Sunday, 18 September 2011

नाथ आज मैं काह न पावा

राम जी जब अपने पिता के वरदान स्वरूप जंगल जा रहे थे। उन्हें वनवासी होने का वरदान दिया गया था। कैकई ने मांगा था, रामजी को १४ वर्षों का वनवास होगा और भरत को राजा बनाया जाएगा। वनवासी राम वनवासी वेष धारण करके वन की ओर निकल गए। उस पूरे वन यात्रा में, पिता की आज्ञा के पालन की यात्रा में राम जी ने सम्पूर्ण मानवता को लाभ पहुंचाया। यात्राओं का एक विशेष स्वरूप होता है। जैसे वनस्पति वैज्ञानिको की यात्रा, जैसे खनिज वालों की यात्रा, राजनेता की यात्रा। राजनेता यात्रा करता है, तो अपने वोट बैंक को मजबूत करता है। खनिज पदार्थों का अन्वेषण करने वाले यह पता लगाते हैं कि कहां खनिज तत्व हैं। राम जी भी वनवास यात्रा पर निकले। रामजी ने वहां केवल अपने वनवासी स्वरूप को ही नहीं बनाए रखा, बल्कि सम्पूर्ण संसार को वनवासी होने की प्रेरणा भी दे सकते। रामभाव में आने की प्रेरणा दे सके। वनवासी होने का भी अभिप्राय है भौतिक जीवन से संन्यासी जीवन की ओर बढऩा। बालों को जटा बना लिया, शैम्पू-साबुन की जरूरत नहीं। पैरों में जूते की जरूरत नहीं। कोई शृंगार नहीं, कोई आडंबर, कोई दिखावा नहीं, वृक्ष के नीचे रहना है, गांव में भी नहीं जाना है। ऋषियों के बीच रहना है, सत्संग में रहना है, अच्छी संगत में रहना है, वनवासी जातियों की परंपराओं से जुडऩा है। उन्होंने १४ वर्षों के वनवास काल में सम्पूर्ण संसार को वनवासी जीवन का आदर्श दिया। इससे सम्बंधित केवट वाला प्रसंग मैं सुनाना चाह रहा हूं।
राम जी केवट के पास गए कि मुझे नदी पार जाना है। केवट ने कहा कि मैं आपके चरण धोऊंगा। केवट को वनवासी से क्या लेना-देना? उसका काम तो नाव चलाना और मजदूरी लेना है। राम जी से अच्छा ग्राहक कौन मिलेगा? अगर अभी नकद पेमेन्ट नहीं होगा, तो उधारी ही लिखवा लेता। उसको क्या कहा जाएगा कि जो रोज कमाता है, रोज खाता है। जिसका जीवन रोज सूर्योदय से सूर्यास्त तक अर्जन और भोग का माध्यम है। वह कौन-सा प्रयास था, कौन-सी बात थी कि केवट ने चरण धोने की बात कही। उसमें ऐसा परिवर्तन हुआ राम जी को देखकर, राम जी को छूकर, उनसे बात करके कि जब राम जी मजदूरी देने लगे, तो उसने कहा, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। एक व्यक्ति पिता की आज्ञा से राजा होते-होते जंगल जा रहा है। जंगल जाते-जाते भी छोटे-छोटे से छोटे कर्म और छोटी से छोटी सोच, छोटी शिक्षा वालों को भी रामभाव में लाने के प्रयास में जुटा है। जब राम जी उसे मजदूरी दे रहे हैं, तो उत्तर सुनिए, नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा। बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी। अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।
केवट पूर्ण रूप से रामभाव में आ गया। जो राम जी का सम्प्रेषण है, वह अद्भुत अतुलनीय है। बाहर से तो वह पहले ही प्रभावित कर रहे हैं, लेकिन आंतरिक धरातल भी उजागर है। कहा जाता है, जब राम जी चले गए, तो केवट ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली कि जब राम जी लौटेंगे, तब उन्हीं को देखूंगा और किसी को नहीं देखूंगा। नौका बांधकर चलाऊंगा, दूसरे किसी व्यक्ति को नहीं देखूंगा, जो अव्रती होगा, क्रोधी होगा, कामी होगा, भ्रष्ट होगा, किसी को नहीं देखूंगा।। आंख पर पट्टी बंध गई, तब तक बंधी रही, जब तक राम जी लौट न आए। राम जी जब लौटे, तब राम जी ने कहा कि अब पट्टी खोल दो, उसने कहा, आप चले जाएंगे, तो फिर पट्टी बांध लूंगा। तब राम जी ने कहा, नहीं उसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि तुम्हें अब हर जगह राम ही दिखाई पड़ेंगे।
कितना बड़ा संदेश है इसमें। तमाम जो बड़े व्यक्तित्व हैं, विभिन्न क्षेत्रों के बड़े लोग हैं, उनके द्वारा अपने क्षेत्र में अपने ही समान लोगों का निर्माण क्यों नहीं हो रहा है? इस पर मेरा कहना है कि जो बड़े लोग हैं, वे अपने जैसे लोगों का निर्माण करना ही नहीं चाहते हैं। जो बड़ा उद्योगपति है, वह चाह रहा है कि दूसरे लोग उनसे दबें और साथ न खड़े हों। बड़ा क्रिकेटर बड़ा क्रिकेटर पैदा नहीं कर रहे हैं। बहुत दिनों से एक ही 'बिग बी चल रहे हैं बुढ़ापे तक, दूसरा 'बिग बी नहीं खड़ा कर रहे हैं, यहां तक कि अपने बेटे को भी स्वयं की तरह नहीं खड़ा कर पा रहे हैं। दूसरों को अपने जैसा विशाल बनाने के लिए जरूरी है कि आप अपने अंतर और बाह्य को एक जैसा बनाएं। राम जी बिना कोई उपदेश दिए, बिना जादू टोना, बिना किसी अनुष्ठान के केवट को, कोल-भील्लों को परिवर्तित किया। उनकी दूसरी कोई नीति नहीं, उनकी एक ही नीति है, सबको ऊंचाई पर लाना। बाहर और भीतर जब एक होता है, तो कोई भी आदमी बड़ा हो जाता है। जैसे पहाड़ों में जो घास-पात हैं, वो भी पत्थर हो जाते हैं, मिट्टी भी पत्थर हो जाती है। आज प्रयास तो खूब हो रहे हैं, ढेर सारे लोग परिवर्तन के लिए प्रयासरत हैं, बड़े-बड़े अभियान चल रहे हैं। समाज में अनेक मठाधीश, भागवत-कथाकार, उपदेशक सक्रिय हैं, किन्तु उनके द्वारा कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है, क्योंकि जो बोल रहा है, वह अंदर बाहर से एक नहीं है। अधिकतर लोग तो यही चाहते हैं कि हमारा बाह्य जीवन कैसे विस्तार पाएगा, हमें लोग बड़ा कैसे समझेंगे, किन्तु राम जी ऐसा नहीं क रते। उन्होंने न केवल स्वयं तपस्वी जीवन जीया, बल्कि दूसरों को भी प्रेरणा दी। जो भी उनके संपर्क में आया, उसमें रामभाव आ गया। इसीलिए मैं कहा रहा हूं कि जो भी समाज सुधारक हैं, वे अंतरमन और बाहर को एक करके दूसरों को भी अपने जैसा बनाने के प्रयास करें।
आदि शंकराचार्य ने कहा, गुरु पारसमणि लोहे को भी सोना बना देता है, लेकिन पारसमणि नहीं बनाता। सच्चा गुरु तो वह है, जो अपने जैसा बना देता है। सबमें गुरुत्व का भाव आए, मैं ऐसी परिकल्पना करता हूं। नकली गुरु कदापि नहीं बनना है। उपदेश कुछ दे रहे हैं और मन कुछ सोच रहा है। ऐसे तो सारा समाज ही दिग्भ्रमित हो जाएगा। राम जी ने केवट को अपने जैसा बना दिया। केवट उसी ऊंचाई तक पहुंच गया। यही सच्चा परिवर्तन है। अगर इसी विचारधारा पर सारे गुणी लोग चलें, तो ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्रों में बड़े-बड़े लोग तैयार हो जाएंगे, राष्ट्र और विश्व का कल्याण हो जाएगा।
जय श्रीराम
(जयपुर में जगदगुरु का एक प्रवचन)

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