Saturday, 16 July 2016

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र

समापन भाग
हमें विश्वामित्र जी से प्रेरणा लेनी चाहिए। हम लडऩा भी जानते है और शास्त्रार्थ में पराजित करना भी जानते हैं। भारतीय संस्कृति में केवल पढऩा या शास्त्र तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। हम केवल ज्ञानवान नहीं हैं, हमारे पास धन भी रहना चाहिए। हमारे पास ज्ञान भी रहना चाहिए। 
शक्ति होनी चाहिए कि आज जो भारत भूमि को लांछित कर रहा है, रामराज्य को लांछित कर रहा है, हम उन्हें निश्चित रूप से सबक सिखा दें, इस तरह का सामथ्र्य भी हमारे पास होना चाहिए, इसके लिए हमें विश्वामित्र जी से प्र्रेरणा लेनी चाहिए। विश्वामित्र जी हर दृष्टि से समर्थ रहे। हमारा जीवन अपने लिए, समाज, परिवार की रक्षा, संरक्षण के लिए होना चाहिए। हमारा जीवन मानवता के लिए वरदान होना चाहिए। ज्ञान भी चाहिए और शक्ति भी चाहिए और धर्म के माध्यम से चाहिए। विश्वामित्र जी ने अपने को ऐसा बनाया था कि आज भी हमें गौरव है। इस देश में वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषि-संत हमारे लिए प्रेरणा स्रोत हैं, उनका ज्ञान, उनका जीवन हमारे लिए आदर्श है, उनका इतिहास हमारे साथ है। भगवान से प्रार्थना है कि ऋषियों की प्रेरणा, उनका ज्ञान, उनकी नीति, उनके द्वारा किया गया प्रयोग सभी के जीवन में आए और हम लोग अपने देश, संसार, मानवता को सभी दृष्टि से लांछित होने से बचाएं। संतत्व को लांछित होने से बचाएं। गुरुत्व लांछित हो रहा है, भारत भूमि की वंदना लांछित हो रही है। धर्मज्ञान, अध्यात्म लांछित हो रहा है, हमें सुधार की दिशा में बढऩा ही चाहिए।
कितना प्रभाव था विश्वामित्र जी का जनकपुर में, अनेक राजा-महाराजा आए थे, कोई विश्वामित्र जी के साथ आंख नहीं मिला सकता था, जनक जी ने स्वयं को धन्य माना कि आप राम जी को लेकर आए। वशिष्ठ ने भी स्वयं को धन्य माना। कहीं कोई कमी नहीं है, दूसरों को सम्मान देने में स्नेह देने में। जब दो परिपूर्ण विभूतियां एक दूसरे के साथ सही ढंग से जुड़ेंगी, तभी तो समाज को लाभ होगा, नहीं तो समाज अपनी संपत्ति को खो देगा, बिखर जाएगा।
हमें ऋषियों से गौरव लेना है, ज्ञान लेना है, दिशा लेनी है। रामजी को परिपूर्ण जीवन मिला। गृहस्थ जीवन बिना दान-त्याग के अधूरा होता है। हम कह सकते हैं कि विश्वामित्र जी ने ही जानकी जी से राम जी का विवाह करवाया। यह भी अद्भुत घटना है। जनकपुर में रामजी हैं, उस विवाह में वशिष्ठ जी भी पहुंचते हैं, वहां विश्वामित्र जी पहले से हैं, कहीं कोई संतुलन नहीं बिगड़ता है। दोनों एक दूसरे के लिए भरपूर सम्मान रखते हैं, एक दूसरे का प्रभाव बढ़ाते हुए रामराज्य को सशक्त करते हैं। यदि हम इन ऋषियों से कुछ भी सीखते हैं, तो हमारा खोया हुआ जगतगुरुत्व, खोया हुआ जो संसार का नेतृत्व है, जो खोया हुआ हमारा वैभव है, वह हमें अवश्य प्राप्त हो जाएगा।
जय श्रीराम

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र

भाग - ७
सबसे पहले राम जी ने कहा - 
निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाईं। 
आप निर्भय होकर यज्ञ कीजिए। रामजी ने विश्वामित्र जी को कहा, जो राक्षस आएंगे, उन्हें मैं कालकलवित कर दूंगा। आप यज्ञ कीजिए।
धर्म का सबसे बड़ा कृत्य है यज्ञ। देवता जितना देते हैं, उसके बदले में हम भी उन्हें दें, उनका अभिनंदन करें, हमारी मानवता हमारा व्यक्तित्व देवत्व को प्राप्त करेगा। देवत्व से ईश्वरत्व को प्राप्त करेगा। जीवन की सबसे बड़ी ऊंचाई यही होती है कि हम अपने बच्चे को कैसे ऊंचाई तक ले जाएं। तो विश्वामित्र जी का और वशिष्ठ जी का, दोनों का ऋषित्व मिलकर एक बहुत बड़े संसार के उपकार का मार्ग प्रशस्त करता है। लोग कहा करते हैं कि राम जी अद्भुत हैं, ऋषि के समान हैं, ऋषि जैसे दो तत्वों को मिलाता है, एक पक्ष विश्वामित्र और दूसरा पक्ष वशिष्ठ जी हैं। एक का जन्म ही ब्रह्मर्षि के परिवार में हुआ है और एक का जन्म हुआ क्षत्रिय परिवार में, दोनों ने धीरे-धीरे संयम-नियम करते हुए जीवन को बड़ा किया और बहुत बड़ी दूरी थी दोनों के बीच, लेकिन वह भी धीरे-धीरे कम होती चली गई। परिपूर्ण, अटल रूप से दोनों के हित साथ हुए और दानों को राम जी ने जोड़ा। कौशल्या और कैकयी की दूरी को कम किया, उत्तर और दक्षिण को जोड़ा, ऐसे ही रामजी ने विश्वामित्र जी और वशिष्ठ जी को जोड़ा। दोनों ऋषियों ने मिलकर संपूर्ण जीवन में धर्म राज्य-अध्यात्म राज्य को बढ़ाया, यह पे्ररणा लेने वाली बात है।
रामजी जैसा सोचने की जरूरत है। विश्वामित्र और वशिष्ठ की तरह सोचने की जरूरत है। हमारे जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है धर्म की स्थापना, हम संतों और आचार्यों के जीवन का, लेकिन अब तो सभी लोग धन एकत्र करने लगे कि कैसे मठ बड़ा हो जाए, कैसे गाडिय़ां बड़ी हो जाएं। कैसे हमारे जीवन का वैभव बढ़े, कैसे हमारा संग्रह प्रभाव बढ़े। कैसे रोज हमारा नाम अखबारों में आए। हम कैसे समाज के नेता हो जाएं, ये तमाम तरह इच्छाएं बलवती हो रही हैं। गृहस्थ जीवन में अर्थ और भोग ही जैसे प्रधान होता है, वैसे ही आज के संतों का मुख्य रूप से उद्देश्य केवल मान-सम्मान, धन-दौलत है।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं, जैसे आपने वशिष्ठ-विश्वामित्र को एक साथ जोड़ा, दोनों को साथ लेकर संपूर्ण मानवता के लिए अपने को अर्पित किया। असंख्य जीवों का उद्धार किया। कैसी अनुपमता जीवन में प्रकट हुई, ठीक इसी तरह के परिवर्तन आज के संत समाज में होने चाहिए। ऐसा हुआ, तो बहुत लाभ होगा और पूरे विश्व को लाभ होगा। धन, विद्या, शक्ति इत्यादि सबमें वृद्धि होगी। आज जो अभाव दिख रहा है, एक दूसरे को सहन नहीं करने से उपजा अभाव है, कहीं-कहीं लगता है कि केवल हम हम ही हों, दूसरा कोई न हो, यह गलत प्रवृत्ति है। भगवान की दया से विश्वामित्र जी कहते थे कि हमारे एक हाथ में वेद है और एक हाथ में धनुष हैं।
हम दोनों ही दिशाओं में समर्थ हैं। शास्त्र भी है और शक्ति भी है। जिसके जीवन में केवल शास्त्र ही हो, उसका जीवन अधूरा है और जिसके जीवन में केवल शक्ति हो, उसका जीवन भी अधूरा है। भारतीय संस्कृति की विशेषता है। यह ध्यान देने की बात है कि हमने धन बल को बढ़ाया, तप बल को नहीं बढ़ाया, इसलिए देश पराजित हो गया। लंबे समय तक के लिए गुलाम हो गया।
क्रमश:

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र

भाग - ६
वशिष्ठ जी और विश्वामित्र जी की आध्यात्मिकता में कहीं भी कोई खोटापन होता, कहीं मन में प्रतिस्पद्र्धा होती, तो ऐसा संभव नहीं होता। वशिष्ठ जी स्वयं लेकर जाते राम जी को या नहीं जाने देते, लेकिन वशिष्ठ जी श्रेष्ठ भावों को समझ रहे थे। आज के ऋषियों-संतों को देखना चाहिए, यदि आज ऐसी स्थिति हो, तो वे क्या करेंगे। विश्वामित्र जी लेने आए हैं, पहली बार राम जी को, ऐसे कर्म के लिए जाना है और इसी यात्रा में विवाह का भी योग बनना है। तो वशिष्ठ जी के स्थान पर कोई अन्य संत या ऋषि होता या आज का कोई धर्माचार्य होता, तो अपने शिष्य को देता क्या? दशरथ जी चाहते भी, तो मना कर देता या कहता कि मैं लेकर आऊंगा, लेकिन धन्य हैं वशिष्ठ जी, उनका ऋषित्व विशिष्ट है, उनमें कहीं से भी कोई त्रुटि नहीं है। इसलिए उन्होंने दशरथ जी को समझाया। समझाया कि राम जी क्यों आए हैं। राम तो संपूर्ण विश्व के लिए राम हैं, संपूर्ण विश्व में धर्म की संस्थापना के लिए राम जी आए हैं। रामराज्य की संस्थापना के लिए आए हैं, सब जगह प्रेम हो, अच्छे संस्कार हों, इसके लिए आए हैं। उस जगह के निर्माण के लिए आए हैं, जहां - सबहीं करें परस्पर प्रीति।
सबके लिए सबके मन में प्रेम हो, सभी लोग जीवन के चरमोत्कर्ष को प्राप्त करके जीवन जीएं। दशरथ जी ने वशिष्ठ जी के कहने पर राम-लक्ष्मण को जाने दिया। आज तक राम, लक्ष्मण के गुरु वशिष्ठ जी थे, लेकिन उन्होंने अपने शिष्यों को कहा कि ये केवल मेरे ही शिष्य नहीं हैं, अब विश्वामित्र जी के भी शिष्य हैं।
आश्वस्त होने के बाद दशरथ जी ने सहर्ष कहा -
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आना नहिं कोऊ।।
यात्रा के दौरान विश्वामित्र जी ने अनेक तरह की शिक्षाओं, साधनाओं से राम जी को परिचित कराया। ऐसे दिव्यास्त्र दिए, जो इन्हें साक्षात भगवान शंकर से मिले थे। ईश्वर के रूप में राम जी सबकुछ जानते हैं, लेकिन तब भी लोकाचार के लिए राम जी को कई शिक्षाओं से विभूषित किया।
आज के आचार्यों, धर्माचार्यों को सीखना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन में लोगों को पे्ररणा लेनी चाहिए। सभी दृष्टियों से लौकिक और अलौकिक अवस्थाओं को जानने वाले शिष्य को कोई दूसरे को देता है क्या? मानवता के प्रति भले का भाव वशिष्ठ जी जैसा किसी के पास दिखता है क्या? आज के संतों में वैसा समर्पण है क्या? आज तो ज्यादातर लोग गर्त में जा रहे हैं। आज दो रुपया देने वाला चेला भी दूसरे मठ में जाता है, तो उसके गुरु को बुरा लगता है। बड़े-बड़े संत वेषधारी आचार्य बड़े-बड़े धर्माचार्य एकदम तड़पने लगते हैं कि कहां चला गया चेला, निकम्मा है, गधा है। बहुत विकृत्ति आई है धर्माचार्यों में।
विश्वामित्र जी को कितना अच्छा लगा होगा, वशिष्ठ जी उनका भरपूर सम्मान कर रहे हैं, अपने शिष्यों को मेरे साथ भेज रहे हैं। कैसा अनुभव हुआ होगा उन्हें, यह वैदिक सनातन धर्म का सुख जिसका कोई विकल्प नहीं है। ऐसे चरित्र कहां मिलेंगे, सभी लोगों को ऐसे ऋषियों, संतों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
तो रामजी गए उनके साथ ऋषि-मानवता सेवा के लिए। रामजी के बोल तभी पहली बार निकलते हैं, उसके पहले उनके वचन का कोई उदाहरण नहीं मिलता, तुलसीदास जी ने पहली बार राम जी को बोलते हुए विश्वामित्र जी के साथ ही दिखाया। जब यज्ञ प्रारंभ होने वाला था, तब सबसे पहले राम जी ने जो कहा, उसे तुलसीदास जी ने लिखा, उसके पहले उनके किसी वचन को नहीं लिखा। इतनी बड़ी आयु तक वे सावधान थे कि जब राम-वचन की शुरुआत करूंगा, तो जिसके लिए ईश्वर ने अवतार लिया है, उसके लिए करूंगा।
आज खा लिया, आज वहां जाने का मन है, आज यह खेलूंगा, जैसी बालपन वाली बातों का विवरण तुलसीदास जी ने नहीं किया। ईश्वर का अवतार कोई ऐसी बातों के लिए होता है क्या, ईश्वर जिसके लिए आते हैं, उसी का महत्व है।
क्रमश:

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र

भाग - ५
ऐसे धर्म भी हैं, जिनके कथित संतों को भक्तों ने ही मार दिया। दंड विधान था ही नहीं। लोग एक हत्या नहीं झेल पाते, लेकिन यहां सौ पुत्रों की हत्या हो गई, फिर भी वशिष्ठ निर्लिप्त थे, गुणों की क्या ऊंचाई है। ऐसा किसी धर्म में नहीं मिलेगा, मानवता के लिए यह अनुकरणीय है, अच्छे संस्कार होने चाहिए, जो भी अच्छा कार्य करे, उसकी प्रशंसा की प्रवृत्ति होनी चाहिए। हर कोई पवित्र जीवन को प्राप्त करे, बदले की कोई भावना नहीं रहे, तब जो समाज बनेगा, वह वरदान स्वरूप होगा।
वस्तुत: यही जीवन का अद्भुत क्रम है, जो हम विश्वामित्र जी के जीवन में देखते हैं। हम अपने जीवन का ध्यान करें, अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए बल को बढ़ाने के लिए तप को बढ़ाने के लिए, जो भी आंतरिक भावों को बढ़ाने के लिए सकारात्मक है, हम निरंतर साधना करें, तप करें, जप करें, संयम-नियम करें। ऐसा करते-करते धीरे-धीरे हमारा विकास होता जाएगा। हम अपने जीवन को भी सार्थक करेंगे और दूसरे के जीवन को भी। रामराज्य जो दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मानक राज्य है, जहां लोग सभी दृष्टि से संपन्न और आनंदित थे, जहां किसी तरह का संताप नहीं था, जहां किसी तरह का विरोध नहीं था, जहां परस्पर प्रेम था, उस रामराज्य को अनेक लोगों ने अपना बल दिया होगा, प्रयास किया होगा। अपना सर्वस्व अर्पित किया होगा, लेकिन विश्वामित्र जी भी वशिष्ठ जी के समान ही रामराज्य के संस्थापकों में गिने जा सकते हैं। यह अद्भुत घटना है, राम जी पहली बार विश्वामित्र जी के आचार्यत्व में ही घर से निकलते हैं। ईश्वर मानवता के लिए ही आता है, समाज के परिष्कार के लिए आता है, वैदिक सनातन धर्म की यही मान्यता है। धर्म का सबसे बड़ा स्वरूप यज्ञ को माना जाता है। धर्म के अनेक रूप है, दान भी धर्म है, दया भी धर्म है, सेवा भी धर्म है, तीर्थाटन भी धर्म है, माता-पिता गुरु, गऊ, दरिद्रनारायण की सेवा भी धर्म है, धर्म के अनेक विकल्प हैं, लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान यज्ञ का है। देवताओं को सम्बोधित करके जब समर्पण होता है, तब यज्ञ संपन्न होता है।
तो भगवान के अवतारों में आदर्श अवतार है भगवान श्री राम का। धर्म के सर्वश्रेष्ठ कर्म के संपादन के लिए यज्ञ की सुरक्षा में अपने को अर्पित करने के लिए विश्वामित्र जी के आचार्यत्व में अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ राम जी वन जाते हैं। तैंतीस हजार वर्षों का काल है राम जी का, लेकिन कर्म का पहला प्रयोग, उसके लिए जो पहली यात्रा हुई, वह विश्वामित्र जी के साथ ही शुरू हुई। कौन सेवा के क्षेत्र में, धर्म के क्षेत्र में लेने आया, कौन लेकर गया, यह बहुत महत्व रखता है। विश्वामित्र जी ने ही राम जी को मांगा और दशरथ जी से मांगकर ले गए। उन्हें मालूम था कि भगवान प्रकट हुए हैं, मैं अयोध्या जाऊंगा, तब राम जी मिलेंगे।
राम जी लौकिक दृष्टि से विश्वामित्र जी के भी शिष्य हैं। व्यावहारिक दृष्टि से मानवीय दृष्टि से विश्वामित्र जी को शाष्टांग प्रणाम करते हैं, लेकिन वास्तव में विश्वामित्र जी भक्त हैं राम जी के। उन्हें मालूम है कि मैंने जो तप किया था, उसका फल हैं राम जी। फल देने वाले भी यही हैं और मुख्य लक्ष्य भी यही हैं, उनके लिए ही मैंने तप किया था। विश्वामित्र जी ले गए राम जी को यज्ञ रक्षा के लिए। पहले यह बात समझ में नहीं आ रही थी महाराजा दशरथ जी को, राम जी को भेजने को तैयार नहीं हो रहे थे। 
दशरथ जी को राम जी बहुत प्रिय थे, प्रेम अतुलनीय था, अपने प्राणों से अधिक पे्रम वे अपने पुत्र राम जी से करते थे। यह बात ध्यान देने योग्य है कि वशिष्ठ जी ने कहा कि मैं लेकर आता हूं, दशरथ जी राम जी को भेजने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं, मैं समझाऊंगा, तैयार करूंगा।
क्रमश:

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र

भाग - ४
बाद में वे राजर्षी के रूप में प्रतिष्ठित हुए, लेकिन यहां भी मेनका के सौंदर्य ने उन्हें पराजित कर दिया, तपश्चर्या को नष्ट कर लिया। काम ने उनके तप को निगल लिया। तब उन्हें ग्लानि हुई, लज्जा हुई, इसके बाद उन्होंने फिर तपस्या की। उनका दुनिया भर में डंका बजा। इसके बाद के घटनाक्रम में विश्वामित्र जी ने वशिष्ठ जी के पुत्रों को मार दिया।
ध्यान देने की बात है, काम और क्रोध, दोनों ही तपश्चर्या के घोर विरोधी हैं। जब हम आध्यात्मिक जीवन में कुछ करना चाहते हैं, तो हमें अनेक तरह के दुर्गुणों से बचना चाहिए। अवरोधकों से हमें दूरी बनाकर रखना चाहिए। सबसे मुख्य है कि हमें काम और क्रोध से बचना चाहिए। विश्वामित्र जी तो दोनों से ही पराजित हो रहे हैं। मेनका के रूप में काम ने पराजित कर दिया और क्रोध के रूप में विश्वामित्र जी के पुत्रों को मारकर अपने तपस्वी जीवन को लांछित कर लिया। जो काम और क्रोध पर ही विजय नहीं प्राप्त करेगा, वह कभी जीवन के सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता, कभी ऋषित्व को प्राप्त नहीं कर सकता, ईश्वरीय जीवन को प्राप्त नहीं कर सकता, वह अपने जीवन की परमावस्था को नहीं प्राप्त सकता। ऐसी स्थिति में सौ बच्चों की हानि के बावजूद वशिष्ठ जी का चित्त अत्यंत व्यवस्थित था, कहीं से कोई चिंता नहीं, कहीं से कोई लांछना नहीं, कहीं से कोई भेद नहीं, पूर्ण रूप से वे शांत हैं। कहीं भी कितनी भी बड़ी हानि हो जाए, लेकिन मन में विकृति नहीं आनी चाहिए, तभी आदमी आध्यात्मिक जीवन में ऊंचाई प्राप्त करता है।
जब वशिष्ठ जी शांत रहे, तो यह बात विश्वामित्र जी को बहुत खली। उन्हें लगा कि राजर्षित्व से ब्रह्मर्षित्व को प्राप्त करना चाहिए। ऐसे कर्मों से तो कोई राजर्षि नहीं बनता था, तो ब्रह्मर्षि क्या बनेगा? गलत आचरण वाला, काम, क्रोध का शिकार व्यक्ति संत कैसे होगा? जो ऋषि के ही पुत्रों को मार दे, वह संत कैसे बनेगा, उन्हें ग्लानि हुई, उन्होंने नए सिरे से अपने जीवन को संवारा। अद्भुत तप किया। जो लोग ऊंचाई पर जाने का प्रयास करते हैं, उन्हें प्रलोभन मिलते हैं, लेकिन भटकना नहीं चाहिए। दृष्टि अपने लक्ष्य पर रहनी चाहिए। जो आकाश पर जा रहा है, वही जमीन पर गिरता है। तप के क्रम में उन्होंने काम और क्रोध पर विजय प्राप्त की, इस क्रम में अनेक तरह के विघ्नों को उन्होंने पार किया। वे ऋषित्व की विशिष्टतम स्थिति में पहुंचे। उनका संपूर्ण संसार जय-जयकार करने लगा। उन्होंने सभी देवताओं, ऋषियों को प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी आए और कहा कि मैं बहुत प्रसन्न हूं। तुम वरदान मांगो।
तब ब्रह्मा जी को उन्होंने कहा कि आप मुझे वरदान दीजिए ब्रह्मर्षि बनने का। उन्होंने कहा, वशिष्ठ जी यदि ये उपाधि दें, सम्मान से दें, तब मुझे संतोष होगा। ब्रह्मा जी की प्रेरणा से वशिष्ठ जी आए, वशिष्ठ जी विश्वामित्र जी भी के तप के बारे में जानते थे, इसलिए विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि मनाने में देर नहीं की।
ब्रह्मर्षि के रूप में उन्होंने विश्वामित्र को सम्मान दिया। प्रसन्नता व्यक्त की। इस घटना के बाद विश्वामित्र जी सर्वश्रेष्ठ ऊंचाई पर पहुंचे। लेकिन सबसे बड़ी ऊंचाई तो सनातन धर्म की हुई, यहां केवल प्रभाव से उपाधियां नहीं मिलतीं, आध्यात्मिक जगत में कोई संस्था उपाधि नहीं बांटती, लोग उपाधि नहीं बांटते। जब तक व्यक्ति सही मायने में ऊंचाई पर नहीं पहुंचते, तब तक उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता। विश्वामित्र जी ने वशिष्ठ जी का कितना विरोध किया था, कितना लांछित किया था, इसके बावजूद वशिष्ठ जी में लालसा नहीं थी। दुनिया के इतिहास में शायद ही कोई ऐसी घटना है।
इस घटना से प्रेरणा लेनी चाहिए कि अपना दुश्मन भी अगर सुधार करता है, आंतरिक-आध्यात्मिक श्रेष्ठ गुणों, मानवता को वरदान स्वरूप जो ऊंचाई को प्राप्त करता है, तो उसे हमें सहर्ष गले लगाना है और अपनी हानि के बावजूद उसे सम्मान देना है। किसी तरह का विद्वेष नहीं रखना है, लेकिन आज की दुनिया में यह काम बंद हो गया है, आज जो संत समाज है, आज जो साधकों का समाज है, उसमें यह काम कम हुआ है, लेकिन वास्तव में सनातन धर्म में ऐसा नहीं होना चाहिए।
क्रमश:

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र

भाग - ३
यह कितना महान देश है, अतिथिदेव भव का देश है। वशिष्ठ जी ने अपने तप और शक्ति के दम पर उनके यहां विराजमान कामधेनु पुत्री नंदिनी की कृपा से विश्वामित्र जी और उनकी सेना का पूरा सम्मान किया। कल्पना नहीं कर सकते थे विश्वामित्र जी, अतिथि सत्कार की कोई ऐसी विधा या कर्म नहीं था, जो वशिष्ठ जी ने नहीं किया। परंपराओं का भरपूर पालन हुआ, अतिथि गदगद हो गए। बहुत बड़ी घटना हो गई। सैनिकों को आश्चर्य हो गया। सभी को लगा कि यह सम्मान तो कहीं प्राप्त ही नहीं हुआ था, पता नहीं कहां से आज ईश्वर तुल्य महर्षि अपनी संपूर्ण सदश्चर्या की शक्ति को लेकर अपनी गऊ नंदिनी की पूरी महिमा को लगाकर सम्मान कर रहा है, बहुत गदगद हुए विश्वामित्र जी।
यहीं से वशिष्ठ और विश्वामित्र के संबंध की शुरुआत हुई। विश्वामित्र जी का मन ललचा गया नन्दिनी की महिमा देखकर। उन्होंने कहा, यह गऊ आप हमें दे दीजिए।
विश्वामित्र जी के पास दान लेने की योग्यता नहीं है, लेकिन वे मांगने लगे। वे अपने धर्म से हटने लगे। लालच वश भी यदि वे ऐसा कर रहे हैं, तो भी वे अपने स्थान से गिर रहे हैं। उन्होंने यह नहीं सोचा कि मुझे वशिष्ठ जी को देना चाहिए, लेकिन मैं मांग रहा हूं।
वशिष्ठ जी ने कहा कि मैं इसके द्वारा अपने यज्ञ सफल बनाता हूं, मेरी संपूर्ण व्यवस्था का यह मूल स्रोत है, सबका सत्कार मैं इससे करता हूं, संसाधन अर्जन से लेकर हर सुविधा मैं इसी से लेता हूं, इसलिए मैं गऊ नहीं दे सकता, क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है मेरे पास। विकल्प होता, तो मैं दे देता।
यह ध्यान देने की बात है कि विश्वामित्र जी ने जो याचना की थी, वह क्षत्रिय धर्म के खिलाफ थी। वे ऋषि पर आक्रमण नहीं कर सकते थे, राजा पालक होता है, वह मांगने वाला नहीं होता, देने वाला होता है। राजा को ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए कि वह ऋषियों को देने की बजाय मांगने लग जाए।
ऋषि से आध्यात्मिक शक्ति का लाभ उठाना चाहिए, उससे कुछ मांगना, लेना नहीं चाहिए। विश्वामित्र जी ने गलत काम किया। उनका जो प्रजापालक स्वरूप था, वह सब यहां लुप्त हो गया और नंदिनी को बलात ले जाने का उन्होंने प्रयास किया, तो लांछित हो गए, इतिहास उन्हें इसके लिए कभी माफ नहीं करेगा। महाराजा ने अपनी संपूर्ण शक्तियों को नंदिनी के लालच में लांछित कर लिया। गर्त में पहुंचा दिया, अशोभनीय कार्य किया। वशिष्ठ जी के मना करने पर भी वे बलात नंदिनी को ले जाने लगे, लेकिन वशिष्ठ जी शांत बैठे थे, कोई हलचल नहीं, बाहर भी नहीं, मन में भी नहीं, धैर्य की जो अवस्था होती है, संत की जो अवस्था होती है, लाभ और हानि में भी वह समान स्वरूप में रहता है।
नंदिनी ने जाते हुए उनकी ओर देखा, कहा कि आप चाहते हैं, तो मैं अपनी सुरक्षा के लिए कुछ करूं।
वशिष्ठ जी ने भरे हृदय से कहा, करो।
तो नंदिनी ने भयानक क्रोध किया, अपने नथुनों से असंख्य सैनिकों को पैदा कर दिया, जो सैनिक कामधेनु पुत्री नंदिनी की दिव्य शक्ति से पैदा हुए थे, उन्होंने विश्वामित्र जी की सेना को पराजित कर दिया। अद्भुत और अनुपम प्रताप दिखा। इस बड़ी हार से विश्वामित्र बहुत लज्जित हुए। क्षत्रिय बल का घमंड टूटा, वे सोचते थे, क्षत्रिय बल से कोई भी बड़ा नहीं है, लेकिन उन्हें लगा कि क्षत्रिय बल से ब्रह्म बल बड़ा है, ज्यादा प्रभावी है। तभी उन्होंने यह संकल्प लिया कि मैं भी तप करूंगा। मैं भी ऋषि शक्ति को प्राप्त करूंगा। वे तप में जुट गए, आगे बढ़ते गए।
क्रमश:

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र

भाग - २
विश्वामित्र का कद बढ़ा, तो संयम, नियम से बढ़ा, उन्होंने अपने जीवन को पकाया, स्वयं उच्च अवस्था को प्राप्त किया, तो उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि प्राप्त हुई। ये उपाधि वैसी नहीं थी, जिसे पैसा देकर प्राप्त किया जाए। आजकल दुनिया में जो उपाधियां बंट रही हैं, वैसे पहले उपाधि नहीं बंटती थी। अब किसी के प्रभाव में आकर भी ये उपाधियां दे दी जाती हैं। कसौटियों पर खरा उतरकर ही विश्वामित्र जी को ब्रह्मर्षित्व की प्राप्ति हुई। संसार के धर्मों के लिए यह एक मानक है और परम सनातन है, जो भी कसौटी पर खरा उतरता है, चाहे वह किसी जाति का हो, किसी आयु का, किसी अवस्था का, किसी भाषा का हो, स्वभाव का हो, उसे ऊंचाई मिलनी चाहिए। समाज, संप्रदाय को, परंपरा को उनका अनुसरण करना चाहिए, विश्वामित्र जी को संसार में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ।
ब्राह्मण को सर्वोच्च माना जाता है और उसने ऐसे काम भी किए हैं, मानवता का उद्धार करना, जितना संयम, उद्यम, अपने को पका-पका कर परम तत्व को प्राप्त करना, मंगल भाव को प्राप्त करना, उसका उपयोग समाज के लिए करना। तो ब्राह्मण ने जितना किया है, उतना किसी ने नहीं किया, इसलिए ब्रह्मर्षित्व की उपाधि कोई केवल ब्राह्मणों की उपाधि नहीं है, यह मानवता की श्रेष्ठ उपाधि है, इससे बड़ी उपाधि हो ही नहीं सकती। जो ईश्वर को जान ले, जो ईश्वर की व्यवस्था को समझ ले, जीवन में उतार ले, जो संपूर्ण संसार के लिए हो गया, जिसमें कोई विद्वेष नहीं है, कोई भी विकृति नहीं है, कदाचार नहीं है, भ्रष्टाचार नहीं है, जिसमें छोडऩे योग्य कुछ नहीं है, उस अवस्था को प्राप्त करना। संसार की सबसे बड़ी उपाधि विश्वामित्र जी ने प्राप्त की। यह उन्होंने तप और त्याग के आधार पर प्राप्त किया, यह बल या धन से प्राप्त स्थान नहीं है। किसी को प्रभावित करके प्राप्त स्थान नहीं है।
राजा विश्वामित्र अपनी सेना के साथ जंगल में विहार कर रहे थे, पर्याप्त मात्रा में सैनिक उनके साथ थे। जितने साधन आवश्यक होते हैं, वो सब थे, बड़ा ही प्रताप था। ऐसी अवस्था में भी वशिष्ठ जी ने उन्हें आकर्षित किया। वे वशिष्ठ जी के आश्रम पहुंच गए। अतिथि तो देव समान होता है। वशिष्ठ जी ने उनका पूरा सत्कार किया। विश्वामित्र जी को कहा कि आप हमें सत्कार का अवसर दें, यहां आप जो कहेंगे, हो जाएगा।
विश्वामित्र जी को लगा कि ये ऋषि हैं, मेरे पास इतनी बड़ी सेना है, सबका सम्मान, सत्कार ये ऋषि कैसे करेंगे। इनका आश्रम छोटा-सा है, इसमें कुछ ही लोग हैं, संसाधन भी अल्प हैं, ऐसी अवस्था में इतनी बड़ी सेना का पालन ये कैसे कर सकते हैं। बहुत महंगा पड़ेगा। उन्होंने मना किया, लेकिन वशिष्ठ जी ने कहा कि सब हो जाएगा, आप आतिथ्य देने के लिए तैयार हो जाइए। बहुत आग्रह करने के बाद राजा विश्वामित्र ने स्वीकार किया कि ठीक है, हम मना नहीं कर सकते।
संसार का, संपूर्ण सृष्टि का, संपूर्ण मानवता का, सबसे तेजस्वी ऊर्जावान, अपनी अंतरात्मा व व्यक्तित्व को निखारने वाला, जिसका जीवन ईश्वर तुल्य जीवन है, जिसके जीवन में रोम-रोम से संयम-नियम-तप झलक रहे हैं, ऐसा ऋषि एक राजा के सम्मान के लिए कह रहा है और बहुत कायदे से कह रहा है, अपनी अंतरात्मा से कह रहा है। बहुत बड़ी बात है। यह क्रम अनुकरणीय क्रम है, वैदिक सनातन धर्म का एक आदर्श क्रम है।
क्रमश:

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र


नित नई राह निकाल बढ़े

महाराज गाधि जी के पुत्र थे विश्वामित्र जी। राज परिवार के थे, क्षत्रिय वंश में समाज के विस्तार का, शक्तियों को बढ़ाने का शौक होता है, बहुत तरह की अच्छाइयां और बुराइयां होती हैं। वे प्रजापालक भी थे, लोगों के संरक्षण की चिंता करना, अच्छे राजाओं में इनकी गणना होती थी, ये पुरुषार्थी राजा थे, यह नहीं कि दूसरे के द्वारा अर्जित धन संपदा से ही संतुष्ट हो गए, दूसरों से अर्जित करके ही जीवन जीने का उनमें विश्वास नहीं था। एक पुरुषार्थी अपने जीवन में जिन ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है, वैसा उन्होंने किया। केवल मनोरथ करने से किसी की सिद्धि नहीं होती, जंगल का सिंह भी अगर बैठा रहे या सोया रहे, तो उसके पास कोई भी नहीं आएगा। राजा को ही प्रयास करना पड़ता है। जब कोई पुरुषार्थी होगा, तभी तो उसके मनोरथ पूरे होंगे। वे जीवन भर पुरुषार्थ करते रहे। कभी विराम नहीं लिया। भगवान की दया से ईश्वर के आशीर्वाद से इन्हें सभी क्षेत्रों में सफलता मिली। उनके जीवन से सबसे बड़ी प्रेरणा ही यही है कि व्यक्ति को पुरुषार्थी होना चाहिए। अच्छी चीजों के लिए प्रयास करना चाहिए। जो जीवन को समृद्ध करने वाला है, जो समाज को समृद्ध करने वाला है, मानवता को समृद्ध करने वाला है, इस तरह के पुरुषार्थ को कभी बंद नहीं करना चाहिए। निष्क्रिय जीवन ठीक नहीं है। पूर्णता के बाद भी पुरुषार्थ नहीं छोडऩा चाहिए। पुरुषार्थ को कभी विराम नहीं देना चाहिए। उसे कुंठित नहीं करना चाहिए। जीवन में जो भी शक्ति मिली है, उसके साथ हमें लगे रहना चाहिए, परिवार, समाज के लिए, अपने लिए। जीवन के सभी क्षेत्रों में विश्वामित्र जी ने काम किया, विद्या, तप के क्षेत्र में, राजा के क्षेत्र में भी, बल के क्षेत्र में भी, अनेक तरह की सिद्धियों को प्राप्त किया। सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह है कि ब्रह्मणत्व को प्राप्त कर लिया, राजर्षि से ब्रह्मर्षि पद को प्राप्त कर लिया और संतों की सर्वश्रेष्ठ ऊंचाई को प्राप्त किया। 
विश्वामित्र जी का जीवन अद्भुत जीवन है, उनके जीवन से सनातन वैदिक धर्म की उदारता का भी परिचय मिलता है।
ईसाइयों का सबसे प्रमुख देश अमरीका है, जो दुनिया का नेतृत्व कर रहा है, अमरीका दुनिया के संरक्षक के रूप में स्वयं को देखता है और उसकी मान्यता भी है, तो अमरीका का जो प्रजातांत्रिक जीवन है, उस जीवन में भी उद्धार आसान नहीं है।
वरिष्ठ जॉर्ज बुश के कार्यकाल में एक अश्वेत व्यक्ति को संतत्व की उपाधि मिली। ईसाई धर्म को इससे पहले २ हजार साल हो गए थे, किसी भी अश्वेत आदमी को संतत्व हासिल नहीं हुआ था। किसी अश्वेत व्यक्ति को आगे नहीं बढ़ाया गया था, लेकिन अपने वैदिक सनातन धर्म में उदारता महत्वपूर्ण है, अनुकरणीय है, यहां क्षत्रिय ब्रह्मर्षि हो गया। जब उन्होंने प्रयास किया राजर्षि से ब्रह्मर्षि होने का, तो विधिवत सम्मान हुआ, ब्रह्मा ने भी उन्हें मान्यता प्रदान की और महर्षि वशिष्ठ ने भी कहा कि ये ब्रह्मर्षि हैं, उन्हें गले लगाया, उनका अभिनंदन किया। इससे सनातन धर्म की उदारता ही प्रकट होती है। रंग के आधार पर यदि धर्म का या गरिमा का या ऊंचाई का निर्धारण हो, तो वह कौन-सा मानव धर्म हुआ, वह ऐसे में विश्व धर्म या मानव धर्म नहीं हो सकता। जो जिसके लायक है, जिस गरिमा को प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहा है, सही ऊंचाई पर पहुंचता है, तो उसे यथोचित पद मिलना चाहिए। किन्तु दूसरे संप्रदायों में इस गुण का बहुत अभाव रहा है। सिख पंथ में तो गुरु परंपरा को ही विराम दे दिया गया, गुरुग्रंथ साहब को ही गुरु के रूप में मान लिया गया। क्या यह सोचने वाली बात नहीं हो गई कि केवल ग्रंथ गुरु कैसे होगा? ग्रंथ को पढऩे वाला, जानने वाला, अपने जीवन में उतारने वाला, उसे दूसरों को समझाने की क्षमता वाला गुरु होता है। हमारे यहां वेदों की अनुपम महिमा है, लेकिन इनको जो समझे, अपने जीवन में उतारे, वही गुरु होगा। चौबीसवें तीर्थंकर के बाद जैनों ने तीर्थंकरों की परंपरा को बंद कर दिया। बौद्ध भी किनारे होने लगे हैं, दलाई लामा निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कोई पूछने वाला नहीं है।
क्रमश:

Sunday, 12 June 2016

महर्षि वशिष्ठ : ऐसा साधु न कोय

समापन भाग
कालीदास ने लिखा है - रघुवंशी राजाओं का प्राण योगियों की तरह छूट रहा है, तो इसके लिए तो अभ्यास करना पड़ेगा। संयम, नियम, तप से चलना पड़ेगा। गुरु वशिष्ठ आदर्श हैं संतों के, गुरुत्व के, संतत्व के। जितनी भी आध्यात्मिक ऊंचाइयां हैं, उसके अंतिम सोपान हैं वशिष्ठ जी। उन्होंने रघुवंश को ऊंचाई पर पहुंचाया और स्वयं पीछे रहकर संरक्षण का काम किया। निर्देशक मुख्य होता है, वह हर तरह के सुधार के लिए आग्रह करता है, प्रेरित करता है और ब्राह्मण, ऋषि, गुरु हमेशा पर्दे के पीछे रहता है, शासन के लिए आगे आने की परंपरा नहीं थी। सीधे शासन चलाना ब्राह्मणों का काम नहीं था।
कहने को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू भी ब्राह्मण थे, लेकिन ब्राह्मणत्व के लिए जो प्रयास होने चाहिए थे, जो गुण होने चाहिए थे, वो उनमें नहीं थे, लेकिन यदि ब्राह्मणत्व के जरूरी गुण उस वंश को प्राप्त हुए होते, तो यह वंश और भी ऊंचाई पर होता। उन्होंने शासक के रूप में ऊंचाइयों को प्राप्त नहीं किया जैसा रघुवंशी लोग प्राप्त करते थे। आध्यात्मिक ऊर्जा का लाभ देश को मिले, इसके लिए कोई प्रयास नहीं था।
जैसे अध्यापक बहुत अच्छा मिल जाए, लेकिन विद्यार्थी बहुत प्रयास नहीं करेंगे, पहलवान गुरु मिल जाए, शिष्य प्रयास न करे, तो सफल नहीं हो सकता। वैसे ही कितना बड़ा ही वैज्ञानिक अध्यापक हो जाए और विद्यार्थी प्रयास न करे, तो क्या लाभ होगा, इसलिए गुरु वशिष्ठ को मानक बनाकर चलना होगा। संपूर्ण संसार के लोग देश के लिए उनको प्रेरक स्तंभ बनाकर उनके अनुसार जीवन जीएं, आज भी जो पुराणों में संदर्भ हैं, विश्वास हैं, इस आधार पर हम अपने जीवन को जीएं, तो हमारा वंश ही रघुवंश हो जाएगा। हमारा जीवन ही राम जी के जैसा हो जाएगा। हमारा संपूर्ण प्रयास राम राज्य का संस्थापक प्रयास हो जाएगा। गुरु वशिष्ठ जी कहीं गए नहीं हैं, सप्त ऋषियों के रूप में मान्यता के आधार पर मौजूद हैं, बहुत खिन्न होकर भारत भूमि को देख रहे हैं, जहां रघुवंश आलोकित हो रहा था, वह भूमि कैसी हो गई। हमारे जो विचार हैं, कृतित्व हैं, जो आदर्श थे, जिसके आधार पर लोगों को प्रेरित होना था, जिससे लोग लोक, परलोक दोनों को बनाते, वो कहां गए। वशिष्ठ जी आज भी सप्तऋषि मंडल में विराजमान रहकर प्रेरित करने के लिए तत्पर हैं। कोई भी चाहे कि हमारे जीवन में रामराज्य आए, राम जी हमारे यहां प्रकट हों, रघु जी हमारे यहां प्रकट हों, हम असंख्य लोगों के लिए गंगा को लाने वाले भगीरथ जी की भूमिका में आ जाएं, तो वशिष्ठ जी से प्रेरणा लेनी पड़ेगी।
दोनों ही पक्षों में कमी आई है। संत लोग वशिष्ठ बनने के लिए प्रयासरत नहीं हैं, गाड़ी लिया, गद्दी पर बैठे, मौज से जीवन जी रहे हैं, उनमें यह इच्छा ही नहीं कि लोग उन्हें तपस्वी कहें, उन्हें तो बस पैसे की जरूरत है।
जैसे अभिनेता प्रदर्शन के लिए धन मांगते हैं, वैसे ही संत लोग भी मांगने लगे हैं। ऐसे लोग भी धर्म मंच पर विराजमान होने लगे हैं, जिनमें कोई तप-त्याग नहीं है। यह भी माना जाने लगा है कि जो जितना ज्यादा नंगा है, वह उतना ही बड़ा संत है, जिसके गले में जनेऊ है, वही ब्राह्मण है, जो बहुत बड़-बड़ करता है, वही बड़ा विद्वान है। जो चुनाव जीत जाए, वही नेता है, ये नई परिभाषाएं हैं।
पहले लोग केवल ज्ञान से बड़े नहीं होते थे, वे कर्म से बड़े होते थे, वे अपने लोगों, मानवता और संसार के लिए जीते थे। जैसे संतों ने केवल अपने लिए काम नहीं किया, सबके लिए काम किया। सभी के लिए जो काम करता है, वही तो ईश्वर है, जो अपने लिए काम करता है, वह मनुष्य है, जो अपने लिए भी नहीं करे, दूसरों के लिए भी नहीं करने दे, वह राक्षस है।
जो अपना संपूर्ण जीवन समाज के लिए दे, साधु का मतलब ही यही है कि वह अपनी संपूर्ण ऊर्जा दूसरों के लिए लगा दे। वह स्वयं भी आनंद के सागर में होता है और दूसरों को भी आनंद सागर में ले जाता है, दूसरों को भी धन्य जीवन के लिए, राष्ट्र जीवन के लिए तैयार करता है। वशिष्ठ जी आचार्य शिरोमणि हैं, जिनसे आचार्य भी सीख सकते हैं। मैं प्रार्थना करता हूं कि आप स्वयं के लोगों को शक्ति दें आशीर्वाद दें, प्रेरणा दें, शक्ति दें, हमें वशिष्ठ जैसे गुरु प्राप्त हों।
अभी तो साधु इसी बात में लगे हैं कि हमारा शिष्य हमें दक्षिणा दे। जजमान कहां डूब रहा है, उससे पुरोहित का कोई लेना-देना नहीं है। संत से सम्बंध को महत्व देना चाहिए, यह सम्बंध भोग के लिए नहीं है, लेकिन आज समाज में लोग संतों से भोग के लिए भी जुडऩे लगे हैं, इससे बुरी बात क्या हो सकती है? संत भी समाज से केवल पैसे के लिए सम्बंध बना रहे हैं, आज के ज्यादातर संतों, पुरोहितों को भी केवल भोग चाहिए। वैदिक सनातन धर्म को वशिष्ठ जी प्राप्त हुए, इसका गौरव है, पूरी दुनिया के इतिहास में वशिष्ठ जैसे गुरु किसी पंथ-संप्रदाय में नहीं हुए हैं। ऐसे पुरोहित गुरु न पहले हुए थे, न आज हैं और न कल होंगे।
हमारे देश को संपूर्ण रघुवंश जैसा होना चाहिए, संपूर्ण दुनिया रघुवंश जैसी हो जाए, रामराज्य की संस्थापना भारत में हो, पूरी दुनिया में हो। रामराज्य केवल भारत का राज्य नहीं था, पूरी दुनिया का राज्य था। रामराज्य में सभी राज्य समाहित थे, उन्हीं नियमों-कायदों से जुड़े हुए थे। आज कलयुग में भी अच्छे प्रयास जारी हैं, हम वशिष्ठ जी जैसा जीवन अपनाकर असंख्य लोगों का उद्धार करें। तभी हम अच्छे जीवन को जी सकेंगे।
जय श्रीराम

महर्षि वशिष्ठ : ऐसा साधु न कोय

भाग -६
आज जो संत का सम्मान होना चाहिए, जो सम्मान पुरोहित का होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। समाज में इसमें बहुत अंतर आ गया है। लोग केवल औपचारिक रूप से संतों से जुड़ते हैं, गुरु से जुड़ते हैं, लाभ उठाने की प्रेरणा और उसके लिए समर्पित होना, सेवा भावी होना और उसके लिए निष्ठावान होना चाहिए। संत के लिए, गुरु के लिए, जैसे रघुवंशी लोग थे, आज वैसे लोग नहीं हो रहे हैं। रघुवंशियों के मन में अपने पुरोहित के प्रति कितना विश्वास था।
ताडक़ा, सुबाहू, मारीच इत्यादि राक्षस बहुत तंग कर रहे थे यज्ञ में, जब विश्वामित्र जी यज्ञ रक्षा के लिए राम, लक्ष्मण को लेने आए, तो दशरथ जी ने मना कर दिया, मेरे बच्चे छोटे हैं, राम के बिना एक क्षण नहीं रह सकता। ये क्या लड़ेंगे राक्षसों से, ये तो बहुत छोटे हैं। मैं नहीं दूंगा पुत्र।
गुरु वशिष्ठ जी ने तत्काल कहा, राम जी आपकी गोद में बैठने के लिए आए हैं क्या, पूरे संसार को बनाने वाले संहार करने वाले हैं, इनको आप क्या समझ रहे हैं। अरे, ये तो आए ही हैं इसी काम के लिए कि यज्ञ की रक्षा कैसे हो, वेदों, ब्राह्मणों, साधुओं, संतों, तपस्वियों की सेवा के लिए, समाज के लिए काम करने वालों के लिए, पूरे संसार में अच्छे भाव हों, इसके लिए राम जी आए हैं, केवल आपके आंगन में खेलने के लिए नहीं आए हैं, इसलिए इन्हें जाने दीजिए।
दशरथ जी ने अपनी गलती को समझा और राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया। वरना विश्वामित्र नाराज हो जाते, यज्ञ की रक्षा नहीं होती, शापित कर देते दशरथ जी को, राम जी अगर जाते नहीं हैं, तो चारों भाइयों का विवाह तब नहीं हुआ होता। जो राम जी की महानता है, उनका जो जीवन है, उसका प्रारंभ विश्वामित्र जी के साथ ही हुआ। वशिष्ठ जी केवल केवल ज्ञानी ही नहीं हैं, सफल अध्यापक हैं। कौन-सा ऐसा ज्ञान विज्ञान है, जो वशिष्ठ में नहीं है। जो पढ़ेगा, उन्हें जानेगा, उसका लौकिक और आध्यात्मिक जीवन आलोकित होगा, इसलिए गुरु वशिष्ठ को प्राप्त करने के लिए हमें रघुवंशियों जैसा बनना चाहिए और रघुवंशियों जैसा बनने के लिए हमें गुरु वशिष्ठ को प्राप्त करना चाहिए और गुरु वशिष्ठ जैसा बनने के लिए हमें गुरु वशिष्ठ से प्रेरणा लेनी चाहिए। हमें अपने जीवन को सभी अच्छी क्रियाओं से जोडऩा चाहिए। हमारा जीवन रामराज्य का जीवन होगा, हमारा जीवन रघुवंशियों का जीवन होगा। गुरु वशिष्ठ की प्रेरणा से उनके मार्ग पर चलकर ही रामराज्य आ सकता है।
आज गुरुओं में संयम, नियम, तप की बहुत कमी आ गई है, यह बड़ी चिंता का विषय है। ऐसा नहीं है कि बीज नष्ट हो गया हो, संख्या कम हो गई हो, हां, वोल्टेज कम हो गया है। उतनी शक्ति नहीं रही। एक बड़ी विडंबना है, लोकतंत्र में बहुत कम लोग हैं, जो गुरु वशिष्ठ से सीखकर राज्य का संचालन करते हैं।
एक बड़े विद्वान कह रहे थे कि एक नेता उनके यहां बहुत आया करते थे, जब मुख्यमंत्री हो गए, तब भी शुरू में एक महीना में एक बार मिलने लगे, एक साल बीत गए, तो दो महीने में एक बार मिलने लगे, बाद में छह महीने में एक बार मिलने लगे, पांचवा साल आया, तो एक ही बार मिले, लेकिन जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, तो एक बार भी नहीं मिले। वे राजनीति शास्त्र के विद्वान हैं, वो सुना रहे थे मुझसे जबलपुर में। तो आज की जो राजशाही है, जो राजनेता हैं, बड़े शिक्षाविद् हैं, लौकिक शिक्षा और ऐसे ही विभिन्न क्षेत्रों के जो लोग हैं, उन्होंने चमत्कार का लाभ उठाया और बाद में मान लिया कि यह मेरा ही काम है।
ऐसे लोग अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन नहीं लाते हैं। आध्यात्मिक ऊर्जा या किसी ढंग के संत, पुरोहित से अपने को नहीं जोड़ते हैं। वे सोचते हैं कि जो मैं कर रहा हूं, मैं वहीं करूंगा, केवल हमें लाभ मिलना चाहिए। अभी क्षत्रियों में कम लोग हैं, जो संध्या वंदन करते होंगे, लेकिन वेदों में लिखा गया है कि ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों को जनेऊ पहनना चाहिए। वैश्य लोग सर्वथा दूर हो गए, वे संतों की सन्निधि में कम रहते हैं, बस कुछ देर के लिए मिले, आशीर्वाद लिया, चिंता है कि हमारा धन बढ़े, हम समृद्ध हों, लेकिन हमारा परलोक भी ठीक हो जाए, हमारी संतति भी शुद्ध हो, ऐसी कोई चिंता नहीं है। 
ऐसा आज के समाज में हो रहा है। संतों, ब्राह्मणों, विद्वानों से आशीर्वाद का संपर्क है, वास्तविक लाभ उठाना नहीं चाहते। उनके विचारों के अनुसार अपने जीवन क्रम को बनाना नहीं चाहते। केवल गुरु वशिष्ठ आशीर्वाद दे दें, काम तो आज के लोग अपनी मनमर्जी से ही करेंगे।
राम जी सबकुछ जानते हैं। तुलसीदास जी ने लिखा है...
गुरुगृँह गए पढऩ रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई।
वशिष्ठ जी वेद-पुराण सुनाते हैं, राम जी अत्यंत आदर के साथ सुनते हैं, जैसे कुछ जानते ही नहीं हों। उन्हें सब मालूम है। परमात्मा हैं, तो कौन-सा ज्ञान होगा, जो उनमें नहीं होगा, लेकिन इसके बाद भी वे अपने गुरु की पूरी बात सुनते हैं। समाज का भी बड़ा दूषण है, जो लाभ उठाना चाहिए पुरोहित से, ब्राह्मण से, संत से, गुरु से, वह नहीं उठाया जा रहा है। लोग अपने जीवन की गतिविधियों को नहीं सुधार रहे हैं, केवल गुरु महाराज का आशीर्वाद मिले, मैं खूब कमाऊं, खूब भोग करूं, थोड़े रुपए इनको भी दे दूं, बस इतना ही सम्बंध रह गया है। इसलिए समाज में जितना लाभ होना चाहिए लोगों को, उतना नहीं हो रहा है।
आज गायत्री जपने में बड़ी क्षमता है। कहा जाता है ब्राह्मणों ने जो ज्ञान अर्जित किया, वह गायत्री की महिमा से किया, व्रत, तप की महिमा से पूरे संसार में झंडा फहरा दिया। तो आज बड़ी दोष की अवस्था है, लोग ज्ञान से लाभ नहीं लेना चाहते हैं, केवल चमत्कार का लाभ चाहते हैं। रघुवंशी लोग केवल आशीर्वाद का चमत्कार नहीं चाहते थे।
क्रमश:

महर्षि वशिष्ठ : ऐसा साधु न कोय

भाग -५
जैसे सूर्य का प्रकाश बहुत काम करता है, लेकिन ब्रह्मर्षि नहीं बना सकता, वह संसार की सभी वस्तुओं को बनाता है, लेकिन क्या वह कोई ब्रह्म ज्ञानी पैदा करेगा, क्या कोई रघुवंश को पैदा करेगा? रघुवंशी सूर्यवंशी ही हैं, लेकिन रघुवंशियों को जो ज्ञान हुआ, वह वशिष्ठ जी के कारण ही हुआ।
आज सभी गुरुओं को गुरु वशिष्ठ से प्रेरणा लेनी चाहिए, वह नहीं हो रहा है। गुरु वशिष्ठ होने के लिए बड़े त्याग ज्ञान की जरूरत है। रोग रहित रहने की कामना, तमाम तरह की जीवन की कमियों से दूर रहने की कामना। राजा का पद तो तुच्छ है, जिस अवस्था में पुरोहित रहता है, अपने जजमान के यहां, वहां राजा नतमस्तक होता है, जिसके चरणों की धूल के लिए तरसता रहता है। उसके आशीर्वाद से ही वह राजा है, वैभवशाली है, उसका ज्ञान बढ़ रहा है, उसके वंश की वृद्धि हो रही है। आज के संतों को गुरु़ वशिष्ठ से प्रेरणा लेनी चाहिए, तभी उनके जजमान का वंश रघुवंश के समान होगा, वहां राम जी प्रगट होंगे और रामराज्य की स्थापना होगी।
राम जी के जंगल जाने के बाद भी रघुवंश चला, भरत के दौर में भी रघुवंश आगे बढ़ा। अध्यात्म रामायण में लिखा है भरत जी अनशन करने लगे कि राम जी साथ चलेंगे, तभी अनशन तोडूंगा, नहीं तो शरीर छोड़ दूंगा। 
गुरु वशिष्ठ ने कहा कि तुम क्या बालकपन कर रहे हो, एक बार आंख घुमाया, तो भरत जी आकर चरणों में बैठ गए। यदि भरत जी शरीर छोड़ देते, तो राम जी बहुत मुश्किल में पड़ जाते, जंगल से लौटना भी नहीं था, पिता जी ने जो वरदान दिया था, वह यदि नहीं पूरा होता, तो पाप लगता, वे जो स्वर्ग में गए थे नीचे उतर आते। राम जी बार-बार दोहराते हैं, पिता की कीर्ति अनुकरणीय है, अनुपम है, उसके लिए हम लोगों को प्रयास करना चाहिए, उन्होंने माता जी को वरदान दिया था, यदि वह वरदान पूरा नहीं करते हैं, तो निश्चित रूप से कीर्ति नष्ट होगी। हम लोग पुत्र होकर क्या करेंगे, हमारा पुत्रत्व तब नष्ट हो जाएगा, जब पिता स्वर्ग से नीचे आ जाएंगे। तो इन सभी क्रमों, स्थानों व्यवस्थाओं में गुरु वशिष्ठ की अहम भूमिका है और गुरु वशिष्ठ कहीं से भी लालची नहीं हैं, क्रोधी नहीं हैं, संपूर्ण ज्ञानी हैं। वे केवल ज्ञानी ही नहीं हैं, ज्ञान उनके रोम-रोम में उतरा हुआ है। संसार में तमाम व्यावहारिक कर्म के वे ज्ञाता हैं, नियामक हैं, प्रेरक हैं, आज के गुरुओं को निस्संदेह प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम भी गुरु वशिष्ठ के जैसे बनें। हमारा ज्ञान ऐसा बढ़े कि हम ईश्वर के सदृश हो जाएं, हमारा नियम, संयम, प्रतिष्ठा, हमारी समाधि, हमारा द्वंद्व, काम करने का गुण ऊंचाई को प्राप्त हो, हम अपने कमाए हुए धन से अपना भी भला करें, अपने जजमान का भी भला करें, राज्य का भी भला करें। हमारा इतना वोल्टेज हो या इतनी ऊर्जा हो तप, ज्ञान, विज्ञान की कि उससे संपूर्ण संसार लाभान्वित हो। संपूर्ण संसार पे्ररित हो। इसके लिए हमें गुरु वशिष्ठ से प्रेरणा लेकर और गुरु वशिष्ठ के समान बनकर लोगों को लाभान्वित करना चाहिए। यह संतत्व की पराकाष्ठा है। यदि किसी को संत में निष्ठा नहीं हो रही है, तो उसे वशिष्ठ जी को ही संत में रूप में देखते हुए प्रेरणा लेनी चाहिए।
क्रमश:

महर्षि वशिष्ठ : ऐसा साधु न कोय

भाग -४
आजकल ऐसे संतों-ऋषियों का जो अभाव दिख रहा है, उसमें सबसे महत्वपूर्ण जो बात है कि आजकल का जो पुरोहित है, उसे न तो पूरा ज्ञान है और लोभ वृत्ति भी बहुत बढ़ गई है। व्यावहारिक ज्ञान के अभाव की स्थिति है। जैसे तैसे पुरोहित कर्म किया और चलता बना, इसकी चिंता नहीं है कि जजमान का भला हुआ या नहीं हुआ। न उसे यह ज्ञान है कि कैसे भला होगा, यदि ज्ञान है, तो अपने जजमान के लिए समर्पण नहीं है, कृतज्ञता नहीं है कि हम जजमान से सम्मान ले रहे हैं, धन ले रहे हैं, तो हमारे जजमान का भला होना चाहिए। घातक स्वरूप पैदा हो गया है, ब्राह्मणों में, साधुओं में, कइयों को तो केवल पैसे से मतलब है, जजमान का भला हो, उससे कोई मतलब नहीं है। जैसे अपने-अपने क्षेत्र में लोग अभ्यास करते हैं, अभ्यास के बल पर आगे निकलते हैं, वैसे ही यदि कोई संत बनना चाहता है, तो उसे संयम, नियम, कठोर परिश्रम की जरूरत है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए बहुत प्रयास करने की जरूरत पड़ती है। जिस जजमान से जुड़ा है, उसके प्रति पूरी समर्पित भावना होनी चाहिए। हमारे जजमान का जरूर भला हो, विपत्ति टले, लेकिन आज के पुरोहित ऐसा करते नहीं हैंं। ज्यादातर लोगों का भाव यही है कि हमें तो पैसा मिले, नहीं हुआ, तो नहीं हुआ, हम क्या करें। संकट में जजमान हैं, तो हैं, हमें क्या लेना देना? ऐसे गुरु वशिष्ठ नहीं थे, राज्य की जो समस्याएं थीं, उसका समाधान करते थे, ठीक उसी तरह से रघुवंशियों का भी उन्होंने समाधान किया। रघुवंश उस समय दुनिया का केन्द्रीभूत वंश था, कोई छोटा-मोटा राज्य नहीं था, आज जैसे संयुक्त राष्ट्र दुनिया का केन्द्र बना हुआ है, सारी दुनिया जब उससे जुड़ी हुई है, ठीक उसी तरह से रघुवंश से बाकी वंश जुड़े हुए थे, पूरी दुनिया के लिए रघुवंश मानक था, आदर्श था, पे्ररक संस्थान था। संपूर्ण संसार को उससे प्रेरणा मिलती थी, सभी राजा-महाराजा उससे प्रेरित होते थे। ऐसे वंश को गुरु वशिष्ठ जी ने ही तैयार किया था। उनमें क्षमता थी सभी तरह की। यदि क्षमता नहीं होती, तो विश्वामित्र ब्रह्मर्षित्व को प्राप्त नहीं होते।
विश्वामित्र जी एक बार वशिष्ठ जी की गऊ कामधेनु पुत्री नंदिनी का अपहरण करना चाहते थे, गऊ नहीं ले जा पाए, गऊ ने ही सैनिकों को पैदा कर दिया और विश्वामित्र जी की सेना हार गई, तब से विरोध चला और चलता रहा। ऋषि से पराजित होने के बाद विश्वामित्र जी को लगा कि सामान्य बल से तपोबल श्रेष्ठ है। परिणाम यह हुआ कि भगवान की दया से उन्होंने बहुत तप किया। भगवान शंकर से उन्हें धनुर्वेद की शिक्षा मिली, भगवान ने उन्हें दिव्यास्त्र प्रदान किए। दिव्यास्त्र लेकर विश्वामित्र जी ने फिर वशिष्ठ को मारना चाहा, लेकिन उनके आक्रमण को वशिष्ठ जी ने ब्रह्मदंड से पराजित कर दिया। विश्वामित्र जी चाहते थे कि किसी भी तरह से वशिष्ठ जी को नुकसान पहुंचाया जाए, उन्हें आत्मसमर्पित होने के लिए तैयार करा दिया जाए, उनके सौ पुत्रों को भी मार दिया, किन्तु वशिष्ठ जी ने अपने ऋषित्व को कहीं भी क्षतिग्रस्त नहीं होने दिया। विश्वामित्र ने फिर तपस्या शुरू की। बताया जाता है कि उन्होंने महाराज सुदास को शाप देकर बारह वर्ष के लिए राक्षस बना दिया, उस राक्षस ने ही वशिष्ठ जी के पुत्रों को नष्ट कर दिया था। वशिष्ठ जी में विशेषता थी कि वे कभी भी क्रोधित नहीं होते थे। उद्वेग नहीं आता था, हमेशा ही संयमित और प्रसन्न रहते थे। जो गुरु की सबसे ऊंची स्थिति है, वे संयमित रहकर सबकुछ करते थे। यही कारण था कि अंत में विश्वामित्र जी को झुकना पड़ा। विश्वामित्र जी बोलते थे, जब तक वशिष्ठ जी मुझे ब्रह्मर्षि नहीं कहेंगे, तब तक मैं मानूंगा नहीं कि मैं बह्मर्षि हो गया हूं। कहते हैं कि ब्रह्मा ने ही शर्त लगाई थी कि ब्रह्मर्षि तो वशिष्ठ जी ही बना सकते हैं। जिनके सौ बच्चों को नष्ट कर दिया, उन्हीं से ब्रह्मर्षि की उपाधि लेने की कोई कल्पना नहीं कर सकता। कितनी दयालुता होगी, कल्पना कीजिए, पुत्रों को मारने वाले को माफ कर दिया। उनमें क्रोध का कितना अभाव होगा, यह सोचा जा सकता है। लिखा है कि इतना होने पर भी विश्वामित्र जी इस इरादे से आए थे कि वशिष्ठ जी को नष्ट कर दूंगा, लेकिन जब एकांत में पत्नी के साथ वार्तालाप कर रहे वशिष्ठ जी के मुख से अपने लिए प्रशंसा सुनी, तो उनको सही ज्ञान हुआ, वशिष्ठ जी के चरणों में गिर पड़े।
क्रमश:

महर्षि वशिष्ठ : ऐसा साधु न कोय

भाग -३
जो सम्मान वशिष्ठ को राजा बने बिना प्राप्त था, जो ज्ञान प्राप्त था, जो लोगों का स्नेह प्राप्त था, जो लोगों की श्रद्धा प्राप्त थी, जो लोगों के श्रेष्ठ भाव प्राप्त थे, तो राजा का पद उनके सामने छोटा दिखता था।
ज्ञानी अपने ज्ञान के माध्यम से जो सम्मान प्राप्त करता है, वह राजा कभी नहीं प्राप्त कर सकता। हम लोगों ने पढ़ा था, अपने ही देश में राजा की पूजा होती है, दूसरे देशों में कोई राजा को पूजता नहीं है, लेकिन विद्वान तो सर्वत्र पूजा जाता है। वशिष्ठ जी का सम्मान तो सर्वोच्च था। आध्यात्मिक ऊंचाई को वे प्राप्त थे, वहां लौकिक ऐश्वर्य, भूमिका या राजा का सम्मान, तमाम तरह की उपलब्धियां, वहां वैसी ही कम महत्व की हो जाती हैं, जैसे सूर्य के उगने पर जितने प्रकाश के स्तंभ हैं शून्य हो जाते हैं, जितने तारे हैं धूमिल हो जाते हैं, उनका कोई मतलब नहीं रह जाता है, जैसे सूर्य उगते ही सर्वव्यापी हो जाता है। वैसे ही वशिष्ठ अपनी उपस्थिति से सबको प्रभावित करते हैं। जिस ज्ञान गरिमा को वे प्राप्त हैं, जिस संयम-नियम को वे प्राप्त हैं, वहां राजा बनने का कोई मतलब नहीं होता, वहां वे राजा की तुलना में असंख्य गुना ज्यादा सम्मान पाते हैं। लिखा है शास्त्रों में कि जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म के समान ही हो जाता है।
जैसे तुलसीदास जी ने भी कहा कि
जानत तुम्हही तुमही होई जाईं।
आपको जानने के बाद आपके जैसा हो जाता है। जैसे शंकराचार्य जी के अनुसार, ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म हो जाता है, लेकिन वैष्णव मत में ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म के समान हो जाता है। ब्रह्म नहीं होता। वशिष्ठ जी संत शिरोमणि हैं, गुरु शिरोमणि हैं, ज्ञान शिरोमणि हैं, ऐसी अवस्था में आध्यात्मिक संसार में जितने भी सोपान हो सकते हैं, उसके एवरेस्ट पर विद्यमान हैं गुरु वशिष्ठ जी। ईश्वर से बराबर का दर्जा वशिष्ठ जी के पास है। वशिष्ठ जी के मन में राजा बनने या सत्ता संभालने की इच्छा कभी नहीं होती।
राजा तो विश्वामित्र थे, लेकिन वह भी राजा का पद छोडक़र ऋषि बने, राजर्षि बने और फिर ब्रह्मर्षि बने। ऐसे तमाम राजाओं का इतिहास भारत में मिलता है, जिन्होंने राजा का पद छोडक़र फकीरों का जीवन प्राप्त किया, ज्ञानियों, संतों का जीवन प्राप्त किया। वशिष्ठ जी के पास इतनी क्षमता होने के बाद भी उन्होंने राजा बनना स्वीकार नहीं किया, वे राजाओं के राजा हैं। लौकिक दृष्टि से देखा जाए, तो संपूर्ण रघुवंश में जो सबसे बड़ा पद है, राजा भी अपने हर कार्य में सम्मति लेना चाहता है, आशीर्वाद लेना चाहता है, जिसने संपूर्ण जीवन को अपनी तपश्चर्या से पल्लवित किया है, राम जी ने कहा वशिष्ठ जी को कि आप जो कहेंगे, वही होगा, दूसरा कुछ होना ही नहीं है, आपने संपूर्ण वंश को जो ऊंचाई दी है, संपूर्ण वंश को जिस तरह से सिंचित किया है, उसका कोई ऋण त्राण नहीं सकता। आप नहीं होते, तो रघुवंश आज का रघुवंश नहीं होता। ऐसे कई वंश संसार में आए और गए, लेकिन एक भी वंश रघुवंश जैसा नहीं हुआ। जो भी विशिष्टता है इस वंश में, सबकुछ आपका दिया हुआ है, हम रोम रोम से आपके ऋणी हैं। मैं प्रफुल्लित हूं, आपके मन में मेरे भाई के लिए कितना लगाव है। वशिष्ठ जी संपूर्ण गुरु हैं। दिलीप को पुत्र देकर, गंगा को लाकर, दशरथ जी को चार पुत्र देकर, उन्होंने केवल राजा बनने के लिए ही प्रेरित नहीं किया, उनको ज्ञानी भी बनाया।
कालिदास ने लिखा है कि जो रघुवंशी थे, वे विद्या का अभ्यास करते थे छोटी आयु से ही। युवा अवस्था में विवाह करके और प्रजा के रंजन के लिए प्रजा की सेवा के लिए पुत्र की प्राप्ति करते थे, जहां वृद्धावस्था आई, वहां मुनि का जीवन जीते थे, जैसे योगी लोग अपने शरीर का परित्याग करते हैं, वैसे ही रघुवंशी लोग अपने प्राणों का त्याग करते थे। जिस वंश में राजा योगी के रूप में अपने जीवन का समापन करे, जिस वंश में राजा जहां ऋषियों के पुत्र पढ़ते थे, वहां पढ़े, ऋषियों जैसा जीवन जिए, यह कितना महान वंश है। ऐसे वंश का जिन्होंने पालन-पोषण किया, ऐसे गुरु वशिष्ठ अतुलनीय ऋषी हैं।
क्रमश:

Tuesday, 17 May 2016

महर्षि वशिष्ठ : ऐसा साधु न कोय

भाग - २
जब से सृष्टि हुई, ब्राह्मण कभी आगे नहीं आते थे, अपने शिष्यों को राज्य संचालन-संरक्षण के लिए शिक्षित, प्रशिक्षित और प्रेरित करते थे। पीछे से संपूर्ण शक्ति, ज्ञान का स्रोत, संपूर्ण व्यावहारिक संस्कारों का स्रोत, संपूर्ण हमदर्दी का स्रोत उनके पास होता था। वस्तुत: तो पुरोहित ही राजा होता था। राज्य में अकाल पड़ गया, तो पुरोहित ही समाधान करता था कि वर्षा कैसे होगी, किसी भी तरह के संकट के समय उपाय करता था, समाधान खोजता था।
रघुवंश के ही एक प्रतापी राजा दिलीप को संतति नहीं हो रही थी, तो वशिष्ठ जी ने कहा कि नंदिनी की सेवा करो, कामधेनु की बेटी है। कामधेनु का अपमान हो गया है, आप कहीं से आ रहे थे, रास्ते में कामधेनु थी, लेकिन आपने उनका सम्मान नहीं किया, इसी कारण आपका वंश रुक गया। उसके बाद वशिष्ठ के निर्देश के अनुसार, राजा ने नंदिनी की सेवा की। राजा स्वयं गाय चराने जा रहा है, विश्व के इतिहास में यह अनोखी घटना है कि दुनिया का सबसे प्रतापी राजा रोज गाय चराने जाता है, गाय खड़ी होती है, तो खड़ा होना, जहां जा रही हो, वहां जाना, हवा के समान उस गऊ का अनुसरण करना।
कितनी ऊर्जा थी कि किसी राजा को संतति चाहिए, तो पुरोहित को मालूम है कि क्यों संतति रुक गई। राजा को गऊ के पीछे लगा देना, गऊ की हर सेवा में अपने को समर्पित कर देना, उससे पुण्य की प्राप्ति होना, उससे पुत्र की प्राप्ति होना, यह कोई मामूली बात नहीं है। केवल पंचांग देखकर पूजा करवा देना ही पुरोहित का काम नहीं है।
मैंने पढ़ा है कि एक राजा ने वशिष्ठ जी के बिना ही यज्ञ करवा दिया, तो वशिष्ठ जी ने शापित कर दिया, अरे, मैं पुरोहित हूं, तुमने दूसरे पुरोहित से यज्ञ करवा लिया, मैं कहीं चला गया, तो तुम मेरी प्रतीक्षा न कर सके। उसे शापित करके मनुष्य योनि से वंचित कर दिया। बाद में लोगों ने उन्हें समझाया। तो इतनी शक्ति थी गुरु वशिष्ठ में। अनुग्रह और निग्रह की अपार शक्ति गुरु वशिष्ठ के पास थी, तो कहने का अर्थ यह है कि पुरोहित अपने जजमान का संपूर्ण ज्ञान, विज्ञान, सामाजिक आर्थिक विकास करता था, उसमें सहायक बनता है।
बहुत महत्वपूर्ण भूमिका गुरु वशिष्ठ की है। इस भूमिका का इतने लंबे समय तक उन्होंने निर्वाह किया। जिस वंश का विश्व में कितना बड़ा योगदान है, राम जी जिस वंश में हुए। ईश्वर अवतार लेता ही रहता है, अपनी सृष्टि की देखभाल करता है, जो कमी आ रही है, उसे दूर करना, साधुजनों का सम्मान करना, संरक्षण करना, साधुजनों को दिव्य लाभ देना। राम जी को सबल बनाने में वशिष्ठ जी का भी बहुत बड़ा योगदान है।
दशरथ जी की तीन रानियों को कोई संतति नहीं हो रही थी। सभी ओर से हतोत्साहित होकर, कहीं से जब उपाय नहीं दिखा, तब गुरु वशिष्ठ को कहा। तब गुरु ने कहा कि हां, आपको पुत्र की प्राप्ति होगी। फिर यज्ञ हुआ, तो राम जी आए, राम जी को प्रकट कराने के अन्य कई कारण हैं, अन्य कई भूमिकाएं हैं, कई लोगों को श्रेय मिलेगा, लेकिन मुख्य श्रेय गुरु वशिष्ठ को मिलेगा। यदि ईश्वर प्रगट होता है, तो कोई साधारण घटना नहीं होती। सुप्रीम पावर मनुष्य रूप में आए, यह कोई मामूली बात नहीं है। राम के रूप में ईश्वर सुप्रीम रूप में प्रगट हुए, इसका एक कारण वशिष्ठ भी थे, उनकी भूमिका अनुपम है।
उनका यज्ञ समाधान यज्ञ होता है। समाधान भी गुरु वशिष्ठ ने ही किया। उन्होंने दशरथ जी से कहा,
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन विदित भगत भय हारी।
उन्होंने कहा कि आपको चार पुत्र होंगे। स्वयं चरम शक्ति आपको पुत्र के रूप में प्राप्त होगी। किसी काल में वशिष्ठ जी ने ही राजा भगीरथ को ऐसे तैयार किया था कि वे गंगा को धरा पर लाने में समर्थ हो गए। वशिष्ठ जी के काल में जितनी महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं, वो रामराज्य में सहायक बनीं। यदि ऐसा कहा जाए कि राम राज्य रूपी महल के संबल थे वशिष्ठ जी, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। रामजी जंगल जाते हैं १४ वर्ष तक भरत राज्य का संचालन करते हैं, भरत जी राम जी को मनाने जाते हैं, प्रजा के साथ गुरु वशिष्ठ भी जाते हैं और पूरा प्रयास करते हैं कि राम जी लौट आएं। लौटकर प्रजा को प्रसन्न करें, प्रजा दुखी हो रही है। भरत को ऐसा राज्य नहीं चाहिए। उसमें भी मुख्य भूमिका है वशिष्ठ जी की। यदि नहीं आते हैं राम, तो चरण पादुका का लाभ हुआ, तो बड़ी सांत्वना भरत जी को राम जी की ओर से मिल गई। उसी को सिंहासन पर प्रतिष्ठित करके भरत जी ने १४ वर्ष तक राज्य का संचालन किया, इस राज्य के मुख्य केन्द्र गुरु वशिष्ठ जी ही रहे। भरत जी तो नंदीग्राम में रहते थे और चरण पादुका और गुरु वशिष्ठ जी से आज्ञा मांगकर सलाह लेकर प्रेरणा लेकर, उनका भाव समझकर, उनके चरणों की छाया, उनके दिव्य व्यक्तित्व की छाया में संपूर्ण राज्य का संचालन करते थे। तो अभिप्राय यह है कि वशिष्ठ जी ने अपने ज्ञान-पुण्य प्रताप से रघुवंश को ऊंचाई पर पहुंचा दिया।
क्रमश:

महर्षि वशिष्ठ : ऐसा साधु न कोय

(महर्षि वशिष्ठ पर केन्द्रित महाराज के प्रवचन के संपादित अंश)  

कुछ गुरु प्रारंभिक शिक्षा के होते हैं, तो कुछ मध्य शिक्षा के और कुछ अंत शिक्षा के होते हैं और उतने ही काल तक उनकी भूमिका रहती है। शिक्षक और गुरु का जो दायरा है, उसी में वे जुड़े रहते हैं। कोई-कोई गुरु ऐसे भी होते हैं, जो जीवन भर जुड़े रहते हैं। जरूरी है कि गुरु का ज्ञान बड़ा हो, व्यावहारिकता बहुत अच्छी हो, बच्चों या शिष्यों को जोडक़र रखने की कला हो। गुरु जो शिष्यों की गतिविधियों को बल देता हो, तो क्रम बना रहता है जीवन भर, लेकिन दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए। गुरु वशिष्ठ का जो लंबा क्रम था, एक तो वे कुल पुरोहित थे, वे केवल राम जी के गुरु नहीं थे, दिलीप और रघु के गुरु नहीं थे, वे संपूर्ण रघुवंश के पुरोहित नियुक्त हुए थे। पुरोहित तमाम तरह की पारिवारिक, सामाजिक गतिविधियों और संस्कारों की गतिविधियों से, बुराइयों से बचाने की अनेक गतिविधियों से जुड़ा रहता है। सत्यनारायण कथा भी हो, तो पुरोहित के बिना नहीं होती। विवाह हो या मुंडन हो, पुरोहित के बिना कोई भी संस्कार संभव नहीं है। नामकरण संस्कार, विद्यारम्भ संस्कार, जनेऊ संस्कार, गर्भाधान संस्कार से लेकर अंतिम संस्कार तक, संपूर्ण कार्य पुरोहित के माध्यम से ही संपन्न होते हैं। यह बड़ी खासियत थी कि वशिष्ठ जी कुल पुरोहित के साथ-साथ जीवन को आलोकित करने वाला जो संपूर्ण ज्ञान है, वैदिक सनातन धर्म का जो सार सर्वस्व है, जो परम रहस्य है, उसके भी ज्ञाता थे। वे शिक्षा देने का भी काम करते थे। उन्होंने ज्योतिष व अन्य तमाम तरह के ज्ञान प्राप्त थे। लौकिक जीवन में जिन संस्कारों की जरूरत होती है, जैसे तंत्र-मंत्र की जरूरत होती है, उसके भी वशिष्ठ जी ज्ञाता थे, इसलिए ऐसा कोई राजा इस वंश में नहीं हुआ है, ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ है, जो वशिष्ठ से न जुड़ा हो। कई बार गुरु अपने कई दुव्र्यसनों के कारण भी जजमान परिवार से दूर हो जाता है, लेकिन गुरु वशिष्ठ जी में किसी तरह का वैसा दुव्र्यसन या दुव्र्यवहार नहीं था, किसी तरह की कुचेष्टा नहीं थी, जो उन्हें रघुवंश से दूर करती है, अत्यंत समर्पित रहने के कारण वे निरंतर रघुवंश से जुड़े रहे।
रघुवंश का पुरोहित उन्हें उनके पिताश्री ने ही बनवाया था। वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि रघुवंशियों या सूर्यवंशियों के कुल पुरोहित बन जाओ, तो उन्होंने कुछ अरुचि जताई। यह बहुत अच्छा कर्म नहीं है, ऐसा सीधे कहा तो नहीं, क्योंकि इससे पिता की आज्ञा का उल्लंघन होता था, लेकिन जितना उत्साह होना चाहिए था, जितना आनंद होना चाहिए, उतना उन्हें नहीं हुआ था। ब्रह्मा जी समझ गए कि पुत्र को पुरोहित बनने के लिए जाना है, इसलिए उसका मन ठीक नहीं लग रहा। यह आम धारणा रही है कि पुरोहिती को कोई अच्छा काम नहीं माना गया। वैसे अपने यहां पुरोहित का बहुत महत्व है, अगर यह नहीं हो, तो सारा संसार भ्रष्ट हो जाए।
वैसे आज गर्भाधान संस्कार, नामकरण संस्कार इत्यादि अनेक संस्कार हैं, जो नहीं होते हैं। खाने-पीने में लोग पैसा लगाते हैं, लेकिन मूल संस्कार कर्म में नहीं लगाते हैं। फिर भी यह धारणा है, पुरोहिती को कभी प्रशस्त कर्म नहीं माना गया है, ऐसा उल्लेख भी मिलता है। फिर भी पिता की आज्ञा का पालन वशिष्ठ जी ने किया, रघुकुल के पुरोहित हो गए। कुल पुरोहित का अर्थ है, किसी भी तरह की कोई समस्या आती है, किसी भी तरह का व्यवधान आता है, तो पुरोहित आगे बढक़र जजमान को मार्ग दिखाए। पुरोहित बनकर वशिष्ठ जी ने समग्र रघुवंश की सेवा की। रघुवंश को संसार का सबसे बड़ा और सबसे अच्छा वंश कहा जाए, तो कुछ भी गलत नहीं होगा। वशिष्ठ जी ने अपने संपूर्ण ज्ञान से इस वंश को पाला, विकसित किया और समृद्ध बनाया। वे केवल पूजा-पाठ ही नहीं करवाते थे, केवल शिक्षा देने तक ही वे सीमित नहीं थे, संपूर्ण गतिविधियों का संपादन उनके द्वारा होता था। रघुवंश में कोई भी निर्णय या पहल गुरु वशिष्ठ के बिना संभव नहीं था। उनसे सम्मति ली जाती थी, इसलिए दूसरे गुरुओं से बिल्कुल अलग वशिष्ठ का व्यापक सम्बंध अपने जजमान परिवार के साथ था। कुल पुरोहित को किसी तरह की कमी नहीं होती थी, संपूर्ण साधन उसके पास होते थे। 
पुरोहित को राजा समान समझा जाता था, जजमान अपने पुरोहित को संपूर्ण समृद्धियों से सज्जित करते रहते थे, लगता था, जैसे राजा ही हैं, कोई साधन विहीन ब्राह्मण नहीं हैं, अध्यापक या पुरोहित नहीं हैं। संपूर्ण समृद्धियों से भरा-पूरा उनका जीवन रहता था। वशिष्ठ जी तो केवल पुरोहित ही नहीं, बहुत पहुंचे हुए ऋषि थे। ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में उनकी गणना है। भगवान की दया से उन्होंने तप, संयम, नियम, शुद्ध आहार और विचार से संपन्न संपूर्ण जीवन जिया, किसी तरह की कमी नहीं थी।
क्रमश:

Monday, 16 May 2016

साधु, तुझको क्या हुआ ?

समापन भाग 
जो वेद तत्व हैं, वो अनादि है और उसका जो परिष्कार हुआ, वेदों, इतिहासों पुराणों के रूप में। कबीरदास हुए, संत ज्ञानेश्वर जी हुए, तुकाराम जी हुए, भारत के हर प्रांत में एक से बढक़र एक संत हुए। ईश्वर में कितनी शक्ति है कि उसकी ऊर्जा ने अनेक संतों को उत्पन्न कर दिया।
स्वामी विवेकानंद के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस जी, जो गृहस्थ के रूप में रहते थे, किन्तु तब भी उन्होंने ऊंचे संतत्व को प्राप्त किया। आज संसार में संतत्व को महत्वपूर्ण रूप में देखना चाहिए। जैसे सूर्य, ग्रह नक्षत्र तारे हैं, ठीक उसी तरह से ईश्वर जो सबसे बड़े सूर्य हैं, लेकिन उनकी भावनाओं को लोगों के बीच पहुंचाने का काम संतों ने हमेशा ही किया है। मैं किसी संत विशेष की बात नहीं कर रहा हूं, किन्तु इतना अवश्य कहूंगा कि संतत्व संसार से कभी खत्म नहीं होगा। 
मैं तो मोहम्मद साहब और ईसा मसीह को भी मान देता हूं। अजमेर वाले ख्वाजा गरीबनवाज भी सूफी संत थे। सूफी संतों में अनेक ऐसे हुए हैं, जो अहं ब्रह्मास्मि कहते थे, एक ऐसे सूफी संत की हत्या कर दी गई। जब उन्हें जलाकर राख समुद्र में फेंकी गई, तो उसमें से भी अहं ब्रह्मास्मि की आवाज आई, जिसने उस जल को पिया उसके पेट से भी अहं ब्रह्मास्मि की आवाज आने लगी। उस सूफी संत ने कितना तप किया होगा, सोचकर देखिए। जिसने उन्हें मरवाया था, उसने भी जब जल पिया, तो उसके पेट से भी आवाज आने लगी अहं ब्रह्मास्मि। कितना संयम किया होगा, कितना तप किया होगा, तभी तो ऐसी शक्ति अर्जित हुई।
हम लोगों की यह भावना है कि संसार के सभी क्षेत्रों में परिवर्तन हुए हैं। खान-पान, चिंतन बदला है, किन्तु ऐसे परिवेश में भी संतत्व कहीं भी निखर सकता है, संतत्व लाखों-लाखों को प्रेरित करता है। लोगों को संयम के लिए प्रेरित करना, अच्छाई की ओर प्रेरित करना, दुराचार को रोकने का प्रयास करना, समाज को ईश्वर की ऊंचाई की ओर ले जाना। यहां तो तोते को भी राम राम रटवाने की परंपरा रही है। पशु-पक्षी सारा वातावरण ईश्वरीय हो। रामायण, योगदर्शन, पुराणों में लिखा है कि व्यक्ति पूर्णत: अहिंसक हो जाए, तो साक्षात विरोधी जो जीव हैं, उनमें भी अहिंसा की भावना आ जाती है। यदि आप सच्चे अहिंसक हो जाएं, तो आपके पास सांप और नेवले भी साथ-साथ आ जाएंगे, वे भी अपना परस्पर विरोध छोड़ देंगे। परस्पर शाश्वत विरोध वाले बाघ और हिरण एक साथ ऋषियों के आश्रम में रहते थे, कोई किसी को परेशान नहीं करता था। प्रेम का वातावरण संत बनाते हैं। दुनिया की दूसरी व्यवस्थाओं, प्रशासनिक, वैज्ञानिक व्यवस्थाओं में उतना दम नहीं है, जितना संतों की व्यवस्था में दम है। अत: ईश्वरीय समाज का, ईश्वरीय भावना के अनुरूप समाज का निर्माण होना चाहिए।
आज नेताओं को देखिए। उनमें आवश्यक गुण नहीं हैं। संसदीय प्रणाली जैसी होनी चाहिए, लोकतंत्र के लिए, वैसी नहीं है। यदि नेताओं में लोकतांत्रिक भाव ही ठीक से नहीं है, तो ईश्वरीय भाव कहां से आएगा? ईश्वरीय संसार को ईश्वरीय शक्ति के माध्यम से ही ईश्वरीय वातावरण देने का एकमात्र जो कारण है, उसी का नाम संतत्व है। संतत्व कभी नष्ट नहीं होता। अभी अनेक संत संसार की श्रेष्ठ सेवा कर रहे हैं। देश और दुनिया में ऐसे असंख्य लोग हैं, जो ईश्वरीय जीवन को जी रहे हैं।
जय श्रीराम

साधु, तुझको क्या हुआ ?

भाग - ५
आज हमें प्रयास करना है कि इस संसार में अच्छाई को बल मिले, सभी में ईवरीय जीवन वितरित हो, धैर्य का जीवन वितरित हो। संतों, ऋषियों को अपनी ऊर्जा का ध्यान रखना चाहिए, उन्हें पता होना चाहिए कि ऊर्जा कहां लगानी है। ताडक़ा, सुबाहू को तो विश्वामित्र जी भी मार सकते थे, लेकिन वे अपनी तप-जप शक्ति को नष्ट करना नहीं चाहते थे, इसलिए राम-लक्ष्मण जी को मांगकर ले गए और राक्षसों के आतंक को कम करवाया, जिससे यज्ञ संभव हुए।
तो संतों के श्रेष्ठ जीवन की बड़ी लंबी परंपरा है, इसमें अब शिथिलता आई है। युगों का परिवर्तन होता रहता है, जब कलयुग समाप्त हो जाएगा, तब पुन: सतयुग आएगा, सभी भावों में परिष्कार आ जाएगा, सही भावों में मजबूती आ जाएगी।
संतों के सम्बंध में अपने मनोबल और मनोभावों को यह सोचकर दूषित नहीं करना चाहिए कि अब संत नहीं रहे। ईश्वर की फैक्ट्री बंद होने वाली नहीं है। एक फैक्ट्री बंद होती है, तो तमाम फेक्ट्रियां खुल जाती हैं। जो ईश्वर की प्रक्रिया है, उसमें कभी भी संतत्व लुप्त नहीं होता है, क्योंकि संत तो ईश्वर के प्रतिनिधि हैं। संत में गुणवत्ता की कमी आ जाना संभव है, लेकिन संतत्व पूरी तरह से कभी लुप्त नहीं होता।
लोगों को आज आशंका होती है, संतों पर प्रश्न उठते हैं। फिर भी यदि विवेचना की जाए, तो अनेक ऐसे संत मिलेंगे, जिनका जीवन पवित्र है, जो पूरा जीवन समाज के लिए लगा रहे हैं, कहीं से भी जिनमें कोई बुराई नहीं है। अनेक संत उत्तम निर्माण में लगे हैं। लोगों को परखने में अवश्य परेशानी होती है, वे गलत लोगों को भी संत मान लेते हैं। रजनीश को भी लोगों ने संत मान लिया था, जबकि उनका शास्त्रों, वेदों से लेना-देना नहीं था, जिनका संयम-नियम से लेना-देना नहीं था, जहां सच्चा साधु जीवन नहीं था, जो आदमी यह कह रहा है कि संभोग से समाधि होती है, वह वैदिक सनातन धर्म का कैसे हो सकता है? हमारे चिंतन में यह बात कहीं नहीं दिखाई देती। परिणाम सामने है, आज उन्हें संत के रूप में कम ही लोग याद करते हैं।
ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि संपूर्ण संतत्व लांछित हो गया है। जैसे कभी मंदी आ जाती है, मजबूती गायब हो जाती है, तो कभी मंदी दूर हो जाती है, मजबूती आ जाती है। परिवर्तन चलता रहता है, ठीक इसी तरह से संतत्व समाज का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है। संत के रूप में हमें ईश्वर प्रतिनिधि रूप में प्राप्त हैं।
संत और ईश्वर में अभेद भावना का भी उल्लेख किया गया है। देवर्षि नारद जी स्वयं भी एक संत हैं, हर युग में उनकी उपस्थिति मानी जाती है, वे हमेशा ही रहते हैं। उन्होंने अपने गं्रथ में लिखा है कि संत में और भगवान में कोई भेद नहीं होता। भगवान की जो भावना होती है, जो उसके गुण होते हैं, जो उसकी क्रिया होती है, जिस तरह से परिवर्तन होते हैं, वे सभी संतों में भी होते हैं। रामानंद संप्रदाय में एक संत हुए नाभादास जी, उन्होंने संत चरित्र की रचना की, वे राजस्थान के सीकर में रैवासा पीठ में रहे। उन्होंने भी यही कहा कि भक्त और भगवान में भेद नहीं होता।
सारे वेदों में संत तत्व एक ही है। सारा संसार ईश्वर स्वरूप ही है। जेट चलाने वाले से लेकर रिक्शा चलाने वाले तक ईश्वर की व्याप्ति है, किन्तु सभी लोग एक ऊंचाई के नहीं होते हैं। सबकी अपनी-अपनी ऊंचाई होती है, ठीक उसी तरह से संत एक जैसे नहीं होते, लेकिन संतत्व का जो सही परिमार्जित स्वरूप है, वह ईश्वर की भावना का स्वरूप है। इन्हीं भावों को ईश्वरों ने शास्त्रों के रूप में प्रस्तुत किया। संतों ने ईश्वर के लिए समर्पित होकर शास्त्र ज्ञान को संसार के लिए समर्पित किया।
क्रमश:

साधु, तुझको क्या हुआ ?


भाग - ४
दुनिया के दूसरे देशों में भी संत हुए, लेकिन जितनी समृद्ध परंपरा संतों की भारत में रही है, वैसी कहीं नहीं रही। कल भी नहीं थी और आज भी नहीं है और कल भी नहीं रहेगी। यहां संतत्व की प्राप्ति का बड़ा राजमार्ग था, इस राजमार्ग पर चलकर असंख्य लोग संतत्व को प्राप्त करते थे। इस मार्ग पर चलना है, यह ईश्वरीय मार्ग है, यह खाने-कमाने का मार्ग नहीं है। कहीं भी रहकर संतत्व को प्राप्त किया जा सकता है, किसी भी कमरे में किसी भी क्षेत्र में, भाषा, जाति, समाज, आयु में रहकर संत बना जा सकता है।
रोम-रोम से जैसे ईश्वर का जीवन होता है, वैसे ही संत का जीवन होना चाहिए, कहीं कोई बुराई नहीं, वासना नहीं, कहीं कोई राग, विद्वेष नहीं। कोई दुर्गण उनमें नहीं है, ये लोग घूम-घूमकर संस्कारों का प्रचार करते हैं, असंख्य लोगों को मंगलमय जीवन देते हैं, पूर्ण विश्राम का जीवन देते हैं। अद्भुत जीवन है उनका। ऐसी ही देश में एक लंबी परंपरा चली है, संतत्व जो है, वह सतयुग में भी वैसा ही था, त्रेता में भी और द्वापर में भी ऐसा ही और कलयुग में भी ऐसा ही है।
कौन कितना बड़ा संत है, यह कैसे तय होगा? संत ने ईश्वरीयता को कहां तक प्राप्त किया है और कहां तक प्राप्त नहीं किया है, इससे ही संत के बड़े या छोटे होने का निर्धारण होगा। जिसको ज्ञान नहीं है, वैराग्य, निष्ठा, प्रेम नहीं है, वो संत कैसे बनेगा? कभी भी किसी भी काल में सभी लोग पूर्णत: संतत्व को प्राप्प्त नहीं होते हैं। जो ईश्वरीय कण है, वह सभी में नहीं आता। जैसे सभी लोग वैज्ञानिक नहीं होते, सभी लोग अच्छे खिलाड़ी नहीं होते, सभी लोग बड़े विद्वान नहीं होते, जैसे सभी लोग बलशाली नहीं होते, जैसे सारे लोग योग्य नहीं होते, वैसे ही सभी संतत्व की प्राप्ति में लगे हुए लोग पूर्ण संत नहीं होते। संतत्व आंशिक रूप से आता है, कुछ मात्रा में आता है, आंशिक रूप से आ जाता है, तो भी संत सम्मानित हो जाते हैं।
आजकल संतत्व लांछित हो रहा है, संतों को जो काम करना चाहिए, नित्य अनुष्ठान, संयम, नियम, तप का जो उपक्रम होना चाहिए, वह अब नहीं हो रहा है। संतों को जो काम करने चाहिए, उसमें काफी गिरावट आई है। त्रेता में भी गिरावट आई, कुछ द्वापर में आई और कलयुग में भी गिरावट हुई। इसलिए समाज भी लांछित हो रहे हैं, क्योंकि संतत्व कम हुआ है। संतत्व की प्राप्ति में लगे हर व्यक्ति को देखकर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। अनेक प्रयासरत संतों को देखकर लोगों को लगता है कि अब संत नहीं होते, अब संतों का जीवन सात्विक नहीं रहता। आज ऐसे संत बहुत कम हैं, जिन्हें खाने-पीने, धन की चिंता नहीं है, जिन्हें परिवार और अपनी जाति की चिंता नहीं है। ऐसे संत कम हैं, जिन्होंने स्वयं को संसार को समर्पित कर रखा है।
फिर भी आज समाज में संत की बड़ी उपयोगिता है। आम आदमी में विकार होता है, अपनी कमाई का थोड़ा धर्म पर खर्च करता है, लेकिन सच्चा संत जो भी कमाता है, उसे पूरा का पूरा समाज पर खर्च कर देता है। संत और आम आदमी में यही फर्क है, संत जो भी कमाता है, उसे पूरा खर्च कर सकता है, लेकिन आम आदमी बचत के बारे में सोचता है। कई संत तो कर्ज लेकर भी समाज का भला करते हैं, क्योंकि समाज के कार्य जरूरी हैं। अच्छे संत अपने ऊपर पैसे खर्च नहीं करते। आम आदमी जो भी बल हो, ज्ञान हो, प्रभाव हो, उसका उपयोग अपने लिए, अपने लोगों, अपने परिवार के लिए, अपने सम्बंधियों के लिए करता है और संत का जो स्वभाव है, संत की जो आंतरिक कमाई है, उसे वह संपूर्ण समाज के लिए खर्च करता है। कहीं से उसमें यह भावना नहीं होती कि ये हमारी जाति के हैं, हमारे संपर्क वाले हैं, हमारे सम्बंधी हैं, हमारी भाषा के हैं। जितने जुड़ाव हैं, उन सबसे अलग हटकर संत अपने जीवन को समाज-संसार के लिए अर्पित कर देता है। निश्चित रूप से संसार की जो स्थिति आज है, यदि संतों को घटा दिया जाए, तो लोगों को अच्छा जीवन जीने की कला ही नहीं आएगी। 
संत प्रयोगशाला भी होते थे और कारखाना भी। संत लेबोरेटरी भी होते थे और फैक्ट्री भी। संत श्रेष्ठ भावों की प्रयोगशाला होते थे, वे स्वयं में अच्छे मूल्यों का प्रयोग करते थे और दूसरों को भी इसके लिए तैयार करते थे। दूसरों में भी सफल प्रयुक्त-उपयोगी भावों को डालना संतों का ही काम होता है।
महर्षि विश्वामित्र जी के जीवन में ऐसा प्रसंग आता है कि वे जब राजा थे, तब वशिष्ठ जी से पवित्र गऊ कामधेनु पुत्री नन्दिनी मांग रहे थे। जब वे सेना के माध्यम से गाय ले जाने लगे, तब नन्दिनी ने वशिष्ठ से पूछा कि क्या मैं बचने-छूटने का प्रयास करूं। वशिष्ठ जी ने कहा कि करो। नन्दिनी ने तत्काल विशाल सेना को जन्म दिया और विश्वामित्र की सेना पराजित होकर लौटने को मजबूर हो गई। विश्वामित्र ने अनेक प्रकार से वशिष्ठ को कष्ट दिए, उनके पुत्रों को भी मार दिया, लेकिन वशिष्ठ जी कुछ नहीं बोले, कहीं कोई आक्रोश नहीं, विद्वेष नहीं। साधु ऐसे ही होते हैं। इसका प्रभाव विश्वामित्र जी पर पड़ा, वे समझ गए कि राजाओं से भी अधिक शक्ति व महानता साधुओं-ऋषियों के पास है। उन्होंने भी तप-जप-नियम से स्वयं को ब्रह्मर्षि बना लिया।
क्रमश:

साधु, तुझको क्या हुआ ?

भाग - ३
ईश्वर ने संसार को बनाकर छोड़ दिया होता, यदि ऋषियों, संतों, विद्वानों का सृजन नहीं हुआ होता, तो संसार वहीं का वहीं पड़ा रहता। जैसे वेदों ने कहा कि सत्य बोलना चाहिए, सत्यम वद्। वेदों के माध्यम से ईश्वर ने यह बोल दिया, लेकिन वह हर व्यक्ति के पास आकर यह नहीं बोल सकता कि आप सत्य बोलिए, भगवान कितना समय कितने लोगों के साथ बिता सकते हैं, इसीलिए शास्त्रों की रचना हुई, शास्त्रों का अनुसरण करके संतों ने अपने जीवन को अच्छा व धन्य बनाया। संसार में अनेक संतों का प्रादिर्भाव हुआ, न जाने कितने संतों ने संतत्व के विकास के लिए अपना संपूर्ण जीवन लगा दिया। संयम, नियम से सज्जित जीवन के माध्यम से ऊंचाई को प्राप्त किया। उन्होंने बार-बार बताया कि मेरा जीवन अपने लिए ही नहीं है, संपूर्ण संसार के लिए है। जैसे सूर्य अपने लिए नहीं उगता, जैसे चांद अपने लिए नहीं उगता, जैसे नदियां अपने लिए नहीं बहतीं, आकाश अपने लिए ही आवागमन की सुविधा नहीं देता, ठीक उसी तरह से संत का जीवन भी दूसरों के लिए है। संत, मुनि जीवन के लोग अपने जीवन को समाज के लिए पूर्णत: समर्पित कर देते हैं, उनमें अपना स्व कुछ नहीं होता, उनमें अपने भोग की भावना नहीं होती। कहीं भी वे शक्ति नष्ट नहीं करते, कहीं मन में कटुता नहीं आती। एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, संपूर्ण जीवन वे ऐसा ही करते चलते हैं। केवल ईश्वरीय भावों को, सर्वश्रेष्ठ भावों को सबको बांटना है। सर्वश्रेष्ठ भावों को अपने जीवन में उतारकर उसका प्रयोग सबको बताना है। कोई भेदभाव नहीं करना है, न जाति का भेदभाव, न क्षेत्र का, न भाषा का, हमें तो बस अच्छी बातें बतलाना है, लोगों को सुशिक्षित बनाना है, सत्य बोलना है और लोगों से बोलवाना है।
सत्य में जो प्रतिष्ठित होता है, वह यदि किसी पापी को भी बोल दे कि तुम स्वर्ग जाओगे, तो पापी को स्वर्ग मिल जाता है, ऐसा योग दर्शन में कहा गया है।
इसमें पैसा नहीं लगता, इसके लिए किसी बड़े विश्वविद्यालय में डिग्री लेने की जरूरत नहीं है, अखाड़े में जाने की जरूरत नहीं, मैदान में जाने की जरूरत नहीं है, जो जहां पर है, वहीं पर जो ज्ञान हुआ है, जो वस्तु जैसी है, उसका ध्यान करे और उसी के अनुरूप बोले। संसार की बहुत बड़ी समस्या का समाधान केवल सत्य बोलने से हो जाएगा और यही काम संत लोग सदा से करते रहे हैं।
कबीरदास जी की एक कथा है। वे एक दिन बैठकर राम-राम भजन कर रहे थे, तभी एक आदमी भागता हुआ आया और बोला, ‘मुझे बचाओ, कोई मुझे हथियार लेकर मारने के लिए दौड़ा रहा है। बोल रहा है कि मार दूंगा, आप मुझे बचाओ।’
पास ही रुई का ढेर था, कबीरदास जी ने कहा, ‘जाओ, उसमें छिप जाओ।’
वह व्यक्ति बहुत डरा हुआ था, बिना विचार किए वह तत्काल जाकर रुई के ढेर में छिप गया। इसके कुछ ही पल बाद तलवार लिए एक आदमी आया, उसने पूछा, ‘यहां एक आदमी दौड़ता हुआ आया था क्या?’
कबीरदास जी ने कहा, ‘हां, इसी ढेर में छिपा हुआ है।’
हमला करने आए व्यक्ति ने कहा, ‘मुझे मूर्ख बना रहे हो, जिसे मौत का भय होगा, वह रुई के ढेर में छिपेगा क्या? उसमें तो मारना बहुत आसान है, रुई में तो कोई आग लगा देगा, तो छिपा बैठा आदमी मर जाएगा। तलवार से बचना है, तो व्यक्ति कहीं और छिपेगा। वह सोचेगा कि किसी भी तरह से सुरक्षा हो जाए, यह संभव नहीं है कि कोई रुई में छिपे।’
कबीरदास जी ने कहा, ‘मैं कह रहा हूं कि वह यहीं छिपा है।’
हमलावर व्यक्ति को विश्वास नहीं हुआ, वह बुरा-भला कहते आगे बढ़ गया। उसके जाने के कुछ देर बाद रुई में छिपा व्यक्ति बाहर निकला। उसने कबीरदास जी से कहा, ‘आप बाबा बड़े ढोंगी हो, आपने मुझे छिपाया और वह आया तो आपने उसे भी बता दिया कि इसी में छिपा है, आप तो ढोंगी हैं, आप तो जान के साथ खिलवाड़ कर रहे थे, मैं तो भाग्य से बच गया।’
कबीरदास जी ने कहा, ‘मैंने तुम्हें रुई से नहीं ढका था, मैंने तुम्हें सत्य से ढका था, सत्य पर कोई तलवार काम नहीं करती। तुम छिपे थे, मैं संत हूं, मैंने ही छिपाया था, मैंने ही कहा कि आप मार दीजिए, लेकिन सत्य इतना मजबूत है कि उस हमलावर को विश्वास ही नहीं हुआ। वह तो उसे रुई समझ रहा था और मैं सत्य समझ रहा था।’
तो संत लोग अपने प्रत्येक व्यवहार को सत्यतापूर्वक चलाते हैं। संयम, वैराग्य की इच्छा से अपना पूरा जीवन चलाते हैं और समाज में ऐसे श्रेष्ठ मूल्यों का प्रचार करते हैं, जिन मूल्यों के कारण मनुष्य मनुष्यता वाला बन जाता है, जिसके कारण मनुष्य देवता तक बन जाता है, चंद्रमा बन जाता है, ग्रह-नक्षत्र बन जाता है।
क्रमश:

साधु, तुझको क्या हुआ ?

 भाग - २
ईश्वर ने अपने प्रतिनिधि के रूप में संतों को भेजा है। जैसे लोकतंत्र प्रतिनिधि तंत्र है, ठीक उसी तरह से संतों का समाज भी ईश्वर का प्रतिनिधि तंत्र है। उसके सभी उद्देश्यों, सभी इच्छाओं, सभी लीलाओं, क्रियाओं, सभी व्यवस्थाओं को संत जन समाज कल्याण के लिए प्रयुक्त करते हैं। संत स्वयं को केवल समाज के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए, केवल मानवता के लिए ही नहीं, अपितु संपूर्ण प्राणियों के लिए समर्पित करके सबके विकास को गति देते हैं।
संसार में साधुओं, संतों का बड़ा काम है। संतों ने मानव समाजों को ईश्वरीय ज्ञान से जोड़ा, संस्कारों से जोड़ा, जीवन जीने की कला से जोड़ा है। विकास की तमाम क्रियाओं से जोड़ा है और सबकुछ इतना अच्छा किया कि पूरा संसार उनकी ओर देखता है। ऐसे बड़े कामों के लिए, लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए संत का बड़ा अच्छा और वैसा ही सही स्वरूप होना चाहिए, जैसे ईश्वर के किसी प्रतिनिधि का होना चाहिए।  
आज यह हमें जानना होगा कि संत का सही स्वरूप क्या होता है। जब वह अपने ज्ञान द्वारा ईश्वर को समझ लेता है, अपनी भक्ति द्वारा ईश्वर को प्राप्त कर लेता है, अपनी शरणागति द्वारा ईश्वर को प्राप्त कर लेता है और उसके गुणों से युक्त हो जाता है, जब उसी तरह से अपने संपूर्ण जीवन को संसार का जीवन बना लेता है, जब अपनी संपूर्ण इच्छाओं को संसार की इच्छाओं में डालकर विकास के लिए प्रयास करता है, तमाम उपयोगी विविधिताओं में गुणों को डालकर उनके विकास के लिए प्रयास करता है, तब उसको सही संत का दर्जा प्राप्त होता है। तभी वह संसार में संत के रूप में सार्थक होता है। उसका सम्बंध केवल वस्त्र-आभूषण से नहीं है, किसी एक पंथ या संप्रदाय से नहीं है, बाहरी आडंबरों से नहीं है। वास्तव में आंतरिक उत्कर्ष ही संतत्व का लक्षण है। यह उत्कर्ष उसकी क्रियाओं में प्रकट होता है, यह संत की सबसे बड़ी पहचान है। संत का कर्म कभी स्वार्थ के अनुरूप नहीं होता, हमेशा परमार्थ के अनुरूप होता है।
आज लोगों को भी यह देखना होगा कि संत का केन्द्रीकरण कहा है, कहां के लिए वह अपने जीवन को लगा रहा है, किसी काम के लिए स्वयं को थका रहा है, किस उद्देश्य के लिए जीवन व्यतीत कर रहा है, उसके जीवन का परम लक्ष्य कहां है। निस्संदेह, संत का उद्देश्य सम्पूर्ण संसार के लिए होना चाहिए। वह यह चाहता है कि सभी लोगों को महा-आनंद मिल जाए, सभी लोग सुखी हो जाएं, यदि कोई ऐसा चाहता है और इसके लिए प्रयास करता है, तो वैदिक सनातन धर्म में उसे संत कहा गया है।
केवल सनातन धर्म में ही नहीं, दूसरी परंपराओं में भी अच्छे संत हुए हैं। हम कभी यह नहीं मानते कि संत केवल भारतीय समाज में हुए। मुसलमानों में भी एक बड़ी धारा सूफियों की रही, जिनका जीवन बहुत अच्छा था, जिनमें सत्ता लोभ नहीं था, भोग नहीं था, जो तपस्या से रहते थे, बहुत त्याग से रहते थे, उनमें दान पाने के लिए उतावलापन नहीं था। ऐसे ज्ञान से प्रेरित होकर मुस्लिम धर्म में भी अनेक संत हुए। अपूर्व शक्ति और स्थान उन्होंने प्राप्त किया। न जाने कितने लोगों के जीवन को सुधारा। जो सही मायने में जीवन का चरम है, वे वहां पहुंच गए।
ईसा मसीह को भी संत का दर्जा प्राप्त है, उन्होंने भी संसार को अपने जीवन से धन्य बनाया। यह परंपरा संसार में अनादि है, जैसे संसार अनादि है, जैसे ईश्वरीय व्यवस्था, उसके संस्कार अनादि हैं। इस संसार का तो यह पता ही नहीं है कि यह कब बना। कर्मों के आधार पर लोगों ने उसे विकसित किया है। केवल बच्चा जन्म देने से बच्चा पवित्र जीवन का नहीं हो जाता, उसके पालन-पोषण में उच्चता होनी चाहिए, उसे पढ़ाना, शब्दों का ज्ञान कराना, ज्ञान देना, यह प्रक्रिया लंबी चलती है और जीवन भर चलती रहती है।
क्रमश: