हो, वो दूसरों के लिए भी काम का हो, दूसरों के लिए भी समृद्धि व ऐश्वर्य जीवन में बढ़ाने वाला हो, इसके लिए बाल्यावस्था से ही बच्चों को कैसे तैयार किया जाए। यह मुख्य विषय है।
यह केवल भारतवर्ष में ही नहीं, संपूर्ण संसार के मनुष्यों के जो शिशु हैं, उनके जात हैं और उनके जो वंश के दीपक हैं, वंशवद्र्धक हैं, वंश-रक्षक हैं, तो उनको कैसे तैयार किया जाए, जिससे वो परिपूर्ण जीवन को प्राप्त करें, जिसे वो सुंदर जीवन को, संतुष्ट जीवन को, वरदान जीवन को प्राप्त करें। इसकी चर्चा को हम और आगे बढ़ाते हुए विस्तार देंगे। 
असल में ज्ञान भी जीव का स्वरूप ही है। जैसे ईश्वर ज्ञान की राशि है, ज्ञान का सागर है, ज्ञान उससे ज्यादा हो ही नहीं सकता, इसलिए उसको सर्वज्ञ कहते हैं। वह पूरे संसार को सामान्य रूप से भी जानता है और विशेष रूप से भी जानता है। तो जीव भी ज्ञान स्वरूप है। चैतन्य स्वरूप है, जीव भी ज्ञान का अंग है, किन्तु हमारा ज्ञान छोटा है। बच्चे जो उत्पन्न होते हैं मनुष्य परिवार में, तो मनुष्य माता-पिता की गोद में, आंगन में, तो उनका ज्ञान बहुत छोटा होता है। सभी तरह का ज्ञान छोटा होता है। अब ये अलग बात है कि पिछले जन्म का बहुत बड़ा संस्कार हो, साथ आ रहा हो, तो कुछ विशेष लोगों का जन्म लेते ही ज्ञान बहुत बड़ा हो जाता है, किन्तु सामान्य लोगों को ज्ञान को बढ़ाना पड़ता है। ज्ञान के संवर्धन की जो पद्धति है, ज्ञान के विकास का जो क्रम है, वो कैसे ऐसा किया जाए कि जिससे ज्ञान आदमी को हो। ज्ञान सभी व्यवहारों का कारण है। कोई भी व्यवहार ज्ञान के बिना नहीं हो सकता। चाहे वो बैठने का हो, चाहे वो खाने का हो, कमाने का हो, चाहे वो शरीर के विकास का हो, चाहे वो धन के विकास का हो, चाहे वो सम्मान के विकास का हो, कोई भी व्यवहार होगा, तो ज्ञान उसका मूल सहयोगी होगा। मूल उत्पादक होगा, इसलिए दर्शनशास्त्र में पढ़ाया जाता है कि जो सभी व्यवहारों का कारण हो और गुण भी हो, उसी को ज्ञान कहते हैं। 
जब हम ज्ञान अर्जित करने के लिए विद्यालय में बच्चों को भेजते हैं। पहले तो बच्चे ५ से ६ वर्षों के हो जाते थे, तो विद्यालय में जाते थे। अब आयु सीमा में कमी आई, अब ३ वर्ष के बाद बच्चे विद्यालय जाने लगते हैं। ३ वर्षों का जो प्रारंभिक काल है, उसका बहुत महत्व है। प्राथमिक विद्यालय से पहले का जो सर्वप्रथम नींव रखने वाला विद्यालय है, वो परिवार का विद्यालय है। माता-पिता, दादा-दादी और जो परिजन हैं, उनका जो सान्निध्य है, उनका जो संरक्षण है, उनका जो अत्यंत ममत्व है परिपालन में, हर्ष विकास में, वो बहुत बड़ा विषय है। अत: पहला विद्यालय वह है, जहां हमने जन्म प्राप्त किया, जहां हमने जीवन प्राप्त किया, तो उस विद्यालय की बड़ी भूमिका है, जीवन को सफल बनाने वाली शिक्षा के क्रम में। उस शिक्षा से जुडक़र माता-पिता, परिवार के जो अन्य लोग हैं, उनको बच्चों को शिक्षित करना चाहिए।
क्रमश:

Wednesday, 5 September 2018

रामानंदाचार्य प्राकट्यधाम - हरित माधव मंदिर, प्रयाग


रेल और सडक़ पुल के बीच स्थित रामानंद प्राकट्यधाम



गंगा नदी

रामानंदाचार्य प्राकट्यधाम - हरित माधव मंदिर, प्रयाग

ऐसा कहा जाता है कि इस जगह रामानंदाचार्य जी का जन्म हुआ था और उसके बाद उन्होंने काशी को अपनी कर्मस्थली बनाया। 


इस मठ पर लंबे समय अतिक्रमण का आतंक रहा, किन्तु रामानंद संप्रदाय की सक्रियता के कारण इस मठ का तेजी से उद्धार हो रहा है और यहां स्थित हरित माधव मंदिर अति सुंदर प्राचीन शैली का मंदिर है। 


Monday, 27 August 2018

बच्चों को महामानव बनाएं

समापन भाग - ११
जब हम छोटे थे, तब लोग देखते थे कि हम किसे देख रहे हैं। यदि हमारा लडक़ा सयाना है और जिसे नहीं देखना चाहिए, उसे देख रहा है, तो बड़े लोग टोकते थे कि क्या देख रहे हो। मुझे गुरुजी का ध्यान है कि मेरे कमरे में खिडक़ी थी, खिडक़ी के पार एक परिवार के लोग रहते थे, बीच में गली थी। उस खिडक़ी से बाहर देखते हुए मुझे गुरुजी ने नहीं देखा, लेकिन जब वे देख लेते थे कि कभी खिडक़ी खुली है, तो वे कठोर शब्दों का प्रयोग करके मेरी भत्र्सना करते थे। पूछते थे कि उधर खिडक़ी क्यों खुली है? परिणाम यह कि पांच-पांच महीने निकल जाते, मैं खिडक़ी नहीं खोलता। 
आज भी जहां रहता हूं, वहां खिडक़ी नहीं खोलना है, आदत हो गई है। हमें बाहर क्या देखना है, कौन-सी चीज कमरे में नहीं है, बाहर किसको देखकर हम वैज्ञानिक या विरागी हो जाएंगे? तो भद्र को ही सुनना और भद्र को ही देखना और भद्र को ही छूना और यह बच्चों को शुरू से बताना चाहिए। खुद भी ऐसा करें और बच्चों से भी करवाएं। 
संत शिरोमणि डोंगरे जी का प्रवचन सुन रहा था। उन्होंने कहा, ‘हम किसी को दो पैसा दे दें, उसे जब जरूरत हो, किन्तु हम आंख और कान नहीं दें।’ 
लोग अनावश्यक बहुत बोलते हैं और अनावश्यक बहुत सुनते हैं। आदमी किसी को भी सुन लेता है। हम क्यों सुनें? हम क्यों देखें? हमें देखने से कुछ अच्छा मिले, तो देखें? क्या जो भी मिलेगा ग्रहण कर लेंगे? जीवन भर इंद्रियों का प्रयोग करना है, ईश्वर ने दिया है। यह हमारे कल्याण के संसाधनों का धाम है शरीर। जीवन को परिपूर्णता देने के लिए हमें शुरू से ही संसाधन मिले हैं। इन संसाधनों का प्रयोग भी हमें बतलाया जाए, छोटी ही आयु से। अभिभावक भी इस प्रयोग को करें। आज अभिभावक भी टीवी पर गलत देख रहे हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए। हम अपने जीवन को सबके लिए लाभप्रद बनाएं। 
ध्यान दीजिए, वह कौन-सी शिक्षा होगी कि इसी संसार में अनेक महान विभूतियों ने ऋषित्व जीवन प्राप्त किया। वह कौन-सी शिक्षा होगी - व्यसन संसाधन के बिना भी सुदामा पूज्य हो गए? धनवान होना गलत नहीं है, किन्तु उसे प्राप्त करके भी जीवन विकसित हो, दूसरों के लिए उपयोगी हो। धन पाकर पशु जैसा जीवन न हो, लूटखसोट का जीवन न हो। धन पाकर पशु जैसा जीवन हो, तो कुछ ही दिनों तक लोग वाह-वाह करते हैं। 
मनु जी ने श्लोक कहा - जिसका अर्थ है -जैसे आदमी सही संसाधनों से बढ़ता है, वैसे ही गलत संसाधनों से भी बढ़ता है। जैसे पुण्य से बढ़ता है, वैसे ही पाप से भी बढ़ता है। अधर्म से भी संपन्नता और सम्मान का विस्तार होता है। सब बढ़ जाता है, रोज बढ़ता है। किन्तु वह समय भी आता है, मानो पूरा का पूरा नीचे दलदल हो, वैसे ही वह पूरा जीवन बैठ जाता है। जैसे रावण का बैठ गया। सबकुछ था, लेकिन वह जो बढ़ रहा था, लगता था कि वह बढ़ रहा है, किन्तु वह तो अधर्म से पतन की ओर बढ़ रहा था। 
गलत तरीके से जो शरीर लाल हो रहा है, मजबूत हो रहा है, वह केवल लगता है कि बढ़ रहा है, किन्तु वास्तव में वह मृत्यु की ओर जा रहा है। ऐसे अनेक लोगों ने धन अर्जित कर लिया, किन्तु धन चला जाता है। कभी मंदी में, कभी महंगाई में देश में ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जिनमें तमाम लोग एक साथ बैठ जाते हैं। जब करोड़ों हजार का आदमी अपने जीवन में गिर जाता है। करोड़ों रुपए का व्यापार करने वाले का भी लोप हो जाता है। अधर्म से बढऩे वाला अपयश को प्राप्त हो जाता है। इसलिए हमें शुरू से यह शिक्षा मिलनी चाहिए कि हमें गलत रास्ते से शरीर, प्रतिष्ठा, परिवार, पद, विद्या को नहीं बढ़ाना है। केवल यह नहीं सिखलाइए कि कैसे पेट भरेगा-बढ़ेगा। बताइए कि अच्छी शिक्षा नहीं होगी, तो परिवार नहीं चलेगा, समाज नहीं चलेगा, राष्ट्र नहीं चलेगा। भारत में तो अनादि काल से सही सार्थक परिपूर्ण चिंतन की परंपरा प्रवाहित हो रही है। आइए, इस प्रवाह से सीखें। 
जय सियाराम

बच्चों को महामानव बनाएं

भाग - १०
मैं इंदौर में था गीता पर प्रवचन करने के लिए एक विद्वान आए। बहुत दूर से आए। मोह-शोक भगाने वाली चर्चा चल रही थी, किन्तु उन्होंने भी अपना बाल आगे कर लिया। यह तो हमें छोटी आयु में ही सिखलाया गया था, जब घर से आ गए कि आदमी बाहरी संसाधनों से सुंदर नहीं होता, कपड़ा और जूता और तमाम तरह के जो आभूषण हैं, जो बाल हैं, उनसे हमारा व्यक्तित्व नहीं बढ़ता, व्यक्तित्व तो अपने श्रेष्ठ संस्कारों के आधार पर बढ़ता है। सभी लोगों को शुरू से ही यह शिक्षा दी जाए कि हम कैसे बड़े आदमी हो सकते हैं। 
दान देने से दूसरों की मदद करने से हमारे हाथों की सुुंदरता है, केवल स्वर्ण का कड़ा पहनने से हाथों की सुंदरता नहीं है। हमारी वाणी की मधुरता से, सत्यता से, मर्यादित शब्दों के उच्चारण से हमारी वाणी की सफलता है, उपयोगिता है। जैसे-तैसे बोलकर हाव-भाव बनाकर तमाम अश्लील बातों को परोस कर, विनोदी बातें करके, हम बहुत अच्छे हो जाएंगे, यह सही नहीं है। 
व्यक्तित्व व व्यवहार में यह सुधार अचानक नहीं होगा। मैंने पहले बतलाया कि मां के गर्भ से ही शिक्षा शुरू हो जाती है। अभी हमने एक परंपरा की शुरुआत की है। समर्पित भक्तों के यहां जब कोई महिला गर्भवती हो जाती है, तो मैं उन्हें ९ दिनों की राम कथा सुनवाता हूं। उसमें भीड़भाड़ नहीं होती, गर्भवती महिला अपनी किसी महिला अभिभावक के साथ उपस्थित रहती है। कम से कम दो महिलाएं परिपूर्ण ९ दिनों में अधिक से अधिक घंटे कथा सुनती हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है, जो बच्चे जन्म ले रहे हैं, उनमें उत्कृष्ट राम भाव दिख रहा है। मैंने भी कई जगह कहा कि इस आयु में मेरा ऐसा भाव नहीं था, जबकि मैं धार्मिक आध्यात्मिक जीवन में एक स्वरूप को प्राप्त कर चुका हूं, लोग कहते हैं कि आपका जीवन प्रेरित करता है, लेकिन मैं हाथ खड़ा कर देता हूं, जब उन बच्चों को देखता हूं, जिन्हें ९ दिन रामचरितमानस सुनवाया था। 
एक बच्ची जन्म ली, सर्दी के दिनों में, घर वाले रात्रि भर गोद में लेकर जाप करते थे, लेकिन जहां जाप बंद कर दें, तो रोने लगती थी, राम राम कहें, तो गोद में लेटी रहती थी, निद्रा में रहती थी, लोग बोलते रहते थे सीताराम सीताराम राधे श्याम राधे श्याम। चमत्कार है, जो बच्चा सर्दी से पीडि़त है, रोने लगता है, वह केवल राम-राम से चुप होता है। तो अभिप्राय यह कि हम शुरू से ही केवल अर्थ प्राप्ति की शिक्षा नहीं दें, केवल भोग की शिक्षा नहीं दें, शिक्षा हम धर्म और मोक्ष की भी दें। 
कई लोग अपने बच्चों को चोरी की शिक्षा देते हैं। मुझे अनुभव है कि कैसे मां अपने बच्चे को व्याभिचारी बनाती है, चोरी करना सिखाती है, कैसे मां अपने बच्चे को आतंकवादी बनाती है, कैसे दूसरों को तिरस्कार करना सिखाती है। शुरू से ही बच्चों को गलत ढंग से पालती है। सुधार करना होगा। हम बच्चों को शब्द व्यवहार सिखाएं, साथ-साथ जीवन के श्रेष्ठ मूल्यों से परिचय कराना चाहिए। केवल यहीं हमारा गांव नहीं है, ऊपर भी गांव है, जहां भगवान रहते हैं, वहां चोर, बदमाश, झूठ बोलने वाले नहीं जाते, अपमानित करने वाले, हत्या करने वाले, ठगने वाले नहीं जाते। वहां अच्छे लोग ही जाते हैं। 
ये जो बातें हम कर रहे हैं, उन बातों को तमाम आयु बीतने के बाद आदमी सीखता है, किन्तु हमें शिशु या बाल्यकाल से ही यह सीख लेना चाहिए।
बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो - गांधी जी की यह शिक्षा - ये वेदों ने भी कहा। हम केवल भद्र को ही सुनेंगे। दूसरों की निंदा सुनकर आदमी राक्षस हो जाता है। कान भी बुरी बातों को सुनने का आदी हो जाता है। चरस पीने वालों को दूसरा नशा काम नहीं करता, जैसे शराब पीने वालों को दूसरा पेय प्रभावित नहीं करता, सुकून नहीं देता। शुरू से ही हमें गलत, असभ्य बातों पर कान नहीं देना है। वेदों ने कहा कि हमें भद्र को सुनना है - भद्र माने - जो हमें विकृत प्रेरणा नहीं दे सकता। शुरू से ही शिक्षा होनी चाहिए। भद्र को ही सुनना और भद्र को ही देखना-सीखना चाहिए। 
क्रमश: 

बच्चों को महामानव बनाएं

भाग - ९
यह व्यवहार इतना अच्छा है कि क्या बात है, इसका कोई जोड़ नहीं है। ये सारे जो मनुष्य के प्रारंभिक ज्ञान हैं, किसी के आने पर हम कैसे उसका स्वागत करते हैं, कैसे उसे स्वीकार करते हैं, कैसे शुरुआत करते हैं, तो यह बहुत ही सिखाने लायक बात है। यह बात अंतिम समय तक काम आएगी। जीवन के किसी भी क्षेत्र में होंगे, यह काम आने वाली शिक्षा है। 
लिखा है कि मनु ने कि सज्जनों के यहां स्वागत के चार संसाधन सदा उपस्थित रहते हैं। सबसे पहले कोई आया, हम उसे नमस्कार करें। घर के लोग करें, बच्चे को भी कहें। देखो कि मैं नमस्कार कर रहा हूं, आप भी करो। कोई भी आया है, जो कनिष्ठ है, जो अंजान है, जान नहीं रहे हैं कि छोटा है या बड़ा है, किस भाव से आया है, जान नहीं रहे हैं, किन्तु उसे भी प्रणाम करना है। 
हां, ध्यान रहे, शाष्टांग दंडवत ईश्वर, गुरु, माता-पिता को ही किया जा सकता है। यह सबके लिए नहीं है, पंचांग दंडवत भी सबके लिए नहीं होता। सामान्य तौर पर कोई भी आपके घर में आए, तो कम से कम हाथ जोडि़ए। दोनों हथेलियों को जोडक़र सिर से लगाना है... जी प्रणाम, आइए पधारिए। 
यह स्वागत है, इतने में तो आने वाला आदमी पानी हो जाएगा, पानी कहना गलत लग रहा हो, तो गलकर दूध हो जाएगा, गंगाजल हो जाएगा। जिसे आपने सम्मान दिया, स्वागत किया। अपनी संस्कृति में जय श्रीराम, सीताराम, जय महादेव, जय श्रीकृष्णा, राधे-राधे, राधे-कृष्णा बोलकर भी स्वागत करने का चलन है। यह स्वागत बिना पैसे का है, कोई भी इस व्यवहार को कर सकता है। यह शिक्षा शुरू से नहीं होने से प्रणाम वाली बात तो समाप्त हो चुकी है। लोग घुटने में ही हाथ लगा देते हैं। बड़े-बड़े आज के विद्वान लोग भी घुटने में एक हाथ लगा देते हैं, हो गया प्रणाम, नमस्कार ? 
एक बार एक मंत्री जी ने मुझे माला पहनाया और घुटने के पास हाथ लगा दिया। दिल्ली में सभा हो रही थी, गोविंदाचार्य जी भी थे, के.सी. त्यागी भी थे, वहीं सबके सामने एक हाथ लगा दिया, बतलाइए। मैंने प्रवचन के क्रम में कहा कि आप लोगों को क्या प्रभावित करेंगे, जब प्रभावित करने का सबसे प्रथम चरण प्रणाम ही नहीं करने आ रहा है।  
स्वागत का दूसरा संसाधन मनु जी ने बताया। ये वही मनु हैं, जिनकी बातों, वचनों को वेदों के बराबर स्तर प्राप्त है। वही लोग मनुवाद-मनुवाद कहकर आलोचना करते हैं, जिन्हें पता नहीं है कि मनु कौन हैं। 
स्वागत का दूसरा चरण - हम आगंतुक या अतिथि को आसन दें। जो भी आसन उपलब्ध हो, उस पर बैठाएं आदर के साथ। ऐसे नहीं कि केवल बोल दिया - बैठिए। हम अतिथि को ले जाएं आसन तक और कहें कि विराजिए। आसन को सुशोभित कीजिए। आसन सबको प्रिय है। आप आसन को सुुंदरता प्रदान करें। अंग्रेजी वाले बोलते हैं कि आप अपनी सीट लें, इसमें वह मर्यादा भाव नहीं है, टेक योर सीट। 
स्वागत का तीसरा चरण या संसाधन - अतिथि से कुशल क्षेम पूछना। यह स्वागत मान देने का बड़ा साधन है। पूछिए कि आप कैसे हैं, कुशल तो हैं, इधर कैसे आना हुआ? ये तीन साधन बिना धन बिना तैयारी के उपलब्ध हैं, हर परिवार में हर समय उपलब्ध हैं। 
चौथा है अतिथि को जल पिलाएं। बहुत प्यार से कहें कि जल ग्रहण करें, आप चलकर आ रहे हैं, ऐसा नहीं कि आपने लाकर रख दिया, बहुत प्यार से हाथों में जल का पात्र दीजिए। ये बात जीवन भर काम आने वाली है। सभी लोग अरबपति नहीं होंगे, सभी बड़े पद पर नहीं होंगे, सबको जीवन का बड़ा उत्कर्ष प्राप्त नहीं होगा, लेकिन ये चारों संसाधन, जो अत्यंत विकसित और प्रभावित करने वाले हैं, जो जीवात्मा के विकास के बड़े साधन हैं, उसका संपादन सब करें। यह कब होगा, जब हम जैसे माता-पिता का परिचय कराते हैं, वैसे हम अतिथि का परिचय कराएं। वेदों में लिखा है- अतिथि देवो भव:। जो बिना सूचना, बिना सम्बंध के, जो कहीं से संबद्ध नहीं है, आ गया है या संबद्ध है, किन्तु बिना सूचना के आ गया, तो हम उसका बिना प्रयोजन के, स्वार्थ के बिना, किसी बनावटीपने के बिना, किसी कुरूपता के बिना हम उसका स्वागत करें - आइए प्रणाम, बैठिए, आप कैसे हैं, और लीजिए जल ग्रहण कीजिए। जल पिलाने का भी बहुत-बहुत सकारात्मक प्रभाव है। 
तो मनु जी ने व्यवहार का वह क्रम बताया, जो जीवन भर उपयोगी रहेगा, राष्ट्रपति होकर भी हमें ये काम करने होंगे, जो अपने पास आया उसका स्वागत करना होगा। ऐसे व्यवहार और संस्कार की समाज व राष्ट्र को जरूरत है। बड़े लोगों को आदर्श स्थापित करना होगा। नेता जी को कैसे बोलना चाहिए, नेता जी को कैसे बैठना चाहिए, कैसा कपड़ा पहनना चाहिए, ऐसे सजग नेता व बड़े अधिकारी कम हैं। मुझे बहुत ही दुख होता है कि संतों को भी कपड़ा नहीं पहनने आता। अभी एक महात्मा को देखा, धनवान हैं, छोटी आयु के हैं, मेरे संपर्क में हैं। मैं हैरान हूं, लेकिन जैसे लड़कियां अपने बालों को सुंदरता बढ़ाने के लिए आगे कर लेती हैं, उनके भी बाल घुंघराले हैं, उन्होंने भी बालों को आगे कर लिया, हे भगवान।
क्रमश: 

बच्चों को महामानव बनाएं

भाग - ८
ऐसे ही एक दिन मैं दिल्ली आ रहा था। कुछ विदेशी भी आ रहे थे, चंडीगढ़ हवाईअड्डे पर। विदेशियों ने मुझे देखकर कहा, बाय-बाय, हाथ दिखाकर। अमरीका के लगभग पच्चीस लोग थे, हमारा मजाक उड़ा रहे थे, बाबा जी हैं, बैठे हैं। मेरे साथ एक ब्रिगेडियर भी बैठे थे, मैंने उन्हें कहा, मुझे अंग्रेजी नहीं आती, आप ऐसा करें कि मैं जो पूछता हूं, वो उनसे पूछिए।
पूछिए कि बाय-बाय का अर्थ क्या है - व्हाट इज मीनिंग ऑफ बाय-बाय। तो उत्तर मिला, बाय-बाय का अर्थ बाय-बाय।
यह क्या हुआ? जैसे वाटर का मतलब वाटर होता है। शब्द अलग है, वस्तु अलग है। ऐसे ही सूर्य अलग है, जो प्रकाशित करता है और सूर्य शब्द अलग है। आपने क्यों कहा, बाय-बाय, मेरा आपसे सम्बंध है क्या? आपकी मेरे में निष्ठा है क्या, तो किस तरह से आपने बाय-बाय कहा? मैंने आपको कुछ कहा नहीं। यदि यह निरर्थक शब्द है, तो आप पागल हैं या मैं पागल हूं? 
अब तो हुआ झगड़ा। तब उन्होंने कहा, भारत में लोग संत नहीं, चोर ज्यादा होते हैं। मैंने उन्हें तमाम तरह से घेरकर कहा कि अमरीका में आयकर या इनकम टैक्स के साथ चोरी टैक्स भी लगता है। टैक्स चोर अमरीका में ज्यादा हुए या भारत में? अमरीका में अनेक राष्ट्रपतियों की हत्या हुई, यहां केवल गद्दी पर रहते इंदिरा गांधी की हत्या हुई, सुरक्षा ज्यादा कहां है? एक समय में पश्चिमी देशों में जितने समाज विरोधी कार्य करने वाले लोग थे, उन्हें देश से निकालकर अमरीका जैसे देशों में भेजा और बसाया गया था। वहां से ज्यादा भ्रष्ट कहां हैं?
सही प्रशिक्षण नहीं होने के कारण ही लोग एक दूसरे से गलत व्यवहार करते हैं। किसी से भी मिलें, तो नमस्कार करें। उन्हें बतलाएं कि आप हमारे यहां आए, हम धन्य हो रहे हैं। बहुत आनंद हो रहा है, आपकी श्रेष्ठता को हम प्रणाम करते हैं। दर्शनशास्त्र में भी पढ़ाया जाता है कि कोई भी आए, तो हम सबसे पहले उसे प्रणाम करें। प्रणाम इसलिए कि आप हमसे श्रेष्ठ हैं, आप सम्मानित हैं, आप वरिष्ठ हैं, यह बतलाने का जो व्यापार है, उसे ही प्रणाम कहते हैं। हममें जो छोटापन है, उससे निरूपित बड़प्पन आपमें है, इसका ज्ञान हम जिस व्यापार से करा दें, उस व्यापार का नाम नमस्कार है। कोई आया है, तो यह न मानें कि दरिद्र है, इसलिए आया है। हमसे कुछ चाहता है, उत्कर्ष वाला नहीं है, इसलिए आया है। वह आए, तो हम उसे यह कहें कि आप बड़े हैं, आइए नमस्कार, हाथ जोडक़र कहें। नमस्कार, प्रणाम के तमाम विधान हैं। शाष्टांग दंडवत से लेकर सामान्य नमस्कार तक। जोडक़र दोनों हथेलियों को अपने सिर से सटाएं, इसे नमस्कार कहते हैं। सबका एक ही अभिप्राय है, यहां तक कि जो अचानक आया है, जिसे हम नहीं जानते, उसे भी अतिथि मानकर देवता जैसा सम्मान देने की परंपरा है। आप आए, तो कोई परिचय नहीं था, रिश्ता नहीं था, फिर भी आए, कितने उदार हैं आप, आइए-आइए नमस्कार। 
क्रमश: