Tuesday, 13 September 2011

दुनिया में इतना दुख क्यों है?

एक दिन मैं बिहार यात्रा में किसी गांव जा रहा था। विभिन्न स्वभाव और विभिन्न आयु व आकार-प्रकार व अवस्थाओं के लोग साथ थे। उन लोगों ने कई प्रकार की चर्चाएं छेड़ रखी थीं, लेकिन उन चर्चाओं का कोई समाधान नहीं हो रहा था। कोई पूछ रहा था कि माता पिता को लोग क्यों नहीं मान रहे हैं, कोई भ्रष्टाचार की बात कर रहे थे। हर आदमी के मन में कोई न कोई जिज्ञासा थी, लेकिन उसका समाधान उस समूह के द्वारा नहीं हो रहा था। देखने से यही लग रहा था कि लोग जिज्ञासु हैं, जानने की इच्छा है। शास्त्रों में लिखा है, जिज्ञासा तभी होती है, जब संदेह हो और जब अपना मतलब सिद्ध होना हो। तो दुनिया में कोई ऐसा नहीं है, जिसे जिज्ञासा नहीं हो। हर किसी को कोई न कोई मतलब भी है और संदेह भी है।
तो चर्चा चल रही थी, क्यों लोग भ्रष्टाचारी हो रहे हैं, क्यों मर्यादाएं खो रही हैं। मुझसे लोगों ने पूछा कि आप इस पर कुछ बोलिए। मैंने कहा कि आप लोग अच्छी चर्चा कर रहे हैं, लेकिन इस चर्चा का कहीं एक जगह समाधान होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। मैंने कहा कि देखिए, व्यावसायिक उदाहरण से आपको समझाने का प्रयास कर रहा हूं। व्यवसाय में सभी को किसी दूसरे की सहायता लेनी पड़ती है। अपनी पूंजी से बड़ा व्यवसाय सभी लोग नहीं करते। बहुत बड़ा प्रतिशत उन लोगों का है, जो बैंक या दूसरों से ऋण लेकर व्यवसाय शुरू करते हैं। कुछ लोग मित्रों और रिश्तेदारों से ऋण लेकर व्यवसाय शुरू करते हैं। जो आदमी पैसा ले ले और उसे लौटाए नहीं, बाजार में उसकी साख खत्म होने लगती है। उसे लोग ऋण देने में संकोच करने लगते हैं। लोग उसे चोर कहेंगे, गलत आदमी कहेंगे। बाजार से आदमी बाहर हो जाएगा। यह आम दुनिया की बात है, तो मेरा यह मानना है कि सारी जो अव्यवस्थाएं हैं, वे सिर्फ इसलिए है कि जहां से हमने ऋण लिए हैं, उन ऋणों को चुका नहीं रहे हैं। हमारे ऊपर देवताओं का ऋण हैं, जो हमें वायु देते हैं, जल देते हैं, आकाश देते हैं, पृथ्वी देते हैं, किन्तु हम यह भूल जाते हैं।
मनुष्य जब जन्म लेता है, तो तीन ऋणों के साथ जन्म लेता है। पितृ ऋण, ऋषि ऋण और देव ऋण। इन तीनों से ऋणवान होकर ही आदमी जन्म लेता है। जो टाटा-बिड़ला के परिवारों में जन्म लेगा, वह भी इन तीन ऋणों के साथ जन्म लेगा। अमीर हो या गरीब, सबको ऑक्सीजन की, प्रकाश की और जल की आवश्यकता पड़ेगी। जन्म लेते ही जो हमें संस्कार मिले, जो ज्ञान-विज्ञान मिले, वह ऋषियों का ऋण है, वह परंपरागत रूप से हमें प्राप्त है और एक ऋण हमारे पितरों का हमारे शरीर में है। इन तमाम लोगों से हम ऋण लेकर आगे बढ़ते हैं और इन ऋणों को नहीं चुकाना ठीक उसी तरह से है, जैसे बाजार से ऋण लिया हो, किन्तु चुकाया नहीं। जो ऋण नहीं चुकाता, वह कभी पनप नहीं पाएगा, कभी यशस्वी नहीं हो पाएगा, कभी शांत नहीं होगा। हम सभी को इन ऋणों को चुकाने का प्रयास करना चाहिए। इन ऋणों को नहीं चुकाने के कारण ही संसार में सारी अव्यवस्थाएं हैं। सारी समस्याएं हैं।
सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए और कहा कि इस बात को प्रचारित करने की जरूरत है। जो माता-पिता के ऋण को नहीं चुकाएगा, राष्ट्र के ऋण को नहीं चुकाएगा, हम राष्ट्र की सडक़ों पर चलेंगे, लेकिन हम राष्ट्र या सरकार को नहीं मानेंगे, ऐसा कैसे चलेगा। जो ईश्वर को नहीं मानता, उसका कैसे चलेगा, मूल पिता तो वही हैं। संसार के सभी लोगों को इस परंपरा से जुडऩा चाहिए कि आपको अपने विकास के लिए जहां से शक्ति मिली है, वहां के प्रति कृतज्ञता की भावना होनी ही चाहिए। ऋषियों से क्या लिया, देवताओं से क्या लिया, पितरों से क्या लिया, यह अवश्य विचार करना चाहिए।
शास्त्रों में पांच यज्ञ करने के लिए कहा गया है, ऋषि (ब्रम्ह) यज्ञ - स्वध्यात्मक, देव यज्ञ - हवनात्मक, पितृ यज्ञ - तर्पणात्मक, भूत यज्ञ - गाय को चारा डालना, पंछियों को दाना डालना इत्यादि, मनुष्य यज्ञ - अतिथि, दीन हीन अभ्यागत व अतिथियों को भोजन कराना सत्कार करना। जो व्यक्ति अपने जीवन में इन यज्ञों या कर्मों को करता है, वही सुखी होता है और कष्टों से बचा रहता है।
(महाराज के प्रवचन से)

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