Thursday, 13 October 2011

जात पांत पूछै नहीं कोई

भाग-दो
बिहार में मेरे एक बड़े भक्त हैं। बात बड़ी जोरदार करते हैं। होटल के मालिक हैं। खूब धार्मिक हैं, शायद ही कोई आदमी हो, जो अपनी आमदनी का चौथा भाग धर्म पर खर्च करता हो। वे करते हैं। चौथा भाग राजनीति में, चौथा भाग परिवार में और चौथा भाग व्यापार में खर्च करते हैं। राजा आदमी हैं। उन्होंने मुझे बुलाया, मैं गया। यज्ञ मंडप में उन्होंने मुझे किसी कार्य से बुलाया, कहा, 'चलिए,' मैं दंड छोडक़र चल पड़ा, तो उन्होंने कहा, 'ओह, दंड क्यों छोड़ रहे हैं, इसी को तो हम नमस्कार करते हैं, बाकी आप रामनरेशाचार्य जी तो पहले भी थे। ये दंड स्वामी जी हैं, राम जी हैं, इनको नमस्कार है, इन्हें साथ ले चलिए।' कितनी बड़ी ज्ञान की बात उन्होंने की। मैंने दंड थाम लिया। तो ऐसा है हमारा संप्रदाय। न कोई परिवारवाद, न क्षेत्रवाद, न जातिवाद, हमने वेदों की नब्ज पकड़ ली है।
जब राम जी और भरत जी निषादराज को, कोल, भिल्लों को गले लगा सकते हैं, तो रामानंदाचार्य जी रविदास को क्यों नहीं अपना सकते?
दुःख क्यों होता है?

Tuesday, 4 October 2011

जात पांत पूछे नहीं कोई

यह ईश्वरावतार की भूमि है, ऐसी भारत भूमि हमें प्राप्त हुई। कहा जाता है, ईसाई धर्म दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है। ईसाई देश दुनिया में सबसे धनवान हैं। दुनिया का नेतृत्व कर रहे हैं, दुनिया की सारी गतिविधियों को प्रभावित करते हैं। तो जिसके पास पैसा है, वह तो बड़ा हो जाता है, सुंदर हो जाता है। ये सभी बातें आपको मालूम हैं। किन्तु काफी लंबे समय तक कोई काले रंग का आदमी संत की उपाधि प्राप्त नहीं कर सका था। अमरीका को स्थापित हुए सवा दो सौ साल से भी अधिक हो गए। ईसा मसीह को २००० वर्ष हो गए, किन्तु कैसा धर्म है कि काले लोग संत नहीं बन पाते हैं, अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, वहां काले रंग वाले को भी संत की उपाधि दी गई। यहां तो जब कहा गया कि विद्याध्ययन ब्राह्मण ही करेगा, ब्राह्मणों को ही संन्यास लेने का अधिकार होगा, ऐसा कहा शंकराचार्य जी ने। धर्म को निश्चित रूप से उनका योगदान अनुपम है, लेकिन इस बात पर उनके अनुयायियों ने ही विरोध कर दिया। इस बात का विरोध विद्वान मंडन मिश्र ने कर दिया, जो बाद में सुरेश्वराचार्य के रूप में जाने गए, सृंगेरी मठ के प्रथम शंकरचार्य हुए. कहा यह गलत है, जिसे जेनऊ का अधिकार है, उसे वेदाध्ययन करने का अधिकार है, संन्यास लेने का भी अधिकार है। तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, तीनों संन्यासी बनने लगे। दशनाम की परंपरा है, संन्यासी में भी दो विभाग हैं एक तो दंड वाले लोग और दूसरे दशनाम हैं। जो दंडी नहीं हैं। बिना दंड के हैं, जैसे महामंडलेश्वर इत्यादि। यह सनातन धर्म है, यहां ऐसे गुरु हैं, जिन्हें शंकराचार्य कहा जाता है।
दु:ख क्यों होता है?

मीडिया में महाराज


(राजस्थान पत्रिका में रविवार को महाराज जगदगुरु के सम्बन्ध में २ अक्टूबर को प्रकाशित सामग्री)
संस्कृत का संरक्षण मेरा उद्देश्य
बारह साल की उम्र में बिहार के भोजपुर से अपना गांव परसिया छोड़कर साधु बने स्वामी रामनरेशाचार्य संस्कृत में निरंतर लुप्त हो रही हजारों साल पुरानी न्याय दर्शन, वैशेषिक और वैष्णव दर्शन की परंपरा को पुनर्जीवित करने में लगे हुए हैं। काशी की विद्वत परंपरा के विद्वान आचार्य बदरीनाथ शुक्ल से 10 वर्षो तक विद्याध्ययन करने के बाद रामनरेशाचार्य ने ऋषिकेश के कैलाश आश्रम में बिना किसी जाति-पांति व वर्ग का भेद किए हजारों विद्यार्थियों व साधुओं को न्याय दर्शन, वैशेषिक और वैष्णव दर्शन पढ़ाया। संस्कृत के दुर्लभ व लगभग अप्राप्त ग्रंथों का प्रकाशन कर रामनरेशाचार्य ने विलुप्त होते अनेक ग्रंथों को भी बचाया है।
अपने जीवन के छह दशक पूरे कर रहे रामनरेशाचार्य काशी में जगद्गुरू रामानंदाचार्य के मुख्य आचार्य पीठ "श्रीमठ" में 1988 से "जगद्गुरू रामानंदाचार्य" के पद पर अभिषिक्त होने के बाद भी अनेक देशी-विदेशी छात्रों को संस्कृत मे निबद्ध भारतीय दर्शन की जटिल शास्त्र प्रक्रिया को निरंतर सहज रूप से पढ़ा रहे हैं। देश के अनेक क्षेत्रों में संस्कृत विद्यालयों की स्थापना कर रामनरेशाचार्य विद्यार्थियों को सारी सुविधाएं भी निशुल्क ही उपलब्ध करवाते हैं। आदिवासी क्षेत्र में रामनरेशाचार्य ने संस्कृत की एक ऎसी अलख जगाई है कि वहां स्थापित विद्यालयों में हजारों छात्र समान रूप से बिना किसी भेद-भाव के संस्कृत पढ़ रहे हैं।

दु:ख क्यों होता है?

Saturday, 1 October 2011

गलत लोगों का बहिष्कार हो

भ्रूण हत्या केवल समाज का संतुलन ही नहीं बिगाड़ रही है, केवल शादी की समस्या ही नहीं पैदा कर रही है, आतंकवाद का विस्तार भी कर रही है, जो दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है। विचार के क्रम में मेरे मन में यह भाव भी आया कि लंका में सारे दुराचार होते थे, लूट, अत्याचार, व्यभिचार, अपहरण, लेकिन भ्रूण हत्या नहीं होती थी, आपस में वहां भाईचारा था। विभिषण का भी सम्मान था, कुम्भकर्ण का भी सम्मान था। हां, लंका में भोग की वृत्ति गलत थी।वैसे अपने राष्ट्र में कन्या द्रोह पुराना है। राजा लोग, क्षत्रिय लोग लड़कियों को विष चटा देते थे कि किसी के सामने सिर नहीं झुकाना पड़ेगा। लडक़ी हो जाए, तो सिर झुकाना पड़ता है। राम राज्य में यह परंपरा नहीं थी।
दु:ख क्यों होता है?

घर घर आतंकवाद

भाग २
भ्रूण हत्या से चिंता यह नहीं है कि लड़कियों की संख्या कम होगी, तो लडक़ों की शादी कैसे होगी। शादी जरूरी नहीं है, सौ में से २० लोग ही शादी की योग्यता वाले हैं। जो योग्य नहीं, वे शादी क्यों करते हैं, शादी उसी को करना चाहिए, जिसकी जेब में पैसे हों, जो स्वस्थ हो। पुराने जमाने में सभी लोगों की शादी नहीं होती थी। बहुत पुरुष कुंवारे रह जाते थे, अभी भी हरियाणा वगैरह में प्रथा चल रही है, पांच भाइयों में एक भाई शादी कर रहा है, क्योंकि पाचों शादी करेंगे, तो सबके बच्चे होंगे, विभाजन हो जाएगा, संपत्ति बिखर जाएगी। संपत्ति बिखर जाएगी, तो परिवार का कुटुंब का सम्मान चला जाएगा। इसलिए कई परिवारों में शादियां कम होती हैं।
असली बात पर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है।

दु:ख क्यों होता है?

Thursday, 29 September 2011

मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि

भ्रूण हत्या, पहला - भाग
आज कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ी समस्या है। हम मानते हैं कि हत्या होनी ही नहीं चाहिए, क्योंकि जो जीवन दान है, वह हमारे द्वारा नहीं होता है, चाहे कीट का जीवन हो या पतंग का जीवन हो। यहां तक कि हम गेहूं, चावल भी स्वयं नहीं बना पाते हैं, हम केवल बीज डालते हैं, सींचते हैं, उसमें फूल स्वत: आता है, फल आता है। जो बनाता है, उसी को नष्ट करने का अधिकार है। रोटी हम बनाते हैं, बिल्ली आदि से उसकी रक्षा करते हैं, हम उसको खा जाते हैं या लोगों को खिला देते हैं। तीनों काम हुआ, उत्पादन, पालन और संहारण, इसलिए हम रोटी के स्वामी हैं। स्वामी को अधिकार है। मकान बनाया हमने, तो स्वामी उसका कोई दूसरा होगा क्या? इस संसार में एक भी ऐसा मनुष्य शरीर नहीं है, जो मनुष्य बनाता हो।

दु:ख क्यों होता है?

हर कोई अपनी संपत्ति बताए

भ्रष्टाचार को खत्म करना है, उसके खिलाफ आंदोलन करना है, तो आंदोलन करने वालों को सबसे पहले अपनी संपत्ति बतानी चाहिए। संपत्ति कितनी है, कैसे बढ़ी, कितनी बढ़ी है, कहां बढ़ी। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है, यह तरीका सही है। शरीर अचानक बढ़ जाता है, तो डॉक्टर पता लगाते हैं कि शरीर क्यों बढ़ा है, शक्ति बढ़ गई है या कोई और कारण है। उसके लिए डॉक्टर जांच करते हैं। जांच मेरी भी होनी चाहिए, पहले साइकिल भी नहीं थी, किन्तु बाद में पैसा कहां से आया, श्रीमठ में मार्बल, ग्रेनाइट लगने लगा। देश में हर आदमी को अपनी आय बतानी चाहिए। छोटा महंत भी बताए, सेठ भी बताए, रामानंदाचार्य भी बताएं, रामदेव जी को भी बतलाने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं, तो शंका के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। वैसे भी संन्यासी का जीवन खुला होता है, कुछ भी छिपा नहीं होता। जैसे संपत्ति आई है, आप डंके की चोट पर बताइए, कहां से आई, गलत आई है, तो आप सुधार कीजिए।
दु:ख क्यों होता है?

Wednesday, 28 September 2011

कैसे दूर होगा भ्रष्टाचार?

सीबीआई जांच या कुछ लोगों को जेल भेजने से भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा। यह भावना आनी चाहिए कि भ्रष्टाचार नहीं करके भी हम बड़े हो सकते हैं। जब तक यह विवेक जागृत नहीं होगा कि भ्रष्टाचार करने के बाद क्या कुफल होगा, तब तक भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा। किसी भी अच्छी चीज को देखकर, सुदर्शन पुरुष या सुंदर स्त्री को देखकर मन जाता है, अच्छा मकान देखकर भी मन बहकता है, किसी का सम्मान हो रहा हो, तो अपने मन को भी लगता है कि अपना भी सम्मान होता। यह भावना स्वाभाविक है, लेकिन इस भावना को नियंत्रित अनुशासित करने के लिए विवेक जरूरी है। यदि हम चरित्र सम्बंधी भ्रष्टाचार की बात करें, तो स्त्री और पुरुष का परस्पर आकर्षण स्वाभाविक है, उनकी जो संरचना है, उसे भगवान ने ही बनाया है। पुरुष का आकर्षण महिला के लिए, महिला का आकर्षण पुरुषों के लिए स्वाभाविक है।
दु:ख क्यों होता है?

Tuesday, 27 September 2011

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ

हम संसार को अनादि मानते हैं। मनुष्य अनादि काल से विकास के लिए जुटा है। विकास के प्रयास में ज्ञान भी संसाधन है। बल भी संसाधन है। विकास में हमारा व्यवहार, परस्पर सौहार्द्र और प्रेम भी संसाधन है। विकास की जो भावना है, वह हम सब लोगों में है। हम ब्रह्म के अंश हैं, ब्रह्म का स्वभाव ही विकासशील है। जो निरंतर विकासशील हो, वही ब्रह्म है, जो महान है, वही ब्रह्म है। हमारे मन में भी विकास की भावना निरंतर है, हमारा, ज्ञान बढ़े, सुंदरता बढ़े, लोग इसमें लगे रहते हैं, परिवार बढ़े, कीर्ति बढ़े, व्यवहार भी बढ़ाता है, पहचान भी बढ़ती है। विकासशील स्वभाव को सही तरीके से नहीं समझने की वजह से ही भ्रष्टाचार में संसार लिप्त हो गया है।
दु:ख क्यों होता है?

Wednesday, 21 September 2011

ऐसे संत कम हैं

रामबहादुर राय
प्रसिद्ध पत्रकार
ऐसे संत कम हैं, जो विद्वान भी हैं और अपनी बात ढंग से रख सकते हैं। इनकी जो पहली योग्यता दिखती है, वह है अपने पंथ के बारे में और उसके इतिहास के बारे में बचपन से ही आकर्षण। यह भी नहीं है कि मठ के आकर्षण ने उन्हें संत बनाया हो। कई बार ऐसा भी होता है, मठ का वैभव लूटने के लिए लोग संत बन जाते हैं। बनारस में जहां ये रहकर पढ़े-लिखे हैं, एक संस्कृत विद्यालय में। उस संस्कृत विद्यालय के सामने साहित्यकार मनु शर्मा रहते थे, उनके बहुत सारे उपन्यास हैं। तब मनु शर्मा की इन सब चीजों में रुचि नहीं थी, लेकिन मनु शर्मा की माता जी जो हैं, वो रामनरेशाचार्य जी को (तब वे रामनरेशाचार्य नहीं हुए थे) बहुत मानती थीं और अपने परिवार में यह चर्चा करती थीं कि इस लडक़े को यहां से निकालना चाहिए, बहुत प्रतिभा है, बहुत क्षमता है और संस्कृत पढक़र ये भविष्य में क्या करेंगे।.. लेकिन ये उनका अपना स्नेह था, जो बालक रामनरेशाचार्य जी पर बरसता था। इससे यह मालूम होता है कि साधना करके वे यहां तक पहुंचे हैं। यह स्वाध्याय और प्रार्थना का बल है, जो वे यहां तक पहुंचे हैं। यह बात उनमें दिखाई भी पड़ती है, जो व्यक्ति स्वाध्याय और साधना से ऊपर उठता जाता है, उसमें एक स्वाभिमान भी होता है, जो रामनरेशाचार्य जी में भरपूर दिखता है।
धारणा तो यह है कि वे दिग्विजय सिंह के करीब हैं और कुछ हद तक कांग्रेस हाईकमान के भी. मेरी धारणा यह है कि दिग्विजय सिंह चूंकि रामानंद जी के एक प्रिय शिष्य संत पीपा के वंशजों में से एक हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से रामनरेशाचार्य जी का उनसे भावनात्मक लगाव है।

Monday, 19 September 2011

सूचना

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी के वीडियो देखने के लिए You Tube पर gyanghar लिख कर देखें. सामवेद के दुर्लभ पाठ से लेकर राम जी की डोली और छप्पन भोग तक।

gyanghar

सत्संग


भगवान की दया से एक बार मैं सूरत से वाराणसी के लिए यात्रा कर रहा था। प्रात: काल का समय था, लोग सो रहे थे। मैं बैठे-बैठे ईश्वर की विराट अवस्था का अवलोकन कर रहा था। कितना बड़ा आकाश, बाग-बगीचे और हमारा अपना छोटा-सा दायरा। ट्रेन में सामने ही एक सज्जन मेरी ही तरह बैठे थे। बाकी सभी लोग सो रहे थे। उन्होंने कहा, 'महाराज, मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूं।'
मैंने पूछा, 'यह प्रश्न आपके मन में कैसे आया?'
उन्होंने कहा, 'बार-बार मेरे मन में आ रहा है कि आपसे कुछ पूछूं, आपसे कोई गपशप हो।'

आनंद की खोज !

बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य ऋषि अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं, 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति। संसार के प्रत्येक व्यक्ति को अपने सुख के लिए ही पत्नी, पुत्र व धन प्रिय होता है।
एक व्यक्ति ने अपने समस्त परिवार से विद्रोह करके एक अत्यंत सुन्दर कन्या से विवाह किया। रात-दिन पत्नी को खुश करने में जुट गया। एक बार वह पत्नी के साथ गंगा में नौका विहार कर रहा था, तभी आकस्मिक तूफान आने से नाव डूबने लगी। भयभीत पत्नी बोल पड़ी, 'मुझे तैरना नहीं आता, मेरी कैसे रक्षा होगी।' पति ने उत्तर दिया, 'नाव भले डूब जाए, मैं तुम्हें पार ले जाऊंगा।' वह पत्नी को कंधे पर बिठाकर तैरने लगा।

Sunday, 18 September 2011

नाथ आज मैं काह न पावा

राम जी जब अपने पिता के वरदान स्वरूप जंगल जा रहे थे। उन्हें वनवासी होने का वरदान दिया गया था। कैकई ने मांगा था, रामजी को १४ वर्षों का वनवास होगा और भरत को राजा बनाया जाएगा। वनवासी राम वनवासी वेष धारण करके वन की ओर निकल गए। उस पूरे वन यात्रा में, पिता की आज्ञा के पालन की यात्रा में राम जी ने सम्पूर्ण मानवता को लाभ पहुंचाया। यात्राओं का एक विशेष स्वरूप होता है। जैसे वनस्पति वैज्ञानिको की यात्रा, जैसे खनिज वालों की यात्रा, राजनेता की यात्रा। राजनेता यात्रा करता है, तो अपने वोट बैंक को मजबूत करता है।
दु:ख क्यों होता है?

Wednesday, 14 September 2011

India needs own education policy

(What jagadguru thinks about education and pakistan?)

“The English system of education introduced by Lord Macaulay in the country has failed. India should now evolve its own education policy,” remarked Jagadguru Ramanandacharya Swami Ramnareshacharya Ji Maharaj of Shrimath Kashi (Varanasi), while addressing the audience at Law Auditorium, Panjab University, today.

Swami Ramnareshacharya was invited by the Panjab University Students Association to express his views on the present education system in India and the need for proper guidance in the education field in colleges and universities .

Regarding the possibility of a war, the Swami said: “India is not interested in extending her territory but wants protection at the LoC. And for this purpose, India should not be afraid of any world power.”

Commenting on the recent events, including an attack on the World Trade Centre and America’s war against terrorism, he categorically stated, ‘’It was in the knowledge of America that Osama bin Laden is Pakistan’s creation and that is why it directed Pakistan to locate Osama bin Laden.”

He further said, “India should dispell fear and leave the policy of wait and watch. India should repell terrorists activity with vigour and force. The country should not fear even declaring a war against Pakistan and should strike at the very root of evil”.

“There are some other supreme powers which do not want that Pakistan and India should lead peaceful lives. The conflict between the two countries suits them”, he added.

A report published in the tribune

Chandigarh, January 4, 2002

Tuesday, 13 September 2011

हरिद्वार में अद्वितीय श्रीराम मंदिर निर्माण



संसार के जो महामनीषी श्रीराम को भगवान के रूप में नहीं स्वीकार करते वे भी उन्हें विश्व इतिहास का सर्वश्रेष्ठ मानव मानते ही हैं। विश्व के किसी भी देश, जाति, संप्रदाय एवं धर्म के पास श्रीराम जैसे चरित्रनायक नहीं है। वर्तमान संसार की अखिल संस्कृतियां श्रीरामसंस्कृति की ही जीर्ण-शीर्ण-विकृत एवं मिश्रित स्वरूप है। यह संस्कृति अनुसंधान नायको की प्रबलतम भावना है। ऐसे मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का मंदिर कहां नहीं होना चाहिए? संसार के सभी क्षेत्रों कालों एवं दिशाओं में होना चाहिए, तभी तो मानवता का सम्पूर्ण विकास होगा। धर्म की स्थापना होगी एवं तभी रामराज्य की स्थापना होगी।

दुनिया में इतना दुख क्यों है?

एक दिन मैं बिहार यात्रा में किसी गांव जा रहा था। विभिन्न स्वभाव और विभिन्न आयु व आकार-प्रकार व अवस्थाओं के लोग साथ थे। उन लोगों ने कई प्रकार की चर्चाएं छेड़ रखी थीं, लेकिन उन चर्चाओं का कोई समाधान नहीं हो रहा था। कोई पूछ रहा था कि माता पिता को लोग क्यों नहीं मान रहे हैं, कोई भ्रष्टाचार की बात कर रहे थे। हर आदमी के मन में कोई न कोई जिज्ञासा थी, लेकिन उसका समाधान उस समूह के द्वारा नहीं हो रहा था। देखने से यही लग रहा था कि लोग जिज्ञासु हैं, जानने की इच्छा है। शास्त्रों में लिखा है, जिज्ञासा तभी होती है, जब संदेह हो और जब अपना मतलब सिद्ध होना हो। तो दुनिया में कोई ऐसा नहीं है, जिसे जिज्ञासा नहीं हो। हर किसी को कोई न कोई मतलब भी है और संदेह भी है।
दु:ख क्यों होता है?

Monday, 12 September 2011

प्रतिशोध की भावना क्यों?

(महाराज का एक प्रवचन)

सबके मन में प्रतिशोध की भावना होती है, सबके मन में यह भावना होती है कि उसके हिसाब से ही सारे काम हों। सबके अपने-अपने संकल्प होते हैं। लेकिन इसके लिए जो लोग हमारे विपरीत हैं, उनका हम क्या करें? हमें बनाना है राम राज्य और हम प्रयोग कर रहे हैं रावण राज का। सरेआम सड़क पर गलत काम हो, व्यभिचार हो, यह कदापि उचित नहीं। इस तरह से राम राज्य नहीं आएगा। रावण तो आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रतीक हुआ। उसने तो राम जी की पत्नी का ही धोखे से अपहरण कर लिया। ब्राह्मणों की तो हत्या रोज ही होती थी, वेद ध्वनि बंद हो गई थी, यज्ञ बंद हो गए, माता-पिता का सम्मान बंद हो गया था, देवताओं का कोई सम्मान नहीं रहा। अर्थ यह कि धर्म की, श्रेष्ठता की, पवित्रता की, मर्यादाओं की, अच्छी परंपराओं की विधियां नष्ट हो गई थीं। दंड व प्रतिशोध का कोई विकल्प नहीं बच गया था।
दु:ख क्यों होता है?

चातुर्मास संपन्न

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी का इंदौर चातुर्मास आज संपन्न हो गया, गीता भवन इंदौर में चातुर्मास काल में महाराज जी के दर्शन के लिए देश और विदेश से भी भक्त पधारे. हिन्दू धर्माचार्यों में स्वामी जी का चातुर्मास बहुत महत्व रखता है, आम तौर पर चातुर्मास अत्यंत कठिन और पवित्र विधान है, स्वामी जी ने चातुर्मास की परंपरा को एक तरह से पुनर्जीवन दिया है. चातुर्मास काल में स्वामी जी का सानिध्य अत्यंत लाभकारी और उर्जावान हो जाता है. वे अपनी सम्पूर्ण उपस्थिति से राम भाव का संचार करते अनुभूत होते हैं. वे ऐसे महात्मा हैं, जिनके सामने अरबपति से लेकर गरीब तक सबका समान महत्व है. इस पावन काल में न केवल उनके भक्त बल्कि देश भर के विद्वान और संत महात्मा भी जुटते हैं, ऐसे ऐसे महत्मा जुटते हैं जिनके दर्शन आम दिनों में संभव नहीं. उनके तत्वावधान में केवल ब्राहमण सभा ही नहीं होती, स्वामी जी हरिजन बस्तियों में भी जाते हैं और अपने श्रीमठ की उपयोगिता एवं परम्परा का निर्वहन करते हैं.

Sunday, 11 September 2011

स्वामी रामनरेशाचार्य जी


रामबहादुर राय
स्वामी रामानन्द ने जहां से भक्ति आंदोलन चलाया, वह काशी का पंचगंगा घाट है। उस पर श्रीमठ है। इस मठ का नामकरण अपने आप में भक्ति की गंगोत्री का प्रतीक है। श्री का अर्थ सीता से है। साफ है कि स्वामी रामानंद का भक्ति आंदोलन भगवान श्रीराम का गुणगान है। जब स्वामी रामानंद का सप्तशताब्दी महोत्सव मनाया गया, उसके अध्यक्ष तत्कालीन मुख्यमंत्री दिज्विजय सिंह थे, उस समय यह जाना जा सका कि वे संत पीपा के वंशज हैं। याद करिए कि स्वामी रामानंद के शिष्यों में एक पीपा भी थे। जो श्रीमठ था, वह स्वामी रामनरेशाचार्य से पहले श्रीहीन हो गया था। उसे जगाने में स्वामी रामनरेशाचार्य लगे हैं, विद्वानों का मानना है कि श्रीमठ बहुत विशाल था। आश्चर्य की बात है कि स्वामी रामानंद का विशाल आनंदमठ और श्रीमठ ऐतिहासिक रूप से प्राय: लुप्त हो गए। स्वामी रामानंद का वह विशाल वन, जिसमें हजारों संन्यासी रहते थे, सैंकड़ों सूफी, पचासों संत, फकीर, जंगम, जोड़े, नाथपंथी रहता करते थे, वहां लोगों के घर हैं।
दु:ख क्यों होता है?