Thursday, 29 September 2011

मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि

भ्रूण हत्या, पहला - भाग
आज कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ी समस्या है। हम मानते हैं कि हत्या होनी ही नहीं चाहिए, क्योंकि जो जीवन दान है, वह हमारे द्वारा नहीं होता है, चाहे कीट का जीवन हो या पतंग का जीवन हो। यहां तक कि हम गेहूं, चावल भी स्वयं नहीं बना पाते हैं, हम केवल बीज डालते हैं, सींचते हैं, उसमें फूल स्वत: आता है, फल आता है। जो बनाता है, उसी को नष्ट करने का अधिकार है। रोटी हम बनाते हैं, बिल्ली आदि से उसकी रक्षा करते हैं, हम उसको खा जाते हैं या लोगों को खिला देते हैं। तीनों काम हुआ, उत्पादन, पालन और संहारण, इसलिए हम रोटी के स्वामी हैं। स्वामी को अधिकार है। मकान बनाया हमने, तो स्वामी उसका कोई दूसरा होगा क्या? इस संसार में एक भी ऐसा मनुष्य शरीर नहीं है, जो मनुष्य बनाता हो। गर्भाधान संस्कार हुआ, उसके बाद कौन-सी शक्ति है जो ७२ हजार नाडिय़ों को बनाए, ईश्वर ने निमित्त बनाया, माता और पिता के गुणों का संयोजन हुआ, लेकिन शरीर की जो संरचना है, कहां नाक, कहां कान, कहां मुंह, कहां मस्तिष्क , कैसे रक्त जा रहा है, कहां वायु का मार्ग और कहां से पानी जा रहा है। इसमें से एक भी उत्पादन मनुष्य नहीं करता। आत्मा के साथ शरीर का जो संयोग है, वह मुनष्य के लिए संभव नहीं है। इसलिए वेदों ने यह नहीं कहा कि ब्राह्मण को मारो, क्षत्रिय को नहीं मारो, वेदों ने कहा, किसी भी प्राणी को नहीं मारो।
मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि अर्थात किसी भी प्राणी को नहीं मारो। यह वाक्य है हिंसा के विरुद्ध, ऐसा कोई दूसरा वाक्य नहीं है, पूरी दुनिया के साहित्य में नहीं है।
अपने यहां एक कथानक सुनाते हैं लोग, जिसने पूर्वजन्म में तितली को कांटे चुभोए थे, उसे सूल पर बैठना पड़ा। हमारे यहां ऐसा प्राचीन संविधान है। बहुत स्पष्ट उदाहरण है। मारने से तो पाप है ही, उसके अनुमोदन से भी पाप लगता है। दुनिया में एक ही कानून है, आपको मैं गाली दूं, आप कब तक मेरी वंदना करेंगे। जैसा हम आपके साथ करेंगे, वैसा आप हमारे साथ करेंगे। हम आदर करेंगे, आदर मिलेगा। संसार में ध्वनि भी लौटती है। जैसी ध्वनि आप उत्पन्न करेंगे, वैसी ही ध्वनि आप तक लौटेगी। राम को पुकारेंगे, तो राम लौटेंगे, रावण को पुकारेंगे, तो रावण ही लौटेगा। मारने का अधिकार किसी को नहीं है, जो मारेगा उसे दंड मिलेगा। इसलिए यहां तो किसी को वाणी से भी नहीं मारा जाता, मन से भी नहीं मारा जाता, शरीर से मारने की बात भूल जाइए, क्या बात है। आज भी भगवान की दया से अपने यहां सिखाया जाता है कि पता नहीं, कौन ऋषि, महर्षि हो। पहले वृंदावन में किसी भी चीज को नहीं मारते थे। वृक्ष काटने को भी पाप ही कहते हैं, आजतक दुनिया में कोई भी वृक्ष काटने वाला बड़ा आदमी नहीं हुआ। लकड़ी बेचकर लकड़ी वाले थोड़े दिन तक पैसे वाले हो जाते हैं, कुछ ही साल बाद नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि जीवित वृक्ष को जो काटेगा, उसका तख्तापलट हो जाएगा। यहां यह बात सबको पता है। हमारे मठ के प्रबंधक ने एक दिन कहा कि मैं आम के वृक्ष को काटने आऊंगा, आप मुझे रोकना। मैंने कहा, आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं, उन्होंने कहा, आम के पेड़ को डराना है, कई साल हो गए फलता ही नहीं है। वो आए कुल्हाड़ी लेकर लगे बोलने कि काटो इस पेड़ को, बेकार हो गया है, फलता ही नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है, तीन-चार साल हो गए फल ही नहीं रहा। मैंने कहा, मत काटिए, इनको एक बार मौका दीजिए। ऐसा नाटक हुआ कि अगली बार आम इतना फला कि मत पूछिए। वृक्ष में प्राण होते हैं, संवेदना होती है, वह डरता है, वह लोभ भी करता है, उसमें भी आत्मा है, यह आज की बात नहीं है। हमारे यहां कहा जाता है कि कोई अमुक काम करेगा, तो अगले जन्म में ये वृक्ष होगा, अमुक काम करेगा, तो वो वृक्ष होगा।
वह कैसा समाज होगा, जहां किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होगी। जिस समाज में किसी की हत्या की भावना नहीं होगी। व्यभिचार नहीं होगा, किसी प्रकार का अत्याचार नहीं होगा। शोषण नहीं होगा, दुख नहीं होगा।
क्रमश:
जगदगुरु के एक प्रवचन से

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