Sunday, 11 September 2011

स्वामी रामनरेशाचार्य जी

रामबहादुर राय
स्वामी रामानन्द ने जहां से भक्ति आंदोलन चलाया, वह काशी का पंचगंगा घाट है। उस पर श्रीमठ है। इस मठ का नामकरण अपने आप में भक्ति की गंगोत्री का प्रतीक है। श्री का अर्थ सीता से है। साफ है कि स्वामी रामानंद का भक्ति आंदोलन भगवान श्रीराम का गुणगान है। जब स्वामी रामानंद का सप्तशताब्दी महोत्सव मनाया गया, उसके अध्यक्ष तत्कालीन मुख्यमंत्री दिज्विजय सिंह थे, उस समय यह जाना जा सका कि वे संत पीपा के वंशज हैं। याद करिए कि स्वामी रामानंद के शिष्यों में एक पीपा भी थे। जो श्रीमठ था, वह स्वामी रामनरेशाचार्य से पहले श्रीहीन हो गया था। उसे जगाने में स्वामी रामनरेशाचार्य लगे हैं, विद्वानों का मानना है कि श्रीमठ बहुत विशाल था। आश्चर्य की बात है कि स्वामी रामानंद का विशाल आनंदमठ और श्रीमठ ऐतिहासिक रूप से प्राय: लुप्त हो गए। स्वामी रामानंद का वह विशाल वन, जिसमें हजारों संन्यासी रहते थे, सैंकड़ों सूफी, पचासों संत, फकीर, जंगम, जोड़े, नाथपंथी रहता करते थे, वहां लोगों के घर हैं। मस्जिदें हैं, तरह तरह के पड़ाव हैं, गलियां हैं, दुकानें हैं। पंचगंगा घाट पर श्रीमठ के रूप में बहुत जरा-सी पुण्य भूमि बची हुई है।
स्वामी रामनरेशाचार्य उस श्रीमठ के आचार्य हैं, जिसे स्वामी रामानंद ने बनाया था। राममंदिर आंदोलन के वे अग्रणी संत रहे हैं। वे उन्हीं दिनों रामानंदाचार्य पीठ पर आए जब राममंदिर आंदोलन रफ्तार पकड़ रहा था। उन्होंने शिलान्यास के लिए जनजागरण का बीड़ा उठाया था। देश के अनेक हिस्सों में यात्राएं की , लेकिन आंदोलन की मुख्यधारा से वे बाद में अलग हो गए। पी वी नरसिंराव के जमाने में जो सरकारी ट्रस्ट बना, उसके वे प्रधान बनाए गए। यह १९९४ की बात है।
संत साहित्य के विद्वान डॉक्टर सुखदेव सिंह की नजर में स्वामी रामनरेशाचार्य भी रामानंद की प्रतिमूर्ति जान पड़ते हैं। इसी सही साबित करने के लिए उन्हें यह मंत्र बार-बार दोहराना होगा। मैं अनेक बार जन्मा और अनेक बार मरा हूं। तब भी अगर मैं ताजा और हरा हूं, तो कारण इसका यह है कि मेरे हृदय में श्रीराम की खींची हुई अमृत रेखा है।
(यह उस लेख का अंश है, जो करीब दस साल पहले जनसत्ता में छपा था।)

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